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द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 12

श्रोता और वक्ता का प्रसंग

अध्याय 11अध्याय-सूची

श्लोक 1 (devibhagavatam.2.12.1)

सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य व्यासः सत्यवतीसुतः । उवाच वचनं तत्र सभायां नृपतिं च तम्

sūta uvāca tacchrutvā vacanaṁ tasya vyāsaḥ satyavatīsutaḥ uvāca vacanaṁ tatra sabhāyāṁ nṛpatiṁ ca tam

सूत जी ने कहा — उसका यह वचन सुनकर सत्यवती-पुत्र व्यास जी ने उस सभा में, उस राजा से यह वचन कहा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.2.12.2)

व्यास उवाच । शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि पुराणं गुह्यमद्भुतम् । पुण्यं भागवतं नाम नानाख्यानयुतं शिवम्

vyāsa uvāca śṛṇu rājan pravakṣyāmi purāṇaṁ guhyamadbhutam puṇyaṁ bhāgavataṁ nāma nānākhyānayutaṁ śivam

व्यास जी ने कहा — 'हे राजन्! सुनो, मैं तुम्हें एक गुह्य और अद्भुत पुराण सुनाता हूँ — 'भागवत' नामक वह पुण्यदायक, अनेक आख्यानों से युक्त, कल्याणकारी पुराण।

श्लोक 3 (devibhagavatam.2.12.3)

अध्यापितं मया पूर्वं शुकायात्मसुताय वै । श्रावयामि नृप त्वां हि रहस्यं परमं मम

adhyāpitaṁ mayā pūrvaṁ śukāyātmasutāya vai śrāvayāmi nṛpa tvāṁ hi rahasyaṁ paramaṁ mama

इसे मैंने पूर्वकाल में अपने पुत्र शुक को पढ़ाया था; हे राजन्! अब मैं तुम्हें भी अपना यह परम रहस्य सुनाता हूँ।

श्लोक 4 (devibhagavatam.2.12.4)

धर्मार्थकाममोक्षाणां कारणं श्रवणात्किल । शुभद सुखदं नित्यं सर्वागमसमुद्धृतम्

dharmārthakāmamokṣāṇāṁ kāraṇaṁ śravaṇātkila śubhada sukhadaṁ nityaṁ sarvāgamasamuddhṛtam

इसे सुनने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन सबकी सिद्धि होती है; यह शुभदायक, नित्य सुखदायक, और समस्त शास्त्रों का सार है।'

श्लोक 5 (devibhagavatam.2.12.5)

जनमेजय उवाच । आस्तीकोऽयं सुतः कस्य विघ्नार्थं कथमागतः । प्रयोजनं किमत्रास्य सर्पाणां रक्षणे प्रभो

janamejaya uvāca āstīko'yaṁ sutaḥ kasya vighnārthaṁ kathamāgataḥ prayojanaṁ kimatrāsya sarpāṇāṁ rakṣaṇe prabho

जनमेजय ने कहा — 'यह आस्तीक किसका पुत्र है, और वह विघ्न डालने के लिए कैसे आया? हे प्रभो! सर्पों की रक्षा में इसका क्या प्रयोजन था?

श्लोक 6 (devibhagavatam.2.12.6)

कथयैतन्महाभाग विस्तरेण कथानकम् । पुराणं च तथा सर्वं विस्तराद्वद सुव्रत

kathayaitanmahābhāga vistareṇa kathānakam purāṇaṁ ca tathā sarvaṁ vistarādvada suvrata

हे महाभाग! यह सारी कथा मुझे विस्तार से सुनाइए, और साथ ही वह सारा पुराण भी, हे सुव्रत! विस्तारपूर्वक बताइए।'

श्लोक 7 (devibhagavatam.2.12.7)

व्यास उवाच । जरत्कारुर्मुनिः शान्तो न चकार गृहाश्रमम् । तेन दृष्टा वने गर्ते लम्बमाना स्वपूर्वजाः

vyāsa uvāca jaratkārurmuniḥ śānto na cakāra gṛhāśramam tena dṛṣṭā vane garte lambamānā svapūrvajāḥ

व्यास जी ने कहा — 'जरत्कारु नामक एक शांत मुनि थे, जिन्होंने गृहस्थाश्रम अपनाया ही नहीं था। एक बार उन्होंने वन में एक गड्ढे में अपने पूर्वजों को लटकते हुए देखा,

श्लोक 8 (devibhagavatam.2.12.8)

ततस्तमाहुः कुरु पुत्र दारा- । न्यथा च नः स्यात्परमा हि तृप्तिः । स्वर्गे व्रजामः खलु दुःखमुक्ता । वयं सदाचारयुते सुते वै

tatastamāhuḥ kuru putra dārā- nyathā ca naḥ syātparamā hi tṛptiḥ svarge vrajāmaḥ khalu duḥkhamuktā vayaṁ sadācārayute sute vai

