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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4

विष्णुकृत देवीस्तोत्र

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (devibhagavatam.3.4.1)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः पुनराह जनार्दनः । वयं गच्छेम पार्श्वेऽस्याः प्रणमन्तः पुनः पुनः

brahmovāca ityuktvā bhagavānviṣṇuḥ punarāha janārdanaḥ vayaṁ gacchema pārśve'syāḥ praṇamantaḥ punaḥ punaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — यह कहकर भगवान् विष्णु जनार्दन ने पुनः कहा — 'हम बार-बार प्रणाम करते हुए इनके पास चलें।'

श्लोक 2 (devibhagavatam.3.4.2)

सेयं वरा महामाया दास्यत्येषा वरान् हि नः । स्तुवामः सन्निधिं प्राप्य निर्भयाश्चरणान्तिके

seyaṁ varā mahāmāyā dāsyatyeṣā varān hi naḥ stuvāmaḥ sannidhiṁ prāpya nirbhayāścaraṇāntike

'यह श्रेष्ठ महामाया अवश्य हमें वर देंगी; इनकी समीपता पाकर निर्भय होकर इनके चरणों के पास हम स्तुति करें।'

श्लोक 3 (devibhagavatam.3.4.3)

यदि नो वारयिष्यन्ति द्वारस्थाः परिचारकाः । पठिष्यामश्च तत्रस्थाः स्तुतिं देव्याः समाहिताः

yadi no vārayiṣyanti dvārasthāḥ paricārakāḥ paṭhiṣyāmaśca tatrasthāḥ stutiṁ devyāḥ samāhitāḥ

'यदि द्वार पर खड़े परिचारक हमें रोकेंगे, तो हम वहीं खड़े होकर एकाग्रचित्त होकर देवी की स्तुति का पाठ करेंगे।'

श्लोक 4 (devibhagavatam.3.4.4)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्ते हरिणा वाक्ये सुप्रहृष्टौ सुसंस्थितौ । जातौ प्रमुदितौ कामं निकटे गमनाय च

brahmovāca ityukte hariṇā vākye suprahṛṣṭau susaṁsthitau jātau pramuditau kāmaṁ nikaṭe gamanāya ca

ब्रह्मा जी ने कहा — हरि के यह वचन कहने पर हम दोनों अत्यन्त प्रसन्न और स्थिर हो गए, तथा निकट जाने के लिए अत्यन्त हर्षित हुए।

श्लोक 5 (devibhagavatam.3.4.5)

ओमित्युक्त्वा हरिं सर्वे विमानात्त्वरितास्त्रयः । उत्तीर्य निर्गता द्वारि शङ्कमाना मनस्यलम्

omityuktvā hariṁ sarve vimānāttvaritāstrayaḥ uttīrya nirgatā dvāri śaṅkamānā manasyalam

'ॐ' कहकर हम तीनों शीघ्रता से विमान से उतरे और मन में आशंकित होते हुए द्वार पर आ पहुँचे।

श्लोक 6 (devibhagavatam.3.4.6)

द्वारस्थान् वीक्ष्य तान्सर्वान्देवी भगवती तदा । स्मितं कृत्वा चकाराशु तांस्त्रीन्स्त्रीरूपधारिणः

dvārasthān vīkṣya tānsarvāndevī bhagavatī tadā smitaṁ kṛtvā cakārāśu tāṁstrīnstrīrūpadhāriṇaḥ

द्वार पर खड़े हुए हम सबको देखकर भगवती देवी ने मुस्कुराते हुए तुरन्त हम तीनों को स्त्री-रूपधारी बना दिया।

श्लोक 7 (devibhagavatam.3.4.7)

वयं युवतयो जाताः सुरूपाश्चारुभूषणाः । विस्मयै परमं प्राप्ता गतास्तत्सन्निधिं पुनः

vayaṁ yuvatayo jātāḥ surūpāścārubhūṣaṇāḥ vismayai paramaṁ prāptā gatāstatsannidhiṁ punaḥ

हम सुन्दर रूप और मनोहर आभूषणों वाली युवतियाँ बन गए; परम विस्मय को प्राप्त होकर हम पुनः उनके समीप गए।

श्लोक 8 (devibhagavatam.3.4.8)

सा दृष्ट्वा नः स्थितांस्तत्र स्त्रीरूपांश्चरणान्तिके । व्यलोकयत चार्वङ्गी प्रेमसम्पूर्णया दृशा

sā dṛṣṭvā naḥ sthitāṁstatra strīrūpāṁścaraṇāntike vyalokayata cārvaṅgī premasampūrṇayā dṛśā

