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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2

ब्रह्मादि की गति का वर्णन

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (devibhagavatam.3.2.1)

व्यास उवाच । यत्त्वया च महाबाहो पृष्टोऽहं कुरुसत्तम । तान्प्रश्नान्नारदः प्राह मया पृष्टो मुनीश्वरः

vyāsa uvāca yattvayā ca mahābāho pṛṣṭo'haṁ kurusattama tānpraśnānnāradaḥ prāha mayā pṛṣṭo munīśvaraḥ

व्यास जी ने कहा — हे महाबाहो! हे कुरुसत्तम! आपने मुझसे जो प्रश्न पूछे, वही प्रश्न जब मैंने मुनीश्वर नारद से पूछे थे, तब उन्होंने मुझे बताए थे।

श्लोक 2 (devibhagavatam.3.2.2)

नारद उवाच । व्यास किं ते ब्रवीम्यद्य पुराऽयं संशयो मम । उत्पन्नो हृदयेऽत्यर्थं सन्देहासारपीडितः

nārada uvāca vyāsa kiṁ te bravīmyadya purā'yaṁ saṁśayo mama utpanno hṛdaye'tyarthaṁ sandehāsārapīḍitaḥ

नारद जी ने कहा — हे व्यास! आज मैं आपसे क्या कहूँ? पूर्वकाल में यही संशय मेरे हृदय में अत्यन्त उठा था और मैं संदेह की निःसार पीड़ा से व्याकुल था।

श्लोक 3 (devibhagavatam.3.2.3)

गत्वाऽहं पितरं स्थाने ब्रह्माणममितौजसम् । अपृच्छं यत्त्वया पृष्टं व्यासाद्य प्रश्नमुत्तमम्

gatvā'haṁ pitaraṁ sthāne brahmāṇamamitaujasam apṛcchaṁ yattvayā pṛṣṭaṁ vyāsādya praśnamuttamam

मैं अपरिमित तेजस्वी पिता ब्रह्मा के पास जाकर, हे व्यास! आज आपने जो उत्तम प्रश्न पूछा है, वही मैंने भी उनसे पूछा था।

श्लोक 4 (devibhagavatam.3.2.4)

पितः कुतः समुत्पन्नं ब्रह्माण्डमखिलं विभो । भवत्कृतेन वा सम्यक् किं वा विष्णुकृतं त्विदम्

pitaḥ kutaḥ samutpannaṁ brahmāṇḍamakhilaṁ vibho bhavatkṛtena vā samyak kiṁ vā viṣṇukṛtaṁ tvidam

हे पिता! हे विभो! यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कहाँ से उत्पन्न हुआ? क्या यह वास्तव में आपके द्वारा रचा गया है अथवा विष्णु द्वारा?

श्लोक 5 (devibhagavatam.3.2.5)

रुद्रकृतं वा विश्वात्मन् ब्रूहि सत्यं जगत्पते । आराधनीयः कः कामं सर्वोत्कृष्टश्च कः प्रभुः

rudrakṛtaṁ vā viśvātman brūhi satyaṁ jagatpate ārādhanīyaḥ kaḥ kāmaṁ sarvotkṛṣṭaśca kaḥ prabhuḥ

अथवा हे विश्वात्मन्! क्या यह रुद्र द्वारा रचा गया है? हे जगत्पते! सत्य बताइए। कौन उपासना के योग्य है और कौन सबसे श्रेष्ठ स्वामी है?

श्लोक 6 (devibhagavatam.3.2.6)

तत्सर्वं वद मे ब्रह्मन्सन्देहांश्छिन्धि चानघ । निमग्नो ह्यस्मि संसारे दुःखरूपेऽनृतोपमे

tatsarvaṁ vada me brahmansandehāṁśchindhi cānagha nimagno hyasmi saṁsāre duḥkharūpe'nṛtopame

हे ब्रह्मन्! हे निष्पाप! यह सब मुझे बताइए और मेरे संदेहों को दूर कीजिए। मैं दुःखरूपी और मिथ्या के समान इस संसार में डूबा हुआ हूँ।

