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एकादश स्कन्ध · अध्याय 18

बृहद्रथ-कथानक

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (devibhagavatam.11.18.1)

नारद उवाच । पूजाविशेषं श्रीदेव्याः श्रोतुमिच्छामि मानद । येनाश्रितेन मनुजः कृतकृत्यत्वमावहेत् ॥

nārada uvāca pūjāviśeṣaṁ śrīdevyāḥ śrotumicchāmi mānada yenāśritena manujaḥ kṛtakṛtyatvamāvahet

नारद ने कहा — हे मानद! मैं श्री देवी की विशेष पूजा-विधि सुनना चाहता हूँ, जिसका आश्रय लेकर मनुष्य कृतकृत्यता प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 2 (devibhagavatam.11.18.2)

श्रीनारायण उवाच । देवर्षे शृणु वक्ष्यामि श्रीमत्सु पूजनक्रमम् । भुक्तिमुक्तिप्रदं साक्षात्समस्तापन्निवारणम् ॥

śrīnārāyaṇa uvāca devarṣe śṛṇu vakṣyāmi śrīmatsu pūjanakramam bhuktimuktipradaṁ sākṣātsamastāpannivāraṇam

श्री नारायण ने कहा — हे देवर्षे! सुनो, मैं श्रीमत् (श्रेष्ठ) पूजनों का क्रम बताता हूँ, जो साक्षात् भोग-मोक्ष प्रदान करने वाला और समस्त विपत्तियों का निवारण करने वाला है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.11.18.3)

आचम्य मौनी सङ्कल्प्य भूतशुद्।ह्ध्यादिकं चरेत् । मातृकान्यासपूर्वं तु षडङ्गन्यासमाचरेत् ॥

ācamya maunī saṅkalpya bhūtaśud hdhyādikaṁ caret mātṛkānyāsapūrvaṁ tu ṣaḍaṅganyāsamācaret

आचमन करके, मौन रहते हुए संकल्प करके भूत-शुद्धि आदि करनी चाहिए। मातृका-न्यास पूर्वक षडंग-न्यास करना चाहिए।

श्लोक 4 (devibhagavatam.11.18.4)

शङ्खस्य स्थापनं कृत्वा सामान्यार्घ्यं विधाय च । पूजाद्रव्याणि चास्त्रेण प्रोक्षयेन्मतिमान्नरः ॥

śaṅkhasya sthāpanaṁ kṛtvā sāmānyārghyaṁ vidhāya ca pūjādravyāṇi cāstreṇa prokṣayenmatimānnaraḥ

शंख की स्थापना करके, सामान्य अर्घ्य तैयार करके, बुद्धिमान पुरुष को अस्त्र-मंत्र से पूजा-द्रव्यों का प्रोक्षण करना चाहिए।

श्लोक 5 (devibhagavatam.11.18.5)

गुरोरनुज्ञामादाय ततः पूजां समारभेत् । पीठपूजां पुरा कृत्वा देवीं ध्यायेत्ततः परम् ॥

guroranujñāmādāya tataḥ pūjāṁ samārabhet pīṭhapūjāṁ purā kṛtvā devīṁ dhyāyettataḥ param

गुरु की आज्ञा लेकर तत्पश्चात् पूजा आरम्भ करनी चाहिए। पहले पीठ-पूजा करके तत्पश्चात् देवी का ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 6 (devibhagavatam.11.18.6)

आसनाद्युपचारैश्च भक्तिप्रेमयुतः सदा । स्नापयेत्परदेवीं तां पञ्चामृतरसादिभिः ॥

āsanādyupacāraiśca bhaktipremayutaḥ sadā snāpayetparadevīṁ tāṁ pañcāmṛtarasādibhiḥ

आसन आदि उपचारों से, सदा भक्ति और प्रेम से युक्त होकर, उस परम देवी को पंचामृत आदि रसों से स्नान कराना चाहिए।

श्लोक 7 (devibhagavatam.11.18.7)

पौण्ड्रेक्षुरसपूर्णैस्तु कलशैः शतसङ्ख्यकैः । स्तापयेद्यो महेशानीं न स भूयोऽभिजायते ॥

pauṇḍrekṣurasapūrṇaistu kalaśaiḥ śatasaṅkhyakaiḥ stāpayedyo maheśānīṁ na sa bhūyo'bhijāyate

जो पौण्ड्र इक्षु के रस से भरे सौ कलशों से महेश्वरी को स्नान कराता है, वह पुनः जन्म नहीं लेता।

श्लोक 8 (devibhagavatam.11.18.8)

यश्च चूतरसैरेवं स्नापयेज्जगदम्बिकाम् । वेदपारायणं कृत्वा रसेनेक्षूद्भवेन वा ॥

yaśca cūtarasairevaṁ snāpayejjagadambikām vedapārāyaṇaṁ kṛtvā rasenekṣūdbhavena vā

जो वेद-पारायण करके आम के रस से अथवा इक्षु-रस से जगदम्बिका को स्नान कराता है,

श्लोक 9 (devibhagavatam.11.18.9)

तद्गेहं न त्यजेन्नित्यं रमा चैव सरस्वती । यस्तु द्राक्षारसेनैव वेदपारायणं चरन् ॥

tadgehaṁ na tyajennityaṁ ramā caiva sarasvatī yastu drākṣārasenaiva vedapārāyaṇaṁ caran