उन्हें चरणों के समीप स्त्री-रूप में खड़े देखकर उस सुन्दरांगी ने प्रेम से परिपूर्ण दृष्टि से हमें देखा।

श्लोक 9 (devibhagavatam.3.4.9)

प्रणम्य तां महादेवीं पुरतः संस्थिता वयम् । परस्परं लोकयन्तः स्त्रीरूपाश्चारुभूषणाः

praṇamya tāṁ mahādevīṁ purataḥ saṁsthitā vayam parasparaṁ lokayantaḥ strīrūpāścārubhūṣaṇāḥ

उस महादेवी को प्रणाम करके हम स्त्री-रूप और सुन्दर आभूषणों में उनके सामने एक-दूसरे को देखते हुए खड़े रहे।

श्लोक 10 (devibhagavatam.3.4.10)

पादपीठं प्रेक्षमाणा नानामणिविभूषितम् । सूर्यकोटिप्रतीकाशं स्थितास्तत्र वयं त्रयः

pādapīṭhaṁ prekṣamāṇā nānāmaṇivibhūṣitam sūryakoṭipratīkāśaṁ sthitāstatra vayaṁ trayaḥ

हम तीनों वहाँ खड़े होकर नाना मणियों से सुशोभित, करोड़ों सूर्यों के समान देदीप्यमान उनके पादपीठ को देखते रहे।

श्लोक 11 (devibhagavatam.3.4.11)

काश्चिद्रक्ताम्बरास्तत्र सहचर्यः सहस्रशः । काश्चिन्नीलाम्बरा नार्यस्तथा पीताम्बराः शुभाः

kāścidraktāmbarāstatra sahacaryaḥ sahasraśaḥ kāścinnīlāmbarā nāryastathā pītāmbarāḥ śubhāḥ

वहाँ हजारों सहचरियों में से कुछ लाल वस्त्र पहने थीं, कुछ नील वस्त्र वाली स्त्रियाँ तथा कुछ शुभ पीत वस्त्र वाली थीं।

श्लोक 12 (devibhagavatam.3.4.12)

देव्यः सर्वाः शुभाकारा विचित्राम्बरभूषणाः । विरेजुः पार्श्वतस्तस्याः परिचर्यापराः किल

devyaḥ sarvāḥ śubhākārā vicitrāmbarabhūṣaṇāḥ virejuḥ pārśvatastasyāḥ paricaryāparāḥ kila

सभी देवियाँ शुभ रूप वाली, विचित्र वस्त्रों और आभूषणों से युक्त थीं तथा उनकी सेवा में तत्पर उनके पार्श्व में शोभायमान हो रही थीं।

श्लोक 13 (devibhagavatam.3.4.13)

जगुश्च ननृतुश्चान्याः पर्युपासन्त ताः स्त्रियः । वीणामारुतवाद्यानि वादयन्तो मुदान्विताः

jaguśca nanṛtuścānyāḥ paryupāsanta tāḥ striyaḥ vīṇāmārutavādyāni vādayanto mudānvitāḥ

उनमें से कुछ स्त्रियाँ गा रही थीं, कुछ नाच रही थीं और अन्य उनकी उपासना में लगी हुई, हर्षपूर्वक वीणा और वायु-वाद्य बजा रही थीं।

श्लोक 14 (devibhagavatam.3.4.14)

शृणु नारद वक्ष्यामि यद्दृष्टं तत्र चाद्भुतम् । नखदर्पणमध्ये वै देव्याश्चरणपङ्कजे

śṛṇu nārada vakṣyāmi yaddṛṣṭaṁ tatra cādbhutam nakhadarpaṇamadhye vai devyāścaraṇapaṅkaje

हे नारद! सुनो, मैं वह अद्भुत बात बताता हूँ जो मैंने वहाँ देखी — देवी के दर्पण-सदृश नखयुक्त चरण-कमल के मध्य में —

श्लोक 15 (devibhagavatam.3.4.15)

ब्रह्माण्डमखिलं सर्वं तत्र स्थावरजङ्गमम् । अहं विष्णुश्च रुद्रश्च वायुरग्निर्यमो रविः

brahmāṇḍamakhilaṁ sarvaṁ tatra sthāvarajaṅgamam ahaṁ viṣṇuśca rudraśca vāyuragniryamo raviḥ

