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द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 11

सर्पसत्र

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (devibhagavatam.2.11.1)

सूत उवाच । गतप्राणं तु राजानं बालं पुत्रं समीक्ष्य च । चक्रुश्च मन्त्रिणः सर्वे परलोकस्य सत्क्रियाः

sūta uvāca gataprāṇaṁ tu rājānaṁ bālaṁ putraṁ samīkṣya ca cakruśca mantriṇaḥ sarve paralokasya satkriyāḥ

सूत जी ने कहा — राजा को प्राणहीन देखकर, और उस बालक पुत्र को देखकर, सभी मंत्रियों ने परलोक-संबंधी विधिपूर्वक क्रियाएँ कीं।

श्लोक 2 (devibhagavatam.2.11.2)

गङ्गातीरे दग्धदेहं भस्मप्रायं महीपतिम् । अगुरुभिश्चाभियुक्तायां चितायामध्यरोपयन्

gaṅgātīre dagdhadehaṁ bhasmaprāyaṁ mahīpatim agurubhiścābhiyuktāyāṁ citāyāmadhyaropayan

गंगा के तट पर, अगुरु आदि सुगंधित द्रव्यों से युक्त चिता पर, उस लगभग भस्म हो चुके राजा के शरीर को उन्होंने रखा।

श्लोक 3 (devibhagavatam.2.11.3)

दुर्मरणे मृतस्यास्य चकुश्चैवौर्ध्वदैहिकीम् । क्रियां पुरोहितास्तस्य वेदमन्त्रैर्विधानतः

durmaraṇe mṛtasyāsya cakuścaivaurdhvadaihikīm kriyāṁ purohitāstasya vedamantrairvidhānataḥ

इस दुर्मरण से मरे हुए उस राजा की सारी उर्ध्वदैहिक क्रियाएँ उसके पुरोहितों ने वेद-मंत्रों द्वारा विधिपूर्वक संपन्न कीं।

श्लोक 4 (devibhagavatam.2.11.4)

ददुर्दानानि विप्रेभ्यो गाः सुवर्णं यथोचितम् । अन्नं बहुविधं तत्र वस्त्राणि विविधानि च

dadurdānāni viprebhyo gāḥ suvarṇaṁ yathocitam annaṁ bahuvidhaṁ tatra vastrāṇi vividhāni ca

उन्होंने ब्राह्मणों को दान दिया — गायें, सोना, यथोचित रूप से; और वहाँ अनेक प्रकार के अन्न तथा विविध वस्त्र भी दिए गए।

श्लोक 5 (devibhagavatam.2.11.5)

सुमुहूर्ते सुतं बालं प्रजानां प्रीतिवर्धनम् । सिंहासने शुभे तत्र मन्त्रिणः संन्यवेशयन्

sumuhūrte sutaṁ bālaṁ prajānāṁ prītivardhanam siṁhāsane śubhe tatra mantriṇaḥ saṁnyaveśayan

प्रजा के हृदय में प्रीति बढ़ाने वाले उस बालक पुत्र को मंत्रियों ने एक शुभ मुहूर्त में शुभ सिंहासन पर बिठाया।

श्लोक 6 (devibhagavatam.2.11.6)

पौरा जानपदा लोकाश्चक्रुस्तं नृपतिं शिशुम् । जनमेजयनामानं राजलक्षणसंयुतम्

paurā jānapadā lokāścakrustaṁ nṛpatiṁ śiśum janamejayanāmānaṁ rājalakṣaṇasaṁyutam

नगरवासियों और जनपद के लोगों ने राजलक्षणों से युक्त उस बालक राजा को 'जनमेजय' नाम दिया।

श्लोक 7 (devibhagavatam.2.11.7)

धात्रेयी शिक्षयामास राजचिह्नानि सर्वशः । दिने दिने वर्धमानः स बभूव महामतिः

dhātreyī śikṣayāmāsa rājacihnāni sarvaśaḥ dine dine vardhamānaḥ sa babhūva mahāmatiḥ

उसकी धाई (माता) ने उसे राजोचित सभी शिक्षाएँ और चिह्न सिखाए; दिन-प्रतिदिन बढ़ते हुए वह अत्यंत बुद्धिमान हो गया।

श्लोक 8 (devibhagavatam.2.11.8)

प्राप्ते चैकादशे वर्षे तस्मै कुलपुरोहितः । यथोचितां ददौ विद्यां जग्राह स यथोचिताम्

prāpte caikādaśe varṣe tasmai kulapurohitaḥ yathocitāṁ dadau vidyāṁ jagrāha sa yathocitām

ग्यारहवें वर्ष में पहुँचने पर, कुल-पुरोहित ने उसे यथोचित विद्या प्रदान की, और उसने उसे यथोचित रूप से ग्रहण किया।

श्लोक 9 (devibhagavatam.2.11.9)

धनुर्वेदं कृपः पूर्णं ददावस्मै सुसंस्कृतम् । अर्जुनाय यथा द्रोणः कर्णाय भार्गवो यथा

dhanurvedaṁ kṛpaḥ pūrṇaṁ dadāvasmai susaṁskṛtam arjunāya yathā droṇaḥ karṇāya bhārgavo yathā

