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द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3

प्रतीप से शन्तनु के जन्म तक

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

श्लोक 1 (devibhagavatam.2.3.1)

उत्पत्तिस्तु त्वया प्रोक्ता व्यासस्यामिततेजसः । सत्यवत्यास्तथा सूत विस्तरेण त्वयाऽनघ

utpattistu tvayā proktā vyāsasyāmitatejasaḥ satyavatyāstathā sūta vistareṇa tvayā'nagha

हे निष्पाप सूत जी! आपने अपार तेजस्वी व्यास और सत्यवती की उत्पत्ति हमें विस्तारपूर्वक बता दी।

श्लोक 2 (devibhagavatam.2.3.2)

तथाऽप्येकस्तु संदेहश्चित्तेऽस्माकं सुसंस्थितः । न निवर्तति धर्मज्ञ कथितेन त्वयाऽनघ

tathā'pyekastu saṁdehaścitte'smākaṁ susaṁsthitaḥ na nivartati dharmajña kathitena tvayā'nagha

फिर भी, हे धर्मज्ञ! हमारे मन में अब भी एक संदेह बना हुआ है, जो आपके कथन से भी दूर नहीं हुआ, हे निष्पाप!

श्लोक 3 (devibhagavatam.2.3.3)

माता व्यासस्य या प्रोक्ता नाम्ना सत्यवती शुभा । सा कथं नृपतिं प्राप्ता शंतुनुं धर्मवित्तमम्

mātā vyāsasya yā proktā nāmnā satyavatī śubhā sā kathaṁ nṛpatiṁ prāptā śaṁtunuṁ dharmavittamam

जिस सत्यवती नाम की शुभ स्त्री को व्यास जी की माता कहा गया, वह धर्मज्ञों में श्रेष्ठ राजा शन्तनु को कैसे प्राप्त हुई?

श्लोक 4 (devibhagavatam.2.3.4)

निषादपुत्रीं स कथं वृतवान्नृपतिः स्वयम् । धर्मिष्ठः पौरवो राजा कुलहीनामसंवृत्ताम्

niṣādaputrīṁ sa kathaṁ vṛtavānnṛpatiḥ svayam dharmiṣṭhaḥ pauravo rājā kulahīnāmasaṁvṛttām

उस अत्यंत धर्मिष्ठ पौरव राजा ने कुलहीन और असंस्कृता निषाद-कन्या को स्वयं पत्नी रूप में कैसे वरण किया?

श्लोक 5 (devibhagavatam.2.3.5)

शंतनोः प्रथमा पत्नी का ह्यभूत्कथयाधुना । भीष्मः पुत्रोऽथ मेधावी वसोरंशः कथं पुनः

śaṁtanoḥ prathamā patnī kā hyabhūtkathayādhunā bhīṣmaḥ putro'tha medhāvī vasoraṁśaḥ kathaṁ punaḥ

शन्तनु की प्रथम पत्नी कौन थी, यह भी अब हमें बताइए; और वसु के अंश से उत्पन्न बुद्धिमान पुत्र भीष्म का जन्म फिर किस प्रकार हुआ?

श्लोक 6 (devibhagavatam.2.3.6)

त्वया प्रोक्तं पुरा सूत राजा चित्रांगदः कृतः । सत्यवत्याः सुतो वीरो भीष्मेणामित तेजसा

tvayā proktaṁ purā sūta rājā citrāṁgadaḥ kṛtaḥ satyavatyāḥ suto vīro bhīṣmeṇāmita tejasā

हे सूत! आपने पहले कहा था कि अपार तेजस्वी भीष्म ने सत्यवती के वीर पुत्र चित्रांगद को राजा बनाया।

श्लोक 7 (devibhagavatam.2.3.7)

चित्रांगदे हते वीरे कृतस्तदनुजस्तथा । विचित्रवीर्यनामाऽसौ सत्यवत्याः सुतो नृपः

citrāṁgade hate vīre kṛtastadanujastathā vicitravīryanāmā'sau satyavatyāḥ suto nṛpaḥ

वीर चित्रांगद के मारे जाने पर उसके छोटे भाई, सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य नामक राजा को (राजपद पर) स्थापित किया गया।

श्लोक 8 (devibhagavatam.2.3.8)

ज्येष्ठे भीष्मे स्थिते पूर्वे धमिष्ठं रूपवत्यपि । कृतवान्स कथं राज्यं स्थापितस्तेन जानता

jyeṣṭhe bhīṣme sthite pūrve dhamiṣṭhaṁ rūpavatyapi kṛtavānsa kathaṁ rājyaṁ sthāpitastena jānatā

बड़े भाई भीष्म के जीवित रहते हुए भी उस धर्मपरायण और रूपवान् (विचित्रवीर्य) को उसने राज्य पर कैसे स्थापित किया, यह जानते हुए भी?

