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द्वादश स्कन्ध · अध्याय 12

मणिद्वीपवर्णनम्

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (devibhagavatam.12.12.1)

व्यास उवाच । तदेव देवीसदनं मध्यभागे विराजते । सहस्रस्तम्भसंयुक्ताश्चत्वारस्तेषु मण्डपाः

vyāsa uvāca tadeva devīsadanaṁ madhyabhāge virājate sahasrastambhasaṁyuktāścatvārasteṣu maṇḍapāḥ

व्यास जी ने कहा — देवी का वही सदन बीचोंबीच सुशोभित है; उसमें एक हजार स्तम्भों से युक्त चार मण्डप हैं,

श्लोक 2 (devibhagavatam.12.12.2)

शृङ्गारमण्डपश्चैको मुक्तिमण्डप एव च । ज्ञानमण्डपसंज्ञस्तु तृतीयः परिकीर्तितः

śṛṅgāramaṇḍapaścaiko muktimaṇḍapa eva ca jñānamaṇḍapasaṁjñastu tṛtīyaḥ parikīrtitaḥ

एक शृंगार-मण्डप, तथा मुक्ति-मण्डप; ज्ञान-मण्डप नाम वाला तीसरा कहा गया है,

श्लोक 3 (devibhagavatam.12.12.3)

एकान्तमण्डपश्चैव चतुर्थः परिकीर्तितः । नानावितानसंयुक्ता नानाधूपैस्तु धूपिताः

ekāntamaṇḍapaścaiva caturthaḥ parikīrtitaḥ nānāvitānasaṁyuktā nānādhūpaistu dhūpitāḥ

और एकान्त-मण्डप नाम वाला चौथा कहा गया है; नाना चंदोवों से युक्त, नाना धूपों से सुगन्धित,

श्लोक 4 (devibhagavatam.12.12.4)

कोटिसूर्यसमाः कान्त्या भ्राजन्ते मण्डपाः शुभाः । तन्मण्डपानां परितः काश्मीरवनिका स्मृता

koṭisūryasamāḥ kāntyā bhrājante maṇḍapāḥ śubhāḥ tanmaṇḍapānāṁ paritaḥ kāśmīravanikā smṛtā

वे शुभ मण्डप करोड़ों सूर्यों के समान कान्ति से सुशोभित होते हैं; उन मण्डपों के चारों ओर केसर का वन स्मरण किया गया है,

श्लोक 5 (devibhagavatam.12.12.5)

मल्लिकाकुन्दवनिका यत्र पुष्कलकाः स्थिताः । असङ्ख्याता मृगमदैः पूरितास्तत्स्रवा नृप

mallikākundavanikā yatra puṣkalakāḥ sthitāḥ asaṅkhyātā mṛgamadaiḥ pūritāstatsravā nṛpa

तथा मल्लिका और कुन्द का वन, जहाँ प्रचुर संख्या में असंख्य कस्तूरी-मृग स्थित हैं; हे राजन्! उनकी कस्तूरी से वह स्थान सिंचित रहता है,

श्लोक 6 (devibhagavatam.12.12.6)

महापद्माटवी तद्वद्रत्नसोपाननिर्मिता । सुधारसेन सम्पूर्णा गुञ्जन्मत्तमधुव्रता

mahāpadmāṭavī tadvadratnasopānanirmitā sudhārasena sampūrṇā guñjanmattamadhuvratā

उसी प्रकार महापद्म-वन है, जो रत्नमय सीढ़ियों से बना है, अमृत-रस से परिपूर्ण, गुंजार करते मतवाले भ्रमरों से युक्त,

श्लोक 7 (devibhagavatam.12.12.7)

हंसकारण्डवाकीर्णा गन्धपूरितदिक्तटा । वनिकानां सुगन्धैस्तु मणिद्वीपं सुवासितम्

haṁsakāraṇḍavākīrṇā gandhapūritadiktaṭā vanikānāṁ sugandhaistu maṇidvīpaṁ suvāsitam

हंस और कारण्डव पक्षियों से भरा, दिशाओं के छोरों तक सुगन्ध से पूर्ण; इन वनों की सुगन्ध से मणिद्वीप अत्यन्त सुवासित है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.12.12.8)

शृङ्गारमण्डपे देव्यो गायन्ति विविधैः स्वरैः । सभासदो देववरा मध्ये श्रीजगदम्बिका

śṛṅgāramaṇḍape devyo gāyanti vividhaiḥ svaraiḥ sabhāsado devavarā madhye śrījagadambikā

शृंगार-मण्डप में देवियाँ नाना स्वरों में गाती हैं; श्रेष्ठ देवगण सभासद हैं, और मध्य में श्री जगदम्बिका विराजमान हैं।

श्लोक 9 (devibhagavatam.12.12.9)

मुक्तिमण्डपमध्ये तु मोचयत्यनिशं शिवा । ज्ञानोपदेशं कुरुते तृतीये नृप मण्डपे

muktimaṇḍapamadhye tu mocayatyaniśaṁ śivā jñānopadeśaṁ kurute tṛtīye nṛpa maṇḍape

