Skip to main content

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 2

महिषासुर का जन्म

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.2.1)

राजोवाच । योगेश्वर्याः प्रभावोऽयं कथितश्चातिविस्तरात् । ब्रूहि तच्चरितं स्वामिञ्छ्रोतुं कौतूहलं मम

rājovāca | yogeśvaryāḥ prabhāvo'yaṁ kathitaścātivistarāt | brūhi taccaritaṁ svāmiñchrotuṁ kautūhalaṁ mama

राजा ने कहा — योगेश्वरी की यह महिमा तो अत्यंत विस्तार से कही गई। हे स्वामिन्! अब उनका चरित्र और भी सुनाइए, मुझे सुनने की उत्सुकता है।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.2.2)

महादेवीप्रभावं वै श्रोतुं को नाभिवाञ्छति । यो जानाति जगत्सर्वं तदुत्पन्नं चराचरम्

mahādevīprabhāvaṁ vai śrotuṁ ko nābhivāñchati | yo jānāti jagatsarvaṁ tadutpannaṁ carācaram

महादेवी की महिमा सुनने की इच्छा किसे नहीं होती, जिनसे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है और जो सबको जानती हैं?

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.2.3)

व्यास उवाच । शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि विस्तरेण महामते । श्रद्दधानाय शान्ताय न ब्रूयात्स तु मन्दधीः

vyāsa uvāca | śṛṇu rājan pravakṣyāmi vistareṇa mahāmate | śraddadhānāya śāntāya na brūyātsa tu mandadhīḥ

व्यास जी ने कहा — हे राजन्! हे महामते! सुनिए, मैं विस्तार से कहता हूँ। यह कथा श्रद्धावान् और शान्त-चित्त व्यक्ति को ही कहनी चाहिए, मन्दबुद्धि को नहीं।

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.2.4)

पुरा युद्धमभूद् घोरं देवदानवसेनयोः । पृथिव्यां पृथिवीपाल महिषाख्ये महीपतौ

purā yuddhamabhūd ghoraṁ devadānavasenayoḥ | pṛthivyāṁ pṛthivīpāla mahiṣākhye mahīpatau

हे पृथिवीपाल! प्राचीन काल में, जब महिष नामक राजा पृथ्वी पर राज्य कर रहा था, देवताओं और दानवों की सेनाओं में एक घोर युद्ध हुआ।

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.2.5)

महिषो नाम राजेन्द्र चकार तप उत्तमम् । गत्वा हेमगिरौ चोग्रं देवविस्मयकारकम्

mahiṣo nāma rājendra cakāra tapa uttamam | gatvā hemagirau cograṁ devavismayakārakam

हे राजेन्द्र! महिष नामक दानव ने हेमगिरि पर्वत पर जाकर ऐसा उत्कृष्ट और उग्र तप किया, जिसने देवताओं को भी चकित कर दिया।

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.2.6)

वर्षाणामयुतं पूर्णं चिन्तयन्हृदि देवताम् । तस्य तुष्टो महाराज ब्रह्मा लोकपितामहः

varṣāṇāmayutaṁ pūrṇaṁ cintayanhṛdi devatām | tasya tuṣṭo mahārāja brahmā lokapitāmahaḥ

दस हजार वर्षों तक हृदय में देवता का ध्यान करते हुए, हे महाराज! लोकपितामह ब्रह्मा उससे प्रसन्न हो गए।

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.2.7)

तत्रागत्याब्रवीद्वाक्यं हंसारूढश्चतुर्मुखः । वरं वरय धर्मात्मन्ददामि तव वाच्छितम्

tatrāgatyābravīdvākyaṁ haṁsārūḍhaścaturmukhaḥ | varaṁ varaya dharmātmandadāmi tava vācchitam

वहाँ आकर हंसारूढ़ चतुर्मुख ब्रह्मा ने कहा — 'हे धर्मात्मन्! वर माँगो, मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा।'

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.2.8)