श्लोक 9 (devibhagavatam.2.3.9)

मृते विचित्रवीर्ये तु सत्यवत्यतिदुःखिता । वधूभ्यां गोलकौ पुत्रौ जनयामास सा कथम्

mṛte vicitravīrye tu satyavatyatiduḥkhitā vadhūbhyāṁ golakau putrau janayāmāsa sā katham

विचित्रवीर्य के मरने पर अत्यंत दुःखी हुई सत्यवती ने अपनी दोनों पुत्रवधुओं से गोलक (नियोग-जनित) पुत्रों को कैसे उत्पन्न कराया?

श्लोक 10 (devibhagavatam.2.3.10)

कथं राज्यं न भीष्माय ददौ सा वरवर्णिनी । न कृतस्तु कथं तेन वीरेण दारसंग्रहः

kathaṁ rājyaṁ na bhīṣmāya dadau sā varavarṇinī na kṛtastu kathaṁ tena vīreṇa dārasaṁgrahaḥ

उस सुंदरी ने राज्य भीष्म को क्यों नहीं दिया? और उस वीर ने विवाह क्यों नहीं किया?

श्लोक 11 (devibhagavatam.2.3.11)

अधर्मस्तु कृतः कस्माद्व्यासेनामिततेजसा । ज्येष्ठेन भ्रातृभार्यायां पुत्रानुत्पादिताविति

adharmastu kṛtaḥ kasmādvyāsenāmitatejasā jyeṣṭhena bhrātṛbhāryāyāṁ putrānutpāditāviti

अपार तेजस्वी व्यास जी ने किस कारण यह अधर्म किया — अपने बड़े भाई की पत्नियों में पुत्रों को उत्पन्न करना?

श्लोक 12 (devibhagavatam.2.3.12)

पुराणकर्ता धर्मात्मा स कथं कृतवान्मुनिः । सेवनं परदाराणां भ्रातुश्चैव विशेषतः

purāṇakartā dharmātmā sa kathaṁ kṛtavānmuniḥ sevanaṁ paradārāṇāṁ bhrātuścaiva viśeṣataḥ

पुराणों के रचयिता वह धर्मात्मा मुनि दूसरों की पत्नियों की, वह भी विशेष रूप से अपने ही भाई की पत्नियों की, सेवा (नियोग) कैसे कर सके?

श्लोक 13 (devibhagavatam.2.3.13)

जुगुप्सितमिदं कर्म स कथं कृतवान्मुनिः । शिष्टाचारः कथं सूत वेदानुमितिकारक

jugupsitamidaṁ karma sa kathaṁ kṛtavānmuniḥ śiṣṭācāraḥ kathaṁ sūta vedānumitikāraka

हे सूत! वह मुनि यह निंदनीय कर्म कैसे कर सका? वह तो सदाचारी और वेदों के अनुसार अनुमान करने वाला था।

श्लोक 14 (devibhagavatam.2.3.14)

व्यास शिष्योऽसि मेधाविन्संदेहं छेत्तुमर्हसि । श्रोतुकामा वयं सर्वे धर्मक्षेत्रे कृतक्षणाः

vyāsa śiṣyo'si medhāvinsaṁdehaṁ chettumarhasi śrotukāmā vayaṁ sarve dharmakṣetre kṛtakṣaṇāḥ

आप बुद्धिमान व्यास के शिष्य हैं, आपको यह संशय दूर करना चाहिए। धर्मक्षेत्र में अवसर पाकर हम सब यह सुनने के इच्छुक हैं।

श्लोक 15 (devibhagavatam.2.3.15)

सूत उवाच । इक्ष्वाकुवंशप्रभवो महाभिष इति स्मृतः । सत्यवान्धर्मशीलश्च चक्रवर्ती नृपोत्तमः

sūta uvāca ikṣvākuvaṁśaprabhavo mahābhiṣa iti smṛtaḥ satyavāndharmaśīlaśca cakravartī nṛpottamaḥ

सूत जी ने कहा — इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न महाभिष नामक एक राजा प्रसिद्ध था, जो सत्यवान्, धर्मशील, चक्रवर्ती और श्रेष्ठ राजा था।

