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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 24

देवी के पास दूत धूम्रलोचन का प्रेषण

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.24.1)

व्यास उवाच । देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स दूतः प्राह विस्मितः । किं ब्रूषे रुचिरापाङ्गि स्त्रीस्वभावाद्धि साहसात्

vyāsa uvāca | devyāstadvacanaṁ śrutvā sa dūtaḥ prāha vismitaḥ | kiṁ brūṣe rucirāpāṅgi strīsvabhāvāddhi sāhasāt

व्यास जी ने कहा — देवी के ये वचन सुनकर वह दूत आश्चर्यचकित होकर बोला — "हे सुंदर-नेत्री! तुम स्त्री-स्वभाव के दुस्साहस से यह क्या कह रही हो?"

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.24.2)

इन्द्राद्या निर्जिता येन देवा दैत्यास्तथापरे । तं कथं समरे देवि जेतुमिच्छसि भामिनि

indrādyā nirjitā yena devā daityāstathāpare | taṁ kathaṁ samare devi jetumicchasi bhāmini

"जिसने इंद्र आदि देवताओं और अन्य दैत्यों को भी जीत लिया है, हे भामिनी! उसे युद्ध में जीतने की इच्छा तुम कैसे करती हो?"

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.24.3)

त्रैलोक्ये तादृशो नास्ति यः शुम्भं समरे जयेत् । का त्वं कमलपत्राक्षि तस्याग्रे युधि साम्प्रतम्

trailokye tādṛśo nāsti yaḥ śumbhaṁ samare jayet | kā tvaṁ kamalapatrākṣi tasyāgre yudhi sāmpratam

"त्रैलोक्य में ऐसा कोई नहीं है जो युद्ध में शुंभ को जीत सके। हे कमल-पत्राक्षी! तुम कौन हो, जो अभी उसके सामने युद्ध में खड़ी होगी?"

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.24.4)

अविचार्य न वक्तव्यं वचनं चापि सुन्दरि । बलं स्वपरयोर्ज्ञात्वा वक्तव्यं समयोचितम्

avicārya na vaktavyaṁ vacanaṁ cāpi sundari | balaṁ svaparayorjñātvā vaktavyaṁ samayocitam

"हे सुंदरी! बिना विचारे कोई वचन नहीं कहना चाहिए; अपने और दूसरे के बल को जानकर ही समयोचित वचन कहना चाहिए।"

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.24.5)

त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भस्तव रूपेण मोहितः । त्वाञ्च प्रार्थयते राजा कुरु तस्येप्सितं प्रिये

trailokyādhipatiḥ śumbhastava rūpeṇa mohitaḥ | tvāñca prārthayate rājā kuru tasyepsitaṁ priye

"त्रैलोक्य के अधिपति शुंभ तुम्हारे रूप से मोहित हैं, और वह राजा तुम्हें चाहते हैं; हे प्रिये! उनकी इच्छा पूर्ण करो।"

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.24.6)

त्यक्त्वा मूर्खस्वभावं त्वं सम्मान्य वचनं मम । भज शुम्भं निशुम्भं वा हितमेतद् ब्रवीमि ते

tyaktvā mūrkhasvabhāvaṁ tvaṁ sammānya vacanaṁ mama | bhaja śumbhaṁ niśumbhaṁ vā hitametad bravīmi te

"अपने मूर्खतापूर्ण स्वभाव को त्यागकर, मेरे वचन का सम्मान करके, शुंभ अथवा निशुंभ को स्वीकार करो — यह हितकर बात मैं तुमसे कहता हूँ।"

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.24.7)

शृङ्गारः सर्वथा सर्वैः प्राणिभिः परया मुदा । सेवनीयो बुद्धिमद्भिर्नवानामुत्तमो यतः

śṛṅgāraḥ sarvathā sarvaiḥ prāṇibhiḥ parayā mudā | sevanīyo buddhimadbhirnavānāmuttamo yataḥ

