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एकादश स्कन्ध · अध्याय 8

भूतशुद्धि-वर्णन

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (devibhagavatam.11.8.1)

श्रीनारायण उवाच । भूतशुद्धिप्रकारं च कथयामि महामुने । मूलाधारात्समुत्थाय कुण्डलीं परदेवताम्

śrīnārāyaṇa uvāca bhūtaśuddhiprakāraṁ ca kathayāmi mahāmune mūlādhārātsamutthāya kuṇḍalīṁ paradevatām

श्रीनारायण ने कहा — हे महामुने! अब मैं भूतशुद्धि की विधि कहूँगा। मूलाधार से परम देवी कुंडलिनी को उठाकर —

श्लोक 2 (devibhagavatam.11.8.2)

सुषुम्णामार्गमाश्रित्य ब्रह्मरन्ध्रगतां स्मरेत् । जीवं ब्रह्मणि संयोज्य हंसमन्त्रेण साधकः

suṣumṇāmārgamāśritya brahmarandhragatāṁ smaret jīvaṁ brahmaṇi saṁyojya haṁsamantreṇa sādhakaḥ

सुषुम्णा मार्ग का आश्रय लेकर उसे ब्रह्मरंध्र में पहुँची हुई भावना करे; साधक हंस-मंत्र द्वारा जीव को ब्रह्म में मिलाकर —

श्लोक 3 (devibhagavatam.11.8.3)

पादादिजानुपर्यन्तं चतुष्कोणं सवज्रकम् । लं बीजाख्यं स्वर्णवर्णं स्मरेदवनिमण्डलम्

pādādijānuparyantaṁ catuṣkoṇaṁ savajrakam laṁ bījākhyaṁ svarṇavarṇaṁ smaredavanimaṇḍalam

पैरों से घुटनों तक चतुष्कोण, वज्र-चिह्न से युक्त, स्वर्णवर्ण, 'लं' बीजाक्षर वाले पृथ्वी-मंडल का ध्यान करे।

श्लोक 4 (devibhagavatam.11.8.4)

जान्वाद्यानाभिचन्द्रार्धनिभं पद्मद्वयाङ्कितम् । वं बीजयुक्तं श्वेताभमम्भसो मण्डलं स्मरेत्

jānvādyānābhicandrārdhanibhaṁ padmadvayāṅkitam vaṁ bījayuktaṁ śvetābhamambhaso maṇḍalaṁ smaret

घुटनों से नाभि तक अर्धचंद्राकार, दो कमलों से अंकित, 'वं' बीजाक्षर वाले, श्वेतवर्ण जल-मंडल का ध्यान करे।

श्लोक 5 (devibhagavatam.11.8.5)

नाभेर्हृदयपर्यन्तं त्रिकोणं स्वस्तिकान्वितम् । रं बीजेन युतं रक्तं स्मरेत्पावकमण्डलम्

nābherhṛdayaparyantaṁ trikoṇaṁ svastikānvitam raṁ bījena yutaṁ raktaṁ smaretpāvakamaṇḍalam

नाभि से हृदय तक त्रिकोण, स्वस्तिक-चिह्न से युक्त, 'रं' बीजाक्षर वाले रक्तवर्ण अग्नि-मंडल का ध्यान करे।

श्लोक 6 (devibhagavatam.11.8.6)

हृदो भूमध्यपर्यन्तं वृत्तं षड्बिन्दुलाञ्छितम् । यं बीजयुक्तं धूम्राभं नभस्वन्मण्डलं स्मरेत्

hṛdo bhūmadhyaparyantaṁ vṛttaṁ ṣaḍbindulāñchitam yaṁ bījayuktaṁ dhūmrābhaṁ nabhasvanmaṇḍalaṁ smaret

हृदय से भ्रूमध्य तक वृत्ताकार, छह बिंदुओं से अंकित, 'यं' बीजाक्षर वाले धूम्रवर्ण वायु-मंडल का ध्यान करे।

श्लोक 7 (devibhagavatam.11.8.7)

आब्रह्मरन्ध्रं भ्रूमध्याद्वृत्तं स्वच्छं मनोहरम् । हं बीजयुक्तमाकाशमण्डलं च विचिन्तयेत्

ābrahmarandhraṁ bhrūmadhyādvṛttaṁ svacchaṁ manoharam haṁ bījayuktamākāśamaṇḍalaṁ ca vicintayet

भ्रूमध्य से ब्रह्मरंध्र तक वृत्ताकार, स्वच्छ, मनोहर, 'हं' बीजाक्षर वाले आकाश-मंडल का चिंतन करे।

