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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 15

असिलोमा और बिडाल का वध

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.15.1)

व्यास उवाच । तौ तया निहतौ श्रुत्वा महिषो विस्मयान्वितः । प्रेषयामास दैतेयांस्तद्वधार्थं महाबलान्

vyāsa uvāca | tau tayā nihatau śrutvā mahiṣo vismayānvitaḥ | preṣayāmāsa daiteyāṁstadvadhārthaṁ mahābalān

व्यास जी ने कहा — उन दोनों को उसके द्वारा मारा गया सुनकर महिष आश्चर्यचकित हो उठा, और उनके वध का बदला लेने के लिए महाबली दैत्यों को भेजा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.15.2)

असिलोमबिडालाख्यप्रमुखान् युद्धदुर्मदान् । सैन्येन महता युक्तान्सायुधान्सपरिच्छदान्

asilomabiḍālākhyapramukhān yuddhadurmadān | sainyena mahatā yuktānsāyudhānsaparicchadān

जिनमें प्रमुख थे असिलोमा और बिडाल नामक दानव, युद्ध में उन्मत्त, विशाल सेना, शस्त्रों और साज-सामान से युक्त।

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.15.3)

ते तत्र ददृशुर्देवीं सिंहस्योपरि संस्थिताम् । अष्टादशभुजां दिव्यां खड्गखेटकधारिणीम्

te tatra dadṛśurdevīṁ siṁhasyopari saṁsthitām | aṣṭādaśabhujāṁ divyāṁ khaḍgakheṭakadhāriṇīm

उन्होंने वहाँ देवी को सिंह पर विराजमान, अठारह भुजाओं वाली, दिव्य, तलवार और ढाल धारण किए देखा।

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.15.4)

असिलोमाग्रतो गत्वा तामुवाच हसन्निव । विनयावनतः शान्तो देवीं दैत्यवधोद्यताम्

asilomāgrato gatvā tāmuvāca hasanniva | vinayāvanataḥ śānto devīṁ daityavadhodyatām

असिलोमा आगे जाकर, विनयपूर्वक झुका हुआ और शांत, हँसता हुआ-सा, दैत्यों के वध में तत्पर देवी से बोला —

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.15.5)

असिलोमोवाच । देवि ब्रूहि वचः सत्यं किमर्थमिह सुन्दरि । आगतासि किमर्थं वा हंसि दैत्यान्निरागसः

asilomovāca | devi brūhi vacaḥ satyaṁ kimarthamiha sundari | āgatāsi kimarthaṁ vā haṁsi daityānnirāgasaḥ

असिलोमा ने कहा — "हे देवी! हे सुंदरी! सत्य वचन कहो, तुम यहाँ किसलिए आई हो? और निरपराध दैत्यों को क्यों मार रही हो?"

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.15.6)

कारणं कथयाद्य त्वं त्वया सन्धिं करोम्यहम् । काञ्चनं मणिरत्नानि भाजनानि वराणि च

kāraṇaṁ kathayādya tvaṁ tvayā sandhiṁ karomyaham | kāñcanaṁ maṇiratnāni bhājanāni varāṇi ca

"आज अपना कारण बताओ, मैं तुमसे संधि कर लूँगा। सोना, मणि-रत्न, और श्रेष्ठ पात्र —"

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.15.7)

यानीच्छसि वरारोहे गहीत्वा गच्छ मा चिरम् । किमर्थं युद्धकामासि दुःखसन्तापवर्धनम्

yānīcchasi varārohe gahītvā gaccha mā ciram | kimarthaṁ yuddhakāmāsi duḥkhasantāpavardhanam

"— हे सुंदरी! जो तुम्हें अच्छा लगे, उसे लेकर बिना विलंब चली जाओ। दुख-संताप बढ़ाने वाले युद्ध की इच्छा तुम्हें क्यों है?"

