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एकादश स्कन्ध · अध्याय 4

रुद्राक्ष-माहात्म्य-वर्णन (द्वितीय)

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (devibhagavatam.11.4.1)

नारद उवाच । एवम्भूतानुभावोऽयं रुद्राक्षो भवतानघ । वर्णितो महतां पूज्यः कारणं तत्र किं वद

nārada uvāca evambhūtānubhāvo'yaṁ rudrākṣo bhavatānagha varṇito mahatāṁ pūjyaḥ kāraṇaṁ tatra kiṁ vada

नारद ने कहा — हे निष्पाप! आपने महापुरुषों द्वारा पूजित इस अद्भुत प्रभाव वाले रुद्राक्ष का वर्णन किया है; कृपया बताइए, इसका कारण (उत्पत्ति) क्या है?

श्लोक 2 (devibhagavatam.11.4.2)

श्रीनारायण उवाच । एवमेव पुरा पृष्टो भगवान् गिरिशः प्रभुः । षण्मुखेन च रुद्रस्तं यदुवाच शृणुष्व तत्

śrīnārāyaṇa uvāca evameva purā pṛṣṭo bhagavān giriśaḥ prabhuḥ ṣaṇmukhena ca rudrastaṁ yaduvāca śṛṇuṣva tat

श्रीनारायण ने कहा — पूर्वकाल में भगवान् गिरीश शिव से षण्मुख (कार्तिकेय) ने भी यही प्रश्न पूछा था; रुद्र ने उन्हें जो उत्तर दिया, वह सुनो।

श्लोक 3 (devibhagavatam.11.4.3)

ईश्वर उवाच । शृणु षण्मुख तत्त्वेन कथयामि समासतः । त्रिपुरो नाम दैत्यस्तु पुराऽऽसीत्सर्वदुर्जयः

īśvara uvāca śṛṇu ṣaṇmukha tattvena kathayāmi samāsataḥ tripuro nāma daityastu purā''sītsarvadurjayaḥ

ईश्वर ने कहा — हे षण्मुख! सुनो, मैं संक्षेप में सत्य कहता हूँ। पूर्वकाल में त्रिपुर नामक एक दैत्य था, जो सबके लिए अजेय था।

श्लोक 4 (devibhagavatam.11.4.4)

जितास्तेन सुराः सर्वे बह्मविष्ण्वादिदेवताः । सर्वैस्तु कथिते तस्मिंस्तदाहं त्रिपुरं प्रति

jitāstena surāḥ sarve bahmaviṣṇvādidevatāḥ sarvaistu kathite tasmiṁstadāhaṁ tripuraṁ prati

उसने ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवताओं को जीत लिया था। जब सबने मुझे यह बताया, तब मैंने त्रिपुर के विनाश के लिए —

श्लोक 5 (devibhagavatam.11.4.5)

अचिन्तयं महाशस्त्रमघोराख्यं मनोहरम् । सर्वदेवमयं दिव्यं ज्वलन्तं घोररूपि यत्

acintayaṁ mahāśastramaghorākhyaṁ manoharam sarvadevamayaṁ divyaṁ jvalantaṁ ghorarūpi yat

मनोहर, समस्त देवताओं की शक्ति से युक्त, दिव्य, प्रज्वलित और भयंकर स्वरूप वाले 'अघोर' नामक महाशस्त्र का ध्यान किया —

श्लोक 6 (devibhagavatam.11.4.6)

त्रिपुरस्य वधार्थाय देवानां तारणाय च । सर्वविघ्नोपशमनमघोरास्त्रमचिन्तयम्

tripurasya vadhārthāya devānāṁ tāraṇāya ca sarvavighnopaśamanamaghorāstramacintayam

त्रिपुर के वध और देवताओं के उद्धार के लिए, तथा सब विघ्नों को शांत करने वाले उस अघोरास्त्र का चिंतन किया।

श्लोक 7 (devibhagavatam.11.4.7)

