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तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5

हर-ब्रह्मकृत स्तुति वर्णन

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (devibhagavatam.3.5.1)

ब्रह्मोवाच । इत्युक्त्वा विरते विष्णौ देवदेवे जनार्दने । उवाच शङ्करः शर्वः प्रणतः पुरतः स्थितः

brahmovāca ityuktvā virate viṣṇau devadeve janārdane uvāca śaṅkaraḥ śarvaḥ praṇataḥ purataḥ sthitaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — देवाधिदेव जनार्दन विष्णु के यह कहकर चुप हो जाने पर, आगे खड़े होकर प्रणत शंकर शर्व ने कहा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.3.5.2)

शिव उवाच । यदि हरिस्तव देवि विभावजस्तदनु पद्मज एव तवोद्भवः । किमहमत्र तवापि न सद्गुणः सकललोकविधौ चतुरा शिवे

śiva uvāca yadi haristava devi vibhāvajastadanu padmaja eva tavodbhavaḥ kimahamatra tavāpi na sadguṇaḥ sakalalokavidhau caturā śive

शिव ने कहा — हे देवी! यदि हरि तुम्हारे ही प्रकटीकरण से उत्पन्न हैं और उसके पश्चात् कमलजन्मा भी तुमसे ही उत्पन्न हैं, तो हे कुशल कल्याणी! समस्त लोकों की रचना में क्या मैं भी तुम्हारा ही एक सद्गुण नहीं हूँ?

श्लोक 3 (devibhagavatam.3.5.3)

त्वमसि भूः सलिलं पवनस्तथा खमपि वह्निगुणश्च तथा पुनः । जननि तानि पुनः करणानि च त्वमसि बुद्धिमनोऽप्यथ हङ्कृतिः

tvamasi bhūḥ salilaṁ pavanastathā khamapi vahniguṇaśca tathā punaḥ janani tāni punaḥ karaṇāni ca tvamasi buddhimano'pyatha haṅkṛtiḥ

तुम पृथ्वी हो, जल हो, वायु हो, आकाश हो, अग्नि तथा गुण भी हो; और हे माता! फिर तुम ही इन्द्रियाँ भी हो; तुम बुद्धि, मन तथा अहंकार भी हो।

श्लोक 4 (devibhagavatam.3.5.4)

न च विदन्ति वदन्ति च येऽन्यथा हरिहराजकृतं निखिलं जगत् । तव कृतास्त्रय एव सदैव ते विरचयन्ति जगत्सचराचरम्

na ca vidanti vadanti ca ye'nyathā hariharājakṛtaṁ nikhilaṁ jagat tava kṛtāstraya eva sadaiva te viracayanti jagatsacarācaram

जो अन्यथा यह कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् हरि, हर और राजा (ब्रह्मा) द्वारा रचा गया है, वे नहीं जानते; वे तीनों, सदा तुम्हारे ही द्वारा रचे गए, ही चराचर सहित जगत् की रचना करते हैं।

श्लोक 5 (devibhagavatam.3.5.5)

अवनिवायुखवह्निजलादिभिः सविषयैः सगुणैश्च जगद्भवेत् । यदि तदा कथमद्य च तत्स्फुटं प्रभवतीति तवाम्ब कलामृते

avanivāyukhavahnijalādibhiḥ saviṣayaiḥ saguṇaiśca jagadbhavet yadi tadā kathamadya ca tatsphuṭaṁ prabhavatīti tavāmba kalāmṛte

यदि पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि, जल आदि से ही, विषयों और गुणों सहित, जगत् बन सकता, तो हे माता! आज तुम्हारे अंश के बिना यह स्पष्टतः क्यों उत्पन्न नहीं हो पाता?

श्लोक 6 (devibhagavatam.3.5.6)

भवसि सर्वमिदं सचराचरं त्वमजविष्णुशिवाकृतिकल्पितम् । विविधवेषविलासकुतूहलैर्विरमसे रमसेऽम्ब यथारुचि

bhavasi sarvamidaṁ sacarācaraṁ tvamajaviṣṇuśivākṛtikalpitam vividhaveṣavilāsakutūhalairviramase ramase'mba yathāruci

तुम स्वयं यह सम्पूर्ण चराचर जगत् हो; तुमने ही अपने को अजन्मा ब्रह्मा, विष्णु और शिव के रूपों में कल्पित किया है; कुतूहलवश विविध वेशों की लीला द्वारा तुम कभी विराम लेती हो और कभी अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करती हो, हे माता!