महिष उवाच । अमरत्वं देवदेव वाञ्छामि द्रुहिण प्रभो । यथा मृत्यु भयं न स्यात्तथा कुरु पितामह

mahiṣa uvāca | amaratvaṁ devadeva vāñchāmi druhiṇa prabho | yathā mṛtyu bhayaṁ na syāttathā kuru pitāmaha

महिष ने कहा — हे देवदेव! हे द्रुहिण! हे प्रभो! मैं अमरत्व चाहता हूँ। हे पितामह! ऐसा करें कि मुझे मृत्यु का भय न रहे।

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.2.9)

ब्रह्मोवाच । उत्पन्नस्य ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । सर्वथा मरणोत्पत्ती सर्वेषां प्राणिनां किल

brahmovāca | utpannasya dhruvaṁ mṛtyurdhruvaṁ janma mṛtasya ca | sarvathā maraṇotpattī sarveṣāṁ prāṇināṁ kila

ब्रह्मा ने कहा — जो उत्पन्न हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है, उसका जन्म भी निश्चित है। समस्त प्राणियों के लिए जन्म और मृत्यु सर्वथा अवश्यम्भावी हैं।

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.2.10)

नाशः कालेन सर्वेषां प्राणिनां दैत्यपुङ्गव । महामहीधराणां च समुद्राणां च सर्वथा

nāśaḥ kālena sarveṣāṁ prāṇināṁ daityapuṅgava | mahāmahīdharāṇāṁ ca samudrāṇāṁ ca sarvathā

हे दैत्यपुंगव! काल के द्वारा सभी प्राणियों का, और सर्वथा महान् पर्वतों तथा समुद्रों का भी नाश होता है।

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.2.11)

एकं स्थानं परित्यज्य मरणस्य महीपते । प्रब्रूहि तं वरं साधो यस्ते मनसि वर्तते

ekaṁ sthānaṁ parityajya maraṇasya mahīpate | prabrūhi taṁ varaṁ sādho yaste manasi vartate

हे महीपते! मृत्यु के इस एक विषय को छोड़कर, हे साधो! जो भी वर तुम्हारे मन में हो, वह बताओ।

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.2.12)

महिष उवाच । न देवान्मानुषाद्दैत्यान्मरणं मे पितामह । पुरुषान्न च मे मृत्युर्योषा मां का हनिष्यति

mahiṣa uvāca | na devānmānuṣāddaityānmaraṇaṁ me pitāmaha | puruṣānna ca me mṛtyuryoṣā māṁ kā haniṣyati

महिष ने कहा — हे पितामह! मेरी मृत्यु न देवताओं से हो, न मनुष्यों से, न दैत्यों से, न ही किसी पुरुष से। भला कोई स्त्री मुझे कैसे मार सकती है?

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.2.13)

तस्मान्मे मरणं नूनं कामिन्याः कुरु पद्मज । अबला हन्त मां हन्तुं कथं शक्ता भविष्यति

tasmānme maraṇaṁ nūnaṁ kāminyāḥ kuru padmaja | abalā hanta māṁ hantuṁ kathaṁ śaktā bhaviṣyati

इसलिए हे पद्मज! मेरी मृत्यु किसी कामिनी के हाथों ही निश्चित करें — क्योंकि भला एक अबला मुझे मारने में कैसे समर्थ हो सकती है?

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.2.14)

ब्रह्मोवाच । यदा कदापि दैत्येन्द्र नार्यास्ते मरणं ध्रुवम् । न नरेभ्यो महाभाग मृतिस्ते महिषासुर

brahmovāca | yadā kadāpi daityendra nāryāste maraṇaṁ dhruvam | na narebhyo mahābhāga mṛtiste mahiṣāsura

ब्रह्मा ने कहा — हे दैत्येन्द्र! जब कभी भी हो, तुम्हारी मृत्यु स्त्री के हाथों ही निश्चित है, पुरुषों से नहीं, हे महाभाग महिषासुर!

