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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 21

शुंभ-निशुंभ द्वारा स्वर्ग-विजय

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.21.1)

व्यास उवाच । शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्याश्चरितमुत्तमम् । सुखदं सर्वजन्तूनां सर्वपापप्रणाशनम्

vyāsa uvāca | śṛṇu rājan pravakṣyāmi devyāścaritamuttamam | sukhadaṁ sarvajantūnāṁ sarvapāpapraṇāśanam

व्यास जी ने कहा — "हे राजन्! सुनो, मैं अब देवी का यह उत्तम चरित्र सुनाता हूँ, जो समस्त प्राणियों को सुख देने वाला और सभी पापों का नाश करने वाला है।"

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.21.2)

यथा शुम्भो निशुम्भश्च भ्रातरौ बलवत्तरौ । बभूवतुर्महावीरौ अवध्यौ पुरुषैः किल

yathā śumbho niśumbhaśca bhrātarau balavattarau | babhūvaturmahāvīrau avadhyau puruṣaiḥ kila

"किस प्रकार शुंभ और निशुंभ नामक दो अत्यंत बलशाली भाई महावीर बने, जो मनुष्यों द्वारा अवध्य थे।"

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.21.3)

बहुसेनावृतौ शूरौ देवानां दुःखदौ सदा दुराचारौ मदोत्सिक्तौ बहुदानवसंयुतौ

bahusenāvṛtau śūrau devānāṁ duḥkhadau sadā durācārau madotsiktau bahudānavasaṁyutau

"वे दोनों वीर, विशाल सेना से घिरे हुए, सदा देवताओं को दुख देने वाले, दुराचारी, मद से उन्मत्त, अनेक दानवों से युक्त —"

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.21.4)

हतावम्बिकया तौ तु सङ्ग्रामेऽतीव दारुणे । देवानाञ्ज हितार्थाय सर्वैः परिचरैः सह

hatāvambikayā tau tu saṅgrāme'tīva dāruṇe | devānāñja hitārthāya sarvaiḥ paricaraiḥ saha

"— एक अत्यंत भीषण युद्ध में देवताओं के हित के लिए अंबिका द्वारा अपने समस्त सेवकों सहित मारे गए।"

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.21.5)

चण्डमुण्डौ महाबाहू रक्तबीजोऽतिदारुणः । धूम्रलोचननामा च निहतास्ते रणाङ्गणे

caṇḍamuṇḍau mahābāhū raktabījo'tidāruṇaḥ | dhūmralocananāmā ca nihatāste raṇāṅgaṇe

"महाबाहु चंड और मुंड, अत्यंत भीषण रक्तबीज, और धूम्रलोचन नामक दानव भी युद्धभूमि में मारे गए।"

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.21.6)

तान्निहत्य सुराणां सा जहार भयमुत्तमम् । स्तुता सम्पूजिता देवैर्गिरौ हेमाचले शुभे

tānnihatya surāṇāṁ sā jahāra bhayamuttamam | stutā sampūjitā devairgirau hemācale śubhe

"उन्हें मारकर देवी ने देवताओं के परम भय को हर लिया, और स्वर्ण-पर्वत पर देवताओं द्वारा स्तुति और पूजा प्राप्त की।"

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.21.7)

राजोवाच । कावेतावसुरावादौ कथं तौ बलिनां वरौ । केन संस्थापितौ चेह स्त्रीवध्यत्वं कुतो गतौ

rājovāca | kāvetāvasurāvādau kathaṁ tau balināṁ varau | kena saṁsthāpitau ceha strīvadhyatvaṁ kuto gatau

राजा ने कहा — "ये दोनों असुर पहले कौन थे? वे बलशालियों में श्रेष्ठ कैसे बने? इन्हें किसने स्थापित किया, और वे स्त्री द्वारा वध्य कैसे बने?"