कृप ने उसे संपूर्ण, सुसंस्कृत धनुर्वेद प्रदान किया, जैसे द्रोण ने अर्जुन को दिया था, और परशुराम ने कर्ण को दिया था।

श्लोक 10 (devibhagavatam.2.11.10)

सम्प्राप्तविद्यो बलवान्वभूव दुरतिक्रमः । धनुर्वेदे तथा वेदे पारगः परमार्थवित्

samprāptavidyo balavānvabhūva duratikramaḥ dhanurvede tathā vede pāragaḥ paramārthavit

विद्या को पूर्ण रूप से प्राप्त करके वह बलवान् और अजेय हो गया; इसी प्रकार धनुर्वेद और वेद दोनों में पारंगत और परमार्थ का ज्ञाता हो गया।

श्लोक 11 (devibhagavatam.2.11.11)

धर्मशास्त्रार्थकुशलः सत्यवादी जितेन्द्रियः । चकार राज्यं धर्मात्मा पुरा धर्मसुतो यथा

dharmaśāstrārthakuśalaḥ satyavādī jitendriyaḥ cakāra rājyaṁ dharmātmā purā dharmasuto yathā

वह धर्मशास्त्र के अर्थ में कुशल, सत्यवादी, जितेन्द्रिय था; उस धर्मात्मा ने राज्य का शासन उसी प्रकार किया जैसे पूर्वकाल में धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) ने किया था।

श्लोक 12 (devibhagavatam.2.11.12)

ततः सुवर्णवर्माख्यो राजा काशिपतिः किल । वपुष्टमां शुभा कन्यां ददौ पारीक्षिताय च

tataḥ suvarṇavarmākhyo rājā kāśipatiḥ kila vapuṣṭamāṁ śubhā kanyāṁ dadau pārīkṣitāya ca

फिर काशी के राजा सुवर्णवर्मा नामक ने अपनी शुभ, अत्यंत सुंदर पुत्री उस परीक्षित्-पुत्र (जनमेजय) को दे दी।

श्लोक 13 (devibhagavatam.2.11.13)

स तां प्राप्यासितापाङ्गीं मुमुदे जनमेजयः । काशिराजसुतां कान्तां प्राप्य राजा यथा पुरा

sa tāṁ prāpyāsitāpāṅgīṁ mumude janamejayaḥ kāśirājasutāṁ kāntāṁ prāpya rājā yathā purā

उस काले नेत्रों वाली को पाकर जनमेजय अत्यंत हर्षित हुआ, जैसे पूर्वकाल में विचित्रवीर्य काशिराज-पुत्री को पाकर,

श्लोक 14 (devibhagavatam.2.11.14)

विचित्रवीर्यो मुमुदे सुभद्रां च यथार्जुनः । विजहार महीपालो वनेषूपवनेषु च

vicitravīryo mumude subhadrāṁ ca yathārjunaḥ vijahāra mahīpālo vaneṣūpavaneṣu ca

और अर्जुन सुभद्रा को पाकर हर्षित हुए थे, उसी प्रकार। वह राजा उसके साथ वनों और उपवनों में विहार करने लगा,

श्लोक 15 (devibhagavatam.2.11.15)

तया कमलपत्राक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा । प्रजास्तस्य सुसन्तुष्टा बभूवुः सुखलालिताः

tayā kamalapatrākṣyā śacyā śatakraturyathā prajāstasya susantuṣṭā babhūvuḥ sukhalālitāḥ

जैसे इन्द्र कमल-दल के समान नेत्रों वाली शची के साथ विहार करते हैं। उसकी प्रजा उससे अत्यंत संतुष्ट होकर सुखपूर्वक पलती रही।

श्लोक 16 (devibhagavatam.2.11.16)

मन्त्रिणः कर्मकुशलाश्चक्रुः कार्याणि सर्वशः । एतस्मिन्नेव काले तु मुनिरुत्तङ्कनामकः

mantriṇaḥ karmakuśalāścakruḥ kāryāṇi sarvaśaḥ etasminneva kāle tu muniruttaṅkanāmakaḥ

कार्य-कुशल मंत्री सभी कार्यों को यथोचित रूप से करते रहे। इसी समय उत्तंक नामक एक मुनि,

श्लोक 17 (devibhagavatam.2.11.17)

तक्षकेण परिक्लिष्टो हस्तिनापुरमभ्यगात् । वैरस्यापचितिं कोऽस्य प्रकुर्यादिति चिन्तयन्

takṣakeṇa parikliṣṭo hastināpuramabhyagāt vairasyāpacitiṁ ko'sya prakuryāditi cintayan

तक्षक से पीड़ित होकर, यह विचार करते हुए कि इसके वैर का प्रतिकार कौन करे, हस्तिनापुर की ओर गया।

श्लोक 18 (devibhagavatam.2.11.18)