"शृंगार-रस को सर्वथा समस्त प्राणियों को परम आनंद से भोगना चाहिए; बुद्धिमानों द्वारा उसका सेवन करना चाहिए, क्योंकि वह नवों रसों में श्रेष्ठ है।"

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.24.8)

नागमिष्यसि चेद् बाले सङ्क्रुद्धः पृथिवीपतिः । अन्यानाज्ञाकरान्प्रेष्य बलान्नेष्यति साम्प्रतम्

nāgamiṣyasi ced bāle saṅkruddhaḥ pṛthivīpatiḥ | anyānājñākarānpreṣya balānneṣyati sāmpratam

"हे बाला! यदि तुम नहीं आओगी, तो क्रुद्ध पृथ्वीपति अन्य आज्ञाकारी सेवकों को भेजकर बलपूर्वक तुम्हें अभी ले आएगा।"

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.24.9)

केशेष्वाकृष्य ते नूनं दानवा बलदर्पिताः । त्वां नयिष्यन्ति वामोरु तरसा शुम्भसन्तिधौ

keśeṣvākṛṣya te nūnaṁ dānavā baladarpitāḥ | tvāṁ nayiṣyanti vāmoru tarasā śumbhasantidhau

"हे सुंदरी! बल से गर्वित दानव निश्चय ही तुम्हें केशों से खींचकर शीघ्रता से शुंभ के सम्मुख ले जाएँगे।"

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.24.10)

स्वलज्जां रक्ष तन्वङ्गि साहसं सर्वथा त्यज । मानिता गच्छ तत्पार्श्वे मानपात्रं यतोऽसि वै

svalajjāṁ rakṣa tanvaṅgi sāhasaṁ sarvathā tyaja | mānitā gaccha tatpārśve mānapātraṁ yato'si vai

"हे कोमलांगी! अपनी लाज की रक्षा करो, यह दुस्साहस सर्वथा त्याग दो। मान सहित उनके पास जाओ, क्योंकि तुम वास्तव में सम्मान की पात्र हो।"

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.24.11)

क्व युद्धं निशितैर्बाणैः क्व सुखं रतिसङ्गजम् । सारासारं परिच्छेद्य कुरु मे वचनं पटु

kva yuddhaṁ niśitairbāṇaiḥ kva sukhaṁ ratisaṅgajam | sārāsāraṁ paricchedya kuru me vacanaṁ paṭu

"कहाँ तीक्ष्ण बाणों से युद्ध, और कहाँ प्रेम-संयोग से उत्पन्न सुख? सार-असार का निर्णय करके मेरी चतुर बात मान लो।"

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.24.12)

भज शुम्भं निशुम्भं वा लब्धासि परमं सुखम् । देव्युवाच । सत्यं दूत महाभाग प्रवक्तुं निपुणो ह्यसि

bhaja śumbhaṁ niśumbhaṁ vā labdhāsi paramaṁ sukham | devyuvāca | satyaṁ dūta mahābhāga pravaktuṁ nipuṇo hyasi

"शुंभ अथवा निशुंभ को स्वीकार करो, और परम सुख प्राप्त करो।" देवी ने कहा — "हे महाभाग दूत! तुम सत्य ही में बोलने में निपुण हो।"

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.24.13)

निशुम्भशुम्भौ जानामि बलवन्ताविति ध्रुवम् । प्रतिज्ञा मे कृता बाल्यादन्यथा सा कथं भवेत्

niśumbhaśumbhau jānāmi balavantāviti dhruvam | pratijñā me kṛtā bālyādanyathā sā kathaṁ bhavet

"मैं जानती हूँ कि निशुंभ और शुंभ दोनों निश्चय ही बलवान हैं। परंतु बाल्यावस्था में मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, वह अन्यथा कैसे हो सकती है?"