श्लोक 7 (devibhagavatam.3.5.7)

सकललोकसिसृक्षुरहं हरिः कमलभूश्च भवाम यदाऽम्बिके । तव पदाम्बुजपांसुपरिग्रहं समधिगम्य तदा ननु चक्रिम

sakalalokasisṛkṣurahaṁ hariḥ kamalabhūśca bhavāma yadā'mbike tava padāmbujapāṁsuparigrahaṁ samadhigamya tadā nanu cakrima

हे अम्बिके! जब सम्पूर्ण लोकों की रचना की इच्छा से हरि, कमलजन्मा और मैं प्रवृत्त हुए, तब हमने निश्चय ही तुम्हारे चरण-कमल की रज को ग्रहण करके ही ऐसा किया।

श्लोक 8 (devibhagavatam.3.5.8)

यदि दयार्द्रमना न सदाम्बिके कथमहं विहितश्च तमोगुणः । कमलजश्च रजोगुणसम्भवः सुविहितः किमु सत्त्वगुणो हरिः

yadi dayārdramanā na sadāmbike kathamahaṁ vihitaśca tamoguṇaḥ kamalajaśca rajoguṇasambhavaḥ suvihitaḥ kimu sattvaguṇo hariḥ

हे माता! यदि तुम्हारा मन सदा दया से आर्द्र न होता, तो मुझे तमोगुण से युक्त, कमलजन्मा को रजोगुण से उत्पन्न और हरि को सत्त्वगुण से भलीभाँति युक्त कैसे किया जाता?

श्लोक 9 (devibhagavatam.3.5.9)

यदि न ते विषमा मतिरम्बिके कथमिदं बहुधा विहितं जगत् । सचिवभूपतिभृत्यजनावृतं बहुधनैरधनैश्च समाकुलम्

yadi na te viṣamā matirambike kathamidaṁ bahudhā vihitaṁ jagat sacivabhūpatibhṛtyajanāvṛtaṁ bahudhanairadhanaiśca samākulam

हे अम्बिके! यदि तुम्हारी बुद्धि विषम (विविध) न होती, तो मन्त्री, राजा और सेवकजनों से आवृत, अनेक धनवानों और निर्धनों से व्याकुल यह जगत् इस प्रकार अनेक रूपों में कैसे रचा जाता?

श्लोक 10 (devibhagavatam.3.5.10)

तव गुणास्रय एव सदा क्षमाः प्रकटनावनसंहरणेषु वै । हरिहरद्रुहिणाश्च क्रमात्त्वया विरचितास्त्रिजगतां किल कारणम्

tava guṇāsraya eva sadā kṣamāḥ prakaṭanāvanasaṁharaṇeṣu vai hariharadruhiṇāśca kramāttvayā viracitāstrijagatāṁ kila kāraṇam

तुम्हारे ही गुणों का आश्रय लेकर हरि, हर और ब्रह्मा सदा प्रकटीकरण, पालन और संहार में समर्थ होते हैं; तुम्हीं ने उन्हें क्रमशः तीनों लोकों के कारण के रूप में रचा है।

श्लोक 11 (devibhagavatam.3.5.11)

परिचितानि मया हरिणा तथा कमलजेन विमानगतेन वै । पथिगतैर्भुवनानि कृतानि वा कथय केन भवानि नवानि च

paricitāni mayā hariṇā tathā kamalajena vimānagatena vai pathigatairbhuvanāni kṛtāni vā kathaya kena bhavāni navāni ca

मैंने, हरि ने और विमान में यात्रा करते हुए कमलजन्मा ने मार्ग में जो लोक जाने, वे भी बताओ — हे भवानी! ये नए लोक किसके द्वारा रचे गए हैं?

श्लोक 12 (devibhagavatam.3.5.12)

सृजसि पासि जगज्जगदम्बिके स्वकलया कियदिच्छसि नाशितुम् । रमयसे स्वपतिं पुरुषं सदा तव गतिं न हि विद्म वयं शिवे

sṛjasi pāsi jagajjagadambike svakalayā kiyadicchasi nāśitum ramayase svapatiṁ puruṣaṁ sadā tava gatiṁ na hi vidma vayaṁ śive

हे जगदम्बिके! तुम अपनी ही कला से जगत् की रचना करती हो, उसका पालन करती हो; इसे कितना नष्ट करने की इच्छा है? तुम अपने पति पुरुष को सदा रमण कराती हो — हे कल्याणी! हम तुम्हारी गति को नहीं जानते।

श्लोक 13 (devibhagavatam.3.5.13)

