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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 22

देवताओं द्वारा देवी की आराधना

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.22.1)

व्यास उवाच । पराजिताः सुराः सर्वे राज्यं शुम्भः शशास ह । एवं वर्षसहस्रं तु जगाम नृपसत्तम

vyāsa uvāca | parājitāḥ surāḥ sarve rājyaṁ śumbhaḥ śaśāsa ha | evaṁ varṣasahasraṁ tu jagāma nṛpasattama

व्यास जी ने कहा — "समस्त देवता पराजित हो गए, और शुंभ ने राज्य किया। हे राजाओं में श्रेष्ठ! इस प्रकार एक हजार वर्ष बीत गए।"

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.22.2)

भ्रष्टराज्यास्ततो देवाश्चिन्तामापुः सुदुस्तराम् । गुरुं दुःखातुरास्ते तु पप्रच्छुरिदमादृताः

bhraṣṭarājyāstato devāścintāmāpuḥ sudustarām | guruṁ duḥkhāturāste tu papracchuridamādṛtāḥ

तब राज्य से भ्रष्ट देवता अत्यंत दुस्तर चिंता में पड़ गए; दुख से पीड़ित होकर उन्होंने आदरपूर्वक अपने गुरु से यह पूछा —

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.22.3)

किं कर्तव्यं गुरो ब्रूहि सर्वज्ञस्त्वं महामुनिः । उपायोऽस्ति महाभाग दुःखस्य विनिवृत्तये

kiṁ kartavyaṁ guro brūhi sarvajñastvaṁ mahāmuniḥ | upāyo'sti mahābhāga duḥkhasya vinivṛttaye

"हे गुरो! बताइए, क्या करना चाहिए? आप सर्वज्ञ महामुनि हैं। हे महाभाग! क्या इस दुख की निवृत्ति का कोई उपाय है?"

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.22.4)

उपचारपरा नूनं वेदमन्त्राः सहस्रशः । वाच्छितार्थकरा नूनं सूत्रैः संलक्षिताः किल

upacāraparā nūnaṁ vedamantrāḥ sahasraśaḥ | vācchitārthakarā nūnaṁ sūtraiḥ saṁlakṣitāḥ kila

"निश्चय ही हजारों वेद-मंत्र विशेष अनुष्ठानों के लिए हैं; वे सूत्रों में निर्दिष्ट, निश्चय ही इच्छित फल देने वाले हैं।"

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.22.5)

इष्टयो विविधाः प्रोक्ताः सर्वकामफलप्रदाः । ताः कुरुष्व मुने नूनं त्वं जानासि च तत्क्रियाः

iṣṭayo vividhāḥ proktāḥ sarvakāmaphalapradāḥ | tāḥ kuruṣva mune nūnaṁ tvaṁ jānāsi ca tatkriyāḥ

"अनेक प्रकार की इष्टियाँ (यज्ञ) बताई गई हैं, जो समस्त कामनाओं का फल देने वाली हैं। हे मुनि! आप निश्चय ही उन्हें कीजिए, आप उनकी विधियाँ जानते हैं।"

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.22.6)

विधिः शत्रुविनाशाय यथोद्दिष्टः सदागमे । तं कुरुष्वाद्य विधिवद्यथा नो दुःखसङ्क्षयः

vidhiḥ śatruvināśāya yathoddiṣṭaḥ sadāgame | taṁ kuruṣvādya vidhivadyathā no duḥkhasaṅkṣayaḥ

"शत्रु के विनाश के लिए शास्त्रों में जो विधि बताई गई है, उसे आज विधिपूर्वक कीजिए, जिससे हमारा दुख नष्ट हो जाए।"

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.22.7)

भवेदाङ्गिरसाद्यैव तथा त्वं कर्तुमर्हसि । दानवानां विनाशाय अभिचारं यथामति

bhavedāṅgirasādyaiva tathā tvaṁ kartumarhasi | dānavānāṁ vināśāya abhicāraṁ yathāmati

"हे अंगिरा-पुत्र! ऐसा ही हो — आप समर्थ हैं। दानवों के विनाश के लिए अपनी बुद्धि के अनुसार अभिचार-कर्म कीजिए।"

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.22.8)

बृहस्पतिरुवाच । सर्वे मन्त्राश्च वेदोक्ता दैवाधीनफलाश्च ते । न स्वतन्त्राः सुराधीश तथैकान्तफलप्रदाः

bṛhaspatiruvāca | sarve mantrāśca vedoktā daivādhīnaphalāśca te | na svatantrāḥ surādhīśa tathaikāntaphalapradāḥ

बृहस्पति ने कहा — "वेदोक्त समस्त मंत्रों का फल दैव के अधीन है; हे देवेश्वर! वे स्वतंत्र नहीं हैं, न ही सदा निश्चित फल देने वाले हैं।"

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.22.9)

मन्त्राणां देवता यूयं ते तु दुःखैकभाजनम् । जाताः स्म कालयोगेन किं करोमि प्रसाधनम्

mantrāṇāṁ devatā yūyaṁ te tu duḥkhaikabhājanam | jātāḥ sma kālayogena kiṁ karomi prasādhanam

"तुम स्वयं ही उन मंत्रों के देवता हो, फिर भी काल-योग से केवल दुख के ही पात्र बने हो — मैं क्या सिद्ध कर सकता हूँ?"

