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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 11

ताम्र द्वारा देवी को समझाने के वचन

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.11.1)

व्यास उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा महिषो मदविह्वलः । मन्त्रिवृद्धान् समाहूय राजा वचनमब्रवीत्

vyāsa uvāca | iti tasya vacaḥ śrutvā mahiṣo madavihvalaḥ | mantrivṛddhān samāhūya rājā vacanamabravīt

व्यास जी ने कहा — उसके वचन सुनकर, मद से विह्वल महिष राजा ने अपने वृद्ध मन्त्रियों को बुलाकर यह कहा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.11.2)

राजोवाच । मन्त्रिणः किं च कर्तव्यं विश्रब्धं ब्रूत मा चिरम् । आगता देवविहिता मायेयं शाम्बरीव किम्

rājovāca | mantriṇaḥ kiṁ ca kartavyaṁ viśrabdhaṁ brūta mā ciram | āgatā devavihitā māyeyaṁ śāmbarīva kim

राजा ने कहा — हे मन्त्रियो! अब क्या करना चाहिए? निःसंकोच होकर शीघ्र बताओ। क्या यह देवताओं द्वारा रची गई कोई शाम्बरी माया है?

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.11.3)

कार्येऽस्मिन्निपुणा यूयमुपायेषु विचक्षणाः । सामादिषु च कर्तव्यः कोऽत्र मह्यं ब्रुवन्तु च

kārye'sminnipuṇā yūyamupāyeṣu vicakṣaṇāḥ | sāmādiṣu ca kartavyaḥ ko'tra mahyaṁ bruvantu ca

तुम इस विषय में निपुण हो, उपायों में विचक्षण हो। मुझे बताओ कि यहाँ साम आदि उपायों में से कौन-सा उपयुक्त है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.11.4)

मन्त्रिण ऊचुः । सत्यं सदैव वक्तव्यं प्रियञ्च नृपसत्तम । कार्यं हितकरं नूनं विचार्य विबुधैः किल

mantriṇa ūcuḥ | satyaṁ sadaiva vaktavyaṁ priyañca nṛpasattama | kāryaṁ hitakaraṁ nūnaṁ vicārya vibudhaiḥ kila

मन्त्रियों ने कहा — हे नृपसत्तम! सत्य सदा कहना चाहिए, और प्रिय भी; विद्वानों को सदा विचारपूर्वक ही हितकारी कार्य करना चाहिए।

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.11.5)

सत्यं च हितकृद्राजन्प्रियं चाहितकृद्भवेत् । यथौषधं नृणां लोके ह्यप्रियं रोगनाशनम्

satyaṁ ca hitakṛdrājanpriyaṁ cāhitakṛdbhavet | yathauṣadhaṁ nṛṇāṁ loke hyapriyaṁ roganāśanam

हे राजन्! सत्य और हितकारी वचन कभी-कभी अप्रिय भी हो सकता है; जैसे संसार में औषधि, अप्रिय होते हुए भी, रोग का नाश करती है।

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.11.6)

सत्यस्य श्रोता मन्ता च दुर्लभः पृथिवीपते । वक्तापि दुर्लभः कामं बहवश्चाटुभाषकाः

satyasya śrotā mantā ca durlabhaḥ pṛthivīpate | vaktāpi durlabhaḥ kāmaṁ bahavaścāṭubhāṣakāḥ

हे पृथिवीपते! सत्य को सुनने और स्वीकार करने वाला दुर्लभ है; सत्य कहने वाला भी दुर्लभ है — चाटुकार तो अनेक होते हैं।

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.11.7)

कथं ब्रूमोऽत्र नृपते विचारे गहने त्विह । शुभं वाप्यशुभं वापि को वेत्ति भुवनत्रये

kathaṁ brūmo'tra nṛpate vicāre gahane tviha | śubhaṁ vāpyaśubhaṁ vāpi ko vetti bhuvanatraye

हे नृपते! इस अत्यंत गहन विचार-विषय में हम भला क्या कहें? इसमें शुभ है या अशुभ, इसे त्रिलोक में कौन जानता है?