उसके घर को रमा और सरस्वती कभी नहीं त्यागतीं। जो वेद-पारायण करते हुए द्राक्षा (अंगूर) के रस से,

श्लोक 10 (devibhagavatam.11.18.10)

अभिषिञ्चेन्महेशानीं सकुटुम्बो नरोत्तमः । रसरेणुप्रमाणं च देवीलोके महीयते ॥

abhiṣiñcenmaheśānīṁ sakuṭumbo narottamaḥ rasareṇupramāṇaṁ ca devīloke mahīyate

महेश्वरी का अभिषेक करता है, वह श्रेष्ठ पुरुष अपने कुटुम्ब सहित, उस रस के कण जितनी संख्या में, देवीलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 11 (devibhagavatam.11.18.11)

कर्पूरागुरुकाश्मीरकस्तूरीपङ्कपङ्किलैः । सलिलैः स्नापयेद्देवीं वेदपारायणं चरन् ॥

karpūrāgurukāśmīrakastūrīpaṅkapaṅkilaiḥ salilaiḥ snāpayeddevīṁ vedapārāyaṇaṁ caran

जो वेद-पारायण करते हुए कपूर, अगुरु, केसर तथा कस्तूरी के गाढ़े लेप से युक्त जल से देवी को स्नान कराता है,

श्लोक 12 (devibhagavatam.11.18.12)

भस्मीभवन्ति पापानि शतजन्मार्जितानि च । यो दुग्धकलशैर्देवीं स्तापयेद्वेदपाठतः ॥

bhasmībhavanti pāpāni śatajanmārjitāni ca yo dugdhakalaśairdevīṁ stāpayedvedapāṭhataḥ

उसके सौ जन्मों में अर्जित पाप भस्म हो जाते हैं। जो वेद-पाठ करते हुए दूध के कलशों से देवी को स्नान कराता है,

श्लोक 13 (devibhagavatam.11.18.13)

आकल्पं स वसेन्नित्यं तस्मिन् वै क्षीरसागरे । यस्तु दध्नाभिषिञ्चेत्तां दधिकुल्यापतिर्भवेत् ॥

ākalpaṁ sa vasennityaṁ tasmin vai kṣīrasāgare yastu dadhnābhiṣiñcettāṁ dadhikulyāpatirbhavet

वह एक कल्प तक उस क्षीरसागर में ही निवास करता है। जो दही से देवी का अभिषेक करता है, वह दधि की नदी का स्वामी बनता है।

श्लोक 14 (devibhagavatam.11.18.14)

मधुना च धृतेनैव तथा शर्करयापि च । स्नापयेन्मधुकुल्यादिनदीनां स पतिर्भवेत् ॥

madhunā ca dhṛtenaiva tathā śarkarayāpi ca snāpayenmadhukulyādinadīnāṁ sa patirbhavet

जो मधु, घृत तथा शर्करा से देवी को स्नान कराता है, वह मधु आदि की नदियों का स्वामी बनता है।

श्लोक 15 (devibhagavatam.11.18.15)

सहस्रकलशैर्देवीं स्नापयन्भक्तितत्परः । इह लोके सुखी भूत्वाप्यन्यलोके सुखी भवेत् ॥

sahasrakalaśairdevīṁ snāpayanbhaktitatparaḥ iha loke sukhī bhūtvāpyanyaloke sukhī bhavet

भक्ति में तत्पर होकर हज़ार कलशों से देवी को स्नान कराने वाला इस लोक में सुखी होकर परलोक में भी सुखी होता है।

श्लोक 16 (devibhagavatam.11.18.16)

क्षौमं वस्त्रद्वयं दत्त्वा वायुलोकं स गच्छति । रत्ननिर्मितभूषाणां दाता निधिपतिर्भवेत् ॥

kṣaumaṁ vastradvayaṁ dattvā vāyulokaṁ sa gacchati ratnanirmitabhūṣāṇāṁ dātā nidhipatirbhavet

रेशमी वस्त्रों की एक जोड़ी अर्पित करके वह वायुलोक को जाता है; रत्न-निर्मित आभूषणों का दाता निधियों का स्वामी बनता है।

श्लोक 17 (devibhagavatam.11.18.17)

काश्मीरचन्दनं दत्त्वा कस्तूरीबिन्दुभूषितम् । तथा सीमन्तसिन्दूरं चरणेऽलक्तपत्रकम् ॥

kāśmīracandanaṁ dattvā kastūrībindubhūṣitam tathā sīmantasindūraṁ caraṇe'laktapatrakam

केसर-चन्दन को कस्तूरी की बिंदियों से सुसज्जित करके, तथा सिन्दूर और चरणों के लिए अलक्तक (महावर) अर्पित करके,

श्लोक 18 (devibhagavatam.11.18.18)

इन्द्रासने समारूढो भवेद्देवपतिः परः । पुष्पाणि विविधान्याहुः पूजाकर्मणि साधवः ॥

indrāsane samārūḍho bhaveddevapatiḥ paraḥ puṣpāṇi vividhānyāhuḥ pūjākarmaṇi sādhavaḥ