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.24.14)

तस्माद् ब्रूहि निशुम्भञ्च शुम्भं वा बलवत्तरम् । विना युद्धं न मे भर्ता भविता कोऽपि सौष्ठवात्

tasmād brūhi niśumbhañca śumbhaṁ vā balavattaram | vinā yuddhaṁ na me bhartā bhavitā ko'pi sauṣṭhavāt

"इसलिए निशुंभ अथवा जो भी अधिक बलवान हो — शुंभ — उससे कह दो, युद्ध के बिना उचित रीति से कोई भी मेरा पति नहीं बन सकेगा।"

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.24.15)

जित्वा मां तरसा कामं करं गृह्णातु साम्प्रतम् । युद्धेच्छया समायातां विद्धि मामबलां नृप

jitvā māṁ tarasā kāmaṁ karaṁ gṛhṇātu sāmpratam | yuddhecchayā samāyātāṁ viddhi māmabalāṁ nṛpa

"वह मुझे शीघ्र जीतकर, अभी मेरा हाथ ग्रहण करे, जैसी उसकी इच्छा हो। हे राजन्! जान लो कि मैं यद्यपि दुर्बल स्त्री हूँ, फिर भी युद्ध की इच्छा से यहाँ आई हूँ।"

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.24.16)

युद्धं देहि समर्थोऽसि वीरधर्मं समाचर । बिभेषि मम शूलाच्चेत्पातालं गच्छ मा चिरम्

yuddhaṁ dehi samartho'si vīradharmaṁ samācara | bibheṣi mama śūlāccetpātālaṁ gaccha mā ciram

"यदि तुम समर्थ हो, तो युद्ध करो, वीर-धर्म का पालन करो। यदि मेरे त्रिशूल से डरते हो, तो शीघ्र ही पाताल चले जाओ —"

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.24.17)

त्रिदिवं च धरां त्यक्त्वा जीवितेच्छा यदस्ति ते । इति दूत वदाशु त्वं गत्वा स्वपतिमादरात्

tridivaṁ ca dharāṁ tyaktvā jīvitecchā yadasti te | iti dūta vadāśu tvaṁ gatvā svapatimādarāt

"— स्वर्ग और पृथ्वी दोनों त्यागकर, यदि तुम्हें जीवित रहने की कोई इच्छा हो। हे दूत! जाकर आदरपूर्वक अपने स्वामी से यह शीघ्र कह दो।"

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.24.18)

स विचार्य यथायुक्तं करिष्यति महाबलः । संसारे दूतधर्मोऽयं यत्सत्यं भाषणं किल

sa vicārya yathāyuktaṁ kariṣyati mahābalaḥ | saṁsāre dūtadharmo'yaṁ yatsatyaṁ bhāṣaṇaṁ kila

"वह महाबली भली-भाँति विचार करके जो उचित हो वही करेगा। संसार में दूत का धर्म यही है कि वह सत्य ही बोले।"

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.24.19)

शत्रौ पत्यौ च धर्मज्ञ तथा त्वं कुरु मा चिरम् । व्यास उवाच । अथ तद्वचनं श्रुत्वा नीतिमद्बलसंयुतम्

śatrau patyau ca dharmajña tathā tvaṁ kuru mā ciram | vyāsa uvāca | atha tadvacanaṁ śrutvā nītimadbalasaṁyutam

"चाहे शत्रु हो अथवा पति, हे धर्मज्ञ! तुम वैसा ही बिना विलंब करो।" व्यास जी ने कहा — तब उसके तर्कसंगत, बलयुक्त वे वचन सुनकर —

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.24.20)

हेतुयुक्तं प्रगल्पञ्च विस्मितः प्रययौ तदा । गत्वा दैत्यपतिं दूतो विचार्य च पुनः पुनः

hetuyuktaṁ pragalpañca vismitaḥ prayayau tadā | gatvā daityapatiṁ dūto vicārya ca punaḥ punaḥ

— युक्तिपूर्ण और साहसपूर्वक कहे गए, आश्चर्यचकित होकर वह चल पड़ा; दैत्यों के स्वामी के पास जाकर, बार-बार विचार करके, वह दूत —