समस्त स्थावर-जंगम सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड — मैं, विष्णु, रुद्र, वायु, अग्नि, यम, सूर्य,

श्लोक 16 (devibhagavatam.3.4.16)

वरुणः शीतगुस्त्वष्टा कुबेरः पाकशासनः । पर्वताः सागरा नद्यो गन्धर्वाप्सरसस्तथा

varuṇaḥ śītagustvaṣṭā kuberaḥ pākaśāsanaḥ parvatāḥ sāgarā nadyo gandharvāpsarasastathā

वरुण, शीतल किरणों वाले चन्द्रमा, त्वष्टा, कुबेर, इन्द्र, पर्वत, समुद्र, नदियाँ तथा गन्धर्व-अप्सराएँ —

श्लोक 17 (devibhagavatam.3.4.17)

विश्वावसुश्चित्रकेतुः श्वेतश्चित्राङ्गदस्तथा । नारदस्तुम्बुरुश्चैव हाहाहूहूस्तथैव च

viśvāvasuścitraketuḥ śvetaścitrāṅgadastathā nāradastumburuścaiva hāhāhūhūstathaiva ca

विश्वावसु, चित्रकेतु, श्वेत, चित्रांगद, नारद और तुम्बुरु, तथा हाहा और हूहू भी —

श्लोक 18 (devibhagavatam.3.4.18)

अश्विनौ वसवः साध्याः सिद्धाश्च पितरस्तथा । नागाः शेषादयः सर्वे किन्नरोरगराक्षसाः

aśvinau vasavaḥ sādhyāḥ siddhāśca pitarastathā nāgāḥ śeṣādayaḥ sarve kinnaroragarākṣasāḥ

दोनों अश्विनीकुमार, वसुगण, साध्यगण, सिद्धगण तथा पितरगण, शेष आदि समस्त नाग, किन्नर, सर्प और राक्षस —

श्लोक 19 (devibhagavatam.3.4.19)

वैकुण्ठो ब्रह्मलोकश्च कैलासः पर्वतोत्तमः । सर्वं तदखिलं दृष्टं नखमध्यस्थितं च नः

vaikuṇṭho brahmalokaśca kailāsaḥ parvatottamaḥ sarvaṁ tadakhilaṁ dṛṣṭaṁ nakhamadhyasthitaṁ ca naḥ

वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक तथा श्रेष्ठ पर्वत कैलास — यह सब कुछ हमने उनके नख के भीतर स्थित देखा।

श्लोक 20 (devibhagavatam.3.4.20)

मज्जन्मपङ्कजं तत्र स्थितोऽहं चतुराननः । शेषशायी जगन्नाथस्तथा च मधुकैटभौ

majjanmapaṅkajaṁ tatra sthito'haṁ caturānanaḥ śeṣaśāyī jagannāthastathā ca madhukaiṭabhau

मेरे जन्म का कमल भी वहीं था, और उस पर चतुर्मुख होकर मैं स्वयं स्थित था; तथा शेषशायी जगन्नाथ और मधु-कैटभ भी वहाँ थे।

श्लोक 21 (devibhagavatam.3.4.21)

ब्रह्मोवाच । एवं दृष्टं मया तत्र पादपद्मनखे स्थितम् । विस्मतोऽहं ततो वीक्ष्य किमेतदिति शङ्कितः

brahmovāca evaṁ dṛṣṭaṁ mayā tatra pādapadmanakhe sthitam vismato'haṁ tato vīkṣya kimetaditi śaṅkitaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — इस प्रकार मैंने वहाँ चरण-कमल के नख में स्थित यह सब देखा। इसे देखकर विस्मित होकर मैंने सोचा — 'यह क्या है?'

श्लोक 22 (devibhagavatam.3.4.22)

विष्णुश्च विस्मयाविष्टः शङ्करश्च तथा स्थितः । तां तदा मेनिरे देवीं वयं विश्वस्य मातरम्

viṣṇuśca vismayāviṣṭaḥ śaṅkaraśca tathā sthitaḥ tāṁ tadā menire devīṁ vayaṁ viśvasya mātaram

विष्णु भी विस्मय से भर गए और शंकर भी उसी प्रकार स्थित थे। तब हमने उस देवी को विश्व की माता के रूप में जान लिया।

श्लोक 23 (devibhagavatam.3.4.23)