इन्द्र के सिंहासन पर आरूढ़ होकर वह देवताओं का परम स्वामी बनता है। साधुजन पूजा-कर्म में विविध पुष्पों को श्रेष्ठ कहते हैं।

श्लोक 19 (devibhagavatam.11.18.19)

तानि दत्त्वा यथालाभं कैलासं लभते स्वयम् । बिल्वपत्राण्यमोघानि यो दद्यात्परशक्तये ॥

tāni dattvā yathālābhaṁ kailāsaṁ labhate svayam bilvapatrāṇyamoghāni yo dadyātparaśaktaye

उन्हें यथासंभव अर्पित करके व्यक्ति स्वयं कैलास को प्राप्त करता है। जो परम शक्ति को अमोघ फल देने वाले बिल्वपत्र अर्पित करता है,

श्लोक 20 (devibhagavatam.11.18.20)

तस्य दुःखं कदाचिच्च क्वचिच्च न भविष्यति । बिल्वपत्रत्रये रक्तचन्दनेन तु संल्लिखेत् ॥

tasya duḥkhaṁ kadācicca kvacicca na bhaviṣyati bilvapatratraye raktacandanena tu saṁllikhet

उसे कभी भी, कहीं भी दुःख नहीं होगा। तीन बिल्वपत्रों पर लाल चन्दन से,

श्लोक 21 (devibhagavatam.11.18.21)

मायाबीजत्रयं यत्नात्सुस्फुटं चातिसुन्दरम् । मायाबीजादिकं नाम चतुर्थ्यन्तं समुच्चरेत् ॥

māyābījatrayaṁ yatnātsusphuṭaṁ cātisundaram māyābījādikaṁ nāma caturthyantaṁ samuccaret

यत्नपूर्वक, अत्यंत स्पष्ट और सुंदर तीन माया-बीज (ह्रीं) लिखने चाहिए। माया-बीज सहित नाम को चतुर्थी-विभक्ति में उच्चारित करना चाहिए,

श्लोक 22 (devibhagavatam.11.18.22)

नमोऽन्तं परया भक्त्या देवीचरणपङ्कजे । समर्पयेन्महादेव्यै कोमलं तच्च पत्रकम् ॥

namo'ntaṁ parayā bhaktyā devīcaraṇapaṅkaje samarpayenmahādevyai komalaṁ tacca patrakam

'नमः' अंत सहित, परम भक्ति से देवी के चरण-कमल में — उस कोमल पत्र को महादेवी को अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 23 (devibhagavatam.11.18.23)

य एवं कुरुते भक्त्या मनुत्वं लभते हि सः । यस्तु कोटिदलैरेवं कोमलैरतिनिर्मलैः ॥

ya evaṁ kurute bhaktyā manutvaṁ labhate hi saḥ yastu koṭidalairevaṁ komalairatinirmalaiḥ

जो भक्तिपूर्वक ऐसा करता है, वह मनु-पद प्राप्त करता है। जो करोड़ों कोमल तथा अत्यंत निर्मल दलों से,

श्लोक 24 (devibhagavatam.11.18.24)

पूजयेद्भुवनेशानीं ब्रह्माण्डाधिपतिर्भवेत् । कुन्दपुष्पैर्नवीनैस्तु लुलितैरष्टगन्धतः ॥

pūjayedbhuvaneśānīṁ brahmāṇḍādhipatirbhavet kundapuṣpairnavīnaistu lulitairaṣṭagandhataḥ

भुवनेश्वरी की पूजा करता है, वह ब्रह्माण्ड का अधिपति बनता है। नए, अष्ट-गंध से युक्त कुन्द-पुष्पों से,

श्लोक 25 (devibhagavatam.11.18.25)

कोटिसङ्ख्यैः पूजयेत्तु प्राजापत्यं लभेद्ध्रुवम् । मल्लिकामालतीपुष्पैरष्टगन्धेन लोलितैः ॥

koṭisaṅkhyaiḥ pūjayettu prājāpatyaṁ labheddhruvam mallikāmālatīpuṣpairaṣṭagandhena lolitaiḥ

करोड़ों की संख्या में पूजा करने पर वह निश्चय ही प्राजापत्य पद प्राप्त करता है। मल्लिका-मालती के अष्ट-गंधयुक्त पुष्पों से,

श्लोक 26 (devibhagavatam.11.18.26)

कोटिसङ्ख्यैः पूजया तु जायते स चतुर्मुखः । दशकोटिभिरप्येवं तैरेव कुसुमैर्मुने ॥

koṭisaṅkhyaiḥ pūjayā tu jāyate sa caturmukhaḥ daśakoṭibhirapyevaṁ taireva kusumairmune

करोड़ों की संख्या में पूजा करने से वह चतुर्मुख ब्रह्मा बन जाता है। हे मुने! उन्हीं फूलों से दस करोड़ की संख्या में पूजा करने पर,

श्लोक 27 (devibhagavatam.11.18.27)

विष्णुत्वं लभते मर्त्यो यत्सुरेष्वपि दुर्लभम् । विष्णुनैतद्व्रतं पूर्वं कृतं स्वपदलब्धये ॥

viṣṇutvaṁ labhate martyo yatsureṣvapi durlabham viṣṇunaitadvrataṁ pūrvaṁ kṛtaṁ svapadalabdhaye