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.24.21)

प्रणम्य पादयोः प्रह्वः प्रत्युवाच नृपञ्ज तम् । राजनीतिकरं वाक्यं मृदुपूर्वं प्रियं वचः

praṇamya pādayoḥ prahvaḥ pratyuvāca nṛpañja tam | rājanītikaraṁ vākyaṁ mṛdupūrvaṁ priyaṁ vacaḥ

— चरणों में झुककर प्रणाम करके, उस राजा से उत्तर में राजनीति के अनुकूल, पहले कोमल फिर प्रिय वचन कहने लगा।

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.24.22)

दूत उवाच । सत्यं प्रियं च वक्तव्यं तेन चिन्तापरो ह्यहम् । सत्यं प्रियं च राजेन्द्र वचनं दुर्लभं किल

dūta uvāca | satyaṁ priyaṁ ca vaktavyaṁ tena cintāparo hyaham | satyaṁ priyaṁ ca rājendra vacanaṁ durlabhaṁ kila

दूत ने कहा — "मुझे सत्य और प्रिय दोनों ही कहना है, इसीलिए मैं चिंतित हूँ; हे राजेंद्र! सत्य और प्रिय दोनों साथ मिलना कठिन ही है।"

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.24.23)

अप्रियं वदतां कामं राजा कुप्यति सर्वथा । साक्षात्कुतः समायाता कस्य वा किम्बलाबला

apriyaṁ vadatāṁ kāmaṁ rājā kupyati sarvathā | sākṣātkutaḥ samāyātā kasya vā kimbalābalā

"अप्रिय बोलने वालों पर राजा सर्वथा क्रोधित होते हैं — वह साक्षात् कहाँ से आई, वह किसकी पुत्री है, उसका बल-अबल क्या है —"

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.24.24)

न ज्ञानगोचरं किञ्चित्किं ब्रवीमि विचेष्टितम् । युद्धकामा मया दृष्टा गर्विता कटुभाषिणी

na jñānagocaraṁ kiñcitkiṁ bravīmi viceṣṭitam | yuddhakāmā mayā dṛṣṭā garvitā kaṭubhāṣiṇī

"— इसमें से कुछ भी मेरे ज्ञान के दायरे में नहीं है। उसका आचरण मैं क्या बताऊँ? मैंने उसे युद्ध की इच्छुक, गर्वित और कटु-भाषिणी देखा।"

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.24.25)

तया यत्कथितं सम्यक् तच्छृणुष्व महामते । मया बाल्यात्प्रतिज्ञेयं कृता पूर्वं विनोदतः

tayā yatkathitaṁ samyak tacchṛṇuṣva mahāmate | mayā bālyātpratijñeyaṁ kṛtā pūrvaṁ vinodataḥ

"हे महामते! उसने जो कुछ ठीक-ठीक कहा, वह सुनिए — मैंने बाल्यावस्था में केवल खेल-खेल में एक प्रतिज्ञा की थी,"

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.24.26)

सखीनां पुरतः कामं विवाहं प्रति सर्वथा । यो मां युद्धे जयेदद्धा दर्पञ्च विधुनोति वै

sakhīnāṁ purataḥ kāmaṁ vivāhaṁ prati sarvathā | yo māṁ yuddhe jayedaddhā darpañca vidhunoti vai

"— अपनी सखियों के सामने, अपने विवाह के विषय में — जो भी युद्ध में मुझे वास्तव में जीत लेगा और मेरे अभिमान को दूर कर देगा —"

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.24.27)

तं वरिष्याम्यहं कामं पतिं समबलं किल । न मे प्रतिज्ञा मिथ्या सा कर्तव्या नृपसत्तम

taṁ variṣyāmyahaṁ kāmaṁ patiṁ samabalaṁ kila | na me pratijñā mithyā sā kartavyā nṛpasattama

"— उसी को मैं अपने समान बलशाली पति के रूप में वरण करूँगी। मेरी प्रतिज्ञा मिथ्या नहीं होनी चाहिए, हे राजाओं में श्रेष्ठ।"