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.2.15)

व्यास उवाच । एवं दत्त्वा वरं तस्मै ययौ ब्रह्मा निजालयम् । सोऽपि दैत्यवरः प्राप निजं स्थानं मुदान्वितः

vyāsa uvāca | evaṁ dattvā varaṁ tasmai yayau brahmā nijālayam | so'pi daityavaraḥ prāpa nijaṁ sthānaṁ mudānvitaḥ

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार उसे वर देकर ब्रह्मा अपने लोक को चले गए। वह दैत्यश्रेष्ठ भी हर्षित होकर अपने स्थान को लौट गया।

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.2.16)

राजोवाच । महिषः कस्य पुत्रोऽसौ कथं जातो महाबली । कथं च माहिषं रूपं प्राप्तं तेन महात्मना

rājovāca | mahiṣaḥ kasya putro'sau kathaṁ jāto mahābalī | kathaṁ ca māhiṣaṁ rūpaṁ prāptaṁ tena mahātmanā

राजा ने कहा — यह महाबली महिष किसका पुत्र था? वह कैसे उत्पन्न हुआ? और उस महात्मा को भैंसे का रूप कैसे प्राप्त हुआ?

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.2.17)

व्यास उवाच । दनोः पुत्रौ महाराज विख्यातौ क्षितिमण्डले । रम्भश्चैव करम्भश्च द्वावास्तां दानवोत्तमौ

vyāsa uvāca | danoḥ putrau mahārāja vikhyātau kṣitimaṇḍale | rambhaścaiva karambhaśca dvāvāstāṁ dānavottamau

व्यास जी ने कहा — हे महाराज! दनु के दो पुत्र थे, जो पृथ्वीमण्डल में विख्यात थे — रम्भ और करम्भ, दोनों ही श्रेष्ठ दानव।

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.2.18)

तावपुत्रौ महाराज पुत्रार्थं तेपतुस्तपः । बहून्वर्षगणान्कामं पुण्ये पञ्चनदे जले

tāvaputrau mahārāja putrārthaṁ tepatustapaḥ | bahūnvarṣagaṇānkāmaṁ puṇye pañcanade jale

हे महाराज! वे दोनों पुत्रहीन थे, अतः पुत्र-प्राप्ति हेतु पवित्र पंचनद के जल में अनेक वर्षों तक स्वेच्छा से तप किया।

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.2.19)

करम्भस्तु जले मग्नश्चकार परमं तपः । वृक्षं रसालवटं प्राप्य रम्भोऽग्निमसेवत

karambhastu jale magnaścakāra paramaṁ tapaḥ | vṛkṣaṁ rasālavaṭaṁ prāpya rambho'gnimasevata

करम्भ जल में डूबा हुआ परम तप करने लगा, जबकि रम्भ आम्र और वट वृक्ष के समीप जाकर अग्नि की उपासना करने लगा।

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.2.20)

पञ्चाग्निसाधनासक्तः स रम्भस्तु यदाभवत् । ज्ञात्वा शचीपतिर्दुःखमुद्ययौ दानवौ प्रति

pañcāgnisādhanāsaktaḥ sa rambhastu yadābhavat | jñātvā śacīpatirduḥkhamudyayau dānavau prati

जब रम्भ पंचाग्नि-साधना में लीन हो गया, तब यह जानकर इन्द्र दुःखी हो उन दोनों दानवों की ओर चल पड़े।

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.2.21)

गत्वा पञ्चनदे तत्र ग्राहरूपं चकार ह । वासवस्तु करम्भं तं तदा जग्राह पादयोः

gatvā pañcanade tatra grāharūpaṁ cakāra ha | vāsavastu karambhaṁ taṁ tadā jagrāha pādayoḥ

वहाँ पंचनद में जाकर इन्द्र ने मगरमच्छ का रूप धारण किया, और उसी रूप में उन्होंने करम्भ को पैरों से पकड़ लिया।

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.2.22)