वह मरणशील मनुष्य विष्णुत्व प्राप्त करता है, जो देवताओं में भी दुर्लभ है। यह व्रत पूर्वकाल में विष्णु ने भी अपने पद की प्राप्ति के लिए किया था।

श्लोक 28 (devibhagavatam.11.18.28)

शतकोटिभिरप्येवं सूत्रात्मत्वं व्रजेद्ध्रुवम् । व्रतमेतत्पुरा सम्यक्कृतं भक्त्या प्रयत्नतः ॥

śatakoṭibhirapyevaṁ sūtrātmatvaṁ vrajeddhruvam vratametatpurā samyakkṛtaṁ bhaktyā prayatnataḥ

इसी प्रकार सौ करोड़ फूलों से पूजा करने पर वह निश्चय ही सूत्रात्मा का पद प्राप्त करता है। यह व्रत पूर्वकाल में भक्तिपूर्वक और यत्नपूर्वक सम्यक् रूप से किया गया था,

श्लोक 29 (devibhagavatam.11.18.29)

तेन व्रतप्रभावेण हिरण्योदरतां व्रजेत् । जपाकुसुमपुष्पस्य बन्धूककुसुमस्य च ॥

tena vrataprabhāveṇa hiraṇyodaratāṁ vrajet japākusumapuṣpasya bandhūkakusumasya ca

और उस व्रत के प्रभाव से हिरण्यगर्भ का पद प्राप्त होता है। जपाकुसुम (जासवंत) तथा बन्धूक-पुष्प का —

श्लोक 30 (devibhagavatam.11.18.30)

दाडिमीकुसुमस्यापि विधिरेष उदीरितः । एवमन्यानि पुष्पाणि श्रीदेव्यै विधिनार्पयेत् ॥

dāḍimīkusumasyāpi vidhireṣa udīritaḥ evamanyāni puṣpāṇi śrīdevyai vidhinārpayet

तथा अनार के फूल का भी यही विधान कहा गया है। इसी प्रकार अन्य पुष्प भी श्री देवी को विधिपूर्वक अर्पित करने चाहिए।

श्लोक 31 (devibhagavatam.11.18.31)

तस्य पुण्यफलस्यान्तं न जानातीश्वरोऽपि सः । तत्तदृतूद्भवैः पुष्पैर्नामसाहस्रसङ्ख्यया ॥

tasya puṇyaphalasyāntaṁ na jānātīśvaro'pi saḥ tattadṛtūdbhavaiḥ puṣpairnāmasāhasrasaṅkhyayā

इसके पुण्यफल का अंत तो स्वयं ईश्वर भी नहीं जानते। ऋतु-ऋतु में उत्पन्न होने वाले फूलों से, सहस्रनामों की संख्या में,

श्लोक 32 (devibhagavatam.11.18.32)

समर्पयेन्महादेव्यै प्रतिवर्षमतन्द्रितः । य एवं कुरुते भक्त्या महापातकसंयुतः ॥

samarpayenmahādevyai prativarṣamatandritaḥ ya evaṁ kurute bhaktyā mahāpātakasaṁyutaḥ

प्रतिवर्ष अलस्य-रहित होकर महादेवी को अर्पित करने चाहिए। जो भक्तिपूर्वक ऐसा करता है, वह महापातकों से युक्त होते हुए भी,

श्लोक 33 (devibhagavatam.11.18.33)

उपपातकयुक्तोऽपि मुच्यते सर्वपातकैः । देहान्ते श्रीपदाम्भोजं दुर्लभं देवसत्तमैः ॥

upapātakayukto'pi mucyate sarvapātakaiḥ dehānte śrīpadāmbhojaṁ durlabhaṁ devasattamaiḥ

उपपातकों से युक्त होते हुए भी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। शरीर के अंत में वह श्री-चरण-कमल को प्राप्त करता है, जो श्रेष्ठ देवताओं के लिए भी दुर्लभ है —

श्लोक 34 (devibhagavatam.11.18.34)

प्राप्नोति साधकवरो मुने नास्त्यत्र संशयः । कृष्णागुरुं सकर्पूरं चन्दनेन समन्वितम् ॥

prāpnoti sādhakavaro mune nāstyatra saṁśayaḥ kṛṣṇāguruṁ sakarpūraṁ candanena samanvitam

हे मुने! ऐसा श्रेष्ठ साधक उसे प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं। कृष्णागुरु को कपूर तथा चन्दन से युक्त करके,

श्लोक 35 (devibhagavatam.11.18.35)

सिल्हकं चाज्यसंयुक्तं गुग्गुलेन समन्वितम् । धूपं दद्यान्महादेव्यै येन स्याद्धूपितं गृहम् ॥

silhakaṁ cājyasaṁyuktaṁ guggulena samanvitam dhūpaṁ dadyānmahādevyai yena syāddhūpitaṁ gṛham

सिल्हक को घी से युक्त करके, गुग्गुल से युक्त करके — महादेवी को यह धूप अर्पित करना चाहिए, जिससे घर सुगंधित हो जाए।