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.15.8)

कथयन्ति महात्मानो युद्धं सर्वसुखापहम् । कोमलेऽतीव ते देहे पुष्पघातासहे भृशम्

kathayanti mahātmāno yuddhaṁ sarvasukhāpaham | komale'tīva te dehe puṣpaghātāsahe bhṛśam

"महात्मा लोग कहते हैं कि युद्ध सभी सुखों का नाशक है। तुम्हारा शरीर तो अत्यंत कोमल है, फूल के आघात को भी सहन न कर सके —"

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.15.9)

किमर्थं शस्त्रसम्पातान्सहसीति विसिस्मिये । चातुर्यस्य फलं शान्तिः सततं सुखसेवनम्

kimarthaṁ śastrasampātānsahasīti visismiye | cāturyasya phalaṁ śāntiḥ satataṁ sukhasevanam

"— फिर शस्त्रों के प्रहार तुम कैसे सहोगी? मुझे तो अत्यंत विस्मय हो रहा है। चातुर्य का फल शांति है, सतत सुख का भोग।"

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.15.10)

तत्किमर्थं दुःखहेतुं सङ्ग्रामं कर्तुमिच्छसि । संसारेऽत्र सुखं ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः

tatkimarthaṁ duḥkhahetuṁ saṅgrāmaṁ kartumicchasi | saṁsāre'tra sukhaṁ grāhyaṁ duḥkhaṁ heyamiti sthitiḥ

"तो फिर दुख का कारण बनने वाले युद्ध को करने की इच्छा तुम्हें क्यों है? इस संसार में यह नियम है कि सुख ग्राह्य है और दुख त्याज्य।"

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.15.11)

तत्सुखं द्विविधं प्रोक्तं नित्यानित्यप्रभेदतः । आत्मज्ञानं सुखं नित्यमनित्यं भोगजं स्मृतम्

tatsukhaṁ dvividhaṁ proktaṁ nityānityaprabhedataḥ | ātmajñānaṁ sukhaṁ nityamanityaṁ bhogajaṁ smṛtam

"वह सुख नित्य और अनित्य के भेद से दो प्रकार का कहा गया है — आत्मज्ञान नित्य सुख है, भोगजन्य सुख अनित्य माना गया है।"

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.15.12)

नाशात्मकं तु तत्त्याज्यं वेदशास्त्रार्थचिन्तकैः । सौगतानां मतं चेत्त्वं स्वीकरोषि वरानने

nāśātmakaṁ tu tattyājyaṁ vedaśāstrārthacintakaiḥ | saugatānāṁ mataṁ cettvaṁ svīkaroṣi varānane

"जो नाशवान है, वेद-शास्त्रों के अर्थ पर विचार करने वालों के अनुसार, उसे त्याग देना चाहिए। परंतु हे सुमुखी! यदि तुम बौद्धों का मत स्वीकार करती हो —"

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.15.13)

तथापि यौवनं प्राप्य भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान् । परलोकस्य सन्देहो यदि तेऽस्ति कृशोदरि

tathāpi yauvanaṁ prāpya bhuṅkṣva bhogānanuttamān | paralokasya sandeho yadi te'sti kṛśodari

"— तो फिर यौवन पाकर सर्वोत्तम भोगों का आनंद लो, हे कृशोदरी! यदि तुम्हें परलोक के विषय में कोई संशय हो।"

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.15.14)

स्वर्गभोगपरा नित्यं भव भामिनि भूतले । अनित्यं यौवनं देहे ज्ञात्वेति सुकृतं चरेत्

svargabhogaparā nityaṁ bhava bhāmini bhūtale | anityaṁ yauvanaṁ dehe jñātveti sukṛtaṁ caret

"हे भामिनी! पृथ्वी पर रहते हुए सदा स्वर्ग के भोगों में ही तत्पर रहो; शरीर का यौवन अनित्य जानकर सत्कर्म करना चाहिए — ऐसा कहा जाता है।"

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.15.15)

परोपतापनं कार्यं वर्जनीयं सदा बुधैः । अविरोधेन कर्तव्यं धर्मार्थकामसेवनम्

paropatāpanaṁ kāryaṁ varjanīyaṁ sadā budhaiḥ | avirodhena kartavyaṁ dharmārthakāmasevanam

"दूसरों को कष्ट पहुँचाना बुद्धिमानों को सदा त्याज्य है; धर्म, अर्थ और काम का सेवन बिना विरोध के करना चाहिए।"

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.15.16)

तस्मात्त्वमपि कल्याणि मतिं धर्मे सदा कुरु । अपराधं विना दैत्यान्कस्मान्मारयसेऽम्बिके

tasmāttvamapi kalyāṇi matiṁ dharme sadā kuru | aparādhaṁ vinā daityānkasmānmārayase'mbike

"अतः हे कल्याणी! तुम भी सदा धर्म में ही बुद्धि लगाओ। हे अंबिके! बिना अपराध किए दैत्यों को क्यों मार रही हो?"