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.11.8)

राजोवाच । स्वस्वमत्यनुसारेण ब्रुवन्त्वद्य पृथक्पृथक् । येषां हि यादृशो भावस्तच्छ्रुत्वा चिन्तयाम्यहम्

rājovāca | svasvamatyanusāreṇa bruvantvadya pṛthakpṛthak | yeṣāṁ hi yādṛśo bhāvastacchrutvā cintayāmyaham

राजा ने कहा — आज सब अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार पृथक्-पृथक् कहें; जिस-जिसका जैसा भाव हो, उसे सुनकर मैं विचार करूँगा।

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.11.9)

बहूनां मतमाज्ञाय विचार्य च पुनः पुनः । यच्छ्रेयस्तद्धि कर्तव्यं कार्यं कार्यविचक्षणैः

bahūnāṁ matamājñāya vicārya ca punaḥ punaḥ | yacchreyastaddhi kartavyaṁ kāryaṁ kāryavicakṣaṇaiḥ

अनेक जनों के मत को जानकर तथा बार-बार विचार करके, कार्यकुशल लोगों को वही करना चाहिए जो श्रेयस्कर हो।

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.11.10)

व्यास उवाच । तस्यैवं वचनं श्रुत्वा विरूपाक्षो महाबलः । उवाच तरसा वाक्यं रञ्जयन्पृथिवीपतिम्

vyāsa uvāca | tasyaivaṁ vacanaṁ śrutvā virūpākṣo mahābalaḥ | uvāca tarasā vākyaṁ rañjayanpṛthivīpatim

व्यास जी ने कहा — उसके इस वचन को सुनकर महाबली विरूपाक्ष ने पृथिवीपति को प्रसन्न करते हुए तुरन्त यह कहा।

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.11.11)

विरूपाक्ष उवाच । राजन्नारी वराकीयं सा ब्रूते मदगर्विता । विभीषिकामात्रमिदं ज्ञातव्यं वचनं त्वया

virūpākṣa uvāca | rājannārī varākīyaṁ sā brūte madagarvitā | vibhīṣikāmātramidaṁ jñātavyaṁ vacanaṁ tvayā

विरूपाक्ष ने कहा — हे राजन्! यह तो एक तुच्छ, मद से गर्वित स्त्री ही तो है। आप इसे केवल भय दिखाने का वचन मात्र समझें।

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.11.12)

को बिभेति स्त्रियो वाक्यैर्दुरुक्तै रणदुर्मदैः । अनृतं साहसं चेति जानन्नारीविचेष्टितम्

ko bibheti striyo vākyairduruktai raṇadurmadaiḥ | anṛtaṁ sāhasaṁ ceti jānannārīviceṣṭitam

भला कौन स्त्रियों के कठोर, युद्धोन्मत्त वचनों से भयभीत होता है, यह जानते हुए कि नारी का आचरण असत्य और दुःसाहस से भरा होता है?

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.11.13)

जित्वा त्रिभुवनं राजन्नद्य कान्ताभयेन वै । दीनत्वेऽप्ययशो नूनं वीरस्य भुवने भवेत्

jitvā tribhuvanaṁ rājannadya kāntābhayena vai | dīnatve'pyayaśo nūnaṁ vīrasya bhuvane bhavet

हे राजन्! तीनों लोकों को जीतकर, आज एक स्त्री के भय से दीन होना, वीर के लिए संसार में निश्चय ही अपयश का कारण होगा।

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.11.14)

तस्माद्याम्यहमेकाकी युद्धाय चण्डिकां प्रति । हनिष्ये तां महाराज निर्भयो भव साम्प्रतम्

tasmādyāmyahamekākī yuddhāya caṇḍikāṁ prati | haniṣye tāṁ mahārāja nirbhayo bhava sāmpratam

इसलिए मैं स्वयं अकेला ही उस चण्डिका से युद्ध करने जाऊँगा; हे महाराज! मैं उसका वध करूँगा — अब निर्भय हो जाइए।

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.11.15)

सेनावृतोऽहं गत्वा तां शस्त्रास्त्रैर्विविधैः किल । निषूदयामि दुर्मर्षां चण्डिकां चण्डविक्रमाम्

senāvṛto'haṁ gatvā tāṁ śastrāstrairvividhaiḥ kila | niṣūdayāmi durmarṣāṁ caṇḍikāṁ caṇḍavikramām

सेना से घिरा हुआ मैं वहाँ जाकर विविध शस्त्रास्त्रों से उस दुःसह, प्रचण्ड पराक्रमी चण्डिका का संहार कर दूँगा।

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.11.16)

बद्ध्वा सर्पमयैः पाशैरानयिष्ये तवान्तिकम् । वशगा तु सदा ते स्यात्पश्य राजन् बलं मम

baddhvā sarpamayaiḥ pāśairānayiṣye tavāntikam | vaśagā tu sadā te syātpaśya rājan balaṁ mama

अथवा सर्पों के पाशों से बाँधकर मैं उसे आपके समीप ले आऊँगा; वह सदा आपके अधीन रहेगी। हे राजन्! मेरा बल तो देखिए!

