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एकादश स्कन्ध · अध्याय 22

वैश्वदेवादि-विधिनिरूपण

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (devibhagavatam.11.22.1)

श्रीनारायण उवाच । अथातः श्रूयतां ब्रह्मन् वैश्वदेवविधानकम् । पुरश्चर्याप्रसङ्गेन ममापि स्मृतिमागतम् ॥

śrīnārāyaṇa uvāca athātaḥ śrūyatāṁ brahman vaiśvadevavidhānakam puraścaryāprasaṅgena mamāpi smṛtimāgatam

श्री नारायण ने कहा — हे ब्रह्मन्! अब वैश्वदेव की विधि सुनो, जो पुरश्चरण के प्रसंग से मुझे भी स्मरण आ गई।

श्लोक 2 (devibhagavatam.11.22.2)

देवयज्ञो ब्रह्मयज्ञो भूतयज्ञस्तथैव च । पितृयज्ञो मनुष्यस्य यज्ञश्चैव तु पञ्चमः ॥

devayajño brahmayajño bhūtayajñastathaiva ca pitṛyajño manuṣyasya yajñaścaiva tu pañcamaḥ

देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, तथा उसी प्रकार भूतयज्ञ; पितृयज्ञ, तथा मनुष्य के लिए पाँचवाँ यज्ञ — मनुष्ययज्ञ (अतिथि-सत्कार)।

श्लोक 3 (devibhagavatam.11.22.3)

पञ्चसूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः । कण्डणी चोदकुम्भश्च तेषां पापस्य शान्तये ॥

pañcasūnā gṛhasthasya cullī peṣaṇyupaskaraḥ kaṇḍaṇī codakumbhaśca teṣāṁ pāpasya śāntaye

गृहस्थ की पाँच 'सूनाएँ' (हिंसा के स्थान) हैं — चूल्हा, चक्की, झाड़ू, ओखली-मूसल तथा जल-कुम्भ; इन पाँच यज्ञों से इन कारणों से उत्पन्न पाप की शान्ति होती है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.11.22.4)

न चुल्ल्यां नायसे पात्रे न भूमौ न च खर्परे । वैश्वदेवं प्रकुर्वीत कुण्डे वा स्थण्डिलेऽपि वा ॥

na cullyāṁ nāyase pātre na bhūmau na ca kharpare vaiśvadevaṁ prakurvīta kuṇḍe vā sthaṇḍile'pi vā

चूल्हे में, लोहे के पात्र में, भूमि पर अथवा ठीकरे में वैश्वदेव नहीं करना चाहिए; कुण्ड में अथवा वेदी पर ही करना चाहिए।

श्लोक 5 (devibhagavatam.11.22.5)

न पाणिना न शूर्पेण न च मेध्याजिनादिभिः । मुखेनोपधमेदग्निं मुखादेव व्यजायत ॥

na pāṇinā na śūrpeṇa na ca medhyājinādibhiḥ mukhenopadhamedagniṁ mukhādeva vyajāyata

हाथ से, न शूर्प (सूप) से, न पवित्र मृगचर्म आदि से अग्नि को फूँकना चाहिए; मुख से ही अग्नि को फूँकना चाहिए, क्योंकि वह मुख से ही उत्पन्न हुई थी।

श्लोक 6 (devibhagavatam.11.22.6)

पटकेन भवेद्व्याधिः शूर्पेण धननाशनम् । पाणिना मृत्युमाप्नोति कर्मसिद्धिर्मुखेन तु ॥

paṭakena bhavedvyādhiḥ śūrpeṇa dhananāśanam pāṇinā mṛtyumāpnoti karmasiddhirmukhena tu

कपड़े से फूँकने पर रोग होता है, शूर्प से धन-नाश होता है, हाथ से मृत्यु प्राप्त होती है, और मुख से फूँकने पर ही कर्म सिद्ध होता है।

श्लोक 7 (devibhagavatam.11.22.7)

