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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 12

देवी के पराजय हेतु दुर्धर के प्रबोध-वचन

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.12.1)

व्यास उवाच । तन्निशम्य वचस्तस्य ताम्रस्य जगदम्बिका । मेघगम्भीरया वाचा हसन्ती तमुवाच ह

vyāsa uvāca | tanniśamya vacastasya tāmrasya jagadambikā | meghagambhīrayā vācā hasantī tamuvāca ha

व्यास जी ने कहा — ताम्र के उन वचनों को सुनकर, जगदम्बिका हँसते हुए मेघ के समान गम्भीर वाणी में उससे यह कहने लगीं।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.12.2)

देव्युवाच । गच्छ ताम्र पतिं ब्रूहि मुमूर्षुं मन्दचेतसम् । महिषं चातिकामार्तं मूढं ज्ञानविवर्जितम्

devyuvāca | gaccha tāmra patiṁ brūhi mumūrṣuṁ mandacetasam | mahiṣaṁ cātikāmārtaṁ mūḍhaṁ jñānavivarjitam

देवी ने कहा — जाओ ताम्र, अपने स्वामी से कहो — उस मृत्युसन्निकट, मन्दबुद्धि, अत्यंत कामातुर, मूढ़ और ज्ञानहीन महिष से —

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.12.3)

यथा ते महिषी माता प्रौढा यवसभक्षिणी । नाहं तथा शृङ्गवती लम्बपुच्छा महोदरी

yathā te mahiṣī mātā prauḍhā yavasabhakṣiṇī | nāhaṁ tathā śṛṅgavatī lambapucchā mahodarī

'— जैसे तुम्हारी माता प्रौढ़ा, घास चरने वाली भैंस थी, वैसे ही मैं सींगों वाली, लम्बी पूँछ वाली अथवा बड़े पेट वाली नहीं हूँ।'

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.12.4)

न कामयेऽहं देवेशं नैव विष्णुं न शङ्करम् । धनदं वरुणं नैव ब्रह्माणं न च पावकम्

na kāmaye'haṁ deveśaṁ naiva viṣṇuṁ na śaṅkaram | dhanadaṁ varuṇaṁ naiva brahmāṇaṁ na ca pāvakam

'— मैं न देवेश की कामना करती हूँ, न विष्णु की, न शंकर की; न धनद, न वरुण, न ब्रह्मा, न अग्नि की।'

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.12.5)

एतान्देवगणान्हित्वा पशुं केन गुणेन वै । वृणोम्यहं वृथा लोके गर्हणा मे भवेदिति

etāndevagaṇānhitvā paśuṁ kena guṇena vai | vṛṇomyahaṁ vṛthā loke garhaṇā me bhavediti

'— इन सभी देवगणों को त्यागकर, किस गुण के कारण मैं एक पशु को वरण करूँ? यह तो व्यर्थ ही संसार में मेरी निन्दा का कारण बनेगा।'

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.12.6)

नाहं पतिंवरा नारी वर्तते मे पतिः प्रभुः । सर्वकर्ता सर्वसाक्षी ह्यकर्ता निःस्पृहः स्थिरः

nāhaṁ patiṁvarā nārī vartate me patiḥ prabhuḥ | sarvakartā sarvasākṣī hyakartā niḥspṛhaḥ sthiraḥ

'— मैं वर-वरण करने वाली स्त्री नहीं हूँ; मेरे तो पहले से ही एक स्वामी हैं — जो सर्वकर्ता होते हुए भी अकर्ता हैं, सर्वसाक्षी, निःस्पृह और स्थिर हैं —'

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.12.7)

निर्गुणो निर्ममोऽनन्तो निरालम्बो निराश्रयः । सर्वज्ञः सर्वगः साक्षी पूर्णः पूर्णाशयः शिवः

nirguṇo nirmamo'nanto nirālambo nirāśrayaḥ | sarvajñaḥ sarvagaḥ sākṣī pūrṇaḥ pūrṇāśayaḥ śivaḥ

'— गुणरहित, ममतारहित, अनन्त, आलम्बनरहित, आश्रयरहित, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, साक्षी, पूर्ण, पूर्णाशय तथा कल्याणस्वरूप हैं —'

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.12.8)

सर्वावासक्षमः शान्तः सर्वदृक्सर्वभावनः । तं त्यक्त्वा महिषं मन्दं कथं सेवितुमुत्सहे

sarvāvāsakṣamaḥ śāntaḥ sarvadṛksarvabhāvanaḥ | taṁ tyaktvā mahiṣaṁ mandaṁ kathaṁ sevitumutsahe

'— सर्वत्र निवास करने में समर्थ, शान्त, सर्वद्रष्टा तथा सर्वभावों के जनक हैं। उन्हें त्यागकर मैं भला मन्दबुद्धि महिष की सेवा कैसे कर सकती हूँ?'