परीक्षितसुतं मत्वा तं नृपं समुपागतः । कार्याकार्यं न जानासि समये नृपसत्तम

parīkṣitasutaṁ matvā taṁ nṛpaṁ samupāgataḥ kāryākāryaṁ na jānāsi samaye nṛpasattama

वह परीक्षित् के पुत्र को (उपयुक्त प्रतिशोधक) मानकर उस राजा के पास पहुँचा और बोला — 'हे नृपसत्तम! तुम अपने समय पर करने-न-करने योग्य कार्य को नहीं जानते।

श्लोक 19 (devibhagavatam.2.11.19)

अकर्तव्यं करोष्यद्य कर्तव्यं न करोषि वै । किं त्वां सम्प्रार्थयाम्यद्य गतामर्षं निरुद्यमम्

akartavyaṁ karoṣyadya kartavyaṁ na karoṣi vai kiṁ tvāṁ samprārthayāmyadya gatāmarṣaṁ nirudyamam

जो करने योग्य नहीं, वह तुम आज कर रहे हो, और जो करने योग्य है, वह तुम नहीं कर रहे। मैं आज तुमसे और क्या याचना करूँ — तुम तो क्रोधरहित और उद्यमहीन हो,

श्लोक 20 (devibhagavatam.2.11.20)

अवैरज्ञमतन्त्रज्ञं बालचेष्टासमन्वितम् । जनमेजय उवाच । किं वैरं न मया ज्ञातं न किं प्रतिकृतं मया

avairajñamatantrajñaṁ bālaceṣṭāsamanvitam janamejaya uvāca kiṁ vairaṁ na mayā jñātaṁ na kiṁ pratikṛtaṁ mayā

वैर को न जानने वाले, राजनीति को न समझने वाले, और बालक की भाँति चेष्टा करने वाले हो।' जनमेजय ने कहा — 'क्या मुझे कोई वैर ज्ञात नहीं है? क्या मैंने कोई प्रतिशोध नहीं लिया है?

श्लोक 21 (devibhagavatam.2.11.21)

तद्वद त्वं महाभाग करोमि यदनन्तरम् । उत्तङ्क उवाच । पिता ते निहतो भूप तक्षकेण दुरात्मना

tadvada tvaṁ mahābhāga karomi yadanantaram uttaṅka uvāca pitā te nihato bhūpa takṣakeṇa durātmanā

हे महाभाग! वह मुझे बताइए, ताकि उसके पश्चात् मैं जो उचित हो वह करूँ।' उत्तंक ने कहा — 'हे राजन्! तुम्हारे पिता उस दुष्टात्मा तक्षक द्वारा मारे गए।

श्लोक 22 (devibhagavatam.2.11.22)

मन्त्रिणस्त्वं समाहूय पृच्छ स्वपितृनाशनम् । सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं राजा पप्रच्छ मन्त्रिसत्तमान्

mantriṇastvaṁ samāhūya pṛccha svapitṛnāśanam sūta uvāca tacchrutvā vacanaṁ rājā papraccha mantrisattamān

अपने मंत्रियों को बुलाकर अपने पिता के विनाश के विषय में पूछो।' सूत जी ने कहा — यह सुनकर राजा ने अपने श्रेष्ठ मंत्रियों से यह प्रश्न किया।

श्लोक 23 (devibhagavatam.2.11.23)

ऊचुस्ते द्विजशापेन दष्टः सर्पेण वै मृतः । जनमेजय उवाच । शापोऽत्र कारणं राज्ञः शप्तस्य मुनिना किल

ūcuste dvijaśāpena daṣṭaḥ sarpeṇa vai mṛtaḥ janamejaya uvāca śāpo'tra kāraṇaṁ rājñaḥ śaptasya muninā kila

उन्होंने कहा — 'एक ब्राह्मण के शाप से, सर्प द्वारा डसे जाने पर, वे मरे थे।' जनमेजय ने कहा — 'यहाँ राजा की मृत्यु का कारण मुनि द्वारा दिया गया शाप ही था —

श्लोक 24 (devibhagavatam.2.11.24)

तक्षकस्य तु को दोषो ब्रूहि मे मुनिसत्तम । उत्तङ्क उवाच । तक्षकेण धनं दत्त्वा कश्यपः सन्निवारितः

takṣakasya tu ko doṣo brūhi me munisattama uttaṅka uvāca takṣakeṇa dhanaṁ dattvā kaśyapaḥ sannivāritaḥ

तो हे मुनिश्रेष्ठ! मुझे बताइए, तक्षक का इसमें क्या दोष है?' उत्तंक ने कहा — 'तक्षक ने धन देकर कश्यप को रोक लिया था —

श्लोक 25 (devibhagavatam.2.11.25)

न स किं तक्षको वैरी पितृहा तव भूपते । भार्या रुरोः पुरा भूप दष्टा सर्पेण सा मृता

na sa kiṁ takṣako vairī pitṛhā tava bhūpate bhāryā ruroḥ purā bhūpa daṣṭā sarpeṇa sā mṛtā

क्या वह तक्षक तुम्हारा पितृ-हत्यारा शत्रु नहीं है, हे राजन्? पूर्वकाल में रुरु की भार्या भी एक सर्प द्वारा डसी जाकर मर गई थी,