तब उन्होंने उससे कहा — 'हे पुत्र! विवाह कर, अन्यथा हमें परम तृप्ति नहीं मिलेगी। हम दुःख से मुक्त होकर स्वर्ग जा सकेंगे,

श्लोक 9 (devibhagavatam.2.12.9)

स तानुवाचाथ लभे समाना- । मयाचितां चातिवशानुगां च । तदा गृहारम्भमहं करोमि । ब्रवीमि तथ्यं मम पूर्वजा वै

sa tānuvācātha labhe samānā- mayācitāṁ cātivaśānugāṁ ca tadā gṛhārambhamahaṁ karomi bravīmi tathyaṁ mama pūrvajā vai

केवल तभी जब तेरे सदाचारी पुत्र हों।' उसने उनसे कहा — 'यदि मुझे एक ऐसी पत्नी मिले जो अयाचित हो, समान नाम वाली हो, और सर्वथा मेरे वश में रहने वाली हो,

श्लोक 10 (devibhagavatam.2.12.10)

इत्युक्त्वा ताञ्जरत्कारुर्गतस्तीर्थान्प्रति द्विजः । तदैव पन्नगाः शप्ता मात्राग्नौ निपतन्त्विति

ityuktvā tāñjaratkārurgatastīrthānprati dvijaḥ tadaiva pannagāḥ śaptā mātrāgnau nipatantviti

तभी मैं गृहस्थाश्रम आरंभ करूँगा; मैं अपने पूर्वजों से सत्य ही कहता हूँ।' यह कहकर द्विज जरत्कारु तीर्थों की ओर चले गए, उसी समय सर्प उनकी माता द्वारा यह शाप दिए गए थे कि वे अग्नि में गिरें।

श्लोक 11 (devibhagavatam.2.12.11)

कश्यपस्य मुनेः पत्न्यौ कद्रूश्च विनता तथा । दृष्ट्वादित्यरथे चाश्वमूचतुश्च परस्परम्

kaśyapasya muneḥ patnyau kadrūśca vinatā tathā dṛṣṭvādityarathe cāśvamūcatuśca parasparam

कश्यप मुनि की दो पत्नियाँ थीं — कद्रू और विनता; एक बार उन्होंने सूर्य के रथ में जुते एक अश्व को देखकर आपस में यह बात कही।

श्लोक 12 (devibhagavatam.2.12.12)

तं दृष्ट्वा च तदा कद्रूर्विनतामिदमब्रवीत् । किंवर्णोऽयं हयो भद्रे सत्यं प्रब्रूहि माचिरम्

taṁ dṛṣṭvā ca tadā kadrūrvinatāmidamabravīt kiṁvarṇo'yaṁ hayo bhadre satyaṁ prabrūhi māciram

उसे देखकर कद्रू ने विनता से यह कहा — 'हे भद्रे! यह घोड़ा किस रंग का है? सत्य-सत्य बताओ, बिना देर किए।'

श्लोक 13 (devibhagavatam.2.12.13)

विनतोवाच । श्वेत एवाश्वराजोऽयं किं वा त्वं मन्यसे शुभे । ब्रूहि वर्णं त्वमप्यस्य ततस्तु विपणावहे

vinatovāca śveta evāśvarājo'yaṁ kiṁ vā tvaṁ manyase śubhe brūhi varṇaṁ tvamapyasya tatastu vipaṇāvahe

विनता ने कहा — 'हे शुभे! यह अश्वराज तो श्वेत ही है, तुम क्या मानती हो? तुम भी इसका रंग बताओ, फिर हम शर्त लगाते हैं।'

श्लोक 14 (devibhagavatam.2.12.14)

कद्रुरुवाच । कृष्णवर्णमहं मन्ये हयमेनं शुचिस्मिते । एहि सार्धं मया दिव्यं दासीभावाय भामिनि

kadruruvāca kṛṣṇavarṇamahaṁ manye hayamenaṁ śucismite ehi sārdhaṁ mayā divyaṁ dāsībhāvāya bhāmini

कद्रू ने कहा — 'हे शुचिस्मिते! मैं तो इस घोड़े को काले रंग का ही मानती हूँ। हे भामिनि! चलो, मेरे साथ इस पर शर्त लगाओ, दासी बनने की शर्त पर।'

श्लोक 15 (devibhagavatam.2.12.15)

सूत उवाच । कद्रूश्च स्वसुतानाह सर्वान्सर्पान्वशे स्थितान् । बालाञ्छ्यामान्प्रकुर्वन्तु यावतोऽश्वशरीरके

sūta uvāca kadrūśca svasutānāha sarvānsarpānvaśe sthitān bālāñchyāmānprakurvantu yāvato'śvaśarīrake

सूत जी ने कहा — कद्रू ने अपने वश में स्थित सभी सर्प-पुत्रों से कहा कि वे काले होकर उस अश्व के शरीर पर लिपट जाएँ।

श्लोक 16 (devibhagavatam.2.12.16)