फलैर्दधिघृतैः कुर्यान्मूलशाकोदकादिभिः । अलाभे येन केनापि काष्ठमूलतृणादिभिः ॥

phalairdadhighṛtaiḥ kuryānmūlaśākodakādibhiḥ alābhe yena kenāpi kāṣṭhamūlatṛṇādibhiḥ

फल, दही, घी से, अथवा मूल-शाक-जल आदि से हवन करना चाहिए; इनके अभाव में जो भी उपलब्ध हो, काष्ठ, मूल, तृण आदि से भी।

श्लोक 8 (devibhagavatam.11.22.8)

जुहुयात्सर्पिषाभ्यक्तं तैलक्षारविवर्जितम् । दध्यक्तं वा पायसाक्तं तदभावेऽम्भसापि वा ॥

juhuyātsarpiṣābhyaktaṁ tailakṣāravivarjitam dadhyaktaṁ vā pāyasāktaṁ tadabhāve'mbhasāpi vā

घी में सने हुए, तेल तथा क्षार से रहित द्रव्य की आहुति देनी चाहिए; अथवा दही में सना हुआ, अथवा खीर में सना हुआ; उनके अभाव में जल से भी।

श्लोक 9 (devibhagavatam.11.22.9)

शुष्कैः पर्युषितैः कुष्ठी उच्छिष्टेन द्विषां वशी । रुक्षैर्द्ररिद्रतां याति क्षारं हुत्वा व्रजत्यधः ॥

śuṣkaiḥ paryuṣitaiḥ kuṣṭhī ucchiṣṭena dviṣāṁ vaśī rukṣairdraridratāṁ yāti kṣāraṁ hutvā vrajatyadhaḥ

सूखे तथा बासी द्रव्य से कुष्ठ होता है, जूठे से शत्रुओं का वश्य होना पड़ता है, रूखे द्रव्यों से दरिद्रता प्राप्त होती है, और क्षार की आहुति देने पर नीचे (अधोगति में) जाना पड़ता है।

श्लोक 10 (devibhagavatam.11.22.10)

अङ्गारान्भस्ममिश्रांस्तु निर्हृत्योत्तरतोऽनलात् । जुहुयाद्वैश्वदेवं तु न क्षारादिविमिश्रितम् ॥

aṅgārānbhasmamiśrāṁstu nirhṛtyottarato'nalāt juhuyādvaiśvadevaṁ tu na kṣārādivimiśritam

अग्नि के उत्तर भाग से भस्म-मिश्रित अंगारे निकालकर वैश्वदेव की आहुति देनी चाहिए — क्षार आदि से मिश्रित कभी नहीं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.11.22.11)

अकृत्वा वैश्वदेवं तु यो भुङ्क्ते मूढधीर्द्विजः । स मूढो नरकं याति कालसूत्रमवाक्शिराः ॥

akṛtvā vaiśvadevaṁ tu yo bhuṅkte mūḍhadhīrdvijaḥ sa mūḍho narakaṁ yāti kālasūtramavākśirāḥ

जो मूढ़बुद्धि द्विज वैश्वदेव किए बिना भोजन करता है, वह मूर्ख अधोमुख होकर कालसूत्र नामक नरक में जाता है।

श्लोक 12 (devibhagavatam.11.22.12)

शाकं वा यदि वा पत्रं मूलं वा यदि वा फलम् । सङ्कल्पयेद्यदाहारं तेनाग्नौ जुहुयादपि ॥

śākaṁ vā yadi vā patraṁ mūlaṁ vā yadi vā phalam saṅkalpayedyadāhāraṁ tenāgnau juhuyādapi

शाक हो, पत्ता हो, मूल हो अथवा फल हो — जो भी आहार खाने का संकल्प करे, उसी से अग्नि में भी आहुति देनी चाहिए।

श्लोक 13 (devibhagavatam.11.22.13)