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.22.10)

इन्द्राग्निवरुणादीनां यजनं यज्ञकर्मसु । ते यूयं विपदं प्राप्ताः करिष्यन्ति किमिष्टयः

indrāgnivaruṇādīnāṁ yajanaṁ yajñakarmasu | te yūyaṁ vipadaṁ prāptāḥ kariṣyanti kimiṣṭayaḥ

"इंद्र, अग्नि, वरुण आदि की पूजा यज्ञ-कर्मों में होती है — तुम स्वयं वे ही देवता हो और विपत्ति को प्राप्त हुए हो; तो इष्टियाँ क्या कर सकेंगी?"

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.22.11)

अवश्यम्भाविभावानां प्रतीकारो न विद्यते । उपायस्त्वथ कर्तव्य इति शिष्टानुशासनम्

avaśyambhāvibhāvānāṁ pratīkāro na vidyate | upāyastvatha kartavya iti śiṣṭānuśāsanam

"जो अवश्यंभावी घटनाएँ हैं, उनका कोई प्रतिकार नहीं होता; फिर भी उपाय करना चाहिए — यही शास्त्रज्ञों का उपदेश है।"

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.22.12)

दैवं हि बलवत्केचित्प्रवदन्ति मनीषिणः । उपायवादिनो दैवं प्रवदन्ति निरर्थकम्

daivaṁ hi balavatkecitpravadanti manīṣiṇaḥ | upāyavādino daivaṁ pravadanti nirarthakam

"कुछ बुद्धिमान कहते हैं कि दैव ही बलवान है; कुछ उपाय-वादी दैव को व्यर्थ बताते हैं।"

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.22.13)

दैवं चैवाप्युपायश्च द्वावेवाभिमतौ नृणाम् । केवलं दैवमाश्रित्य न स्थातव्यं कदाचन

daivaṁ caivāpyupāyaśca dvāvevābhimatau nṛṇām | kevalaṁ daivamāśritya na sthātavyaṁ kadācana

"दैव और उपाय दोनों ही मनुष्यों को स्वीकार्य हैं; केवल दैव पर आश्रित होकर कभी नहीं बैठे रहना चाहिए।"

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.22.14)

उपायः सर्वथा कार्यो विचार्य स्वधिया पुनः । तस्माद् ब्रवीमि वः सर्वान्संविचार्य पुनः पुनः

upāyaḥ sarvathā kāryo vicārya svadhiyā punaḥ | tasmād bravīmi vaḥ sarvānsaṁvicārya punaḥ punaḥ

"अपनी बुद्धि से पुनः भली-भाँति विचार करके सर्वथा उपाय करना चाहिए। इसलिए बार-बार विचार करके मैं तुम सबसे यह कहता हूँ —"

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.22.15)

पुरा भगवती तुष्टा जघान महिषासुरम् । युष्माभिस्तु स्तुता देवी वरदानं ददावथ

purā bhagavatī tuṣṭā jaghāna mahiṣāsuram | yuṣmābhistu stutā devī varadānaṁ dadāvatha

"पूर्वकाल में प्रसन्न होकर भगवती ने महिषासुर को मार डाला था; तुम्हारे द्वारा स्तुति किए जाने पर देवी ने तब यह वरदान दिया था —"

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.22.16)

आपदं नाशयिष्यामि संस्मृता वा सदैव हि । यदा यदा वो देवेशा आपदो दैवसम्भवाः

āpadaṁ nāśayiṣyāmi saṁsmṛtā vā sadaiva hi | yadā yadā vo deveśā āpado daivasambhavāḥ

"'स्मरण किए जाने पर मैं सदा ही विपत्ति का नाश करूँगी। हे देवेशों! जब-जब तुम्हें दैव से उत्पन्न विपत्तियाँ —'"

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.22.17)

प्रभवन्ति तदा कामं स्मर्तव्याहं सुरैः सदा । स्मृताहं नाशयिष्यामि युष्माकं परमापदः

prabhavanti tadā kāmaṁ smartavyāhaṁ suraiḥ sadā | smṛtāhaṁ nāśayiṣyāmi yuṣmākaṁ paramāpadaḥ