दिव्यवर्षसहस्रं तु चक्षुरुन्मीलितं मया । पश्चान्ममाकुलाक्षिभ्यः पतिता जलबिन्दवः

divyavarṣasahasraṁ tu cakṣurunmīlitaṁ mayā paścānmamākulākṣibhyaḥ patitā jalabindavaḥ

एक हजार दिव्य वर्षों तक मैंने अपने नेत्र खुले रखे; उसके बाद मेरी व्याकुल आँखों से जल की बूँदें गिरीं।

श्लोक 8 (devibhagavatam.11.4.8)

तत्राश्रुबिन्दुतो जाता महारुद्राक्षवृक्षकाः । ममाज्ञया महासेन सर्वेषां हितकाम्यया

tatrāśrubinduto jātā mahārudrākṣavṛkṣakāḥ mamājñayā mahāsena sarveṣāṁ hitakāmyayā

हे महासेन! उन अश्रुबिंदुओं से ही, मेरी आज्ञा से और सबके हित की कामना से, महान् रुद्राक्ष-वृक्ष उत्पन्न हुए।

श्लोक 9 (devibhagavatam.11.4.9)

बभूवुस्ते च रुद्राक्षा अष्टत्रिंशत्प्रभेदतः । सूर्यनेत्रसमुद्भूताः कपिला द्वादश स्मृताः

babhūvuste ca rudrākṣā aṣṭatriṁśatprabhedataḥ sūryanetrasamudbhūtāḥ kapilā dvādaśa smṛtāḥ

वे रुद्राक्ष अड़तीस भेदों में हुए। मेरे सूर्य-नेत्र से उत्पन्न रुद्राक्ष कपिल (भूरे) वर्ण के, बारह प्रकार के स्मरण किए गए हैं;

श्लोक 10 (devibhagavatam.11.4.10)

सोमनेत्रोत्थिताः श्वेतास्ते षोडशविधाः क्रमात् । वह्निनेत्रोद्भवाः कृष्णा दश भेदा भवन्ति हि

somanetrotthitāḥ śvetāste ṣoḍaśavidhāḥ kramāt vahninetrodbhavāḥ kṛṣṇā daśa bhedā bhavanti hi

चंद्र-नेत्र से उत्पन्न रुद्राक्ष श्वेत वर्ण के, क्रमशः सोलह प्रकार के हैं; और अग्नि-नेत्र से उत्पन्न रुद्राक्ष कृष्ण वर्ण के, दस भेदों के होते हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.11.4.11)

श्वेतवर्णश्च रुद्राक्षो जातितो ब्राह्म उच्यते । क्षात्रो रक्तस्तथा मिश्रो वैश्यः कृष्णस्तु शूद्रकः

śvetavarṇaśca rudrākṣo jātito brāhma ucyate kṣātro raktastathā miśro vaiśyaḥ kṛṣṇastu śūdrakaḥ

श्वेतवर्ण रुद्राक्ष जाति से ब्राह्मण कहा जाता है; रक्तवर्ण क्षत्रिय, मिश्रवर्ण वैश्य, और कृष्णवर्ण शूद्र कहा जाता है।

श्लोक 12 (devibhagavatam.11.4.12)

एकवक्त्रः शिवः साक्षाद्ब्रह्महत्यां व्यपोहति । द्विवक्त्रो देवदेव्यो स्याद्विविधं नाशयेदघम्

ekavaktraḥ śivaḥ sākṣādbrahmahatyāṁ vyapohati dvivaktro devadevyo syādvividhaṁ nāśayedagham

एकमुखी रुद्राक्ष साक्षात् शिव है, जो ब्रह्महत्या के पाप को दूर करता है; द्विमुखी देव-देवी का स्वरूप है, जो विविध पापों का नाश करता है।

श्लोक 13 (devibhagavatam.11.4.13)

त्रिवक्त्रस्त्वनलः साक्षात्स्त्रीहत्यां दहति क्षणात् । चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति

trivaktrastvanalaḥ sākṣātstrīhatyāṁ dahati kṣaṇāt caturvaktraḥ svayaṁ brahmā narahatyāṁ vyapohati