अकृते वैश्वदेवे तु भिक्षौ भिक्षार्थमागते । उद्धृत्य वैश्वदेवार्थं भिक्षां दत्त्वा विसर्जयेत् ॥

akṛte vaiśvadeve tu bhikṣau bhikṣārthamāgate uddhṛtya vaiśvadevārthaṁ bhikṣāṁ dattvā visarjayet

वैश्वदेव किए बिना ही यदि कोई भिक्षु भिक्षा माँगने आ जाए, तो वैश्वदेव के लिए (निकाला हुआ) भाग निकालकर भिक्षा देकर उसे विदा करना चाहिए।

श्लोक 14 (devibhagavatam.11.22.14)

वैश्वदेवकृतं दोषं शक्तो भिक्षुर्व्यपोहितुम् । न तु भिक्षुकृतं दोषं वैश्वदेवो व्यपोहति ॥

vaiśvadevakṛtaṁ doṣaṁ śakto bhikṣurvyapohitum na tu bhikṣukṛtaṁ doṣaṁ vaiśvadevo vyapohati

वैश्वदेव से उत्पन्न दोष को भिक्षु दूर करने में समर्थ है, किन्तु भिक्षु (को न देने) से उत्पन्न दोष को वैश्वदेव दूर नहीं कर सकता।

श्लोक 15 (devibhagavatam.11.22.15)

यतिश्च ब्रह्मचारी च पक्वान्नस्वामिनावुभौ । तयोरन्नमदत्त्वा तु भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

yatiśca brahmacārī ca pakvānnasvāmināvubhau tayorannamadattvā tu bhuktvā cāndrāyaṇaṁ caret

यति और ब्रह्मचारी दोनों ही पके हुए अन्न के स्वामी हैं; उन्हें अन्न दिए बिना जो भोजन करता है, उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिए।

श्लोक 16 (devibhagavatam.11.22.16)

वैश्वदेवानन्तरं च गोग्रासं प्रतिपादयेत् । तद्विधानं प्रवक्ष्यामि शृणु देवर्षिपूजित ॥

vaiśvadevānantaraṁ ca gogrāsaṁ pratipādayet tadvidhānaṁ pravakṣyāmi śṛṇu devarṣipūjita

वैश्वदेव के पश्चात् गौ को ग्रास देना चाहिए। हे देवर्षि-पूजित! उसकी विधि बताता हूँ, सुनो।

श्लोक 17 (devibhagavatam.11.22.17)

सुरभिर्वैष्णवी माता नित्यं विष्णुपदे स्थिता । गोग्रासं च मया दत्तं सुरभे प्रतिगृह्यताम् ॥

surabhirvaiṣṇavī mātā nityaṁ viṣṇupade sthitā gogrāsaṁ ca mayā dattaṁ surabhe pratigṛhyatām

'सुरभि, वैष्णवी माता, नित्य विष्णु के पद में स्थित — हे सुरभि! मेरे द्वारा दिया गया यह गोग्रास स्वीकार करो।'

श्लोक 18 (devibhagavatam.11.22.18)

गोभ्यश्च नम इत्येव पूजां कृत्वा गवेऽर्पयेत् । गोग्रासेन तु गोमाता सुरभिः सम्प्रसीदति ॥

gobhyaśca nama ityeva pūjāṁ kṛtvā gave'rpayet gogrāsena tu gomātā surabhiḥ samprasīdati

'गौओं को नमस्कार है' कहकर पूजा करके गौ को अर्पित करना चाहिए। इस ग्रास से गौ-माता सुरभि अत्यंत प्रसन्न होती हैं।

श्लोक 19 (devibhagavatam.11.22.19)

ततो गोदोहनं कालं तिष्ठेच्चैव गृहाङ्गणे । अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते ॥

tato godohanaṁ kālaṁ tiṣṭheccaiva gṛhāṅgaṇe atithiryasya bhagnāśo gṛhātpratinivartate

तत्पश्चात् गौ के दुहने के समय तक घर के आँगन में रुकना चाहिए। जिसके घर से अतिथि निराश होकर लौट जाता है,