नेति केचन तत्राहुस्तानथासौ शशाप ह । जनमेजयस्य यज्ञे वै गमिष्यथ हुताशनम्

neti kecana tatrāhustānathāsau śaśāpa ha janamejayasya yajñe vai gamiṣyatha hutāśanam

कुछ सर्पों ने वहाँ मना किया; तब उसने उन्हें शाप दे दिया — 'तुम सब जनमेजय के यज्ञ में अग्नि में जाओगे।'

श्लोक 17 (devibhagavatam.2.12.17)

अन्ये चक्रुर्हयं सर्पाः कर्बुरं वर्णभोगकैः । वेष्टयित्वास्य पुच्छं तु मातुः प्रियचिकीर्षया

anye cakrurhayaṁ sarpāḥ karburaṁ varṇabhogakaiḥ veṣṭayitvāsya pucchaṁ tu mātuḥ priyacikīrṣayā

अन्य सर्पों ने अपनी माता को प्रसन्न करने की इच्छा से, उसकी पूँछ को लपेटकर, उस घोड़े को रंग-बिरंगा (धब्बेदार) बना दिया।

श्लोक 18 (devibhagavatam.2.12.18)

भगिन्यौ च सुसंयुक्ते गत्वा ददृशतुर्हयम् । कर्बुरं तं हयं दृष्ट्वा विनता चातिदुःखिता

bhaginyau ca susaṁyukte gatvā dadṛśaturhayam karburaṁ taṁ hayaṁ dṛṣṭvā vinatā cātiduḥkhitā

दोनों बहनें साथ मिलकर वहाँ गईं और उस घोड़े को देखा। उस धब्बेदार घोड़े को देखकर विनता अत्यंत दुःखी हुई।

श्लोक 19 (devibhagavatam.2.12.19)

तदाजगाम गरुडः सुतस्तस्या महाबलः । स दृष्ट्वा मातरं दीनामपृच्छत्पन्नगाशनः

tadājagāma garuḍaḥ sutastasyā mahābalaḥ sa dṛṣṭvā mātaraṁ dīnāmapṛcchatpannagāśanaḥ

तभी उसका महाबली पुत्र गरुड़ वहाँ आ पहुँचा। सर्पों को खाने वाले उस पुत्र ने अपनी उदास माता को देखकर पूछा।

श्लोक 20 (devibhagavatam.2.12.20)

मातः कथं सुदीनासि रुदितेव विभासि मे । जीवमाने मयि सुते तथान्ये रविसारथौ

mātaḥ kathaṁ sudīnāsi ruditeva vibhāsi me jīvamāne mayi sute tathānye ravisārathau

'हे माता! तू क्यों इतनी दुःखी है? मुझे तो तू रोती हुई-सी दिखाई दे रही है। जबकि मैं पुत्र जीवित हूँ, और सूर्य के सारथी (अरुण) रूपी दूसरा भी जीवित है,

श्लोक 21 (devibhagavatam.2.12.21)

दुःखितासि ततो वां धिग्जीवितं चारुलोचने । किं जातेन सुतेनाथ यदि माता सुदुःखिता

duḥkhitāsi tato vāṁ dhigjīvitaṁ cārulocane kiṁ jātena sutenātha yadi mātā suduḥkhitā

तो भी तुम दुःखी हो, हे सुंदर नेत्रों वाली! तो ऐसे जीवन को धिक्कार है। यदि माता ही अत्यंत दुःखी हो, तो जन्मा हुआ पुत्र किस काम का?

श्लोक 22 (devibhagavatam.2.12.22)

शंस मे कारणं मातः करोमि विगतज्वराम् । विनतोवाच । सपत्न्या दास्यहं पुत्र किं ब्रवीमि वृथा क्षता

śaṁsa me kāraṇaṁ mātaḥ karomi vigatajvarām vinatovāca sapatnyā dāsyahaṁ putra kiṁ bravīmi vṛthā kṣatā

हे माता! मुझे इसका कारण बताओ, मैं तुम्हें उस दुःख से मुक्त कर दूँगा।' विनता ने कहा — 'हे पुत्र! मैं अपनी सौत की दासी बन गई हूँ। मैं व्यर्थ ही घायल होकर तुझसे और क्या कहूँ?