जननि देहि पदाम्बुजसेवनं युवतिभागवतानपि नः सदा । पुरुषतामधिगम्य पदाम्बुजाद्विरहिताः क्व लभेम सुखं स्फुटम्

janani dehi padāmbujasevanaṁ yuvatibhāgavatānapi naḥ sadā puruṣatāmadhigamya padāmbujādvirahitāḥ kva labhema sukhaṁ sphuṭam

हे माता! तुम्हारे भक्त-रूप युवतियों के रूप में स्थित हम सबको भी सदा अपने चरण-कमल की सेवा प्रदान करो; क्योंकि पुरुषत्व को पुनः प्राप्त करके भी तुम्हारे चरण-कमल से विरहित होकर हम स्पष्ट सुख कहाँ पाएँगे?

श्लोक 14 (devibhagavatam.3.5.14)

न रुचिरस्ति ममाम्ब पदाम्बुजं तव विहाय शिवे भुवनेष्वलम् । निवसितुं नरदेहमवाप्य च त्रिभुवनस्य पतित्वमवाप्य वै

na rucirasti mamāmba padāmbujaṁ tava vihāya śive bhuvaneṣvalam nivasituṁ naradehamavāpya ca tribhuvanasya patitvamavāpya vai

हे माता! हे कल्याणी! तुम्हारे चरण-कमल को छोड़कर, चाहे मनुष्य-देह प्राप्त करके या तीनों लोकों का स्वामित्व पाकर भी, लोकों में निवास करने की मुझे तनिक भी रुचि नहीं है।

श्लोक 15 (devibhagavatam.3.5.15)

सुदति नास्ति मनागपि मे रतिर्युवतिभावमवाप्य तवान्तिके । पुरुषता क्व सुखाय भवत्यलं तव पदं न यदीक्षणगोचरम्

sudati nāsti manāgapi me ratiryuvatibhāvamavāpya tavāntike puruṣatā kva sukhāya bhavatyalaṁ tava padaṁ na yadīkṣaṇagocaram

हे सुदती! तुम्हारे समीप युवती-भाव को प्राप्त करने के बाद मुझे तनिक भी (पुरुषत्व में लौटने की) रुचि नहीं है — यदि तुम्हारे चरण मेरी दृष्टि के गोचर न हों, तो पुरुषत्व सुख के लिए कहाँ पर्याप्त हो सकता है?

श्लोक 16 (devibhagavatam.3.5.16)

त्रिभुवनेषु भवत्वियमम्बिके मम सदैव हि कीर्तिरनाविला । युवतिभावमवाप्य पदाम्बुजं परिचितं तव संसृतिनाशनम्

tribhuvaneṣu bhavatviyamambike mama sadaiva hi kīrtiranāvilā yuvatibhāvamavāpya padāmbujaṁ paricitaṁ tava saṁsṛtināśanam

हे अम्बिके! तीनों लोकों में मेरी यही सदा निर्मल कीर्ति हो — कि युवती-भाव को प्राप्त करके मैंने तुम्हारे संसार-विनाशक चरण-कमल को जान लिया।

श्लोक 17 (devibhagavatam.3.5.17)

भुवि विहाय तवान्तिकसेवनं क इह वाञ्छति राज्यमकण्टकम् । त्रुटिरसौ किल याति युगात्मतां न निकटं यदि तेऽङ्घ्रिसरोरुहम्

bhuvi vihāya tavāntikasevanaṁ ka iha vāñchati rājyamakaṇṭakam truṭirasau kila yāti yugātmatāṁ na nikaṭaṁ yadi te'ṅghrisaroruham

पृथ्वी पर तुम्हारे समीप की सेवा को छोड़कर यहाँ कण्टकरहित राज्य की कामना कौन करेगा? यदि तुम्हारा चरण-कमल निकट न हो, तो एक क्षण भी मानो युग के समान बीतता है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.3.5.18)

तपसि ये निरता मुनयोऽमलास्तव विहाय पदाम्बुजपूजनम् । जननि ते विधिना किल वञ्चिताः परिभवो विभवे परिकल्पितः

tapasi ye niratā munayo'malāstava vihāya padāmbujapūjanam janani te vidhinā kila vañcitāḥ paribhavo vibhave parikalpitaḥ

हे माता! जो निष्पाप मुनि तुम्हारे चरण-कमल की पूजा छोड़कर तप में लीन रहते हैं, वे विधि द्वारा वस्तुतः ठगे गए हैं — उनकी सम्पदा में ही उनका तिरस्कार निहित है।

श्लोक 19 (devibhagavatam.3.5.19)

