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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13

बाष्कल और दुर्मुख का वध

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.13.1)

व्यास उवाच । इत्युक्त्वा तौ महाबाहू दैत्यौ बाष्कलदुर्मुखौ । जग्मतुर्मददिग्धाङ्गौ सर्वशस्त्रास्त्रकोविदौ

vyāsa uvāca | ityuktvā tau mahābāhū daityau bāṣkaladurmukhau | jagmaturmadadigdhāṅgau sarvaśastrāstrakovidau

व्यास जी ने कहा — ऐसा कहे जाने पर वे दोनों महाबाहु दैत्य, बाष्कल और दुर्मुख, जिनके अंग मद से लिप्त थे और जो समस्त शस्त्र-अस्त्रों में निपुण थे, युद्ध के लिए चल पड़े।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.13.2)

तौ गत्वा समरे देवीमूचतुर्वचनं तदा । दानवौ च मदोन्मत्तौ मेघगम्भीरया गिरा

tau gatvā samare devīmūcaturvacanaṁ tadā | dānavau ca madonmattau meghagambhīrayā girā

युद्धभूमि में जाकर उन दोनों मदोन्मत्त दानवों ने मेघ के समान गंभीर वाणी में देवी से यह वचन कहा।

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.13.3)

देवि देवा जिता येन महिषेण महात्मना । वरय त्वं वरारोहे सर्वदैत्याधिपं नृपम्

devi devā jitā yena mahiṣeṇa mahātmanā | varaya tvaṁ varārohe sarvadaityādhipaṁ nṛpam

हे देवी! हे सुंदरांगी! जिस महात्मा महिष ने देवताओं को जीत लिया है, उस समस्त दैत्यों के अधिपति राजा को तुम वरण करो।

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.13.4)

स कृत्वा मानुषं रूपं सर्वलक्षणसंयुतम् । भूषितं भूषणैर्दिव्यैस्त्वामेष्यति रहः किल

sa kṛtvā mānuṣaṁ rūpaṁ sarvalakṣaṇasaṁyutam | bhūṣitaṁ bhūṣaṇairdivyaistvāmeṣyati rahaḥ kila

वह मानव रूप धारण करके, जो समस्त शुभ लक्षणों से युक्त होगा और दिव्य आभूषणों से सुसज्जित होगा, एकांत में तुम्हारे पास आएगा।

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.13.5)

त्रैलोक्यविभवं कामं त्वमेष्यसि शुचिस्मिते । महिषे परमं भावं कुरु कान्ते मनोगतम्

trailokyavibhavaṁ kāmaṁ tvameṣyasi śucismite | mahiṣe paramaṁ bhāvaṁ kuru kānte manogatam

हे मधुर मुस्कान वाली! तुम अपनी इच्छानुसार तीनों लोकों का ऐश्वर्य प्राप्त करोगी; हे प्रिये! अपने मन में महिष के प्रति सर्वोच्च प्रेम-भाव धारण करो।

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.13.6)

कृत्वा पतिं महावीरं संसारसुखमद्भुतम् । त्वं प्राप्स्यसि पिकालापे योषितां खलु वाञ्छितम्

kṛtvā patiṁ mahāvīraṁ saṁsārasukhamadbhutam | tvaṁ prāpsyasi pikālāpe yoṣitāṁ khalu vāñchitam

उस महावीर को पति बनाकर तुम संसार का अद्भुत सुख प्राप्त करोगी; हे कोकिल-कण्ठी! यही तो प्रत्येक स्त्री की वांछित वस्तु है।

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.13.7)

देव्युवाच । जाल्म त्वं किं विजानासि नारीयं काममोहिता । मन्दबुद्धिबलात्यर्थं भजेयं महिषं शठम्

devyuvāca | jālma tvaṁ kiṁ vijānāsi nārīyaṁ kāmamohitā | mandabuddhibalātyarthaṁ bhajeyaṁ mahiṣaṁ śaṭham

देवी ने कहा — हे नीच! तू क्या समझता है? क्या यह स्त्री काम-मोहित है, जो निर्बुद्धिता के वशीभूत होकर उस कपटी महिष को अत्यधिक प्रेम करेगी?

