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एकादश स्कन्ध · अध्याय 6

रुद्राक्ष-माहात्म्य में गुणनिधि-मोक्ष-वर्णन

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (devibhagavatam.11.6.1)

ईश्वर उवाच । महासेन कुशग्रन्थिपुत्राजीवादयः परे । रुद्राक्षस्य तु नैकोऽपि कलामर्हति षोडशीम्

īśvara uvāca mahāsena kuśagranthiputrājīvādayaḥ pare rudrākṣasya tu naiko'pi kalāmarhati ṣoḍaśīm

ईश्वर ने कहा — हे महासेन! कुशगाँठ, पुत्रजीवा आदि अन्य मनके रुद्राक्ष के सोलहवें अंश के भी योग्य नहीं हैं।

श्लोक 2 (devibhagavatam.11.6.2)

पुरुषाणां यथा विष्णुर्ग्रहाणां च यथा रविः । नदीनां तु यथा गङ्गा मुनीनां कश्यपो यथा

puruṣāṇāṁ yathā viṣṇurgrahāṇāṁ ca yathā raviḥ nadīnāṁ tu yathā gaṅgā munīnāṁ kaśyapo yathā

जैसे पुरुषों में विष्णु, ग्रहों में सूर्य, नदियों में गंगा, और मुनियों में कश्यप श्रेष्ठ हैं,

श्लोक 3 (devibhagavatam.11.6.3)

उच्चैःश्रवा यथाश्वानां देवानामीश्वरो यथा । देवीनां तु यथा गौरी तद्वच्छ्रेष्ठमिदं भवेत्

uccaiḥśravā yathāśvānāṁ devānāmīśvaro yathā devīnāṁ tu yathā gaurī tadvacchreṣṭhamidaṁ bhavet

जैसे घोड़ों में उच्चैःश्रवा, देवताओं में ईश्वर, और देवियों में गौरी श्रेष्ठ हैं, वैसे ही यह [रुद्राक्ष] सबसे श्रेष्ठ है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.11.6.4)

नातः परतरं स्तोत्रं नातः परतरं व्रतम् । अक्षय्येषु च दानेषु रुद्राक्षस्तु विशिष्यते

nātaḥ parataraṁ stotraṁ nātaḥ parataraṁ vratam akṣayyeṣu ca dāneṣu rudrākṣastu viśiṣyate

इससे बढ़कर न कोई स्तोत्र है, न कोई व्रत है; अक्षय दानों में भी रुद्राक्ष विशिष्ट माना गया है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.11.6.5)

शिवभक्ताय शान्ताय दद्याद्रुद्राक्षमुत्तमम् । तस्य पुण्यफलस्यान्तं न चाहं वक्तुमुत्सहे

śivabhaktāya śāntāya dadyādrudrākṣamuttamam tasya puṇyaphalasyāntaṁ na cāhaṁ vaktumutsahe

शांतचित्त शिवभक्त को उत्तम रुद्राक्ष देना चाहिए; उसके पुण्यफल का अंत मैं स्वयं भी नहीं बता सकता।

श्लोक 6 (devibhagavatam.11.6.6)

धृतरुद्राक्षकण्ठाय यस्त्वन्नं सम्प्रयच्छति । त्रिसप्तकुलमुद्धृत्य रुद्रलोकं स गच्छति

dhṛtarudrākṣakaṇṭhāya yastvannaṁ samprayacchati trisaptakulamuddhṛtya rudralokaṁ sa gacchati

जो कंठ में रुद्राक्ष धारण किए हुए व्यक्ति को अन्न देता है, वह इक्कीस पीढ़ियों के कुल का उद्धार करके रुद्रलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 7 (devibhagavatam.11.6.7)

यस्य भाले विभूतिर्न नाङ्गे रुद्राक्षधारणम् । न शम्भोर्भवने पूजा स विप्रः श्वपचाधमः

yasya bhāle vibhūtirna nāṅge rudrākṣadhāraṇam na śambhorbhavane pūjā sa vipraḥ śvapacādhamaḥ