ततो वर्षशतं पूर्णं व्यतिक्रान्तं प्रपश्यतः । सुधामये शिवे द्वीपे विहारं विविधं तदा

tato varṣaśataṁ pūrṇaṁ vyatikrāntaṁ prapaśyataḥ sudhāmaye śive dvīpe vihāraṁ vividhaṁ tadā

इसके पश्चात् उस अमृतमय मंगलमय द्वीप पर विविध क्रीड़ाएँ देखते-देखते पूरे सौ वर्ष व्यतीत हो गए।

श्लोक 24 (devibhagavatam.3.4.24)

सख्य इव तदा तत्र मेनिरेऽस्मानवस्थितान् । देव्यः प्रमुदिताकारा नानाभरणमण्डिताः

sakhya iva tadā tatra menire'smānavasthitān devyaḥ pramuditākārā nānābharaṇamaṇḍitāḥ

प्रसन्न आकृति वाली, नाना आभूषणों से सुशोभित उन देवियों ने वहाँ स्थित हम तीनों को मानो अपनी सखियाँ ही मान लिया।

श्लोक 25 (devibhagavatam.3.4.25)

वयमप्यतिरम्यत्वाद्बभूविम विमोहिताः । प्रहृष्टमनसः सर्वे पश्यन्भावान्मनोरमान्

vayamapyatiramyatvādbabhūvima vimohitāḥ prahṛṣṭamanasaḥ sarve paśyanbhāvānmanoramān

उस स्थान की अत्यन्त रमणीयता से हम भी मोहित हो गए और उन मनोहर दृश्यों को देखते हुए सभी अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गए।

श्लोक 26 (devibhagavatam.3.4.26)

एकदा तां महादेवीं देवीं श्रीभुवनेश्वरीम् । तुष्टाव भगवान्विष्णुर्युवतीभावसंस्थितः

ekadā tāṁ mahādevīṁ devīṁ śrībhuvaneśvarīm tuṣṭāva bhagavānviṣṇuryuvatībhāvasaṁsthitaḥ

एक बार युवती-रूप में स्थित भगवान् विष्णु ने उस महादेवी श्रीभुवनेश्वरी की स्तुति की।

श्लोक 27 (devibhagavatam.3.4.27)

श्रीभगवानुवाच । नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नमः । कल्याणै कामदायै च वृद्।ह्ध्यै सिद्।ह्ध्यै नमो नमः

śrībhagavānuvāca namo devyai prakṛtyai ca vidhātryai satataṁ namaḥ kalyāṇai kāmadāyai ca vṛd|hdhyai sid|hdhyai namo namaḥ

श्रीभगवान् ने कहा — 'देवी को नमस्कार, प्रकृति को नमस्कार, विधात्री को सदा नमस्कार; कल्याणकारिणी, कामनाओं को देने वाली, वृद्धि तथा सिद्धि को बार-बार नमस्कार।

श्लोक 28 (devibhagavatam.3.4.28)

सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणये नमः । पञ्चकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नमः

saccidānandarūpiṇyai saṁsārāraṇaye namaḥ pañcakṛtyavidhātryai te bhuvaneśyai namo namaḥ

सच्चिदानन्दस्वरूपिणी को, संसाररूपी वन को (भस्म करने वाली अग्नि) को नमस्कार; पाँच कृत्यों की विधायिनी, हे भुवनेशी! तुम्हें बार-बार नमस्कार।

श्लोक 29 (devibhagavatam.3.4.29)

सर्वाधिष्टानरूपायै कूटस्थायै नमो नमः । अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नमः

sarvādhiṣṭānarūpāyai kūṭasthāyai namo namaḥ ardhamātrārthabhūtāyai hṛllekhāyai namo namaḥ

सबके आधार-स्वरूपा, कूटस्थ को बार-बार नमस्कार; अर्धमात्रा के अर्थस्वरूपा हृल्लेखा को बार-बार नमस्कार।

श्लोक 30 (devibhagavatam.3.4.30)

ज्ञातं मयाऽखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं त्वत्तोऽस्य सम्भवलयावपि मातरद्य । शक्तिश्च तेऽस्य करणे विततप्रभावा ज्ञाताऽधुना सकललोकमयीति नूनम्

jñātaṁ mayā'khilamidaṁ tvayi sanniviṣṭaṁ tvatto'sya sambhavalayāvapi mātaradya śaktiśca te'sya karaṇe vitataprabhāvā jñātā'dhunā sakalalokamayīti nūnam