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.21.8)

तपसा वरदानेन कस्य जातौ महाबलौ । कथञ्च निहतौ सर्वं कथयस्व सविस्तरम्

tapasā varadānena kasya jātau mahābalau | kathañca nihatau sarvaṁ kathayasva savistaram

"किस तप से, अथवा किसके वरदान से वे महाबली बने? और उनका वध कैसे हुआ? यह सब मुझे विस्तार से बताइए।"

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.21.9)

व्यास उवाच । शृणु राजन्कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् । देव्याश्चरितसंयुक्तां सर्वार्थफलदां शुभाम्

vyāsa uvāca | śṛṇu rājankathāṁ divyāṁ sarvapāpapraṇāśinīm | devyāścaritasaṁyuktāṁ sarvārthaphaladāṁ śubhām

व्यास जी ने कहा — "हे राजन्! सुनो यह दिव्य कथा, जो समस्त पापों का नाश करने वाली, देवी के चरित्र से युक्त, और सभी अभीष्ट फल देने वाली शुभ कथा है।"

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.21.10)

पुरा शुम्भनिशुम्भौ द्वावसुरौ भूमिमण्डले । पातालतश्च सम्प्राप्तौ भ्रातरौ शुभदर्शनौ

purā śumbhaniśumbhau dvāvasurau bhūmimaṇḍale | pātālataśca samprāptau bhrātarau śubhadarśanau

"प्राचीन काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर, सुंदर रूप वाले दो भाई, पाताल से पृथ्वी-मंडल पर आए।"

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.21.11)

तौ प्राप्तयौवनौ चैव चेरतुस्तप उत्तमम् । अन्नोदकं परित्यज्य पुष्करे लोकपावने

tau prāptayauvanau caiva ceratustapa uttamam | annodakaṁ parityajya puṣkare lokapāvane

"यौवन प्राप्त करके उन्होंने अन्न-जल त्यागकर, लोकपावन पुष्कर तीर्थ में उत्तम तप करना आरंभ किया।"

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.21.12)

वर्षाणामयुतं यावद्योगविद्यापरायणौ । एकत्रैवासनं कृत्वा तेपाते परमं तपः

varṣāṇāmayutaṁ yāvadyogavidyāparāyaṇau | ekatraivāsanaṁ kṛtvā tepāte paramaṁ tapaḥ

"दस हजार वर्षों तक, योग-विद्या में तत्पर, एक ही स्थान पर बैठकर उन्होंने परम तप किया।"

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.21.13)

तयोस्तुष्टोऽभवद् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः । तत्रागतश्च भगवानारुह्य वरटापतिम्

tayostuṣṭo'bhavad brahmā sarvalokapitāmahaḥ | tatrāgataśca bhagavānāruhya varaṭāpatim

"उन दोनों से समस्त लोकों के पितामह ब्रह्मा प्रसन्न हुए, और भगवान वहाँ हंस पर सवार होकर आए।"

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.21.14)

तावुभौ च जगत्स्रष्टा दृष्ट्वा ध्यानपरौ स्थितौ । उत्तिष्ठत महाभागौ तुष्टोऽहं तपसा किल

tāvubhau ca jagatsraṣṭā dṛṣṭvā dhyānaparau sthitau | uttiṣṭhata mahābhāgau tuṣṭo'haṁ tapasā kila

"उन दोनों को ध्यानमग्न देखकर, जगत-स्रष्टा ने कहा — 'उठो, हे महाभागो! मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ।'"

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.21.15)

वाञ्छितं वां वरं कामं ददामि ब्रुवतामिह । कामदोऽहं समायातो दृष्ट्वा वां तपसो बलम्

vāñchitaṁ vāṁ varaṁ kāmaṁ dadāmi bruvatāmiha | kāmado'haṁ samāyāto dṛṣṭvā vāṁ tapaso balam

"'यहाँ बोलो, तुम जो भी वरदान चाहते हो, वह मैं तुम्हें देता हूँ। तुम्हारे तप का बल देखकर मैं वरदाता बनकर आया हूँ।'"

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.21.16)

व्यास उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्य प्रबुद्धौ तौ समाहितौ । प्रदक्षिणक्रियां कृत्वा प्रणामं चक्रतुस्तदा

vyāsa uvāca | iti śrutvā vacastasya prabuddhau tau samāhitau | pradakṣiṇakriyāṁ kṛtvā praṇāmaṁ cakratustadā