जिसके मस्तक पर भस्म नहीं, शरीर पर रुद्राक्ष-धारण नहीं, और जो शिव के भवन में पूजा नहीं करता — वह ब्राह्मण चाण्डाल से भी अधम है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.11.6.8)

खादन्मांसं पिबन्मद्यं सङ्गच्छन्नन्त्यजानपि । पातकेभ्यो विमुच्येत रुद्राक्षं शिरसि स्थिते

khādanmāṁsaṁ pibanmadyaṁ saṅgacchannantyajānapi pātakebhyo vimucyeta rudrākṣaṁ śirasi sthite

मांस खाते हुए, मद्य पीते हुए, अथवा अन्त्यजों के साथ रहते हुए भी, यदि मस्तक पर रुद्राक्ष स्थित हो, तो मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 9 (devibhagavatam.11.6.9)

सर्वयज्ञतपोदानवेदाभ्यासैश्च यत्फलम् । तत्फलं लभते सद्यो रुद्राक्षस्य तु धारणात्

sarvayajñatapodānavedābhyāsaiśca yatphalam tatphalaṁ labhate sadyo rudrākṣasya tu dhāraṇāt

समस्त यज्ञों, तपों, दानों तथा वेदाभ्यास से जो फल प्राप्त होता है, वह फल रुद्राक्ष धारण करने मात्र से तत्काल मिल जाता है।

श्लोक 10 (devibhagavatam.11.6.10)

वेदैश्चतुर्भिर्यत्पुण्यं पुराणपठनेन च । यत्तीर्थसेवनेनैव सर्वविद्यादिभिस्तथा

vedaiścaturbhiryatpuṇyaṁ purāṇapaṭhanena ca yattīrthasevanenaiva sarvavidyādibhistathā

चारों वेदों से, पुराण-पठन से, तीर्थ-सेवन से तथा समस्त विद्याओं से जो पुण्य मिलता है,

श्लोक 11 (devibhagavatam.11.6.11)

तत्पुण्यं लभते सद्यो रुद्राक्षस्य तु धारणात् । प्रयाणकाले रुद्राक्षं बन्धयित्वा म्रियेद्यदि

tatpuṇyaṁ labhate sadyo rudrākṣasya tu dhāraṇāt prayāṇakāle rudrākṣaṁ bandhayitvā mriyedyadi

वह पुण्य रुद्राक्ष धारण करने मात्र से तत्काल प्राप्त हो जाता है। यदि कोई मृत्यु के समय रुद्राक्ष बाँधकर मरे,

श्लोक 12 (devibhagavatam.11.6.12)

स रुद्रत्वमवाप्नोति पुनर्जन्म न विद्यते । रुद्राक्षं धारयेत्कण्ठे बाह्वोर्वा म्रियते यदि

sa rudratvamavāpnoti punarjanma na vidyate rudrākṣaṁ dhārayetkaṇṭhe bāhvorvā mriyate yadi

तो वह रुद्रत्व को प्राप्त होता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। यदि कोई कंठ या भुजाओं में रुद्राक्ष धारण किए हुए मरे,

श्लोक 13 (devibhagavatam.11.6.13)

कुलैकविंशमुत्तार्य रुद्रलोके वसेन्नरः । ब्राह्मणो वापि चाण्डालो निर्गुणः सगुणोऽपि च

kulaikaviṁśamuttārya rudraloke vasennaraḥ brāhmaṇo vāpi cāṇḍālo nirguṇaḥ saguṇo'pi ca

तो वह इक्कीस पीढ़ियों के कुल का उद्धार करके रुद्रलोक में निवास करता है — चाहे वह ब्राह्मण हो या चाण्डाल, निर्गुण हो या सगुण।

श्लोक 14 (devibhagavatam.11.6.14)

भस्मरुद्राक्षधारी यः स देवत्वं शिवं व्रजेत् । शुचिर्वाप्यशुचिर्वापि तथाभक्ष्यस्य भक्षकः

bhasmarudrākṣadhārī yaḥ sa devatvaṁ śivaṁ vrajet śucirvāpyaśucirvāpi tathābhakṣyasya bhakṣakaḥ