मुक्ति-मण्डप के मध्य में कल्याणी देवी निरन्तर मुक्ति प्रदान करती हैं; हे राजन्! तीसरे मण्डप में वे ज्ञान का उपदेश देती हैं,

श्लोक 10 (devibhagavatam.12.12.10)

चतुर्थमण्डपे चैव जगद्रक्षाविचिन्तनम् । मन्त्रिणीसहिता नित्यं करोति जगदम्बिका

caturthamaṇḍape caiva jagadrakṣāvicintanam mantriṇīsahitā nityaṁ karoti jagadambikā

और चौथे मण्डप में जगदम्बिका अपनी मन्त्रिणी सहित नित्य जगत् की रक्षा का चिन्तन करती हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.12.12.11)

चिन्तामणिगृहे राजञ्छक्तितत्त्वात्मकैः परैः । सोपानैर्दशभिर्युक्तो मञ्चकोऽप्यधिराजते

cintāmaṇigṛhe rājañchaktitattvātmakaiḥ paraiḥ sopānairdaśabhiryukto mañcako'pyadhirājate

हे राजन्! चिन्तामणि-भवन में शक्ति-तत्त्वों से युक्त दस सीढ़ियों वाला एक महान् पलंग भी सुशोभित है,

श्लोक 12 (devibhagavatam.12.12.12)

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः । एते मञ्चखुराः प्रोक्ताः फलकस्तु सदाशिवः

brahmā viṣṇuśca rudraśca īśvaraśca sadāśivaḥ ete mañcakhurāḥ proktāḥ phalakastu sadāśivaḥ

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव — ये उस पलंग के पाए कहे गए हैं, और उसका फलक (सतह) सदाशिव ही हैं।

श्लोक 13 (devibhagavatam.12.12.13)

तस्योपरि महादेवो भुवनेशो विराजते । या देवी निजलीलार्थं द्विधाभूता बभूव ह

tasyopari mahādevo bhuvaneśo virājate yā devī nijalīlārthaṁ dvidhābhūtā babhūva ha

उसके ऊपर महादेव भुवनेश विराजमान हैं — जो देवी की अपनी लीला के लिए ही दो रूपों में हो गए।

श्लोक 14 (devibhagavatam.12.12.14)

सृष्ट्यादौ तु स एवायं तदर्धाङ्गो महेश्वरः । कन्दर्पदर्पनाशोद्यत्कोटिकन्दर्पसुन्दरः

sṛṣṭyādau tu sa evāyaṁ tadardhāṅgo maheśvaraḥ kandarpadarpanāśodyatkoṭikandarpasundaraḥ

सृष्टि के आरम्भ में वही यह महेश्वर उनका अर्धांग बना; कामदेव के गर्व का नाश करने को उद्यत, करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर,

श्लोक 15 (devibhagavatam.12.12.15)

पञ्चवक्त्रस्त्रिनेत्रश्च मणिभूषणभूषितः । हरिणाभीतिपरशून् वरं च निजबाहुभिः

pañcavaktrastrinetraśca maṇibhūṣaṇabhūṣitaḥ hariṇābhītiparaśūn varaṁ ca nijabāhubhiḥ

पंचमुख, त्रिनेत्र, मणि-आभूषणों से विभूषित, अपनी भुजाओं में हिरण, अभयमुद्रा, फरसा और वरमुद्रा धारण किए हुए,

श्लोक 16 (devibhagavatam.12.12.16)

दधानः षोडशाब्दोऽसौ देवः सर्वेश्वरो महान् । कोटिसूर्यप्रतीकाशश्चन्द्रकोटिसुशीतलः

dadhānaḥ ṣoḍaśābdo'sau devaḥ sarveśvaro mahān koṭisūryapratīkāśaścandrakoṭisuśītalaḥ

सदा सोलह वर्ष की आयु वाले, महान् सर्वेश्वर देव, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, करोड़ों चन्द्रमाओं के समान अत्यन्त शीतल,

श्लोक 17 (devibhagavatam.12.12.17)

शुद्धस्फटिकसङ्काशस्त्रिनेत्रः शीतलद्युतिः । वामाङ्गे सन्निषण्णास्य देवी श्रीभुवनेश्वरी

śuddhasphaṭikasaṅkāśastrinetraḥ śītaladyutiḥ vāmāṅge sanniṣaṇṇāsya devī śrībhuvaneśvarī

शुद्ध स्फटिक के समान, त्रिनेत्र, शीतल कान्ति वाले — उनके बाएँ अंग में विराजमान हैं देवी श्री भुवनेश्वरी,

श्लोक 18 (devibhagavatam.12.12.18)

नवरत्नगणाकीर्णकाञ्चीदामविराजिता । तप्तकाञ्चनसन्नद्धवैदूर्याङ्गदभूषणा

navaratnagaṇākīrṇakāñcīdāmavirājitā taptakāñcanasannaddhavaidūryāṅgadabhūṣaṇā

नौ रत्नों के समूहों से भरी करधनी से सुशोभित, तपे हुए स्वर्ण में जड़े वैदूर्य के बाजूबन्दों से विभूषित,

श्लोक 19 (devibhagavatam.12.12.19)