श्लोक 26 (devibhagavatam.2.11.26)

अविवाहिता तु मुनिना जीविता च पुनः प्रिया । रुरुणापि कृता तत्र प्रतिज्ञा चातिदारुणा

avivāhitā tu muninā jīvitā ca punaḥ priyā ruruṇāpi kṛtā tatra pratijñā cātidāruṇā

जबकि वह विवाहित भी नहीं थी; उस मुनि (रुरु) ने अपनी प्रिया को पुनः जीवित किया, और वहीं रुरु ने भी एक अत्यंत भयंकर प्रतिज्ञा ली थी —

श्लोक 27 (devibhagavatam.2.11.27)

यं यं सर्पं प्रपश्यामि तं तं हन्म्यायुधेन वै । एवं कृत्वा प्रतिज्ञां स शस्त्रपाणी रुरुस्तदा

yaṁ yaṁ sarpaṁ prapaśyāmi taṁ taṁ hanmyāyudhena vai evaṁ kṛtvā pratijñāṁ sa śastrapāṇī rurustadā

'जिस-जिस सर्प को मैं देखूँगा, उस-उस को अपने अस्त्र से मार डालूँगा।' ऐसी प्रतिज्ञा करके शस्त्र हाथ में लिए वह रुरु,

श्लोक 28 (devibhagavatam.2.11.28)

व्यचरत्पृथिवीं राजन्निघ्नन्सर्पान्यतस्ततः । एकदा स वने घोरं डुण्डुभं जरसान्वितम्

vyacaratpṛthivīṁ rājannighnansarpānyatastataḥ ekadā sa vane ghoraṁ ḍuṇḍubhaṁ jarasānvitam

हे राजन्! पृथ्वी पर विचरण करता हुआ, जहाँ-तहाँ सर्पों का वध करता रहा। एक बार वन में उसने एक भयंकर, बूढ़े डुण्डुभ (एक निर्विष सर्प) को देखा।

श्लोक 29 (devibhagavatam.2.11.29)

अपश्यद्दण्डमुद्यम्य हन्तुं तं समुपाययौ । अभ्यहन्रुषितो विप्रस्तमुवाचाथ डुण्डुभः

apaśyaddaṇḍamudyamya hantuṁ taṁ samupāyayau abhyahanruṣito viprastamuvācātha ḍuṇḍubhaḥ

दंड उठाकर वह उसे मारने के लिए आगे बढ़ा। क्रोधित उस ब्राह्मण ने उस पर प्रहार किया; तब उस डुण्डुभ ने उससे कहा।

श्लोक 30 (devibhagavatam.2.11.30)

नापराध्नोमि ते विप्र कस्मान्मामभिहंसि वै । रुरुरुवाच । प्राणप्रिया मे दयिता दष्टा सर्पेण सा मृता

nāparādhnomi te vipra kasmānmāmabhihaṁsi vai rururuvāca prāṇapriyā me dayitā daṣṭā sarpeṇa sā mṛtā

'हे विप्र! मैंने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया — तुम मुझे क्यों मार रहे हो?' रुरु ने कहा — 'मेरी प्राणों से प्रिय पत्नी सर्प द्वारा डसी जाकर मर गई थी —

श्लोक 31 (devibhagavatam.2.11.31)

प्रतिज्ञेयं तदा सर्प दुःखितेन मया कृता । डुण्डुभ उवाच । नाहं दशामि तेऽन्ये वै ये दशन्ति भुजङ्गमाः

pratijñeyaṁ tadā sarpa duḥkhitena mayā kṛtā ḍuṇḍubha uvāca nāhaṁ daśāmi te'nye vai ye daśanti bhujaṅgamāḥ

हे सर्प! तब मैंने दुःखी होकर यह प्रतिज्ञा ली थी।' डुण्डुभ ने कहा — 'मैं तुम्हें नहीं डसता; अन्य सर्प ही डसते हैं —

श्लोक 32 (devibhagavatam.2.11.32)

शरीरसमयोगेन न मां हिंसितुमर्हसि । उत्तङ्क उवाच । श्रुत्वा तां मानुषीं वाणीं सर्पेणोक्तां मनोहराम्

śarīrasamayogena na māṁ hiṁsitumarhasi uttaṅka uvāca śrutvā tāṁ mānuṣīṁ vāṇīṁ sarpeṇoktāṁ manoharām

केवल शरीर के समान होने के कारण तुम्हें मुझे मारना उचित नहीं है।' उत्तंक ने कहा — सर्प द्वारा कहे गए इस मनोहर, मनुष्य के समान वचन को सुनकर,

श्लोक 33 (devibhagavatam.2.11.33)

रुरुः पप्रच्छ कोऽसि त्वं कस्माद्डुण्डुभतां गतः । सर्प उवाच । ब्राह्मणोऽहं पुरा विप्र सखा मे खगमाभिधः

ruruḥ papraccha ko'si tvaṁ kasmādḍuṇḍubhatāṁ gataḥ sarpa uvāca brāhmaṇo'haṁ purā vipra sakhā me khagamābhidhaḥ