न तपसा न दमेन समाधिना न च तथा विहितैः क्रतुभिर्यथा । तव पदाब्जपरागनिषेवणाद्भवति मुक्तिरजे भवसागरात्

na tapasā na damena samādhinā na ca tathā vihitaiḥ kratubhiryathā tava padābjaparāganiṣevaṇādbhavati muktiraje bhavasāgarāt

न तप से, न इन्द्रिय-संयम से, न समाधि से, और न ही विधिपूर्वक किए गए यज्ञों से उतनी सिद्धि मिलती है, हे रानी! जितनी तुम्हारे चरण-कमल की पराग-सेवा से भवसागर से मुक्ति प्राप्त होती है।

श्लोक 20 (devibhagavatam.3.5.20)

कुरु दयां दयसे यदि देवि मां कथय मन्त्रमनाविलमद्भुतम् । समभवं प्रजपन्सुखितो ह्यहं सुविशदं च नवार्णमनुत्तमम्

kuru dayāṁ dayase yadi devi māṁ kathaya mantramanāvilamadbhutam samabhavaṁ prajapansukhito hyahaṁ suviśadaṁ ca navārṇamanuttamam

हे देवी! यदि तुम मुझ पर कृपा करती हो तो कृपा करो और वह निर्मल, अद्भुत मन्त्र बताओ; उसका जप करते हुए मैं सुखी हो जाऊँ — वह अत्यन्त स्पष्ट, सर्वश्रेष्ठ नवार्ण (नौ अक्षरों वाला) मन्त्र।

श्लोक 21 (devibhagavatam.3.5.21)

प्रथमजन्मनि चाधिगतो मया तदधुना न विभाति नवाक्षरः । कथय मां मनुमद्य भवार्णवाज्जननि तारय तारय तारके

prathamajanmani cādhigato mayā tadadhunā na vibhāti navākṣaraḥ kathaya māṁ manumadya bhavārṇavājjanani tāraya tāraya tārake

पहले जन्म में मैंने इसे पाया था, परन्तु अब वह नवाक्षर मन्त्र मुझे स्मरण नहीं हो रहा। आज मुझे वह मन्त्र बताओ — हे माता! हे तारने वाली! मुझे इस भवसागर से तारो, तारो।

श्लोक 22 (devibhagavatam.3.5.22)

इत्युक्ता सा तदा देवी शिवेनाद्भुततेजसा । उच्चचाराम्बिका मन्त्रं प्रस्फुटं च नवाक्षरम्

ityuktā sā tadā devī śivenādbhutatejasā uccacārāmbikā mantraṁ prasphuṭaṁ ca navākṣaram

अद्भुत तेजस्वी शिव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, तब देवी अम्बिका ने स्पष्ट रूप से नवाक्षर मन्त्र का उच्चारण किया।

श्लोक 23 (devibhagavatam.3.5.23)

तं गृहीत्वा महादेवः परां मुदमवाप ह । प्रणम्य चरणौ देव्यास्तत्रैवावस्थितः शिवः

taṁ gṛhītvā mahādevaḥ parāṁ mudamavāpa ha praṇamya caraṇau devyāstatraivāvasthitaḥ śivaḥ

उसे ग्रहण करके महादेव ने परम आनन्द प्राप्त किया; देवी के दोनों चरणों को प्रणाम करके शिव वहीं स्थिर हो गए।

श्लोक 24 (devibhagavatam.3.5.24)

जपन्नवाक्षरं मन्त्रं कामदं मोक्षदं तथा । बीजयुक्तं शुभोच्चारं शङ्करस्तस्थिवांस्तदा

japannavākṣaraṁ mantraṁ kāmadaṁ mokṣadaṁ tathā bījayuktaṁ śubhoccāraṁ śaṅkarastasthivāṁstadā

कामनाओं तथा मोक्ष को देने वाले, बीज-सहित, शुभ उच्चारण वाले उस नवाक्षर मन्त्र का जप करते हुए शंकर तब वहीं खड़े रहे।

श्लोक 25 (devibhagavatam.3.5.25)

तं तथाऽवस्थितं दृष्ट्वा शङ्करं लोकशङ्करम् । अवोचं तां महामायां संस्थितोऽहं पदान्तिके

taṁ tathā'vasthitaṁ dṛṣṭvā śaṅkaraṁ lokaśaṅkaram avocaṁ tāṁ mahāmāyāṁ saṁsthito'haṁ padāntike

लोकमंगलकारी शंकर को इस प्रकार स्थित देखकर, चरणों के समीप खड़े होकर, मैंने भी उस महामाया से कहा।