कनच्छ्रीचक्रताटङ्कविटङ्कवदनाम्बुजा । ललाटकान्तिविभवविजितार्थसुधाकरा

kanacchrīcakratāṭaṅkaviṭaṅkavadanāmbujā lalāṭakāntivibhavavijitārthasudhākarā

चमकते श्रीचक्र के कर्णाभूषणों से सुशोभित कमल-मुख वाली, जिनके ललाट की कान्ति के वैभव ने चन्द्रमा के अमृत-भण्डार को भी जीत लिया है,

श्लोक 20 (devibhagavatam.12.12.20)

बिम्बकान्तितिरस्कारिरदच्छदविराजिता । लसत्कुङ्कुमकस्तुरीतिलकोद्भासितानना

bimbakāntitiraskāriradacchadavirājitā lasatkuṅkumakasturītilakodbhāsitānanā

जिनके होंठों की कान्ति बिम्ब-फल की आभा को भी तिरस्कृत कर देती है, केसर और कस्तूरी के तिलक से जिनका मुख जगमगाता है,

श्लोक 21 (devibhagavatam.12.12.21)

दिव्यचूडामणिस्फारचञ्चच्चन्द्रकसूर्यका । उद्यत्कविसमस्वच्छनासाभरणभासुरा

divyacūḍāmaṇisphāracañcaccandrakasūryakā udyatkavisamasvacchanāsābharaṇabhāsurā

दिव्य चूड़ामणि में चमकते चन्द्र-सूर्य के चिह्न वाली, उगते शुक्र ग्रह के समान स्वच्छ नासिका-आभूषण से चमकती हुई,

श्लोक 22 (devibhagavatam.12.12.22)

चिन्ताकलम्बितस्वच्छमुक्तागुच्छविराजिता । पाटीरपङ्ककर्पूरकुङ्कुमालङ्कृतस्तनी

cintākalambitasvacchamuktāgucchavirājitā pāṭīrapaṅkakarpūrakuṅkumālaṅkṛtastanī

चिन्तापूर्वक झूलते स्वच्छ मोतियों के गुच्छों से सुशोभित, चन्दन, कपूर और केसर से अलंकृत स्तनों वाली,

श्लोक 23 (devibhagavatam.12.12.23)

विचित्रविविधाकल्पा कम्बुसङ्काशकन्धरा । दाडिमीफलबीजाभदन्तपङ्क्तिविराजिता

vicitravividhākalpā kambusaṅkāśakandharā dāḍimīphalabījābhadantapaṅktivirājitā

विचित्र नाना अलंकारों वाली, शंख के समान गर्दन वाली, अनार के बीजों के समान दंत-पंक्ति से सुशोभित,

श्लोक 24 (devibhagavatam.12.12.24)

अनर्घ्यरत्नघटितमुकुटाञ्चितमस्तका । मत्तालिमालाविलसदलकाढ्यमुखाम्बुजा

anarghyaratnaghaṭitamukuṭāñcitamastakā mattālimālāvilasadalakāḍhyamukhāmbujā

अमूल्य रत्नों से जड़े मुकुट से अंकित मस्तक वाली, मतवाले भ्रमरों की माला से सुशोभित अलकों से समृद्ध कमल-मुख वाली,

श्लोक 25 (devibhagavatam.12.12.25)

कलङ्ककार्श्यनिर्मुक्तशरच्चन्द्रनिभानना । जाह्नवीसलिलावर्तशोभिनाभिविभूषिता

kalaṅkakārśyanirmuktaśaraccandranibhānanā jāhnavīsalilāvartaśobhinābhivibhūṣitā

कलंक और क्षीणता से मुक्त शरद्-चन्द्रमा के समान मुख वाली, गंगा-जल के भँवर के समान सुशोभित नाभि से विभूषित,

श्लोक 26 (devibhagavatam.12.12.26)

माणिक्यशकलाबद्धमुद्रिकाङ्गुलिभूषिता । पुण्डरीकदलाकारनयनत्रयसुन्दरी

māṇikyaśakalābaddhamudrikāṅgulibhūṣitā puṇḍarīkadalākāranayanatrayasundarī

माणिक्य के टुकड़ों से बनी अँगूठियों से सुशोभित अंगुलियों वाली, श्वेत कमल-दलों के समान तीन नेत्रों से सुन्दर,

श्लोक 27 (devibhagavatam.12.12.27)

कल्पिताच्छमहारागपद्मरागोज्ज्वलप्रभा । रत्नकिङ्किणिकायुक्तरत्नकङ्कणशोभिता

kalpitācchamahārāgapadmarāgojjvalaprabhā ratnakiṅkiṇikāyuktaratnakaṅkaṇaśobhitā

स्वच्छ महारत्न-माला के पद्मराग की उज्ज्वल आभा से युक्त, रत्न-घंटियों सहित रत्न-कंगनों से सुशोभित,

श्लोक 28 (devibhagavatam.12.12.28)

मणिमुक्तासरापारलसत्पदकसन्ततिः । रत्नाङ्गुलिप्रविततप्रभाजाललसत्करा

maṇimuktāsarāpāralasatpadakasantatiḥ ratnāṅgulipravitataprabhājālalasatkarā

मणि-मोतियों की अनन्त लड़ियों से चमकते पदकों की श्रृंखला वाली, रत्न-जड़ित अंगुलियों से फैलती प्रभा के जाल से चमकते हाथों वाली,