श्लोक 7 (devibhagavatam.3.2.7)

सन्देहान्दोलितं चेतो न प्रशाम्यति कुत्रचित् । न तीर्थेषु न देवेषु साधनेष्वितरेषु च

sandehāndolitaṁ ceto na praśāmyati kutracit na tīrtheṣu na deveṣu sādhaneṣvitareṣu ca

संदेह से आन्दोलित मेरा चित्त कहीं भी शान्त नहीं होता — न तीर्थों में, न देवताओं में और न ही अन्य साधनों में।

श्लोक 8 (devibhagavatam.3.2.8)

अविज्ञाय परं तत्त्वं कुतः शान्तिः परन्तप । विकीर्णं बहुधा चित्तं नैकत्र स्थिरतां व्रजेत्

avijñāya paraṁ tattvaṁ kutaḥ śāntiḥ parantapa vikīrṇaṁ bahudhā cittaṁ naikatra sthiratāṁ vrajet

हे परन्तप! परम तत्त्व को जाने बिना शान्ति कहाँ से हो? अनेक दिशाओं में बिखरा हुआ चित्त किसी एक स्थान पर स्थिरता को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 9 (devibhagavatam.3.2.9)

कं स्मरामि यजे कं वा कं व्रजाम्यर्चयामि कम् । स्तौमि कं नाभिजानामि देव सर्वेश्वरेश्वरम्

kaṁ smarāmi yaje kaṁ vā kaṁ vrajāmyarcayāmi kam staumi kaṁ nābhijānāmi deva sarveśvareśvaram

किसका स्मरण करूँ, किसकी पूजा करूँ, किसके पास जाऊँ, किसका अर्चन करूँ, किसकी स्तुति करूँ — हे देव! मैं सर्वेश्वरों के ईश्वर को नहीं जानता।

श्लोक 10 (devibhagavatam.3.2.10)

ततो मां प्रत्युवाचेदं ब्रह्मा लोकपितामहः । मया सत्यवतीसूनो कृते प्रश्ने सुदुस्तरे

tato māṁ pratyuvācedaṁ brahmā lokapitāmahaḥ mayā satyavatīsūno kṛte praśne sudustare

हे सत्यवती-सुत! तब मेरे द्वारा यह अत्यन्त दुस्तर प्रश्न पूछे जाने पर लोकपितामह ब्रह्मा ने मुझे इस प्रकार उत्तर दिया।

श्लोक 11 (devibhagavatam.3.2.11)

ब्रह्मोवाच । किं ब्रवीमि सुताद्याहं दुर्बोधं प्रश्नमुत्तमम् । त्वयाशक्यं महाभाग विष्णोरपि सुनिश्चयात्

brahmovāca kiṁ bravīmi sutādyāhaṁ durbodhaṁ praśnamuttamam tvayāśakyaṁ mahābhāga viṣṇorapi suniścayāt

ब्रह्मा जी ने कहा — हे पुत्र! आज मैं तुम्हें क्या बताऊँ? यह श्रेष्ठ प्रश्न दुर्बोध है, हे महाभाग्यशाली! यह तुम्हारे लिए तो क्या, विष्णु के लिए भी सुनिश्चित रूप से जान पाना असम्भव है।

श्लोक 12 (devibhagavatam.3.2.12)

रागी कोऽपि न जानाति संसारेऽस्मिन्महामते । विरक्तश्च विजानाति निरीहो यो विमत्सरः

rāgī ko'pi na jānāti saṁsāre'sminmahāmate viraktaśca vijānāti nirīho yo vimatsaraḥ

हे महामते! इस संसार में कोई भी आसक्त व्यक्ति इसे नहीं जानता। जो विरक्त, निःस्पृह और ईर्ष्यारहित है, वही इसे जानता है।

श्लोक 13 (devibhagavatam.3.2.13)

एकार्णवे पुरा जाते नष्टे स्थावरजङ्गमे भूतमात्रे समुत्पन्ने सञ्जज्ञे कमलादहम्

ekārṇave purā jāte naṣṭe sthāvarajaṅgame bhūtamātre samutpanne sañjajñe kamalādaham

