एकादश स्कन्ध · अध्याय 21
गायत्री-पुरश्चरणविधि-कथन
श्लोक 1 (devibhagavatam.11.21.1)
श्रीनारायण उवाच । अथातः श्रूयतां ब्रह्मन् गायत्र्या पापनाशनम् । पुरश्चरणकं पुण्यं यथैष्टफलदायकम् ॥
śrīnārāyaṇa uvāca athātaḥ śrūyatāṁ brahman gāyatryā pāpanāśanam puraścaraṇakaṁ puṇyaṁ yathaiṣṭaphaladāyakam
श्री नारायण ने कहा — हे ब्रह्मन्! अब गायत्री के पापनाशक, पुण्यदायी तथा इच्छित फल देने वाले पुरश्चरण को सुनो।
श्लोक 2 (devibhagavatam.11.21.2)
पर्वताग्रे नदीतीरे बिल्वमूले जलाशये । गोष्ठे देवालयेऽश्वत्थे उद्याने तुलसीवने ॥
parvatāgre nadītīre bilvamūle jalāśaye goṣṭhe devālaye'śvatthe udyāne tulasīvane
पर्वत के शिखर पर, नदी के तट पर, बिल्व-वृक्ष के मूल में, जलाशय के समीप, गोशाला में, देवालय में, पीपल के वृक्ष पर, उद्यान में, तुलसी-वन में,
श्लोक 3 (devibhagavatam.11.21.3)
पुण्यक्षेत्रे गुरोः पार्श्वे चित्तैकाग्र्यस्थलेऽपि च । पुरश्चरणकृन्मन्त्री सिध्यत्येव न संशयः ॥
puṇyakṣetre guroḥ pārśve cittaikāgryasthale'pi ca puraścaraṇakṛnmantrī sidhyatyeva na saṁśayaḥ
पुण्यक्षेत्र में, गुरु के समीप, अथवा चित्त की एकाग्रता वाले किसी भी स्थान में — पुरश्चरण करने वाला मंत्र-साधक अवश्य सिद्धि प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 4 (devibhagavatam.11.21.4)
यस्य कस्यापि मन्त्रस्य पुरश्चरणमारभेत् । व्याहृतित्रयसंयुक्तां गायत्रीं चायुतं जपेत् ॥
yasya kasyāpi mantrasya puraścaraṇamārabhet vyāhṛtitrayasaṁyuktāṁ gāyatrīṁ cāyutaṁ japet
किसी भी मंत्र का पुरश्चरण आरम्भ करते समय तीनों व्याहृतियों से युक्त गायत्री का दस हज़ार बार जप करना चाहिए।
श्लोक 5 (devibhagavatam.11.21.5)
नृसिंहार्कवराहाणां तान्त्रिकं वैदिकं तथा । विना जप्त्वा तु गायत्रीं तत्सर्वं निष्कलं भवेत् ॥
nṛsiṁhārkavarāhāṇāṁ tāntrikaṁ vaidikaṁ tathā vinā japtvā tu gāyatrīṁ tatsarvaṁ niṣkalaṁ bhavet
नृसिंह, सूर्य तथा वराह के तांत्रिक अथवा वैदिक मंत्रों का भी — गायत्री का जप किए बिना वह सब निष्फल हो जाता है।
श्लोक 6 (devibhagavatam.11.21.6)
सर्वे शाक्ता द्विजाः प्रोक्ता न शैवा न च वैष्णवाः । आदिशक्तिमुपासन्ते गायत्रीं वेदमातरम् ॥
sarve śāktā dvijāḥ proktā na śaivā na ca vaiṣṇavāḥ ādiśaktimupāsante gāyatrīṁ vedamātaram
समस्त द्विज शाक्त कहे गए हैं, न शैव और न वैष्णव — क्योंकि वे आदिशक्ति गायत्री, वेदमाता की उपासना करते हैं।
श्लोक 7 (devibhagavatam.11.21.7)
मन्त्रं संशोध्य यत्नेन पुरश्चरणतत्परः । मन्त्रशोधनपूर्वाङ्गमात्मशोधनमुत्तमम् ॥
mantraṁ saṁśodhya yatnena puraścaraṇatatparaḥ mantraśodhanapūrvāṅgamātmaśodhanamuttamam
पुरश्चरण में तत्पर व्यक्ति को यत्नपूर्वक मंत्र का शोधन करना चाहिए; मंत्र-शोधन से पहले उत्तम अंग है आत्म-शोधन।
श्लोक 8 (devibhagavatam.11.21.8)
आत्मतत्त्वशोधनाय त्रिलक्षं प्रजपेद्बुधः । अथवा चैकलक्षं तु श्रुतिप्रोक्तेन वर्त्मना ॥
ātmatattvaśodhanāya trilakṣaṁ prajapedbudhaḥ athavā caikalakṣaṁ tu śrutiproktena vartmanā
आत्म-तत्त्व के शोधन के लिए बुद्धिमान को तीन लाख बार जप करना चाहिए, अथवा श्रुति-कथित मार्ग से एक लाख बार भी पर्याप्त है।
श्लोक 9 (devibhagavatam.11.21.9)
आत्मशुद्धिं विना कर्तुर्जपहोमादिकाः क्रियाः । निष्फलास्तास्तु विज्ञेयाः कारणं श्रुतिचोदितम् ॥
ātmaśuddhiṁ vinā karturjapahomādikāḥ kriyāḥ niṣphalāstāstu vijñeyāḥ kāraṇaṁ śruticoditam
आत्म-शुद्धि के बिना साधक के जप-होम आदि कर्म निष्फल जानने चाहिए — यह कारण श्रुति में कहा गया है।
श्लोक 10 (devibhagavatam.11.21.10)
तपसा तापयेद्देहं पितृदेवांश्च तर्पयेत् । तपसा स्वर्गमाप्नोति तपसा विन्दते महत् ॥
tapasā tāpayeddehaṁ pitṛdevāṁśca tarpayet tapasā svargamāpnoti tapasā vindate mahat
तप से शरीर को तपाना चाहिए और पितरों-देवताओं को तर्पण देना चाहिए। तप से स्वर्ग प्राप्त होता है, तप से ही महानता प्राप्त होती है।