श्लोक 29 (devibhagavatam.12.12.29)

कञ्चुकीगुम्फितापारनानारत्नततिद्युतिः । मल्लिकामोदिधम्मिल्लमल्लिकालिसरावृता

kañcukīgumphitāpāranānāratnatatidyutiḥ mallikāmodidhammillamallikālisarāvṛtā

कंचुकी में गुँथी अनन्त नाना रत्नों की पंक्तियों की द्युति वाली, मल्लिका की सुगन्ध से युक्त जूड़े में मल्लिका-भ्रमरों की पंक्तियों से घिरी हुई,

श्लोक 30 (devibhagavatam.12.12.30)

सुवृत्तनिबिडोत्तुङ्गकुचभारालसा शिवा । वरपाशाङ्कुशाभीतिलसद्बाहुचतुष्टया

suvṛttanibiḍottuṅgakucabhārālasā śivā varapāśāṅkuśābhītilasadbāhucatuṣṭayā

गोल, सघन, ऊँचे स्तनों के भार से मंथर गति वाली कल्याणी, वरमुद्रा, पाश, अंकुश और अभयमुद्रा से चमकती चार भुजाओं वाली,

श्लोक 31 (devibhagavatam.12.12.31)

सर्वशृङ्गारवेषाढ्या सुकुमाराङ्गवल्लरी । सौन्दर्यधारासर्वस्वा निर्व्याजकरुणामयी

sarvaśṛṅgāraveṣāḍhyā sukumārāṅgavallarī saundaryadhārāsarvasvā nirvyājakaruṇāmayī

समस्त शृंगार-वेश से समृद्ध, कोमल अंगों वाली लता के समान, सौन्दर्य की धारा का सर्वस्व, निष्कपट करुणा से युक्त,

श्लोक 32 (devibhagavatam.12.12.32)

निजसंलापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपी । कोटिकोटिरवीन्दूनां कान्तिं या बिभ्रती परा

nijasaṁlāpamādhuryavinirbhartsitakacchapī koṭikoṭiravīndūnāṁ kāntiṁ yā bibhratī parā

जिनकी वाणी की मधुरता वीणा को भी तिरस्कृत कर देती है, जो करोड़ों-करोड़ों सूर्यों-चन्द्रमाओं की कान्ति को भी धारण करती हैं —

श्लोक 33 (devibhagavatam.12.12.33)

नानासखीभिर्दासीभिस्तथा देवाङ्गनादिभिः । सर्वाभिर्देवताभिस्तु समन्तात्परिवेष्टिता

nānāsakhībhirdāsībhistathā devāṅganādibhiḥ sarvābhirdevatābhistu samantātpariveṣṭitā

नाना सखियों, दासियों तथा देवांगनाओं आदि से, और सभी देवताओं से चारों ओर घिरी हुई,

श्लोक 34 (devibhagavatam.12.12.34)

इच्छाशक्त्या ज्ञानशक्त्या क्रियाशक्त्या समन्विता । लज्जा तुष्टिस्तथा पुष्टिः कीर्तिः कान्तिः क्षमा दया

icchāśaktyā jñānaśaktyā kriyāśaktyā samanvitā lajjā tuṣṭistathā puṣṭiḥ kīrtiḥ kāntiḥ kṣamā dayā

इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति से युक्त; लज्जा, तुष्टि, पुष्टि, कीर्ति, कान्ति, क्षमा, दया,

श्लोक 35 (devibhagavatam.12.12.35)

बुद्धिर्मेधा स्मृतिर्लक्ष्मीर्मूर्तिमत्योऽङ्गनाः स्मृताः । जया च विजया चैवाप्यजिता चापराजिता

buddhirmedhā smṛtirlakṣmīrmūrtimatyo'ṅganāḥ smṛtāḥ jayā ca vijayā caivāpyajitā cāparājitā

बुद्धि, मेधा, स्मृति और लक्ष्मी — ये मूर्तिमती स्त्रियाँ स्मरण की गई हैं; तथा जया, विजया, अजिता और अपराजिता,

श्लोक 36 (devibhagavatam.12.12.36)

नित्या विलासिनी दोग्ध्री त्वघोरा मङ्गला नव । पीठशक्तय एतास्तु सेवन्ते यां पराम्बिकाम्

nityā vilāsinī dogdhrī tvaghorā maṅgalā nava pīṭhaśaktaya etāstu sevante yāṁ parāmbikām

नित्या, विलासिनी, दोग्ध्री, अघोरा और मंगला — ये नौ पीठ-शक्तियाँ हैं, जो उस परम माता की सेवा करती हैं।

श्लोक 37 (devibhagavatam.12.12.37)

यस्यास्तु पार्श्वभागे स्तो निधी तौ शङ्खपद्मकौ । नवरत्नवहा नद्यस्तथा वै काञ्चनस्रवाः

yasyāstu pārśvabhāge sto nidhī tau śaṅkhapadmakau navaratnavahā nadyastathā vai kāñcanasravāḥ