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.11.17)

व्यास उवाच । विरूपाक्षवचः श्रुत्वा दुर्धरो वाक्यमब्रवीत् । सत्यमुक्तं वचो राजन् विरूपाक्षेण धीमता

vyāsa uvāca | virūpākṣavacaḥ śrutvā durdharo vākyamabravīt | satyamuktaṁ vaco rājan virūpākṣeṇa dhīmatā

व्यास जी ने कहा — विरूपाक्ष के वचनों को सुनकर दुर्धर ने कहा — 'हे राजन्! बुद्धिमान् विरूपाक्ष द्वारा कहा गया वचन सत्य ही है —'

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.11.18)

ममापि वचनं श्लक्ष्णं श्रोतव्यं धीमता त्वया । कामातुरैषा सुदती लक्ष्यतेऽप्यनुमानतः

mamāpi vacanaṁ ślakṣṇaṁ śrotavyaṁ dhīmatā tvayā | kāmāturaiṣā sudatī lakṣyate'pyanumānataḥ

'— फिर भी हे बुद्धिमान्! आप मेरे कोमल वचन भी सुनें। यह सुन्दर-दन्ता स्त्री अनुमान से कामातुर प्रतीत होती है।'

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.11.19)

भवत्येवंविधा कामं नायिका रूपगर्विता । भीषयित्वा वरारोहा त्वां वशे कर्तुमिच्छति

bhavatyevaṁvidhā kāmaṁ nāyikā rūpagarvitā | bhīṣayitvā varārohā tvāṁ vaśe kartumicchati

'रूप-गर्विता नायिकाएँ प्रायः इसी प्रकार का आचरण करती हैं; वह श्रेष्ठ नारी भय दिखाकर आपको अपने वश में करना चाहती है।'

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.11.20)

हावोऽयं मानिनीनां वै तं वेत्ति रसवित्तमः । वक्रोक्तिरेषा कामिन्याः प्रियं प्रति परायणम्

hāvo'yaṁ māninīnāṁ vai taṁ vetti rasavittamaḥ | vakroktireṣā kāminyāḥ priyaṁ prati parāyaṇam

'यह मानिनी नारियों का हाव-भाव है — इसे केवल रसिक पुरुष ही जानता है; कामिनी की यह वक्रोक्ति उसके प्रिय के प्रति ही समर्पित होती है।'

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.11.21)

वेत्ति कोऽपि नरः कामं कामशास्त्रविचक्षणः । यदुक्तं नाम बाणैस्त्वा वधिष्ये रणमूर्धनि

vetti ko'pi naraḥ kāmaṁ kāmaśāstravicakṣaṇaḥ | yaduktaṁ nāma bāṇaistvā vadhiṣye raṇamūrdhani

'केवल कामशास्त्र में निपुण पुरुष ही इसे समझता है। जो उसने कहा कि "मैं तुम्हें रणभूमि में बाणों से मार डालूँगी" —'

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.11.22)

हेतुगर्भमिदं वाक्यं ज्ञातव्यं हेतुवित्तमैः । बाणास्तु मानिनीनां वै कटाक्षा एव विश्रुताः

hetugarbhamidaṁ vākyaṁ jñātavyaṁ hetuvittamaiḥ | bāṇāstu māninīnāṁ vai kaṭākṣā eva viśrutāḥ

'— यह वचन गूढ़ार्थ से भरा है, इसे तर्क-कुशल जन ही समझ सकते हैं। मानिनी नारियों के "बाण" तो प्रसिद्ध रूप से उनकी कटाक्ष-दृष्टि ही होते हैं।'

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.11.23)

पुष्पाञ्जलिमयाश्चान्ये व्यङ्ग्यानि वचनानि च । का शक्तिरन्यबाणानां प्रेरणे त्वयि पार्थिव

puṣpāñjalimayāścānye vyaṅgyāni vacanāni ca | kā śaktiranyabāṇānāṁ preraṇe tvayi pārthiva

'अन्य "बाण" पुष्पांजलि और व्यंग्यपूर्ण वचनों के होते हैं। हे राजन्! अन्य किसी बाण में आप पर चलाए जाने की भला क्या शक्ति है?'

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.11.24)

तादृशीनां न सा शक्तिर्ब्रह्मविष्णुहरादिषु । ययोक्तं नेत्रबाणैस्त्वां हनिष्ये मन्द पार्थिवम्

tādṛśīnāṁ na sā śaktirbrahmaviṣṇuharādiṣu | yayoktaṁ netrabāṇaistvāṁ haniṣye manda pārthivam

'ऐसी स्त्रियों में ब्रह्मा-विष्णु-हर के विरुद्ध भी वैसी शक्ति नहीं होती — जो उसने कहा कि "हे मन्द राजन्! मैं तुम्हें नेत्र-बाणों से मार डालूँगी" —'

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.11.25)

विपरीतं परिज्ञातं तेनारसविदा किल । पातयिष्यामि शय्यायां रणमय्यां पतिं तव

viparītaṁ parijñātaṁ tenārasavidā kila | pātayiṣyāmi śayyāyāṁ raṇamayyāṁ patiṁ tava