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.13.8)

कुलशीलगुणैस्तुल्यं तं भजन्ति कुलस्त्रियः । अधिकं रूपचातुर्यबुद्धिशीलक्षमादिभिः

kulaśīlaguṇaistulyaṁ taṁ bhajanti kulastriyaḥ | adhikaṁ rūpacāturyabuddhiśīlakṣamādibhiḥ

कुलवती स्त्रियाँ उसी को प्रेम करती हैं जो कुल, शील और गुणों में उनके समान हो, और जो रूप, चातुर्य, बुद्धि, शील एवं क्षमा आदि में उनसे भी अधिक हो।

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.13.9)

का नु कामातुरा नारी भजेच्च पशुरूपिणम् । पशूनामधमं नूनं महिषं देवरूपिणी

kā nu kāmāturā nārī bhajecca paśurūpiṇam | paśūnāmadhamaṁ nūnaṁ mahiṣaṁ devarūpiṇī

कौन-सी स्त्री, चाहे कितनी भी काम-पीड़ित क्यों न हो, पशु-रूपधारी को प्रेम करेगी? मैं तो देवी-स्वरूपा हूँ, निश्चय ही पशुओं में अधम उस महिष को कभी नहीं चाहूँगी।

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.13.10)

गच्छतं महिषं तूर्णं भूपं बाष्कलदुर्मुखौ । वदतं मद्वचो दैत्यं गजतुल्यं विषाणिनम्

gacchataṁ mahiṣaṁ tūrṇaṁ bhūpaṁ bāṣkaladurmukhau | vadataṁ madvaco daityaṁ gajatulyaṁ viṣāṇinam

हे बाष्कल और दुर्मुख! शीघ्र जाओ और राजा महिष से, उस गजतुल्य सींगधारी दैत्य से, मेरे ये वचन कहो।

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.13.11)

पातालं गच्छ वाभ्येत्य सङ्ग्रामं कुरु वा मया । रणे जाते सहस्राक्षो निर्भयः स्यादिति धुवम्

pātālaṁ gaccha vābhyetya saṅgrāmaṁ kuru vā mayā | raṇe jāte sahasrākṣo nirbhayaḥ syāditi dhuvam

या तो पाताल चला जा, अथवा आकर मुझसे युद्ध कर। युद्ध छिड़ जाने पर सहस्राक्ष (इंद्र) निश्चय ही निर्भय हो जाएगा।

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.13.12)

हत्वाहं त्वां गमिष्यामि नान्यथा गमनं मम । इत्थं ज्ञात्वा सुदुर्बुद्धे यथेच्छसि तथा कुरु

hatvāhaṁ tvāṁ gamiṣyāmi nānyathā gamanaṁ mama | itthaṁ jñātvā sudurbuddhe yathecchasi tathā kuru

तुझे मारकर ही मैं जाऊँगी, अन्यथा मेरा जाना संभव नहीं। हे दुर्बुद्धे! यह जानकर जैसी तेरी इच्छा हो, वैसा कर।

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.13.13)

मामनिर्जित्य भूभागे न स्थानं ते कदाचन । भविष्यति चतुष्पाद दिवि वा गिरिकन्दरे

māmanirjitya bhūbhāge na sthānaṁ te kadācana | bhaviṣyati catuṣpāda divi vā girikandare

हे चतुष्पद! मुझे बिना जीते, तुझे इस भूतल पर, स्वर्ग में अथवा पर्वत की कंदरा में — कहीं भी स्थान प्राप्त नहीं होगा।

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.13.14)

व्यास उवाच । इत्युक्तौ तौ तया दैत्यौ कोपाकुलितलोचनौ । धनुर्बाणधरौ वीरौ युद्धकामौ बभूवतुः

vyāsa uvāca | ityuktau tau tayā daityau kopākulitalocanau | dhanurbāṇadharau vīrau yuddhakāmau babhūvatuḥ

