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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10

मन्त्री द्वारा महिष का देवी के समक्ष विवाह-प्रस्ताव

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.10.1)

व्यास उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्य प्रमदोत्तमा । तमुवाच महाराज मेघगम्भीरया गिरा

vyāsa uvāca | iti tasya vacaḥ śrutvā prahasya pramadottamā | tamuvāca mahārāja meghagambhīrayā girā

व्यास जी ने कहा — उसके वचन सुनकर वह श्रेष्ठ नारी हँस पड़ी, और हे महाराज! मेघ के समान गम्भीर वाणी में उससे यह कहा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.10.2)

देव्युवाच । मन्त्रिवर्य सुराणां वै जननीं विद्धि मां किल । महालक्ष्मीमिति ख्यातां सर्वदैत्यनिषूदिनीम्

devyuvāca | mantrivarya surāṇāṁ vai jananīṁ viddhi māṁ kila | mahālakṣmīmiti khyātāṁ sarvadaityaniṣūdinīm

देवी ने कहा — हे मन्त्रिवर्य! मुझे देवताओं की जननी जानो, जो महालक्ष्मी के नाम से विख्यात, समस्त दैत्यों की संहारक हूँ।

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.10.3)

प्रार्थिताहं सुरैः सर्वैर्महिषस्य वधाय च । पीडितैर्दानवेन्द्रेण यज्ञभागबहिष्कृतैः

prārthitāhaṁ suraiḥ sarvairmahiṣasya vadhāya ca | pīḍitairdānavendreṇa yajñabhāgabahiṣkṛtaiḥ

मैं समस्त देवताओं द्वारा महिष के वध हेतु प्रार्थित हूँ — उन देवताओं द्वारा, जो उस दानवेन्द्र द्वारा पीड़ित और यज्ञभाग से वंचित कर दिए गए हैं।

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.10.4)

तस्मादिहागतास्म्यद्य तद्वधार्थं कृतोद्यमा । एकाकिनी न सैन्येन संयुता मन्त्रिसत्तम

tasmādihāgatāsmyadya tadvadhārthaṁ kṛtodyamā | ekākinī na sainyena saṁyutā mantrisattama

इसीलिए मैं आज उसके वध हेतु संकल्प लेकर यहाँ आई हूँ — हे मन्त्रिसत्तम! अकेली, बिना किसी सेना के साथ।

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.10.5)

यत्त्वयाहं सामपूर्वं कृत्वा स्वागतमादरात् । उक्ता मधुरया वाचा तेन तुष्टास्मि तेऽनघ

yattvayāhaṁ sāmapūrvaṁ kṛtvā svāgatamādarāt | uktā madhurayā vācā tena tuṣṭāsmi te'nagha

हे निष्पाप! तुमने आदरपूर्वक साम-नीति के साथ मेरा स्वागत किया और मधुर वाणी से मुझसे बात की, इसलिए मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.10.6)

नोचेद्धन्मि दृशा त्वां वै कालाग्निसमया किल । कस्य प्रीतिकरं न स्यान्माधुर्यवचनं खलु

noceddhanmi dṛśā tvāṁ vai kālāgnisamayā kila | kasya prītikaraṁ na syānmādhuryavacanaṁ khalu

अन्यथा मैं तुम्हें प्रलयाग्नि के समान अपनी दृष्टि मात्र से ही भस्म कर देती। भला मधुर वचनों से किसका हृदय प्रसन्न नहीं होता?

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.10.7)

गच्छ तं महिषं पापं वद मद्वचनादिदम् । गच्छ पातालमधुना जीवितेच्छा यदस्ति ते

gaccha taṁ mahiṣaṁ pāpaṁ vada madvacanādidam | gaccha pātālamadhunā jīvitecchā yadasti te

जाओ, उस पापी महिष से मेरे इन वचनों को कहो — 'यदि तुम्हें जीवित रहने की इच्छा है, तो अभी पाताल चले जाओ।'

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.10.8)

नोचेत्कृतागसं दुष्टं हनिष्यामि रणाङ्गणे । मद्बाणक्षुण्णदेहस्त्वं गन्तासि यमसादनम्

nocetkṛtāgasaṁ duṣṭaṁ haniṣyāmi raṇāṅgaṇe | madbāṇakṣuṇṇadehastvaṁ gantāsi yamasādanam

'अन्यथा, हे दुष्ट अपराधी! मैं तुम्हें रणभूमि में मार डालूँगी; मेरे बाणों से क्षत-विक्षत होकर तुम यमलोक को जाओगे।'

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.10.9)

दयालुत्वं ममेदं त्वं विदित्वा गच्छ सत्वरम् । हते त्वयि सुरा मूढ स्वर्गं प्राप्स्यन्ति सत्वरम्

dayālutvaṁ mamedaṁ tvaṁ viditvā gaccha satvaram | hate tvayi surā mūḍha svargaṁ prāpsyanti satvaram