मैंने आज जान लिया कि यह सम्पूर्ण जगत् तुम्हारे भीतर ही स्थित है; इसकी उत्पत्ति और प्रलय भी तुमसे ही होते हैं, हे माता! और इसे रचने में तुम्हारी अत्यन्त प्रभावशाली शक्ति ही अब सम्पूर्ण लोकमयी जानी गई है।

श्लोक 31 (devibhagavatam.3.4.31)

विस्तार्य सर्वमखिलं सदसद्विकारं सन्दर्शयस्यविकलं पुरुषाय काले । तत्त्वैश्च षोडशभिरेव च सप्तभिश्च भासीन्द्रजालमिव नः किल रञ्जनाय

vistārya sarvamakhilaṁ sadasadvikāraṁ sandarśayasyavikalaṁ puruṣāya kāle tattvaiśca ṣoḍaśabhireva ca saptabhiśca bhāsīndrajālamiva naḥ kila rañjanāya

सत् और असत् के इस समस्त विकार को विस्तृत करके तुम पुरुष के लिए काल में इसे सम्पूर्ण रूप से दिखाती हो; सोलह तथा सात तत्त्वों द्वारा तुम हमारे मनोरंजन के लिए मानो इन्द्रजाल के समान प्रकाशित होती हो।

श्लोक 32 (devibhagavatam.3.4.32)

न त्वामृते किमपि वस्तुगतं विभाति व्याप्यैव सर्वमखिलं त्वमवस्थिताऽसि । शक्तिं विना व्यवहृतो पुरुषोऽप्यशक्तो वम्भण्यते जननि बुद्धिमता जनेन

na tvāmṛte kimapi vastugataṁ vibhāti vyāpyaiva sarvamakhilaṁ tvamavasthitā'si śaktiṁ vinā vyavahṛto puruṣo'pyaśakto vambhaṇyate janani buddhimatā janena

तुम्हारे बिना कोई भी वस्तु प्रकट नहीं होती; तुम ही सब कुछ व्याप्त करके स्थित हो। शक्ति के बिना पुरुष, चाहे व्यवहार में लगा हो, भी बुद्धिमान् लोगों द्वारा असमर्थ कहा जाता है, हे माता!

श्लोक 33 (devibhagavatam.3.4.33)

प्रीणासि विश्वमखिलं सततं प्रभावैः स्वैस्तेजसा च सकलं प्रकटीकरोषि । अत्स्येव देवि तरसा किल कल्पकाले को वेद देवि चरितं तव वै भवस्य

prīṇāsi viśvamakhilaṁ satataṁ prabhāvaiḥ svaistejasā ca sakalaṁ prakaṭīkaroṣi atsyeva devi tarasā kila kalpakāle ko veda devi caritaṁ tava vai bhavasya

तुम अपने प्रभावों से सदा सम्पूर्ण विश्व को प्रसन्न करती हो और अपने तेज से सब कुछ प्रकट करती हो। हे देवी! प्रलयकाल में तुम मानो वेगपूर्वक इसे निगल जाती हो — हे देवी! तुम्हारा और शिव का यह चरित्र कौन जानता है?

श्लोक 34 (devibhagavatam.3.4.34)

त्राता वयं जननि ते मधुकैटभाभ्यां लोकाश्च ते सुवितताः खलु दर्शिता वै । नीताः सुखस्य भवने परमां च कोटिं यद्दर्शनं तव भवानि महाप्रभावम्

trātā vayaṁ janani te madhukaiṭabhābhyāṁ lokāśca te suvitatāḥ khalu darśitā vai nītāḥ sukhasya bhavane paramāṁ ca koṭiṁ yaddarśanaṁ tava bhavāni mahāprabhāvam

हे माता! मधु और कैटभ से तुमने हमारी रक्षा की, और तुम्हारे विस्तृत लोकों को हमें दिखाया गया; हमें सुख के भवन की परम सीमा तक पहुँचाया गया — तुम्हारा यह दर्शन, हे भवानी! अत्यन्त प्रभावशाली है।

श्लोक 35 (devibhagavatam.3.4.35)

नाहं भवो न च विरिञ्चि विवेद मातः कोऽन्यो हि वेत्ति चरितं तव दुर्विभाव्यम् । कानीह सन्ति भुवनानि महाप्रभावे ह्यस्मिन्भवानि रचिते रचनाकलापे

nāhaṁ bhavo na ca viriñci viveda mātaḥ ko'nyo hi vetti caritaṁ tava durvibhāvyam kānīha santi bhuvanāni mahāprabhāve hyasminbhavāni racite racanākalāpe

हे माता! न मैं, न शिव और न ब्रह्मा तुम्हें जानते हैं — फिर तुम्हारा दुर्बोध चरित्र और कौन जान सकता है? हे परम प्रभावशालिनी भवानी! तुम्हारे इस रचना-विन्यास में कितने लोक हैं?