जिनके दोनों पार्श्वों में शंख और पद्म नाम के दो निधि हैं; वहाँ नौ रत्नों को बहाने वाली नदियाँ हैं, तथा स्वर्ण को बहाने वाली धाराएँ भी,

श्लोक 38 (devibhagavatam.12.12.38)

सप्तधातुवहा नद्यो निधिभ्यां तु विनिर्गताः । सुधासिन्ध्वन्तगामिन्यस्ताः सर्वा नृपसत्तम

saptadhātuvahā nadyo nidhibhyāṁ tu vinirgatāḥ sudhāsindhvantagāminyastāḥ sarvā nṛpasattama

हे श्रेष्ठ राजन्! उन दोनों निधियों से निकली सात धातुओं को बहाने वाली नदियाँ, ये सब अमृत-सागर तक जाने वाली हैं।

श्लोक 39 (devibhagavatam.12.12.39)

सा देवी भुवनेशानी तद्वामाङ्के विराजते । सर्वेशत्वं महेशस्य यत्सङ्गादेव नान्यथा

sā devī bhuvaneśānī tadvāmāṅke virājate sarveśatvaṁ maheśasya yatsaṅgādeva nānyathā

वे देवी भुवनेशानी उनके बाएँ अंक में विराजमान हैं; और उन्हीं के संग से ही महेश का सर्वेश्वरत्व है, अन्यथा नहीं।

श्लोक 40 (devibhagavatam.12.12.40)

चिन्तामणिगृहस्यास्य प्रमाणं शृणु भूमिप । सहस्रयोजनायामं महान्तस्तत्प्रचक्षते

cintāmaṇigṛhasyāsya pramāṇaṁ śṛṇu bhūmipa sahasrayojanāyāmaṁ mahāntastatpracakṣate

हे भूमिप! अब इस चिन्तामणि-भवन का प्रमाण सुनो — यह एक हजार योजन लम्बा और अत्यन्त विशाल बताया जाता है।

श्लोक 41 (devibhagavatam.12.12.41)

तदुत्तरे महाशालाः पूर्वस्माद्द्विगुणाः स्मृताः । अन्तरिक्षगतं त्वेतन्निराधारं विराजते

taduttare mahāśālāḥ pūrvasmāddviguṇāḥ smṛtāḥ antarikṣagataṁ tvetannirādhāraṁ virājate

उससे आगे के महाप्राकार पिछले से दुगुने स्मरण किए गए हैं; यह सम्पूर्ण रचना आकाश में बिना किसी आधार के सुशोभित है।

श्लोक 42 (devibhagavatam.12.12.42)

सङ्कोचश्च विकासश्च जायतेऽस्य निरन्तरम् । पटवत्कार्यवशतः प्रलये सर्जने तथा

saṅkocaśca vikāsaśca jāyate'sya nirantaram paṭavatkāryavaśataḥ pralaye sarjane tathā

प्रलय और सृष्टि के समय, कार्य के अनुसार, इसका संकोच और विकास वस्त्र के समान निरन्तर होता रहता है।

श्लोक 43 (devibhagavatam.12.12.43)

शालानां चैव सर्वेषां सर्वकान्तिपरावधि । चिन्तामणिगृहं प्रोक्तं यत्र देवी महोमयी

śālānāṁ caiva sarveṣāṁ sarvakāntiparāvadhi cintāmaṇigṛhaṁ proktaṁ yatra devī mahomayī

सभी प्राकारों में चिन्तामणि-भवन को सम्पूर्ण कान्ति की चरम सीमा कहा गया है, जहाँ परम आनन्दमयी देवी विराजमान हैं।

श्लोक 44 (devibhagavatam.12.12.44)

ये ये उपासकाः सन्ति प्रतिब्रह्माण्डवर्तिनः । देवेषु नागलोकेषु मनुष्येष्वितरेषु च

ye ye upāsakāḥ santi pratibrahmāṇḍavartinaḥ deveṣu nāgalokeṣu manuṣyeṣvitareṣu ca

प्रत्येक ब्रह्माण्ड में स्थित जो-जो उपासक हैं — देवों में, नागलोकों में, मनुष्यों में तथा अन्य में —

श्लोक 45 (devibhagavatam.12.12.45)

श्रीदेव्यास्ते च सर्वेऽपि व्रजन्त्यत्रैव भूमिप । देवीक्षेत्रे ये त्यजन्ति प्राणान्देव्यर्चने रताः

śrīdevyāste ca sarve'pi vrajantyatraiva bhūmipa devīkṣetre ye tyajanti prāṇāndevyarcane ratāḥ

वे सभी श्री देवी के भक्त, हे भूमिप! यहीं आते हैं। जो देवी के क्षेत्र में देवी की अर्चना में रत होकर प्राण त्यागते हैं,

श्लोक 46 (devibhagavatam.12.12.46)

ते सर्वे यान्ति तत्रैव यत्र देवी महोत्सवा । घृतकुल्या दुग्धकुल्या दधिकुल्या मधुस्रवाः

te sarve yānti tatraiva yatra devī mahotsavā ghṛtakulyā dugdhakulyā dadhikulyā madhusravāḥ