"'— प्राप्त हों, तब-तब देवताओं द्वारा मुझे सदा स्मरण करना चाहिए। स्मरण किए जाने पर मैं तुम्हारी परम विपत्तियों का नाश करूँगी।'"

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.22.18)

तस्माद्धिमाचले गत्वा पर्वते सुमनोहरे । आराधनं चण्डिकायाः कुरुध्वं प्रेमपूर्वकम्

tasmāddhimācale gatvā parvate sumanohare | ārādhanaṁ caṇḍikāyāḥ kurudhvaṁ premapūrvakam

"इसलिए हिमाचल के परम मनोहर पर्वत पर जाकर प्रेमपूर्वक चण्डिका की आराधना करो।"

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.22.19)

मायाबीजविधानज्ञास्तत्पुरश्चरणे रताः । जानाम्यहं योगबलात्प्रसन्ना सा भविष्यति

māyābījavidhānajñāstatpuraścaraṇe ratāḥ | jānāmyahaṁ yogabalātprasannā sā bhaviṣyati

"माया-बीज की विधि जानने वाले, उसके पुरश्चरण में लगे हुए — मैं योग-बल से जानता हूँ कि वे प्रसन्न हो जाएँगी।"

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.22.20)

दुःखस्यान्तोऽद्य युष्माकं दृश्यते नात्र संशयः । तस्मिञ्छैले सदा देवी तिष्ठतीति मया श्रुतम्

duḥkhasyānto'dya yuṣmākaṁ dṛśyate nātra saṁśayaḥ | tasmiñchaile sadā devī tiṣṭhatīti mayā śrutam

"आज तुम्हारे दुख का अंत निकट दिखाई देता है, इसमें संदेह नहीं। मैंने सुना है कि देवी सदा उस पर्वत पर निवास करती हैं।"

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.22.21)

स्तुता सम्पूजिता सद्यो वाञ्छितार्थान् प्रदास्यति । निश्चयं परमं कृत्वा गच्छध्वं वै हिमालयम्

stutā sampūjitā sadyo vāñchitārthān pradāsyati | niścayaṁ paramaṁ kṛtvā gacchadhvaṁ vai himālayam

"स्तुति और पूजा किए जाने पर वे तुरंत तुम्हारे इच्छित अर्थ प्रदान करेंगी। परम निश्चय करके हिमालय की ओर चलो।"

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.22.22)

सुराः सर्वाणि कार्याणि सा वः कामं विधास्यति । व्यास उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा देवास्ते प्रययुर्गिरिम्

surāḥ sarvāṇi kāryāṇi sā vaḥ kāmaṁ vidhāsyati | vyāsa uvāca | iti tasya vacaḥ śrutvā devāste prayayurgirim

"हे देवताओ! वह तुम्हारे समस्त कार्य इच्छानुसार सिद्ध कर देंगी।" व्यास जी ने कहा — उनके ये वचन सुनकर देवगण पर्वत की ओर चल पड़े।

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.22.23)

हिमालयं महाराज देवीध्यानपरायणाः । मायाबीजं हृदा नित्यं जपन्तः सर्व एव हि

himālayaṁ mahārāja devīdhyānaparāyaṇāḥ | māyābījaṁ hṛdā nityaṁ japantaḥ sarva eva hi

हे महाराज! देवी के ध्यान में तत्पर होकर, हिमालय की ओर जाते हुए, सभी अपने हृदय में सदा माया-बीज का जप करते हुए —

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.22.24)

नमश्चक्रुर्महामायां भक्तानामभयप्रदाम् । तुष्टुवुः स्तोत्रमन्त्रैश्च भक्त्या परमया युताः

namaścakrurmahāmāyāṁ bhaktānāmabhayapradām | tuṣṭuvuḥ stotramantraiśca bhaktyā paramayā yutāḥ

— भक्तों को अभय देने वाली महामाया को नमस्कार करते हुए, परम भक्ति से युक्त होकर स्तोत्र-मंत्रों से उनकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.22.25)

नमो देवि विश्वेश्वरि प्राणनाथे सदानन्दरूपे सुरानन्ददे ते । नमो दानवान्तप्रदे मानवाना मनेकार्थदे भक्तिगम्यस्वरूपे

namo devi viśveśvari prāṇanāthe sadānandarūpe surānandade te | namo dānavāntaprade mānavānā manekārthade bhaktigamyasvarūpe

"हे देवी! हे विश्वेश्वरी! हे प्राणनाथे! सदा आनंद-स्वरूपा, देवताओं को आनंद देने वाली, तुम्हें नमस्कार। हे दानवों का अंत करने वाली, मनुष्यों को अनेक अर्थ देने वाली, भक्ति से ही प्राप्य स्वरूपा, तुम्हें नमस्कार।"