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.12.9)

प्रबुध्य युध्यतां कामं करोमि यमवाहनम् । अथवा मनुजानां वै करिष्ये जलवाहकम्

prabudhya yudhyatāṁ kāmaṁ karomi yamavāhanam | athavā manujānāṁ vai kariṣye jalavāhakam

'उसे जगाओ, यदि वह चाहे तो युद्ध करे — मैं उसे यम का वाहन बना दूँगी; अथवा मनुष्यों के लिए जलवाहक बना दूँगी।'

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.12.10)

जीवितेच्छास्ति चेत्पाप गच्छ पातालमाशु वै । समस्तैर्दानवैर्युक्तस्त्वन्यथा हन्मि सङ्गरे

jīvitecchāsti cetpāpa gaccha pātālamāśu vai | samastairdānavairyuktastvanyathā hanmi saṅgare

'हे पापी! यदि तुम्हें जीवित रहने की इच्छा है, तो शीघ्र पाताल चले जाओ। अन्यथा समस्त दानवों सहित मैं तुम्हें युद्ध में मार डालूँगी।'

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.12.11)

कामं सदृशयोर्योगः संसारे सुखदो भवेत् । अन्यथा दुःखदो भूयादज्ञानाद्यदि कल्पितः

kāmaṁ sadṛśayoryogaḥ saṁsāre sukhado bhavet | anyathā duḥkhado bhūyādajñānādyadi kalpitaḥ

'समान लोगों का मिलन ही इस संसार में सुखदायी होता है; परन्तु यदि अज्ञानवश असमान का मिलन रचा जाए, तो वह दुःखदायी ही होता है।'

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.12.12)

मूर्खस्त्वमसि यद् ब्रूषे पतिं मे भज भामिनि । क्वाहं क्व महिषः शृङ्गी सम्बन्धः कीदृशो द्वयोः

mūrkhastvamasi yad brūṣe patiṁ me bhaja bhāmini | kvāhaṁ kva mahiṣaḥ śṛṅgī sambandhaḥ kīdṛśo dvayoḥ

'तुम मूर्ख हो, जो कहते हो — "हे भामिनि! मेरे स्वामी को स्वीकार करो।" मैं कहाँ, और सींगों वाला महिष कहाँ — दोनों में भला कैसा सम्बन्ध?'

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.12.13)

गच्छ युध्यस्व वा कामं हनिष्येऽहं सबान्धवम् । यज्ञभागं देवलोकं नोचेत्त्यक्त्वा सुखी भव

gaccha yudhyasva vā kāmaṁ haniṣye'haṁ sabāndhavam | yajñabhāgaṁ devalokaṁ nocettyaktvā sukhī bhava

'जाओ, अथवा चाहो तो युद्ध करो — मैं उसे उसके समस्त बन्धुओं सहित मार डालूँगी। अन्यथा यज्ञभाग और देवलोक को त्यागकर सुखी रहो।'

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.12.14)

व्यास उवाच । इत्युक्त्वा सा तदा देवी जगर्ज भृशमद्भुतम् । कल्पान्तसदृशं नादं चक्रे दैत्यभयावहम्

vyāsa uvāca | ityuktvā sā tadā devī jagarja bhṛśamadbhutam | kalpāntasadṛśaṁ nādaṁ cakre daityabhayāvaham

व्यास जी ने कहा — यह कहकर देवी ने तब अत्यंत अद्भुत गर्जना की — प्रलयकाल के समान, दैत्यों के लिए भयदायक ध्वनि की।

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.12.15)

चकम्पे वसुधा चेलुस्तेन शब्देन भूधराः । गर्भाश्च दैत्यपत्नीनां सस्रंसुर्गर्जितस्वनात्

cakampe vasudhā celustena śabdena bhūdharāḥ | garbhāśca daityapatnīnāṁ sasraṁsurgarjitasvanāt

उस ध्वनि से पृथ्वी काँप उठी, पर्वत हिल गए; और उस गर्जना की ध्वनि से दैत्यों की पत्नियों के गर्भ स्रवित हो गए।

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.12.16)

ताम्रः श्रुत्वा च तं शब्दं भयत्रस्तमनास्तदा । पलायनं ततः कृत्वा जगाम महिषान्तिकम्

tāmraḥ śrutvā ca taṁ śabdaṁ bhayatrastamanāstadā | palāyanaṁ tataḥ kṛtvā jagāma mahiṣāntikam

ताम्र उस ध्वनि को सुनकर, मन में भयत्रस्त होकर, वहाँ से भाग गया और महिष के समीप पहुँचा।