श्लोक 16 (devibhagavatam.2.3.16)

अश्वमेधसहस्रेण वाजपेयशतेन च । तोषयामास देवेंद्रं स्वर्गं प्राप महामतिः

aśvamedhasahasreṇa vājapeyaśatena ca toṣayāmāsa deveṁdraṁ svargaṁ prāpa mahāmatiḥ

हज़ार अश्वमेध यज्ञों और सौ वाजपेय यज्ञों से उसने इन्द्र को संतुष्ट कर दिया; वह महाबुद्धिमान राजा स्वर्ग को प्राप्त हुआ।

श्लोक 17 (devibhagavatam.2.3.17)

एकदा ब्रह्मसदनं गतो राजा महाभिषः । सुराः सर्वे समाजग्मुः सेवनार्थं प्रजापतिम्

ekadā brahmasadanaṁ gato rājā mahābhiṣaḥ surāḥ sarve samājagmuḥ sevanārthaṁ prajāpatim

एक बार राजा महाभिष ब्रह्मलोक में गए; सभी देवता भी प्रजापति ब्रह्मा की सेवा के लिए वहाँ एकत्र हुए।

श्लोक 18 (devibhagavatam.2.3.18)

गंगा महानदी तत्र संस्थिता सेवितुं विभुम् । तस्या वासः समुद्धूतं मारुतेन तरस्विना

gaṁgā mahānadī tatra saṁsthitā sevituṁ vibhum tasyā vāsaḥ samuddhūtaṁ mārutena tarasvinā

महानदी गंगा भी वहाँ ब्रह्मा की सेवा में उपस्थित थीं; वेगवान् वायु ने उनके वस्त्र को उड़ा दिया।

श्लोक 19 (devibhagavatam.2.3.19)

अधोमुखाः सुराः सर्वे न विलोक्यैव तां स्थिताः । राजा महाभिषस्तां तु निःशंकः समपश्यत

adhomukhāḥ surāḥ sarve na vilokyaiva tāṁ sthitāḥ rājā mahābhiṣastāṁ tu niḥśaṁkaḥ samapaśyata

सभी देवता (लज्जावश) अपना मुख नीचे किए बिना उसे देखे बैठे रहे, परन्तु राजा महाभिष ने निःशंक होकर उन्हें देख लिया।

श्लोक 20 (devibhagavatam.2.3.20)

साऽपि तं प्रेमसंयुक्तं नृपं ज्ञातवती नदी । दृष्ट्वा तौ प्रेमसंयुक्तौ निर्लज्जौ काममोहितौ

sā'pi taṁ premasaṁyuktaṁ nṛpaṁ jñātavatī nadī dṛṣṭvā tau premasaṁyuktau nirlajjau kāmamohitau

उस नदी (गंगा) ने भी उस प्रेमासक्त राजा को पहचान लिया; उन दोनों को प्रेम में लीन, निर्लज्ज और काम-मोहित देखकर —

श्लोक 21 (devibhagavatam.2.3.21)

ब्रह्मा चुकोप तौ तूर्णं शशाप च रुषाऽन्वितः । मर्त्यलोकेषु भूपाल जन्म प्राप्य पुनर्दिवम्

brahmā cukopa tau tūrṇaṁ śaśāpa ca ruṣā'nvitaḥ martyalokeṣu bhūpāla janma prāpya punardivam

ब्रह्मा तुरंत क्रोधित हो गए और क्रोधावेश में शाप दे दिया — 'हे राजन्! तू मृत्युलोक में जन्म पाकर, फिर से स्वर्ग को प्राप्त करेगा,

श्लोक 22 (devibhagavatam.2.3.22)

पुण्येन महताऽऽविष्टस्त्वमवाप्स्यसि सर्वथा । गंगां तथोक्तवान्ब्रह्मा वीक्ष्य प्रेमवतीं नृपे

puṇyena mahatā''viṣṭastvamavāpsyasi sarvathā gaṁgāṁ tathoktavānbrahmā vīkṣya premavatīṁ nṛpe

महान् पुण्य से युक्त होकर, यह सर्वथा सुनिश्चित है।' ब्रह्मा ने राजा के प्रति प्रेमासक्त गंगा को देखकर उससे भी ऐसा ही कहा।

श्लोक 23 (devibhagavatam.2.3.23)

विमनस्कौ तु तौ तूर्णं निःसृतौ ब्रह्मणोंऽतिकात् । स नृपश्चिंतयित्वाऽथ भूलोके धर्मतत्परान्

vimanaskau tu tau tūrṇaṁ niḥsṛtau brahmaṇoṁ'tikāt sa nṛpaściṁtayitvā'tha bhūloke dharmatatparān