श्लोक 20 (devibhagavatam.11.22.20)

स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति । माता पिता गुरुर्भ्राता प्रजा दासः समाश्रितः ॥

sa tasmai duṣkṛtaṁ dattvā puṇyamādāya gacchati mātā pitā gururbhrātā prajā dāsaḥ samāśritaḥ

वह अतिथि अपना पाप उसे देकर, उसका पुण्य लेकर चला जाता है। माता, पिता, गुरु, भाई, संतान, दास, आश्रित,

श्लोक 21 (devibhagavatam.11.22.21)

अभ्यागतोऽतिथिश्चाग्निरेते पोष्या उदाहृताः । एवं ज्ञात्वा तु यो मोहान्न करोति गृहाश्रमम् ॥

abhyāgato'tithiścāgnirete poṣyā udāhṛtāḥ evaṁ jñātvā tu yo mohānna karoti gṛhāśramam

अभ्यागत, अतिथि तथा अग्नि — ये सब पालनीय (पोष्य) कहे गए हैं। जो मोहवश यह जानते हुए भी गृहस्थाश्रम नहीं करता,

श्लोक 22 (devibhagavatam.11.22.22)

तस्य नायं तु न परो लोको भवति धर्मतः । यत्फलं सोमयागेन प्राप्नोति धनवान्द्विजः ॥

tasya nāyaṁ tu na paro loko bhavati dharmataḥ yatphalaṁ somayāgena prāpnoti dhanavāndvijaḥ

उसके लिए धर्मानुसार न यह लोक है और न परलोक। धनवान द्विज सोमयाग से जो फल पाता है,

श्लोक 23 (devibhagavatam.11.22.23)

सम्यक् पञ्चमहायज्ञैर्दरिद्रस्तेन चाप्नुयात् । अथ प्राणाग्निहोत्रं तु वक्ष्यामि मुनिपुङ्गव ॥

samyak pañcamahāyajñairdaridrastena cāpnuyāt atha prāṇāgnihotraṁ tu vakṣyāmi munipuṅgava

वही फल दरिद्र मनुष्य पाँच महायज्ञों के सम्यक् पालन से प्राप्त कर लेता है। हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं प्राणाग्निहोत्र बताऊँगा,

श्लोक 24 (devibhagavatam.11.22.24)

यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्जन्ममृत्युजरादिभिः । परिज्ञानेन मुच्यन्ते नराः पातककिल्बिषैः ॥

yajjñātvā mucyate janturjanmamṛtyujarādibhiḥ parijñānena mucyante narāḥ pātakakilbiṣaiḥ

जिसे जानकर प्राणी जन्म-मृत्यु-जरा आदि से मुक्त हो जाता है; इस पूर्ण ज्ञान से मनुष्य पापों और अपराधों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 25 (devibhagavatam.11.22.25)

विधिना भुज्यते येन मुच्येत स ऋणत्रयात् । कुलान्युद्धरते विप्रो नरकानेकविंशतिम् ॥

vidhinā bhujyate yena mucyeta sa ṛṇatrayāt kulānyuddharate vipro narakānekaviṁśatim

जिस विधि से भोजन किया जाता है, उससे तीनों ऋणों से मुक्ति मिलती है; इसे जानने वाला द्विज अपने कुलों को इक्कीस नरकों से उद्धार कर देता है,

श्लोक 26 (devibhagavatam.11.22.26)

सर्वयज्ञफलप्राप्तिः सर्वलोकेषु गच्छति । हृत्पुण्डरीकमरणिर्मनो मन्धानसंज्ञकम् ॥

sarvayajñaphalaprāptiḥ sarvalokeṣu gacchati hṛtpuṇḍarīkamaraṇirmano mandhānasaṁjñakam

तथा समस्त यज्ञों का फल प्राप्त करके समस्त लोकों में जाता है। हृदय-कमल अरणि (मंथन-काष्ठ) है, मन मन्थन-दण्ड कहलाता है;

श्लोक 27 (devibhagavatam.11.22.27)