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.22.26)

न ते नामसङ्ख्यां न ते रूपमीदृ क्तथा कोऽपि वेदादिदेवस्वरूपे । त्वमेवासि सर्वेषु शक्तिस्वरूपा प्रजासृष्टिसंहारकाले सदैव

na te nāmasaṅkhyāṁ na te rūpamīdṛ ktathā ko'pi vedādidevasvarūpe | tvamevāsi sarveṣu śaktisvarūpā prajāsṛṣṭisaṁhārakāle sadaiva

"तुम्हारे नामों की संख्या नहीं, न ही तुम्हारा वैसा कोई रूप है; हे वेद और आदि देवताओं के स्वरूप! तुम्हीं समस्त प्राणियों के सृष्टि और संहार के समय शक्ति-स्वरूपा हो।"

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.22.27)

स्मृतिस्त्वं धृतिस्त्वं त्वमेवासि बुद्धि र्जरा पुष्टितुष्टी धृतिः कान्तिशान्ती । सुविद्या सुलक्ष्मीर्गतिः कीर्तिमेधे त्वमेवासि विश्वस्य बीजं पुराणम्

smṛtistvaṁ dhṛtistvaṁ tvamevāsi buddhi rjarā puṣṭituṣṭī dhṛtiḥ kāntiśāntī | suvidyā sulakṣmīrgatiḥ kīrtimedhe tvamevāsi viśvasya bījaṁ purāṇam

"तुम स्मृति हो, तुम धृति हो, तुम्हीं बुद्धि हो; तुम जरा, पुष्टि, तुष्टि, धृति, कांति और शांति हो; तुम सुविद्या, सुलक्ष्मी, गति, कीर्ति और मेधा हो; तुम्हीं इस विश्व का पुरातन बीज हो।"

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.22.28)

यदा यैः स्वरूपैः करोषीह कार्यं सुराणां च तेभ्यो नमामोऽद्य शान्त्यै । क्षमा योगनिद्रा दया त्वं विवक्षा स्थिता सर्वभूतेषु शस्तैः स्वरूपैः

yadā yaiḥ svarūpaiḥ karoṣīha kāryaṁ surāṇāṁ ca tebhyo namāmo'dya śāntyai | kṣamā yoganidrā dayā tvaṁ vivakṣā sthitā sarvabhūteṣu śastaiḥ svarūpaiḥ

"तुम जिन-जिन स्वरूपों से देवताओं का कार्य सिद्ध करती हो, आज उन्हीं स्वरूपों को हम शांति के लिए नमस्कार करते हैं। तुम क्षमा, योगनिद्रा, दया और वाणी की इच्छा हो; तुम अपने श्रेष्ठ स्वरूपों में समस्त प्राणियों में स्थित हो।"

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.22.29)

कृतं कार्यमादौ त्वया यत्सुराणां हतोऽसौ महारिर्मदान्धो हयारिः । दया ते सदा सर्वदेवेषु देवि प्रसिद्धा पुराणेषु वेदेषु गीता

kṛtaṁ kāryamādau tvayā yatsurāṇāṁ hato'sau mahārirmadāndho hayāriḥ | dayā te sadā sarvadeveṣu devi prasiddhā purāṇeṣu vedeṣu gītā

"तुमने आरंभ में देवताओं का यह कार्य किया कि अपने मद से अंधे उस महान शत्रु अश्वारि (महिष) को मार डाला। हे देवी! देवताओं के प्रति तुम्हारी दया सदा पुराणों और वेदों में गाई गई है, प्रसिद्ध है।"

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.22.30)

किमत्रास्ति चित्रं यदम्बा सुतं स्वं मुदा पालयेत्पोषयेत्सम्यगेव । यतस्त्वं जनित्री सुराणां सहाया कुरुष्वैकचित्तेन कार्यं समग्रम्

kimatrāsti citraṁ yadambā sutaṁ svaṁ mudā pālayetpoṣayetsamyageva | yatastvaṁ janitrī surāṇāṁ sahāyā kuruṣvaikacittena kāryaṁ samagram

"इसमें क्या आश्चर्य है कि माता अपने पुत्र का हर्षपूर्वक भली-भाँति पालन-पोषण करे? क्योंकि तुम्हीं देवताओं की जननी और सहायिका हो, इसलिए एकाग्रचित्त होकर यह समस्त कार्य पूर्ण करो।"

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.22.31)