'मेरी इस दयालुता को समझकर शीघ्र चले जाओ। हे मूढ़! तुम्हारे मारे जाने पर देवगण शीघ्र ही स्वर्ग को प्राप्त करेंगे।'

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.10.10)

तस्माद् गच्छस्व त्यक्त्वैको मेदिनीञ्च ससागराम् । पातालं तरसा मन्द यावद् बाणा न मेऽपतन्

tasmād gacchasva tyaktvaiko medinīñca sasāgarām | pātālaṁ tarasā manda yāvad bāṇā na me'patan

'इसलिए हे मन्द! इस सागर-सहित पृथ्वी को अकेले त्यागकर शीघ्र पाताल चले जाओ, जब तक मेरे बाण तुम पर नहीं गिरे हैं।'

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.10.11)

युद्धेच्छा चेन्मनसि ते तर्ह्येहि त्वरितोऽसुर । वीरैर्महाबलैः सर्वैर्नयामि यमसादनम्

yuddhecchā cenmanasi te tarhyehi tvarito'sura | vīrairmahābalaiḥ sarvairnayāmi yamasādanam

'हे असुर! यदि तुम्हारे मन में युद्ध की इच्छा है, तो तुरन्त आ जाओ। मैं तुम्हें तुम्हारे समस्त महाबली वीरों सहित यमलोक पहुँचा दूँगी।'

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.10.12)

युगे युगे महामूढ हतास्त्वत्सदृशाः किल । असङ्ख्यातास्तथा त्वां वै हनिष्यामि रणाङ्गणे

yuge yuge mahāmūḍha hatāstvatsadṛśāḥ kila | asaṅkhyātāstathā tvāṁ vai haniṣyāmi raṇāṅgaṇe

'हे महामूढ़! युग-युग में तुम्हारे जैसे असंख्य असुर मारे गए हैं — उसी प्रकार मैं भी तुम्हें रणभूमि में मार डालूँगी।'

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.10.13)

साफल्यं कुरु शस्त्राणां धारणे तु श्रमोऽन्यथा । तद्युध्यस्व मया सार्धं समरे स्मरपीडितः

sāphalyaṁ kuru śastrāṇāṁ dhāraṇe tu śramo'nyathā | tadyudhyasva mayā sārdhaṁ samare smarapīḍitaḥ

'अपने शस्त्रों को सफल बनाओ — अन्यथा उन्हें धारण करना केवल श्रम मात्र है। हे कामपीड़ित! अतः मुझसे युद्ध करो।'

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.10.14)

मा गर्वं कुरु दुष्टात्मन् यन्मेऽस्ति ब्रह्मणो वरः । स्त्रीवध्यत्वे त्वया मूढ पीडिताः सुरसत्तमाः

mā garvaṁ kuru duṣṭātman yanme'sti brahmaṇo varaḥ | strīvadhyatve tvayā mūḍha pīḍitāḥ surasattamāḥ

'हे दुष्टात्मन्! यह सोचकर गर्व मत करो कि "मुझे ब्रह्मा का वरदान प्राप्त है।" हे मूढ़! केवल स्त्री द्वारा वध्य होते हुए भी तुमने श्रेष्ठ देवताओं को पीड़ित किया है।'

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.10.15)

कर्तव्यं वचनं धातुस्तेनाहं त्वामुपागता । स्त्रीरूपमतुलं कृत्वा सत्यं हन्तुं कृतागसम्

kartavyaṁ vacanaṁ dhātustenāhaṁ tvāmupāgatā | strīrūpamatulaṁ kṛtvā satyaṁ hantuṁ kṛtāgasam

'विधाता के वचन को सत्य करना ही था — इसीलिए मैं यह अनुपम स्त्री-रूप धारण कर तुम्हारे पास आई हूँ, ताकि तुम्हारे अपराध का सत्य ही वध कर सकूँ।'

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.10.16)

यथेच्छं गच्छ वा मूढ पातालं पन्नगावृतम् । हित्वा भूसुरसद्माद्य जीवितेच्छा यदस्ति ते

yathecchaṁ gaccha vā mūḍha pātālaṁ pannagāvṛtam | hitvā bhūsurasadmādya jīvitecchā yadasti te

'अथवा हे मूढ़! यदि तुम्हें जीवित रहने की इच्छा है, तो आज ही देवताओं के इस धाम को छोड़कर, इच्छानुसार सर्पों से घिरे पाताल को चले जाओ।'

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.10.17)

व्यास उवाच । इत्युक्तः स ततो देव्या मन्त्रिश्रेष्ठो बलान्वितः । प्रत्युवाच निशम्यासौ वचनं हेतुगर्भितम्

vyāsa uvāca | ityuktaḥ sa tato devyā mantriśreṣṭho balānvitaḥ | pratyuvāca niśamyāsau vacanaṁ hetugarbhitam