श्लोक 36 (devibhagavatam.3.4.36)

अस्माभिरत्र भुवने हरिरन्य एव दृष्टः शिवः कमलजः प्रथितप्रभावः । अन्येषु देवि भुवनेपु न सन्ति किं ते किं विद्म देवि विततं तव सुप्रभावम्

asmābhiratra bhuvane hariranya eva dṛṣṭaḥ śivaḥ kamalajaḥ prathitaprabhāvaḥ anyeṣu devi bhuvanepu na santi kiṁ te kiṁ vidma devi vitataṁ tava suprabhāvam

इस लोक में हमने एक अन्य हरि, अन्य शिव और विख्यात प्रभाव वाले अन्य कमलजन्मा ब्रह्मा को देखा है — क्या अन्य लोकों में भी वैसे नहीं हैं, हे देवी? हम तुम्हारे विस्तृत सुप्रभाव को क्या जानें, हे देवी?

श्लोक 37 (devibhagavatam.3.4.37)

याचेऽम्ब तेऽङ्घ्रिकमलं प्रणिपत्य कामं चित्ते सदा वसतु रूपमिदं तवैतत् । नामापि वक्त्रकुहरे सततं तवैव सन्दर्शनं तव पदाम्बुजयोः सदैव

yāce'mba te'ṅghrikamalaṁ praṇipatya kāmaṁ citte sadā vasatu rūpamidaṁ tavaitat nāmāpi vaktrakuhare satataṁ tavaiva sandarśanaṁ tava padāmbujayoḥ sadaiva

हे माता! प्रणाम करके मैं तुम्हारे चरण-कमल से यही याचना करता हूँ — तुम्हारा यह रूप सदा मेरे चित्त में बसा रहे, तुम्हारा नाम भी सदा मेरे मुख में रहे, और तुम्हारे चरण-कमलों का दर्शन मुझे सदा प्राप्त होता रहे।

श्लोक 38 (devibhagavatam.3.4.38)

भृत्योऽयमस्ति सततं मयि भावनीयं त्वां स्वामिनीति मनसा ननु चिन्तयामि । एषाऽऽवयोरविरता किल देवि भूयाद्व्याप्तिः सदैव जननी सुतयोरिवार्थे

bhṛtyo'yamasti satataṁ mayi bhāvanīyaṁ tvāṁ svāminīti manasā nanu cintayāmi eṣā''vayoraviratā kila devi bhūyādvyāptiḥ sadaiva jananī sutayorivārthe

यह सेवक सदा तुम्हारा ही चिन्तन करने योग्य है; मैं मन से निश्चय ही तुम्हें अपनी स्वामिनी मानकर सोचता हूँ। हे देवी! हम दोनों के बीच यह अखण्ड सम्बन्ध सदा बना रहे — जैसे माता और पुत्र के बीच होता है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.3.4.39)

त्वं वेत्सि सर्वमखिलं भुवनप्रपञ्चं सर्वज्ञता परिसमाप्तिनितान्तभूमिः । किं पामरेण जगदम्ब निवेदनीयं यद्युक्तमाचर भवानि तवेङ्गितं स्यात्

tvaṁ vetsi sarvamakhilaṁ bhuvanaprapañcaṁ sarvajñatā parisamāptinitāntabhūmiḥ kiṁ pāmareṇa jagadamba nivedanīyaṁ yadyuktamācara bhavāni taveṅgitaṁ syāt

तुम इस सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच को पूर्ण रूप से जानती हो; तुम सर्वज्ञता की परम पूर्ण भूमि हो। हे जगदम्बा! मुझ पामर को तुमसे क्या निवेदन करना है? जो उचित हो वही करो, हे भवानी! तुम्हारी जैसी इच्छा हो।

श्लोक 40 (devibhagavatam.3.4.40)

ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरुमापतिश्च संहारकारक इयं तु जने प्रसिद्धिः । किं सत्यमेतदपि देवि तवेच्छया वै कर्तुं क्षमा वयमजे तव शक्तियुक्ताः

brahmā sṛjatyavati viṣṇurumāpatiśca saṁhārakāraka iyaṁ tu jane prasiddhiḥ kiṁ satyametadapi devi tavecchayā vai kartuṁ kṣamā vayamaje tava śaktiyuktāḥ

'ब्रह्मा रचते हैं, विष्णु पालन करते हैं और उमापति संहार करते हैं' — यह तो लोगों में प्रसिद्ध बात है। हे देवी! क्या यह भी सत्य है कि तुम्हारी ही इच्छा से, हे अजन्मा! हम तुम्हारी शक्ति से युक्त होकर ही (यह सब) करने में समर्थ हैं?

श्लोक 41 (devibhagavatam.3.4.41)

धात्री धराधरसुते न जगद्बिभर्ति आधारशक्तिरखिलं तव वै बिभर्ति । सूर्योऽपि भाति वरदे प्रभया युतस्ते त्वं सर्वमेतदखिलं विरजा विभासि

dhātrī dharādharasute na jagadbibharti ādhāraśaktirakhilaṁ tava vai bibharti sūryo'pi bhāti varade prabhayā yutaste tvaṁ sarvametadakhilaṁ virajā vibhāsi

हे पर्वतपुत्री! पृथ्वी स्वयं जगत् को धारण नहीं करती — तुम्हारी ही आधारशक्ति सब कुछ धारण करती है। हे वरदे! सूर्य भी तुम्हारे ही तेज से युक्त होकर चमकता है; हे निर्मले! तुम ही इस सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करती हो।

श्लोक 42 (devibhagavatam.3.4.42)

ब्रह्माऽहमीश्वरवरः किल ते प्रभावात्सर्वे वयं जनियुता न यदा तु नित्याः । केऽन्ये सुराः शतमखप्रमुखाश्च नित्या नित्या त्वमेव जननी प्रकृतिः पुराणा

brahmā'hamīśvaravaraḥ kila te prabhāvātsarve vayaṁ janiyutā na yadā tu nityāḥ ke'nye surāḥ śatamakhapramukhāśca nityā nityā tvameva jananī prakṛtiḥ purāṇā

मैं ब्रह्मा, श्रेष्ठ ईश्वर — यह भी निश्चय ही तुम्हारे ही प्रभाव से हूँ; हम सब तो जन्म वाले हैं, नित्य नहीं। इन्द्र आदि अन्य देवता भी नित्य कहाँ हैं? हे पुरातन प्रकृति! नित्य तो केवल तुम ही माता हो।

श्लोक 43 (devibhagavatam.3.4.43)

त्वं चेद्भवानि दयसे पुरुषं पुराणं जानेऽहमद्य तव सन्निधिगः सदैव । नोचेदहं विभुरनादिरनीह ईशो विश्वात्मधीरिति तमःप्रकृतिः सदैव

tvaṁ cedbhavāni dayase puruṣaṁ purāṇaṁ jāne'hamadya tava sannidhigaḥ sadaiva nocedahaṁ vibhuranādiranīha īśo viśvātmadhīriti tamaḥprakṛtiḥ sadaiva

हे भवानी! यदि तुम पुरातन पुरुष पर कृपा करती हो, तभी मैं उन्हें आज और सदा तुम्हारे सान्निध्य में स्थित जानता हूँ; अन्यथा वे विभु, अनादि, निःस्पृह ईश्वर, विश्वात्मा होने के अभिमान में सदा तमःप्रकृति (अज्ञान-स्वरूप) ही बने रहते हैं।

श्लोक 44 (devibhagavatam.3.4.44)

विद्या त्वमेव ननु बुद्धिमतां नराणां शक्तिस्त्वमेव किल शक्तिमतां सदैव । त्वं कीर्तिकान्तिकमलामलतुष्टिरूपा मुक्तिप्रदा विरतिरेव मनुष्यलोके

vidyā tvameva nanu buddhimatāṁ narāṇāṁ śaktistvameva kila śaktimatāṁ sadaiva tvaṁ kīrtikāntikamalāmalatuṣṭirūpā muktipradā viratireva manuṣyaloke

तुम ही बुद्धिमान् मनुष्यों की विद्या हो, तुम ही सदा शक्तिशालियों की शक्ति हो। तुम कीर्ति, कान्ति, निर्मल कमल तथा तुष्टि-स्वरूपा हो; तुम मनुष्यलोक में मुक्तिदायिनी और वैराग्य-स्वरूपा हो।