श्लोक 23 (devibhagavatam.2.12.23)

वह मां सा ब्रवीत्यद्य तेनास्मि दुःखिता सुत । गरुड उवाच । वहिष्येऽहं तत्र किल यत्र सा गन्तुमुत्सुका

vaha māṁ sā bravītyadya tenāsmi duḥkhitā suta garuḍa uvāca vahiṣye'haṁ tatra kila yatra sā gantumutsukā

'तू आज मुझे ढोकर ले चल' — ऐसा वह मुझसे कहती है, इसीलिए मैं दुःखी हूँ, हे पुत्र!' गरुड़ ने कहा — 'मैं ही तुझे वहाँ ले जाऊँगा, जहाँ वह जाने के लिए उत्सुक हो।

श्लोक 24 (devibhagavatam.2.12.24)

मा शोकं कुरु कल्याणि निश्चिन्तां त्वां करोम्यहम् । व्यास उवाच । इत्युक्ता सा गता पार्श्वं कद्रोश्च विनता तदा

mā śokaṁ kuru kalyāṇi niścintāṁ tvāṁ karomyaham vyāsa uvāca ityuktā sā gatā pārśvaṁ kadrośca vinatā tadā

हे कल्याणी! शोक मत कर, मैं तुझे निश्चिन्त कर दूँगा।' व्यास जी ने कहा — ऐसा कहे जाने पर विनता उस समय कद्रू के पास चली गई,

श्लोक 25 (devibhagavatam.2.12.25)

दासीभावमपाकर्तुं गरुडोऽपि महाबलः । उवाह तां सपुत्रां वै सिन्धोः पारं जगाम ह

dāsībhāvamapākartuṁ garuḍo'pi mahābalaḥ uvāha tāṁ saputrāṁ vai sindhoḥ pāraṁ jagāma ha

और महाबली गरुड़ भी उस दासत्व को दूर करने के लिए, उसे और उसके पुत्र को लेकर समुद्र के पार चला गया।

श्लोक 26 (devibhagavatam.2.12.26)

गत्वा तां गरुडः प्राह ब्रूहि मातर्नमोऽस्तु ते । कथं मुच्येत मे माता दासीभावादसंशयम्

gatvā tāṁ garuḍaḥ prāha brūhi mātarnamo'stu te kathaṁ mucyeta me mātā dāsībhāvādasaṁśayam

वहाँ जाकर गरुड़ ने उससे कहा — 'हे माता! मुझे कहो, तुम्हें नमस्कार है। मेरी माता निःसंदेह दासत्व से किस प्रकार मुक्त हो सकती है?'

श्लोक 27 (devibhagavatam.2.12.27)

कद्रूरुवाच । अमृतं देवलोकात्त्वं बलादानीय मे सुतान् । समर्पय सुताद्याशु मातरं मोचयाबलाम्

kadrūruvāca amṛtaṁ devalokāttvaṁ balādānīya me sutān samarpaya sutādyāśu mātaraṁ mocayābalām

कद्रू ने कहा — 'देवलोक से बलपूर्वक अमृत लाकर मुझे दे दो, हे पुत्र! शीघ्र ही अपनी माता को इस दासत्व से मुक्त कर लो।'

श्लोक 28 (devibhagavatam.2.12.28)

व्यास उवाच । इत्युक्तः प्रययौ शीघ्रमिन्द्रलोकं महाबलः । कृत्वा युद्धं जहाराशु सुधाकुम्भं खगोत्तमः

vyāsa uvāca ityuktaḥ prayayau śīghramindralokaṁ mahābalaḥ kṛtvā yuddhaṁ jahārāśu sudhākumbhaṁ khagottamaḥ

व्यास जी ने कहा — ऐसा कहे जाने पर वह महाबली शीघ्रता से इन्द्रलोक की ओर चला गया; उस श्रेष्ठ पक्षी ने युद्ध करके शीघ्र ही अमृत का कलश हर लिया।

श्लोक 29 (devibhagavatam.2.12.29)

समानीयामृतं मात्रे वैनतेयः समर्पयत् । मोचिता विनता तेन दासीभावादसंशयम्

samānīyāmṛtaṁ mātre vainateyaḥ samarpayat mocitā vinatā tena dāsībhāvādasaṁśayam

अमृत लाकर वैनतेय (गरुड़) ने उसे अपनी माता को सौंप दिया; इस प्रकार विनता निःसंदेह उस दासत्व से मुक्त कर दी गई।

श्लोक 30 (devibhagavatam.2.12.30)

अमृतं सञ्जहारेन्द्रः स्नातुं सर्पा यदा गताः । दासीभावाद्विनिर्मुक्ता विनता विपतेर्बलात्

amṛtaṁ sañjahārendraḥ snātuṁ sarpā yadā gatāḥ dāsībhāvādvinirmuktā vinatā vipaterbalāt

जब सर्प स्नान करने गए, तब इन्द्र ने वह अमृत वापस हर लिया। इस प्रकार अपने पुत्र के पराक्रम से विनता उस दासत्व से मुक्त हो गई।

श्लोक 31 (devibhagavatam.2.12.31)

तत्रास्तीर्णाः कुशास्तैस्तु लीढाः पन्नगनामकैः । द्विजिह्वास्ते सुसम्पन्नाः कुशाग्रस्पर्शमात्रतः

tatrāstīrṇāḥ kuśāstaistu līḍhāḥ pannaganāmakaiḥ dvijihvāste susampannāḥ kuśāgrasparśamātrataḥ

वहाँ फैलाए गए कुशों को उन नागों ने चाटा; केवल कुशा की नोक के स्पर्श मात्र से ही उन सर्पों की जीभ दो भागों में विभक्त हो गई।