श्लोक 8 (devibhagavatam.11.8.8)

एवं भूतानि सञ्चिन्त्य प्रत्येकं संविलापयेत् । भुवं जले जलं वह्नौ वह्निं वायौ नभस्यमुम्

evaṁ bhūtāni sañcintya pratyekaṁ saṁvilāpayet bhuvaṁ jale jalaṁ vahnau vahniṁ vāyau nabhasyamum

इस प्रकार तत्त्वों का चिंतन कर प्रत्येक को क्रमशः विलीन करे — पृथ्वी को जल में, जल को अग्नि में, अग्नि को वायु में, और उस वायु को आकाश में;

श्लोक 9 (devibhagavatam.11.8.9)

विलाप्य खमहङ्कारे महत्तत्त्वेऽप्यहङ्कृतिम् । महान्तं प्रकृतौ मायामात्मनि प्रविलापयेत्

vilāpya khamahaṅkāre mahattattve'pyahaṅkṛtim mahāntaṁ prakṛtau māyāmātmani pravilāpayet

आकाश को अहंकार में, और अहंकार को महत्तत्त्व में विलीन करके, महत्तत्त्व को प्रकृति में, और माया को आत्मा में विलीन करे।

श्लोक 10 (devibhagavatam.11.8.10)

शुद्धसंविन्मयो भूत्वा चिन्तयेत्पापपूरुषम् । वामकुक्षिस्थितं कृष्णमङ्गुष्ठपरिमाणकम्

śuddhasaṁvinmayo bhūtvā cintayetpāpapūruṣam vāmakukṣisthitaṁ kṛṣṇamaṅguṣṭhaparimāṇakam

शुद्ध चैतन्यमय होकर, बाईं ओर उदर में स्थित, अंगूठे के बराबर काले वर्ण के 'पापपुरुष' का चिंतन करे,

श्लोक 11 (devibhagavatam.11.8.11)

ब्रह्महत्याशिरोयुक्तं कनकस्तेयबाहुकम् । मदिरापानहृदयं गुरुतल्पकटीयुतम्

brahmahatyāśiroyuktaṁ kanakasteyabāhukam madirāpānahṛdayaṁ gurutalpakaṭīyutam

जिसका सिर ब्रह्महत्या है, भुजाएँ सुवर्ण-चोरी हैं, हृदय मदिरापान है, और कटिभाग गुरुपत्नी-गमन है,

श्लोक 12 (devibhagavatam.11.8.12)

तत्संसर्गिपदद्वन्द्वमुपपातकमस्तकम् । खड्गचर्मधरं कृष्णमधोवक्त्रं सुदुःसहम्

tatsaṁsargipadadvandvamupapātakamastakam khaḍgacarmadharaṁ kṛṣṇamadhovaktraṁ suduḥsaham

जिसके दोनों पैर [ऐसे पापियों के] संसर्ग हैं, और उपपातक जिसका मस्तक है — काले वर्ण का, खड्ग और ढाल धारण किए, मुख नीचे किए हुए, अत्यंत असह्य।

श्लोक 13 (devibhagavatam.11.8.13)

वायुबीजं स्मरन्वायुं सम्पूर्यैनं विशोषयेत् । स्वशरीरयुतं मन्त्रो वह्निबीजेन निर्दहेत्

vāyubījaṁ smaranvāyuṁ sampūryainaṁ viśoṣayet svaśarīrayutaṁ mantro vahnibījena nirdahet

वायु-बीजाक्षर का स्मरण करते हुए वायु से उसे भरकर सुखा दे; फिर अपने शरीर के मंत्र-सहित अग्नि-बीजाक्षर से उसे पूर्णतः जला डाले।

श्लोक 14 (devibhagavatam.11.8.14)

कुम्भके परिजप्तेन ततः पापनरोद्भवम् । बहिर्भस्म समुत्सार्य वायुबीजेन रेचयेत्

kumbhake parijaptena tataḥ pāpanarodbhavam bahirbhasma samutsārya vāyubījena recayet

कुंभक में उसका जप करके, उस पाप-पुरुष से उत्पन्न भस्म को बाहर निकालकर, वायु-बीजाक्षर से उसे रेचक में बाहर फेंक दे।

श्लोक 15 (devibhagavatam.11.8.15)

सुधाबीजेन देहोत्थं भस्म सम्प्लावयेत्सुधीः । भूबीजेन घनीकृत्य भस्म तत्कनकाण्डवत्

sudhābījena dehotthaṁ bhasma samplāvayetsudhīḥ bhūbījena ghanīkṛtya bhasma tatkanakāṇḍavat