रुरु ने पूछा — 'तुम कौन हो, और डुण्डुभ-भाव को कैसे प्राप्त हुए?' सर्प ने कहा — 'हे विप्र! मैं पूर्वकाल में एक ब्राह्मण था; मेरा एक मित्र था, जिसका नाम खगम था —

श्लोक 34 (devibhagavatam.2.11.34)

विप्रो धर्मभृतां श्रेष्ठः सत्यवादी जितेन्द्रियः । स मया वञ्जितो मौर्ख्यात्सर्पं कृत्वा च तार्णकम्

vipro dharmabhṛtāṁ śreṣṭhaḥ satyavādī jitendriyaḥ sa mayā vañjito maurkhyātsarpaṁ kṛtvā ca tārṇakam

वह ब्राह्मण धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, सत्यवादी और जितेन्द्रिय था। मैंने ही मूर्खतावश एक तिनके का सर्प बनाकर उसे धोखा दिया था,

श्लोक 35 (devibhagavatam.2.11.35)

भयं च प्रापितोऽत्यर्थमग्निहोत्रगृहे स्थितः । तेन भीतेन शप्तोऽहं विह्वलेनातिवेपिना

bhayaṁ ca prāpito'tyarthamagnihotragṛhe sthitaḥ tena bhītena śapto'haṁ vihvalenātivepinā

और उसे अत्यंत भयभीत कर दिया था, जब वह अपने अग्निहोत्र-गृह में बैठा था। भय से व्याकुल और थर-थर काँपते हुए उस मित्र ने मुझे शाप दे दिया —

श्लोक 36 (devibhagavatam.2.11.36)

भव सर्पो मन्दबुद्धे येनाहं धर्षितस्त्वया । मया प्रसादितोऽत्यर्थं सर्पेणासौ द्विजोत्तमः

bhava sarpo mandabuddhe yenāhaṁ dharṣitastvayā mayā prasādito'tyarthaṁ sarpeṇāsau dvijottamaḥ

'हे मूर्ख! जिसने मुझे इस प्रकार तिरस्कृत किया, वह तू सर्प बन जा।' मैंने उस ब्राह्मणश्रेष्ठ सर्प (मित्र) को अत्यंत प्रसन्न किया,

श्लोक 37 (devibhagavatam.2.11.37)

मामुवाचाथ तत्क्रोधात्किञ्चिच्छान्तिमवाप्य च । रुरुस्ते मोचिता शापस्यास्य सर्प भविष्यति

māmuvācātha tatkrodhātkiñcicchāntimavāpya ca ruruste mocitā śāpasyāsya sarpa bhaviṣyati

और उसने, अपने क्रोध से कुछ शांत होकर, मुझसे यह कहा — 'हे सर्प! तुझे इस शाप से रुरु द्वारा मुक्ति मिलेगी;

श्लोक 38 (devibhagavatam.2.11.38)

प्रमतेस्तु सुतो नूनमिति मां सोऽब्रवीद्वचः । सोऽहं सर्पो रुरुस्त्वं च शृणु मे परमं वचः

pramatestu suto nūnamiti māṁ so'bravīdvacaḥ so'haṁ sarpo rurustvaṁ ca śṛṇu me paramaṁ vacaḥ

वह निश्चय ही प्रमति का पुत्र होगा' — ऐसा उसने मुझसे कहा। वह सर्प मैं ही हूँ, और तुम रुरु हो — अब मेरा यह श्रेष्ठ वचन सुनो।

श्लोक 39 (devibhagavatam.2.11.39)

अहिंसा परमो धर्मो विप्राणां नात्र संशयः । दया सर्वत्र कर्तव्या ब्राह्मणेन विजानता

ahiṁsā paramo dharmo viprāṇāṁ nātra saṁśayaḥ dayā sarvatra kartavyā brāhmaṇena vijānatā

अहिंसा ब्राह्मणों का सर्वोच्च धर्म है, इसमें कोई संदेह नहीं; ज्ञानवान ब्राह्मण को सर्वत्र दया ही करनी चाहिए।

श्लोक 40 (devibhagavatam.2.11.40)

यज्ञादन्यत्र विप्रेन्द्र न हिंसा याज्ञिको मता । सूत उवाच । सर्पयोनेर्विनिर्मुक्तो बाह्मणोऽसौ रुरुस्ततः

yajñādanyatra viprendra na hiṁsā yājñiko matā sūta uvāca sarpayonervinirmukto bāhmaṇo'sau rurustataḥ

यज्ञ के अतिरिक्त कहीं भी, हे विप्रेन्द्र, हिंसा को यज्ञकर्ता के लिए उचित नहीं माना गया है।' सूत जी ने कहा — तब उस रुरु को सर्प-योनि से मुक्त हुआ वह ब्राह्मण,

श्लोक 41 (devibhagavatam.2.11.41)

कृत्वा तस्य च शापान्तं परित्यक्तं च हिंसनम् । विवाहिता तेन बाला मृता सज्जीविता पुनः

kṛtvā tasya ca śāpāntaṁ parityaktaṁ ca hiṁsanam vivāhitā tena bālā mṛtā sajjīvitā punaḥ