निजघान च तं दुष्टं करम्भं वृत्रसूदनः । भ्रातरं निहतं श्रुत्वा रम्भः कोपं परं गतः

nijaghāna ca taṁ duṣṭaṁ karambhaṁ vṛtrasūdanaḥ | bhrātaraṁ nihataṁ śrutvā rambhaḥ kopaṁ paraṁ gataḥ

वृत्रसूदन (इन्द्र) ने उस दुष्ट करम्भ का वध कर दिया। अपने भाई के मारे जाने का समाचार सुनकर रम्भ अत्यंत क्रोधित हो उठा।

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.2.23)

स्वशीर्षं पावके होतुमैच्छच्छित्त्वा करेण ह । केशपाशे गहीत्वाशु वामेन क्रोधसंयुतः

svaśīrṣaṁ pāvake hotumaicchacchittvā kareṇa ha | keśapāśe gahītvāśu vāmena krodhasaṁyutaḥ

क्रोध से भरकर उसने अपने ही सिर को हाथ से काटकर अग्नि में हवन करने की इच्छा की; शीघ्रता से बाएँ हाथ से अपने केशों को पकड़कर —

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.2.24)

दक्षिणेन करेणोग्रं गृहीत्वा खड्गमुत्तमम् । छिनत्ति शीर्षं तत्तावद्वह्निना प्रतिबोधितः

dakṣiṇena kareṇograṁ gṛhītvā khaḍgamuttamam | chinatti śīrṣaṁ tattāvadvahninā pratibodhitaḥ

और दाहिने हाथ से उग्र, उत्तम खड्ग लेकर वह अपना सिर काटने ही वाला था कि तभी अग्निदेव ने स्वयं उसे रोक दिया।

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.2.25)

उक्तश्च दैत्य मूर्खोऽसि स्वशीर्षं छेत्तुमिच्छसि । आत्महत्यातिदुःसाध्या कथं त्वं कर्तुमुद्यतः

uktaśca daitya mūrkho'si svaśīrṣaṁ chettumicchasi | ātmahatyātiduḥsādhyā kathaṁ tvaṁ kartumudyataḥ

और उससे कहा गया — 'हे दैत्य! तुम मूर्ख हो, जो अपना सिर काटना चाहते हो! आत्महत्या अत्यंत दुःसाध्य पाप है, तुम इसे करने पर क्यों उद्यत हो?'

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.2.26)

वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते । मा म्रियस्व मृतेनाद्य किं ते कार्यं भविष्यति

varaṁ varaya bhadraṁ te yaste manasi vartate | mā mriyasva mṛtenādya kiṁ te kāryaṁ bhaviṣyati

'इसके बदले वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो, जो भी तुम्हारे मन में हो। मरो मत — आज तुम्हारे मरने से क्या लाभ होगा?'

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.2.27)

व्यास उवाच । तच्छुत्वा वचनं रम्भः पावकस्य सुभाषितम् । ततोऽब्रवीद्वचो रम्भस्त्यक्त्वा केशकलापकम्

vyāsa uvāca | tacchutvā vacanaṁ rambhaḥ pāvakasya subhāṣitam | tato'bravīdvaco rambhastyaktvā keśakalāpakam

व्यास जी ने कहा — अग्निदेव के इन सुभाषित वचनों को सुनकर रम्भ ने अपने केश छोड़ दिए और यह कहा।

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.2.28)

यदि तुष्टोऽसि देवेश देहि मे वाञ्छितं वरम् । त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्नः परबलार्दनः

yadi tuṣṭo'si deveśa dehi me vāñchitaṁ varam | trailokyavijayī putraḥ syānnaḥ parabalārdanaḥ

'हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे मेरा इच्छित वर दीजिए — मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो त्रिलोक-विजयी और शत्रु-सेना का संहारक हो।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.2.29)

अजेयः सर्वथा स स्याद्देवदानवमानवैः । कामरूपी महावीर्यः सर्वलोकाभिवन्दितः

ajeyaḥ sarvathā sa syāddevadānavamānavaiḥ | kāmarūpī mahāvīryaḥ sarvalokābhivanditaḥ