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.15.17)

दयाधर्मोऽस्य देहोऽस्ति सत्ये प्राणाः प्रकीर्तिताः । तस्माद्दया तथा सत्यं रक्षणीयं सदा बुधैः

dayādharmo'sya deho'sti satye prāṇāḥ prakīrtitāḥ | tasmāddayā tathā satyaṁ rakṣaṇīyaṁ sadā budhaiḥ

"दया धर्म का शरीर है, सत्य को उसके प्राण कहा गया है। इसलिए दया और सत्य दोनों को बुद्धिमानों को सदा सुरक्षित रखना चाहिए।"

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.15.18)

कारणं वद सुश्रोणि दानवानां वधे तव । देव्युवाच । त्वया पृष्टं महाबाहो किमर्थमिह चागता

kāraṇaṁ vada suśroṇi dānavānāṁ vadhe tava | devyuvāca | tvayā pṛṣṭaṁ mahābāho kimarthamiha cāgatā

"हे सुंदरी! दानवों के वध का अपना कारण बताओ।" देवी ने कहा — "हे महाबाहो! तुमने पूछा है कि मैं यहाँ किसलिए आई हूँ —"

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.15.19)

तदहं सम्प्रवक्ष्यामि हनने च प्रयोजनम् । विचरामि सदा दैत्य सर्वलोकेषु सर्वदा

tadahaṁ sampravakṣyāmi hanane ca prayojanam | vicarāmi sadā daitya sarvalokeṣu sarvadā

"— तो मैं अब वध का प्रयोजन तुम्हें बताती हूँ। हे दैत्य! मैं सदा सभी लोकों में सर्वदा विचरण करती हूँ,"

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.15.20)

न्यायान्यायौ च भूतानां पश्यन्ती साक्षिरूपिणी । न मे कदापि भोगेच्छा न लोभो न च वैरिता

nyāyānyāyau ca bhūtānāṁ paśyantī sākṣirūpiṇī | na me kadāpi bhogecchā na lobho na ca vairitā

"— समस्त प्राणियों के न्याय-अन्याय को साक्षी-रूप में देखती हुई। मुझे कभी न भोग की इच्छा है, न लोभ है, न ही वैर है।"

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.15.21)

धर्मार्थं विचराम्यत्र संसारे साधुरक्षणम् । व्रतमेतत्तु नियतं पालयामि निजं सदा

dharmārthaṁ vicarāmyatra saṁsāre sādhurakṣaṇam | vratametattu niyataṁ pālayāmi nijaṁ sadā

"मैं इस संसार में धर्म के लिए, साधुजनों की रक्षा के लिए विचरण करती हूँ। यही अपना नियत व्रत मैं सदा पालन करती हूँ।"

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.15.22)

साधूनां रक्षणं कार्यं हन्तव्या येऽप्यसाधवः । वेदसंरक्षणं कार्यमवतारैरनेकशः

sādhūnāṁ rakṣaṇaṁ kāryaṁ hantavyā ye'pyasādhavaḥ | vedasaṁrakṣaṇaṁ kāryamavatārairanekaśaḥ

"साधुओं की रक्षा करनी चाहिए, और जो असाधु हों, उन्हें मार डालना चाहिए। वेद की रक्षा भी अनेक अवतारों द्वारा करनी होती है।"

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.15.23)

युगे युगे तानेवाहमवतारान्बिभर्मि च । महिषस्तु दुराचारो देवान्वै हन्तुमुद्यतः

yuge yuge tānevāhamavatārānbibharmi ca | mahiṣastu durācāro devānvai hantumudyataḥ

"युग-युग में मैं वे ही अवतार धारण करती हूँ। अब यह दुराचारी महिष देवताओं को मारने पर उतारू है —"