जो भस्म और रुद्राक्ष दोनों धारण करता है, वह शिव के दिव्य पद को प्राप्त होता है — चाहे वह शुद्ध हो या अशुद्ध, अथवा अभक्ष्य वस्तुओं का भक्षक ही क्यों न हो,

श्लोक 15 (devibhagavatam.11.6.15)

म्लेच्छो वाप्यथ चाण्डालो युतो वा सर्वपातकैः । रुद्राक्षधारणादेव स रुद्रो नात्र संशयः

mleccho vāpyatha cāṇḍālo yuto vā sarvapātakaiḥ rudrākṣadhāraṇādeva sa rudro nātra saṁśayaḥ

म्लेच्छ हो या चाण्डाल, अथवा समस्त पापों से युक्त ही क्यों न हो — रुद्राक्ष धारण करने मात्र से वह रुद्र ही हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 16 (devibhagavatam.11.6.16)

शिरसा धारिते कोटिः कर्णयोर्दशकोटयः । शतकोटिर्गले बद्धो मूर्ध्नि कोटिसहस्रकम्

śirasā dhārite koṭiḥ karṇayordaśakoṭayaḥ śatakoṭirgale baddho mūrdhni koṭisahasrakam

मस्तक पर धारण करने से एक करोड़ का, दोनों कानों में दस करोड़ का, कंठ में बाँधने से सौ करोड़ का, और सिर के ऊपरी भाग पर एक हजार करोड़ का फल मिलता है;

श्लोक 17 (devibhagavatam.11.6.17)

अयुतं चोपवीते तु लक्षकोटिर्भुजे स्थिते । मणिबन्धे तु रुद्राक्षो मोक्षसाधनकः परः

ayutaṁ copavīte tu lakṣakoṭirbhuje sthite maṇibandhe tu rudrākṣo mokṣasādhanakaḥ paraḥ

यज्ञोपवीत में दस हजार गुना, भुजा में स्थित होने पर लाख करोड़ गुना; और कलाई पर रुद्राक्ष मोक्ष का सर्वोत्तम साधन है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.11.6.18)

रुद्राक्षधारको भूत्वा यत्किञ्चित्कर्म वैदिकम् । कुर्वन्विप्रः सदा भक्त्या महदाप्नोति तत्फलम्

rudrākṣadhārako bhūtvā yatkiñcitkarma vaidikam kurvanvipraḥ sadā bhaktyā mahadāpnoti tatphalam

रुद्राक्षधारी होकर द्विज जो भी वैदिक कर्म सदा भक्तिपूर्वक करता है, उसे उसका महान् फल प्राप्त होता है।

श्लोक 19 (devibhagavatam.11.6.19)

रुद्राक्षमालिकां कण्ठे धारयेद्भक्तिवर्जितः । पापकर्मा तु यो नित्यं स मुक्तः सर्वबन्धनात्

rudrākṣamālikāṁ kaṇṭhe dhārayedbhaktivarjitaḥ pāpakarmā tu yo nityaṁ sa muktaḥ sarvabandhanāt

जो भक्तिरहित होकर भी कंठ में रुद्राक्षमालिका धारण करता है, और सदा पापकर्म करने वाला भी है, वह भी समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 20 (devibhagavatam.11.6.20)

रुद्राक्षार्पितचेता यो रुद्राक्षस्तु न वै धृतः । असौ माहेश्वरो लोके नमस्यः स तु लिङ्गवत्

rudrākṣārpitacetā yo rudrākṣastu na vai dhṛtaḥ asau māheśvaro loke namasyaḥ sa tu liṅgavat

जिसका चित्त रुद्राक्ष में समर्पित है, चाहे उसने वास्तव में रुद्राक्ष धारण न किया हो, वह भी शिव का भक्त है और लोक में लिंगधारी के समान वंदनीय है।