श्लोक 36 (devibhagavatam.11.18.36)

तेन प्रसन्ना देवेशी ददाति भुवनत्रयम् । दीपं कर्पूरखण्डैश्च दद्याद्देव्यै निरन्तरम् ॥

tena prasannā deveśī dadāti bhuvanatrayam dīpaṁ karpūrakhaṇḍaiśca dadyāddevyai nirantaram

उससे प्रसन्न होकर देवेशी तीनों लोक प्रदान कर देती हैं। कपूर के टुकड़ों से युक्त दीप देवी को निरन्तर अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 37 (devibhagavatam.11.18.37)

सूर्यलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा । शतदीपांस्तथा दद्यात्सहस्रान्वा समाहितः ॥

sūryalokamavāpnoti nātra kāryā vicāraṇā śatadīpāṁstathā dadyātsahasrānvā samāhitaḥ

इससे सूर्यलोक की प्राप्ति होती है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं। सावधान होकर सौ दीप अथवा हज़ार दीप भी अर्पित करने चाहिए।

श्लोक 38 (devibhagavatam.11.18.38)

नैवेद्यं पुरतो देव्याः स्थापयेत्पर्वताकृतिम् । लेह्यैश्चोष्यैस्तथा पेयैः षड्रसैस्तु समाहितैः ॥

naivedyaṁ purato devyāḥ sthāpayetparvatākṛtim lehyaiścoṣyaistathā peyaiḥ ṣaḍrasaistu samāhitaiḥ

देवी के सामने पर्वत के आकार का नैवेद्य रखना चाहिए — चाटने योग्य, चबाने योग्य तथा पीने योग्य छह रसों से युक्त,

श्लोक 39 (devibhagavatam.11.18.39)

नानाफलानि दिव्यानि स्वादूनि रसवन्ति च । स्वर्णपात्रस्थितान्नानि दद्याद्देव्यै निरन्तरम् ॥

nānāphalāni divyāni svādūni rasavanti ca svarṇapātrasthitānnāni dadyāddevyai nirantaram

विविध दिव्य फलों से, स्वादिष्ट तथा रसयुक्त — स्वर्ण-पात्रों में रखे हुए अन्न देवी को निरन्तर अर्पित करने चाहिए।

श्लोक 40 (devibhagavatam.11.18.40)

तृप्तायां श्रीमहादेव्यां भवेत्तृप्तं जगत्त्रयम् । यतस्तदात्मकं सर्वं रज्जौ सर्पो यथा तथा ॥

tṛptāyāṁ śrīmahādevyāṁ bhavettṛptaṁ jagattrayam yatastadātmakaṁ sarvaṁ rajjau sarpo yathā tathā

श्री महादेवी के तृप्त होने पर तीनों लोक तृप्त हो जाते हैं, क्योंकि सब कुछ उन्हीं का स्वरूप है, जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम होता है, वैसे ही।

श्लोक 41 (devibhagavatam.11.18.41)

ततः पानीयकं दद्याच्छुभं गङ्गाजलं महत् । कर्पूरवालासंयुक्तं शीतलं कलशस्थितम् ॥

tataḥ pānīyakaṁ dadyācchubhaṁ gaṅgājalaṁ mahat karpūravālāsaṁyuktaṁ śītalaṁ kalaśasthitam

तत्पश्चात् शुभ, विशाल, कपूर तथा वाला (सुगंधित मूल) से युक्त, कलश में रखा शीतल गंगाजल अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 42 (devibhagavatam.11.18.42)

ताम्बूलं च ततो देव्यै कर्पूरशकलान्वितम् । एलालवङ्गसंयुक्तं मुखसौगन्ध्यदायकम् ॥

tāmbūlaṁ ca tato devyai karpūraśakalānvitam elālavaṅgasaṁyuktaṁ mukhasaugandhyadāyakam

तत्पश्चात् देवी को कपूर के टुकड़ों से युक्त, इलायची-लौंग से युक्त, मुख को सुगंधित करने वाला ताम्बूल —

श्लोक 43 (devibhagavatam.11.18.43)

दद्याद्देव्यै महाभक्त्या येन देवी प्रसीदति । मृदङ्गवीणामुरजढक्कादुन्दुभिनिःस्वनैः ॥

dadyāddevyai mahābhaktyā yena devī prasīdati mṛdaṅgavīṇāmurajaḍhakkādundubhiniḥsvanaiḥ

महाभक्ति से देवी को अर्पित करना चाहिए, जिससे देवी प्रसन्न होती हैं। मृदंग, वीणा, मुरज, ढक्का तथा दुन्दुभि की ध्वनियों से,

श्लोक 44 (devibhagavatam.11.18.44)

तोषयेज्जगतां धात्रीं गायनैरतिमोहनैः । वेदपारायणैः स्तोत्रैः पुराणादिभिरप्युत ॥

toṣayejjagatāṁ dhātrīṁ gāyanairatimohanaiḥ vedapārāyaṇaiḥ stotraiḥ purāṇādibhirapyuta

अत्यंत मनोहर गायनों से, वेद-पारायणों से, स्तोत्रों से तथा पुराणादि से भी जगत् की धात्री को संतुष्ट करना चाहिए।