व्यास जी ने कहा — देवी द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वह श्रेष्ठ मन्त्री साहस जुटाकर, उन वचनों को सुनकर, तर्कयुक्त उत्तर देने लगा।

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.10.18)

देवि स्त्रीसदृशं वाक्यं ब्रूषे त्वं मदगर्विता । क्वासौ क्व त्वं कथं युद्धमसम्भाव्यमिदं किल

devi strīsadṛśaṁ vākyaṁ brūṣe tvaṁ madagarvitā | kvāsau kva tvaṁ kathaṁ yuddhamasambhāvyamidaṁ kila

'हे देवि! आप स्त्री-सुलभ अभिमानपूर्ण वचन बोल रही हैं। वे कहाँ और आप कहाँ? यह युद्ध तो असंभव-सा प्रतीत होता है।'

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.10.19)

एकाकिनी पुनर्बाला प्रारब्धयौवना मृदुः । महिषोऽसौ महाकायो दुर्विभाव्यं हि सङ्गतम्

ekākinī punarbālā prārabdhayauvanā mṛduḥ | mahiṣo'sau mahākāyo durvibhāvyaṁ hi saṅgatam

'फिर आप अकेली, युवावस्था में प्रवेश की हुई कोमलांगी बालिका हैं; और वह महिष अत्यंत विशालकाय है — यह मुकाबला तो कल्पना से परे है।'

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.10.20)

सैन्यं बहुविधं तस्य हस्त्यश्वरथसङ्कुलम् । पदातिगणसंविद्धं नानायुधविराजितम्

sainyaṁ bahuvidhaṁ tasya hastyaśvarathasaṅkulam | padātigaṇasaṁviddhaṁ nānāyudhavirājitam

'उसकी सेना नाना प्रकार की है, हाथी-घोड़े-रथों से भरी हुई, पैदल सेना से युक्त तथा विविध शस्त्रों से सुशोभित है।'

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.10.21)

कः श्रमः करिराजस्य मालतीपुष्पमर्दने । मारणे तव वामोरु महिषस्य तथा रणे

kaḥ śramaḥ karirājasya mālatīpuṣpamardane | māraṇe tava vāmoru mahiṣasya tathā raṇe

'हाथी के लिए मालती के फूल को कुचल देना क्या श्रमसाध्य है? हे वामोरु! उसी प्रकार युद्ध में महिष के लिए आपको मार डालना भी सहज है।'

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.10.22)

यदि त्वां परुषं वाक्यं ब्रवीमि स्वल्पमप्यहम् । शृङ्गारे तद्विरुद्धं हि रसभङ्गाद्बिभेम्यहम्

yadi tvāṁ paruṣaṁ vākyaṁ bravīmi svalpamapyaham | śṛṅgāre tadviruddhaṁ hi rasabhaṅgādbibhemyaham

'यदि मैं आपसे थोड़ा भी कठोर वचन कहूँ, तो वह शृंगार-रस के विपरीत होगा — मुझे रस-भंग होने का भय है।'

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.10.23)

राजास्माकं सुररिपुर्वर्तते त्वयि भक्तिमान् । साममेव मया वाच्यं दानयुक्तं तथा वचः

rājāsmākaṁ suraripurvartate tvayi bhaktimān | sāmameva mayā vācyaṁ dānayuktaṁ tathā vacaḥ

'हमारे राजा, जो सुर-शत्रु हैं, आपके प्रति भक्तिमान् हैं; मुझे तो केवल साम-नीति के तथा उपहार के वचन ही कहने चाहिए।'

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.10.24)

नोचेद्धन्म्यहमद्यैव बाणेन त्वां मृषावदाम् । मिथ्याभिमानचतुरां रूपयौवनगर्विताम्

noceddhanmyahamadyaiva bāṇena tvāṁ mṛṣāvadām | mithyābhimānacaturāṁ rūpayauvanagarvitām

'अन्यथा मैं आज ही तुम्हें बाण से मार डालूँगा, हे मिथ्यावादिनी! मिथ्या अभिमान में चतुर, रूप-यौवन से गर्वित!'