'— उस रस-अज्ञ मन्त्री द्वारा इसे विपरीत अर्थ में समझा गया। "मैं तुम्हारे स्वामी को रणरूपी शय्या पर गिरा दूँगी" —'

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.11.26)

विपरीतरतिकीडाभाषणं ज्ञेयमेव तत् । करिष्ये विगतप्राणं यदुक्तं वचनं तया

viparītaratikīḍābhāṣaṇaṁ jñeyameva tat | kariṣye vigataprāṇaṁ yaduktaṁ vacanaṁ tayā

'— यह तो विपरीत-रति-क्रीड़ा की ही भाषा है। और उसने जो कहा कि "मैं इसे प्राणहीन कर दूँगी" —'

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.11.27)

वीर्यं प्राणा इति प्रोक्तं तद्विहीनं न चान्यथा । व्यङ्ग्याधिक्येन वाक्येन वरयत्युत्तमा नृप

vīryaṁ prāṇā iti proktaṁ tadvihīnaṁ na cānyathā | vyaṅgyādhikyena vākyena varayatyuttamā nṛpa

'— वीर्य को ही प्राण कहा गया है, और उससे रहित होने का अर्थ रति-क्रीड़ा में शिथिल होना ही है। हे राजन्! श्रेष्ठ नारी व्यंग्य से भरपूर वचनों द्वारा ही अपने प्रिय का वरण करती है।'

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.11.28)

तद्वै विचारतो ज्ञेयं रसग्रन्थविचक्षणैः । इति ज्ञात्वा महाराज कर्तव्यं रससंयुतम्

tadvai vicārato jñeyaṁ rasagranthavicakṣaṇaiḥ | iti jñātvā mahārāja kartavyaṁ rasasaṁyutam

'यह तो रस-ग्रन्थों के विशेषज्ञों द्वारा ही विचारपूर्वक समझा जा सकता है। हे महाराज! यह जानकर रसानुकूल कार्य ही करना चाहिए।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.11.29)

सामदानद्वयं तस्या नान्योपायोऽस्ति भूपते । रुष्टा वा गर्विता वापि वशगा मानिनी भवेत्

sāmadānadvayaṁ tasyā nānyopāyo'sti bhūpate | ruṣṭā vā garvitā vāpi vaśagā māninī bhavet

'हे भूपते! उसके लिए साम और दान — ये दो ही उपाय हैं, कोई अन्य उपाय नहीं है। क्रुद्ध हो अथवा गर्विता, मानिनी नारी अवश्य वशीभूत हो जाती है।'

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.11.30)

तादृशैर्मधुरैर्वाक्यैरानयिष्ये तवान्तिकम् । किं बहूक्तेन मे राजन् कर्तव्या वशवर्तिनी

tādṛśairmadhurairvākyairānayiṣye tavāntikam | kiṁ bahūktena me rājan kartavyā vaśavartinī

'ऐसे ही मधुर वचनों से मैं उसे आपके समीप ले आऊँगा। हे राजन्! अधिक कहने से क्या लाभ? उसे तो आपके वश में लाना ही है।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.11.31)

गत्वा मयाधुनैवेयं किङ्करीव सदैव ते । व्यास उवाव इत्थं निशम्य तद्वाक्यं ताम्रस्तत्त्वविचक्षणः

gatvā mayādhunaiveyaṁ kiṅkarīva sadaiva te | vyāsa uvāva itthaṁ niśamya tadvākyaṁ tāmrastattvavicakṣaṇaḥ

'मैं स्वयं अभी जाकर उसे सदैव के लिए, मानो एक दासी के समान, आपके अधीन बना दूँगा।' व्यास जी ने कहा — यह वचन सुनकर, तत्त्व का विचक्षण ज्ञाता ताम्र —

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.11.32)

उवाच वचनं राजन्निशामय मयोदितम् । हेतुमद्धर्मसहितं रसयुक्तं नयान्वितम्

uvāca vacanaṁ rājanniśāmaya mayoditam | hetumaddharmasahitaṁ rasayuktaṁ nayānvitam

— बोला — 'हे राजन्! मेरे कहे वचन सुनिए — जो तर्कयुक्त, धर्मसंगत, रससहित तथा नीतिसंगत हैं।'

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.11.33)

नैषा कामातुरा बाला नानुरक्ता विचक्षणा । व्यङ्ग्यानि नैव वाक्यानि तयोक्तानि तु मानद

naiṣā kāmāturā bālā nānuraktā vicakṣaṇā | vyaṅgyāni naiva vākyāni tayoktāni tu mānada

'हे मानद! यह बालिका न तो कामातुर है, न प्रेमासक्त, यद्यपि वह चतुर है। उसके कहे वचन व्यंग्यार्थक नहीं हैं।'

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.11.34)