व्यास जी ने कहा — उनके ये वचन सुनकर, समाधि से जागृत और सावधान हुए वे दोनों, प्रदक्षिणा करके प्रणाम करने लगे।

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.21.17)

दण्डवत्प्रणिपातञ्च कृत्वा तौ दुर्बलाकृती । ऊचतुर्मधुरां वाचं दीनौ गद्गदया गिरा

daṇḍavatpraṇipātañca kṛtvā tau durbalākṛtī | ūcaturmadhurāṁ vācaṁ dīnau gadgadayā girā

दंडवत प्रणाम करके, तप से दुर्बल हुई देह वाले वे दोनों, दीन स्वर में, गद्गद वाणी से मधुर वचन बोले।

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.21.18)

देवदेव दयासिन्धो भक्तानामभयप्रद । अमरत्वञ्च नौ ब्रह्मन्देहि तुष्टोऽसि चेद्विभो

devadeva dayāsindho bhaktānāmabhayaprada | amaratvañca nau brahmandehi tuṣṭo'si cedvibho

"हे देवाधिदेव! हे दया-सागर! हे भक्तों को अभय देने वाले! हे ब्रह्मन्! यदि आप प्रसन्न हैं, तो हमें अमरता प्रदान करें।"

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.21.19)

मरणादपरं किञ्चिद्भयं नास्ति धरातले । तस्माद्भयाच्च सन्त्रस्तौ युष्माकं शरणं गतौ

maraṇādaparaṁ kiñcidbhayaṁ nāsti dharātale | tasmādbhayācca santrastau yuṣmākaṁ śaraṇaṁ gatau

"इस पृथ्वी पर मृत्यु से बढ़कर कोई भय नहीं है; इसीलिए इस भय से भयभीत होकर हम आपकी शरण में आए हैं।"

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.21.20)

त्राहि त्वं देवदेवेश जगत्कर्तः क्षमानिधे । परिस्फोटय विश्वात्मन् सद्यो मरणजं भयम्

trāhi tvaṁ devadeveśa jagatkartaḥ kṣamānidhe | parisphoṭaya viśvātman sadyo maraṇajaṁ bhayam

"हे देवाधिदेवेश! हे जगत-कर्ता! हे क्षमा-निधि! हमारी रक्षा करें, हे विश्वात्मन्! इस मृत्यु-जनित भय को तुरंत ही नष्ट कर दें।"

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.21.21)

ब्रह्मोवाच । किमिदं प्रार्थनीयं वो विपरीतं तु सर्वथा । अदेयं सर्वथा सर्वैः सर्वेभ्यो भुवनत्रये

brahmovāca | kimidaṁ prārthanīyaṁ vo viparītaṁ tu sarvathā | adeyaṁ sarvathā sarvaiḥ sarvebhyo bhuvanatraye

ब्रह्मा ने कहा — "यह तुम क्या माँग रहे हो? यह तो सर्वथा विपरीत है — यह तीनों लोकों में किसी को भी, किसी के द्वारा भी सर्वथा नहीं दिया जा सकता।"

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.21.22)

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । मर्यादा विहिता लोके पूर्वं विश्वकृता किल

jātasya hi dhruvo mṛtyurdhruvaṁ janma mṛtasya ca | maryādā vihitā loke pūrvaṁ viśvakṛtā kila

"जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरता है, उसका पुनर्जन्म निश्चित है। यह मर्यादा पूर्वकाल में विश्वकर्ता द्वारा ही लोक में स्थापित की गई है।"

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.21.23)

मर्तव्यं सर्वथा सर्वैः प्राणिभिर्नात्र संशयः । अन्यं प्रार्थयतं कामं ददामि यच्च वाञ्छितम्

martavyaṁ sarvathā sarvaiḥ prāṇibhirnātra saṁśayaḥ | anyaṁ prārthayataṁ kāmaṁ dadāmi yacca vāñchitam