व्यास जी ने कहा — उसके इस प्रकार कहने पर वे दोनों दैत्य, क्रोध से व्याकुल नेत्रों वाले, धनुष-बाण धारण किए हुए वीर, युद्ध की इच्छा करने लगे।

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.13.15)

कृत्वा सुविपुलं नादं देवी सा निर्भया स्थिता । उभौ च चक्रतुस्तीव्रा बाणवृष्टिं कुरूद्वह

kṛtvā suvipulaṁ nādaṁ devī sā nirbhayā sthitā | ubhau ca cakratustīvrā bāṇavṛṣṭiṁ kurūdvaha

विशाल गर्जना करके देवी निर्भय होकर खड़ी रहीं; और उन दोनों ने, हे कुरुश्रेष्ठ, तीव्र बाण-वर्षा आरंभ कर दी।

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.13.16)

भगवत्यपि बाणौघान्मुमोच दानवौ प्रति । कृत्वातिमधुरं नादं देवकार्यार्थसिद्धये

bhagavatyapi bāṇaughānmumoca dānavau prati | kṛtvātimadhuraṁ nādaṁ devakāryārthasiddhaye

भगवती ने भी अति मधुर ध्वनि करते हुए, देवताओं के कार्य की सिद्धि हेतु, उन दोनों दानवों पर बाणों की झड़ी लगा दी।

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.13.17)

तयोस्तु बाष्कलस्तूर्णं सम्मुखोऽभूद् रणाङ्गणे । दुर्मुखः प्रेक्षकस्तत्र देवीमभिमुखः स्थितः

tayostu bāṣkalastūrṇaṁ sammukho'bhūd raṇāṅgaṇe | durmukhaḥ prekṣakastatra devīmabhimukhaḥ sthitaḥ

उन दोनों में से बाष्कल शीघ्र ही रणभूमि में देवी के सम्मुख आ गया, जबकि दुर्मुख वहाँ देवी के सम्मुख खड़ा होकर देखता रहा।

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.13.18)

तयोर्युद्धमभूद् घोरं देवीबाष्कलयोस्तदा । बाणासिपरिघाघातैर्भयदं मन्दचेतसाम्

tayoryuddhamabhūd ghoraṁ devībāṣkalayostadā | bāṇāsiparighāghātairbhayadaṁ mandacetasām

तब देवी और बाष्कल के मध्य एक भीषण युद्ध हुआ, जो बाण, तलवार और परिघ के प्रहारों से मंदबुद्धियों के लिए भयकारी था।

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.13.19)

ततः क्रुद्धा जगन्माता दृष्ट्वा तं युद्धदुर्मदम् । जघान पञ्चभिर्बाणैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः

tataḥ kruddhā jaganmātā dṛṣṭvā taṁ yuddhadurmadam | jaghāna pañcabhirbāṇaiḥ karṇākṛṣṭaiḥ śilāśitaiḥ

तब जगन्माता ने युद्ध में उन्मत्त उस दैत्य को देखकर क्रोधित होकर, कान तक खींचे गए, शिला पर तीक्ष्ण किए गए पाँच बाणों से उसे मारा।

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.13.20)

दानवोऽपि शरान्देव्याश्चिच्छेद निशितैः शरैः । सप्तभिस्ताडयामास देवीं सिंहोपरिस्थिताम्

dānavo'pi śarāndevyāściccheda niśitaiḥ śaraiḥ | saptabhistāḍayāmāsa devīṁ siṁhoparisthitām

दानव ने भी देवी के बाणों को अपने तीक्ष्ण बाणों से काट डाला और सिंह पर विराजमान देवी को सात बाणों से बींध दिया।

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.13.21)

सापि तं दशभिस्तीक्ष्णैः सुपीतैः सायकैः खलम् । जघान तच्छरांश्छित्त्वा जहास च मुहुर्मुहुः

sāpi taṁ daśabhistīkṣṇaiḥ supītaiḥ sāyakaiḥ khalam | jaghāna taccharāṁśchittvā jahāsa ca muhurmuhuḥ