श्लोक 45 (devibhagavatam.3.4.45)

गायत्र्यसि प्रथमवेदकला त्वमेव स्वाहा स्वधा भगवती सगुणार्धमात्रा । आम्नाय एव विहितो निगमो भवत्यै सञ्जीवनाय सततं सुरपूर्वजानाम्

gāyatryasi prathamavedakalā tvameva svāhā svadhā bhagavatī saguṇārdhamātrā āmnāya eva vihito nigamo bhavatyai sañjīvanāya satataṁ surapūrvajānām

तुम गायत्री हो, तुम ही वेद का प्रथम अंश हो; तुम स्वाहा, स्वधा, भगवती और सगुण अर्धमात्रा हो। समस्त वेद-परम्परा तुम्हारे लिए ही विहित है, देवताओं के पूर्वजों (पितरों) के सदा संजीवन के लिए।

श्लोक 46 (devibhagavatam.3.4.46)

मोक्षार्थमेव रचयस्यखिलं प्रपञ्चं तेषां गताः खलु यतो ननु जीवभावम् । अंशा अनादिनिधनस्य किलानघस्य पूर्णार्णवस्य वितता हि यथा तरङ्गाः

mokṣārthameva racayasyakhilaṁ prapañcaṁ teṣāṁ gatāḥ khalu yato nanu jīvabhāvam aṁśā anādinidhanasya kilānaghasya pūrṇārṇavasya vitatā hi yathā taraṅgāḥ

तुम केवल मोक्ष के लिए ही इस सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच की रचना करती हो, जिनमें जीव-भाव को प्राप्त वे अंश जाते हैं — जो अनादि-अनन्त, निष्पाप, पूर्ण समुद्र के तरंगों के समान विस्तृत हैं।

श्लोक 47 (devibhagavatam.3.4.47)

जीवो यदा तु परिवेत्ति तवैव कृत्यं त्वं संहरस्यखिलमेतदिति प्रसिद्धम् । नाट्यं नटेन रचितं वितथेऽन्तरङ्गे कार्ये कृते विरमसे प्रथितप्रभावा

jīvo yadā tu parivetti tavaiva kṛtyaṁ tvaṁ saṁharasyakhilametaditi prasiddham nāṭyaṁ naṭena racitaṁ vitathe'ntaraṅge kārye kṛte viramase prathitaprabhāvā

परन्तु जब जीव यह पूर्ण रूप से जान लेता है कि यह सब तुम्हारा ही कृत्य है, तब तुम इस सबका संहार कर देती हो — यह भलीभाँति ज्ञात है — जैसे नट द्वारा रचा गया नाट्य, मिथ्या अन्तरंग कार्य के पूर्ण होने पर, हे विख्यात प्रभाव वाली! तुम विराम पा जाती हो।

श्लोक 48 (devibhagavatam.3.4.48)

त्राता त्वमेव मम मोहमयाद्भवाब्धेस्त्वामम्बिके सततमेमि महार्तिदे च । रागादिभिर्विरचिते वितथे किलान्ते मामेव पाहि बहुदुःखकरे च काले

trātā tvameva mama mohamayādbhavābdhestvāmambike satatamemi mahārtide ca rāgādibhirviracite vitathe kilānte māmeva pāhi bahuduḥkhakare ca kāle

मोहमय इस भवसागर से एकमात्र तुम ही मेरी रक्षक हो; हे अम्बिके! हे महान् अर्थ देने वाली! मैं सदा तुम्हारी ही शरण में जाता हूँ। राग आदि से रचित इस मिथ्या के अन्त में, हे बहुत दुःख देने वाले इस काल में, मेरी ही रक्षा करो।'

श्लोक 49 (devibhagavatam.3.4.49)

नमो देवि महाविद्ये नमामि चरणौ तव । सदा ज्ञानप्रकाशं मे देहि सर्वार्थदे शिवे

namo devi mahāvidye namāmi caraṇau tava sadā jñānaprakāśaṁ me dehi sarvārthade śive

हे देवी! हे महाविद्ये! तुम्हें नमस्कार, तुम्हारे दोनों चरणों को मैं प्रणाम करता हूँ। हे कल्याणकारिणी! हे सर्वार्थ देने वाली! मुझे सदा ज्ञान का प्रकाश प्रदान करो।

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