पूर्वकाल में जब एक ही समुद्र था, स्थावर-जंगम सब नष्ट हो चुका था और केवल सूक्ष्म तत्त्व-मात्र शेष रह गए थे, तब मैं कमल से उत्पन्न हुआ।

श्लोक 14 (devibhagavatam.3.2.14)

नापश्यं तरणिं सोमं न वृक्षान्न च पर्वतान् । कर्णिकायां समाविष्टश्चिन्तामकरवं तदा

nāpaśyaṁ taraṇiṁ somaṁ na vṛkṣānna ca parvatān karṇikāyāṁ samāviṣṭaścintāmakaravaṁ tadā

मुझे न सूर्य दिखा, न चन्द्रमा, न वृक्ष और न ही पर्वत। कमल की कर्णिका में बैठा हुआ मैं तब चिन्तामग्न हो गया।

श्लोक 15 (devibhagavatam.3.2.15)

कस्मादहं समुद्भूतः सलिलेऽस्मिन्महार्णवे । को मे त्राता प्रभुः कर्ता संहर्ता वा युगात्यये

kasmādahaṁ samudbhūtaḥ salile'sminmahārṇave ko me trātā prabhuḥ kartā saṁhartā vā yugātyaye

"इस महासमुद्र के जल में मैं किस कारण उत्पन्न हुआ? मेरा रक्षक, स्वामी, कर्ता अथवा युग के अन्त में संहारक कौन है?"

श्लोक 16 (devibhagavatam.3.2.16)

न च भूर्विद्यते स्पष्टा यदाधारं जलं त्विदम् । पङ्कजं कथमुत्पन्नं प्रसिद्धं रूढियोगयोः

na ca bhūrvidyate spaṣṭā yadādhāraṁ jalaṁ tvidam paṅkajaṁ kathamutpannaṁ prasiddhaṁ rūḍhiyogayoḥ

जिस जल का यह आधार है, वह पृथ्वी स्पष्ट दिखाई नहीं देती; फिर यह कमल — जो लोकरूढ़ि और व्युत्पत्ति दोनों से प्रसिद्ध है (अर्थात् कीचड़ से उत्पन्न) — कैसे उत्पन्न हुआ?

श्लोक 17 (devibhagavatam.3.2.17)

पश्याम्यद्यास्य पङ्कं तं मूलं वै पङ्कजस्य च । भविष्यति धरा तत्र मूलं नास्त्यत्र संशयः

paśyāmyadyāsya paṅkaṁ taṁ mūlaṁ vai paṅkajasya ca bhaviṣyati dharā tatra mūlaṁ nāstyatra saṁśayaḥ

"आज मैं इसके कीचड़ को, इस कमल की जड़ को देखूँगा; वहीं पृथ्वी होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।"

श्लोक 18 (devibhagavatam.3.2.18)

उत्तरन्सलिले तत्र यावद्वर्षसहस्रकम् । अन्वेषमाणो धरणीं नावाप तां यदा तदा

uttaransalile tatra yāvadvarṣasahasrakam anveṣamāṇo dharaṇīṁ nāvāpa tāṁ yadā tadā

वहाँ जल में एक हजार वर्ष तक डूबकर पृथ्वी की खोज करते हुए भी जब मैं उसे नहीं पा सका,

श्लोक 19 (devibhagavatam.3.2.19)

तपस्तपेति चाकाशे वागभूदशरीरिणी । ततो मया तपस्तप्तं पद्मे वर्षसहस्रकम्

tapastapeti cākāśe vāgabhūdaśarīriṇī tato mayā tapastaptaṁ padme varṣasahasrakam

तब आकाश से 'तप करो, तप करो' — यह अशरीरी वाणी सुनाई दी। तब मैंने कमल पर एक हजार वर्ष तक तप किया।

श्लोक 20 (devibhagavatam.3.2.20)

सृजेति पुनरुद्भूता वाणी तत्र श्रुता मया । विमूढोऽहं तदाकर्ण्य कं सृजामि करोमि किम्

sṛjeti punarudbhūtā vāṇī tatra śrutā mayā vimūḍho'haṁ tadākarṇya kaṁ sṛjāmi karomi kim

फिर वहाँ पुनः 'सृष्टि करो' — यह वाणी मैंने सुनी। उसे सुनकर मैं अत्यन्त मोहित हो गया — किसे रचूँ, क्या करूँ?