"सभी प्राणियों को सर्वथा मरना ही है, इसमें संदेह नहीं। कोई अन्य इच्छित वस्तु माँगो, जो तुम चाहो, वह मैं तुम्हें दूँगा।"

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.21.24)

व्यास उवाच । तदाकर्ण्य वचस्तस्य सुविमृश्य च दानवौ । ऊचतुः प्रणिपत्याथ ब्रह्माणं पुरतः स्थितम्

vyāsa uvāca | tadākarṇya vacastasya suvimṛśya ca dānavau | ūcatuḥ praṇipatyātha brahmāṇaṁ purataḥ sthitam

व्यास जी ने कहा — उसके ये वचन सुनकर, भली-भाँति विचार करके, उन दोनों दानवों ने सामने खड़े ब्रह्मा से प्रणाम करके कहा —

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.21.25)

पुरुषैरमराद्यैश्च मानवैर्मृगपक्षिभिः । अवध्यत्वं कृपासिन्धो देहि नौ वाञ्छितं वरम्

puruṣairamarādyaiśca mānavairmṛgapakṣibhiḥ | avadhyatvaṁ kṛpāsindho dehi nau vāñchitaṁ varam

"हे दया-सागर! पुरुषों, देवताओं आदि, मनुष्यों, पशुओं और पक्षियों द्वारा हमें अवध्यता का वरदान दें, जो हम चाहते हैं।"

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.21.26)

नारी बलवती कास्ति या नौ नाशं करिष्यति । न बिभीवः स्त्रियः कामं त्रैलोक्ये सचराचरे

nārī balavatī kāsti yā nau nāśaṁ kariṣyati | na bibhīvaḥ striyaḥ kāmaṁ trailokye sacarācare

"ऐसी कौन-सी बलशाली स्त्री है जो हमारा नाश कर सके? हमें इस चराचर त्रैलोक्य में स्त्रियों से कोई भय नहीं है।"

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.21.27)

अवध्यौ भ्रातरौ स्यातां नरेभ्यः पङ्कजोद्भव । भयं न स्त्रीजनेभ्यश्च स्वभावादबला हि सा

avadhyau bhrātarau syātāṁ narebhyaḥ paṅkajodbhava | bhayaṁ na strījanebhyaśca svabhāvādabalā hi sā

"हे कमल-जन्मे! हम दोनों भाई मनुष्यों द्वारा अवध्य हों; स्त्रियों से हमें भय नहीं है, क्योंकि वे स्वभाव से ही अबला हैं।"

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.21.28)

व्यास उवाच । इति श्रुत्वा तयोर्वाक्यं प्रददौ वाञ्छितं वरम् । ब्रह्मा प्रसन्नमनसा जगामाथ स्वमालयम्

vyāsa uvāca | iti śrutvā tayorvākyaṁ pradadau vāñchitaṁ varam | brahmā prasannamanasā jagāmātha svamālayam

व्यास जी ने कहा — उनके ये वचन सुनकर, प्रसन्न मन से ब्रह्मा ने उन्हें इच्छित वरदान दिया, और फिर अपने लोक को चले गए।

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.21.29)

गतेऽथ भवने तस्मिन्दानवौ स्वगृहं गतौ । भृगुं पुरोहितं कृत्वा चक्रतुः पूजनं तदा

gate'tha bhavane tasmindānavau svagṛhaṁ gatau | bhṛguṁ purohitaṁ kṛtvā cakratuḥ pūjanaṁ tadā

उनके अपने भवन को चले जाने पर, वे दोनों दानव अपने घर गए, और भृगु को पुरोहित बनाकर तब पूजन किया।

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.21.30)

शुभे दिने सुनक्षत्रे जातरूपमयं शुभम् । कृत्वा सिंहासनं दिव्यं राज्यार्थं प्रददौ मुनिः

śubhe dine sunakṣatre jātarūpamayaṁ śubham | kṛtvā siṁhāsanaṁ divyaṁ rājyārthaṁ pradadau muniḥ

शुभ दिन, शुभ नक्षत्र में, शुद्ध स्वर्ण का दिव्य सिंहासन बनवाकर, उस मुनि ने राज्याभिषेक के लिए वह सिंहासन प्रदान किया।