उसने भी उस दुष्ट को दस तीक्ष्ण एवं सुपक्व बाणों से मारा; और उसके बाणों को काटकर वह बार-बार हँसने लगी।

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.13.22)

अर्धचन्द्रेण बाणेन चिच्छेद च शरासनम् । बाष्कलोऽपि गदां गृह्य देवीं हन्तुमुपाययौ

ardhacandreṇa bāṇena ciccheda ca śarāsanam | bāṣkalo'pi gadāṁ gṛhya devīṁ hantumupāyayau

अर्धचंद्राकार बाण से उसने उसका धनुष काट डाला; तब बाष्कल भी गदा लेकर देवी को मारने के लिए आगे बढ़ा।

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.13.23)

आगच्छन्तं गदापाणिं दानवं मदगर्वितम् । चण्डिका स्वगदापातैः पातयामास भूतले

āgacchantaṁ gadāpāṇiṁ dānavaṁ madagarvitam | caṇḍikā svagadāpātaiḥ pātayāmāsa bhūtale

गदा हाथ में लिए, मद से गर्वित होकर आते हुए उस दानव को चण्डिका ने अपनी गदा के प्रहारों से पृथ्वी पर गिरा दिया।

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.13.24)

बाष्कलः पतितो भूमौ मुहूर्तादुत्थितः पुनः । चिक्षेप च गदां सोऽपि चण्डिकां चण्डविक्रमः

bāṣkalaḥ patito bhūmau muhūrtādutthitaḥ punaḥ | cikṣepa ca gadāṁ so'pi caṇḍikāṁ caṇḍavikramaḥ

भूमि पर गिरा हुआ बाष्कल क्षणभर बाद पुनः उठ खड़ा हुआ, और वह भी, प्रचंड पराक्रमी, चण्डिका पर गदा फेंकने लगा।

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.13.25)

तमागच्छन्तमालोक्य देवी शूलेन वक्षसि । जघान बाष्कलं क्रुद्धा पपात च ममार सः

tamāgacchantamālokya devī śūlena vakṣasi | jaghāna bāṣkalaṁ kruddhā papāta ca mamāra saḥ

उसे आते देख देवी ने क्रुद्ध होकर त्रिशूल से बाष्कल की छाती पर प्रहार किया; वह गिर पड़ा और मर गया।

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.13.26)

पतिते बाष्कले सैन्यं भग्नं तस्य दुरात्मनः । जयेति च मुदा देवाश्चुक्रुशुर्गगने स्थिताः

patite bāṣkale sainyaṁ bhagnaṁ tasya durātmanaḥ | jayeti ca mudā devāścukruśurgagane sthitāḥ

बाष्कल के गिरने पर उस दुरात्मा की सेना भंग हो गई; और आकाश में स्थित देवगण हर्षपूर्वक "जय हो" कहकर पुकार उठे।

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.13.27)

तस्मिंश्च निहते दैत्ये दुर्मुखोऽतिबलान्वितः । आजगाम रणे देवीं क्रोधसंरक्तलोचनः

tasmiṁśca nihate daitye durmukho'tibalānvitaḥ | ājagāma raṇe devīṁ krodhasaṁraktalocanaḥ

उस दैत्य के मारे जाने पर अत्यंत बलशाली दुर्मुख, क्रोध से रक्तवर्ण नेत्रों वाला, रणभूमि में देवी के सामने आया।

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.13.28)

तिष्ठ तिष्ठाबले सोऽपि भाषमाणः पुनः पुनः । धनुर्बाणधरः श्रीमान्रथस्थः कवचावृतः

tiṣṭha tiṣṭhābale so'pi bhāṣamāṇaḥ punaḥ punaḥ | dhanurbāṇadharaḥ śrīmānrathasthaḥ kavacāvṛtaḥ