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.12.17)

नगरे तस्य ये दैत्यास्तेऽपि चिन्तामवाप्नुवन् । बधिरीकृतकर्णाश्च पलायनपरा नृप

nagare tasya ye daityāste'pi cintāmavāpnuvan | badhirīkṛtakarṇāśca palāyanaparā nṛpa

हे राजन्! उसके नगर में जो दैत्य थे, वे भी चिन्ताग्रस्त हो गए, उनके कान बधिर हो गए और वे भागने को उद्यत हो गए।

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.12.18)

तदा क्रोधेन सिंहोऽपि ननाद भृशमुत्सटः । तेन नादेन दैतेया भयं जग्मुरपि स्फुटम्

tadā krodhena siṁho'pi nanāda bhṛśamutsaṭaḥ | tena nādena daiteyā bhayaṁ jagmurapi sphuṭam

तब क्रोध से भरा सिंह भी अत्यंत उग्र होकर गरज उठा; उस गर्जना से दैत्य स्पष्ट रूप से भयभीत हो उठे।

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.12.19)

ताम्रं समागतं दृष्ट्वा हयारिरपि मोहितः । चिन्तयामास सचिवैः किं कर्तव्यमतः परम्

tāmraṁ samāgataṁ dṛṣṭvā hayārirapi mohitaḥ | cintayāmāsa sacivaiḥ kiṁ kartavyamataḥ param

ताम्र को लौटा हुआ देखकर महिष भी विचलित हो गया, और अपने मन्त्रियों के साथ विचार करने लगा — 'अब क्या करना चाहिए?'

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.12.20)

दुर्गग्रहो वा कर्तव्यो युद्धं निर्गत्य वा पुनः । पलायने कृते श्रेयो भवेद्वा दानवोत्तमाः

durgagraho vā kartavyo yuddhaṁ nirgatya vā punaḥ | palāyane kṛte śreyo bhavedvā dānavottamāḥ

'हे दानवोत्तमो! क्या हमें दुर्ग में आश्रय लेना चाहिए, अथवा पुनः युद्ध हेतु निकलना चाहिए, अथवा पलायन करना ही श्रेयस्कर होगा?'

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.12.21)

बुद्धिमन्तो दुराधर्षाः सर्वशास्त्रविशारदाः । मन्त्रः खलु प्रकर्तव्यः सुगुप्तः कार्यसिद्धये

buddhimanto durādharṣāḥ sarvaśāstraviśāradāḥ | mantraḥ khalu prakartavyaḥ suguptaḥ kāryasiddhaye

'तुम सब बुद्धिमान्, दुर्जेय तथा सर्वशास्त्रविशारद हो; कार्य की सिद्धि के लिए सुरक्षित मन्त्रणा अवश्य करनी चाहिए।'

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.12.22)

मन्त्रमूलं स्मृतं राज्यं यदि स स्यात्सुरक्षितः । मन्त्रिभिश्च सदाचारैर्विधेयः सर्वथा बुधैः

mantramūlaṁ smṛtaṁ rājyaṁ yadi sa syātsurakṣitaḥ | mantribhiśca sadācārairvidheyaḥ sarvathā budhaiḥ

'राज्य का मूल मन्त्रणा ही माना गया है, यदि वह सुरक्षित हो; और यह सदा सदाचारी, विद्वान् मन्त्रियों द्वारा ही किया जाना चाहिए।'

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.12.23)

मन्त्रभेदे विनाशः स्याद्राज्यस्य भूपतेस्तथा । तस्माद्भेदभयाद् गुप्तः कर्तव्यो भूतिमिच्छता

mantrabhede vināśaḥ syādrājyasya bhūpatestathā | tasmādbhedabhayād guptaḥ kartavyo bhūtimicchatā

'मन्त्रणा के भेद होने से राज्य और राजा दोनों का विनाश होता है; इसलिए ऐश्वर्य चाहने वाले को भेद के भय से इसे गुप्त रखना चाहिए।'

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.12.24)

तदत्र मन्त्रिभिर्वाच्यं वचनं हेतुमद्धितम् । कालदेशानुसारेण विचिन्त्य नीतिनिर्णयम्

tadatra mantribhirvācyaṁ vacanaṁ hetumaddhitam | kāladeśānusāreṇa vicintya nītinirṇayam

'अतः मन्त्रीगण यहाँ देश-काल के अनुसार नीति-निर्णय का विचार कर, तर्कयुक्त और हितकारी वचन ही कहें।'

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.12.25)

या योषात्र समायाता प्रबला देवनिर्मिता । एकाकिनी निरालम्बा कारणं तद्विचिन्त्यताम्

yā yoṣātra samāyātā prabalā devanirmitā | ekākinī nirālambā kāraṇaṁ tadvicintyatām