न वा ते गुणानामियत्तां स्वरूपं वयं देवि जानीमहे विश्ववन्द्ये । कृपापात्रमित्येव मत्वा तथास्मा न्भयेभ्यः सदा पाहि पातुं समर्थे

na vā te guṇānāmiyattāṁ svarūpaṁ vayaṁ devi jānīmahe viśvavandye | kṛpāpātramityeva matvā tathāsmā nbhayebhyaḥ sadā pāhi pātuṁ samarthe

"हे विश्व-वंदिता देवी! हम तुम्हारे गुणों की परिमिति और तुम्हारा स्वरूप नहीं जानते; तुम्हारी दया के पात्र समझकर, हे रक्षा-समर्थ! सदा हमें भयों से बचाओ।"

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.22.32)

विना बाणपातैर्विना मुष्टिघातै र्विनाशूलखड्गैर्विना शक्तिदण्डैः । रिपून्हन्तुमेवासि शक्ता विनोदा त्तथापीह लोकोपकाराय लीला

vinā bāṇapātairvinā muṣṭighātai rvināśūlakhaḍgairvinā śaktidaṇḍaiḥ | ripūnhantumevāsi śaktā vinodā ttathāpīha lokopakārāya līlā

"बाणों के प्रहार के बिना, मुक्कों के बिना, त्रिशूल-तलवार के बिना, शक्ति-दंड के बिना — तुम अकेली ही शत्रुओं को मारने में समर्थ हो; फिर भी यह लोक-कल्याण के लिए तुम्हारी लीला ही है।"

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.22.33)

इदं शाश्वतं नैव जानन्ति मूढा न कार्यं विना कारणं सम्भवेद्वा । वयं तर्कयामोऽनुमानं प्रमाणं त्वमेवासि कर्तास्य विश्वस्य चेति

idaṁ śāśvataṁ naiva jānanti mūḍhā na kāryaṁ vinā kāraṇaṁ sambhavedvā | vayaṁ tarkayāmo'numānaṁ pramāṇaṁ tvamevāsi kartāsya viśvasya ceti

"यह शाश्वत सत्य मूर्ख नहीं जानते — कि बिना कारण के कोई कार्य संभव नहीं होता। हम अनुमान से तर्क करते हैं कि तुम्हीं इस विश्व की कर्ता हो।"

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.22.34)

अजः सृष्टिकर्ता मुकुन्दोऽवितायं हरो नाशकृद्वै पुराणे प्रसिद्धः । न किं त्वत्प्रसूतास्त्रयस्ते युगादौ त्वमेवासि सर्वस्य तेनैव माता

ajaḥ sṛṣṭikartā mukundo'vitāyaṁ haro nāśakṛdvai purāṇe prasiddhaḥ | na kiṁ tvatprasūtāstrayaste yugādau tvamevāsi sarvasya tenaiva mātā

"अज (ब्रह्मा) सृष्टि-कर्ता, मुकुंद (विष्णु) इस जगत के पालनकर्ता, और हर पुराणों में विनाश-कर्ता प्रसिद्ध हैं — क्या ये तीनों युगादि में तुमसे ही उत्पन्न नहीं हुए? इसलिए तुम्हीं सबकी माता हो।"

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.22.35)

त्रिभिस्त्वं पुराराधिता देवि दत्ता त्वया शक्तिरुग्रा च तेभ्यः समग्रा । त्वया संयुतास्ते प्रकुर्वन्ति कामं जगत्पालनोत्पत्तिसंहारमेव

tribhistvaṁ purārādhitā devi dattā tvayā śaktirugrā ca tebhyaḥ samagrā | tvayā saṁyutāste prakurvanti kāmaṁ jagatpālanotpattisaṁhārameva

"हे देवी! पूर्वकाल में इन तीनों ने तुम्हारी आराधना की, और तुमने ही उन्हें अपनी समस्त उग्र शक्ति प्रदान की। तुमसे युक्त होकर वे जगत के पालन, उत्पत्ति और संहार का कार्य इच्छानुसार करते हैं।"

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.22.36)

ते किं न मन्दमतयो यतयो विमूढा स्त्वां ये न विश्वजननीं समुपाश्रयन्ति । विद्यां परां सकलकामफलप्रदां तां मुक्तिप्रदां विबुधवृन्दसुवन्दिताङ्घ्रिम्

te kiṁ na mandamatayo yatayo vimūḍhā stvāṁ ye na viśvajananīṁ samupāśrayanti | vidyāṁ parāṁ sakalakāmaphalapradāṁ tāṁ muktipradāṁ vibudhavṛndasuvanditāṅghrim

"क्या वे मंदबुद्धि, मोहग्रस्त तपस्वी नहीं हैं, जो तुम विश्व-जननी की, समस्त कामनाओं का फल देने वाली, मोक्ष देने वाली, विद्वानों द्वारा वंदित चरणों वाली परा विद्या की, शरण नहीं लेते?"