श्लोक 32 (devibhagavatam.2.12.32)

मात्रा शप्ताश्च ये नागा वासुकिप्रमुखाः शुचा । ब्रह्माणं शरणं गत्वा ते होचुः शापजं भयम्

mātrā śaptāśca ye nāgā vāsukipramukhāḥ śucā brahmāṇaṁ śaraṇaṁ gatvā te hocuḥ śāpajaṁ bhayam

वासुकि आदि जो नाग अपनी माता द्वारा शोकवश शाप दिए गए थे, वे ब्रह्मा जी की शरण में जाकर उन्हें अपने शाप-जनित भय के बारे में बताने लगे।

श्लोक 33 (devibhagavatam.2.12.33)

तानाह भगवान्ब्रह्मा जरत्कारुर्महामुनिः । वासुकेर्भगिनीं तस्मै अर्पयध्वं सनामिकाम्

tānāha bhagavānbrahmā jaratkārurmahāmuniḥ vāsukerbhaginīṁ tasmai arpayadhvaṁ sanāmikām

भगवान् ब्रह्मा ने उनसे कहा — 'जरत्कारु नामक एक महामुनि हैं, वासुकि की समान-नाम वाली अपनी बहन को उसे दे दो।

श्लोक 34 (devibhagavatam.2.12.34)

तस्यां यो जायते पुत्रः स वस्त्राता भविष्यति । आस्तीक इति नामासौ भविता नात्र संशयः

tasyāṁ yo jāyate putraḥ sa vastrātā bhaviṣyati āstīka iti nāmāsau bhavitā nātra saṁśayaḥ

उनसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तुम सबकी रक्षा करने वाला बनेगा; उसका नाम आस्तीक होगा, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 35 (devibhagavatam.2.12.35)

वासुकिस्तु तदाकर्ण्य वचनं ब्रह्मणः शिवम् । वनं गत्वा सुतां तस्मै ददौ विनयपूर्वकम्

vāsukistu tadākarṇya vacanaṁ brahmaṇaḥ śivam vanaṁ gatvā sutāṁ tasmai dadau vinayapūrvakam

यह सुनकर वासुकि ने ब्रह्मा का यह कल्याणकारी वचन ग्रहण करके, वन में जाकर अपनी बहन को अत्यंत विनयपूर्वक उसे (जरत्कारु को) दे दिया।

श्लोक 36 (devibhagavatam.2.12.36)

सनामां तां मुनिर्ज्ञात्वा जरत्कारुरुवाच तम् । अप्रियं मे यदा कुर्यात्तदा तां सन्त्यजाम्यहम्

sanāmāṁ tāṁ munirjñātvā jaratkāruruvāca tam apriyaṁ me yadā kuryāttadā tāṁ santyajāmyaham

उसे समान नाम वाली जानकर मुनि जरत्कारु ने उससे कहा — 'जिस दिन तू मेरा कोई अप्रिय कार्य करेगी, उसी दिन मैं तुझे त्याग दूँगा।'

श्लोक 37 (devibhagavatam.2.12.37)

वाग्बन्धं तादृशं कृत्वा मुनिर्जग्राह तां स्वयम् । दत्त्वा च वासुकिः कामं भवनं स्वं जगाम ह

vāgbandhaṁ tādṛśaṁ kṛtvā munirjagrāha tāṁ svayam dattvā ca vāsukiḥ kāmaṁ bhavanaṁ svaṁ jagāma ha

इस प्रकार वचन-प्रतिज्ञा करके मुनि ने स्वयं उसे ग्रहण कर लिया; और वासुकि इच्छानुसार उसे सौंपकर अपने घर लौट गया।

श्लोक 38 (devibhagavatam.2.12.38)

कृत्वा पर्णकुटीं शुभ्रां जरत्कारुर्महावने । तया सह सुखं प्राप रममाणः परन्तप

kṛtvā parṇakuṭīṁ śubhrāṁ jaratkārurmahāvane tayā saha sukhaṁ prāpa ramamāṇaḥ parantapa

उस महान वन में एक शुभ्र पर्ण-कुटी बनाकर, हे परन्तप! जरत्कारु उसके साथ रमण करते हुए सुखपूर्वक रहने लगे।

श्लोक 39 (devibhagavatam.2.12.39)

एकदा भोजनं कृत्वा सुप्तोऽसौ मुनिसत्तमः । भगिनी वासुकेस्तत्र संस्थिता वरवर्णिनी

ekadā bhojanaṁ kṛtvā supto'sau munisattamaḥ bhaginī vāsukestatra saṁsthitā varavarṇinī

एक बार भोजन करके वह श्रेष्ठ मुनि सो गया; उस समय वासुकि की सुंदरी बहन वहीं बैठी रही।

श्लोक 40 (devibhagavatam.2.12.40)