त्रिमुखी साक्षात् अग्नि है, जो स्त्री-हत्या के पाप को क्षणभर में जला डालता है; चतुर्मुखी स्वयं ब्रह्मा हैं, जो नर-हत्या के पाप को दूर करते हैं।

श्लोक 14 (devibhagavatam.11.4.14)

पञ्चवक्त्रः स्वयं रुद्रः कालाग्निर्नाम नामतः । अभक्ष्यभक्षणोद्भूतैरगम्यागमनोद्भवैः

pañcavaktraḥ svayaṁ rudraḥ kālāgnirnāma nāmataḥ abhakṣyabhakṣaṇodbhūtairagamyāgamanodbhavaiḥ

पंचमुखी स्वयं रुद्र हैं, जिन्हें कालाग्नि के नाम से जाना जाता है; अभक्ष्य भक्षण और अगम्यागमन से उत्पन्न पापों से —

श्लोक 15 (devibhagavatam.11.4.15)

मुच्यते सर्वपापैस्तु पञ्चवक्त्रस्य धारणात् । षड्वक्त्रः कार्तिकेयस्तु स धार्यो दक्षिणे करे

mucyate sarvapāpaistu pañcavaktrasya dhāraṇāt ṣaḍvaktraḥ kārtikeyastu sa dhāryo dakṣiṇe kare

पंचमुखी रुद्राक्ष धारण करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। षण्मुखी कार्तिकेय-स्वरूप है, इसे दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए।

श्लोक 16 (devibhagavatam.11.4.16)

ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः । सप्तवक्त्रो महाभागो ह्यनङ्गो नाम नामतः

brahmahatyādibhiḥ pāpairmucyate nātra saṁśayaḥ saptavaktro mahābhāgo hyanaṅgo nāma nāmataḥ

इससे ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्ति मिलती है, इसमें संदेह नहीं। सप्तमुखी अत्यंत भाग्यशाली है, जिसे अनंग के नाम से जाना जाता है;

श्लोक 17 (devibhagavatam.11.4.17)

तद्धारणान्मुच्यते हि स्वर्णस्तेयादिपातकैः । अष्टवक्त्रो महासेन साक्षाद्देवो विनायकः

taddhāraṇānmucyate hi svarṇasteyādipātakaiḥ aṣṭavaktro mahāsena sākṣāddevo vināyakaḥ

इसे धारण करने से सुवर्ण-चोरी आदि पापों से मुक्ति मिलती है। हे महासेन! अष्टमुखी साक्षात् भगवान् विनायक हैं;

श्लोक 18 (devibhagavatam.11.4.18)

अन्तकूटं तूलकूटं स्वर्णकूटं तथैव च । दुष्टान्वयस्त्रियं वाथ संस्पृशंश्च गुरुस्त्रियम्

antakūṭaṁ tūlakūṭaṁ svarṇakūṭaṁ tathaiva ca duṣṭānvayastriyaṁ vātha saṁspṛśaṁśca gurustriyam

वारिस-संबंधी छल, वस्त्र-संबंधी छल, और स्वर्ण-संबंधी छल, अथवा दुष्ट कुल की स्त्री का स्पर्श, तथा गुरुपत्नी का स्पर्श —

श्लोक 19 (devibhagavatam.11.4.19)

एवमादीनि पापानि हन्ति सर्वाणि धारणात् । विघ्नास्तस्य प्रणश्यन्ति याति चान्ते परं पदम्

evamādīni pāpāni hanti sarvāṇi dhāraṇāt vighnāstasya praṇaśyanti yāti cānte paraṁ padam

इन आदि सभी पापों को यह धारण करने मात्र से नष्ट कर देता है। उसके विघ्न नष्ट हो जाते हैं और अंत में वह परम पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 20 (devibhagavatam.11.4.20)