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.22.37)

ये वैष्णवाः पाशपताश्च सौरा दम्भास्त एव प्रतिभान्ति नूनम् । ध्यायन्ति न त्वां कमलाञ्च लज्जां कान्तिं स्थितिं कीर्तिमथापि पुष्टिम्

ye vaiṣṇavāḥ pāśapatāśca saurā dambhāsta eva pratibhānti nūnam | dhyāyanti na tvāṁ kamalāñca lajjāṁ kāntiṁ sthitiṁ kīrtimathāpi puṣṭim

"जो वैष्णव, पाशुपत और सौर हैं, वे निश्चय ही केवल ढोंगी प्रतीत होते हैं, जो तुम्हारा, कमला का, लज्जा का, कांति, स्थिति, कीर्ति और पुष्टि का ध्यान नहीं करते।"

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.22.38)

हरिहरादिभिरप्यथ सेविता त्वमिह देववरैरसुरैस्तथा । भुवि भजन्ति न येऽल्पधियो नरा जननि ते विधिना खलु वञ्चिताः

hariharādibhirapyatha sevitā tvamiha devavarairasuraistathā | bhuvi bhajanti na ye'lpadhiyo narā janani te vidhinā khalu vañcitāḥ

"हरि-हर आदि देवश्रेष्ठों तथा असुरों द्वारा भी यहाँ तुम्हारी सेवा की जाती है; जो अल्पबुद्धि मनुष्य पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा नहीं करते, हे जननी! वे निश्चय ही भाग्य द्वारा ठगे गए हैं।"

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.22.39)

जलधिजापदपङ्कजरञ्जनं जतुरसेन करोति हरिः स्वयम् । त्रिनयनोऽपि धराधरजाङ्घ्रिपं कजपरागनिषेवणतत्परः

jaladhijāpadapaṅkajarañjanaṁ jaturasena karoti hariḥ svayam | trinayano'pi dharādharajāṅghripaṁ kajaparāganiṣevaṇatatparaḥ

"विष्णु स्वयं समुद्र-कन्या (लक्ष्मी) के चरण-कमलों को लाख के रस से रंगते हैं; त्रिनेत्र शिव भी पर्वत-कन्या (पार्वती) के चरण-कमलों की पराग-सेवा में सदा तत्पर रहते हैं।"

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.22.40)

किमपरस्य नरस्य कथानकै स्तव पदाब्जयुगं न भजन्ति के । विगतरागगृहाश्च दयां क्षमां कृतधियो मुनयोऽपि भजन्ति ते

kimaparasya narasya kathānakai stava padābjayugaṁ na bhajanti ke | vigatarāgagṛhāśca dayāṁ kṣamāṁ kṛtadhiyo munayo'pi bhajanti te

"अन्य किसी मनुष्य की बात ही क्या — तुम्हारे चरण-युगल की पूजा कौन नहीं करता? आसक्ति और गृहस्थी से रहित, विशुद्ध बुद्धि वाले मुनि भी तुम्हारी दया और क्षमा की उपासना करते हैं।"

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.22.41)

देवि त्वदङ्घ्रिभजने न जना रता ये संसारकूपपतिताः पतिताः किलामी । ते कुष्ठगुल्मशिराधियुता भवन्ति दारिद्र्यदैन्यसहिता रहिताः सुखौघैः

devi tvadaṅghribhajane na janā ratā ye saṁsārakūpapatitāḥ patitāḥ kilāmī | te kuṣṭhagulmaśirādhiyutā bhavanti dāridryadainyasahitā rahitāḥ sukhaughaiḥ

"हे देवी! जो लोग तुम्हारे चरणों की भक्ति में रत नहीं हैं, वे निश्चय ही संसार-कूप में गिरे हुए हैं; वे कुष्ठ, गुल्म-रोग और सिरदर्द से युक्त, दरिद्रता और दीनता से भरे, सुख के प्रवाह से रहित हो जाते हैं।"

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.22.42)

ये काष्ठभारवहने यवसावहारे कार्ये भवन्ति निपुणा धनदारहीनाः । जानीमहेऽल्पमतिभिर्भवदङ्घ्रिसेवा पूर्वे भवे जननि तैर्न कृता कदापि

ye kāṣṭhabhāravahane yavasāvahāre kārye bhavanti nipuṇā dhanadārahīnāḥ | jānīmahe'lpamatibhirbhavadaṅghrisevā pūrve bhave janani tairna kṛtā kadāpi

"जो लोग केवल लकड़ी का भार ढोने और चारा लाने के कार्य में निपुण होते हैं, धन और पत्नी से रहित — हम जानते हैं, हे जननी! ऐसे अल्पबुद्धि लोगों ने पूर्वजन्म में कभी तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की।"