श्लोक 21 (devibhagavatam.11.6.21)

अविद्यो वा सविद्यो वा रुद्राक्षस्य तु धारणात् । शिवलोकं प्रपद्येत कीकटे गर्दभो यथा

avidyo vā savidyo vā rudrākṣasya tu dhāraṇāt śivalokaṁ prapadyeta kīkaṭe gardabho yathā

विद्याहीन हो या विद्यायुक्त, रुद्राक्ष धारण करने मात्र से मनुष्य शिवलोक को प्राप्त होता है — जैसे कीकट देश में एक गदहे को प्राप्त हुआ।

श्लोक 22 (devibhagavatam.11.6.22)

स्कन्द उवाच । रुद्राक्षान्सन्दधे देव गर्दभः केन हेतुना । कीकटे केन वा दत्तस्तद्ब्रूहि परमेश्वर

skanda uvāca rudrākṣānsandadhe deva gardabhaḥ kena hetunā kīkaṭe kena vā dattastadbrūhi parameśvara

स्कंद ने कहा — हे देव! वह गदहा किस कारण से रुद्राक्ष धारण किए हुए था, और कीकट में उसे यह किसने दिया? हे परमेश्वर! यह मुझे बताइए।

श्लोक 23 (devibhagavatam.11.6.23)

श्रीभगवानुवाच । शृणु पुत्र पुरावृत्तं गर्दभो विन्ध्यपर्वते । धत्ते रुद्राक्षभारं तु वाहितः पथिकेन तु

śrībhagavānuvāca śṛṇu putra purāvṛttaṁ gardabho vindhyaparvate dhatte rudrākṣabhāraṁ tu vāhitaḥ pathikena tu

श्रीभगवान ने कहा — हे पुत्र! सुनो, यह प्राचीन वृत्तांत है। विंध्य पर्वत पर एक गदहा एक यात्री द्वारा हाँका जा रहा था, और वह रुद्राक्षों का भार ढो रहा था।

श्लोक 24 (devibhagavatam.11.6.24)

श्रान्तोऽसमर्थस्तद्भारं वोढुं पतितवान्भुवि । प्राणैस्त्वक्तस्त्रिनेत्रस्तु शूलपाणिर्महेश्वरः

śrānto'samarthastadbhāraṁ voḍhuṁ patitavānbhuvi prāṇaistvaktastrinetrastu śūlapāṇirmaheśvaraḥ

थका हुआ और उस भार को ढोने में असमर्थ, वह भूमि पर गिर पड़ा और उसके प्राण निकल गए। तब त्रिनेत्र, शूलपाणि महेश्वर की —

श्लोक 25 (devibhagavatam.11.6.25)

मत्प्रसादान्महासेन मदन्तिकमुपागतः । यावद्वक्त्रस्य सङ्ख्यानं रुद्राक्षाणां सुदुर्लभम्

matprasādānmahāsena madantikamupāgataḥ yāvadvaktrasya saṅkhyānaṁ rudrākṣāṇāṁ sudurlabham

हे महासेन! मेरी कृपा से वह मेरे समीप आ पहुँचा। जितने मुख (संख्या) के दुर्लभ रुद्राक्ष उसने ढोए थे,

श्लोक 26 (devibhagavatam.11.6.26)

तावद्युगसहस्राणि शिवलोके महीयते । स्वशिष्येभ्यस्तु वक्तव्यं नाशिष्येभ्यः कदाचन

tāvadyugasahasrāṇi śivaloke mahīyate svaśiṣyebhyastu vaktavyaṁ nāśiṣyebhyaḥ kadācana

उतने ही हजार युगों तक वह शिवलोक में महिमामंडित रहता है। यह [रहस्य] अपने शिष्यों को ही बताना चाहिए, अशिष्यों को कभी नहीं,

श्लोक 27 (devibhagavatam.11.6.27)