'यह जो नारी यहाँ आई है, प्रबल, देवनिर्मित, अकेली और निरालम्ब — इसका कारण विचार किया जाना चाहिए।'

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.12.26)

युद्धं प्रार्थयते बाला किमाश्चर्यमतः परम् । श्रेयोऽत्र विपरीतं वा को वेत्ति भुवनत्रये

yuddhaṁ prārthayate bālā kimāścaryamataḥ param | śreyo'tra viparītaṁ vā ko vetti bhuvanatraye

'यह बालिका स्वयं युद्ध की माँग करती है — इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या हो सकता है? इसमें श्रेय है अथवा विपरीत, यह त्रिलोक में कौन जानता है?'

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.12.27)

न बहूनां जयोऽप्यस्ति नैकस्य च पराजयः । दैवाधीनौ सदा ज्ञेयौ युद्धे जयपराजयौ

na bahūnāṁ jayo'pyasti naikasya ca parājayaḥ | daivādhīnau sadā jñeyau yuddhe jayaparājayau

'विजय बहुसंख्या का ही अधिकार नहीं है, न ही पराजय अकेले का। युद्ध में जय और पराजय को सदा दैवाधीन ही समझना चाहिए।'

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.12.28)

उपायवादिनः प्राहुर्दैवं किं केन वीक्षितम् । अदृष्टमिति यन्नाम प्रवदन्ति मनीषिणः

upāyavādinaḥ prāhurdaivaṁ kiṁ kena vīkṣitam | adṛṣṭamiti yannāma pravadanti manīṣiṇaḥ

'उपाय-प्रवर्तक कहते हैं — दैव क्या है, किसने उसे देखा है? विद्वान् जन उसे ही "अदृष्ट" नाम से पुकारते हैं।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.12.29)

तत्सत्त्वेऽपि प्रमाणं किं कातराशावलम्बनम् । न समर्थजनानां हि दैवं कुत्रापि लक्ष्यते

tatsattve'pi pramāṇaṁ kiṁ kātarāśāvalambanam | na samarthajanānāṁ hi daivaṁ kutrāpi lakṣyate

'उसका अस्तित्व मान भी लें, तो उसका प्रमाण क्या है, सिवाय कातर जनों की आशा के सहारे के? समर्थ जनों में दैव कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता।'

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.12.30)

उद्यमो दैवमेतौ हि शूरकातरयोर्मतम् । विचिन्त्याद्य धिया सर्वं कर्तव्यं कार्यमादरात्

udyamo daivametau hi śūrakātarayormatam | vicintyādya dhiyā sarvaṁ kartavyaṁ kāryamādarāt

'उद्यम शूरवीर का मत है, और दैव कातर का। आज बुद्धिपूर्वक सब कुछ विचार कर, आदरपूर्वक कार्य सम्पन्न करना चाहिए।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.12.31)

व्यास उवाच । इति राज्ञो वचः श्रुत्वा हेतुगर्भं महायशाः । बिडालाख्यो महाराजमित्युवाच कृताञ्जलिः

vyāsa uvāca | iti rājño vacaḥ śrutvā hetugarbhaṁ mahāyaśāḥ | biḍālākhyo mahārājamityuvāca kṛtāñjaliḥ

व्यास जी ने कहा — राजा के इस तर्कयुक्त वचन को सुनकर, महायशस्वी बिडाल नामक मन्त्री ने हाथ जोड़कर महाराज से यह कहा।

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.12.32)

राजन्नेषा विशालाक्षी ज्ञातव्या यत्नतः पुनः । किमर्थमिह सम्प्राप्ता कुतः कस्य परिग्रहः

rājanneṣā viśālākṣī jñātavyā yatnataḥ punaḥ | kimarthamiha samprāptā kutaḥ kasya parigrahaḥ

'हे राजन्! इस विशालाक्षी के विषय में पुनः प्रयत्नपूर्वक जानना चाहिए — यह यहाँ किस प्रयोजन से आई है, कहाँ से आई है, और किसकी है?'