रथ पर बैठा, कवच से आवृत, धनुष-बाण धारण किए वह शोभायमान दुर्मुख भी बार-बार "ठहर, ठहर, हे निर्बल!" कहता रहा।

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.13.29)

तमागच्छन्तमालोक्य देवी शङ्खमवादयत् । कोपयन्ती दानवं तं ज्याघोषञ्च चकार ह

tamāgacchantamālokya devī śaṅkhamavādayat | kopayantī dānavaṁ taṁ jyāghoṣañca cakāra ha

उसे आते देख देवी ने शंख बजाया और उस दानव को क्रोधित करते हुए प्रत्यंचा की टंकार भी की।

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.13.30)

सोऽपि बाणान्मुमोचाशु तीक्ष्णानाशीविषोपमान् । स्वबाणैस्तान्महामाया चिच्छेद च ननाद च

so'pi bāṇānmumocāśu tīkṣṇānāśīviṣopamān | svabāṇaistānmahāmāyā ciccheda ca nanāda ca

उसने भी शीघ्र ही विषधर सर्पों के समान तीक्ष्ण बाण छोड़े; महामाया ने अपने बाणों से उन्हें काट डाला और गर्जना की।

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.13.31)

तयोः परस्परं युद्धं बभूव तुमुलं नृप । बाणशक्तिगदाघातैर्मुसलैस्तोमरैस्तथा

tayoḥ parasparaṁ yuddhaṁ babhūva tumulaṁ nṛpa | bāṇaśaktigadāghātairmusalaistomaraistathā

हे राजन्! उन दोनों के मध्य बाण, शक्ति, गदा, मूसल तथा तोमर के प्रहारों से घमासान युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.13.32)

रणभूमौ तदा जाता रुधिरौघवहा नदी । पतितानि तदा तीरे शिरांसि प्रबभुस्तदा

raṇabhūmau tadā jātā rudhiraughavahā nadī | patitāni tadā tīre śirāṁsi prababhustadā

तब रणभूमि में रक्त की धारा बहाने वाली एक नदी बन गई, जिसके तट पर गिरे हुए सिर चमक रहे थे।

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.13.33)

यथा सन्तरणार्थाय यमकिङ्करनायकैः । तुम्बीफलानि नीतानि नवशिक्षापरैर्मुदा

yathā santaraṇārthāya yamakiṅkaranāyakaiḥ | tumbīphalāni nītāni navaśikṣāparairmudā

मानो नदी पार करने के लिए, नवशिक्षित यमदूतों के प्रमुखों द्वारा हर्षपूर्वक तूंबे लाए गए हों।

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.13.34)

रणभूमिस्तदा घोरा बभूवातीव दुर्गमा । शरीरैः पतितैर्भूमौ खाद्यमानैर्वृकादिभिः

raṇabhūmistadā ghorā babhūvātīva durgamā | śarīraiḥ patitairbhūmau khādyamānairvṛkādibhiḥ

वह रणभूमि तब अत्यंत भयंकर और दुर्गम हो गई, गिरे हुए शरीरों से पटी हुई, जिन्हें भेड़िए आदि खा रहे थे।

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.13.35)

गोमायुसारमेयाश्च काकाः कङ्का अयोमुखाः । गृध्रा श्येनाश्च खादन्ति शरीराणि दुरात्मनाम्

gomāyusārameyāśca kākāḥ kaṅkā ayomukhāḥ | gṛdhrā śyenāśca khādanti śarīrāṇi durātmanām

सियार, कुत्ते, कौवे, बगुले, लौह-मुख पक्षी, गिद्ध और बाज उन दुरात्माओं के शरीरों को खा रहे थे।

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.13.36)

ववौ वायुश्च दुर्गन्धो मृतानां देहसङ्गतः । अभूत्किलकिलाशब्दः खगानां पलभक्षिणाम्

vavau vāyuśca durgandho mṛtānāṁ dehasaṅgataḥ | abhūtkilakilāśabdaḥ khagānāṁ palabhakṣiṇām