चित्रमत्र महाबाहो यदेका वरवर्णिनी । निरालम्बा समायाति चित्ररूपा मनोहरा

citramatra mahābāho yadekā varavarṇinī | nirālambā samāyāti citrarūpā manoharā

'हे महाबाहो! यह आश्चर्य ही है कि एक अत्यंत सुन्दर, विचित्ररूपा तथा मनोहर नारी बिना किसी सहारे के अकेली यहाँ आई है।'

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.11.35)

अष्टादशभुजा नारी न श्रुता न च वीक्षिता । केनापि त्रिषु लोकेषु पराक्रमवती शुभा

aṣṭādaśabhujā nārī na śrutā na ca vīkṣitā | kenāpi triṣu lokeṣu parākramavatī śubhā

'अठारह भुजाओं वाली, इतनी पराक्रमी और शुभ नारी त्रिलोक में किसी ने न कभी सुनी है, न देखी है।'

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.11.36)

आयुधान्यपि तावन्ति धृतानि बलवन्ति च । विपरीतमिदं मन्ये सर्वं कालकृतं नृप

āyudhānyapi tāvanti dhṛtāni balavanti ca | viparītamidaṁ manye sarvaṁ kālakṛtaṁ nṛpa

'इतने सारे बलशाली आयुध भी उसने धारण कर रखे हैं। हे राजन्! मैं मानता हूँ कि यह सब असामान्य है, काल का ही कृत्य है।'

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.11.37)

स्वप्नानि दुर्निमित्तानि मया दृष्टानि वै निशि । तेन जानाम्यहं नूनं वैशसं समुपागतम्

svapnāni durnimittāni mayā dṛṣṭāni vai niśi | tena jānāmyahaṁ nūnaṁ vaiśasaṁ samupāgatam

'मैंने रात्रि में अशुभ स्वप्न देखे हैं; उनसे मैं निश्चय ही जान गया हूँ कि विनाश निकट आ गया है।'

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.11.38)

कृष्णाम्बरधरा नारी रुदती च गृहाङ्गणे । दृष्टा स्वप्नेऽप्युषःकाले चिन्तितव्यस्तदत्ययः

kṛṣṇāmbaradharā nārī rudatī ca gṛhāṅgaṇe | dṛṣṭā svapne'pyuṣaḥkāle cintitavyastadatyayaḥ

'स्वप्न में उषःकाल में मैंने घर के आँगन में विलाप करती हुई, काले वस्त्र पहने एक स्त्री को देखा — यह अनर्थ चिन्तनीय है।'

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.11.39)

विकृताः पक्षिणो रात्रौ रोरुवन्ति गृहे गृहे । उत्पाता विविधा राजन् प्रभवन्ति गृहे गृहे

vikṛtāḥ pakṣiṇo rātrau roruvanti gṛhe gṛhe | utpātā vividhā rājan prabhavanti gṛhe gṛhe

'रात्रि में विकृत पक्षी घर-घर में चीत्कार कर रहे हैं; हे राजन्! नाना प्रकार के उत्पात घर-घर में हो रहे हैं।'

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.11.40)

तेन जानाम्यहं नूनं कारणं किञ्चिदेव हि । यत्त्वां प्रार्थयते बाला युद्धाय कृतनिश्चया

tena jānāmyahaṁ nūnaṁ kāraṇaṁ kiñcideva hi | yattvāṁ prārthayate bālā yuddhāya kṛtaniścayā

'इससे मैं निश्चय ही जानता हूँ कि इसमें कोई गूढ़ कारण अवश्य है — कि यह युद्ध हेतु दृढ़संकल्प बालिका आपको ललकार रही है।'

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.11.41)

नैषास्ति मानुषी नो वा गान्धर्वी न तथासुरी । देवैः कृतेयं ज्ञातव्या माया मोहकरी विभो

naiṣāsti mānuṣī no vā gāndharvī na tathāsurī | devaiḥ kṛteyaṁ jñātavyā māyā mohakarī vibho

'वह न मानवी है, न गान्धर्वी, न आसुरी। हे विभो! इसे देवताओं द्वारा रची गई, मोह उत्पन्न करने वाली माया समझना चाहिए।'

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.11.42)

कातरत्वं न कर्तव्यं ममैतन्मतमित्यलम् । कर्तव्यं सर्वथा युद्धं यद्भाव्यं तद्भविष्यति

kātaratvaṁ na kartavyaṁ mamaitanmatamityalam | kartavyaṁ sarvathā yuddhaṁ yadbhāvyaṁ tadbhaviṣyati

'फिर भी भयभीत नहीं होना चाहिए — यही मेरा मत है। हर स्थिति में युद्ध ही करना चाहिए; जो होनहार है, वह होकर रहेगा।'

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.11.43)