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.15.24)

ज्ञात्वाहं तद्वधार्थं भोः प्राप्तास्मि राक्षसाधुना । तं हनिष्ये दुराचारं सुरशत्रुं महाबलम्

jñātvāhaṁ tadvadhārthaṁ bhoḥ prāptāsmi rākṣasādhunā | taṁ haniṣye durācāraṁ suraśatruṁ mahābalam

"— यह जानकर, हे भद्र राक्षस! मैं उसके वध के लिए ही यहाँ आई हूँ। मैं उस दुराचारी, महाबली देवशत्रु को मार डालूँगी।"

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.15.25)

गच्छ वा तिष्ठ कामं त्वं सत्यमेतदुदाहृतम् । ब्रूहि वा तं दुरात्मानं राजानं महिषीसुतम्

gaccha vā tiṣṭha kāmaṁ tvaṁ satyametadudāhṛtam | brūhi vā taṁ durātmānaṁ rājānaṁ mahiṣīsutam

"तू चाहे तो जा, चाहे ठहर — यही सत्य मैंने तुझसे कहा है। अथवा जा और उस दुरात्मा राजा, महिषी-पुत्र से कह —"

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.15.26)

किमन्यान् प्रेषयस्यत्र स्वयं युद्धं कुरुष्व ह । सन्धिञ्चेत्कर्तुमिच्छास्ति राज्ञस्तव मया सह

kimanyān preṣayasyatra svayaṁ yuddhaṁ kuruṣva ha | sandhiñcetkartumicchāsti rājñastava mayā saha

"— वह दूसरों को क्यों भेजता है? स्वयं आकर युद्ध करे। यदि तुम्हारे राजा को मुझसे संधि करने की इच्छा हो —"

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.15.27)

सर्वे गच्छन्तु पातालं वैरं त्यक्त्वा यथासुखम् । देवद्रव्यं तु यत्किञ्चिद्धृतं जित्वा रणे सुरान् । तद्दत्त्वा यान्तु पातालं प्रह्लादो यत्र तिष्ठति

sarve gacchantu pātālaṁ vairaṁ tyaktvā yathāsukham | devadravyaṁ tu yatkiñciddhṛtaṁ jitvā raṇe surān | taddattvā yāntu pātālaṁ prahlādo yatra tiṣṭhati

"— तो तुम सब वैर त्यागकर सुखपूर्वक पाताल चले जाओ। युद्ध में देवताओं को जीतकर जो कुछ भी देव-द्रव्य हरण किया है, उसे लौटाकर वहीं पाताल चले जाओ, जहाँ प्रह्लाद रहते हैं।"

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.15.28)

व्यास उवाच । तच्छुत्वा वचनं देव्या असिलोमा पुरःस्थितः । बिडालाख्यं महावीरं पप्रच्छ प्रीतिपूर्वकम्

vyāsa uvāca | tacchutvā vacanaṁ devyā asilomā puraḥsthitaḥ | biḍālākhyaṁ mahāvīraṁ papraccha prītipūrvakam

व्यास जी ने कहा — देवी के ये वचन सुनकर, सामने खड़े असिलोमा ने महावीर बिडाल से प्रेमपूर्वक पूछा —

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.15.29)

असिलोमोवाच । श्रुतं तेऽद्य बिडालाख्य भवान्या कथितं च यत् । एवं गते किं कर्तव्यो विग्रहः सन्धिरेव वा

asilomovāca | śrutaṁ te'dya biḍālākhya bhavānyā kathitaṁ ca yat | evaṁ gate kiṁ kartavyo vigrahaḥ sandhireva vā

असिलोमा ने कहा — "हे बिडाल! तुमने आज भवानी का कहा हुआ सुन लिया। ऐसी स्थिति में क्या करना उचित होगा — युद्ध या संधि?"