वायुरज्ज्वा मथेदग्निं चक्षुरध्वर्युरेव च । तर्जनीमध्यमाङ्गुष्ठैः प्राणस्यैवाहुतिं क्षिपेत् ॥

vāyurajjvā mathedagniṁ cakṣuradhvaryureva ca tarjanīmadhyamāṅguṣṭhaiḥ prāṇasyaivāhutiṁ kṣipet

वायु मन्थन की रस्सी है, और नेत्र अध्वर्यु (होता) है। तर्जनी, मध्यमा और अंगूठे से प्राण की आहुति देनी चाहिए;

श्लोक 28 (devibhagavatam.11.22.28)

मध्यमानामिकाङ्गुष्ठैरपानस्याहुतिं क्षिपेत् । कनिष्ठानामिकाङ्गुष्ठैर्व्यानस्य तदनन्तरम् ॥

madhyamānāmikāṅguṣṭhairapānasyāhutiṁ kṣipet kaniṣṭhānāmikāṅguṣṭhairvyānasya tadanantaram

मध्यमा, अनामिका और अंगूठे से अपान की आहुति देनी चाहिए; कनिष्ठिका, अनामिका और अंगूठे से तत्पश्चात् व्यान की;

श्लोक 29 (devibhagavatam.11.22.29)

कनिष्ठातर्जन्यङ्गुष्ठैरुदानस्याहुतिं क्षिपेत् । सर्वाङ्गुलैर्गृहीत्वान्नं समानस्याहुतिं क्षिपेत् ॥

kaniṣṭhātarjanyaṅguṣṭhairudānasyāhutiṁ kṣipet sarvāṅgulairgṛhītvānnaṁ samānasyāhutiṁ kṣipet

कनिष्ठिका, तर्जनी और अंगूठे से उदान की आहुति देनी चाहिए; और सभी अंगुलियों से अन्न लेकर समान की आहुति देनी चाहिए।

श्लोक 30 (devibhagavatam.11.22.30)

स्वाहान्तान्प्रणवाद्यांश्च नाममन्त्रांश्च वै पठेत् । मुखे चाहवनीयस्तु हृदये गार्हपत्यकः ॥

svāhāntānpraṇavādyāṁśca nāmamantrāṁśca vai paṭhet mukhe cāhavanīyastu hṛdaye gārhapatyakaḥ

प्रणव-पूर्वक 'स्वाहा' अंत वाले नाम-मंत्रों का पाठ करना चाहिए। मुख आहवनीय अग्नि है, हृदय गार्हपत्य अग्नि है;

श्लोक 31 (devibhagavatam.11.22.31)

नाभौ च दक्षिणाग्निः स्यादधः सभ्यावसथ्यकौ । वाग्घोता प्राण उद्गाता चक्षुरध्वर्युरेव च ॥

nābhau ca dakṣiṇāgniḥ syādadhaḥ sabhyāvasathyakau vāgghotā prāṇa udgātā cakṣuradhvaryureva ca

नाभि दक्षिणाग्नि है, नीचे सभ्य और आवसथ्य अग्नियाँ हैं। वाणी होता है, प्राण उद्गाता है, नेत्र ही अध्वर्यु है;

श्लोक 32 (devibhagavatam.11.22.32)

मनो ब्रह्मा भवेच्छ्रोत्रमाग्नीध्रस्थान एव च । अहङ्कारः पशुश्चात्र प्रणवः पय ईरितम् ॥

mano brahmā bhavecchrotramāgnīdhrasthāna eva ca ahaṅkāraḥ paśuścātra praṇavaḥ paya īritam

मन ब्रह्मा (पुरोहित) है, और कान आग्नीध्र का स्थान है। यहाँ अहंकार पशु है, और प्रणव को दुग्ध-अर्पण कहा गया है;

श्लोक 33 (devibhagavatam.11.22.33)