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.10.25)

स्वामी मे मोहितः श्रुत्वा रूपं ते भुवनातिगम् । तत्प्रियार्थं प्रियं कामं वक्तव्यं त्वयि यन्मया

svāmī me mohitaḥ śrutvā rūpaṁ te bhuvanātigam | tatpriyārthaṁ priyaṁ kāmaṁ vaktavyaṁ tvayi yanmayā

'मेरे स्वामी आपके त्रिभुवन में अद्वितीय रूप के विषय में सुनकर मोहित हो गए हैं; उनके प्रेम हेतु मुझे आपसे केवल प्रिय और कामनापूर्ण वचन ही कहने चाहिए।'

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.10.26)

राज्यं तव धनं सर्वं दासस्ते महिषः किल । कुरु भावं विशालाक्षि त्यक्त्वा रोषं मृतिप्रदम्

rājyaṁ tava dhanaṁ sarvaṁ dāsaste mahiṣaḥ kila | kuru bhāvaṁ viśālākṣi tyaktvā roṣaṁ mṛtipradam

'राज्य आपका है, समस्त धन आपका है — महिष तो आपका दास है। हे विशालाक्षि! मृत्युदायक क्रोध त्यागकर अनुकूल भाव धारण कीजिए।'

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.10.27)

पतामि पादयोस्तेऽहं भक्तिभावेन भामिनि । पट्टराज्ञी महाराज्ञो भव शीघ्रं शुचिस्मिते

patāmi pādayoste'haṁ bhaktibhāvena bhāmini | paṭṭarājñī mahārājño bhava śīghraṁ śucismite

'हे भामिनि! मैं भक्तिभाव से आपके चरणों में गिरता हूँ। हे शुचिस्मिते! शीघ्र ही महाराज की पटरानी बन जाइए।'

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.10.28)

त्रैलोक्यविभवं सर्वं प्राप्स्यसि त्वमनाविलम् । सुखं संसारजं सर्वं महिषस्य परिग्रहात्

trailokyavibhavaṁ sarvaṁ prāpsyasi tvamanāvilam | sukhaṁ saṁsārajaṁ sarvaṁ mahiṣasya parigrahāt

'महिष की पत्नी बनकर आप त्रिलोक का सम्पूर्ण, निष्कंटक ऐश्वर्य तथा संसार के समस्त सुख प्राप्त करेंगी।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.10.29)

देव्युवाच । शृणु साचिव वक्ष्यामि वाक्यानां सारमुत्तमम् । शास्त्रदृष्टेन मार्गेण चातुर्यमनुचिन्त्य च

devyuvāca | śṛṇu sāciva vakṣyāmi vākyānāṁ sāramuttamam | śāstradṛṣṭena mārgeṇa cāturyamanucintya ca

देवी ने कहा — हे मन्त्रिन्! सुनो, मैं तुम्हें शास्त्र-सम्मत मार्ग से तथा योग्यतापूर्वक विचार कर वचनों का उत्तम सार बताती हूँ।

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.10.30)

महिषस्य प्रधानस्त्वं मया ज्ञातं धिया किल । पशुबुद्धिस्वभावोऽसि वचनात्तव साम्प्रतम्

mahiṣasya pradhānastvaṁ mayā jñātaṁ dhiyā kila | paśubuddhisvabhāvo'si vacanāttava sāmpratam

'तुम महिष के प्रधान मन्त्री हो — यह मैं अपनी बुद्धि से जान गई हूँ। तुम्हारे वचनों से यह स्पष्ट हो गया है कि तुम्हारा स्वभाव भी पशु-बुद्धि जैसा ही है।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.10.31)

मन्त्रिणस्त्वादृशा यस्य स कथं बुद्धिमान्भवेत् । उभयोः सदृशो योगः कृतोऽयं विधिना किल

mantriṇastvādṛśā yasya sa kathaṁ buddhimānbhavet | ubhayoḥ sadṛśo yogaḥ kṛto'yaṁ vidhinā kila

'जिसका मन्त्री तुम्हारे जैसा हो, वह भला बुद्धिमान् कैसे हो सकता है? तुम दोनों की यह जोड़ी विधाता ने ही सुसंगत बनाई है।'

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.10.32)

यदुक्तं स्त्रीस्वभावासि तद्विचारस्य मूढ किम् । पुमान्नाहं तत्स्वभावाभवंस्त्रीवेषधारिणी

yaduktaṁ strīsvabhāvāsi tadvicārasya mūḍha kim | pumānnāhaṁ tatsvabhāvābhavaṁstrīveṣadhāriṇī

'तुमने जो कहा कि मैं स्त्री-स्वभाव वाली हूँ — इसमें विचार करने योग्य क्या है, हे मूढ़? मैं पुरुष नहीं हूँ; अपने स्वभाव से ही मैंने यह स्त्री-वेष धारण किया है।'

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.10.33)

याचितं मरणं पूर्वं स्त्रिया त्वत्प्रभुणा यथा । तस्मान्मन्येऽतिमूर्खोऽसौ न वीररसवित्तमः

yācitaṁ maraṇaṁ pūrvaṁ striyā tvatprabhuṇā yathā | tasmānmanye'timūrkho'sau na vīrarasavittamaḥ