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.12.33)

मरणं ते परिज्ञाय स्त्रिया सर्वात्मना सुरैः । प्रेषिता पद्मपत्राक्षी समुत्पाद्य स्वतेजसा

maraṇaṁ te parijñāya striyā sarvātmanā suraiḥ | preṣitā padmapatrākṣī samutpādya svatejasā

'तुम्हारी मृत्यु सर्वथा स्त्री के हाथों निश्चित जानकर, देवताओं ने अपने ही तेज से इस पद्मपत्राक्षी को उत्पन्न कर भेजा है।'

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.12.34)

तेऽपि छन्नाः स्थिताः खेऽत्र सर्वे युद्धदिदृक्षवः । समयेऽस्याः सहायास्ते भविष्यन्ति युयुत्सवः

te'pi channāḥ sthitāḥ khe'tra sarve yuddhadidṛkṣavaḥ | samaye'syāḥ sahāyāste bhaviṣyanti yuyutsavaḥ

'और वे देवगण भी युद्ध देखने की इच्छा से यहीं आकाश में छिपे बैठे हैं; उचित समय पर, युद्ध की इच्छा रखने वाले वे उसके सहायक बनेंगे।'

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.12.35)

पुरतः कामिनीं कृत्वा ते वै विष्णुपुरोगमाः । वधिष्यन्ति च नः सर्वान्सा त्वां युद्धे हनिष्यति

purataḥ kāminīṁ kṛtvā te vai viṣṇupurogamāḥ | vadhiṣyanti ca naḥ sarvānsā tvāṁ yuddhe haniṣyati

'उस स्त्री को आगे कर, विष्णु-प्रमुख वे देवगण हम सबका वध करेंगे; और वह तुम्हारा वध युद्ध में करेगी।'

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.12.36)

एतच्चिकीर्षितं तेषां मया ज्ञातं नराधिप । भवितव्यस्य न ज्ञानं वर्तते मम सर्वथा

etaccikīrṣitaṁ teṣāṁ mayā jñātaṁ narādhipa | bhavitavyasya na jñānaṁ vartate mama sarvathā

'हे नराधिप! उनका यह अभिप्राय मैंने जान लिया है; परन्तु जो होनहार है, उसका मुझे सर्वथा कोई ज्ञान नहीं है।'

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.12.37)

योद्धव्यं न त्वयाद्येति नाहं वक्तुं क्षमः प्रभो । प्रमाणं त्वं महाराज कार्येऽत्र देवनिर्मिते

yoddhavyaṁ na tvayādyeti nāhaṁ vaktuṁ kṣamaḥ prabho | pramāṇaṁ tvaṁ mahārāja kārye'tra devanirmite

'हे प्रभो! मैं यह कहने में समर्थ नहीं हूँ कि "आज आपको युद्ध नहीं करना चाहिए"। हे महाराज! इस देव-निर्मित कार्य में आप ही प्रमाण हैं।'

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.12.38)

तदर्थेऽस्माभिरनिशं मर्तव्यं कार्यगौरवात् । विहर्तव्यं त्वया सार्धमेष धर्मोऽनुजीविनाम्

tadarthe'smābhiraniśaṁ martavyaṁ kāryagauravāt | vihartavyaṁ tvayā sārdhameṣa dharmo'nujīvinām

'आपके लिए, कार्य की गम्भीरता को देखते हुए, हमें सदा मरने को तत्पर रहना चाहिए; आपके साथ विहार करना ही अनुयायियों का धर्म है।'

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.12.39)

विचारोऽत्र महानस्ति यदेका कामिनी नृप । युद्धं प्रार्थयतेऽस्माभिः ससैन्यैर्बलदर्पितैः

vicāro'tra mahānasti yadekā kāminī nṛpa | yuddhaṁ prārthayate'smābhiḥ sasainyairbaladarpitaiḥ

'हे राजन्! इसमें बड़ा विचारणीय विषय यह है कि एक अकेली स्त्री, बल से गर्वित, सेनासहित हम सबसे युद्ध की माँग करती है।'

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.12.40)

दुर्मुख उवाच । राजन् युद्धे जयो नोऽद्य भविता वेद्म्यहं किल । पलायनं न कर्तव्यं यशोहानिकरं नृणाम्

durmukha uvāca | rājan yuddhe jayo no'dya bhavitā vedmyahaṁ kila | palāyanaṁ na kartavyaṁ yaśohānikaraṁ nṛṇām

दुर्मुख ने कहा — हे राजन्! मुझे निश्चय ही ज्ञात है कि आज युद्ध में विजय हमारी ही होगी। पलायन नहीं करना चाहिए, जो मनुष्यों के यश का नाशक है।

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.12.41)

इन्द्रादीनां संयुगेऽपि न कृतं यज्जुगुप्सितम् । एकाकिनीं स्त्रियं प्राप्य को हि कुर्यात्पलायनम्

indrādīnāṁ saṁyuge'pi na kṛtaṁ yajjugupsitam | ekākinīṁ striyaṁ prāpya ko hi kuryātpalāyanam

'जो लज्जाजनक कृत्य इन्द्र आदि से युद्ध में भी नहीं किया, अकेली स्त्री के सामने आने पर भला कौन उसे करेगा?'