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.24.28)

तस्माद्युध्यस्व धर्मज्ञ जित्वा मां स्ववशं कुरु । तयेति व्याहृतं वाक्यं श्रुत्वाहं समुपागतः

tasmādyudhyasva dharmajña jitvā māṁ svavaśaṁ kuru | tayeti vyāhṛtaṁ vākyaṁ śrutvāhaṁ samupāgataḥ

"'इसलिए, हे धर्मज्ञ! युद्ध करो, मुझे जीतकर अपने वश में करो।' यह उसके द्वारा कहा गया वचन सुनकर मैं यहाँ आया हूँ।"

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.24.29)

यथेच्छसि महाराज तथा कुरु तव प्रियम् । सा युद्धार्थं कृतमतिः सायुधा सिंहगामिनी

yathecchasi mahārāja tathā kuru tava priyam | sā yuddhārthaṁ kṛtamatiḥ sāyudhā siṁhagāminī

"हे महाराज! जैसी आपकी इच्छा हो, वैसा ही अपने हित के लिए कीजिए। वह युद्ध के लिए दृढ़-निश्चय, शस्त्रधारी, सिंहवाहिनी है,"

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.24.30)

निश्चला वर्तते भूप यद्योग्यं तद्विधीयताम् । व्यास उवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सुग्रीवस्य नराधिपः

niścalā vartate bhūpa yadyogyaṁ tadvidhīyatām | vyāsa uvāca | ityākarṇya vacastasya sugrīvasya narādhipaḥ

"— हे भूपते! अटल है; जो भी उचित हो, वही किया जाए।" व्यास जी ने कहा — सुग्रीव के इन वचनों को सुनकर राजा ने —

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.24.31)

पप्रच्छ भ्रातरंशूरं समीपस्थं महाबलम् । शुम्भ उवाच । भ्रातः किमत्र कर्तव्यं ब्रूहि सत्यं महामते

papraccha bhrātaraṁśūraṁ samīpasthaṁ mahābalam | śumbha uvāca | bhrātaḥ kimatra kartavyaṁ brūhi satyaṁ mahāmate

— अपने पास खड़े महाबली, वीर भाई से पूछा। शुंभ ने कहा — "हे भ्राता! यहाँ क्या करना उचित होगा, हे महामते! मुझे सत्य बताओ।"

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.24.32)

नार्येका योद्धुकामास्ति समाह्वयति साम्प्रतम् । अहं गच्छामि सङ्ग्रामे त्वं वा गच्छ बलान्वितः

nāryekā yoddhukāmāsti samāhvayati sāmpratam | ahaṁ gacchāmi saṅgrāme tvaṁ vā gaccha balānvitaḥ

"एक स्त्री युद्ध की इच्छुक होकर अभी हमें चुनौती दे रही है। मैं युद्ध में जाऊँ, अथवा तुम अपनी सेना सहित जाओ?"

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.24.33)

यद्रोचते निशुम्भात्र तत्कर्तव्यं मया किल । निशुम्भ उवाच । न मया न त्वया वीर गन्तव्यं रणमूर्धनि

yadrocate niśumbhātra tatkartavyaṁ mayā kila | niśumbha uvāca | na mayā na tvayā vīra gantavyaṁ raṇamūrdhani

"हे निशुंभ! जो तुम्हें अच्छा लगे, वही मैं करूँगा।" निशुंभ ने कहा — "हे वीर! न तो मुझे और न ही तुम्हें युद्धभूमि में जाना चाहिए।"

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.24.34)

प्रेषयस्व महाराज त्वरितं धूम्रलोचनम् । स गत्वा तां रणे जित्वा गृहीत्वा चारुलोचनाम्

preṣayasva mahārāja tvaritaṁ dhūmralocanam | sa gatvā tāṁ raṇe jitvā gṛhītvā cārulocanām