वे सब वहीं जाते हैं जहाँ देवी का महोत्सव होता है — जहाँ घी की नहरें, दूध की नहरें, दही की नहरें, मधु की धाराएँ,

श्लोक 47 (devibhagavatam.12.12.47)

स्यन्दन्ति सरितः सर्वास्तथामृतवहाः पराः । द्राक्षारसवहाः काश्चिज्जम्बूरसवहाः पराः

syandanti saritaḥ sarvāstathāmṛtavahāḥ parāḥ drākṣārasavahāḥ kāścijjambūrasavahāḥ parāḥ

तथा अमृत बहाने वाली श्रेष्ठ नदियाँ भी बहती हैं; कुछ अंगूर के रस को बहाने वाली, कुछ जामुन के रस को बहाने वाली,

श्लोक 48 (devibhagavatam.12.12.48)

आम्रेक्षुरसवाहिन्यो नद्यस्तास्तु सहस्रशः । मनोरथफला वृक्षा वाप्यः कूपास्तथैव च

āmrekṣurasavāhinyo nadyastāstu sahasraśaḥ manorathaphalā vṛkṣā vāpyaḥ kūpāstathaiva ca

आम और गन्ने का रस बहाने वाली — ऐसी हजारों नदियाँ हैं; मनोवांछित फल देने वाले वृक्ष, वापियाँ और कुएँ भी,

श्लोक 49 (devibhagavatam.12.12.49)

यथेष्टपानफलदा न न्यूनं किञ्चिदस्ति हि । न रोगपलितं वापि जरा वापि कदाचन

yatheṣṭapānaphaladā na nyūnaṁ kiñcidasti hi na rogapalitaṁ vāpi jarā vāpi kadācana

मनचाहा पान और फल देने वाले — वहाँ कुछ भी कम नहीं है। न कोई रोग है, न बालों का सफेद होना, न कभी बुढ़ापा,

श्लोक 50 (devibhagavatam.12.12.50)

न चिन्ता न च मात्सर्यं कामक्रोधादिकं तथा । सर्वे युवानः सस्त्रीका सहस्रादित्यवर्चसः

na cintā na ca mātsaryaṁ kāmakrodhādikaṁ tathā sarve yuvānaḥ sastrīkā sahasrādityavarcasaḥ

न चिन्ता है, न ईर्ष्या, और न ही काम-क्रोध आदि; वहाँ सब लोग सदा युवा, पत्नियों सहित, हजार सूर्यों के समान तेजस्वी होकर,

श्लोक 51 (devibhagavatam.12.12.51)

भजन्ति सततं देवीं तत्र श्रीभुवनेश्वरीम् । केचित्सलोकतापन्नाः केचित्सामीप्यतां गताः

bhajanti satataṁ devīṁ tatra śrībhuvaneśvarīm kecitsalokatāpannāḥ kecitsāmīpyatāṁ gatāḥ

वहाँ श्री भुवनेश्वरी देवी की निरन्तर उपासना करते हैं। कुछ सालोक्य को प्राप्त हैं, कुछ सामीप्य को प्राप्त हुए हैं,

श्लोक 52 (devibhagavatam.12.12.52)

सरूपतां गताः केचित्सार्ष्टितां च परे गताः । या यास्तु देवतास्तत्र प्रतिब्रह्माण्डवर्तिनाम्

sarūpatāṁ gatāḥ kecitsārṣṭitāṁ ca pare gatāḥ yā yāstu devatāstatra pratibrahmāṇḍavartinām

कुछ सरूपता को प्राप्त हुए हैं, और अन्य कुछ सार्ष्टिता को प्राप्त हुए हैं। जो-जो देवता प्रत्येक ब्रह्माण्ड में स्थित हैं,

श्लोक 53 (devibhagavatam.12.12.53)

समष्टयः स्थितास्तास्तु सेवन्ते जगदीश्वरीम् । सप्तकोटिमहामन्त्रा मूर्तिमन्त उपासते

samaṣṭayaḥ sthitāstāstu sevante jagadīśvarīm saptakoṭimahāmantrā mūrtimanta upāsate

उनके समष्टि-स्वरूप वहीं स्थित होकर जगदीश्वरी की सेवा करते हैं; सात करोड़ महामन्त्र मूर्तिमान् होकर उनकी उपासना करते हैं,

श्लोक 54 (devibhagavatam.12.12.54)

महाविद्याश्च सकलाः साम्यावस्थात्मिकां शिवाम् । कारणब्रह्मरूपां तां मायाशबलविग्रहाम्

mahāvidyāśca sakalāḥ sāmyāvasthātmikāṁ śivām kāraṇabrahmarūpāṁ tāṁ māyāśabalavigrahām

तथा सभी महाविद्याएँ भी उस साम्यावस्था-स्वरूपा, कल्याणी, कारण-ब्रह्म-रूपा, माया से युक्त शबल-ब्रह्म-स्वरूपा देवी की उपासना करती हैं।

श्लोक 55 (devibhagavatam.12.12.55)

इत्थं राजन् मया प्रोक्तं मणिद्वीपं महत्तरम् । न सूर्यचन्द्रौ नो विद्युत्कोटयोऽग्निस्तथैव च

itthaṁ rājan mayā proktaṁ maṇidvīpaṁ mahattaram na sūryacandrau no vidyutkoṭayo'gnistathaiva ca