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.21.31)

शुम्भाय ज्येष्ठभूताय ददौ राज्यासनं शुभम् । सेवनार्थं तदैवाशु सम्प्राप्ता दानवोत्तमाः

śumbhāya jyeṣṭhabhūtāya dadau rājyāsanaṁ śubham | sevanārthaṁ tadaivāśu samprāptā dānavottamāḥ

बड़े भाई शुंभ को उस शुभ राज-सिंहासन पर बिठाया गया; और तभी शीघ्र ही सेवा के लिए श्रेष्ठ दानव वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.21.32)

चण्डमुण्डौ महावीरौ भ्रातरौ बलदर्पितौ । सम्प्राप्तौ सैन्यसंयुक्तौ रथवाजिगजान्वितौ

caṇḍamuṇḍau mahāvīrau bhrātarau baladarpitau | samprāptau sainyasaṁyuktau rathavājigajānvitau

महावीर चंड और मुंड नामक दोनों भाई, अपने बल से गर्वित, रथ, अश्व और गजों से युक्त सेना के साथ वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.21.33)

धूम्रलोचननामा च तद्रूपश्चण्डविक्रमः । शुम्भञ्च भूपतिं श्रुत्वा तदागाद्बलसंयुतः

dhūmralocananāmā ca tadrūpaścaṇḍavikramaḥ | śumbhañca bhūpatiṁ śrutvā tadāgādbalasaṁyutaḥ

वैसे ही प्रचंड पराक्रम वाला धूम्रलोचन नामक दानव भी, शुंभ को राजा बना सुनकर, अपनी सेना सहित वहाँ आया।

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.21.34)

रक्तबीजस्तथा शूरो वरदानबलाधिकः । अक्षौहिणीभ्यां संयुक्तस्तत्रैवागत्य सङ्गतः

raktabījastathā śūro varadānabalādhikaḥ | akṣauhiṇībhyāṁ saṁyuktastatraivāgatya saṅgataḥ

वीर रक्तबीज भी, जो वरदान के बल से और भी अधिक शक्तिशाली था, दो अक्षौहिणी सेना सहित वहीं आकर मिल गया।

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.21.35)

तस्यैकं कारणं राजन् सङ्ग्रामे युध्यतः सदा । देहाद्रुधिरसम्पातस्तस्य शस्त्राहतस्य च

tasyaikaṁ kāraṇaṁ rājan saṅgrāme yudhyataḥ sadā | dehādrudhirasampātastasya śastrāhatasya ca

हे राजन्! उस रक्तबीज में एक विशेष शक्ति थी — युद्ध में लड़ते हुए, जब शस्त्र-प्रहार से उसके शरीर से रक्त की एक भी बूँद गिरती —

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.21.36)

जायते च यदा भूमावुत्पद्यन्ते ह्यनेकशः । तादृशाः पुरुषाः क्रूरा बहवः शस्त्रपाणयः

jāyate ca yadā bhūmāvutpadyante hyanekaśaḥ | tādṛśāḥ puruṣāḥ krūrā bahavaḥ śastrapāṇayaḥ

— तो भूमि पर गिरते ही उससे अनेक क्रूर, शस्त्रधारी पुरुष उत्पन्न हो जाते थे।

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.21.37)

सम्भवन्ति तदाकारास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः । युद्धं पुनस्ते कुर्वन्ति पुरुषा रक्तसम्भवाः

sambhavanti tadākārāstadrūpāstatparākramāḥ | yuddhaṁ punaste kurvanti puruṣā raktasambhavāḥ

वे उसी के आकार, उसी रूप और उसी पराक्रम वाले उत्पन्न होते थे; और वे रक्त से उत्पन्न पुरुष पुनः युद्ध करने लगते थे।

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.21.38)

अतः सोऽपि महावीर्यः सङ्ग्रामेऽतीव दुर्जयः । अवध्यः सर्वभूतानां रक्तबीजो महासुरः

ataḥ so'pi mahāvīryaḥ saṅgrāme'tīva durjayaḥ | avadhyaḥ sarvabhūtānāṁ raktabījo mahāsuraḥ