श्लोक 21 (devibhagavatam.3.2.21)

तदा दैत्यावपि प्राप्तौ दारुणौ मधुकैटभौ । ताभ्यां विभीषितश्चाहं युद्धाय मकरालये

tadā daityāvapi prāptau dāruṇau madhukaiṭabhau tābhyāṁ vibhīṣitaścāhaṁ yuddhāya makarālaye

तभी दो भयंकर दैत्य, मधु और कैटभ, वहाँ प्रकट हो गए। उनसे भयभीत होकर मैं युद्ध के लिए उस मकरालय (समुद्र) में चला गया।

श्लोक 22 (devibhagavatam.3.2.22)

ततोऽहं नालमालम्ब्य वारिमध्यमवातरम् । तदा तत्र मया दृष्टः पुरुषः परमाद्भुतः

tato'haṁ nālamālambya vārimadhyamavātaram tadā tatra mayā dṛṣṭaḥ puruṣaḥ paramādbhutaḥ

तब मैं कमल-नाल का सहारा लेकर जल के मध्य में उतरा; वहीं मैंने एक परम अद्भुत पुरुष को देखा।

श्लोक 23 (devibhagavatam.3.2.23)

मेघश्यामशरीरस्तु पीतवासाश्चतुर्भुजः । शेषशायी जगन्नाथो वनमालाविभूषितः

meghaśyāmaśarīrastu pītavāsāścaturbhujaḥ śeṣaśāyī jagannātho vanamālāvibhūṣitaḥ

वह मेघ के समान श्याम शरीर वाले, पीताम्बरधारी, चतुर्भुज, शेषशायी, वनमाला से विभूषित जगन्नाथ थे।

श्लोक 24 (devibhagavatam.3.2.24)

शङ्खचक्रगदापद्माद्यायुधैः सुविराजितः । तमद्राक्षं महाविष्णुं शेषपर्यङ्कशायिनम्

śaṅkhacakragadāpadmādyāyudhaiḥ suvirājitaḥ tamadrākṣaṁ mahāviṣṇuṁ śeṣaparyaṅkaśāyinam

वे शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि आयुधों से सुशोभित थे। मैंने उन महाविष्णु को शेष की शय्या पर लेटे हुए देखा,

श्लोक 25 (devibhagavatam.3.2.25)

योगनिद्रासमाक्रान्तमविस्पन्दिनमच्युतम् । शयानं तं समालोक्य भोगिभोगोपरि स्थितम्

yoganidrāsamākrāntamavispandinamacyutam śayānaṁ taṁ samālokya bhogibhogopari sthitam

योगनिद्रा से आक्रान्त, निश्चल तथा अच्युत — नागराज के शरीर पर स्थित उस शयनरत विष्णु को देखकर,

श्लोक 26 (devibhagavatam.3.2.26)

चिन्ता ममाद्भुता जाता किं करोमीति नारद । मया स्मृता तदा देवी स्तुता निद्रास्वरूपिणी

cintā mamādbhutā jātā kiṁ karomīti nārada mayā smṛtā tadā devī stutā nidrāsvarūpiṇī

हे नारद! मुझे अद्भुत चिन्ता हुई — 'मैं क्या करूँ?' तब मैंने निद्रा-स्वरूपिणी देवी का स्मरण कर उनकी स्तुति की।

श्लोक 27 (devibhagavatam.3.2.27)

देहान्निर्गत्य सा देवी गगने संस्थिता शिवा । अवितर्क्यशरीरा सा दिव्याभरणमण्डिता

dehānnirgatya sā devī gagane saṁsthitā śivā avitarkyaśarīrā sā divyābharaṇamaṇḍitā

वह मंगलमयी देवी उनके शरीर से निकलकर आकाश में स्थित हो गईं — उनका शरीर अकल्पनीय था, दिव्य आभूषणों से सुसज्जित।