'वह देवताओं, दानवों और मनुष्यों द्वारा सर्वथा अजेय हो, इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, महापराक्रमी और समस्त लोकों द्वारा वन्दनीय हो।'

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.2.30)

पावकस्तं तथेत्याह भविष्यति तवेप्सितम् । पुत्रस्तव महाभाग मरणाद्विरमाधुना

pāvakastaṁ tathetyāha bhaviṣyati tavepsitam | putrastava mahābhāga maraṇādviramādhunā

अग्निदेव ने कहा — 'ऐसा ही होगा, तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी। हे महाभाग! तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा — अब मृत्यु का विचार त्याग दो।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.2.31)

यस्यां चित्तं तु रम्भ त्वं प्रमदायां करिष्यसि । तस्यां पुत्रो महाभाग भविष्यति बलाधिकः

yasyāṁ cittaṁ tu rambha tvaṁ pramadāyāṁ kariṣyasi | tasyāṁ putro mahābhāga bhaviṣyati balādhikaḥ

'हे रम्भ! जिस स्त्री में तुम अपना चित्त लगाओगे, हे महाभाग! उसी में तुम्हें यह अत्यंत बलशाली पुत्र प्राप्त होगा।'

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.2.32)

व्यास उवाच । इत्युक्तो वह्निना रम्भो वचनं चित्तरञ्जनम् । श्रुत्वा प्रणम्य प्रययौ वह्निं तं दानवोत्तमः

vyāsa uvāca | ityukto vahninā rambho vacanaṁ cittarañjanam | śrutvā praṇamya prayayau vahniṁ taṁ dānavottamaḥ

व्यास जी ने कहा — अग्निदेव द्वारा कहे गए इस चित्त को प्रसन्न करने वाले वचन को सुनकर, वह श्रेष्ठ दानव रम्भ उन्हें प्रणाम कर वहाँ से चला गया।

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.2.33)

यक्षैः परिवृतं स्थानं रमणीयं श्रियान्वितम् । दृष्ट्वा चक्रे तदा भावं महिष्यां दानवोत्तमः

yakṣaiḥ parivṛtaṁ sthānaṁ ramaṇīyaṁ śriyānvitam | dṛṣṭvā cakre tadā bhāvaṁ mahiṣyāṁ dānavottamaḥ

यक्षों से घिरे हुए एक रमणीय, शोभासम्पन्न स्थान को देखकर, उस श्रेष्ठ दानव के मन में वहाँ एक भैंस के प्रति आसक्ति उत्पन्न हुई।

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.2.34)

मत्तायां रूपपूर्णायां विहायान्याञ्च योषितम् । सा समागाच्च तरसा कामयन्ती मुदान्विता

mattāyāṁ rūpapūrṇāyāṁ vihāyānyāñca yoṣitam | sā samāgācca tarasā kāmayantī mudānvitā

अन्य सभी मादाओं को छोड़कर, उस मदमाती, अत्यंत सुन्दर भैंस पर उसका मन गया, और वह भी हर्षित तथा कामातुर होकर वेगपूर्वक उसके पास आई।

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.2.35)

रम्भोऽपि गमनं चक्रे भवितव्यप्रणोदितः । सा तु गर्भवती जाता महिषी तस्य वीर्यतः

rambho'pi gamanaṁ cakre bhavitavyapraṇoditaḥ | sā tu garbhavatī jātā mahiṣī tasya vīryataḥ

होनहार से प्रेरित होकर रम्भ भी उसके समीप गया, और उसके वीर्य से वह भैंस गर्भवती हुई।

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.2.36)

तां गृहीत्वाथ पातालं प्रविवेश मनोहरम् । महिषेभ्यश्च तां रक्षन्प्रियामनुमतां किल

tāṁ gṛhītvātha pātālaṁ praviveśa manoharam | mahiṣebhyaśca tāṁ rakṣanpriyāmanumatāṁ kila