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.15.30)

बिडालाख्य उवाच । न सन्धिकामोऽस्ति नृपोऽभिमानी युद्धे च मृत्युं नियतं हि जानन् । दृष्ट्वा हतान् प्रेरयते तथास्मा न्दैव हि कोऽतिक्रमितुं समर्थः

biḍālākhya uvāca | na sandhikāmo'sti nṛpo'bhimānī yuddhe ca mṛtyuṁ niyataṁ hi jānan | dṛṣṭvā hatān prerayate tathāsmā ndaiva hi ko'tikramituṁ samarthaḥ

बिडाल ने कहा — "हमारा अभिमानी राजा संधि नहीं चाहता — युद्ध में मृत्यु निश्चित जानते हुए भी, मृतकों को देखकर भी वह हमें आगे भेजता है। दैव को कौन टाल सकता है?"

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.15.31)

(दुःसाध्य एवास्त्विह सेवकानां धर्मः सदा मानविवर्जितानाम् । आज्ञापराणां वशवर्तिकानां पाञ्चालिकानामिव सूत्रभेदात् ॥) गत्वा कथं तस्य पुरस्त्वया च मयापि वक्तव्यमिदं कठोरम् । गच्छन्तु पातालमितश्च सर्वे दत्त्वाथ रत्नानि धनं सुराणाम्

(duḥsādhya evāstviha sevakānāṁ dharmaḥ sadā mānavivarjitānām | ājñāparāṇāṁ vaśavartikānāṁ pāñcālikānāmiva sūtrabhedāt ||) gatvā kathaṁ tasya purastvayā ca mayāpi vaktavyamidaṁ kaṭhoram | gacchantu pātālamitaśca sarve dattvātha ratnāni dhanaṁ surāṇām

"[इस संसार में स्वाभिमान-रहित सेवकों का धर्म सदा दुःसाध्य ही होता है — आज्ञा-पालक, वशवर्ती, मानो कठपुतली के समान धागों से नचाए गए।] भला हम दोनों उसके सामने जाकर यह कठोर वचन कैसे कहें — 'सब यहाँ से देवताओं के रत्न-धन लौटाकर पाताल चले जाएँ'?"

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.15.32)

(प्रियं हि वक्तव्यमसत्यमेव न च प्रियं स्याद्धितकृत्तु भाषितम् । सत्यं प्रियं नो भवतीह कामं मौनं ततो बुद्धिमतां प्रतिष्ठितम् ॥) न फल्गुवाक्यैः प्रतिबोधनीयो राजा तु वीरैरिति नीतिशास्त्रम्

(priyaṁ hi vaktavyamasatyameva na ca priyaṁ syāddhitakṛttu bhāṣitam | satyaṁ priyaṁ no bhavatīha kāmaṁ maunaṁ tato buddhimatāṁ pratiṣṭhitam ||) na phalguvākyaiḥ pratibodhanīyo rājā tu vīrairiti nītiśāstram

"[प्रिय वचन प्रायः असत्य होता है, और हितकर वचन प्रायः अप्रिय होता है; सत्य और प्रिय दोनों एक साथ यहाँ कम ही मिलते हैं — इसीलिए बुद्धिमानों के लिए मौन ही श्रेष्ठ माना गया है।] वीर पुरुषों को तुच्छ वचनों से राजा को समझाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए — यही नीतिशास्त्र का कथन है।"

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.15.33)

न नूनं तत्र गन्तव्यं हितं वा वक्तुमादरात् । प्रष्टुं वापि गते राजा कोपयुक्तो भविष्यति

na nūnaṁ tatra gantavyaṁ hitaṁ vā vaktumādarāt | praṣṭuṁ vāpi gate rājā kopayukto bhaviṣyati

"निश्चय ही हमें वहाँ जाकर आदरपूर्वक हित की बात कहने या पूछने भी नहीं जाना चाहिए — क्योंकि हमारे जाने पर राजा और भी क्रोधित हो उठेगा।"

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.15.34)

इति सञ्चिन्त्य कर्तव्यं युद्धं प्राणस्य संशये । स्वामिकार्यं परं मत्वा मरणं तृणवत्तथा

iti sañcintya kartavyaṁ yuddhaṁ prāṇasya saṁśaye | svāmikāryaṁ paraṁ matvā maraṇaṁ tṛṇavattathā

"ऐसा सोचकर, प्राणों के संशय में पड़ने पर भी युद्ध ही करना चाहिए — स्वामी के कार्य को सर्वोपरि मानकर मृत्यु को भी तिनके के समान समझना चाहिए।"