उस शाप का अंत और अपनी हिंसा का त्याग करके — रुरु द्वारा जिसकी मृत पत्नी विवाह से पूर्व ही पुनर्जीवित की गई थी,

श्लोक 42 (devibhagavatam.2.11.42)

कदनं सर्वसर्पाणां कृतं वैरमनुस्मरन् । त्वं तु वैरं समुत्सृज्य वर्तसे पन्नगेष्वथ

kadanaṁ sarvasarpāṇāṁ kṛtaṁ vairamanusmaran tvaṁ tu vairaṁ samutsṛjya vartase pannageṣvatha

उसने सभी सर्पों का संहार किया था, अपने पूर्व वैर का स्मरण करते हुए। परन्तु तुम तो अपने वैर को त्यागकर सर्पों के प्रति ही निष्क्रिय बने हुए हो,

श्लोक 43 (devibhagavatam.2.11.43)

विमन्युर्भरतश्रेष्ठ पितृघातकरेषु वै । अन्तरिक्षे मृतस्तातः स्नानदानविवर्जितः

vimanyurbharataśreṣṭha pitṛghātakareṣu vai antarikṣe mṛtastātaḥ snānadānavivarjitaḥ

हे भरतश्रेष्ठ! अपने पितृ-हन्ताओं के प्रति क्रोध-रहित बने हुए हो। तुम्हारे पिता स्नान-दान से रहित होकर अंतरिक्ष में ही मर गए,

श्लोक 44 (devibhagavatam.2.11.44)

तस्योद्धारं च राजेन्द्र कुरु हत्वाथ पन्नगान् । पितुर्वैरं न जानाति जीवन्नेव मृतो हि सः

tasyoddhāraṁ ca rājendra kuru hatvātha pannagān piturvairaṁ na jānāti jīvanneva mṛto hi saḥ

हे राजेन्द्र! उनका उद्धार करो, सर्पों का वध करके ही यह होगा। जो पिता के वैर को नहीं जानता, वह जीवित होकर भी मृत के समान है।

श्लोक 45 (devibhagavatam.2.11.45)

दुर्गतिस्ते पितुस्तावद्यावत्तान्न हनिष्यसि । अम्बामखमिषं कृत्वा कुरु यज्ञं नृपोत्तम

durgatiste pitustāvadyāvattānna haniṣyasi ambāmakhamiṣaṁ kṛtvā kuru yajñaṁ nṛpottama

जब तक तुम उन सर्पों का वध नहीं करोगे, तब तक तुम्हारे पिता की दुर्गति बनी रहेगी। हे नृपोत्तम! अम्बा-यज्ञ का बहाना बनाकर यज्ञ करो —

श्लोक 46 (devibhagavatam.2.11.46)

सर्पसत्रं महाराज पितुर्वैरमनुस्मरन् । सूत उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा जन्मेजयस्तदा

sarpasatraṁ mahārāja piturvairamanusmaran sūta uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā rājā janmejayastadā

हे महाराज! सर्पसत्र (सर्प-यज्ञ) कर, अपने पिता के वैर का स्मरण करते हुए।' सूत जी ने कहा — इस प्रकार उसका यह वचन सुनकर राजा जनमेजय उस समय,

श्लोक 47 (devibhagavatam.2.11.47)

नेत्राभ्यामश्रुपातं च चकारातीव दुःखितः । धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धेर्वृथा मानकरस्य वै

netrābhyāmaśrupātaṁ ca cakārātīva duḥkhitaḥ dhiṅmāmastu sudurbuddhervṛthā mānakarasya vai

अपनी दोनों आँखों से आँसू बहाते हुए अत्यंत दुःखी हो गया — 'धिक्कार है मुझ अत्यंत दुर्बुद्धि को, जो व्यर्थ ही मान-मर्यादा में लगा रहा,

श्लोक 48 (devibhagavatam.2.11.48)

पिता यस्य गतिं घोरां प्राप्तः पन्नगपीडितः । अद्याहं मखमारभ्य करोम्यपचितिं पितुः

pitā yasya gatiṁ ghorāṁ prāptaḥ pannagapīḍitaḥ adyāhaṁ makhamārabhya karomyapacitiṁ pituḥ

जिसका पिता सर्प द्वारा पीड़ित होकर उस भयंकर गति को प्राप्त हुआ। मैं आज ही यज्ञ आरम्भ करके अपने पिता के प्रति यह कर्तव्य पूरा करूँगा —

श्लोक 49 (devibhagavatam.2.11.49)

हत्वा सर्पानसन्दिग्धो दीप्यमाने विभावसौ । आहूय मन्त्रिणः सर्वान् राजा वचनमब्रवीत्

hatvā sarpānasandigdho dīpyamāne vibhāvasau āhūya mantriṇaḥ sarvān rājā vacanamabravīt

प्रज्वलित अग्नि में सर्पों का वध करके, बिना किसी संदेह के।' सभी मंत्रियों को बुलाकर राजा ने यह वचन कहा।