"हे महाराज! तुरंत धूम्रलोचन को भेजिए। वह जाकर युद्ध में उस सुनयना को जीतकर, पकड़कर —"

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.24.35)

आगमिष्यति शुम्भात्र विवाहः संविधीयताम् । व्यास उवाच । तन्निशम्य वचस्तस्य शुम्भो भ्रातुः कनीयसः

āgamiṣyati śumbhātra vivāhaḥ saṁvidhīyatām | vyāsa uvāca | tanniśamya vacastasya śumbho bhrātuḥ kanīyasaḥ

"— यहाँ लौट आएगा, हे शुंभ; तब विवाह का प्रबंध कर लीजिए।" व्यास जी ने कहा — अपने छोटे भाई के ये वचन सुनकर शुंभ ने —

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.24.36)

कोपात्सम्प्रेषयामास पार्श्वस्थं धूम्रलोचनम् । शुम्भ उवाच । धूम्रलोचन गच्छाशु सैन्येन महताऽऽवृतः

kopātsampreṣayāmāsa pārśvasthaṁ dhūmralocanam | śumbha uvāca | dhūmralocana gacchāśu sainyena mahatā''vṛtaḥ

— क्रोधपूर्वक पास खड़े धूम्रलोचन को भेजा। शुंभ ने कहा — "हे धूम्रलोचन! शीघ्र जाओ, विशाल सेना से घिरे हुए।"

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.24.37)

गृहीत्वाऽऽनय तां मुग्धां स्ववीर्यमदमोहिताम् । देवो वा दानवो वापि मनुष्यो वा महाबलः

gṛhītvā''naya tāṁ mugdhāṁ svavīryamadamohitām | devo vā dānavo vāpi manuṣyo vā mahābalaḥ

"अपने पराक्रम के मद से मोहित उस भोली कन्या को पकड़कर ले आओ। जो भी देवता, दानव अथवा महाबली मनुष्य —"

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.24.38)

तत्पार्ष्णिग्राहतां प्राप्तो हन्तव्यस्तरसा त्वया । तत्पार्श्ववर्तिनीं कालीं हत्वा सङ्गृह्य तां पुनः

tatpārṣṇigrāhatāṁ prāpto hantavyastarasā tvayā | tatpārśvavartinīṁ kālīṁ hatvā saṅgṛhya tāṁ punaḥ

"— उसका पृष्ठ-रक्षक बनकर आए, उसे तुम शीघ्र मार डालना। और उसके पास खड़ी कालिका को मारकर, उसे (देवी को) पुनः पकड़कर —"

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.24.39)

शीघ्रमत्र समागच्छ कृत्वा कार्यमनुत्तमम् । रक्षणीया त्वया साध्वी मुञ्चन्ती मृदुमार्गणान्

śīghramatra samāgaccha kṛtvā kāryamanuttamam | rakṣaṇīyā tvayā sādhvī muñcantī mṛdumārgaṇān

"— शीघ्र यहाँ इस श्रेष्ठ कार्य को पूर्ण करके आ जाना। उस साध्वी की, जो कोमल बाण छोड़ रही है, तुम्हें रक्षा करनी है —"

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.24.40)

यत्नेन महता वीर मृदुदेहा कृशोदरी । तत्सहायाश्च हन्तव्या ये रणे शस्त्रपाणयः

yatnena mahatā vīra mṛdudehā kṛśodarī | tatsahāyāśca hantavyā ye raṇe śastrapāṇayaḥ

"— महान प्रयत्न से, हे वीर! वह कोमल-देही, कृशोदरी है। परंतु उसके सहायक जो युद्ध में शस्त्र लिए हों, उन्हें मार डालना है।"

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.24.41)

सर्वथा सा न हन्तव्या रक्षणीया प्रयत्नतः । व्यास उवाच । इत्यादिष्टस्तदा राज्ञा तरसा धूम्रलोचनः

sarvathā sā na hantavyā rakṣaṇīyā prayatnataḥ | vyāsa uvāca | ityādiṣṭastadā rājñā tarasā dhūmralocanaḥ