हे राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह महत्तर मणिद्वीप वर्णित किया है। न सूर्य-चन्द्रमा, न करोड़ों बिजलियाँ, न उसी प्रकार अग्नि —

श्लोक 56 (devibhagavatam.12.12.56)

एतस्य भासा कोट्यंशकोट्यंशेनापि ते समाः । क्यचिद्विद्रुमसकाशं क्वचिन्मरकतच्छवि

etasya bhāsā koṭyaṁśakoṭyaṁśenāpi te samāḥ kyacidvidrumasakāśaṁ kvacinmarakatacchavi

इसकी आभा के करोड़वें अंश के भी करोड़वें अंश के बराबर नहीं हैं। कहीं यह मूँगे के समान, कहीं पन्ने की आभा वाला,

श्लोक 57 (devibhagavatam.12.12.57)

विद्युद्भानुसमच्छायं मध्यसूर्यसमं क्वचित् । विद्युत्कोटिमहाधारा सारकान्तिततं क्वचित्

vidyudbhānusamacchāyaṁ madhyasūryasamaṁ kvacit vidyutkoṭimahādhārā sārakāntitataṁ kvacit

कहीं बिजली और सूर्य के समान छाया वाला, कहीं मध्याह्न के सूर्य के समान; कहीं करोड़ों बिजलियों के महाआधार से सारभूत कान्ति से व्याप्त,

श्लोक 58 (devibhagavatam.12.12.58)

क्वचित्सिन्दूरनीलेन्द्रमाणिक्यसदृशच्छवि । हीरसारमहागर्भधगद्धगितदिक्तटम्

kvacitsindūranīlendramāṇikyasadṛśacchavi hīrasāramahāgarbhadhagaddhagitadiktaṭam

कहीं सिंदूर, नीलम या माणिक्य के समान आभा वाला, हीरों के महान् सार से दिशाओं के छोर तक चमक-चमक कर,

श्लोक 59 (devibhagavatam.12.12.59)

कान्त्या दावानलसमं तप्तकाञ्चनसन्निभम् । क्वचिच्चन्द्रोपलोद्गारं सूर्योद्गारं च कुत्रचित्

kāntyā dāvānalasamaṁ taptakāñcanasannibham kvaciccandropalodgāraṁ sūryodgāraṁ ca kutracit

कान्ति में दावानल के समान, तपे हुए सोने जैसा; कहीं चन्द्रकान्त मणियों का, और कहीं सूर्यकान्त मणियों का उद्गार,

श्लोक 60 (devibhagavatam.12.12.60)

रत्नशृङ्गिसमायुक्तं रत्नप्राकारगोपुरम् । रत्नपत्रै रत्नफलैर्वक्षैश्च परिमण्डितम्

ratnaśṛṅgisamāyuktaṁ ratnaprākāragopuram ratnapatrai ratnaphalairvakṣaiśca parimaṇḍitam

रत्नों के शिखरों से युक्त, रत्नों के प्राकार और गोपुर वाला, रत्न-पत्तों, रत्न-फलों और वृक्षों से सुशोभित,

श्लोक 61 (devibhagavatam.12.12.61)

नृत्यन्मयूरसङ्घैश्च कपोतरणितोज्ज्वलम् । कोकिलाकाकलीलापैः शुकलापैश्च शोभितम्

nṛtyanmayūrasaṅghaiśca kapotaraṇitojjvalam kokilākākalīlāpaiḥ śukalāpaiśca śobhitam

नाचते मयूर-समूहों तथा कबूतरों की गूँज से उज्ज्वल, कोयलों की मधुर बोली और तोतों की बकबक से सुशोभित,

श्लोक 62 (devibhagavatam.12.12.62)

सुरम्यरमणीयाम्बुलक्षावधिसरोवृतम् । तन्मध्यभागविलसद्विकचद्रत्नपङ्कजैः

suramyaramaṇīyāmbulakṣāvadhisarovṛtam tanmadhyabhāgavilasadvikacadratnapaṅkajaiḥ

अत्यन्त रमणीय जल वाले लाखों सरोवरों से घिरा, जिनके मध्य में रत्नमय पूर्ण खिले हुए कमल शोभा पाते हैं,

श्लोक 63 (devibhagavatam.12.12.63)

सुगन्धिभिः समन्तात्तु वासितं शतयोजनम् । मन्दमारुतसम्भिन्नचलद्द्रुमसमाकुलम्

sugandhibhiḥ samantāttu vāsitaṁ śatayojanam mandamārutasambhinnacaladdrumasamākulam

चारों ओर सुगन्ध से सौ योजन तक सुवासित, मन्द वायु से हिलते वृक्षों से व्याप्त,

श्लोक 64 (devibhagavatam.12.12.64)

चिन्तामणिसमूहानां ज्योतिषा वितताम्बरम् । रत्नप्रभाभिरभितो धगद्धगितदिक्तटम्

cintāmaṇisamūhānāṁ jyotiṣā vitatāmbaram ratnaprabhābhirabhito dhagaddhagitadiktaṭam