को वेद दैवकर्तव्यं शुभं वाप्यशुभं तथा । अवलम्ब्य धिया धैर्यं स्थातव्यं वै विचक्षणैः

ko veda daivakartavyaṁ śubhaṁ vāpyaśubhaṁ tathā | avalambya dhiyā dhairyaṁ sthātavyaṁ vai vicakṣaṇaiḥ

'दैव का विधान शुभ है या अशुभ, यह कौन जानता है? विचक्षण पुरुषों को सदा बुद्धिपूर्वक धैर्य धारण कर स्थिर रहना चाहिए।'

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.11.44)

जीवितं मरणं पुंसां दैवाधीनं नराधिप । कोऽपि नैवान्यथा कर्तुं समर्थो भुवनत्रये

jīvitaṁ maraṇaṁ puṁsāṁ daivādhīnaṁ narādhipa | ko'pi naivānyathā kartuṁ samartho bhuvanatraye

'हे नराधिप! मनुष्यों का जीवन और मृत्यु दैव के अधीन है; तीनों लोकों में कोई भी इसे अन्यथा करने में समर्थ नहीं है।'

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.11.45)

महिष उवाच । गच्छ ताम्र महाभाग युद्धाय कृतनिश्चयः । तामानय वरारोहां जित्वा धर्मेण मानिनीम्

mahiṣa uvāca | gaccha tāmra mahābhāga yuddhāya kṛtaniścayaḥ | tāmānaya varārohāṁ jitvā dharmeṇa māninīm

महिष ने कहा — हे महाभाग ताम्र! युद्ध का संकल्प लेकर जाओ। उस श्रेष्ठ, मानिनी नारी को धर्मपूर्वक जीतकर यहाँ ले आओ।

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.11.46)

न भवेद्वशगा नारी सङ्ग्रामे यदि सा तव । हन्तव्या नान्यथा कामं माननीया प्रयत्नतः

na bhavedvaśagā nārī saṅgrāme yadi sā tava | hantavyā nānyathā kāmaṁ mānanīyā prayatnataḥ

'यदि युद्ध में वह नारी तुम्हारे वश में न आए, तो उसका वध कर दो; अन्यथा उसे प्रयत्नपूर्वक सम्मान दो।'

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.11.47)

वीरस्त्वमसि सर्वज्ञ कामशास्त्रविशारदः । येन केनाप्युपायेन जेतव्या वरवर्णिनी

vīrastvamasi sarvajña kāmaśāstraviśāradaḥ | yena kenāpyupāyena jetavyā varavarṇinī

'तुम वीर हो, सर्वज्ञ हो, कामशास्त्र में निपुण हो; किसी भी उपाय से उस श्रेष्ठ नारी को जीतना है।'

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.11.48)

त्वरन्वीर महाबाहो सैन्येन महता वृतः । तत्र गत्वा त्वया ज्ञेया विचार्य च पुनः पुनः

tvaranvīra mahābāho sainyena mahatā vṛtaḥ | tatra gatvā tvayā jñeyā vicārya ca punaḥ punaḥ

'हे वीर! हे महाबाहो! शीघ्रता करो, विशाल सेना से घिरे हुए। वहाँ जाकर, बार-बार विचार करके तुम्हें यह जानना है —'

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.11.49)

किमर्थमागता चेयं ज्ञातव्यं तद्धि कारणम् । कामाद्वा वैरभावाच्च माया कस्येयमित्युत

kimarthamāgatā ceyaṁ jñātavyaṁ taddhi kāraṇam | kāmādvā vairabhāvācca māyā kasyeyamityuta

'— वह किस प्रयोजन से आई है, इसका कारण जानना चाहिए। यह काम-भाव से आई है अथवा वैर-भाव से, तथा यह किसकी माया है —'

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.11.50)

आदौ तन्निश्चयं कृत्वा ज्ञातव्यं तच्चिकीर्षितम् । पश्चाद्युद्धं प्रकर्तव्यं यथायोग्यं यथाबलम्

ādau tanniścayaṁ kṛtvā jñātavyaṁ taccikīrṣitam | paścādyuddhaṁ prakartavyaṁ yathāyogyaṁ yathābalam

'— पहले इसका निश्चय कर उसकी अभिलाषा जान लेनी चाहिए, और उसके पश्चात् ही यथोचित और यथाशक्ति युद्ध करना चाहिए।'

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.11.51)

कातरत्वं न कर्तव्यं निर्दयत्वं तथा न च । यादृशं हि मनस्तस्याः कर्तव्यं तादृशं त्वया

kātaratvaṁ na kartavyaṁ nirdayatvaṁ tathā na ca | yādṛśaṁ hi manastasyāḥ kartavyaṁ tādṛśaṁ tvayā

'न तो कायरता दिखानी चाहिए, न ही निर्दयता। उसका मन जैसा हो, तुम्हें भी वैसा ही आचरण करना चाहिए।'