भवन्त्येते गुणाः सर्वे ह्यष्टवक्त्रस्य धारणात् । नववक्त्रो भैरवस्तु धारयेद्वामबाहुके

bhavantyete guṇāḥ sarve hyaṣṭavaktrasya dhāraṇāt navavaktro bhairavastu dhārayedvāmabāhuke

अष्टमुखी रुद्राक्ष धारण करने से ये सभी गुण प्राप्त होते हैं। नवमुखी भैरव-स्वरूप है, इसे बाएँ बाहु पर धारण करना चाहिए।

श्लोक 21 (devibhagavatam.11.4.21)

भुक्तिमुक्तिप्रदः प्रोक्तो मम तुल्यबलो भवेत् । भ्रूणहत्यासहस्राणि ब्रह्महत्याशतानि च

bhuktimuktipradaḥ prokto mama tulyabalo bhavet bhrūṇahatyāsahasrāṇi brahmahatyāśatāni ca

यह भोग और मोक्ष दोनों को देने वाला कहा गया है; इसका धारक मेरे समान बलशाली हो जाता है। हजारों भ्रूणहत्याओं और सैकड़ों ब्रह्महत्याओं का पाप —

श्लोक 22 (devibhagavatam.11.4.22)

सद्यः प्रलयमायान्ति नववक्त्रस्य धारणात् । दशवक्त्रस्तु देवेशः साक्षाद्देवो जनार्दनः

sadyaḥ pralayamāyānti navavaktrasya dhāraṇāt daśavaktrastu deveśaḥ sākṣāddevo janārdanaḥ

नवमुखी रुद्राक्ष धारण करने से तत्काल नष्ट हो जाता है। दशमुखी साक्षात् देवेश जनार्दन (विष्णु) हैं;

श्लोक 23 (devibhagavatam.11.4.23)

ग्रहाश्चैव पिशाचाश्च वेताला ब्रह्मराक्षसाः । पन्नगाश्चोपशाम्यन्ति दशवक्त्रस्य धारणात्

grahāścaiva piśācāśca vetālā brahmarākṣasāḥ pannagāścopaśāmyanti daśavaktrasya dhāraṇāt

दशमुखी रुद्राक्ष धारण करने से ग्रह, पिशाच, वेताल, ब्रह्मराक्षस और सर्प सभी शांत हो जाते हैं।

श्लोक 24 (devibhagavatam.11.4.24)

वक्त्रैकादशरुद्राक्षो रुद्रैकादशकं स्मृतम् । शिखायां धारयेद्यो वै तस्य पुण्यफलं शृणु

vaktraikādaśarudrākṣo rudraikādaśakaṁ smṛtam śikhāyāṁ dhārayedyo vai tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

एकादशमुखी रुद्राक्ष ग्यारह रुद्रों का स्वरूप माना गया है। जो इसे शिखा पर धारण करता है, उसका पुण्यफल सुनो —

श्लोक 25 (devibhagavatam.11.4.25)

अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च । गवां शतसहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम्

aśvamedhasahasrasya vājapeyaśatasya ca gavāṁ śatasahasrasya samyagdattasya yatphalam

हजार अश्वमेध यज्ञों, सौ वाजपेय यज्ञों, तथा एक लाख गौओं के विधिवत् दान का जो फल है,

श्लोक 26 (devibhagavatam.11.4.26)

तत्फलं लभते शीघ्रं वक्त्रैकादशधारणात् । द्वादशास्यस्य रुद्राक्षस्यैव कर्णे तु धारणात्

tatphalaṁ labhate śīghraṁ vaktraikādaśadhāraṇāt dvādaśāsyasya rudrākṣasyaiva karṇe tu dhāraṇāt

वह फल एकादशमुखी धारण करने से शीघ्र प्राप्त हो जाता है। द्वादशमुखी रुद्राक्ष को कान में धारण करने से —

श्लोक 27 (devibhagavatam.11.4.27)

आदित्यास्तोषिता नित्यं द्वादशास्ये व्यवस्थिताः । गोभेधे चाश्वमेधे च यत्फलं तदवाप्नुयात्