श्लोक 26 (devibhagavatam.3.5.26)

न वेदास्त्वामेवं कलयितुमिहासन्नपटवो यतस्ते नोचुस्त्वां सकलजनधात्रीमविकलाम् । स्वधाभूता देवी सकलमखहोमेषु विहिता तदा त्वं सर्वज्ञा जननि खलु जाता त्रिभुवने

na vedāstvāmevaṁ kalayitumihāsannapaṭavo yataste nocustvāṁ sakalajanadhātrīmavikalām svadhābhūtā devī sakalamakhahomeṣu vihitā tadā tvaṁ sarvajñā janani khalu jātā tribhuvane

'वेद भी यहाँ तुम्हें इस प्रकार जानने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने तुम्हें समस्त प्राणियों की पूर्ण जननी नहीं कहा है। समस्त यज्ञों और होमों में विहित स्वधा-रूपिणी देवी होने के कारण तुम तीनों लोकों में सर्वज्ञा माता के रूप में सचमुच प्रसिद्ध हो गई हो।

श्लोक 27 (devibhagavatam.3.5.27)

कर्ताऽहं प्रकरोमि सर्वमखिलं ब्रह्माण्डमत्यद्भुतं कोऽन्योस्तीह चराचरे त्रिभुवने मत्तः समर्थः पुमान् । धन्योऽस्म्यत्र न संशयः किल यदा ब्रह्माऽस्मि लोकातिगो मग्नोऽहं भवसागरे प्रवितते गर्वाभिवेशादिति

kartā'haṁ prakaromi sarvamakhilaṁ brahmāṇḍamatyadbhutaṁ ko'nyostīha carācare tribhuvane mattaḥ samarthaḥ pumān dhanyo'smyatra na saṁśayaḥ kila yadā brahmā'smi lokātigo magno'haṁ bhavasāgare pravitate garvābhiveśāditi

'मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही इस अत्यन्त अद्भुत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना करता हूँ; इस त्रिलोक में चराचर में मुझसे बढ़कर समर्थ पुरुष और कौन है? मैं यहाँ धन्य हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं, क्योंकि मैं लोकातीत ब्रह्मा हूँ' — इस प्रकार अहंकार से आविष्ट होकर मैं इस विस्तृत भवसागर में डूब गया था।

श्लोक 28 (devibhagavatam.3.5.28)

अद्याहं तव पादपङ्कजपरागादानगर्वेण वै धन्योऽस्मीति यथार्थवादनिपुणो जातः प्रसादाच्च ते । याचे त्वां भवभीतिनाशचतुरां मुक्तिप्रदां चेश्वरीं हित्वा मोहकृतं महार्तिनिगडं त्वद्भक्तियुक्तं कुरु

adyāhaṁ tava pādapaṅkajaparāgādānagarveṇa vai dhanyo'smīti yathārthavādanipuṇo jātaḥ prasādācca te yāce tvāṁ bhavabhītināśacaturāṁ muktipradāṁ ceśvarīṁ hitvā mohakṛtaṁ mahārtinigaḍaṁ tvadbhaktiyuktaṁ kuru

'आज मैं तुम्हारे चरण-कमल की रज ग्रहण करने के गर्व से ही यथार्थवादन में निपुण हुआ हूँ — यह "मैं धन्य हूँ" कहना भी तुम्हारी ही कृपा से हुआ है। हे भवभय के नाशिनी! हे मोक्षदायिनी! हे ईश्वरी! मैं तुमसे यही याचना करता हूँ — मोह से किए गए इस महाव्यथाजनक बन्धन को दूर करके मुझे तुम्हारी भक्ति से युक्त कर दो।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.3.5.29)

अतोऽहञ्च जातो विमुक्तः कथं स्यां सरोजादमेयात्त्वदाविष्कृताद्वै । तवाज्ञाकरः किङ्करोऽस्मीति नूनं शिवे पाहि मां मोहमग्नं भवाब्धौ

ato'hañca jāto vimuktaḥ kathaṁ syāṁ sarojādameyāttvadāviṣkṛtādvai tavājñākaraḥ kiṅkaro'smīti nūnaṁ śive pāhi māṁ mohamagnaṁ bhavābdhau

'इसलिए, हे कल्याणी! तुम्हारे द्वारा प्रकट किए गए उस अपरिमेय कमल से उत्पन्न होकर भी मैं मुक्त कैसे हो सकता हूँ? मैं तो निश्चय ही तुम्हारी आज्ञा का पालक, तुम्हारा दास हूँ — भवसागर में मोहमग्न मेरी रक्षा करो।'