न सम्बोधयितव्योऽहं त्वया कान्ते कथञ्चन । इत्युक्त्वा तु गतो निद्रां मुनिस्तां सुदतीं तदा

na sambodhayitavyo'haṁ tvayā kānte kathañcana ityuktvā tu gato nidrāṁ munistāṁ sudatīṁ tadā

'हे प्रिये! तुझे मुझे कभी भी नहीं जगाना है' — ऐसा कहकर वह मुनि उस सुंदर दाँतों वाली स्त्री के सामने ही नींद में चला गया।

श्लोक 41 (devibhagavatam.2.12.41)

रविरस्तगिरिं प्राप्तः सन्ध्याकाल उपस्थिते । किं करोमि न मे शान्तिस्त्यजेन्मां बोधितः पुनः

ravirastagiriṁ prāptaḥ sandhyākāla upasthite kiṁ karomi na me śāntistyajenmāṁ bodhitaḥ punaḥ

सूर्य अस्ताचल की ओर पहुँच गया, संध्याकाल आ पहुँचा — 'अब मैं क्या करूँ? मुझे शांति नहीं मिल रही है — यदि मैं उसे जगाऊँ, तो वह मुझे त्याग देगा।

श्लोक 42 (devibhagavatam.2.12.42)

धर्मलोपभयाद्भीता जरत्कारुरचिन्तयत् । नोचेत्प्रबोथयाम्येनं सन्ध्याकालो वृथा व्रजेत्

dharmalopabhayādbhītā jaratkāruracintayat nocetprabothayāmyenaṁ sandhyākālo vṛthā vrajet

धर्म के लोप हो जाने के भय से भयभीत होकर जरत्कारु (उस मुनि की पत्नी भी उसी नाम की थी) यह सोचने लगी — 'यदि मैं इसे नहीं जगाऊँ, तो संध्या-काल व्यर्थ ही बीत जाएगा।

श्लोक 43 (devibhagavatam.2.12.43)

धर्मनाशाद्वरं त्यागस्तथापि मरणं ध्रुवम् । धर्महानिर्नराणां हि नरकाय भवेत्पुनः

dharmanāśādvaraṁ tyāgastathāpi maraṇaṁ dhruvam dharmahānirnarāṇāṁ hi narakāya bhavetpunaḥ

धर्म के नाश से तो (पति का) त्याग कर देना ही श्रेष्ठ है, यद्यपि यह मेरी मृत्यु के समान निश्चित है। पुरुषों के धर्म की हानि तो पुनः नरक का ही कारण बनती है।'

श्लोक 44 (devibhagavatam.2.12.44)

इति सञ्चिन्त्य सा बाला तं मुनिं प्रत्यबोधयत् । सन्ध्याकालोऽपि सञ्जात उत्तिष्ठोत्तिष्ठसुव्रत

iti sañcintya sā bālā taṁ muniṁ pratyabodhayat sandhyākālo'pi sañjāta uttiṣṭhottiṣṭhasuvrata

इस प्रकार विचार करके उस युवती ने उस मुनि को जगा दिया — 'संध्याकाल हो चुका है, उठिए, उठिए, हे सुव्रत!'

श्लोक 45 (devibhagavatam.2.12.45)

उत्थितोऽसौ मुनिः कोपात्तामुवाच व्रजाम्यहम् । त्वं तु भ्रातृगृहं याहि निद्राविच्छेदकारिणी

utthito'sau muniḥ kopāttāmuvāca vrajāmyaham tvaṁ tu bhrātṛgṛhaṁ yāhi nidrāvicchedakāriṇī

क्रोधित होकर उठे उस मुनि ने उससे कहा — 'मैं अब जाता हूँ। तू अपने भाई के घर लौट जा — तूने मेरी नींद भंग की है।'

श्लोक 46 (devibhagavatam.2.12.46)

वेपमानाब्रवीद्वाक्यमित्युक्ता मुनिना तदा । भ्रात्रा दत्ता यदर्थं तत्कथं स्यादमितप्रभ

vepamānābravīdvākyamityuktā muninā tadā bhrātrā dattā yadarthaṁ tatkathaṁ syādamitaprabha

काँपती हुई उस स्त्री ने मुनि के इस प्रकार कहे जाने पर यह वचन कहा — 'हे अपार तेजस्वी! जिस उद्देश्य से मेरे भाई ने मुझे दिया था, वह कैसे पूर्ण होगा?'