श्लोक 45 (devibhagavatam.11.18.45)

छत्रं च चामरे द्वे च दद्याद्देव्यै समाहितः । राजोपचारान् श्रीदेव्यै नित्यमेव समर्पयेत् ॥

chatraṁ ca cāmare dve ca dadyāddevyai samāhitaḥ rājopacārān śrīdevyai nityameva samarpayet

सावधान होकर देवी को छत्र और दो चँवर अर्पित करने चाहिए; श्री देवी को नित्य ही राजोपचार अर्पित करने चाहिए।

श्लोक 46 (devibhagavatam.11.18.46)

प्रदक्षिणां नमस्कारं कुर्याद्देव्या अनेकधा । क्षमापयेज्जगद्धात्रीं जगदम्बां मुहुर्मुहुः ॥

pradakṣiṇāṁ namaskāraṁ kuryāddevyā anekadhā kṣamāpayejjagaddhātrīṁ jagadambāṁ muhurmuhuḥ

देवी की अनेक प्रकार से प्रदक्षिणा और नमस्कार करने चाहिए; जगत् की धात्री, जगदम्बा से बार-बार क्षमा माँगनी चाहिए।

श्लोक 47 (devibhagavatam.11.18.47)

सकृत्स्मरणमात्रेण यत्र देवी प्रसीदति । एतादृशोपचारैश्च प्रसीदेदत्र कः स्मयः ॥

sakṛtsmaraṇamātreṇa yatra devī prasīdati etādṛśopacāraiśca prasīdedatra kaḥ smayaḥ

जहाँ देवी एक बार के स्मरण मात्र से प्रसन्न हो जाती हैं, वहाँ ऐसे उपचारों से प्रसन्न होने में क्या आश्चर्य है?

श्लोक 48 (devibhagavatam.11.18.48)

स्वभावतो भवेन्माता पुत्रेऽतिकरुणावती । तेन भक्तौ कृतायां तु वक्तव्यं किं ततः परम् ॥

svabhāvato bhavenmātā putre'tikaruṇāvatī tena bhaktau kṛtāyāṁ tu vaktavyaṁ kiṁ tataḥ param

माता स्वभाव से ही अपने पुत्र के प्रति अत्यंत करुणामयी होती है; ऐसे में भक्ति किए जाने पर और क्या कहना शेष रह जाता है?

श्लोक 49 (devibhagavatam.11.18.49)

अत्र ते कथयिष्यामि पुरावृत्तं सनातनम् । बृहद्रथस्य राजर्षेः प्रियं भक्तिप्रदायकम् ॥

atra te kathayiṣyāmi purāvṛttaṁ sanātanam bṛhadrathasya rājarṣeḥ priyaṁ bhaktipradāyakam

अब मैं तुम्हें राजर्षि बृहद्रथ का यह प्राचीन, सनातन, प्रिय तथा भक्ति देने वाला वृत्तान्त सुनाता हूँ।

श्लोक 50 (devibhagavatam.11.18.50)

चक्रवाकोऽभवत्पक्षी क्वचिद्देशे हिमालये । भ्रमन्नानाविधान्देशान्ययौ काशीपुरं प्रति ॥

cakravāko'bhavatpakṣī kvaciddeśe himālaye bhramannānāvidhāndeśānyayau kāśīpuraṁ prati

हिमालय के किसी प्रदेश में एक चक्रवाक पक्षी था। विभिन्न देशों में भ्रमण करते हुए वह काशीपुरी की ओर गया।

श्लोक 51 (devibhagavatam.11.18.51)

अन्नपूर्णामहास्थाने प्रारब्धवशतो द्विजः । जगाम लीलया तत्र कणलोभादनाथवत् ॥

annapūrṇāmahāsthāne prārabdhavaśato dvijaḥ jagāma līlayā tatra kaṇalobhādanāthavat

प्रारब्ध के वशीभूत होकर वह अन्नपूर्णा के महास्थान पर अनाथ के समान, दाने के लोभ से, लीलावश वहाँ चला गया।

श्लोक 52 (devibhagavatam.11.18.52)

कृत्वा प्रदक्षिणामेकां जगाम स विहायसा । देशान्तरं विहायैव पुरीं मुक्तिप्रदायिनीम् ॥

kṛtvā pradakṣiṇāmekāṁ jagāma sa vihāyasā deśāntaraṁ vihāyaiva purīṁ muktipradāyinīm

एक प्रदक्षिणा करके वह आकाश-मार्ग से उस मुक्तिदायिनी पुरी को छोड़कर अन्य प्रदेश की ओर चला गया।

श्लोक 53 (devibhagavatam.11.18.53)

कालान्तरे ममारासौ गतः स्वर्गपुरीं प्रति । बुभुजे विषयान्सर्वान् दिव्यरूपधरो युवा ॥

kālāntare mamārāsau gataḥ svargapurīṁ prati bubhuje viṣayānsarvān divyarūpadharo yuvā

कुछ समय बाद वह मर गया और स्वर्गपुरी को गया, जहाँ दिव्य रूप धारण किए हुए युवा के रूप में उसने समस्त भोग भोगे।

श्लोक 54 (devibhagavatam.11.18.54)