उसे साथ लेकर वह मनोहर पाताल-लोक में प्रवेश कर गया, और अन्य भैंसों से अपनी उस प्रिय, स्वीकृत पत्नी की रक्षा करने लगा।

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.2.37)

कदाचिन्महिषश्चान्यः कामार्तस्तामुपाद्रवत् । स्वयमागत्य तं हन्तुं दानवः समुपाद्रवत्

kadācinmahiṣaścānyaḥ kāmārtastāmupādravat | svayamāgatya taṁ hantuṁ dānavaḥ samupādravat

एक दिन कामातुर एक अन्य भैंसा उसके पास आ पहुँचा; तब वह दानव (रम्भ) स्वयं उसे मारने के लिए आगे बढ़ा।

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.2.38)

स्वरक्षार्थं समागत्य महिषं समताडयत् । सोऽपि तं निजघानाशु शृङ्गाभ्यां काममोहितः

svarakṣārthaṁ samāgatya mahiṣaṁ samatāḍayat | so'pi taṁ nijaghānāśu śṛṅgābhyāṁ kāmamohitaḥ

अपनी रक्षा हेतु आगे बढ़कर उसने भैंसे पर प्रहार किया; परन्तु काम से मोहित उस भैंसे ने अपने सींगों से शीघ्र ही उसे मार डाला।

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.2.39)

ताडितस्तेन तीक्ष्णाभ्यां शृङ्गाभ्यां हृदये भृशम् । भूमौ पपात तरसा ममार च विमूर्च्छितः

tāḍitastena tīkṣṇābhyāṁ śṛṅgābhyāṁ hṛdaye bhṛśam | bhūmau papāta tarasā mamāra ca vimūrcchitaḥ

उन तीक्ष्ण सींगों से हृदय पर गहरी चोट लगने से वह वेगपूर्वक भूमि पर गिर पड़ा, और मूर्च्छित होकर मर गया।

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.2.40)

मृते भर्तरि सा दीना भयार्ता विद्रुता भृशम् । सा वेगात्तं वटं प्राप्य यक्षाणां शरणं गता

mṛte bhartari sā dīnā bhayārtā vidrutā bhṛśam | sā vegāttaṁ vaṭaṁ prāpya yakṣāṇāṁ śaraṇaṁ gatā

पति के मर जाने पर वह दीन, भयभीत भैंसी वेगपूर्वक भाग खड़ी हुई; वेग से उसी वटवृक्ष के पास पहुँचकर उसने यक्षों की शरण ली।

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.2.41)

पृष्ठतस्तु गतस्तत्र महिषः कामपीडितः । कामयानस्तु तां कामी बलवीर्यमदोद्धतः

pṛṣṭhatastu gatastatra mahiṣaḥ kāmapīḍitaḥ | kāmayānastu tāṁ kāmī balavīryamadoddhataḥ

परन्तु कामपीड़ित वह भैंसा भी उसके पीछे-पीछे वहाँ आ पहुँचा — बल और वीर्य के मद से उन्मत्त वह कामी उसका पीछा करता रहा।

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.2.42)

रुदती सा भृशं दीना दृष्टा यक्षैर्भयातुरा । धावमानं च तं वीक्ष्य यक्षास्त्रातुं समाययुः

rudatī sā bhṛśaṁ dīnā dṛṣṭā yakṣairbhayāturā | dhāvamānaṁ ca taṁ vīkṣya yakṣāstrātuṁ samāyayuḥ

उसे अत्यंत विलाप करती, दीन और भयभीत देखकर, तथा उस दौड़ते हुए भैंसे को देखकर, यक्ष उसकी रक्षा के लिए आगे आए।

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.2.43)

युद्धं समभवद् घोरं यक्षाणां च हयारिणा । शरेण ताडितस्तूर्णं पपात धरणीतले

yuddhaṁ samabhavad ghoraṁ yakṣāṇāṁ ca hayāriṇā | śareṇa tāḍitastūrṇaṁ papāta dharaṇītale