बुद्धिश्च पत्नी सम्प्रोक्ता यदधीनो गृहाश्रमी । उरो वेदिस्तु रोमाणि दर्भाः स्युः स्रुक्स्रुवौ करौ ॥

buddhiśca patnī samproktā yadadhīno gṛhāśramī uro vedistu romāṇi darbhāḥ syuḥ sruksruvau karau

बुद्धि को पत्नी कहा गया है, जिसके अधीन गृहस्थ रहता है। वक्षस्थल वेदी है, रोम दर्भ हैं, और दोनों हाथ स्रुक्-स्रुवा हैं।

श्लोक 34 (devibhagavatam.11.22.34)

प्राणमन्त्रस्य च ऋषी रुक्मवर्णः क्षुधाग्निकः । देवतादित्य एवात्र गायत्रीच्छन्द उच्यते ॥

prāṇamantrasya ca ṛṣī rukmavarṇaḥ kṣudhāgnikaḥ devatāditya evātra gāyatrīcchanda ucyate

प्राण-मंत्र के ऋषि 'रुक्मवर्ण, क्षुधाग्निक' कहे गए हैं; इसके देवता आदित्य ही हैं, और छन्द गायत्री कहा जाता है।

श्लोक 35 (devibhagavatam.11.22.35)

प्राणाय च तथा स्वाहा मन्त्रान्ते कीर्तयेदपि । इदमादित्यदेवाय न ममेति वदेदपि ॥

prāṇāya ca tathā svāhā mantrānte kīrtayedapi idamādityadevāya na mameti vadedapi

मंत्र के अंत में 'प्राणाय स्वाहा' भी कहना चाहिए; तथा 'यह आदित्य देव के लिए है, मेरा नहीं' भी कहना चाहिए।

श्लोक 36 (devibhagavatam.11.22.36)

अपानमन्त्रस्य तथा गोक्षीरधवलाकृतिः । श्रद्धाग्निऋषिरेवात्र सोमो वै देवता स्मृता ॥

apānamantrasya tathā gokṣīradhavalākṛtiḥ śraddhāgniṛṣirevātra somo vai devatā smṛtā

अपान-मंत्र का स्वरूप गौ के दूध के समान श्वेत है; यहाँ ऋषि 'श्रद्धाग्नि' और देवता सोम स्मरण किए गए हैं।

श्लोक 37 (devibhagavatam.11.22.37)

उष्णिक्छन्दस्तथापानाय स्वाहेत्यपि कीर्तयेत् । सोमायेदं च न ममेत्यत्रोहः परिकीर्तितः ॥

uṣṇikchandastathāpānāya svāhetyapi kīrtayet somāyedaṁ ca na mametyatrohaḥ parikīrtitaḥ

छन्द उष्णिक् है; उसी प्रकार 'अपानाय स्वाहा' भी कहना चाहिए; यहाँ 'यह सोम के लिए है, मेरा नहीं' कहना चाहिए।

श्लोक 38 (devibhagavatam.11.22.38)

व्यानमन्त्रस्य चाख्यातोऽम्बुजवर्णहुताशनः । ऋषिरुक्तो देवताग्निरनुष्टुप् छन्द ईरितम् ॥

vyānamantrasya cākhyāto'mbujavarṇahutāśanaḥ ṛṣirukto devatāgniranuṣṭup chanda īritam

व्यान-मंत्र के ऋषि 'कमल-वर्ण अग्नि' कहे गए हैं; देवता अग्नि कहा गया है, और छन्द अनुष्टुप् कहा गया है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.11.22.39)

व्यानाय च तथा स्वाहाग्नयेदं न ममेत्यपि । उदानमन्त्रस्य तथा शक्रगोपसवर्णकः ॥

vyānāya ca tathā svāhāgnayedaṁ na mametyapi udānamantrasya tathā śakragopasavarṇakaḥ

'व्यानाय स्वाहा' तथा 'यह अग्नि के लिए है, मेरा नहीं' भी उसी प्रकार कहना चाहिए। उदान-मंत्र का वर्ण शक्रगोप (लाल कीड़े) के समान है;