श्लोक 28 (devibhagavatam.3.2.28)

विष्णोर्देहं विहायाशु विरराज नभःस्थिता । उदतिष्ठदमेयात्मा तया मुक्तो जनार्दनः

viṣṇordehaṁ vihāyāśu virarāja nabhaḥsthitā udatiṣṭhadameyātmā tayā mukto janārdanaḥ

विष्णु के शरीर को तुरन्त त्यागकर वे आकाश में स्थित होकर शोभायमान हुईं; उनके द्वारा मुक्त होकर अमेय आत्मा जनार्दन उठ खड़े हुए।

श्लोक 29 (devibhagavatam.3.2.29)

पञ्चवर्षसहस्राणि कृतवान् युद्धमुत्तमम् । तदा विलोकितौ दैत्यौ हरिणा विनिपातितौ

pañcavarṣasahasrāṇi kṛtavān yuddhamuttamam tadā vilokitau daityau hariṇā vinipātitau

उन्होंने पाँच हजार वर्षों तक श्रेष्ठ युद्ध किया; तब उन दोनों दैत्यों को देखकर हरि ने उन्हें मार गिराया।

श्लोक 30 (devibhagavatam.3.2.30)

उत्सङ्गं विमलं कृत्वा तत्रैव निहतौ च तौ । रुद्रस्तत्रैव सम्प्राप्तो यत्रावां संस्थितावुभौ

utsaṅgaṁ vimalaṁ kṛtvā tatraiva nihatau ca tau rudrastatraiva samprāpto yatrāvāṁ saṁsthitāvubhau

अपनी गोद को निर्मल करके उन्होंने उन दोनों को वहीं मार डाला; और जहाँ हम दोनों (मैं और विष्णु) खड़े थे, वहीं रुद्र भी आ पहुँचे।

श्लोक 31 (devibhagavatam.3.2.31)

त्रिभिः संवीक्षितास्मामिः स्वस्था देवी मनोहरा । संस्तुता परमा शक्तिरुवाचास्मानवस्थितान्

tribhiḥ saṁvīkṣitāsmāmiḥ svasthā devī manoharā saṁstutā paramā śaktiruvācāsmānavasthitān

हम तीनों के देखते-देखते वह स्वस्थ और मनोहर देवी, वह परम शक्ति, स्तुति की जाकर हम खड़े हुओं से बोलीं।

श्लोक 32 (devibhagavatam.3.2.32)

कृपावलोकनैः कृत्वा पावनैर्मुदितानथ । देव्युवाच । काजेशाः स्वानि कार्याणि कुरुध्वं समतन्द्रिताः

kṛpāvalokanaiḥ kṛtvā pāvanairmuditānatha devyuvāca kājeśāḥ svāni kāryāṇi kurudhvaṁ samatandritāḥ

पवित्र, कृपादृष्टि से हमें प्रसन्न करके देवी बोलीं — 'हे स्वामियो! अपने-अपने कार्य तत्परतापूर्वक करो।

श्लोक 33 (devibhagavatam.3.2.33)

सृष्टिस्थितिविशिष्टानि हतावेतौ महासुरौ । कृत्वा स्वानि निकेतानि वसध्वं विगतज्वराः

sṛṣṭisthitiviśiṣṭāni hatāvetau mahāsurau kṛtvā svāni niketāni vasadhvaṁ vigatajvarāḥ

सृष्टि और स्थिति के विशिष्ट कार्य — ये दोनों महादैत्य मारे जा चुके हैं। अपने-अपने निवास बनाकर संतापरहित होकर निवास करो।

श्लोक 34 (devibhagavatam.3.2.34)

प्रजाश्चतुर्विधाः सर्वाः सृजध्वं स्वविभूतिभिः । ब्रह्मोवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः पेशलं सुखदं मृदु

prajāścaturvidhāḥ sarvāḥ sṛjadhvaṁ svavibhūtibhiḥ brahmovāca tacchrutvā vacanaṁ tasyāḥ peśalaṁ sukhadaṁ mṛdu