श्लोक 30 (devibhagavatam.3.5.30)

न जानन्ति ये मानवास्ते वदन्ति प्रभुं मां तवाद्यं चरित्रं पवित्रम् । यजन्तीह ये याजकाः स्वर्गकामा न ते ते प्रभावं विदन्त्येव कामम्

na jānanti ye mānavāste vadanti prabhuṁ māṁ tavādyaṁ caritraṁ pavitram yajantīha ye yājakāḥ svargakāmā na te te prabhāvaṁ vidantyeva kāmam

'जो मनुष्य तुम्हारे इस पवित्र, आदि चरित्र को नहीं जानते, वे मुझे ही स्वामी कहते हैं। यहाँ जो याजक स्वर्ग की कामना से यज्ञ करते हैं, वे तुम्हारे प्रभाव को कदापि नहीं जानते।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.3.5.31)

त्वया निर्मितोऽहं विधित्वे विहारं विकर्तुं चतुर्धा विधायादिसर्गम् । अहं वेद्मि कोऽन्यो विवेदातिमाये क्षमस्वापराधं त्वहङ्कारजं मे

tvayā nirmito'haṁ vidhitve vihāraṁ vikartuṁ caturdhā vidhāyādisargam ahaṁ vedmi ko'nyo vivedātimāye kṣamasvāparādhaṁ tvahaṅkārajaṁ me

'चतुर्विध आदि-सृष्टि की रचना करने के लिए तुमने ही मुझे विधि-पद पर बनाकर क्रीड़ा दी है; मैं ही जानता हूँ — हे परम माया! और कौन जान सका? मेरे अहंकार से उत्पन्न इस अपराध को क्षमा करो।'

श्लोक 32 (devibhagavatam.3.5.32)

श्रमं येऽष्टधा योगमार्गे प्रवृत्ताः प्रकुर्वन्ति मूढाः समाधौ स्थिता वै । न जानन्ति ते नाम मोक्षप्रदं वा समुच्चारितं जातु मातर्मिषेण

śramaṁ ye'ṣṭadhā yogamārge pravṛttāḥ prakurvanti mūḍhāḥ samādhau sthitā vai na jānanti te nāma mokṣapradaṁ vā samuccāritaṁ jātu mātarmiṣeṇa

'जो मोहग्रस्त लोग अष्टांग योगमार्ग में प्रवृत्त होकर परिश्रम करते हैं और समाधि में स्थित रहते हैं, वे तुम्हारे मोक्षदायी नाम को, जो केवल बहाने से भी उच्चारित हो जाने पर मोक्ष देता है, नहीं जानते, हे माता!'

श्लोक 33 (devibhagavatam.3.5.33)

विचारे परे तत्त्वसङ्ख्याविधाने पदे मोहिता नाम ते संविहाय । न किं ते विमूढा भवाब्धौ भवानि त्वमेवासि संसारमुक्तिप्रदा वै

vicāre pare tattvasaṅkhyāvidhāne pade mohitā nāma te saṁvihāya na kiṁ te vimūḍhā bhavābdhau bhavāni tvamevāsi saṁsāramuktipradā vai

'तत्त्वों की गणना और विधान की परम विवेचना में मोहित होकर, तुम्हारे ही नाम को छोड़कर, हे भवानी! क्या वे भवसागर में अत्यन्त मोहित नहीं हैं? तुम ही संसार से मुक्ति देने वाली हो।'

श्लोक 34 (devibhagavatam.3.5.34)

परं तत्त्वविज्ञानमाद्यैर्जनैर्यैरजे चानुभूतं त्यजन्त्येव ते किम् । निमेषार्धमात्रं पवित्रं चरित्रं शिवा चाम्बिका शक्तिरीशेति नाम

paraṁ tattvavijñānamādyairjanairyairaje cānubhūtaṁ tyajantyeva te kim nimeṣārdhamātraṁ pavitraṁ caritraṁ śivā cāmbikā śaktirīśeti nāma

'हे अजन्मे! जो परम तत्त्वज्ञान प्राचीन ऋषियों द्वारा अनुभव किया गया, क्या वे उसे त्याग देते हैं? आधे क्षण के लिए भी यह पवित्र चरित्र — शिवा, अम्बिका, शक्ति, ईश्वरी — यह नाम (कभी न छूटे)।'

श्लोक 35 (devibhagavatam.3.5.35)