श्लोक 47 (devibhagavatam.2.12.47)

मुनिः प्राह जरत्कारुं तदस्तीति निराकुलः । गता सा मुनिना त्यक्ता वासुकेः सदनं तदा

muniḥ prāha jaratkāruṁ tadastīti nirākulaḥ gatā sā muninā tyaktā vāsukeḥ sadanaṁ tadā

मुनि ने जरत्कारु से कहा — 'वह अवश्य होगा' — यह कहकर वह निश्चिंत हो गया। फिर मुनि द्वारा त्याग दी गई वह वासुकि के घर चली गई।

श्लोक 48 (devibhagavatam.2.12.48)

पृष्टा भ्रात्राब्रवीद्वाक्यं यथोक्तं पतिना तदा । अस्तीत्युक्त्वा च हित्वा मां गतोऽसौ मुनिसत्तमः

pṛṣṭā bhrātrābravīdvākyaṁ yathoktaṁ patinā tadā astītyuktvā ca hitvā māṁ gato'sau munisattamaḥ

अपने भाई द्वारा पूछे जाने पर उसने अपने पति द्वारा कहे गए वे वचन ज्यों-के-त्यों बता दिए — 'यह अवश्य होगा' — यह कहकर वह श्रेष्ठ मुनि मुझे त्यागकर चला गया।'

श्लोक 49 (devibhagavatam.2.12.49)

वासुकिस्तु तदाकर्ण्य सत्यावाङ्मुनिरित्युत । विश्वासं च परं कृत्वा भगिनीं तां समाश्रयत्

vāsukistu tadākarṇya satyāvāṅmunirityuta viśvāsaṁ ca paraṁ kṛtvā bhaginīṁ tāṁ samāśrayat

यह सुनकर वासुकि ने विचार किया कि मुनि सत्यवादी हैं, और उन पर परम विश्वास करते हुए, उसने अपनी बहन को अपने ही घर में आश्रय दिया।

श्लोक 50 (devibhagavatam.2.12.50)

ततः कालेन कियता जातोऽसौ मुनिबालकः । आस्तीक इति नामासौ विख्यातः कुरुसत्तम

tataḥ kālena kiyatā jāto'sau munibālakaḥ āstīka iti nāmāsau vikhyātaḥ kurusattama

फिर कुछ समय पश्चात्, उस मुनि-बालक का जन्म हुआ; हे कुरुश्रेष्ठ! वह 'आस्तीक' नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 51 (devibhagavatam.2.12.51)

तेनायं रक्षितो यज्ञस्तव पार्थिवसत्तम । मातृपक्षस्य रक्षार्थं मुनिना भावितात्मना

tenāyaṁ rakṣito yajñastava pārthivasattama mātṛpakṣasya rakṣārthaṁ muninā bhāvitātmanā

हे पार्थिवश्रेष्ठ! उसी ने तुम्हारे इस यज्ञ की रक्षा की, अपनी माता के कुल की रक्षा के लिए उस उदार-आत्मा मुनि ने।

श्लोक 52 (devibhagavatam.2.12.52)

भव्यं कृतं महाराज मानितोऽयं त्वया मुनिः । यायावरकुलोत्पनो वासुकेर्भगिनीसुतः

bhavyaṁ kṛtaṁ mahārāja mānito'yaṁ tvayā muniḥ yāyāvarakulotpano vāsukerbhaginīsutaḥ

हे महाराज! तुमने भव्य कार्य किया, इस मुनि का सम्मान करके — जो यायावर-कुल में उत्पन्न, वासुकि की बहन का पुत्र है।

श्लोक 53 (devibhagavatam.2.12.53)

स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो भारतं सकलं श्रुतम् । दानानि बहु दत्तानि पूजिता मुनयस्तथा

svasti te'stu mahābāho bhārataṁ sakalaṁ śrutam dānāni bahu dattāni pūjitā munayastathā

हे महाबाहु! तुम्हारा कल्याण हो — तुमने संपूर्ण भारत सुना, अनेक दान दिए, और मुनियों की पूजा भी की।

श्लोक 54 (devibhagavatam.2.12.54)

कृतेन सुकृतेनापि न पिता स्वर्गतिं गतः । पावितं न कुलं कृत्स्नं त्वया भूपतिसत्तम

kṛtena sukṛtenāpi na pitā svargatiṁ gataḥ pāvitaṁ na kulaṁ kṛtsnaṁ tvayā bhūpatisattama

फिर भी, इस अच्छे किए गए पुण्य-कर्म से भी तुम्हारे पिता को स्वर्गगति नहीं मिली, और न ही, हे भूपतिश्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा तुम्हारे संपूर्ण कुल का पवित्रीकरण हुआ।

श्लोक 55 (devibhagavatam.2.12.55)

देव्याश्चायतनं भूप विस्तीर्णं कुरु भक्तितः । येन वै सकला सिद्धिस्तव स्याज्जनमेजय

devyāścāyatanaṁ bhūpa vistīrṇaṁ kuru bhaktitaḥ yena vai sakalā siddhistava syājjanamejaya

हे राजन्! भक्तिपूर्वक देवी का एक विस्तृत मंदिर बनवाओ, जिससे हे जनमेजय! तुम्हें संपूर्ण सिद्धि प्राप्त हो सके।

श्लोक 56 (devibhagavatam.2.12.56)