अपनी-अपनी विभूतियों से सभी चार प्रकार की प्रजाओं की रचना करो।' ब्रह्मा जी ने कहा — उनके इस मधुर, सुखद और कोमल वचन को सुनकर,

श्लोक 35 (devibhagavatam.3.2.35)

अब्रूम तामशक्तिः स्मः कथं कुर्मस्त्विमाः प्रजाः । न मही वितता मातः सर्वत्र विततं जलम्

abrūma tāmaśaktiḥ smaḥ kathaṁ kurmastvimāḥ prajāḥ na mahī vitatā mātaḥ sarvatra vitataṁ jalam

हमने उनसे कहा — 'हम असमर्थ हैं, हम इन प्रजाओं की रचना कैसे करें? हे माता! पृथ्वी कहीं विस्तृत नहीं है, सर्वत्र केवल जल ही व्याप्त है।

श्लोक 36 (devibhagavatam.3.2.36)

न भूतानि गुणाश्चापि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । तदाकर्ण्य वचोऽस्माकं शिवा जाता स्मितानना

na bhūtāni guṇāścāpi tanmātrāṇīndriyāṇi ca tadākarṇya vaco'smākaṁ śivā jātā smitānanā

न महाभूत हैं, न गुण, न तन्मात्राएँ और न ही इन्द्रियाँ हैं।' हमारे इस वचन को सुनकर मंगलमयी देवी मुस्कुरा उठीं।

श्लोक 37 (devibhagavatam.3.2.37)

झटित्येवागतं तत्र विमानं गगनाच्छुभम् । सोवाचास्मिन्सुराः कामं विशध्वं गतसाध्वसाः

jhaṭityevāgataṁ tatra vimānaṁ gaganācchubham sovācāsminsurāḥ kāmaṁ viśadhvaṁ gatasādhvasāḥ

और उसी क्षण आकाश से एक सुन्दर विमान वहाँ आ पहुँचा। उन्होंने कहा — 'हे देवगण! भय त्यागकर इच्छानुसार इसमें प्रवेश करो।

श्लोक 38 (devibhagavatam.3.2.38)

विमाने ब्रह्मविष्ण्वीशा दर्शयाम्यद्य चाद्भुतम् । तन्निशम्य वचस्तस्या ओमित्युक्त्वा पुनर्वयम्

vimāne brahmaviṣṇvīśā darśayāmyadya cādbhutam tanniśamya vacastasyā omityuktvā punarvayam

इस विमान में, हे ब्रह्मा, विष्णु, शिव! मैं आज तुम्हें एक अद्भुत वस्तु दिखाऊँगी।' उनके इस वचन को सुनकर 'ॐ' कहकर हम पुनः —

श्लोक 39 (devibhagavatam.3.2.39)

समारुह्योपविष्टाः स्मो विमाने रत्नमण्डिते । मुक्तादामसुसंवीते किङ्किणीजालशब्दिते

samāruhyopaviṣṭāḥ smo vimāne ratnamaṇḍite muktādāmasusaṁvīte kiṅkiṇījālaśabdite

— रत्नजड़ित, मोतियों की झालरों से आवृत तथा घंटियों के समूह से गूँजते हुए उस विमान पर चढ़कर बैठ गए,

श्लोक 40 (devibhagavatam.3.2.40)

सुरसद्मनिभे रम्ये त्रयस्तत्राविशङ्किताः । सोपविष्टांस्ततो दृष्ट्वा देव्यस्मान्विजितेन्द्रियान्

surasadmanibhe ramye trayastatrāviśaṅkitāḥ sopaviṣṭāṁstato dṛṣṭvā devyasmānvijitendriyān

जो देवलोक के समान रमणीय था। हम तीनों वहाँ निर्भय होकर बैठ गए। तब हम इन्द्रियजित तीनों को बैठा देखकर देवी ने —

श्लोक 41 (devibhagavatam.3.2.41)

स्वशक्त्या तद्विमानं वै नोदयामास चाम्बरे

svaśaktyā tadvimānaṁ vai nodayāmāsa cāmbare

अपनी शक्ति से उस विमान को आकाश में उठा दिया।

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