अभक्तेभ्योऽपि मूर्खेभ्यः कदाचिन्न प्रकाशयेत् । अभक्तो वास्तु भक्तो वा नीचो नीचतरोऽपि वा

abhaktebhyo'pi mūrkhebhyaḥ kadācinna prakāśayet abhakto vāstu bhakto vā nīco nīcataro'pi vā

और अभक्तों तथा मूर्खों को भी कभी प्रकट नहीं करना चाहिए। चाहे कोई अभक्त हो या भक्त, नीच हो या नीचतर भी —

श्लोक 28 (devibhagavatam.11.6.28)

रुद्राक्षान्धारयेद्यस्तु मुच्यते सर्वपातकैः । रुद्राक्षधारणं पुण्यं केन वा सदृशं भवेत्

rudrākṣāndhārayedyastu mucyate sarvapātakaiḥ rudrākṣadhāraṇaṁ puṇyaṁ kena vā sadṛśaṁ bhavet

जो भी रुद्राक्ष धारण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। रुद्राक्ष-धारण के पुण्य की तुलना किससे की जा सकती है?

श्लोक 29 (devibhagavatam.11.6.29)

महाव्रतमिदं प्राहुर्मुनयस्तत्त्वदर्शिनः । सहस्रं धारयेद्यस्तु रुद्राक्षाणां धृतव्रतः

mahāvratamidaṁ prāhurmunayastattvadarśinaḥ sahasraṁ dhārayedyastu rudrākṣāṇāṁ dhṛtavrataḥ

तत्त्वदर्शी मुनियों ने इसे महाव्रत कहा है। जो व्रतधारी एक हजार रुद्राक्ष धारण करता है,

श्लोक 30 (devibhagavatam.11.6.30)

तं नमन्ति सुराः सर्वे यथा रुद्रस्तथैव सः । अभावे तु सहस्रस्य बाह्वोः षोडश षोडश

taṁ namanti surāḥ sarve yathā rudrastathaiva saḥ abhāve tu sahasrasya bāhvoḥ ṣoḍaśa ṣoḍaśa

उसे समस्त देवता उसी प्रकार नमस्कार करते हैं जैसे रुद्र को करते हैं — वह रुद्र के ही समान है। एक हजार के अभाव में, दोनों भुजाओं पर सोलह-सोलह,

श्लोक 31 (devibhagavatam.11.6.31)

एकं शिखायां करयोर्द्वादश द्वादशैव तु । द्वात्रिंशत्कण्ठदेशे तु चत्वारिंशच्च मस्तके

ekaṁ śikhāyāṁ karayordvādaśa dvādaśaiva tu dvātriṁśatkaṇṭhadeśe tu catvāriṁśacca mastake

शिखा पर एक, दोनों हाथों में बारह-बारह, कंठ-प्रदेश में बत्तीस, तथा मस्तक पर चालीस,

श्लोक 32 (devibhagavatam.11.6.32)

एकैकं कर्णयोः षट् षट् वक्षस्यष्टोत्तरं शतम् । यो धारयति रुद्राक्षान् रुद्रवत्स तु पूज्यते

ekaikaṁ karṇayoḥ ṣaṭ ṣaṭ vakṣasyaṣṭottaraṁ śatam yo dhārayati rudrākṣān rudravatsa tu pūjyate

दोनों कानों में छह-छह, और वक्षस्थल पर एक सौ आठ — जो इस प्रकार रुद्राक्ष धारण करता है, वह रुद्र के समान पूजनीय होता है।

श्लोक 33 (devibhagavatam.11.6.33)

मुक्ताप्रवालस्कटिकरौप्यवैदूर्यकाञ्चनैः । समेतान्धारयेद्यस्तु रुद्राक्षान्स शिवो भवेत्

muktāpravālaskaṭikaraupyavaidūryakāñcanaiḥ sametāndhārayedyastu rudrākṣānsa śivo bhavet

जो मोती, मूँगा, स्फटिक, चाँदी, वैदूर्य और सोने के साथ जड़े हुए रुद्राक्ष धारण करता है, वह स्वयं शिव हो जाता है।