वे दोनों उदास होकर तुरंत ब्रह्मा के समीप से चले गए। तब वह राजा भूलोक में धर्मपरायण पुरुषों के विषय में विचार करने लगा।

श्लोक 24 (devibhagavatam.2.3.24)

प्रतीपं चिंतयामास पितरं पुरुवंशजम् । एतस्मिन्समये चाष्टौ वसवः स्त्रीसमन्विताः

pratīpaṁ ciṁtayāmāsa pitaraṁ puruvaṁśajam etasminsamaye cāṣṭau vasavaḥ strīsamanvitāḥ

उसने पुरुवंश में उत्पन्न पितारूप प्रतीप का चिंतन किया। इसी बीच स्त्रियों सहित आठ वसु —

श्लोक 25 (devibhagavatam.2.3.25)

वसिष्ठस्याऽऽश्रमं प्राप्ता रममाणा यदृच्छया । पृथ्वादीनां वसूनां च मध्ये कोऽपि वसूत्तमः

vasiṣṭhasyā''śramaṁ prāptā ramamāṇā yadṛcchayā pṛthvādīnāṁ vasūnāṁ ca madhye ko'pi vasūttamaḥ

इच्छानुसार विचरण करते हुए, वसिष्ठ मुनि के आश्रम में जा पहुँचे। उन वसुओं में पृथु आदि के मध्य एक श्रेष्ठ वसु था,

श्लोक 26 (devibhagavatam.2.3.26)

द्यौर्नामा तस्य भार्याऽथ नंदिनीं गां ददर्श ह । दृष्ट्वा पतिं सा पप्रच्छ कस्येयं धेनुरुत्तमा

dyaurnāmā tasya bhāryā'tha naṁdinīṁ gāṁ dadarśa ha dṛṣṭvā patiṁ sā papraccha kasyeyaṁ dhenuruttamā

जिसकी पत्नी का नाम द्यौ था; उसने वहाँ नंदिनी नामक गाय को देखा। पति को देखकर उसने पूछा — 'यह उत्तम गाय किसकी है?'

श्लोक 27 (devibhagavatam.2.3.27)

द्यौस्तामाह वसिष्ठस्य गौरियं शृणु सुंदरि । दुग्धमस्याः पिबेद्यस्तु नारी वा पुरषोऽथ वा

dyaustāmāha vasiṣṭhasya gauriyaṁ śṛṇu suṁdari dugdhamasyāḥ pibedyastu nārī vā puraṣo'tha vā

द्यौ ने उससे कहा — 'हे सुंदरी! सुनो, यह वसिष्ठ मुनि की गाय है। इसका दूध जो भी स्त्री या पुरुष पीता है,

श्लोक 28 (devibhagavatam.2.3.28)

अयुतायुर्भवेन्यूनं सदैवाऽगतयौवनः । तच्छ्रुत्वा सुंदरी प्राह मृत्युलोकेऽस्ति मे सखी

ayutāyurbhavenyūnaṁ sadaivā'gatayauvanaḥ tacchrutvā suṁdarī prāha mṛtyuloke'sti me sakhī

वह दस हज़ार वर्ष से कम आयु का नहीं होता, और सदा नित्य-युवा बना रहता है।' यह सुनकर उस सुंदरी ने कहा — 'मृत्युलोक में मेरी एक सखी है,

श्लोक 29 (devibhagavatam.2.3.29)

उशीनरस्य राजर्षेः पुत्री परमशोभना । तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां पयस्विनीम्

uśīnarasya rājarṣeḥ putrī paramaśobhanā tasyā hetormahābhāga savatsāṁ gāṁ payasvinīm

राजर्षि उशीनर की पुत्री, अत्यंत सुंदर। हे महाभाग! उसी के लिए, बछड़े सहित दूध देने वाली उस गाय,

श्लोक 30 (devibhagavatam.2.3.30)

आनयस्वाऽऽश्रमश्रेष्ठं नंदिनीं कामदां शुभाम् । यावदस्याः पयः पीत्वा सखी मम सदैव हि

ānayasvā''śramaśreṣṭhaṁ naṁdinīṁ kāmadāṁ śubhām yāvadasyāḥ payaḥ pītvā sakhī mama sadaiva hi

उस कामनापूर्ण, शुभ नंदिनी को इस श्रेष्ठ आश्रम से ले आइए, ताकि इसका दूध पीकर मेरी सखी सदा —