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.11.52)

व्यास उवाच । इति तद्भाषितं श्रुत्वा ताम्रः कालवशं गतः । निर्गतः सैन्यसंयुक्तः प्रणम्य महिषं नृपम्

vyāsa uvāca | iti tadbhāṣitaṁ śrutvā tāmraḥ kālavaśaṁ gataḥ | nirgataḥ sainyasaṁyuktaḥ praṇamya mahiṣaṁ nṛpam

व्यास जी ने कहा — यह वचन सुनकर, काल के वश में आया हुआ ताम्र, महिष राजा को प्रणाम कर, सेना सहित प्रस्थान कर गया।

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.11.53)

गच्छन्मार्गे दुरात्मासौ शकुनान्वीक्ष्य दारुणान् । विस्मयञ्च भयं प्राप यममार्गप्रदर्शकान्

gacchanmārge durātmāsau śakunānvīkṣya dāruṇān | vismayañca bhayaṁ prāpa yamamārgapradarśakān

मार्ग में जाते हुए वह दुरात्मा, यम-मार्ग को दर्शाने वाले भयंकर शकुनों को देखकर आश्चर्य और भय से भर उठा।

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.11.54)

सगत्वा तां समालोक्य देवीं सिंहोपरिस्थिताम् । स्तूयमानां सुरैः सर्वैः सर्वायुधविभूषिताम्

sagatvā tāṁ samālokya devīṁ siṁhoparisthitām | stūyamānāṁ suraiḥ sarvaiḥ sarvāyudhavibhūṣitām

वहाँ जाकर उसने सिंह पर विराजमान, सभी देवताओं द्वारा स्तुत, सर्वायुधों से विभूषित देवी को देखा।

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.11.55)

तामुवाच विनीतः सन् वाक्यं मधुरया गिरा । सामभावं समाश्रित्य विनयावनतः स्थितः

tāmuvāca vinītaḥ san vākyaṁ madhurayā girā | sāmabhāvaṁ samāśritya vinayāvanataḥ sthitaḥ

विनम्र होकर तथा विनय से झुककर, साम-भाव का आश्रय लेते हुए, उसने उससे मधुर वाणी में कहा।

श्लोक 56 (devibhagavatam.5.11.56)

देवि दैत्येश्वरः शृङ्गी त्वद्रूपगुणमोहितः । स्पृहां करोति महिषस्त्वत्पाणिग्रहणाय च

devi daityeśvaraḥ śṛṅgī tvadrūpaguṇamohitaḥ | spṛhāṁ karoti mahiṣastvatpāṇigrahaṇāya ca

'हे देवि! सींगों वाले दैत्येश्वर महिष, आपके रूप और गुणों से मोहित होकर, आपका पाणिग्रहण करने की इच्छा रखते हैं।'

श्लोक 57 (devibhagavatam.5.11.57)

भावं कुरु विशालाक्षि तस्मिन्नमरदुर्जये । पतिं तं प्राप्य मृद्वङ्गि नन्दने विहराद्भुते

bhāvaṁ kuru viśālākṣi tasminnamaradurjaye | patiṁ taṁ prāpya mṛdvaṅgi nandane viharādbhute

'हे विशालाक्षि! उस अमर-दुर्जय के प्रति अनुकूल भाव धारण करो। हे मृद्वंगि! उन्हें पति के रूप में पाकर अद्भुत नन्दन-वन में विहार करो।'

श्लोक 58 (devibhagavatam.5.11.58)

सर्वाङ्गसुन्दरं देहं प्राप्य सर्वसुखास्पदम् । सुखं सर्वात्मना ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः

sarvāṅgasundaraṁ dehaṁ prāpya sarvasukhāspadam | sukhaṁ sarvātmanā grāhyaṁ duḥkhaṁ heyamiti sthitiḥ

'सर्वांगसुन्दर, समस्त सुखों का आधार यह देह पाकर, यह उचित ही है कि सुख को पूर्ण रूप से ग्रहण किया जाए, और दुःख का त्याग किया जाए।'

श्लोक 59 (devibhagavatam.5.11.59)

करभोरु किमर्थं ते गृहीतान्यायुधान्यलम् । पुष्पकन्दुकयोग्यास्ते कराः कमलकोमलाः

karabhoru kimarthaṁ te gṛhītānyāyudhānyalam | puṣpakandukayogyāste karāḥ kamalakomalāḥ

'हे करभोरु! तुमने इतने सारे आयुध क्यों धारण किए हैं? तुम्हारे कमल-कोमल हाथ तो केवल फूल और गेंद के योग्य हैं।'

श्लोक 60 (devibhagavatam.5.11.60)

भ्रूचापे विद्यमानेऽपि धनुषा किं प्रयोजनम् । कटाक्षा विशिखाः सन्ति किं बाणैर्निष्प्रयोजनैः

bhrūcāpe vidyamāne'pi dhanuṣā kiṁ prayojanam | kaṭākṣā viśikhāḥ santi kiṁ bāṇairniṣprayojanaiḥ

'जब भौंहों का धनुष विद्यमान है, तो असली धनुष का क्या प्रयोजन? जब कटाक्ष ही बाण हैं, तो इन निष्प्रयोजन बाणों से क्या लाभ?'