श्लोक 34 (devibhagavatam.11.6.34)

केवलानपि रुद्राक्षान्यद्यालस्याद्बिभर्ति यः । तं न स्पृशन्ति पापानि तमांसीव विभावसुम्

kevalānapi rudrākṣānyadyālasyādbibharti yaḥ taṁ na spṛśanti pāpāni tamāṁsīva vibhāvasum

जो केवल साधारण रुद्राक्ष भी आलस्यवश धारण करता है, उसे भी पाप उसी तरह स्पर्श नहीं करते जैसे अंधकार अग्नि को स्पर्श नहीं करता।

श्लोक 35 (devibhagavatam.11.6.35)

रुद्राक्षमालया मन्त्रो जप्तोऽनन्तफलप्रदः । यस्याङ्गे नास्ति रुद्राक्ष एकोऽपि बहुपुण्यदः

rudrākṣamālayā mantro japto'nantaphalapradaḥ yasyāṅge nāsti rudrākṣa eko'pi bahupuṇyadaḥ

रुद्राक्षमाला से जपा गया मंत्र अनंत फल देने वाला है। जिसके शरीर पर एक भी बहुपुण्यदायी रुद्राक्ष नहीं है,

श्लोक 36 (devibhagavatam.11.6.36)

तस्य जन्म निरर्थं स्यात्त्रिपुण्ड्ररहितं यथा । रुद्राक्षं मस्तके धृत्वा शिरःस्नानं करोति यः

tasya janma nirarthaṁ syāttripuṇḍrarahitaṁ yathā rudrākṣaṁ mastake dhṛtvā śiraḥsnānaṁ karoti yaḥ

उसका जन्म वैसे ही निरर्थक है जैसे त्रिपुण्ड्र से रहित व्यक्ति का। जो मस्तक पर रुद्राक्ष धारण कर शिरःस्नान करता है,

श्लोक 37 (devibhagavatam.11.6.37)

गङ्गास्नानफलं तस्य जायते नात्र संशयः । एकवक्त्रः पञ्चवक्त्र एकादशमुखाः परे

gaṅgāsnānaphalaṁ tasya jāyate nātra saṁśayaḥ ekavaktraḥ pañcavaktra ekādaśamukhāḥ pare

उसे गंगास्नान का फल प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं। एकमुखी, पंचमुखी, ग्यारह मुख वाले, और अन्य,

श्लोक 38 (devibhagavatam.11.6.38)

चतुर्दशमुखाः केचिद्रुद्राक्षा लोकपूजिताः । भक्त्या सम्पूज्यते नित्यं रुद्राक्षः शङ्करात्मकः

caturdaśamukhāḥ kecidrudrākṣā lokapūjitāḥ bhaktyā sampūjyate nityaṁ rudrākṣaḥ śaṅkarātmakaḥ

तथा चौदह मुख वाले — ऐसे रुद्राक्ष लोक में पूजित हैं। शंकरस्वरूप रुद्राक्ष जब सदा भक्तिपूर्वक पूजा जाता है,

श्लोक 39 (devibhagavatam.11.6.39)

दरिद्रं वापि पुरुषं राजानं कुरुते भुवि । अत्र ते कथयिष्यामि पुराणं मतमुत्तमम्

daridraṁ vāpi puruṣaṁ rājānaṁ kurute bhuvi atra te kathayiṣyāmi purāṇaṁ matamuttamam

तो वह इस पृथ्वी पर दरिद्र मनुष्य को भी राजा बना देता है। इस विषय में मैं तुम्हें एक उत्तम प्राचीन आख्यान सुनाता हूँ —

श्लोक 40 (devibhagavatam.11.6.40)

कोसलेषु द्विजः कश्चिद्गिरिनाथ इति श्रुतः । महाधनी च धर्मात्मा वेदवेदाङ्गपारगः

kosaleṣu dvijaḥ kaścidgirinātha iti śrutaḥ mahādhanī ca dharmātmā vedavedāṅgapāragaḥ