इसीलिए वह महाबली महासुर रक्तबीज युद्ध में अत्यंत दुर्जेय और समस्त प्राणियों द्वारा अवध्य था।

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.21.39)

अन्ये च बहवः शूराश्चतुरङ्गसमन्विताः । शुम्भञ्च नृपतिं मत्वा बभूवुस्तस्य सेवकाः

anye ca bahavaḥ śūrāścaturaṅgasamanvitāḥ | śumbhañca nṛpatiṁ matvā babhūvustasya sevakāḥ

अनेक अन्य वीर भी, चतुरंगिणी सेना सहित, शुंभ को राजा मानकर उसके सेवक बन गए।

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.21.40)

असङ्ख्याता तदा जाता सेना शुम्भनिशुम्भयोः । पृथिव्याः सकलं राज्यं गृहीतं बलवत्तया

asaṅkhyātā tadā jātā senā śumbhaniśumbhayoḥ | pṛthivyāḥ sakalaṁ rājyaṁ gṛhītaṁ balavattayā

इस प्रकार शुंभ-निशुंभ की असंख्य सेना बन गई; और बल से पृथ्वी का समस्त राज्य उन्होंने अपने अधीन कर लिया।

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.21.41)

सेनायोगं तदा कृत्वा निशुम्भः परवीरहा । जगाम तरसा स्वर्गे शचीपतिजयाय च

senāyogaṁ tadā kṛtvā niśumbhaḥ paravīrahā | jagāma tarasā svarge śacīpatijayāya ca

तब सेना एकत्र करके, शत्रुवीरों का नाशक निशुंभ, इंद्र को जीतने के लिए शीघ्रता से स्वर्ग की ओर चला।

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.21.42)

चकारासौ महायुद्धं लोकपालैः समन्ततः । वृत्रहा वज्रपातेन ताडयामास वक्षसि

cakārāsau mahāyuddhaṁ lokapālaiḥ samantataḥ | vṛtrahā vajrapātena tāḍayāmāsa vakṣasi

उसने चारों ओर से लोकपालों के साथ महायुद्ध किया; वृत्रासुर-हंता इंद्र ने अपने वज्र से उसकी छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.21.43)

स वज्राभिहतो भूमौ पपात दानवानुजः । भग्नं बलं तदा तस्य निशुम्भस्य महात्मनः

sa vajrābhihato bhūmau papāta dānavānujaḥ | bhagnaṁ balaṁ tadā tasya niśumbhasya mahātmanaḥ

वज्र के आघात से आहत होकर वह दानव-कनिष्ठ भूमि पर गिर पड़ा; तब उस महात्मा निशुंभ की सेना भंग हो गई।

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.21.44)

भ्रातरं मूर्च्छितं श्रुत्वा शुम्भः परबलार्दनः । तत्रागत्य सुरान्मर्वांस्ताडयामास सायकैः

bhrātaraṁ mūrcchitaṁ śrutvā śumbhaḥ parabalārdanaḥ | tatrāgatya surānmarvāṁstāḍayāmāsa sāyakaiḥ

अपने भाई को मूर्च्छित सुनकर, शत्रु-सेना का विनाशक शुंभ वहाँ आया और अपने बाणों से देवताओं पर प्रहार करने लगा।

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.21.45)

कृतं युद्धं महत्तेन शुम्भेनाक्लिष्टकर्मणा । निर्जितास्तु सुराः सर्वे सेन्द्राः पालाश्च सर्वशः

kṛtaṁ yuddhaṁ mahattena śumbhenākliṣṭakarmaṇā | nirjitāstu surāḥ sarve sendrāḥ pālāśca sarvaśaḥ

उस महान, अथक-कर्मा शुंभ ने भीषण युद्ध किया; और इंद्र सहित समस्त लोकपाल पूर्णतः पराजित हो गए।

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.21.46)

ऐन्द्रं पदं तदा तेन गृहीतं बलवत्तया । कल्पपादपसंयुक्तं कामधेनुसमन्वितम्

aindraṁ padaṁ tadā tena gṛhītaṁ balavattayā | kalpapādapasaṁyuktaṁ kāmadhenusamanvitam