ādityāstoṣitā nityaṁ dvādaśāsye vyavasthitāḥ gobhedhe cāśvamedhe ca yatphalaṁ tadavāpnuyāt

द्वादशमुखी में सदा स्थित बारह आदित्य संतुष्ट होते हैं; गोदान और अश्वमेध का जो फल है, वह प्राप्त होता है।

श्लोक 28 (devibhagavatam.11.4.28)

शृङ्गिणां शस्त्रिणां चैव व्याघ्रादीनां भयं न हि । न च व्याधिभयं तस्य नैव चाधिः प्रकीर्तितः

śṛṅgiṇāṁ śastriṇāṁ caiva vyāghrādīnāṁ bhayaṁ na hi na ca vyādhibhayaṁ tasya naiva cādhiḥ prakīrtitaḥ

उसे सींगधारी पशुओं, शस्त्रधारियों तथा व्याघ्र आदि से भय नहीं होता; न रोग का भय होता है, और न ही मानसिक व्यथा उसे सताती है।

श्लोक 29 (devibhagavatam.11.4.29)

न च किञ्चिद्भयं तस्य न च व्याधिः प्रवर्तते । न कुतश्चिद्भयं तस्य सुखी चैवेश्वरो भवेत्

na ca kiñcidbhayaṁ tasya na ca vyādhiḥ pravartate na kutaścidbhayaṁ tasya sukhī caiveśvaro bhavet

उसे किसी प्रकार का भय नहीं होता, न ही कोई रोग उत्पन्न होता है; उसे कहीं से भी भय नहीं रहता और वह सुखी तथा ऐश्वर्यवान् हो जाता है।

श्लोक 30 (devibhagavatam.11.4.30)

हस्त्यश्वमृगमार्जारसर्पमूषकदर्दुरान् । खरांश्च श्वशृगालांश्च हत्वा बहुविधानपि

hastyaśvamṛgamārjārasarpamūṣakadardurān kharāṁśca śvaśṛgālāṁśca hatvā bahuvidhānapi

हाथी, घोड़ा, मृग, बिल्ली, सर्प, चूहा, मेंढक, गधा, कुत्ता तथा सियार आदि अनेक प्रकार के प्राणियों को मारकर भी —

श्लोक 31 (devibhagavatam.11.4.31)

मुच्यते नात्र सन्देहो वक्त्रद्वादशधारणात् । वक्त्रत्रयोदशो वत्स रुद्राक्षो यदि लभ्यते

mucyate nātra sandeho vaktradvādaśadhāraṇāt vaktratrayodaśo vatsa rudrākṣo yadi labhyate

द्वादशमुखी धारण करने से मनुष्य मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। हे वत्स! यदि त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष प्राप्त हो जाए,

श्लोक 32 (devibhagavatam.11.4.32)

कार्तिकेयसमो ज्ञेयः सर्वकामार्थसिद्धिदः । रसो रसायनं चैव तस्य सर्वं प्रसिद्ध्यति

kārtikeyasamo jñeyaḥ sarvakāmārthasiddhidaḥ raso rasāyanaṁ caiva tasya sarvaṁ prasiddhyati

तो उसे कार्तिकेय के समान जानना चाहिए, जो सब कामनाओं और अर्थों की सिद्धि देने वाला है; उसके लिए रस और रसायन सहित सब कुछ सिद्ध हो जाता है।

श्लोक 33 (devibhagavatam.11.4.33)

तस्यैव सर्वभोग्यानि नात्र कार्या विचारणा । मातरं पितरं चैव भ्रातरं वा निहन्ति यः

tasyaiva sarvabhogyāni nātra kāryā vicāraṇā mātaraṁ pitaraṁ caiva bhrātaraṁ vā nihanti yaḥ

उसी के लिए सब भोग सुलभ हो जाते हैं, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं। जो माता, पिता या भाई की हत्या कर चुका हो,

श्लोक 34 (devibhagavatam.11.4.34)