श्लोक 31 (devibhagavatam.2.3.31)

मानुषेषु भवेदेका जरारोगविवर्जिता । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या द्यौर्जहार च नंदिनीम्

mānuṣeṣu bhavedekā jarārogavivarjitā tacchrutvā vacanaṁ tasyā dyaurjahāra ca naṁdinīm

मनुष्यों में अकेली ऐसी हो जो बुढ़ापे और रोग से रहित रहे।' उसका यह वचन सुनकर द्यौ ने नंदिनी का हरण कर लिया,

श्लोक 32 (devibhagavatam.2.3.32)

अवमन्य मुनिं दांतं पृथ्वाद्यैः सहितोऽनघः । हृतायामथ नंदिन्यां वसिष्ठस्तु महातपाः

avamanya muniṁ dāṁtaṁ pṛthvādyaiḥ sahito'naghaḥ hṛtāyāmatha naṁdinyāṁ vasiṣṭhastu mahātapāḥ

उस संयमी, निर्दोष मुनि का अनादर करते हुए, पृथु आदि वसुओं के साथ मिलकर। नंदिनी के हर लिए जाने पर, महातपस्वी वसिष्ठ जी —

श्लोक 33 (devibhagavatam.2.3.33)

आजगामाऽऽश्रमपदं फलान्यादाय सत्वरः । नापश्यत यदा धेनुं सवत्सां स्वाश्रमे मुनिः

ājagāmā''śramapadaṁ phalānyādāya satvaraḥ nāpaśyata yadā dhenuṁ savatsāṁ svāśrame muniḥ

फल लेकर शीघ्रता से अपने आश्रम में लौटे। जब मुनि ने अपने आश्रम में बछड़े सहित उस गाय को नहीं देखा,

श्लोक 34 (devibhagavatam.2.3.34)

मृगयामास तेजस्वी गह्वरेषु वनेष्वपि । नासादिता यदा धेनुश्चुकोपातिशयं मुनिः

mṛgayāmāsa tejasvī gahvareṣu vaneṣvapi nāsāditā yadā dhenuścukopātiśayaṁ muniḥ

तो वह तेजस्वी मुनि वन की गुफाओं और वनों में उसे ढूँढने लगा। जब गाय नहीं मिली, तो मुनि अत्यंत क्रोधित हो गया।

श्लोक 35 (devibhagavatam.2.3.35)

वारुणिश्चापि विज्ञाय ध्यानेन वसुभिर्हृताम् । वसुभिर्मे हृता धेनुर्यस्मान्मामवमन्य वै

vāruṇiścāpi vijñāya dhyānena vasubhirhṛtām vasubhirme hṛtā dhenuryasmānmāmavamanya vai

वरुण-पुत्र वसिष्ठ ने ध्यान से यह भी जान लिया कि वह वसुओं द्वारा हर ली गई है — 'चूँकि वसुओं ने मेरा अनादर करते हुए मेरी गाय का हरण किया है,

श्लोक 36 (devibhagavatam.2.3.36)

तस्मात्सर्वे जनिष्यंति मानुषेषु न संशयः । एवं शशाप धर्मात्मा वसूंस्तान्वारुणिः स्वयम्

tasmātsarve janiṣyaṁti mānuṣeṣu na saṁśayaḥ evaṁ śaśāpa dharmātmā vasūṁstānvāruṇiḥ svayam

इसलिए, इसमें कोई संदेह नहीं, वे सब मनुष्यों में जन्म लेंगे।' इस प्रकार उस धर्मात्मा वारुणि ने स्वयं उन वसुओं को शाप दे दिया।

श्लोक 37 (devibhagavatam.2.3.37)

श्रुत्वा विमनसः सर्वे प्रययुर्दुःखिताश्च ते । शप्ताः स्म इति जानंत ऋषिं तमुपचक्रमुः

śrutvā vimanasaḥ sarve prayayurduḥkhitāśca te śaptāḥ sma iti jānaṁta ṛṣiṁ tamupacakramuḥ

यह सुनकर वे सभी उदासचित्त होकर, दुःखी हुए वहाँ से चले गए। 'हमें शाप मिल गया है', यह जानकर वे उस ऋषि के पास फिर लौटे।

श्लोक 38 (devibhagavatam.2.3.38)

प्रसादयंतस्तमृषिं वसव शरणं गताः । मुनिस्तानाह धर्मात्मा वसून्दीनान्पुरः स्थितान्

prasādayaṁtastamṛṣiṁ vasava śaraṇaṁ gatāḥ munistānāha dharmātmā vasūndīnānpuraḥ sthitān