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.15.35)

व्यास उवाच । इति सञ्चिन्त्य तौ वीरौ संस्थितौ युद्धतत्परौ । धनुर्बाणधरौ तत्र सन्नद्धौ रथसङ्गतौ

vyāsa uvāca | iti sañcintya tau vīrau saṁsthitau yuddhatatparau | dhanurbāṇadharau tatra sannaddhau rathasaṅgatau

व्यास जी ने कहा — ऐसा निश्चय करके वे दोनों वीर युद्ध के लिए तत्पर होकर, धनुष-बाण धारण किए, कवच पहने, रथ पर सवार होकर खड़े हो गए।

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.15.36)

प्रथमं तु बिडालाख्यः सप्तबाणान्मुमोच ह । असिलोमा स्थितो दूरे प्रेक्षकः परमास्त्रवित्

prathamaṁ tu biḍālākhyaḥ saptabāṇānmumoca ha | asilomā sthito dūre prekṣakaḥ paramāstravit

पहले बिडाल ने सात बाण छोड़े, जबकि परम अस्त्रवेत्ता असिलोमा दूर खड़ा होकर देखता रहा।

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.15.37)

चिच्छेद तांस्तथाप्राप्तानम्बिका स्वशरैः शरान् । बिडालाख्यं त्रिभिर्बाणैर्जघान च शिलाशितैः

ciccheda tāṁstathāprāptānambikā svaśaraiḥ śarān | biḍālākhyaṁ tribhirbāṇairjaghāna ca śilāśitaiḥ

अंबिका ने अपने बाणों से उन बाणों को उनके पहुँचने से पहले ही काट डाला, और शिला पर तीक्ष्ण किए गए तीन बाणों से बिडाल को मारा।

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.15.38)

प्राप्य बाणव्यथां दैत्यः पपात समराङ्गणे । मूर्च्छितोऽथ ममाराशु दानवो दैवयोगतः

prāpya bāṇavyathāṁ daityaḥ papāta samarāṅgaṇe | mūrcchito'tha mamārāśu dānavo daivayogataḥ

बाणों की पीड़ा पाकर वह दैत्य रणभूमि में गिर पड़ा; मूर्च्छित होकर वह दानव दैव-योग से शीघ्र ही मर गया।

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.15.39)

बिडालाख्यं हतं दृष्ट्वा रणे शक्तिशरोत्करैः । असिलोमा धनुष्पाणिः संस्थितो युद्धतत्परः

biḍālākhyaṁ hataṁ dṛṣṭvā raṇe śaktiśarotkaraiḥ | asilomā dhanuṣpāṇiḥ saṁsthito yuddhatatparaḥ

बिडाल को युद्ध में बाणों और शक्तियों के समूह से मारा गया देखकर, असिलोमा धनुष हाथ में लिए युद्ध के लिए तत्पर खड़ा हो गया।

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.15.40)

ऊर्ध्वं सव्यं करं कृत्वा तामुवाच मितं वचः । देवि जानामि मरणं दानवानां दुरात्मनाम्

ūrdhvaṁ savyaṁ karaṁ kṛtvā tāmuvāca mitaṁ vacaḥ | devi jānāmi maraṇaṁ dānavānāṁ durātmanām

बायाँ हाथ ऊपर उठाकर उसने देवी से संयत वचन कहा — "हे देवी! मैं जानता हूँ कि हम दुरात्मा दानवों की मृत्यु निश्चित है।"

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.15.41)

तथापि युद्धं कर्तव्यं पराधीनेन वै मया । महिषो मन्दबुद्धिश्च न जानाति प्रियाप्रिये

tathāpi yuddhaṁ kartavyaṁ parādhīnena vai mayā | mahiṣo mandabuddhiśca na jānāti priyāpriye

"फिर भी पराधीन होने के कारण मुझे युद्ध करना ही होगा। और महिष तो मंदबुद्धि है, वह अपने प्रिय-अप्रिय को भी नहीं जानता।"

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.15.42)