अमृत-बीजाक्षर से बुद्धिमान साधक शरीर से उत्पन्न उस भस्म को आप्लावित करे; पृथ्वी-बीजाक्षर से उस भस्म को स्वर्ण-अंड के समान ठोस बना दे,

श्लोक 16 (devibhagavatam.11.8.16)

विशुद्धमुकुराकारं जपन्बीजं विहायसः । मूर्धादिपादपर्यन्तान्यङ्गानि रचयेत्सुधीः

viśuddhamukurākāraṁ japanbījaṁ vihāyasaḥ mūrdhādipādaparyantānyaṅgāni racayetsudhīḥ

जो शुद्ध दर्पण के समान आकार का हो। आकाश-बीजाक्षर का जप करते हुए बुद्धिमान साधक सिर से पैर तक शरीर के अंगों की पुनः रचना करे,

श्लोक 17 (devibhagavatam.11.8.17)

आकाशादीनि भूतानि पुनरुत्पादयेच्चितः । सोऽहं मन्त्रेण चात्मानमानयेद्धृदयाम्बुजे

ākāśādīni bhūtāni punarutpādayeccitaḥ so'haṁ mantreṇa cātmānamānayeddhṛdayāmbuje

मन से आकाश आदि तत्त्वों को पुनः उत्पन्न करते हुए; और 'सोऽहम्' मंत्र से आत्मा को हृदय-कमल में स्थापित करे।

श्लोक 18 (devibhagavatam.11.8.18)

कुण्डलीजीवमादाय परसङ्गात्सुधामयम् । संस्थाप्य हृदयाम्भोजे मूलाधारगतां स्मरेत्

kuṇḍalījīvamādāya parasaṅgātsudhāmayam saṁsthāpya hṛdayāmbhoje mūlādhāragatāṁ smaret

परमात्मा के साथ संयोग से अमृतमय हुए कुंडलिनी-जीव को लेकर, हृदय-कमल में स्थापित कर, फिर उसे मूलाधार में लौटी हुई भावना करे।

श्लोक 19 (devibhagavatam.11.8.19)

रक्ताम्भोधिस्थपोतोल्लसदरुण- सरोजाधिरूढा कराब्जैः शूलं कोदण्डमिक्षूद्भवमणिगुण- मप्यङ्कुशं पञ्चबाणान् । बिभ्राणासृक्कपालं त्रिनयन- लसिता पीनवक्षोरुहाढ्या देवी बालार्कवर्णा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः

raktāmbhodhisthapotollasadaruṇa- sarojādhirūḍhā karābjaiḥ śūlaṁ kodaṇḍamikṣūdbhavamaṇiguṇa- mapyaṅkuśaṁ pañcabāṇān bibhrāṇāsṛkkapālaṁ trinayana- lasitā pīnavakṣoruhāḍhyā devī bālārkavarṇā bhavatu sukhakarī prāṇaśaktiḥ parā naḥ

रक्त-सागर में स्थित नौका पर सुशोभित लाल कमल पर आरूढ़, अपने कमल-सदृश हाथों में त्रिशूल, धनुष, इक्षु-डोरी, अंकुश और पाँच पुष्प-बाण धारण किए, रक्त से भरा कपाल लिए, तीन नेत्रों से देदीप्यमान, पुष्ट वक्षस्थल वाली — वह उदीयमान सूर्य के समान वर्ण वाली परम प्राणशक्ति देवी हमें सुख प्रदान करें।

श्लोक 20 (devibhagavatam.11.8.20)

एवं ध्यात्वा प्राणशक्तिं परमात्मस्वरूपिणीम् । विभूतिधारणं कार्यं सर्वाधिकृतिसिद्धये

evaṁ dhyātvā prāṇaśaktiṁ paramātmasvarūpiṇīm vibhūtidhāraṇaṁ kāryaṁ sarvādhikṛtisiddhaye

इस प्रकार परमात्म-स्वरूपिणी प्राणशक्ति का ध्यान करके, सभी कार्यों की सिद्धि के लिए विभूति (भस्म) धारण करनी चाहिए।

श्लोक 21 (devibhagavatam.11.8.21)

विभूतेर्विस्तरं वक्ष्ये धारणे च महाफलम् । श्रुतिस्मृतिप्रमाणोक्तं भस्मधारणमुत्तमम्

vibhūtervistaraṁ vakṣye dhāraṇe ca mahāphalam śrutismṛtipramāṇoktaṁ bhasmadhāraṇamuttamam

अब मैं विभूति का विस्तार और उसके धारण का महाफल कहूँगा — श्रुति और स्मृति द्वारा प्रमाणित यह उत्तम भस्म-धारण।

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