'चूँकि तुम्हारे स्वामी ने ही पहले स्त्री के हाथों अपनी मृत्यु की याचना की थी, इसलिए मैं उसे अत्यंत मूर्ख मानती हूँ, वीर-रस का सच्चा ज्ञाता नहीं।'

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.10.34)

कामिन्या मरणं क्लीबरतिदं शूरदुःखदम् । प्रार्थितं प्रभुणा तेन महिषेणात्मबुद्धिना

kāminyā maraṇaṁ klībaratidaṁ śūraduḥkhadam | prārthitaṁ prabhuṇā tena mahiṣeṇātmabuddhinā

'कामिनी के हाथों मृत्यु नपुंसक के लिए आनन्ददायक और शूरवीर के लिए दुःखदायी होती है — फिर भी तुम्हारे स्वामी महिष ने अपनी ही बुद्धि से यह याचना की थी।'

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.10.35)

तस्मात्स्त्रीरूपमाधाय कार्यं कर्तुमुपागता । कथं बिभेमि त्वद्वाक्यैर्धर्मशास्त्रविरोधकैः

tasmātstrīrūpamādhāya kāryaṁ kartumupāgatā | kathaṁ bibhemi tvadvākyairdharmaśāstravirodhakaiḥ

'इसीलिए स्त्री-रूप धारण कर मैं यह कार्य सम्पन्न करने आई हूँ — तुम्हारे धर्मशास्त्र-विरुद्ध वचनों से मैं भला कैसे भयभीत हो सकती हूँ?'

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.10.36)

विपरीतं यदा दैवं तृणं वज्रसमं भवेत् । विधिश्चेत्सुमुखः कामं कुलिशं तूलवत्तदा

viparītaṁ yadā daivaṁ tṛṇaṁ vajrasamaṁ bhavet | vidhiścetsumukhaḥ kāmaṁ kuliśaṁ tūlavattadā

'जब दैव प्रतिकूल हो जाए, तो तिनका भी वज्र के समान हो जाता है; और जब विधि अनुकूल हो, तो वज्र भी रुई के समान हल्का हो जाता है।'

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.10.37)

किं सैन्यैरायुधैः किं वा प्रपञ्चैर्दुर्गसेवनैः । मरणं साम्प्रतं यस्य तस्य सैन्यैस्तु किं फलम्

kiṁ sainyairāyudhaiḥ kiṁ vā prapañcairdurgasevanaiḥ | maraṇaṁ sāmprataṁ yasya tasya sainyaistu kiṁ phalam

'सेनाओं और आयुधों से क्या लाभ, अथवा दुर्ग की सुरक्षा के विस्तृत उपायों से भी क्या लाभ? जिसकी मृत्यु निकट है, उसके लिए सेना का भला क्या फल है?'

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.10.38)

यदायं देहसम्बन्धो जीवस्य कालयोगतः । तदैव लिखितं सर्वं सुखं दुःखं तथा मृतिः

yadāyaṁ dehasambandho jīvasya kālayogataḥ | tadaiva likhitaṁ sarvaṁ sukhaṁ duḥkhaṁ tathā mṛtiḥ

'जब काल के योग से जीव का देह से यह सम्बन्ध होता है, तभी सुख, दुःख तथा मृत्यु — सब कुछ लिखा जा चुका होता है।'

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.10.39)

यस्य येन प्रकारेण मरणं दैवनिर्मितम् । तस्य तेनैव जायेत नान्यथेति विनिश्चयः

yasya yena prakāreṇa maraṇaṁ daivanirmitam | tasya tenaiva jāyeta nānyatheti viniścayaḥ

'जिसकी मृत्यु जिस प्रकार दैव द्वारा निर्धारित है, वह उसी प्रकार होती है, अन्यथा नहीं — यह निश्चित सत्य है।'

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.10.40)

ब्रह्मादीनां यथा काले नाशोत्पत्ती विनिर्मिते । तथैव भवतः कामं किमन्येषां विचार्यते

brahmādīnāṁ yathā kāle nāśotpattī vinirmite | tathaiva bhavataḥ kāmaṁ kimanyeṣāṁ vicāryate

'जैसे ब्रह्मा आदि के भी विनाश और उत्पत्ति काल द्वारा निर्धारित हैं, वैसे ही तुम्हारा भी है — फिर अन्य साधारण जनों के विषय में तो क्या ही विचार किया जाए?'