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.22.43)

व्यास उवाच । एवं स्तुता सुरैः सर्वैरम्बिका करुणान्विता । प्रादुर्बभूव तरसा रूपयौवनसंयुता

vyāsa uvāca | evaṁ stutā suraiḥ sarvairambikā karuṇānvitā | prādurbabhūva tarasā rūpayauvanasaṁyutā

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार समस्त देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने पर, करुणा से भरी अंबिका शीघ्र ही रूप और यौवन से युक्त होकर प्रकट हुईं।

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.22.44)

दिव्याम्बरधरा देवी दिव्यभूषणभूषिता । दिव्यमाल्यसमायुक्ता दिव्यचन्दनचर्चिता

divyāmbaradharā devī divyabhūṣaṇabhūṣitā | divyamālyasamāyuktā divyacandanacarcitā

दिव्य वस्त्र धारण किए हुए वह देवी दिव्य आभूषणों से सुसज्जित, दिव्य माला से युक्त, दिव्य चंदन से लिप्त थीं।

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.22.45)

जगन्मोहनलावण्या सर्वलक्षणलक्षिता । अद्वितीयस्वरूपा सा देवानां दर्शनं गता

jaganmohanalāvaṇyā sarvalakṣaṇalakṣitā | advitīyasvarūpā sā devānāṁ darśanaṁ gatā

जगत को मोहित करने वाले लावण्य से युक्त, समस्त शुभ लक्षणों से चिह्नित, अद्वितीय स्वरूप वाली वह देवताओं के सम्मुख प्रकट हुईं।

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.22.46)

जाह्नव्यां स्नातुकामा सा निर्गता गिरिगह्वरात् । दिव्यरूपधरा देवी विश्वमोहनमोहिनी

jāhnavyāṁ snātukāmā sā nirgatā girigahvarāt | divyarūpadharā devī viśvamohanamohinī

गंगा में स्नान करने की इच्छा से वह पर्वत-गुफा से बाहर निकली थीं — वह दिव्य रूपधारी देवी, समस्त विश्व को मोहित करने वाली भी जिससे मोहित हो जाए।

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.22.47)

देवान्स्तुतिपरानाह मेघगम्भीरया गिरा । प्रेमपूर्वं स्मितं कृत्वा कोकिलामञ्जुवादिनी

devānstutiparānāha meghagambhīrayā girā | premapūrvaṁ smitaṁ kṛtvā kokilāmañjuvādinī

स्तुति में तत्पर देवताओं से मेघ के समान गंभीर वाणी में, प्रेमपूर्वक मुस्कुराते हुए, कोकिला के समान मधुर बोलती हुई, उन्होंने कहा —

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.22.48)

देव्युवाच । भो भोः सुरवराः कात्र भवद्भिः स्तूयते भृशम् । किमर्थं ब्रूत वः कार्यं चिन्ताविष्टाः कुतः पुनः

devyuvāca | bho bhoḥ suravarāḥ kātra bhavadbhiḥ stūyate bhṛśam | kimarthaṁ brūta vaḥ kāryaṁ cintāviṣṭāḥ kutaḥ punaḥ

देवी ने कहा — "हे श्रेष्ठ देवगण! यहाँ तुम किसकी इतनी स्तुति कर रहे हो? किस कारण से बताओ, तुम्हें कौन-सा कार्य है, फिर से किस चिंता में डूबे हो?"

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.22.49)

व्यास उवाच । तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या मोहिता रूपसम्पदा । प्रेमपूर्वं हृदुत्साहास्तामूचुः सुरसत्तमाः

vyāsa uvāca | tacchrutvā bhāṣitaṁ tasyā mohitā rūpasampadā | premapūrvaṁ hṛdutsāhāstāmūcuḥ surasattamāḥ

व्यास जी ने कहा — उनके यह वचन सुनकर, उनके रूप-सौंदर्य से मोहित होकर, श्रेष्ठ देवगण प्रेमपूर्वक हृदय के उत्साह से उनसे बोले —

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.22.50)

देवा ऊचुः । देवि स्तुमस्त्वां विश्वेशि प्रणताः स्म कृपार्णवे । पाहि नः सर्वदुःखेभ्यः संविग्नान्दैत्यतापितान्

devā ūcuḥ | devi stumastvāṁ viśveśi praṇatāḥ sma kṛpārṇave | pāhi naḥ sarvaduḥkhebhyaḥ saṁvignāndaityatāpitān

देवताओं ने कहा — "हे देवी! हे विश्वेश्वरी! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं, हे दया-सागर! तुम्हें प्रणाम करते हैं। दैत्यों से संतप्त, व्याकुल हुए हमें समस्त दुखों से बचाओ।"