उस ऋषि को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हुए वसु उनकी शरण में गए। धर्मात्मा मुनि ने अपने सामने खड़े उन दीन वसुओं से कहा —

श्लोक 39 (devibhagavatam.2.3.39)

अनुसंवत्सरं सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ । येनेयं विहृता धेनुर्नंदिनी मम वत्सला

anusaṁvatsaraṁ sarve śāpamokṣamavāpsyatha yeneyaṁ vihṛtā dhenurnaṁdinī mama vatsalā

'तुम सब एक ही वर्ष में शाप-मुक्ति प्राप्त कर लोगे, परन्तु जिसने मेरी वत्सल नंदिनी गाय को हर लिया है,

श्लोक 40 (devibhagavatam.2.3.40)

तस्माद्द्यौर्मानुषे देहे दीर्घकालं वसिष्यति । ते शप्ताः पथि गच्छतीं गंगां दृष्ट्वा सरिद्वराम्

tasmāddyaurmānuṣe dehe dīrghakālaṁ vasiṣyati te śaptāḥ pathi gacchatīṁ gaṁgāṁ dṛṣṭvā saridvarām

उसके कारण द्यौ को मनुष्य-देह में दीर्घकाल तक रहना पड़ेगा।' इस प्रकार शापित हुए वे मार्ग में जाती हुई श्रेष्ठ नदी गंगा को देखकर —

श्लोक 41 (devibhagavatam.2.3.41)

ऊचुस्तां प्रणताः सर्वे शप्तां चिंतातुरां नदीम् । भविष्यामो वयं देवि कथं देवाः सुधाशनाः

ūcustāṁ praṇatāḥ sarve śaptāṁ ciṁtāturāṁ nadīm bhaviṣyāmo vayaṁ devi kathaṁ devāḥ sudhāśanāḥ

उस शापित और चिंताग्रस्त नदी-देवी को सब वसु प्रणाम करके कहने लगे — 'हे देवि! हम अमृतभोजी देवता मनुष्य कैसे बनेंगे?

श्लोक 42 (devibhagavatam.2.3.42)

मानुषाणां च जठरं चिंतेयं महती हि नः । तस्मात्त्वं मानुषी भूत्वा जनयास्मान्सरिद्वरे

mānuṣāṇāṁ ca jaṭharaṁ ciṁteyaṁ mahatī hi naḥ tasmāttvaṁ mānuṣī bhūtvā janayāsmānsaridvare

मनुष्यों की उदर-योनि से जन्म लेने की यह हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है। इसलिए हे उत्तम नदी! तू मनुष्य-रूप धारण करके हमें जन्म दे,

श्लोक 43 (devibhagavatam.2.3.43)

शंतनुर्नाम राजर्षिस्तस्य भार्या भवानघे । जाताञ्जाताञ्जले चास्मान्निक्षिपस्व सुरापगे

śaṁtanurnāma rājarṣistasya bhāryā bhavānaghe jātāñjātāñjale cāsmānnikṣipasva surāpage

हे निष्पाप! शन्तनु नाम का एक राजर्षि है, उसकी पत्नी बन। हे देवगामिनी! हम में से जो-जो जन्म लें, उन्हें तुरंत जल में डाल देना —

श्लोक 44 (devibhagavatam.2.3.44)

एवं शापविनिर्मोक्षो भविता नात्र संशयः । तथेत्युक्ताश्च ते सर्वे जग्मुर्लोकं स्वकं पुनः

evaṁ śāpavinirmokṣo bhavitā nātra saṁśayaḥ tathetyuktāśca te sarve jagmurlokaṁ svakaṁ punaḥ

इस प्रकार हमारी शाप से मुक्ति निश्चित रूप से हो जाएगी, इसमें कोई संदेह नहीं।' 'तथास्तु' कहकर वे सब पुनः अपने-अपने लोक को चले गए।

श्लोक 45 (devibhagavatam.2.3.45)

गंगाऽपि निर्गता देवी चिंत्यमाना पुनः पुनः । महाभिषो नृपो जातः प्रतीपस्य सुतस्तदा

gaṁgā'pi nirgatā devī ciṁtyamānā punaḥ punaḥ mahābhiṣo nṛpo jātaḥ pratīpasya sutastadā

देवी गंगा भी बार-बार यह विचार करती हुई वहाँ से चली गई। उसी समय राजा महाभिष प्रतीप के पुत्र रूप में जन्मे —