चिन्तामणियों के समूहों की ज्योति से फैला हुआ आकाश, रत्नों की प्रभाओं से चारों ओर दिशाओं के छोर तक चमकता हुआ,

श्लोक 65 (devibhagavatam.12.12.65)

वृक्षवातमहागन्धवातवातसुपूरितम् । धूपधूपायितं राजन् मणिदीपायुतोज्ज्वलम्

vṛkṣavātamahāgandhavātavātasupūritam dhūpadhūpāyitaṁ rājan maṇidīpāyutojjvalam

हे राजन्! वृक्षों की महासुगन्धित वायु से पूरित, धूप से सुगन्धित, दस हजार मणि-दीपकों से उज्ज्वल,

श्लोक 66 (devibhagavatam.12.12.66)

मणिजालकसच्छिद्रतरलोदरकान्तिभिः । दिङ्मोहजनकं चैतद्दर्पणोदरसंयुतम्

maṇijālakasacchidrataralodarakāntibhiḥ diṅmohajanakaṁ caitaddarpaṇodarasaṁyutam

मणि-जालों के सूक्ष्म छिद्रों से झिलमिलाती आभा से युक्त, दर्पणों के भीतर से भी झलकता हुआ, यह दिशाओं को भी मोहित कर देता है।

श्लोक 67 (devibhagavatam.12.12.67)

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य शृङ्गारस्याखिलस्य च । सर्वज्ञतायाः सर्वायास्तेजसश्चाखिलस्य वै

aiśvaryasya samagrasya śṛṅgārasyākhilasya ca sarvajñatāyāḥ sarvāyāstejasaścākhilasya vai

सम्पूर्ण ऐश्वर्य का, सम्पूर्ण शृंगार का, समस्त सर्वज्ञता का, तथा सम्पूर्ण तेज का,

श्लोक 68 (devibhagavatam.12.12.68)

पराक्रमस्य सर्वस्य सर्वोत्तमगुणस्य च । सकलाया दयायाश्च समाप्तिरिह भूपते

parākramasya sarvasya sarvottamaguṇasya ca sakalāyā dayāyāśca samāptiriha bhūpate

समस्त पराक्रम का, सर्वोत्तम गुणों का, तथा सम्पूर्ण दया का — हे भूपते! इसी स्थान में समाप्ति (पूर्णता) है।

श्लोक 69 (devibhagavatam.12.12.69)

राज्ञ आनन्दमारभ्य ब्रह्मलोकान्तभूमिषु । आनन्दा ये स्थिताः सर्वे तेऽत्रैवान्तर्भवन्ति हि

rājña ānandamārabhya brahmalokāntabhūmiṣu ānandā ye sthitāḥ sarve te'traivāntarbhavanti hi

राजा के आनन्द से लेकर ब्रह्मलोक तक के लोकों में जो-जो आनन्द स्थित हैं, वे सब यहीं समाहित हो जाते हैं।

श्लोक 70 (devibhagavatam.12.12.70)

इति ते वर्णितं राजन् मणिद्वीपं महत्तरम् । महादेव्याः परं स्थानं सर्वलोकोत्तमोत्तमम्

iti te varṇitaṁ rājan maṇidvīpaṁ mahattaram mahādevyāḥ paraṁ sthānaṁ sarvalokottamottamam

हे राजन्! इस प्रकार तुम्हें यह महत्तर मणिद्वीप वर्णित किया गया — महादेवी का परम स्थान, सभी लोकों में सर्वोत्तम।

श्लोक 71 (devibhagavatam.12.12.71)

एतस्य स्मरणात्सद्यः सर्वं पापं विनश्यति । प्राणोत्क्रमणसन्धौ तु स्मृत्वा तत्रैव गच्छति

etasya smaraṇātsadyaḥ sarvaṁ pāpaṁ vinaśyati prāṇotkramaṇasandhau tu smṛtvā tatraiva gacchati

इसके स्मरण मात्र से तत्काल सारे पाप नष्ट हो जाते हैं; और जो प्राण-निकलने के समय इसका स्मरण करता है, वह वहीं चला जाता है।

श्लोक 72 (devibhagavatam.12.12.72)

अध्यायपञ्चकं त्वेतत्पठेन्नित्यं समाहितः । भूतप्रेतपिशाचादिबाधा तत्र भवेन्न हि

adhyāyapañcakaṁ tvetatpaṭhennityaṁ samāhitaḥ bhūtapretapiśācādibādhā tatra bhavenna hi

जो एकाग्रचित्त होकर नित्य इन पाँच अध्यायों को पढ़ता है, उसे भूत-प्रेत-पिशाच आदि की बाधा कभी नहीं होती।

श्लोक 73 (devibhagavatam.12.12.73)

नवीनगृहनिर्माणे वास्तुयागे तथैव च । पठितव्यं प्रयत्नेन कल्याणं तेन जायते

navīnagṛhanirmāṇe vāstuyāge tathaiva ca paṭhitavyaṁ prayatnena kalyāṇaṁ tena jāyate

नए घर के निर्माण में तथा वास्तु-यज्ञ में भी इसे प्रयत्नपूर्वक पढ़ना चाहिए; इससे कल्याण की प्राप्ति होती है।

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