मृत शरीरों की दुर्गंध से युक्त वायु बहने लगी; और मांस खाने वाले पक्षियों का किलकिल शब्द गूँज उठा।

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.13.37)

तदा चुकोप दुष्टात्मा दुर्मुखः कालमोहितः । देवीमुवाच गर्वेण कृत्वा चोर्ध्वकरं शुभम्

tadā cukopa duṣṭātmā durmukhaḥ kālamohitaḥ | devīmuvāca garveṇa kṛtvā cordhvakaraṁ śubham

तब काल से मोहित वह दुष्टात्मा दुर्मुख क्रोधित हो उठा और अपना शुभ हाथ ऊपर उठाकर अहंकारपूर्वक देवी से बोला।

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.13.38)

गच्छ चण्डि हनिष्यामि त्वामद्यैव सुबालिशे । दैत्यं वा भज वामोरु महिषं मदगर्वितम्

gaccha caṇḍi haniṣyāmi tvāmadyaiva subāliśe | daityaṁ vā bhaja vāmoru mahiṣaṁ madagarvitam

"हे चण्डी! जा, मैं आज ही तुझे मार डालूँगा, हे मूर्खे! अथवा हे सुंदरी! मद से गर्वित उस दैत्य महिष को अपना पति बना ले।"

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.13.39)

देव्युवाच । आसन्नमरणः कामं प्रलपस्यद्य मोहितः । अद्यैव त्वां हनिष्यामि यथायं बाष्कलो हतः

devyuvāca | āsannamaraṇaḥ kāmaṁ pralapasyadya mohitaḥ | adyaiva tvāṁ haniṣyāmi yathāyaṁ bāṣkalo hataḥ

देवी ने कहा — "तेरी मृत्यु निकट है, इसीलिए तू मोहग्रस्त होकर बड़बड़ा रहा है। आज ही मैं तुझे उसी प्रकार मारूँगी, जिस प्रकार यह बाष्कल मारा गया।"

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.13.40)

गच्छ वा तिष्ठ वा मन्द मरणं यदि रोचते । हत्वा त्वां वै वधिष्यामि बालिशं महिषीसुतम्

gaccha vā tiṣṭha vā manda maraṇaṁ yadi rocate | hatvā tvāṁ vai vadhiṣyāmi bāliśaṁ mahiṣīsutam

"हे मूर्ख! जा अथवा ठहर, यदि तुझे मृत्यु ही रुचिकर है। तुझे मारकर ही मैं उस मूर्ख महिषी-पुत्र (महिष) का भी वध करूँगी।"

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.13.41)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या दुर्मुखो मर्तुमुद्यतः । मुमोच बाणवृष्टिं तु चण्डिकां प्रति दारुणाम्

tacchrutvā vacanaṁ tasyā durmukho martumudyataḥ | mumoca bāṇavṛṣṭiṁ tu caṇḍikāṁ prati dāruṇām

उसके ये वचन सुनकर मरने पर उतारू दुर्मुख ने चण्डिका पर भयंकर बाण-वर्षा कर दी।

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.13.42)

सापि तां तरसा छित्त्वा बाणवृष्टिं शितैः शरैः । जघान दानवं कृद्धा वृत्रं वज्रधरो यथा

sāpi tāṁ tarasā chittvā bāṇavṛṣṭiṁ śitaiḥ śaraiḥ | jaghāna dānavaṁ kṛddhā vṛtraṁ vajradharo yathā

उसने भी शीघ्रता से उस बाण-वर्षा को अपने तीक्ष्ण बाणों से काटकर, क्रुद्ध होकर उस दानव पर वैसे ही प्रहार किया, जैसे वज्रधारी इंद्र ने वृत्रासुर पर किया था।

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.13.43)

तयोः परस्परं युद्धं सञ्जातं चातिकर्कशम् । भयदं कातराणाञ्च शूराणां बलवर्धनम्

tayoḥ parasparaṁ yuddhaṁ sañjātaṁ cātikarkaśam | bhayadaṁ kātarāṇāñca śūrāṇāṁ balavardhanam