तदग्रे नैव वक्तव्यं हितं चैवाप्रियं मया । मर्तव्यं वीरधर्मेण शुभं वाप्यशुभं भवेत्

tadagre naiva vaktavyaṁ hitaṁ caivāpriyaṁ mayā | martavyaṁ vīradharmeṇa śubhaṁ vāpyaśubhaṁ bhavet

"इसलिए मैं उसके सामने हितकर परंतु अप्रिय वचन नहीं कहूँगा। वीर-धर्म के अनुसार मुझे मरना ही है, चाहे वह शुभ हो या अशुभ।"

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.15.43)

दैवमेव परं मन्ये धिपौरुषमनर्थकम् । पतन्ति दानवास्तूर्णं तव बाणहता भुवि

daivameva paraṁ manye dhipauruṣamanarthakam | patanti dānavāstūrṇaṁ tava bāṇahatā bhuvi

"मैं दैव को ही श्रेष्ठ मानता हूँ, पुरुषार्थ को व्यर्थ समझता हूँ; क्योंकि तुम्हारे बाणों से आहत होकर दानव शीघ्र ही धरती पर गिर रहे हैं।"

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.15.44)

इत्युक्त्वा शरवृष्टिं स चकार दानवोत्तमः । देवी चिच्छेद तान्बाणैरप्राप्तांस्तु निजान्तिके

ityuktvā śaravṛṣṭiṁ sa cakāra dānavottamaḥ | devī ciccheda tānbāṇairaprāptāṁstu nijāntike

ऐसा कहकर उस श्रेष्ठ दानव ने बाणों की वर्षा की; देवी ने उन्हें अपने पास पहुँचने से पहले ही अपने बाणों से काट डाला।

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.15.45)

अन्यैर्विव्याध तं तूर्णमसिलोमानमाशुगैः । वीक्षितामरसङ्घैश्च कोपपूर्णानना तदा

anyairvivyādha taṁ tūrṇamasilomānamāśugaiḥ | vīkṣitāmarasaṅghaiśca kopapūrṇānanā tadā

देवगणों द्वारा देखे जाते हुए, क्रोध से भरे मुख वाली देवी ने अन्य तीव्रगामी बाणों से तुरंत असिलोमा को बींध डाला।

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.15.46)

शुशुभे दानवः कामं बाणैर्विद्धतनुः किल । स्रवद्रुधिरधारः स प्रफुल्लः किंशुको यथा

śuśubhe dānavaḥ kāmaṁ bāṇairviddhatanuḥ kila | sravadrudhiradhāraḥ sa praphullaḥ kiṁśuko yathā

बाणों से शरीर बिंधा हुआ वह दानव, रक्त की धाराएँ बहाता हुआ, मानो खिले हुए किंशुक वृक्ष के समान अत्यंत शोभायमान हो उठा।

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.15.47)

असिलोमा गदां गुर्वीं लौहीमुद्यम्य वेगतः । दुद्राव चण्डिकां कोपात्सिंहं मूर्ध्नि जघान ह

asilomā gadāṁ gurvīṁ lauhīmudyamya vegataḥ | dudrāva caṇḍikāṁ kopātsiṁhaṁ mūrdhni jaghāna ha

असिलोमा ने भारी लौह-गदा शीघ्रता से उठाकर क्रोधपूर्वक चण्डिका की ओर दौड़कर सिंह के सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.15.48)

सिंहोऽपि नखराघातैस्तं ददार भुजान्तरे । अगणय्य गदाघातं कृतं तेन बलीयसा

siṁho'pi nakharāghātaistaṁ dadāra bhujāntare | agaṇayya gadāghātaṁ kṛtaṁ tena balīyasā

उस बलवान द्वारा किए गए गदा के प्रहार की परवाह न करते हुए सिंह ने भी अपने नखों के आघात से उसकी बाँह चीर डाली।

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.15.49)

उत्पत्य तरसा दैत्यो गदापाणिः सुदारुणः । सिंहमूर्ध्नि समारुह्य जघान गदयाम्बिकाम्

utpatya tarasā daityo gadāpāṇiḥ sudāruṇaḥ | siṁhamūrdhni samāruhya jaghāna gadayāmbikām

वह अत्यंत भयंकर दैत्य शीघ्रता से उछलकर, गदा हाथ में लिए सिंह के सिर पर चढ़कर, अंबिका पर गदा से प्रहार करने लगा।