मुच्यते सर्वपापेभ्यो धारणात्तस्य षण्मुख । चतुर्दशास्यो रुद्राक्षो यदि लभ्येत पुत्रक

mucyate sarvapāpebhyo dhāraṇāttasya ṣaṇmukha caturdaśāsyo rudrākṣo yadi labhyeta putraka

हे षण्मुख! वह भी इसे धारण करने से समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। हे पुत्र! यदि चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष प्राप्त हो जाए,

श्लोक 35 (devibhagavatam.11.4.35)

धारयेत्सततं मूर्ध्नि तस्य पिण्डः शिवस्य तु । किं मुने बहुनोक्तेन वर्णनेन पुनः पुनः

dhārayetsatataṁ mūrdhni tasya piṇḍaḥ śivasya tu kiṁ mune bahunoktena varṇanena punaḥ punaḥ

तो उसे सदैव मस्तक पर धारण करना चाहिए; वह साक्षात् शिव का ही स्वरूप है। हे मुने! बार-बार अधिक कहने से क्या लाभ?

श्लोक 36 (devibhagavatam.11.4.36)

पूज्यते सन्ततं देवैः प्राप्यते च परा गतिः । रुद्राक्ष एकः शिरसा धार्यो भक्त्या द्विजोत्तमैः

pūjyate santataṁ devaiḥ prāpyate ca parā gatiḥ rudrākṣa ekaḥ śirasā dhāryo bhaktyā dvijottamaiḥ

इसका धारक देवताओं द्वारा निरंतर पूजित होता है और परम गति प्राप्त करता है। श्रेष्ठ द्विजों को एक रुद्राक्ष भी भक्तिपूर्वक सिर पर धारण करना चाहिए।

श्लोक 37 (devibhagavatam.11.4.37)

षड्विंशद्भिः शिरोमाला पञ्चाशद्धृदयेन तु । कलाक्षैर्बाहुवलये अर्काक्षैर्मणिबन्धनम्

ṣaḍviṁśadbhiḥ śiromālā pañcāśaddhṛdayena tu kalākṣairbāhuvalaye arkākṣairmaṇibandhanam

शिर के लिए छब्बीस मनकों की माला, हृदय के लिए पचास मनकों की; बाहु के आभूषण में चंद्रकलाओं के बराबर (सोलह), और कलाई के लिए सूर्यों के बराबर (बारह) मनके होने चाहिए।

श्लोक 38 (devibhagavatam.11.4.38)

अष्टोत्तरशतैर्माला पञ्चाशद्भिः षडानन । अथवा सप्तविंशत्या कृत्वा रुद्राक्षमालिकाम्

aṣṭottaraśatairmālā pañcāśadbhiḥ ṣaḍānana athavā saptaviṁśatyā kṛtvā rudrākṣamālikām

हे षडानन! माला एक सौ आठ मनकों की अथवा पचास मनकों की बनाई जाती है; अथवा सत्ताईस मनकों की रुद्राक्ष-मालिका बनाकर —

श्लोक 39 (devibhagavatam.11.4.39)

धारणाद्वा जपाद्वापि ह्यनन्तं फलमश्नुते । अष्टोत्तरशतैर्माला रुद्राक्षैर्धार्यते यदि

dhāraṇādvā japādvāpi hyanantaṁ phalamaśnute aṣṭottaraśatairmālā rudrākṣairdhāryate yadi

उसे धारण करने या उससे जप करने से अनंत फल प्राप्त होता है। यदि एक सौ आठ रुद्राक्षों की माला धारण की जाए,

श्लोक 40 (devibhagavatam.11.4.40)

क्षणे क्षणेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति षण्मुख । त्रिःसप्तकुलमुद्धृत्य शिवलोके महीयते

kṣaṇe kṣaṇe'śvamedhasya phalaṁ prāpnoti ṣaṇmukha triḥsaptakulamuddhṛtya śivaloke mahīyate

हे षण्मुख! तो क्षण-क्षण में अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है; और इक्कीस पीढ़ियों के कुल का उद्धार करके मनुष्य शिवलोक में महिमामंडित होता है।

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