श्लोक 50 (devibhagavatam.2.11.50)

कुर्वन्तु यज्ञसम्भारं यथार्हं मन्त्रिसत्तमाः । गङ्गातीरे शुभां भूमिं मापयित्वा द्विजोत्तमैः

kurvantu yajñasambhāraṁ yathārhaṁ mantrisattamāḥ gaṅgātīre śubhāṁ bhūmiṁ māpayitvā dvijottamaiḥ

'हे मंत्रिश्रेष्ठो! यज्ञ की सामग्री यथोचित रूप से तैयार करवाओ। गंगा के तट पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों से एक शुभ भूमि नापकर,

श्लोक 51 (devibhagavatam.2.11.51)

कुर्वन्तु मण्डपं स्वस्थाः शतस्तम्भं मनोहरम् । वेदी यज्ञस्य कर्तव्या ममाद्य सचिवाः खलु

kurvantu maṇḍapaṁ svasthāḥ śatastambhaṁ manoharam vedī yajñasya kartavyā mamādya sacivāḥ khalu

उस पर स्थिर होकर एक सुंदर, सौ स्तंभों वाला मण्डप बनवाओ। हे सचिवो! मेरे लिए आज ही यज्ञ की वेदी भी बनवानी होगी,

श्लोक 52 (devibhagavatam.2.11.52)

तदङ्गत्वे विधेयो वै सर्पसत्रः सुविस्तरः । तक्षकस्तु पशुस्तत्र होतोत्तङ्को महामुनिः

tadaṅgatve vidheyo vai sarpasatraḥ suvistaraḥ takṣakastu paśustatra hotottaṅko mahāmuniḥ

और उसके अंग रूप में विस्तृत सर्पसत्र का विधान किया जाना चाहिए। उसमें तक्षक ही पशु (यज्ञ-बलि) होगा, और महामुनि उत्तंक होता (यज्ञ-पुरोहित) होंगे।

श्लोक 53 (devibhagavatam.2.11.53)

शीघ्रमाहूयतां विप्राः सर्वज्ञा वेदपारगाः । सूत उवाच । मन्त्रिणस्तु तदा चक्रुर्भूपवाक्यैर्विचक्षणाः

śīghramāhūyatāṁ viprāḥ sarvajñā vedapāragāḥ sūta uvāca mantriṇastu tadā cakrurbhūpavākyairvicakṣaṇāḥ

सर्वज्ञ, वेदपारंगत ब्राह्मणों को शीघ्रता से बुलवाओ।' सूत जी ने कहा — तब उन कुशल मंत्रियों ने राजा के वचनों के अनुसार,

श्लोक 54 (devibhagavatam.2.11.54)

यज्ञस्य सर्वसम्भारं वेदीं यज्ञस्य विस्तृताम् । हवने वर्तमाने तु सर्पाणां तक्षको गतः

yajñasya sarvasambhāraṁ vedīṁ yajñasya vistṛtām havane vartamāne tu sarpāṇāṁ takṣako gataḥ

यज्ञ की सारी सामग्री और यज्ञ की विस्तृत वेदी तैयार करवाई। हवन चलते रहने पर, सर्पों में से तक्षक इन्द्र के पास चला गया,

श्लोक 55 (devibhagavatam.2.11.55)

इन्द्रं प्रति भयार्तोऽहं त्राहि मामिति चाब्रवीत् । भयभीतं समाश्वास्य स्वासने सन्निवेश्य च

indraṁ prati bhayārto'haṁ trāhi māmiti cābravīt bhayabhītaṁ samāśvāsya svāsane sanniveśya ca

भय से पीड़ित होकर उसने कहा — 'मेरी रक्षा कीजिए।' भय से भयभीत उसे सांत्वना देते हुए, अपने ही आसन पर बिठाते हुए,

श्लोक 56 (devibhagavatam.2.11.56)

ददावभयमत्यर्थं निर्भयो भव पन्नग । तमिन्द्रशरणं ज्ञात्वा मुनिर्दत्ताभयं तथा

dadāvabhayamatyarthaṁ nirbhayo bhava pannaga tamindraśaraṇaṁ jñātvā munirdattābhayaṁ tathā

इन्द्र ने उसे पूर्ण अभय दिया — 'हे सर्प! निर्भय हो जाओ।' उसे इन्द्र की शरण में गया जानकर, और अभय दिया गया जानकर,

श्लोक 57 (devibhagavatam.2.11.57)

उत्तङ्कोऽह्वयदुद्विग्नः सेन्द्रं कृत्वा निमन्त्रणम् । स्मृतस्तदा तक्षकेण यायावरकुलोद्भवः

uttaṅko'hvayadudvignaḥ sendraṁ kṛtvā nimantraṇam smṛtastadā takṣakeṇa yāyāvarakulodbhavaḥ

उत्तंक मुनि व्याकुल होकर इन्द्र सहित तक्षक को भी बुलाने लगा। उसी समय, तक्षक द्वारा स्मरण किए जाने पर, यायावर-कुल में उत्पन्न,