कोसल देश में गिरिनाथ नामक एक द्विज थे, जो महाधनी, धर्मात्मा और वेद-वेदांगों में पारंगत थे।

श्लोक 41 (devibhagavatam.11.6.41)

यज्ञकृद्दीक्षितस्तस्य तनयः सुन्दराकृतिः । नाम्ना गुणनिधिः ख्यातस्तरुणः कामसुन्दरः

yajñakṛddīkṣitastasya tanayaḥ sundarākṛtiḥ nāmnā guṇanidhiḥ khyātastaruṇaḥ kāmasundaraḥ

यज्ञ करने वाले और दीक्षित उन [गिरिनाथ] का पुत्र, सुंदर आकृति वाला, गुणनिधि नाम से प्रसिद्ध, कामदेव के समान सुंदर युवक था।

श्लोक 42 (devibhagavatam.11.6.42)

गुरोः सुधिषणस्याथ पत्नीं मुक्तावलीमथ । मोहयामास रूपेण यौवनेन मदेन च

guroḥ sudhiṣaṇasyātha patnīṁ muktāvalīmatha mohayāmāsa rūpeṇa yauvanena madena ca

उसने अपने गुरु सुधिषण की पत्नी मुक्तावली को अपने रूप, यौवन और मद से मोहित कर लिया।

श्लोक 43 (devibhagavatam.11.6.43)

सङ्गतस्तु तया सार्धं कञ्चित्कालं ततो भिया । विषं ददौ च गुरवे येभे पश्चात्तु निर्भयः

saṅgatastu tayā sārdhaṁ kañcitkālaṁ tato bhiyā viṣaṁ dadau ca gurave yebhe paścāttu nirbhayaḥ

कुछ समय तक उसके साथ रहकर, फिर भयवश उसने गुरु को विष दे दिया, और उसके बाद निर्भय होकर संबंध बनाए रखा।

श्लोक 44 (devibhagavatam.11.6.44)

यदा माता पिता कर्म किञ्चिज्जानाति यत्क्षणे । मातरं पितरं चापि मारयामास तद्विषात्

yadā mātā pitā karma kiñcijjānāti yatkṣaṇe mātaraṁ pitaraṁ cāpi mārayāmāsa tadviṣāt

जब भी माता-पिता को इस कर्म का कुछ पता चलता, तो उसने उसी विष से माता और पिता दोनों को भी मार डाला।

श्लोक 45 (devibhagavatam.11.6.45)

नानाविलासभोगैश्च जाते द्रव्यव्यये ततः । ब्राह्मणानां गृहे चौर्यं चकार स तदा खलः

nānāvilāsabhogaiśca jāte dravyavyaye tataḥ brāhmaṇānāṁ gṛhe cauryaṁ cakāra sa tadā khalaḥ

फिर अनेक विलास-भोगों में धन व्यय हो जाने पर, उस दुष्ट ने ब्राह्मणों के घरों में चोरी करना शुरू कर दिया।

श्लोक 46 (devibhagavatam.11.6.46)

सुरापानमदोन्मत्तस्तदा ज्ञातिबहिष्कृतः । ग्रामान्निष्कासितः सर्वैस्तदा सोऽभूद्वनेचरः

surāpānamadonmattastadā jñātibahiṣkṛtaḥ grāmānniṣkāsitaḥ sarvaistadā so'bhūdvanecaraḥ

मद्यपान के मद में उन्मत्त होकर, उसे उसके ज्ञातिजनों ने बहिष्कृत कर दिया; सबने उसे गाँव से निकाल दिया, और तब वह वनचारी बन गया।

श्लोक 47 (devibhagavatam.11.6.47)

मुक्तावल्या तया सार्धं जगाम गहनं वनम् । मार्गे स्थितो द्रव्यलोभाज्जघान ब्राह्मणान्बहून्

muktāvalyā tayā sārdhaṁ jagāma gahanaṁ vanam mārge sthito dravyalobhājjaghāna brāhmaṇānbahūn