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.22.51)

पुरा त्वया महादेवि निहत्यासुरकण्टकम् । महिषं नो वरो दत्तः स्मर्तव्याहं सदापदि

purā tvayā mahādevi nihatyāsurakaṇṭakam | mahiṣaṁ no varo dattaḥ smartavyāhaṁ sadāpadi

"हे महादेवी! पूर्वकाल में असुर-कंटक महिष को मारकर तुमने हमें यह वरदान दिया था कि विपत्ति में मुझे सदा स्मरण करना।"

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.22.52)

स्मरणाद्दैत्यजां पीडां नाशयिष्याम्यसंशयम् । तेन त्वं संस्मृता देवि नूनमस्माभिरित्यपि

smaraṇāddaityajāṁ pīḍāṁ nāśayiṣyāmyasaṁśayam | tena tvaṁ saṁsmṛtā devi nūnamasmābhirityapi

"'स्मरण करने मात्र से मैं दैत्य-जनित पीड़ा का निःसंदेह नाश कर दूँगी।' इसीलिए, हे देवी! हमने भी निश्चय ही तुम्हारा स्मरण किया है।"

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.22.53)

अद्य शुम्भनिशुम्भौ द्वावसुरौ घोरदर्शनौ । उत्पन्नौ विघ्नकर्तारावहन्यौ पुरुषैः किल

adya śumbhaniśumbhau dvāvasurau ghoradarśanau | utpannau vighnakartārāvahanyau puruṣaiḥ kila

"आज शुंभ और निशुंभ नामक दो घोर-दर्शन असुर उत्पन्न हुए हैं — विघ्न उत्पन्न करने वाले, और मनुष्यों द्वारा निश्चय ही अवध्य।"

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.22.54)

रक्तबीजश्च बलवांश्चण्डमुण्डौ तथासुरौ । एतैरन्यैश्च देवानां हृतं राज्यं महाबलैः

raktabījaśca balavāṁścaṇḍamuṇḍau tathāsurau | etairanyaiśca devānāṁ hṛtaṁ rājyaṁ mahābalaiḥ

"तथा बलवान रक्तबीज, और चंड-मुंड नामक दो असुर भी — इनके और इन जैसे अन्य महाबलियों द्वारा देवताओं का राज्य हरण कर लिया गया है।"

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.22.55)

गतिरन्या न चास्माकं त्वमेवासि महाबले । कुरु कार्यं सुराणां वै दुःखितानां सुमध्यमे

gatiranyā na cāsmākaṁ tvamevāsi mahābale | kuru kāryaṁ surāṇāṁ vai duḥkhitānāṁ sumadhyame

"हमारे लिए और कोई गति नहीं है; हे महाबले! तुम्हीं हमारा एकमात्र सहारा हो। हे सुमध्यमे! दुखी देवताओं का यह कार्य पूर्ण करो।"

श्लोक 56 (devibhagavatam.5.22.56)

देवास्त्वदङ्घ्रिभजने निरताः सदैव ते दानवैरतिबलैर्विपदं सुनीताः । तान्देवि दुःखरहितान् कुरु भक्तियुक्ता न्मातस्त्वमेव शरणं भव दुःखितानाम्

devāstvadaṅghribhajane niratāḥ sadaiva te dānavairatibalairvipadaṁ sunītāḥ | tāndevi duḥkharahitān kuru bhaktiyuktā nmātastvameva śaraṇaṁ bhava duḥkhitānām

"जो देवता सदा तुम्हारे चरणों की भक्ति में रत रहे हैं, वे अत्यंत बलशाली दानवों द्वारा विपत्ति में डाल दिए गए हैं। हे देवी! भक्तियुक्त उन्हें दुख-रहित करो; हे माता! दुखियों की शरण बनो।"

श्लोक 57 (devibhagavatam.5.22.57)

सकलभुवनरक्षा देवि कार्या त्वयाद्य स्वकृतमिति विदित्वा विश्वमेतद्युगादौ । जननि जगति पीडां दानवा दर्पयुक्ताः स्वबलमदसमेतास्ते प्रकुर्वन्ति मातः

sakalabhuvanarakṣā devi kāryā tvayādya svakṛtamiti viditvā viśvametadyugādau | janani jagati pīḍāṁ dānavā darpayuktāḥ svabalamadasametāste prakurvanti mātaḥ

"हे देवी! आज सम्पूर्ण भुवनों की रक्षा तुम्हें ही करनी है, यह जानते हुए कि युगादि में यह समस्त विश्व तुम्हारी ही रचना है। हे जननी! दर्प से युक्त वे दानव, अपने बल के मद से भरे हुए, जगत में पीड़ा उत्पन्न कर रहे हैं, हे माता!"

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