कल्पद्वयं तथा भुक्त्वा पुनः प्राप भुवं प्रति । क्षत्रियाणां कुले जन्म प्राप सर्वोत्तमोत्तमम् ॥

kalpadvayaṁ tathā bhuktvā punaḥ prāpa bhuvaṁ prati kṣatriyāṇāṁ kule janma prāpa sarvottamottamam

दो कल्पों तक इस प्रकार भोग भोगकर वह पुनः पृथ्वी पर आया और क्षत्रियों के कुल में सर्वोत्तम जन्म प्राप्त किया।

श्लोक 55 (devibhagavatam.11.18.55)

बृहद्रथेति नाम्नाभूत्प्रसिद्धः क्षितिमण्डले । महायज्वा धार्मिकश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥

bṛhadratheti nāmnābhūtprasiddhaḥ kṣitimaṇḍale mahāyajvā dhārmikaśca satyavādī jitendriyaḥ

वह बृहद्रथ नाम से पृथ्वी-मण्डल में प्रसिद्ध हुआ — महान यज्ञ करने वाला, धार्मिक, सत्यवादी और जितेन्द्रिय,

श्लोक 56 (devibhagavatam.11.18.56)

त्रिकालज्ञः सार्वभौमो यमी परपुरञ्जयः । पूर्वजन्मस्मृतिस्तस्य वर्तते दुर्लभा भुवि ॥

trikālajñaḥ sārvabhaumo yamī parapurañjayaḥ pūrvajanmasmṛtistasya vartate durlabhā bhuvi

त्रिकालज्ञ, सार्वभौम सम्राट, संयमी, शत्रुओं की नगरियों को जीतने वाला — और उसे अपने पूर्वजन्म की स्मृति थी, जो पृथ्वी पर अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 57 (devibhagavatam.11.18.57)

इति श्रुत्वा किंवदन्तीं मुनयः समुपागताः । कृतातिथ्या नृपेन्द्रेण विष्टरेषूषुरेव ते ॥

iti śrutvā kiṁvadantīṁ munayaḥ samupāgatāḥ kṛtātithyā nṛpendreṇa viṣṭareṣūṣureva te

यह जनश्रुति सुनकर मुनिगण वहाँ आए। राजा द्वारा आतिथ्य किए जाने पर वे आसनों पर बैठे।

श्लोक 58 (devibhagavatam.11.18.58)

पप्रच्छुर्मुनयः सर्वे संशयोऽस्ति महान्नृप । केन पुण्यप्रभावेण पूर्वजन्मस्मृतिस्तव ॥

papracchurmunayaḥ sarve saṁśayo'sti mahānnṛpa kena puṇyaprabhāveṇa pūrvajanmasmṛtistava

समस्त मुनियों ने पूछा — 'हे राजन्! हमें एक महान संशय है। किस पुण्य के प्रभाव से तुम्हें पूर्वजन्म की स्मृति है,

श्लोक 59 (devibhagavatam.11.18.59)

त्रिकालज्ञानमेवापि केन पुण्यप्रभावतः । ज्ञानं तवेति तज्ज्ञातुमागताः स्म तवान्तिकम् ॥

trikālajñānamevāpi kena puṇyaprabhāvataḥ jñānaṁ taveti tajjñātumāgatāḥ sma tavāntikam

तथा किस पुण्य के प्रभाव से तुम्हें त्रिकाल का ज्ञान है? यह जानने के लिए ही हम तुम्हारे समीप आए हैं।

श्लोक 60 (devibhagavatam.11.18.60)

वद निर्व्याजया वृत्त्या तदस्माकं यथातथम् । श्रीनारायण उवाच । इति तेषां वचः श्रुत्वा राजा परमधार्मिकः ॥

vada nirvyājayā vṛttyā tadasmākaṁ yathātatham śrīnārāyaṇa uvāca iti teṣāṁ vacaḥ śrutvā rājā paramadhārmikaḥ

बिना किसी छल के, जैसा वास्तव में हुआ हो, वैसा हमें बताओ।' श्री नारायण ने कहा — उनके यह वचन सुनकर परम धार्मिक राजा ने,

श्लोक 61 (devibhagavatam.11.18.61)

उवाच सकलं ब्रह्मन् त्रिकालज्ञानकारणम् । श्रूयतां मुनयः सर्वे मम ज्ञानस्य कारणम् ॥

uvāca sakalaṁ brahman trikālajñānakāraṇam śrūyatāṁ munayaḥ sarve mama jñānasya kāraṇam

हे ब्रह्मन्! त्रिकाल-ज्ञान का सम्पूर्ण कारण बताया — 'हे समस्त मुनियो! मेरे ज्ञान का कारण सुनो।

श्लोक 62 (devibhagavatam.11.18.62)

चक्रवाकः स्थितः पूर्वं नीचयोनिगतोऽपि वा । अज्ञानतोऽपि कृतवानन्नपूर्णाप्रदक्षिणाम् ॥

cakravākaḥ sthitaḥ pūrvaṁ nīcayonigato'pi vā ajñānato'pi kṛtavānannapūrṇāpradakṣiṇām

मैं पूर्वकाल में चक्रवाक पक्षी था, नीच योनि में उत्पन्न होते हुए भी, अज्ञानवश ही सही, मैंने अन्नपूर्णा की प्रदक्षिणा की थी।