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.15.50)

कृतं तेन प्रहारं तु वञ्चयित्वा विशाम्पते । खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद कण्ठतः

kṛtaṁ tena prahāraṁ tu vañcayitvā viśāmpate | khaḍgena śitadhāreṇa śiraściccheda kaṇṭhataḥ

हे राजन्! उसके द्वारा किए गए उस प्रहार को टालकर, देवी ने अपनी तीक्ष्ण धार वाली तलवार से उसका सिर गर्दन से काट डाला।

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.15.51)

छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रः पपात तरसा क्षितौ । हाहाकारो महानासीत्सैन्ये तस्य दुरात्मनः

chinne śirasi daityendraḥ papāta tarasā kṣitau | hāhākāro mahānāsītsainye tasya durātmanaḥ

सिर कटते ही वह दैत्येंद्र तुरंत भूमि पर गिर पड़ा; उस दुरात्मा की सेना में हाहाकार मच गया।

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.15.52)

जय देवीति देवास्ता तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम् । देवदुन्दुभयो नेदुर्जगुश्च नृप किन्नराः

jaya devīti devāstā tuṣṭuvurjagadambikām | devadundubhayo nedurjaguśca nṛpa kinnarāḥ

देवताओं ने "देवी की जय हो" कहकर जगदंबिका की स्तुति की; दिव्य नगाड़े बज उठे और किन्नर गाने लगे, हे राजन्।

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.15.53)

निहतौ दानवौ वीक्ष्य पतितौ च रणाङ्गणे । निहताः सैनिकाः सर्वे तत्र केसरिणा बलात्

nihatau dānavau vīkṣya patitau ca raṇāṅgaṇe | nihatāḥ sainikāḥ sarve tatra kesariṇā balāt

उन दोनों दानवों को रणभूमि में मारा गया देखकर, वहाँ के सभी सैनिकों को भी सिंह ने बलपूर्वक मार डाला।

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.15.54)

भक्षिताश्च तथा केचिन्निःशेषं तद्रणं कृतम् । भग्नाः केचिद् गता मन्दा महिषं प्रति दुःखिताः

bhakṣitāśca tathā kecinniḥśeṣaṁ tadraṇaṁ kṛtam | bhagnāḥ kecid gatā mandā mahiṣaṁ prati duḥkhitāḥ

कुछ को खा लिया गया, और वह युद्ध पूर्णतः समाप्त हो गया; कुछ टूटी हुई हिम्मत वाले, दुखी होकर महिष की ओर लौट गए।

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.15.55)

चुक्रुशू रुरुदुश्चैव त्राहि त्राहीति भाषणैः । असिलोमबिडालाख्यौ निहतौ नृपसत्तम

cukruśū ruruduścaiva trāhi trāhīti bhāṣaṇaiḥ | asilomabiḍālākhyau nihatau nṛpasattama

वे "बचाओ, बचाओ" पुकारते और रोते हुए बोले — "हे राजाओं में श्रेष्ठ! असिलोमा और बिडाल दोनों मारे गए!"

श्लोक 56 (devibhagavatam.5.15.56)

अन्ये ये सैनिका राजन् सिंहेन भक्षिताश्च ते । एवं ब्रुवन्तो राजानं तदा चक्रुश्च वैशसम्

anye ye sainikā rājan siṁhena bhakṣitāśca te | evaṁ bruvanto rājānaṁ tadā cakruśca vaiśasam

"और, हे राजन्! शेष सैनिक भी सिंह द्वारा खा लिए गए!" — ऐसा राजा से कहते हुए वे उस विपत्ति पर विलाप करने लगे।

श्लोक 57 (devibhagavatam.5.15.57)

तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां महिषो दुर्मनास्तदा । बभूव चिन्ताकुलितो विमना दुःखसंयुतः

tacchrutvā vacanaṁ teṣāṁ mahiṣo durmanāstadā | babhūva cintākulito vimanā duḥkhasaṁyutaḥ

उनके ये वचन सुनकर महिष उदास हो उठा; वह चिंता से व्याकुल, खिन्नचित्त और दुख से भर गया।

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