इंद्र का वह पद, कल्पवृक्ष और कामधेनु सहित, उसने बलपूर्वक अपने अधीन कर लिया।

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.21.47)

त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृतास्तेन महात्मना । नन्दनं च वनं प्राप्य मुदितोऽभून्महासुरः

trailokyaṁ yajñabhāgāśca hṛtāstena mahātmanā | nandanaṁ ca vanaṁ prāpya mudito'bhūnmahāsuraḥ

उस महात्मा ने त्रैलोक्य और यज्ञ-भाग भी छीन लिए; और नंदन-वन प्राप्त करके वह महासुर अत्यंत हर्षित हो उठा।

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.21.48)

सुधायाश्चैव पानेन सुखमाप महासुरः । कुबेरं स च निर्जित्य तस्य राज्यं चकार ह

sudhāyāścaiva pānena sukhamāpa mahāsuraḥ | kuberaṁ sa ca nirjitya tasya rājyaṁ cakāra ha

अमृत का पान करके भी उस महासुर को सुख प्राप्त हुआ; और कुबेर को जीतकर उसने उसका राज्य भी अपना बना लिया।

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.21.49)

अधिकारं तथा भानोः शशिनश्च चकार ह । यमञ्चैव विनिर्जित्य जग्राह तत्पदं तथा

adhikāraṁ tathā bhānoḥ śaśinaśca cakāra ha | yamañcaiva vinirjitya jagrāha tatpadaṁ tathā

उसने सूर्य और चंद्रमा के अधिकार भी छीन लिए; और यम को भी जीतकर उसका पद भी हस्तगत कर लिया।

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.21.50)

वरुणस्य तथा राज्यं चकार वह्निकर्म च । वायोः कार्यं निशुम्भश्च चकार स्वबलान्वितः

varuṇasya tathā rājyaṁ cakāra vahnikarma ca | vāyoḥ kāryaṁ niśumbhaśca cakāra svabalānvitaḥ

उसने वरुण का राज्य और अग्नि का कार्य भी अपने हाथ में ले लिया; और निशुंभ ने अपने बल से वायु का कार्य भी अपना लिया।

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.21.51)

ततो देवा विनिर्धूता हृतराज्या हृतश्रियः । सन्त्यज्य नन्दनं सर्वे निर्ययुर्गिरिगह्वरे

tato devā vinirdhūtā hṛtarājyā hṛtaśriyaḥ | santyajya nandanaṁ sarve niryayurgirigahvare

तब देवगण, अपने राज्य और अपनी शोभा से वंचित होकर, नंदन-वन को त्यागकर सभी पर्वत-गुफाओं में चले गए।

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.21.52)

हृताधिकारास्ते सर्वे बभ्रमुर्विजने वने । निरालम्बा निराधारा निस्तेजस्का निरायुधाः

hṛtādhikārāste sarve babhramurvijane vane | nirālambā nirādhārā nistejaskā nirāyudhāḥ

अपने अधिकार से वंचित हुए वे सब निर्जन वन में भटकते रहे — बिना किसी सहारे के, बिना आधार के, तेज-रहित और अस्त्र-रहित।

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.21.53)

विचेरुरमराः सर्वे पर्वतानां गुहासु च । उद्यानेषु च शून्येषु नदीनां गह्वरेषु च

viceruramarāḥ sarve parvatānāṁ guhāsu ca | udyāneṣu ca śūnyeṣu nadīnāṁ gahvareṣu ca

समस्त देवगण पर्वतों की गुफाओं में, सूने उद्यानों में और नदियों की कंदराओं में भटकते रहे।

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.21.54)

न प्रापुस्ते सुखं वापि स्थानभ्रष्टा विचेतसः । लोकपाला महाराज दैवाधीनं सुखं किल

na prāpuste sukhaṁ vāpi sthānabhraṣṭā vicetasaḥ | lokapālā mahārāja daivādhīnaṁ sukhaṁ kila