उन दोनों के मध्य अत्यंत भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो कायरों के लिए भयकारी और शूरवीरों का बल बढ़ाने वाला था।

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.13.44)

देवी चिच्छेद तरसा धनुस्तस्य करे स्थितम् । तथैव पञ्चभिर्बाणैर्बभञ्ज रथमुत्तमम्

devī ciccheda tarasā dhanustasya kare sthitam | tathaiva pañcabhirbāṇairbabhañja rathamuttamam

देवी ने शीघ्रता से उसके हाथ में स्थित धनुष को काट डाला, और उसी प्रकार पाँच बाणों से उसका उत्तम रथ भी तोड़ डाला।

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.13.45)

रथे भग्ने महाबाहुः पदातिर्दुर्मुखस्तदा । गदां गहीत्वा दुर्धर्षां जगाम चण्डिकां प्रति

rathe bhagne mahābāhuḥ padātirdurmukhastadā | gadāṁ gahītvā durdharṣāṁ jagāma caṇḍikāṁ prati

रथ के टूट जाने पर वह महाबाहु दुर्मुख पैदल ही एक दुर्जेय गदा लेकर चण्डिका की ओर बढ़ा।

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.13.46)

चकार स गदाघातं सिंहमौलौ महाबलः । न चचाल हरिः स्थानात्ताडितोऽपि महाबलः

cakāra sa gadāghātaṁ siṁhamaulau mahābalaḥ | na cacāla hariḥ sthānāttāḍito'pi mahābalaḥ

उस महाबली ने सिंह के सिर पर गदा का प्रहार किया; परंतु वह महाबली सिंह प्रहार होने पर भी अपने स्थान से नहीं डिगा।

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.13.47)

अम्बिका तं समालोक्य गदापाणिं पुरःस्थितम् । खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद मौलिमत्

ambikā taṁ samālokya gadāpāṇiṁ puraḥsthitam | khaḍgena śitadhāreṇa śiraściccheda maulimat

गदा हाथ में लिए सामने खड़े उस दुर्मुख को देखकर अंबिका ने अपनी तीक्ष्ण धार वाली तलवार से उसका मुकुटधारी सिर काट डाला।

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.13.48)

छिन्ने च मस्तके भूमौ पपात दुर्मुखो मृतः । जयशब्दं तदा चक्रुर्मुदिता निर्जरा भृशम्

chinne ca mastake bhūmau papāta durmukho mṛtaḥ | jayaśabdaṁ tadā cakrurmuditā nirjarā bhṛśam

सिर कटते ही दुर्मुख मरकर भूमि पर गिर पड़ा; तब अत्यंत हर्षित देवगण जोर-जोर से "जय-जय" का घोष करने लगे।

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.13.49)

तुष्टुवुस्तां तदा देवीं दुर्मुखे निहतेऽमराः । पुष्पवृष्टिं तथा चक्रुर्जयशब्दं नभःस्थिताः

tuṣṭuvustāṁ tadā devīṁ durmukhe nihate'marāḥ | puṣpavṛṣṭiṁ tathā cakrurjayaśabdaṁ nabhaḥsthitāḥ

दुर्मुख के मारे जाने पर देवताओं ने तब देवी की स्तुति की, पुष्पवर्षा की और आकाश में स्थित होकर जय-जयकार किया।

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.13.50)

ऋषयः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरकिन्नराः । जहृषुस्तं हतं दृष्ट्वा दानवं रणमस्तके

ṛṣayaḥ siddhagandharvāḥ savidyādharakinnarāḥ | jahṛṣustaṁ hataṁ dṛṣṭvā dānavaṁ raṇamastake

ऋषि, सिद्ध, गंधर्व, विद्याधर और किन्नर — सभी उस दानव को रणभूमि के शिखर पर मरा हुआ देखकर अत्यंत हर्षित हुए।

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