श्लोक 46 (devibhagavatam.2.3.46)

शंतनुर्नाम राजर्षिर्धर्मात्मा सत्यसंगरः । प्रतीपस्तु स्तुतिं चक्रे सूर्यस्यामिततेजसः

śaṁtanurnāma rājarṣirdharmātmā satyasaṁgaraḥ pratīpastu stutiṁ cakre sūryasyāmitatejasaḥ

शन्तनु नामक धर्मात्मा, सत्यप्रतिज्ञ राजर्षि के रूप में। प्रतीप ने अपार तेजस्वी सूर्य की स्तुति की थी (जिसके फलस्वरूप यह पुत्र प्राप्त हुआ)।

श्लोक 47 (devibhagavatam.2.3.47)

तदा च सलिलात्तस्मान्निःसृता वरवर्णिनी । दक्षिणं शालसंकाशमूरुं भेजे शुभानना

tadā ca salilāttasmānniḥsṛtā varavarṇinī dakṣiṇaṁ śālasaṁkāśamūruṁ bheje śubhānanā

तब उस जल से वह सुंदरी (गंगा) प्रकट हुई और शुभमुखी वह शाल वृक्ष के समान (सुदृढ़) राजा के दाहिने ऊरु (जंघा) पर आ बैठी।

श्लोक 48 (devibhagavatam.2.3.48)

अंके स्थितां स्त्रियं चाह मापृष्ट्वा किं वरानने । ममोरावास्थिताऽसि त्वं किमर्थं दक्षिणे शुभे

aṁke sthitāṁ striyaṁ cāha māpṛṣṭvā kiṁ varānane mamorāvāsthitā'si tvaṁ kimarthaṁ dakṣiṇe śubhe

अपनी गोद में बैठी उस स्त्री से राजा ने बिना कुछ पूछे कहा — 'हे वरानने! तू क्यों मेरी दाहिनी जंघा पर आकर बैठी है, हे शुभे?'

श्लोक 49 (devibhagavatam.2.3.49)

सा तमाह वरारोहा यदर्थं राजसत्तम । स्थिताऽस्म्यंके कुरुश्रेष्ठ कामयानां भजस्व माम्

sā tamāha varārohā yadarthaṁ rājasattama sthitā'smyaṁke kuruśreṣṭha kāmayānāṁ bhajasva mām

उस सुंदरी ने उससे कहा — 'हे राजश्रेष्ठ! जिस कारण मैं आपकी गोद में बैठी हूँ, हे कुरुश्रेष्ठ! मैं कामातुर होकर आई हूँ — मुझे स्वीकार कीजिए।'

श्लोक 50 (devibhagavatam.2.3.50)

तामवोचदथो राजा रूपयौवनशालिनीम् । नाहं परस्त्रियं कामाद्गच्छेयं वरवर्णिनीम्

tāmavocadatho rājā rūpayauvanaśālinīm nāhaṁ parastriyaṁ kāmādgaccheyaṁ varavarṇinīm

उस रूप-यौवन-संपन्न स्त्री से राजा ने कहा — 'हे वरवर्णिनी! मैं काम-वश किसी पराई स्त्री के पास नहीं जाऊँगा।

श्लोक 51 (devibhagavatam.2.3.51)

स्थिता दक्षिणमूरुं मे त्वमाश्लिष्य च भामिनि । अपत्यानां स्नुषाणां च स्थानं विद्धि शुचिस्मिते

sthitā dakṣiṇamūruṁ me tvamāśliṣya ca bhāmini apatyānāṁ snuṣāṇāṁ ca sthānaṁ viddhi śucismite

तू मेरी दाहिनी जंघा पर बैठी है और मुझे आलिंगन कर रही है, हे भामिनि — हे शुचिस्मिते! जान ले कि यह तो संतानों और पुत्रवधुओं का ही स्थान है।

श्लोक 52 (devibhagavatam.2.3.52)

स्नुषा मे भव कल्याणि जाते पुत्रेऽतिवाञ्छिते । भविष्यति च मे पुत्रस्तव पुण्यान्न संशयः

snuṣā me bhava kalyāṇi jāte putre'tivāñchite bhaviṣyati ca me putrastava puṇyānna saṁśayaḥ

हे कल्याणी! तू मेरी पुत्रवधू बन; वांछित पुत्र उत्पन्न होने पर, मेरा वह पुत्र निश्चय ही तेरे पुण्य से ही तुझे प्राप्त होगा, इसमें संदेह नहीं।'