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.10.41)

ये मृत्युधर्मिणस्तेषां वरदानेन दर्पिताः । मरिष्यामो न मन्यन्ते ते मूढा मन्दचेतसः

ye mṛtyudharmiṇasteṣāṁ varadānena darpitāḥ | mariṣyāmo na manyante te mūḍhā mandacetasaḥ

'जो प्राणी स्वभाव से मृत्युधर्मा हैं, फिर भी वरदान से गर्वित होकर यह नहीं मानते कि "हम मरेंगे" — वे मूढ़ और मन्दबुद्धि हैं।'

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.10.42)

तस्माद् गच्छ नृपं ब्रूहि वचनं मम सत्वरम् । यदाज्ञापयते भूपस्तत्कर्तव्यं त्वया किल

tasmād gaccha nṛpaṁ brūhi vacanaṁ mama satvaram | yadājñāpayate bhūpastatkartavyaṁ tvayā kila

'इसलिए जाओ, और शीघ्र राजा से मेरे ये वचन कहो। राजा जो भी आज्ञा दे, वह तुम्हें अवश्य करना है।'

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.10.43)

मघवा स्वर्गमाप्नोतु देवाः सन्तु हविर्भुजः । यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ

maghavā svargamāpnotu devāḥ santu havirbhujaḥ | yūyaṁ prayāta pātālaṁ yadi jīvitumicchatha

'मघवा (इन्द्र) पुनः स्वर्ग प्राप्त करें, देवगण पुनः हवि के भोक्ता बनें। तुम सब यदि जीवित रहना चाहते हो, तो पाताल चले जाओ।'

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.10.44)

अन्यथा चेन्मतिर्मन्द महिषस्य दुरात्मनः । तद्युध्यस्व मया सार्धं मरणाय कृतादरः

anyathā cenmatirmanda mahiṣasya durātmanaḥ | tadyudhyasva mayā sārdhaṁ maraṇāya kṛtādaraḥ

'यदि उस मन्दबुद्धि, दुरात्मा महिष का मत इससे भिन्न हो, तो वह मृत्यु के लिए तत्पर होकर मुझसे युद्ध करे।'

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.10.45)

मन्यसे सङ्गरे भग्ना देवा विष्णुपुरोगमाः । दैवं हि कारणं तत्र वरदानं प्रजापतेः

manyase saṅgare bhagnā devā viṣṇupurogamāḥ | daivaṁ hi kāraṇaṁ tatra varadānaṁ prajāpateḥ

'तुम यह मानते हो कि उस युद्ध में विष्णु सहित देवगण पराजित हुए थे — परन्तु उसका वास्तविक कारण तो प्रजापति का वह वरदान अर्थात् दैव ही था।'

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.10.46)

व्यास उवाच । इति देव्या वचः श्रुत्वा चिन्तयामास दानवः । किं कर्तव्यं मया युद्धं गन्तव्यं वा नृपं प्रति

vyāsa uvāca | iti devyā vacaḥ śrutvā cintayāmāsa dānavaḥ | kiṁ kartavyaṁ mayā yuddhaṁ gantavyaṁ vā nṛpaṁ prati

व्यास जी ने कहा — देवी के इन वचनों को सुनकर वह दानव (मन्त्री) सोचने लगा — 'मुझे क्या करना चाहिए — युद्ध करूँ, अथवा राजा के पास जाऊँ?'

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.10.47)

विवाहार्थमिहाज्ञप्तो राज्ञा कामातुरेण वै । तत्कथं विरसं कृत्वा गच्छेयं नृपसन्निधौ

vivāhārthamihājñapto rājñā kāmātureṇa vai | tatkathaṁ virasaṁ kṛtvā gaccheyaṁ nṛpasannidhau

'मैं यहाँ कामातुर राजा द्वारा विवाह हेतु भेजा गया था — तो भला मैं रस भंग करके राजा के समक्ष कैसे जाऊँ?'

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.10.48)

इयं बुद्धिः समीचीना यद् व्रजामि कलिं विना । यथागतं तथा शीघ्रं राज्ञे संवेदयाम्यहम्

iyaṁ buddhiḥ samīcīnā yad vrajāmi kaliṁ vinā | yathāgataṁ tathā śīghraṁ rājñe saṁvedayāmyaham

'यही उचित प्रतीत होता है कि मैं बिना संघर्ष किए लौट जाऊँ, और जैसा हुआ, वैसा ही शीघ्र राजा को बता दूँ।'

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.10.49)

स प्रमाणं पुनः कार्ये राजा मतिमतां वरः । करिष्यति विचार्यैव सचिवैर्निपुणैः सह

sa pramāṇaṁ punaḥ kārye rājā matimatāṁ varaḥ | kariṣyati vicāryaiva sacivairnipuṇaiḥ saha

'फिर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा ही इस कार्य में प्रमाण होंगे — वे अपने कुशल मन्त्रियों के साथ विचारपूर्वक ही निर्णय करेंगे।'

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.10.50)

सहसा न मया युद्धं कर्तव्यमनया सह । जये पराजये वापि भूपतेरप्रियं भवेत्

sahasā na mayā yuddhaṁ kartavyamanayā saha | jaye parājaye vāpi bhūpaterapriyaṁ bhavet