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.12.42)

तस्माद्युद्धं प्रकर्तव्यं मरणं वा रणे जयः । यद्भावि तद्भवत्येव कात्र चिन्ता विपश्यतः

tasmādyuddhaṁ prakartavyaṁ maraṇaṁ vā raṇe jayaḥ | yadbhāvi tadbhavatyeva kātra cintā vipaśyataḥ

'इसलिए युद्ध ही करना चाहिए — रणभूमि में मृत्यु हो अथवा विजय। जो होनहार है, वह होकर ही रहेगा — फिर स्पष्ट देखने वाले को क्या चिन्ता?'

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.12.43)

मरणेऽत्र यशःप्राप्तिर्जीवने च तथा सुखम् । उभयं मनसा कृत्वा कर्तव्यं युद्धमद्य वै

maraṇe'tra yaśaḥprāptirjīvane ca tathā sukham | ubhayaṁ manasā kṛtvā kartavyaṁ yuddhamadya vai

'यहाँ मृत्यु में यश की प्राप्ति है, और जीवन में सुख की। दोनों को मन में रखकर आज युद्ध ही करना चाहिए।'

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.12.44)

पलायने यशोहानिर्मरणं चायुषः क्षये । तस्माच्छोको न कर्तव्यो जीविते मरणे वृथा

palāyane yaśohānirmaraṇaṁ cāyuṣaḥ kṣaye | tasmācchoko na kartavyo jīvite maraṇe vṛthā

'पलायन में यश की हानि है, और आयु के क्षीण होने पर मृत्यु तो होनी ही है। इसलिए जीवन अथवा मृत्यु के विषय में व्यर्थ ही शोक नहीं करना चाहिए।'

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.12.45)

व्यास उवाच । दुर्मुखस्य वचः श्रुत्वा बाष्कलो वाक्यमब्रवीत् । प्रणतः प्राञ्जलिर्भूत्वा राजानं वाक्यकोविदः

vyāsa uvāca | durmukhasya vacaḥ śrutvā bāṣkalo vākyamabravīt | praṇataḥ prāñjalirbhūtvā rājānaṁ vākyakovidaḥ

व्यास जी ने कहा — दुर्मुख के वचनों को सुनकर, वाक्य-कुशल बाष्कल ने हाथ जोड़कर, प्रणाम करते हुए राजा से यह कहा।

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.12.46)

बाष्कल उवाच । राजंश्चिन्ता न कर्तव्या कार्येऽस्मिन्कातरप्रिये । अहमेको हनिष्यामि चण्डीं चञ्चललोचनाम्

bāṣkala uvāca | rājaṁścintā na kartavyā kārye'sminkātarapriye | ahameko haniṣyāmi caṇḍīṁ cañcalalocanām

बाष्कल ने कहा — हे राजन्! कायरों को ही प्रिय लगने वाले इस कार्य में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मैं अकेला ही चंचल-नयना चण्डी का वध कर दूँगा।

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.12.47)

उत्साहस्तु प्रकर्तव्यः स्थायीभावो रसस्य च । भयानको भवेद्वैरी वीरस्य नृपसत्तम

utsāhastu prakartavyaḥ sthāyībhāvo rasasya ca | bhayānako bhavedvairī vīrasya nṛpasattama

'उत्साह ही धारण करना चाहिए — यही वीर-रस का स्थायी भाव है। हे नृपसत्तम! शत्रु चाहे कितना भी भयानक क्यों न हो, वीर के लिए वह केवल रस का ही विषय होता है।'

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.12.48)

तस्मात्त्यक्त्वा भयं भूप करिष्ये युद्धमद्भुतम् । नयिष्यामि नरेन्द्राहं चण्डिकां यमसादनम्

tasmāttyaktvā bhayaṁ bhūpa kariṣye yuddhamadbhutam | nayiṣyāmi narendrāhaṁ caṇḍikāṁ yamasādanam

'इसलिए, हे भूप! भय त्यागकर मैं एक अद्भुत युद्ध करूँगा। हे नरेन्द्र! मैं स्वयं चण्डिका को यमलोक भेज दूँगा।'

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.12.49)

न बिभेमि यमादिन्द्रात्कुबेराद्वरुणादपि । वायोर्वह्नेस्तथा विष्णोः शङ्कराच्छशिनो रवेः

na bibhemi yamādindrātkuberādvaruṇādapi | vāyorvahnestathā viṣṇoḥ śaṅkarācchaśino raveḥ

'मुझे न यम से भय है, न इन्द्र से, न कुबेर से, न वरुण से; न वायु से, न अग्नि से, न विष्णु से, न शंकर से, न चन्द्रमा से, न सूर्य से।'

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.12.50)