श्लोक 53 (devibhagavatam.2.3.53)

तथेत्युक्ता गता सा वै कामिनी दिव्य दर्शना । राजा चापि गृहं प्राप्तश्चिंतयंस्तां स्त्रियं पुनः

tathetyuktā gatā sā vai kāminī divya darśanā rājā cāpi gṛhaṁ prāptaściṁtayaṁstāṁ striyaṁ punaḥ

'तथास्तु' कहकर वह दिव्यरूपिणी कामिनी चली गई; और राजा भी अपने घर लौट आया, बार-बार उस स्त्री का ही चिंतन करते हुए।

श्लोक 54 (devibhagavatam.2.3.54)

ततः कालेन कियता जाते पुत्रे वयस्विनि । वनं जिगमिषू राजा पुत्रं वृत्तांतमूचिवान्

tataḥ kālena kiyatā jāte putre vayasvini vanaṁ jigamiṣū rājā putraṁ vṛttāṁtamūcivān

कुछ समय पश्चात्, जब उसका पुत्र यौवन को प्राप्त हुआ, तब वन जाने का इच्छुक राजा ने पुत्र को वह सारा वृत्तांत सुनाया।

श्लोक 55 (devibhagavatam.2.3.55)

वृत्तांतं कथयित्वा तु पुनरूचे निजं सुतम् । यदि प्रयाति सा बाला त्वां वने चारुहासिनी

vṛttāṁtaṁ kathayitvā tu punarūce nijaṁ sutam yadi prayāti sā bālā tvāṁ vane cāruhāsinī

यह वृत्तांत कहकर उसने अपने पुत्र से पुनः कहा — 'यदि वन में वह सुहासिनी बालिका तेरे पास आए,

श्लोक 56 (devibhagavatam.2.3.56)

कामयाना वरारोहा ता भजेथा मनोरमाम् । न प्रष्टव्या त्वया काऽसि मन्नियोगान्नराधिप

kāmayānā varārohā tā bhajethā manoramām na praṣṭavyā tvayā kā'si manniyogānnarādhipa

कामनापूर्वक, तो हे नराधिप! तू उस सुंदरी और मनोहर स्त्री को स्वीकार कर लेना। मेरी आज्ञा से तुझे उससे यह नहीं पूछना कि तू कौन है।

श्लोक 57 (devibhagavatam.2.3.57)

धर्मपत्नीं च तां कृत्वा भविता त्वं सुखी किल । सूत उवाच । एवं संदिश्य तं पुत्रं भूपतिः प्रीतमानसः

dharmapatnīṁ ca tāṁ kṛtvā bhavitā tvaṁ sukhī kila sūta uvāca evaṁ saṁdiśya taṁ putraṁ bhūpatiḥ prītamānasaḥ

उसे धर्मपत्नी बनाकर तू निश्चय ही सुखी होगा।' सूत जी ने कहा — इस प्रकार अपने पुत्र को यह आदेश देकर वह प्रसन्नचित्त राजा,

श्लोक 58 (devibhagavatam.2.3.58)

दत्त्वा राज्यश्रियं सर्वां वनं राजा विवेश ह । तत्रापि च तपस्तप्त्वा समाराध्य परांबिकाम्

dattvā rājyaśriyaṁ sarvāṁ vanaṁ rājā viveśa ha tatrāpi ca tapastaptvā samārādhya parāṁbikām

अपना सम्पूर्ण राज्य-वैभव उसे सौंपकर वन में प्रवेश कर गया। वहाँ भी तप करके और परा अम्बिका की आराधना करके,

श्लोक 59 (devibhagavatam.2.3.59)

जगाम स्वर्गं राजाऽसौ देहं त्यक्त्वा स्वतेजसा । राज्यं प्राप महातेजाः शंतनुः सार्वभौमिकम्

jagāma svargaṁ rājā'sau dehaṁ tyaktvā svatejasā rājyaṁ prāpa mahātejāḥ śaṁtanuḥ sārvabhaumikam

वह राजा अपने ही तेज से शरीर त्यागकर स्वर्ग को चला गया। महातेजस्वी शन्तनु ने सार्वभौम राज्य प्राप्त किया,

श्लोक 60 (devibhagavatam.2.3.60)

प्रजां वै पालयामास धर्मदंडो महीपतिः

prajāṁ vai pālayāmāsa dharmadaṁḍo mahīpatiḥ

और धर्म को ही दण्ड मानने वाले उस राजा ने अपनी प्रजा का पालन किया।

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