न किं त्वं समर्थाऽसि विश्वं विधातुं दृशैवाशु सर्वं चतुर्धा विभक्तम् । विनोदार्थमेवं विधिं मां विधायादिसर्गे किलेदं करोषीति कामम्

na kiṁ tvaṁ samarthā'si viśvaṁ vidhātuṁ dṛśaivāśu sarvaṁ caturdhā vibhaktam vinodārthamevaṁ vidhiṁ māṁ vidhāyādisarge kiledaṁ karoṣīti kāmam

'क्या तुम केवल दृष्टि मात्र से ही सम्पूर्ण विश्व को शीघ्र चार भागों में विभक्त करके रचने में समर्थ नहीं हो? फिर केवल मनोरंजन के लिए ही मुझे विधाता बनाकर आदि-सृष्टि में यह कार्य क्यों करवा रही हो?'

श्लोक 36 (devibhagavatam.3.5.36)

हरिः पालकः किं त्वयाऽसौ मधोर्वा तथा कैटभाद्रक्षितः सिन्धुमध्ये । हरः संहृतः किं त्वयाऽसौ न काले कथं मे भ्रुवोर्मध्यदेशात्स जातः

hariḥ pālakaḥ kiṁ tvayā'sau madhorvā tathā kaiṭabhādrakṣitaḥ sindhumadhye haraḥ saṁhṛtaḥ kiṁ tvayā'sau na kāle kathaṁ me bhruvormadhyadeśātsa jātaḥ

'क्या हरि की मधु से और कैटभ से समुद्र के मध्य रक्षा तुमने नहीं की? क्या हर का भी काल में संहार तुम्हारे द्वारा नहीं होता? तब फिर वे मेरी दोनों भौंहों के मध्य से कैसे उत्पन्न हुए?'

श्लोक 37 (devibhagavatam.3.5.37)

न ते जन्म कुत्रापि दृष्टं श्रुतं वा कुतः सम्भवस्ते न कोऽपीह वेद । किलाद्यासि शक्तिस्त्वमेका भवानि स्वतन्त्रैः समस्तैरतो बोधिताऽसि

na te janma kutrāpi dṛṣṭaṁ śrutaṁ vā kutaḥ sambhavaste na ko'pīha veda kilādyāsi śaktistvamekā bhavāni svatantraiḥ samastairato bodhitā'si

'तुम्हारा जन्म कहीं भी न देखा गया है, न सुना गया है; तुम्हारा उद्भव कहाँ से हुआ, यह यहाँ कोई नहीं जानता। हे भवानी! तुम ही निश्चय ही आदि, एकमात्र शक्ति हो — इसीलिए समस्त स्वतन्त्र देवताओं द्वारा भी तुम इसी रूप में समझी गई हो।'

श्लोक 38 (devibhagavatam.3.5.38)

त्वया संयुतोऽहं विकर्तुं समर्थो हरिस्त्रातुमम्ब त्वया संयुतश्च । हरः सम्प्रहर्तुं त्वयैवेह युक्तः क्षमा नाद्य सर्वे त्वया विप्रयुक्ताः

tvayā saṁyuto'haṁ vikartuṁ samartho haristrātumamba tvayā saṁyutaśca haraḥ samprahartuṁ tvayaiveha yuktaḥ kṣamā nādya sarve tvayā viprayuktāḥ

'तुमसे युक्त होकर मैं रचने में समर्थ हूँ; हरि, हे माता! तुमसे युक्त होकर ही रक्षा करने में समर्थ हैं; हर भी तुमसे ही युक्त होकर संहार करने में समर्थ हैं — आज तुमसे वियुक्त होकर हम सब में कोई सामर्थ्य नहीं है।'

श्लोक 39 (devibhagavatam.3.5.39)

यथाऽहं हरिः शङ्करः किं तथाऽन्ये न जाता न सन्तीह नो वाऽभविष्यन् । न मुह्यन्ति केऽस्मिंस्तवात्यन्तचित्रे विनोदे विवादास्पदेऽल्पाशयानाम्

yathā'haṁ hariḥ śaṅkaraḥ kiṁ tathā'nye na jātā na santīha no vā'bhaviṣyan na muhyanti ke'smiṁstavātyantacitre vinode vivādāspade'lpāśayānām

'जैसे मैं, हरि और शंकर (तुम्हारे उपकरण हैं), वैसे ही अन्य भी — चाहे उत्पन्न हुए हों, न हों, या भविष्य में होंगे — तुम्हारी इस अत्यन्त विचित्र, अल्पबुद्धि वालों के विवाद के स्थान बनी हुई लीला में कौन मोहित नहीं होता?'