उस मुक्तावली के साथ वह घने वन में चला गया। मार्ग में रहकर, धन के लोभ से उसने अनेक ब्राह्मणों की हत्या कर दी।

श्लोक 48 (devibhagavatam.11.6.48)

एवं बहुगते काले ममार स तदाधमः । नेतुं तं यमदूताश्च समाजग्मुः सहस्रशः

evaṁ bahugate kāle mamāra sa tadādhamaḥ netuṁ taṁ yamadūtāśca samājagmuḥ sahasraśaḥ

इस प्रकार बहुत समय बीत जाने पर वह अधम पुरुष मर गया। तब उसे ले जाने के लिए यमदूत हजारों की संख्या में वहाँ आए,

श्लोक 49 (devibhagavatam.11.6.49)

शिवलोकाच्छिवगणास्तथैव च समागताः । तयोः परस्परं वादो बभूव गिरिजासुत

śivalokācchivagaṇāstathaiva ca samāgatāḥ tayoḥ parasparaṁ vādo babhūva girijāsuta

और उसी प्रकार शिवलोक से शिवगण भी आ पहुँचे। हे गिरिजासुत! उन दोनों में परस्पर वाद-विवाद हुआ।

श्लोक 50 (devibhagavatam.11.6.50)

यमदूतास्तदा प्रोचुः पुण्यमस्य किमस्ति हि । ब्रुवन्तु सेवकाः शम्भोर्यद्येनं नेतुमिच्छथ

yamadūtāstadā procuḥ puṇyamasya kimasti hi bruvantu sevakāḥ śambhoryadyenaṁ netumicchatha

यमदूतों ने तब कहा — 'इसका ऐसा कौन सा पुण्य है? यदि तुम इसे ले जाना चाहते हो, तो हे शंभु के सेवको! बताओ।'

श्लोक 51 (devibhagavatam.11.6.51)

शिवदूतास्तदा प्रोचुरयं यस्मिन्स्थले मृतः । दशहस्तादधो भूमे रुद्राक्षस्तत्र चास्ति हि

śivadūtāstadā procurayaṁ yasminsthale mṛtaḥ daśahastādadho bhūme rudrākṣastatra cāsti hi

तब शिवदूतों ने कहा — 'जिस स्थान पर यह मरा है, वहाँ भूमि के दस हाथ नीचे एक रुद्राक्ष विद्यमान है।

श्लोक 52 (devibhagavatam.11.6.52)

तत्प्रभावेण हे दूता नेष्यामः शिवसन्निधिम् । ततो विमानमारुह्य दिव्यरूपधरो द्विजः

tatprabhāveṇa he dūtā neṣyāmaḥ śivasannidhim tato vimānamāruhya divyarūpadharo dvijaḥ

हे दूतो! उसी के प्रभाव से हम इसे शिव के सान्निध्य में ले जाएँगे।' तत्पश्चात् दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर, दिव्य रूप धारण किए वह द्विज,

श्लोक 53 (devibhagavatam.11.6.53)

गतो गुणनिधिर्दूतैः सहितः शङ्करालयम् । इति रुद्राक्षमाहात्म्यं कथितं तव सुव्रत

gato guṇanidhirdūtaiḥ sahitaḥ śaṅkarālayam iti rudrākṣamāhātmyaṁ kathitaṁ tava suvrata

गुणनिधि, [शिव-]दूतों के साथ शंकर के धाम को चला गया। हे सुव्रत! इस प्रकार तुम्हें रुद्राक्ष का माहात्म्य कहा गया।

श्लोक 54 (devibhagavatam.11.6.54)

एवं रुद्राक्षमहिमा समासात्कथितो मया । सर्वपापक्षयकरो महापुण्यफलप्रदः

evaṁ rudrākṣamahimā samāsātkathito mayā sarvapāpakṣayakaro mahāpuṇyaphalapradaḥ

इस प्रकार रुद्राक्ष की महिमा मैंने संक्षेप में कह दी — जो समस्त पापों का नाश करने वाली और महान् पुण्यफल देने वाली है।

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