हे महाराज! अपने स्थान से भ्रष्ट, चिंताग्रस्त वे लोकपाल कहीं भी सुख नहीं पा सके; निश्चय ही सुख भाग्य के अधीन होता है।

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.21.55)

बलवन्तो महाभागा बहुज्ञा धनसंयुताः । काले दुःखं तथा दैन्यमाप्नुवन्ति नराधिप

balavanto mahābhāgā bahujñā dhanasaṁyutāḥ | kāle duḥkhaṁ tathā dainyamāpnuvanti narādhipa

हे नरेश! बलवान, महाभाग्यशाली, बहुज्ञ और धनवान लोग भी समय आने पर दुख और दीनता को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 56 (devibhagavatam.5.21.56)

चित्रमेतन्महाराज कालस्यैव विचेष्टितम् । यः करोति नरं तावद्राजानं भिक्षुकं ततः

citrametanmahārāja kālasyaiva viceṣṭitam | yaḥ karoti naraṁ tāvadrājānaṁ bhikṣukaṁ tataḥ

हे महाराज! यह काल की ही लीला अद्भुत है, जो राजा को भी अंततः भिखारी बना देती है,

श्लोक 57 (devibhagavatam.5.21.57)

दातारं याचकं चैव बलवन्तं तथाबलम् । पण्डितं विकलं कामं शूरं चातीव कातरम्

dātāraṁ yācakaṁ caiva balavantaṁ tathābalam | paṇḍitaṁ vikalaṁ kāmaṁ śūraṁ cātīva kātaram

दाता को याचक, बलवान को निर्बल, विद्वान को असहाय और अत्यंत शूरवीर को भी अत्यंत कायर बना देती है।

श्लोक 58 (devibhagavatam.5.21.58)

मखानाञ्च शतं कृत्वा प्राप्येन्द्रासनमुत्तमम् । पुनर्दुःखं परं प्राप्तं कालस्य गतिरीदृशी

makhānāñca śataṁ kṛtvā prāpyendrāsanamuttamam | punarduḥkhaṁ paraṁ prāptaṁ kālasya gatirīdṛśī

सौ यज्ञ करके इंद्र के उत्तम सिंहासन को प्राप्त करके भी, पुनः परम दुख प्राप्त हो सकता है — काल की गति ऐसी ही है।

श्लोक 59 (devibhagavatam.5.21.59)

कालः करोति धर्मिष्ठं पुरुषं ज्ञानसंयुतम् । तमेवातीव पापिष्ठं ज्ञानलेशविवर्जितम्

kālaḥ karoti dharmiṣṭhaṁ puruṣaṁ jñānasaṁyutam | tamevātīva pāpiṣṭhaṁ jñānaleśavivarjitam

काल ही धर्मात्मा, ज्ञानयुक्त पुरुष को भी उसी अत्यंत पापी, ज्ञान-लेशरहित पुरुष में बदल देता है।

श्लोक 60 (devibhagavatam.5.21.60)

न विस्मयोऽत्र कर्तव्यः सर्वथा कालचेष्टिते । ब्रह्मविष्णुहरादीनामपीदृक्कष्टचेष्टितम्

na vismayo'tra kartavyaḥ sarvathā kālaceṣṭite | brahmaviṣṇuharādīnāmapīdṛkkaṣṭaceṣṭitam

इसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि काल की लीला सर्वथा ऐसी ही है; ब्रह्मा, विष्णु, हर आदि को भी ऐसी ही कठिन दशाओं से गुजरना पड़ता है।

श्लोक 61 (devibhagavatam.5.21.61)

विष्णुर्जननमाप्नोति सूकरादिषु योनिषु । हरः कपाली सञ्जातः कालेनैव बलीयसा

viṣṇurjananamāpnoti sūkarādiṣu yoniṣu | haraḥ kapālī sañjātaḥ kālenaiva balīyasā

विष्णु को वराह आदि योनियों में जन्म लेना पड़ता है; हर को कपाल-धारी भिखारी बनना पड़ा — यह सब उसी अत्यंत बलवान काल के कारण ही है।

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