'मुझे इसके साथ अकस्मात् युद्ध नहीं करना चाहिए — क्योंकि जीत हो या हार, दोनों ही स्थितियों में राजा को अप्रिय लगेगा।'

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.10.51)

यदि मां सुन्दरी हन्यादहं वा हन्मि तां पुनः । येन केनाप्युपायेन स कुप्येत्पार्थिवः किल

yadi māṁ sundarī hanyādahaṁ vā hanmi tāṁ punaḥ | yena kenāpyupāyena sa kupyetpārthivaḥ kila

'यदि वह सुन्दरी मुझे मार डाले, अथवा मैं ही उसे मार डालूँ — किसी भी उपाय से राजा अवश्य क्रुद्ध होंगे।'

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.10.52)

तस्मात्तत्रैव गत्वाहं बोधयिष्यामि तं नृपम् । यथाद्याभिहितं देव्या यथारुचि करोतु सः

tasmāttatraiva gatvāhaṁ bodhayiṣyāmi taṁ nṛpam | yathādyābhihitaṁ devyā yathāruci karotu saḥ

'इसलिए मैं वहीं जाकर राजा को यह सूचित करूँगा कि देवी ने आज क्या कहा है; फिर वे जैसा उचित समझें, वैसा करें।'

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.10.53)

व्यास उवाच । इति सञ्चिन्त्य मेधावी जगाम नृपसन्निधौ । प्रणम्य तमुवाचेदं कृताञ्जलिरमात्यकः

vyāsa uvāca | iti sañcintya medhāvī jagāma nṛpasannidhau | praṇamya tamuvācedaṁ kṛtāñjaliramātyakaḥ

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार विचार कर वह बुद्धिमान् मन्त्री राजा के समीप गया, और हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए उससे यह कहने लगा।

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.10.54)

मन्त्र्युवाच । राजन् देवी वरारोहा सिंहस्योपरि संस्थिता । अष्टादशभुजा रम्या वरायुधधरा परा

mantryuvāca | rājan devī varārohā siṁhasyopari saṁsthitā | aṣṭādaśabhujā ramyā varāyudhadharā parā

मन्त्री ने कहा — 'हे राजन्! वह श्रेष्ठ देवी सिंह पर विराजमान, अठारह भुजाओं वाली, रम्य, उत्तम आयुधों को धारण करने वाली, परम अद्भुत हैं —'

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.10.55)

सा मयोक्ता महाराज महिषं भज भामिनि । महिषी भव राज्ञस्त्वं त्रैलोक्याधिपतेः प्रिया

sā mayoktā mahārāja mahiṣaṁ bhaja bhāmini | mahiṣī bhava rājñastvaṁ trailokyādhipateḥ priyā

'— हे महाराज! मैंने उससे कहा — "हे भामिनि! महिष को स्वीकार करो; त्रैलोक्याधिपति राजा की प्रिय पत्नी बनो।"'

श्लोक 56 (devibhagavatam.5.10.56)

पट्टराज्ञी त्वमेवास्य भविता नात्र संशयः । स तवाज्ञाकरो जातो वशवर्ती भविष्यति

paṭṭarājñī tvamevāsya bhavitā nātra saṁśayaḥ | sa tavājñākaro jāto vaśavartī bhaviṣyati

'"तुम ही निःसंदेह उसकी पटरानी बनोगी; वह तुम्हारा आज्ञाकारी बन चुका है और सदा तुम्हारे वश में रहेगा।"'

श्लोक 57 (devibhagavatam.5.10.57)

त्रैलोक्यविभवं भुक्त्वा चिरकालं वरानने । महिषं पतिमासाद्य योषितां सुभगा भव

trailokyavibhavaṁ bhuktvā cirakālaṁ varānane | mahiṣaṁ patimāsādya yoṣitāṁ subhagā bhava

'"हे वरानने! महिष को पति के रूप में पाकर, त्रिलोक के ऐश्वर्य का दीर्घकाल तक भोग करते हुए, समस्त स्त्रियों में सुभगा बनो।"'

श्लोक 58 (devibhagavatam.5.10.58)

इति मद्वचनं श्रुत्वा सा स्मयावेशमोहिता । मामुवाच विशालाक्षी स्मितपूर्वमिदं वचः

iti madvacanaṁ śrutvā sā smayāveśamohitā | māmuvāca viśālākṣī smitapūrvamidaṁ vacaḥ

'— मेरे इन वचनों को सुनकर, वह विशालाक्षी उपहासपूर्ण हँसी से भर उठी, और मुस्कुराते हुए मुझसे यह वचन कहा —'

श्लोक 59 (devibhagavatam.5.10.59)

महिषीगर्भसम्भूतं पशूनामधमं किल । बलिं दास्याम्यहं देव्यै सुराणां हितकाम्यया

mahiṣīgarbhasambhūtaṁ paśūnāmadhamaṁ kila | baliṁ dāsyāmyahaṁ devyai surāṇāṁ hitakāmyayā