"उसे सर्वथा नहीं मारना है, बल्कि प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी है।" व्यास जी ने कहा — राजा द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर धूम्रलोचन शीघ्रता से —

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.24.42)

प्रणम्य शुम्भं सैन्येन भूतः शीघ्रं ययौ रणे । असाधूनां सहस्राणां षष्ट्या तेषां वृतस्तथा

praṇamya śumbhaṁ sainyena bhūtaḥ śīghraṁ yayau raṇe | asādhūnāṁ sahasrāṇāṁ ṣaṣṭyā teṣāṁ vṛtastathā

— शुंभ को प्रणाम करके, सेना सहित शीघ्र युद्धभूमि की ओर चला। साठ हजार दुष्टों से घिरा हुआ —

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.24.43)

स ददर्श ततो देवीं रम्योपवनसंस्थिताम् । दृष्ट्वा तां मृगशावाक्षीं विनयेन समन्वितः

sa dadarśa tato devīṁ ramyopavanasaṁsthitām | dṛṣṭvā tāṁ mṛgaśāvākṣīṁ vinayena samanvitaḥ

— उसने तब देवी को एक रमणीय उपवन में विराजमान देखा। उस मृगशावाक्षी को देखकर, विनयपूर्वक —

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.24.44)

उवाच वचनं श्लक्ष्णं हेतुमद्रसभूषितम् । शृणु देवि महाभागे शुम्भस्त्वद्विरहातुरः

uvāca vacanaṁ ślakṣṇaṁ hetumadrasabhūṣitam | śṛṇu devi mahābhāge śumbhastvadvirahāturaḥ

— उसने तर्क और रस से सुसज्जित कोमल वचन कहे — "हे महाभागा देवी! सुनो, शुंभ तुम्हारे वियोग से व्याकुल है —"

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.24.45)

दूतं प्रेषितवान्पार्श्वे तव नीतिविशारदः । रसभङ्गभयोद्विग्नः सामपूर्वं त्वयि स्वयम्

dūtaṁ preṣitavānpārśve tava nītiviśāradaḥ | rasabhaṅgabhayodvignaḥ sāmapūrvaṁ tvayi svayam

"— उसने नीति में निपुण एक दूत को तुम्हारे पास भेजा था; रस-भंग के भय से व्याकुल होकर, उसने स्वयं साम-पूर्वक तुम्हारे प्रति —"

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.24.46)

तेनागत्य वचः प्रोक्तं विपरीतं वरानने । वचसा तेन मे भर्ता चिन्ताविष्टमना नृपः

tenāgatya vacaḥ proktaṁ viparītaṁ varānane | vacasā tena me bhartā cintāviṣṭamanā nṛpaḥ

"— उस दूत ने आकर विपरीत वचन कह दिया, हे सुंदरी! उसके उन वचनों से मेरे स्वामी, वह राजा, चिंता से व्याकुल-चित्त हो गए हैं।"

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.24.47)

बभूव रसमार्गज्ञे शुम्भः कामविमोहितः । दूतेन तेन न ज्ञातं हेतुगर्भं वचस्तव

babhūva rasamārgajñe śumbhaḥ kāmavimohitaḥ | dūtena tena na jñātaṁ hetugarbhaṁ vacastava

"हे रस-मार्ग की जानकार! शुंभ काम से पूर्णतः मोहित हो गए हैं। उस दूत ने तुम्हारे वचन में छिपे तर्क को नहीं समझा —"

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.24.48)

यो मां जयति सङ्ग्रामे यदुक्तं कठिनं वचः । न ज्ञातस्तेन सङ्ग्रामो द्विविधः खलु मानिनि

yo māṁ jayati saṅgrāme yaduktaṁ kaṭhinaṁ vacaḥ | na jñātastena saṅgrāmo dvividhaḥ khalu mānini