श्लोक 63 (devibhagavatam.11.18.63)

तेन पुण्यप्रभावेण स्वर्गे कल्पद्वयस्थितिः । त्रिकालज्ञानताप्यस्मिन्नभूज्जन्मनि सुव्रताः ॥

tena puṇyaprabhāveṇa svarge kalpadvayasthitiḥ trikālajñānatāpyasminnabhūjjanmani suvratāḥ

उसी पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में दो कल्पों तक निवास मिला, और हे सुव्रतो! इस जन्म में मुझे त्रिकाल-ज्ञान भी प्राप्त हुआ।

श्लोक 64 (devibhagavatam.11.18.64)

को वेद जगदम्बायाः पदस्मृतिफलं कियत् । स्मृत्वा तन्महिमानं तु पतन्त्यश्रूणि मेऽनिशम् ॥

ko veda jagadambāyāḥ padasmṛtiphalaṁ kiyat smṛtvā tanmahimānaṁ tu patantyaśrūṇi me'niśam

जगदम्बा के चरणों की स्मृति का फल कितना है, यह कौन जानता है? उनकी महिमा का स्मरण करते ही मेरे नेत्रों से निरन्तर अश्रु बहते हैं।

श्लोक 65 (devibhagavatam.11.18.65)

धिगस्तु जन्म तेषां वै कृतघ्नानां तु पापिनाम् । ये सर्वमातरं देवीं स्वोपास्यां न भजन्ति हि ॥

dhigastu janma teṣāṁ vai kṛtaghnānāṁ tu pāpinām ye sarvamātaraṁ devīṁ svopāsyāṁ na bhajanti hi

धिक्कार है उन कृतघ्न पापियों के जन्म को, जो अपनी उपास्य सर्वजननी देवी को नहीं भजते।

श्लोक 66 (devibhagavatam.11.18.66)

न शिवोपासना नित्या न विष्णूपासना तथा । नित्योपास्तिः परा देव्या नित्या श्रुत्यैव चोदिता ॥

na śivopāsanā nityā na viṣṇūpāsanā tathā nityopāstiḥ parā devyā nityā śrutyaiva coditā

न शिव की नित्य उपासना है, न विष्णु की उसी प्रकार; देवी की ही परम नित्य उपासना श्रुति द्वारा कही गई है।

श्लोक 67 (devibhagavatam.11.18.67)

किं मया बहु वक्तव्यं स्थाने संशयवर्जिते । सेवनीयं पदाम्भोजं भगवत्या निरन्तरम् ॥

kiṁ mayā bahu vaktavyaṁ sthāne saṁśayavarjite sevanīyaṁ padāmbhojaṁ bhagavatyā nirantaram

मुझे संशय-रहित इस विषय में और क्या अधिक कहना है? भगवती के चरण-कमल की निरन्तर सेवा करनी चाहिए।

श्लोक 68 (devibhagavatam.11.18.68)

नातः परतरं किञ्चिदधिकं जगतीतले । सेवनीया परा देवी निर्गुणा सगुणाथवा ॥

nātaḥ parataraṁ kiñcidadhikaṁ jagatītale sevanīyā parā devī nirguṇā saguṇāthavā

इस पृथ्वी पर इससे बढ़कर कुछ भी अधिक नहीं है। परम देवी की सेवा करनी चाहिए, चाहे वे निर्गुण हों या सगुण।'

श्लोक 69 (devibhagavatam.11.18.69)

श्रीनारायण उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा राजर्षेर्धार्मिकस्य च । प्रसन्नहृदयाः सर्वे गताः स्वस्वनिकेतनम् ॥

śrīnārāyaṇa uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā rājarṣerdhārmikasya ca prasannahṛdayāḥ sarve gatāḥ svasvaniketanam

श्री नारायण ने कहा — उस धार्मिक राजर्षि के ये वचन सुनकर सब लोग प्रसन्न हृदय से अपने-अपने निवास को गए।

श्लोक 70 (devibhagavatam.11.18.70)

एवम्प्रभावा सा देवी तत्पूजायाः फलं कियत् । अस्तीति केन प्रष्टव्यं वक्तव्यं वा न केनचित् ॥

evamprabhāvā sā devī tatpūjāyāḥ phalaṁ kiyat astīti kena praṣṭavyaṁ vaktavyaṁ vā na kenacit

इस प्रकार वह देवी इतनी प्रभावशाली हैं — उनकी पूजा का फल कितना होगा, यह किससे पूछा जाए अथवा किससे न कहा जाए?

श्लोक 71 (devibhagavatam.11.18.71)

येषां तु जन्मसाफल्यं तेषां श्रद्धा तु जायते । येषां तु जन्मसाङ्कर्यं तेषां श्रद्धा न जायते ॥

yeṣāṁ tu janmasāphalyaṁ teṣāṁ śraddhā tu jāyate yeṣāṁ tu janmasāṅkaryaṁ teṣāṁ śraddhā na jāyate

जिनका जन्म सफल है, उन्हीं में श्रद्धा उत्पन्न होती है; जिनका जन्म संकर (निम्न मिश्रण) से युक्त है, उनमें श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती।

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