यक्षों तथा हयारि (इन्द्र) के साथ उस भैंसे का घोर युद्ध हुआ; बाण से आहत होकर वह तत्काल धरती पर गिर पड़ा।

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.2.44)

मृतं रम्भं समानीय यक्षास्ते परमं प्रियम् । चितायां रोपयामासुस्तस्य देहस्य शुद्धये

mṛtaṁ rambhaṁ samānīya yakṣāste paramaṁ priyam | citāyāṁ ropayāmāsustasya dehasya śuddhaye

उन यक्षों ने उस अत्यंत प्रिय मृत रम्भ को लाकर, उसके शरीर की शुद्धि हेतु चिता पर रखा।

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.2.45)

महिषी सा पतिं दृष्ट्वा चितायां रोपितं तदा । प्रवेष्टुं सा मतिं चक्रे पतिना सह पावकम्

mahiṣī sā patiṁ dṛṣṭvā citāyāṁ ropitaṁ tadā | praveṣṭuṁ sā matiṁ cakre patinā saha pāvakam

उस महिषी ने अपने पति को चिता पर रखा देखकर, पति के साथ अग्नि में प्रवेश करने का निश्चय किया।

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.2.46)

वार्यमाणापि यक्षैः सा प्रविवेश हुताशनम् । ज्वालामालाकुलं साध्वी पतिमादाय वल्लभम्

vāryamāṇāpi yakṣaiḥ sā praviveśa hutāśanam | jvālāmālākulaṁ sādhvī patimādāya vallabham

यक्षों द्वारा रोके जाने पर भी, वह साध्वी ज्वालाओं से घिरी हुई अग्नि में अपने प्रिय पति को लेकर प्रविष्ट हो गई।

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.2.47)

महिषस्तु चितामध्यात्समुत्तस्थौ महाबलः । रम्भोऽप्यन्यद्वपुः कृत्वा निःसृतः पुत्रवत्सलः

mahiṣastu citāmadhyātsamuttasthau mahābalaḥ | rambho'pyanyadvapuḥ kṛtvā niḥsṛtaḥ putravatsalaḥ

तब उस चिता के मध्य से महाबली महिष उत्पन्न हुआ, और रम्भ भी दूसरा रूप धारण कर, पुत्र-स्नेह से पूर्ण होकर उससे प्रकट हुआ।

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.2.48)

रक्तबीजोऽप्यसौ जातो महिषोऽपि महाबलः । अभिषिक्तस्तु राज्येऽसौ हयारिरसुरोत्तमैः

raktabījo'pyasau jāto mahiṣo'pi mahābalaḥ | abhiṣiktastu rājye'sau hayārirasurottamaiḥ

इस प्रकार रक्तबीज भी उत्पन्न हुआ, और महाबली महिष भी; और उस इन्द्र-शत्रु महिष को असुरश्रेष्ठों ने राज्याभिषेक किया।

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.2.49)

एवं स महिषो जातो रक्तबीजश्च वीर्यवान् । अवध्यस्तु सुरैर्दैत्यैर्मानवैश्च नृपोत्तम

evaṁ sa mahiṣo jāto raktabījaśca vīryavān | avadhyastu surairdaityairmānavaiśca nṛpottama

हे नृपोत्तम! इस प्रकार वह महिष उत्पन्न हुआ, और पराक्रमी रक्तबीज भी — दोनों ही देवताओं, दैत्यों और मनुष्यों द्वारा अवध्य थे।

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.2.50)

इत्येतत्कथितं राजन् जन्म तस्य महात्मनः । वरप्रदानञ्च तथा प्रोक्तं सर्वं सविस्तरम्

ityetatkathitaṁ rājan janma tasya mahātmanaḥ | varapradānañca tathā proktaṁ sarvaṁ savistaram

हे राजन्! इस प्रकार उस महात्मा का जन्म कह दिया गया, तथा वरदान का प्रसंग भी विस्तारपूर्वक कह दिया गया।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3