एकाकिनी तथा नारी किं पुनर्मदगर्विता । अहं तां निहनिष्यामि विशिखैश्च शिलाशितैः

ekākinī tathā nārī kiṁ punarmadagarvitā | ahaṁ tāṁ nihaniṣyāmi viśikhaiśca śilāśitaiḥ

'फिर मदगर्विता, अकेली नारी की तो बात ही क्या? मैं उसे शिला पर तीक्ष्ण किए हुए बाणों से मार डालूँगा।'

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.12.51)

पश्य बाहुबलं मेऽद्य विहरस्व यथासुखम् । भवतात्र न गन्तव्यं सङ्ग्रामेऽप्यनया समम्

paśya bāhubalaṁ me'dya viharasva yathāsukham | bhavatātra na gantavyaṁ saṅgrāme'pyanayā samam

'आज आप मेरा बाहुबल देखिए — सुखपूर्वक विहार कीजिए। आपको स्वयं इसके साथ युद्ध में जाने की आवश्यकता नहीं है।'

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.12.52)

व्यास उवाच । एवं ब्रुवति राजेन्द्रं बाष्कले मदगर्विते । प्रणम्य नृपतिं तत्र दुर्धरो वाक्यमब्रवीत्

vyāsa uvāca | evaṁ bruvati rājendraṁ bāṣkale madagarvite | praṇamya nṛpatiṁ tatra durdharo vākyamabravīt

व्यास जी ने कहा — मदगर्वित बाष्कल के राजा से इस प्रकार कहने पर, दुर्धर ने वहाँ राजा को प्रणाम कर यह कहा।

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.12.53)

दुर्धर उवाच । महिषाहं विजेष्यामि देवीं देवविनिर्मिताम् । अष्टादशभुजां रम्यां कारणाच्च समागताम्

durdhara uvāca | mahiṣāhaṁ vijeṣyāmi devīṁ devavinirmitām | aṣṭādaśabhujāṁ ramyāṁ kāraṇācca samāgatām

दुर्धर ने कहा — हे महिष! मैं उस देव-निर्मित, अठारह भुजाओं वाली, रम्य तथा किसी कारण से आई हुई देवी को जीत लूँगा।

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.12.54)

राजन् भीषयितुं त्वां वै मायैषा निर्मिता सुरैः । विभीषिकेयं विज्ञाय त्यज मोहं मनोगतम्

rājan bhīṣayituṁ tvāṁ vai māyaiṣā nirmitā suraiḥ | vibhīṣikeyaṁ vijñāya tyaja mohaṁ manogatam

'हे राजन्! यह तो केवल आपको भयभीत करने हेतु देवताओं द्वारा रची गई माया है। इसे भय दिखाने का उपाय मात्र समझकर, मन का यह मोह त्याग दीजिए।'

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.12.55)

राजनीतिरियं राजन् मन्त्रिकृत्यं तथा शृणु । सात्त्विका राजसाः केचित्तामसाश्च तथापरे

rājanītiriyaṁ rājan mantrikṛtyaṁ tathā śṛṇu | sāttvikā rājasāḥ kecittāmasāśca tathāpare

'हे राजन्! यह राजनीति है; अब मन्त्रियों के कर्तव्य भी सुनिए। कुछ सात्त्विक होते हैं, कुछ राजसिक, और अन्य तामसिक।'

श्लोक 56 (devibhagavatam.5.12.56)

मन्त्रिणस्त्रिविधा लोके भवन्ति दानवाधिप । सात्त्विकाः प्रभुकार्याणि साधयन्ति स्वशक्तिभिः

mantriṇastrividhā loke bhavanti dānavādhipa | sāttvikāḥ prabhukāryāṇi sādhayanti svaśaktibhiḥ

'हे दानवाधिप! संसार में मन्त्री तीन प्रकार के होते हैं। सात्त्विक मन्त्री अपनी सम्पूर्ण शक्ति से स्वामी के कार्य सिद्ध करते हैं।'

श्लोक 57 (devibhagavatam.5.12.57)

आत्मकृत्यं प्रकुर्वन्ति स्वामिकार्याविरोधतः । एकचित्ता धर्मपरा मन्त्रशास्त्रविशारदाः

ātmakṛtyaṁ prakurvanti svāmikāryāvirodhataḥ | ekacittā dharmaparā mantraśāstraviśāradāḥ

'वे अपने स्वामी के कार्य में बाधा डाले बिना ही अपना कार्य करते हैं — एकचित्त, धर्मपरायण तथा मन्त्रशास्त्र में निपुण।'

श्लोक 58 (devibhagavatam.5.12.58)