श्लोक 40 (devibhagavatam.11.22.40)

ऋषिरग्निः समाख्यातो वायुर्वै देवता स्मृता । बृहतीच्छन्द आख्यातमुदानाय च पूर्ववत् ॥

ṛṣiragniḥ samākhyāto vāyurvai devatā smṛtā bṛhatīcchanda ākhyātamudānāya ca pūrvavat

इसके ऋषि अग्नि कहे गए हैं, और देवता वायु स्मरण किए गए हैं; छन्द बृहती कहा गया है, और उदान के लिए पूर्ववत् मंत्र कहना चाहिए।

श्लोक 41 (devibhagavatam.11.22.41)

वायवे चेदं न मम एवं चैवोच्चरेद् द्विजः । समानवायुमन्त्रस्य विद्युद्वर्णो विरूपकः ॥

vāyave cedaṁ na mama evaṁ caivoccared dvijaḥ samānavāyumantrasya vidyudvarṇo virūpakaḥ

'यह वायु के लिए है, मेरा नहीं' — इस प्रकार द्विज को उच्चारण करना चाहिए। समान-वायु-मंत्र का वर्ण बिजली के समान, विविध रूप वाला है;

श्लोक 42 (devibhagavatam.11.22.42)

ऋषिरग्निः समाख्यातः पर्जन्यो देवता मता । पङ्क्तिश्छन्दः समाख्यातं समानाय च पूर्ववत् ॥

ṛṣiragniḥ samākhyātaḥ parjanyo devatā matā paṅktiśchandaḥ samākhyātaṁ samānāya ca pūrvavat

इसके ऋषि अग्नि कहे गए हैं, और पर्जन्य को देवता माना गया है; छन्द पंक्ति कहा गया है, और समान के लिए पूर्ववत्,

श्लोक 43 (devibhagavatam.11.22.43)

पर्जन्यायेदमित्युक्त्वा षष्ठीं चैवाहुतिं क्षिपेत् । वैश्वानरो महानग्निरृषिर्वै परिकीर्तितः ॥

parjanyāyedamityuktvā ṣaṣṭhīṁ caivāhutiṁ kṣipet vaiśvānaro mahānagnirṛṣirvai parikīrtitaḥ

'यह पर्जन्य के लिए है' कहकर छठी आहुति देनी चाहिए। वैश्वानर, महान अग्नि, ऋषि कहा गया है,

श्लोक 44 (devibhagavatam.11.22.44)

गायत्रीच्छन्द आख्यातं देवस्त्वात्मा भवेदपि । स्वाहान्तो मन्त्र आख्यातः परमात्मन उच्चरेत् ॥

gāyatrīcchanda ākhyātaṁ devastvātmā bhavedapi svāhānto mantra ākhyātaḥ paramātmana uccaret

छन्द गायत्री कहा गया है, और देवता स्वयं आत्मा है; मंत्र 'स्वाहा' अंत वाला कहा गया है, और इसे परमात्मा के लिए उच्चारित करना चाहिए।

श्लोक 45 (devibhagavatam.11.22.45)

इदं न मम चेत्येवं जातं प्राणाग्निहोत्रकम् । एतज्ज्ञात्वा विधिं कृत्वा ब्रह्मभूयाय कल्पते । प्राणाग्निहोत्रविद्येयं सङ्क्षेपात्कथिता हि ते ॥

idaṁ na mama cetyevaṁ jātaṁ prāṇāgnihotrakam etajjñātvā vidhiṁ kṛtvā brahmabhūyāya kalpate prāṇāgnihotravidyeyaṁ saṅkṣepātkathitā hi te

'यह मेरा नहीं है' — इस प्रकार प्राणाग्निहोत्र सम्पन्न हुआ। इसे जानकर विधिपूर्वक करने वाला ब्रह्म-भाव को प्राप्त करने योग्य हो जाता है। यह प्राणाग्निहोत्र-विद्या तुम्हें संक्षेप में बताई गई।

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