'"जो महिषी के गर्भ से उत्पन्न, पशुओं में अधम है, उसे मैं देवी को बलि के रूप में अर्पित कर दूँगी, देवताओं के हित की कामना से।"'

श्लोक 60 (devibhagavatam.5.10.60)

का मूढा कामिनी लोके महिषं वै पतिं भजेत् । मादृशी मन्दबुद्धे किं पशुभावं भजेदिह

kā mūḍhā kāminī loke mahiṣaṁ vai patiṁ bhajet | mādṛśī mandabuddhe kiṁ paśubhāvaṁ bhajediha

'"संसार में कौन-सी मूढ़ स्त्री महिष को अपना पति मान सकती है? हे मन्दबुद्धे! क्या मेरे जैसी कोई पशु-भाव धारण कर सकती है?"'

श्लोक 61 (devibhagavatam.5.10.61)

महिषी महिषं नाथं सशृङ्गा शृङ्गसंयुतम् । कुरुते क्रन्दमाना वै नाहं तत्सदृशी शठा

mahiṣī mahiṣaṁ nāthaṁ saśṛṅgā śṛṅgasaṁyutam | kurute krandamānā vai nāhaṁ tatsadṛśī śaṭhā

'"एक भैंसी ही, स्वयं सींगों वाली होकर, सींगों वाले भैंसे को अपना स्वामी बनाती है, विलाप करती हुई — मैं उसके समान मूढ़ नहीं हूँ।"'

श्लोक 62 (devibhagavatam.5.10.62)

करिष्येऽहं मृधे युद्धं हनिष्ये त्वां सुराप्रियम् । गच्छ वा दुष्ट पातालं जीवितेच्छा यदस्ति ते

kariṣye'haṁ mṛdhe yuddhaṁ haniṣye tvāṁ surāpriyam | gaccha vā duṣṭa pātālaṁ jīvitecchā yadasti te

'"मैं युद्ध करूँगी और तुम्हें मार डालूँगी, हे मदिरा-प्रिय! अथवा हे दुष्ट! यदि जीवित रहने की इच्छा हो, तो पाताल चले जाओ।"'

श्लोक 63 (devibhagavatam.5.10.63)

परुषं तु तया वाक्यमित्युक्तं नृप मत्तया । तच्छ्रुत्वाहं समायातः प्रविचिन्त्य पुनः पुनः

paruṣaṁ tu tayā vākyamityuktaṁ nṛpa mattayā | tacchrutvāhaṁ samāyātaḥ pravicintya punaḥ punaḥ

'हे राजन्! उस मदमत्त स्त्री ने इस प्रकार कठोर वचन कहे। उन्हें सुनकर, बार-बार विचार करके, मैं लौट आया हूँ।'

श्लोक 64 (devibhagavatam.5.10.64)

रसभङ्गं विचिन्त्यैव न युद्धं तु मया कृतम् । आज्ञां विना तवात्यन्तं कथं कुर्यां वृथोद्यमम्

rasabhaṅgaṁ vicintyaiva na yuddhaṁ tu mayā kṛtam | ājñāṁ vinā tavātyantaṁ kathaṁ kuryāṁ vṛthodyamam

'रस-भंग होने की आशंका से ही मैंने स्वयं युद्ध नहीं किया। आपकी आज्ञा के बिना मैं भला ऐसा व्यर्थ का प्रयत्न कैसे करूँ?'

श्लोक 65 (devibhagavatam.5.10.65)

सातीव च बलोन्मत्ता वर्तते भूप भामिनी । भवितव्यं न जानामि किं वा भावि भविष्यति

sātīva ca balonmattā vartate bhūpa bhāminī | bhavitavyaṁ na jānāmi kiṁ vā bhāvi bhaviṣyati

'हे भूप! वह देवी अपने बल से अत्यंत उन्मत्त हैं। मुझे नहीं पता कि आगे क्या होनहार है, अथवा भविष्य में क्या होगा।'

श्लोक 66 (devibhagavatam.5.10.66)

कार्येऽस्मिंस्त्वं प्रमाणं नो मन्त्रोऽतीव दुरासदः । युद्धं पलायनं श्रेयो न जानेऽहं विनिश्चयम्

kārye'smiṁstvaṁ pramāṇaṁ no mantro'tīva durāsadaḥ | yuddhaṁ palāyanaṁ śreyo na jāne'haṁ viniścayam

'इस कार्य में आप ही हमारे लिए प्रमाण हैं — यह परामर्श अत्यंत कठिन है। युद्ध श्रेयस्कर है अथवा पलायन, इसका निश्चित निर्णय मैं नहीं कर पा रहा हूँ।'

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