राजसा भिन्नचित्ताश्च स्वकार्यनिरताः सदा । कदाचित्स्वामिकार्यं ते प्रकुर्वन्ति यदृच्छया

rājasā bhinnacittāśca svakāryaniratāḥ sadā | kadācitsvāmikāryaṁ te prakurvanti yadṛcchayā

'राजसिक मन्त्री विभाजित-चित्त तथा सदा अपने ही कार्य में लीन रहते हैं; वे स्वामी का कार्य कभी-कभी, वह भी संयोगवश ही करते हैं।'

श्लोक 59 (devibhagavatam.5.12.59)

तामसा लोभनिरताः स्वकार्यनिरताः सदा । प्रभुकार्यं विनाश्यैव स्वकार्यं साधयन्ति ते

tāmasā lobhaniratāḥ svakāryaniratāḥ sadā | prabhukāryaṁ vināśyaiva svakāryaṁ sādhayanti te

'तामसिक मन्त्री लोभासक्त तथा सदा स्वकार्य में लीन रहते हैं; वे स्वामी के कार्य को नष्ट करके ही अपना कार्य सिद्ध करते हैं।'

श्लोक 60 (devibhagavatam.5.12.60)

समये ते विभिद्यन्ते परैस्तु परिवञ्चिताः । स्वच्छिद्रं शत्रुपक्षीयान्निर्दिशन्ति गृहस्थिताः

samaye te vibhidyante paraistu parivañcitāḥ | svacchidraṁ śatrupakṣīyānnirdiśanti gṛhasthitāḥ

'समय आने पर वे शत्रुओं के छल में आकर विश्वासघात कर बैठते हैं; घर में रहते हुए ही वे शत्रु-पक्ष को अपने ही छिद्र दिखा देते हैं।'

श्लोक 61 (devibhagavatam.5.12.61)

कार्यभेदकरा नित्यं कोशगुप्तासिवत्सदा । सङ्ग्रामेऽथ समुत्पन्ने भीषयन्ति प्रभुं सदा

kāryabhedakarā nityaṁ kośaguptāsivatsadā | saṅgrāme'tha samutpanne bhīṣayanti prabhuṁ sadā

'वे सदा कार्य में विघ्न डालते हैं, म्यान में छिपी तलवार के समान; और युद्ध उपस्थित होने पर सदा अपने ही स्वामी को भयभीत करते हैं।'

श्लोक 62 (devibhagavatam.5.12.62)

विश्वासस्तु न कर्तव्यस्तेषां राजन् कदाचन । विश्वासे कार्यहानिः स्यान्मन्त्रहानिः सदैव हि

viśvāsastu na kartavyasteṣāṁ rājan kadācana | viśvāse kāryahāniḥ syānmantrahāniḥ sadaiva hi

'हे राजन्! ऐसे मन्त्रियों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए; उन पर विश्वास करने से सदा कार्य की हानि और मन्त्र का भेद होता है।'

श्लोक 63 (devibhagavatam.5.12.63)

खलाः किं किं न कुर्वन्ति विश्वस्ता लोभतत्पराः । तामसाः पापनिरता बुद्धिहीनाः शठास्तथा

khalāḥ kiṁ kiṁ na kurvanti viśvastā lobhatatparāḥ | tāmasāḥ pāpaniratā buddhihīnāḥ śaṭhāstathā

'दुष्ट व्यक्ति, विश्वास पाकर तथा लोभासक्त होकर, क्या नहीं करते? तामसिक मन्त्री पापरत, बुद्धिहीन तथा शठ होते हैं।'

श्लोक 64 (devibhagavatam.5.12.64)

तस्मात्कार्यं करिष्यामि गत्वाहं रणमस्तके । चिन्ता त्वया न कर्तव्या सर्वथा नृपसत्तम

tasmātkāryaṁ kariṣyāmi gatvāhaṁ raṇamastake | cintā tvayā na kartavyā sarvathā nṛpasattama

'इसलिए मैं स्वयं रणभूमि के अग्रभाग में जाकर यह कार्य सम्पन्न करूँगा। हे नृपसत्तम! आपको सर्वथा कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिए।'

श्लोक 65 (devibhagavatam.5.12.65)

गृहीत्वा तां दुराचारामागमिष्यामि सत्वरः । पश्य मेऽद्य बलं धैर्यं प्रभुकार्यं स्वशक्तितः

gṛhītvā tāṁ durācārāmāgamiṣyāmi satvaraḥ | paśya me'dya balaṁ dhairyaṁ prabhukāryaṁ svaśaktitaḥ

'उस दुराचारिणी को पकड़कर मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा। हे राजन्! आज मेरा बल, धैर्य तथा अपनी शक्ति से स्वामी-कार्य की सिद्धि देखिए।'

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