श्लोक 58 (devibhagavatam.2.11.58)

आस्तीको नाम धर्मात्मा जरत्कारुसुतो मुनिः । तत्रागत्य मुनेर्बालस्तुष्टाव जनमेजयम्

āstīko nāma dharmātmā jaratkārusuto muniḥ tatrāgatya munerbālastuṣṭāva janamejayam

आस्तीक नामक धर्मात्मा मुनि, जरत्कारु का पुत्र, वहाँ आया, और उस मुनि-बालक ने वहाँ आकर राजा जनमेजय की स्तुति की।

श्लोक 59 (devibhagavatam.2.11.59)

राजा तमर्चयामास दृष्ट्वा बालं सुपण्डितम् । अर्चयित्वा नृपस्तं तु छन्दयामास वाञ्छितैः

rājā tamarcayāmāsa dṛṣṭvā bālaṁ supaṇḍitam arcayitvā nṛpastaṁ tu chandayāmāsa vāñchitaiḥ

उस अत्यंत विद्वान् बालक को देखकर राजा ने उसका सम्मान किया; सम्मानित करके राजा ने उसे इच्छानुसार वर देने की पेशकश की।

श्लोक 60 (devibhagavatam.2.11.60)

स तु वव्रे महाभाग यज्ञोऽयं विरमत्विति । सत्यबद्धो नृपस्तेन प्रार्थितश्च पुनस्तथा

sa tu vavre mahābhāga yajño'yaṁ viramatviti satyabaddho nṛpastena prārthitaśca punastathā

उस महाभाग्यशाली बालक ने वर माँगा — 'यह यज्ञ यहीं समाप्त हो जाए।' सत्य से बँधे उस राजा से उसने फिर से यही प्रार्थना की —

श्लोक 61 (devibhagavatam.2.11.61)

होमं निवर्तयामास सर्पाणां मुनिवाक्यतः । भारतं श्रावयामास वैशम्पायन विस्तरात्

homaṁ nivartayāmāsa sarpāṇāṁ munivākyataḥ bhārataṁ śrāvayāmāsa vaiśampāyana vistarāt

और राजा ने मुनि के वचन से सर्पों के हवन को रोक दिया। तब वैशम्पायन जी ने विस्तारपूर्वक महाभारत का श्रवण कराया।

श्लोक 62 (devibhagavatam.2.11.62)

श्रुत्वापि नृपतिः कामं न शान्तिमभिजग्मिवान् । व्यासं पप्रच्छ भूपालो मम शान्तिः कथं भवेत्

śrutvāpi nṛpatiḥ kāmaṁ na śāntimabhijagmivān vyāsaṁ papraccha bhūpālo mama śāntiḥ kathaṁ bhavet

इसे सुनकर भी राजा को इच्छित शांति प्राप्त नहीं हुई। राजा ने व्यास जी से पूछा — 'मुझे शांति किस प्रकार प्राप्त होगी?

श्लोक 63 (devibhagavatam.2.11.63)

मनोऽतिदह्यते कामं किं करोमि वदस्व मे । पिता मे दुर्भगस्यैव मृतः पार्थसुतात्मजः

mano'tidahyate kāmaṁ kiṁ karomi vadasva me pitā me durbhagasyaiva mṛtaḥ pārthasutātmajaḥ

मेरा मन अत्यंत जल रहा है; मैं क्या करूँ, मुझे बताइए। मेरे पिता, अत्यंत दुर्भाग्यशाली, पार्थ-वंश के पुत्रों के पौत्र, मृत्यु को प्राप्त हुए।

श्लोक 64 (devibhagavatam.2.11.64)

क्षत्रियाणां महाभाग सङ्ग्रामे मरणं वरम् । रणे वा मरणं व्यास गृहे वा विधिपूर्वकम्

kṣatriyāṇāṁ mahābhāga saṅgrāme maraṇaṁ varam raṇe vā maraṇaṁ vyāsa gṛhe vā vidhipūrvakam

हे महाभाग! क्षत्रियों के लिए युद्ध में मरना ही श्रेष्ठ माना गया है — हे व्यास! रणभूमि में या फिर घर में विधिपूर्वक मरना।

श्लोक 65 (devibhagavatam.2.11.65)

मरणं न पितुर्मेऽभूदन्तरिक्षे मृतोऽवशः । शान्त्युपायं वदस्वात्र त्वं च सत्यवतीसुत

maraṇaṁ na piturme'bhūdantarikṣe mṛto'vaśaḥ śāntyupāyaṁ vadasvātra tvaṁ ca satyavatīsuta

परन्तु मेरे पिता की मृत्यु ऐसी नहीं हुई — वे असहाय होकर आकाश में मर गए। मुझे शांति का उपाय बताइए, हे सत्यवती-पुत्र!

श्लोक 66 (devibhagavatam.2.11.66)

यथा स्वर्गं व्रजेदाशु पिता मे दुर्गतिं गतः

yathā svargaṁ vrajedāśu pitā me durgatiṁ gataḥ

जिससे मेरे उस दुर्गति को प्राप्त पिता को शीघ्र ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सके।'

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