पूजिता परया भक्त्या शिवा सकलदा सदा । कुलवृद्धिं करोत्येव राज्यं च सुस्थिरं सदा

pūjitā parayā bhaktyā śivā sakaladā sadā kulavṛddhiṁ karotyeva rājyaṁ ca susthiraṁ sadā

परम भक्ति से पूजी गई वह कल्याणी, सर्व-कामना-दायिनी देवी सदा कुल की वृद्धि करती है, और राज्य को सदा सुस्थिर बनाए रखती है।

श्लोक 57 (devibhagavatam.2.12.57)

देवीमखं विधानेन कृत्वा पार्थिवसत्तम । श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं परमं शृणु

devīmakhaṁ vidhānena kṛtvā pārthivasattama śrīmadbhāgavataṁ nāma purāṇaṁ paramaṁ śṛṇu

हे पार्थिवश्रेष्ठ! विधिपूर्वक देवी-यज्ञ करके, अब उस परम पुराण को सुनो, जिसका नाम श्रीमद्भागवत है।

श्लोक 58 (devibhagavatam.2.12.58)

त्वामहं श्रावयिष्यामि कथां परमपावनीम् । संसारतारिणीं दिव्यां नानारससमाहृताम्

tvāmahaṁ śrāvayiṣyāmi kathāṁ paramapāvanīm saṁsāratāriṇīṁ divyāṁ nānārasasamāhṛtām

मैं तुम्हें वह परम पवित्र कथा सुनाऊँगा, जो संसार से तारने वाली है, दिव्य है, और अनेक रसों से समन्वित है।

श्लोक 59 (devibhagavatam.2.12.59)

न श्रोतव्यं परं चास्मात्पुराणाद्विद्यते भुवि । नाराध्यं विद्यते राजन्देवीपादाम्बुजादृते

na śrotavyaṁ paraṁ cāsmātpurāṇādvidyate bhuvi nārādhyaṁ vidyate rājandevīpādāmbujādṛte

इस पुराण से बढ़कर कोई अन्य वस्तु पृथ्वी पर सुनने योग्य नहीं है; हे राजन्! देवी के चरण-कमलों के अतिरिक्त कोई अन्य वस्तु आराधना के योग्य नहीं है।

श्लोक 60 (devibhagavatam.2.12.60)

ते सभाग्याः कृतप्रज्ञा धन्यास्ते नृपसत्तम । येषां चित्ते सदा देवी वसति प्रेमसंकुले

te sabhāgyāḥ kṛtaprajñā dhanyāste nṛpasattama yeṣāṁ citte sadā devī vasati premasaṁkule

हे नृपसत्तम! वे लोग सौभाग्यशाली, ज्ञान-संपन्न और धन्य हैं, जिनके चित्त में सदा प्रेम से भरी हुई वह देवी निवास करती है।

श्लोक 61 (devibhagavatam.2.12.61)

सुदुःखितास्ते दृश्यन्ते भुवि भारत भारते । नाराधिता महामाया यैर्जनैश्च सदाम्बिका

suduḥkhitāste dṛśyante bhuvi bhārata bhārate nārādhitā mahāmāyā yairjanaiśca sadāmbikā

हे भरत-भूषण! इस भरत-भूमि पर वे लोग अत्यंत दुःखी ही दिखाई देते हैं, जिन जनों ने महामाया अम्बिका की सदा आराधना नहीं की।

श्लोक 62 (devibhagavatam.2.12.62)

ब्रह्मादयः सुराः सर्वे यदाराधनतत्पराः । वर्तन्ते सर्वदा राजंस्तां न सेवेत को जनः

brahmādayaḥ surāḥ sarve yadārādhanatatparāḥ vartante sarvadā rājaṁstāṁ na seveta ko janaḥ

ब्रह्मा आदि सभी देवता जिस देवी की आराधना में सदा तत्पर रहते हैं, हे राजन्! उसकी सेवा कौन-सा जन न करे?

श्लोक 63 (devibhagavatam.2.12.63)

य इदं शृणुयान्नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात् । भगवत्या समाख्यातं विष्णवे यदनुत्तमम्

ya idaṁ śṛṇuyānnityaṁ sarvānkāmānavāpnuyāt bhagavatyā samākhyātaṁ viṣṇave yadanuttamam

जो कोई इस कथा को नित्य सुनता है, वह अपनी सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है; क्योंकि यह भगवती के द्वारा ही श्री विष्णु को सुनाई गई थी, जो सर्वोत्तम है।

श्लोक 64 (devibhagavatam.2.12.64)

तेन श्रुतेन ते राजंश्चित्ते शान्तिर्भविष्यति । पितॄणां चाक्षयः स्वर्गः पुराणश्रवणाद्भवेत्

tena śrutena te rājaṁścitte śāntirbhaviṣyati pitṝṇāṁ cākṣayaḥ svargaḥ purāṇaśravaṇādbhavet

हे राजन्! इसे सुनने से तुम्हारे चित्त में शांति प्राप्त होगी, और पुराण-श्रवण से पितरों को अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है।'

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