श्लोक 40 (devibhagavatam.3.5.40)

अकर्ता गुणस्पष्ट एवाद्य देवो निरीहोऽनुपाधिः सदैवाकलश्च । तथापीश्वरस्ते वितीर्णं विनोदं सुसम्पश्यतीत्याहुरेवं विधिज्ञाः

akartā guṇaspaṣṭa evādya devo nirīho'nupādhiḥ sadaivākalaśca tathāpīśvaraste vitīrṇaṁ vinodaṁ susampaśyatītyāhurevaṁ vidhijñāḥ

'आज वह देव अकर्ता, केवल गुणों द्वारा ही स्पष्ट, निःस्पृह, उपाधिरहित, सदा अखण्ड है — फिर भी वह ईश्वर तुम्हारे द्वारा दी गई लीला को भलीभाँति देखता है' — विधि के ज्ञाता ऐसा कहते हैं।'

श्लोक 41 (devibhagavatam.3.5.41)

दृष्टादृष्टविभेदेऽस्मिन्प्राक्त्वत्तो वै पुमान्परः । नान्यः कोऽपि तृतीयोऽस्ति प्रमेये सुविचारिते

dṛṣṭādṛṣṭavibhede'sminprāktvatto vai pumānparaḥ nānyaḥ ko'pi tṛtīyo'sti prameye suvicārite

'दृष्ट और अदृष्ट के इस भेद में तुमसे पहले निश्चय ही परम पुरुष था; भलीभाँति विचार किए गए इस ज्ञेय विषय में कोई तीसरा अन्य नहीं है।'

श्लोक 42 (devibhagavatam.3.5.42)

न मिथ्या वेदवाक्यं वै कल्पनीयं कदाचन । विरोधोऽयं मयाऽत्यन्तं हृदये तु विशङ्कितः

na mithyā vedavākyaṁ vai kalpanīyaṁ kadācana virodho'yaṁ mayā'tyantaṁ hṛdaye tu viśaṅkitaḥ

'वेद-वाक्य को कभी भी मिथ्या नहीं माना जा सकता — फिर भी यह विरोध मेरे हृदय में अत्यन्त संशयपूर्ण बना हुआ है।'

श्लोक 43 (devibhagavatam.3.5.43)

एकमेवाद्वितीयं यद्ब्रह्म वेदा वदन्ति वै । सा किं त्वं वाप्यसौ वा किं सन्देहं विनिवर्तय

ekamevādvitīyaṁ yadbrahma vedā vadanti vai sā kiṁ tvaṁ vāpyasau vā kiṁ sandehaṁ vinivartaya

'जिस एक, अद्वितीय ब्रह्म को वेद कहते हैं — क्या वह तुम हो, अथवा वह (पुरुष)? इस संदेह को दूर करो।'

श्लोक 44 (devibhagavatam.3.5.44)

निःसंशयं न मे चेतः प्रभवत्यविशङ्कितम् । द्वित्वैकत्वविचारेऽस्मिन्निमग्नं क्षुल्लकं मनः

niḥsaṁśayaṁ na me cetaḥ prabhavatyaviśaṅkitam dvitvaikatvavicāre'sminnimagnaṁ kṣullakaṁ manaḥ

'मेरा चित्त निःसंशय, अशंकित होकर स्थिर नहीं हो पाता; इस द्वैत-अद्वैत के विचार में मेरा तुच्छ मन डूबा हुआ है।'

श्लोक 45 (devibhagavatam.3.5.45)

स्वमुखेनापि सन्देहं छेत्तुमर्हसि मामकम् । पुण्यभोगाच्च मे प्राप्ता सङ्गतिस्तव पादयोः

svamukhenāpi sandehaṁ chettumarhasi māmakam puṇyabhogācca me prāptā saṅgatistava pādayoḥ

'तुम अपने ही मुख से मेरा यह संदेह दूर करने के योग्य हो; अपने पुण्य के फल से ही मुझे तुम्हारे चरणों की यह संगति प्राप्त हुई है।'

श्लोक 46 (devibhagavatam.3.5.46)

पुमानसि त्वं स्त्री वासि वद विस्तरतो मम । ज्ञात्वाऽहं परमां शक्तिं मुक्तः स्यां भवसागरात्

pumānasi tvaṁ strī vāsi vada vistarato mama jñātvā'haṁ paramāṁ śaktiṁ muktaḥ syāṁ bhavasāgarāt

'तुम पुरुष हो अथवा स्त्री, यह मुझे विस्तार से बताओ; तुम्हारी परम शक्ति को जानकर ही मैं भवसागर से मुक्त हो सकूँगा।'

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