श्लोक 61 (devibhagavatam.5.11.61)

संसारे दुःखदं युद्धं न कर्तव्यं विजानता । लोभासक्ताः प्रकुर्वन्ति सङ्ग्रामञ्च परस्परम्

saṁsāre duḥkhadaṁ yuddhaṁ na kartavyaṁ vijānatā | lobhāsaktāḥ prakurvanti saṅgrāmañca parasparam

'संसार में दुःखदायी युद्ध, जानने वाले को कभी नहीं करना चाहिए। केवल लोभासक्त लोग ही परस्पर संग्राम करते हैं।'

श्लोक 62 (devibhagavatam.5.11.62)

पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्निशितैः शरैः । भेदनं निजगात्राणां कस्य तज्जायते मुदे

puṣpairapi na yoddhavyaṁ kiṁ punarniśitaiḥ śaraiḥ | bhedanaṁ nijagātrāṇāṁ kasya tajjāyate mude

'फूलों से भी युद्ध नहीं करना चाहिए, फिर तीक्ष्ण बाणों से तो क्या ही कहना! अपने ही अंगों के छिन्न-भिन्न होने में भला किसे आनन्द मिलता है?'

श्लोक 63 (devibhagavatam.5.11.63)

तस्मात्त्वमपि तन्वङ्गि प्रसादं कर्तुमर्हसि । भर्तारं भज मे नाथं देवदानवपूजितम्

tasmāttvamapi tanvaṅgi prasādaṁ kartumarhasi | bhartāraṁ bhaja me nāthaṁ devadānavapūjitam

'इसलिए हे तन्वंगि! तुम्हें भी अनुग्रह करना चाहिए। मेरे स्वामी को अपना पति स्वीकार करो — जो देव-दानवों द्वारा पूजित हैं।'

श्लोक 64 (devibhagavatam.5.11.64)

स तेऽत्र वाञ्छितं सर्वं करिष्यति मनोरथम् । त्वं पट्टमहिषी राज्ञः सर्वथा नात्र संशयः

sa te'tra vāñchitaṁ sarvaṁ kariṣyati manoratham | tvaṁ paṭṭamahiṣī rājñaḥ sarvathā nātra saṁśayaḥ

'वे यहाँ तुम्हारी समस्त इच्छा और मनोरथ पूर्ण करेंगे; तुम सर्वथा राजा की पटरानी बनोगी — इसमें कोई संशय नहीं है।'

श्लोक 65 (devibhagavatam.5.11.65)

वचनं कुरु मे देवि प्राप्स्यसे सुखमुत्तमम् । सङ्ग्रामे जयसन्देहः कष्टं प्राप्य न संशयः

vacanaṁ kuru me devi prāpsyase sukhamuttamam | saṅgrāme jayasandehaḥ kaṣṭaṁ prāpya na saṁśayaḥ

'हे देवि! मेरा वचन मानो, तुम्हें उत्तम सुख प्राप्त होगा। युद्ध में विजय संदिग्ध है, परन्तु कष्ट मिलना निश्चित है — इसमें कोई संशय नहीं है।'

श्लोक 66 (devibhagavatam.5.11.66)

जानासि राजनीतिं त्वं यथावद्वरवर्णिनि । भुङ्क्ष्व राज्यसुखं पूर्णं वर्षाणामयुतायुतम्

jānāsi rājanītiṁ tvaṁ yathāvadvaravarṇini | bhuṅkṣva rājyasukhaṁ pūrṇaṁ varṣāṇāmayutāyutam

'हे वरवर्णिनि! तुम राजनीति को भलीभाँति जानती हो; अनेक हजारों वर्षों तक राज्य के पूर्ण सुख का उपभोग करो।'

श्लोक 67 (devibhagavatam.5.11.67)

पुत्रस्ते भविता कान्तः सोऽपि राजा भविष्यति । यौवने क्रीडयित्वान्ते वार्धक्ये सुखमाप्स्यसि

putraste bhavitā kāntaḥ so'pi rājā bhaviṣyati | yauvane krīḍayitvānte vārdhakye sukhamāpsyasi

'तुम्हें एक सुन्दर पुत्र होगा, जो स्वयं भी राजा बनेगा। यौवन में क्रीड़ा कर, वृद्धावस्था में तुम्हें सुख प्राप्त होगा।'

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