"'जो मुझे युद्ध में जीत ले' — तुमने जो यह कठोर वचन कहा — उसे यह नहीं समझ आया कि युद्ध, हे मानिनी, वास्तव में दो प्रकार का होता है —"

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.24.49)

रतिजोऽथोत्साहजश्च पात्रभेदे विवक्षितः । रतिजस्त्वयि वामोरु शत्रोरुत्साहजः स्मृतः

ratijo'thotsāhajaśca pātrabhede vivakṣitaḥ | ratijastvayi vāmoru śatrorutsāhajaḥ smṛtaḥ

"— एक रति से उत्पन्न, और दूसरा उत्साह (शौर्य) से उत्पन्न — पात्र के भेद से इनका अर्थ अलग-अलग समझना चाहिए। हे सुंदरी! तुम्हारे विषय में यह रति-युद्ध है, शत्रु के विषय में यह उत्साह-युद्ध माना गया है।"

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.24.50)

सुखदः प्रथमः कान्ते दुःखदश्चारिजः स्मृतः । जानाम्यहं वरारोहे भवत्या मानसं किल

sukhadaḥ prathamaḥ kānte duḥkhadaścārijaḥ smṛtaḥ | jānāmyahaṁ varārohe bhavatyā mānasaṁ kila

"हे प्रिये! पहला सुखदायी है, शत्रु से उत्पन्न दूसरा दुखदायी माना गया है। हे वरारोहे! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे मन में निश्चय ही —"

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.24.51)

रतिसङ्ग्रामभावस्ते हृदये परिवर्तते । इति तज्ज्ञं विदित्वा मां त्वत्सकाशं नराधिपः

ratisaṅgrāmabhāvaste hṛdaye parivartate | iti tajjñaṁ viditvā māṁ tvatsakāśaṁ narādhipaḥ

"— यह रति-युद्ध का ही भाव घूम रहा है। यह भली-भाँति समझकर ही, नराधिप ने मुझे तुम्हारे पास —"

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.24.52)

प्रेषयामास शुम्भोऽद्य बलेन महताऽऽवृतम् । चतुरासि महाभागे शृणु मे वचनं मृदु

preṣayāmāsa śumbho'dya balena mahatā''vṛtam | caturāsi mahābhāge śṛṇu me vacanaṁ mṛdu

"— विशाल सेना से घिरा हुआ आज भेजा है। हे महाभागा! तुम चतुर हो, मेरा यह कोमल वचन सुनो।"

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.24.53)

भज शुम्भं त्रिलोकेशं देवदर्पनिबर्हणम् । पट्टराज्ञी प्रिया भूत्वा भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान्

bhaja śumbhaṁ trilokeśaṁ devadarpanibarhaṇam | paṭṭarājñī priyā bhūtvā bhuṅkṣva bhogānanuttamān

"त्रैलोक्येश्वर, देवताओं के दर्प का दमन करने वाले शुंभ को स्वीकार करो; उनकी प्रिय पटरानी बनकर सर्वोच्च भोगों का आनंद लो।"

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.24.54)

जेष्यति त्वां महाबाहुः शुम्भः कामबलार्थवित् । विचित्रान्कुरु हावांस्त्वं सोऽपि भावान्करिष्यति

jeṣyati tvāṁ mahābāhuḥ śumbhaḥ kāmabalārthavit | vicitrānkuru hāvāṁstvaṁ so'pi bhāvānkariṣyati

"काम-बल के मर्मज्ञ महाबाहु शुंभ तुम्हें जीत लेंगे; तुम विविध हाव-भाव करो, वह भी वैसे ही भाव प्रकट करेंगे।"

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.24.55)

भविष्यति कालिकेयं तत्र वै नर्मसाक्षिणी । एवं सङ्गरयोगेन पतिर्मे परमार्थवित्

bhaviṣyati kālikeyaṁ tatra vai narmasākṣiṇī | evaṁ saṅgarayogena patirme paramārthavit

"यह कालिका वहाँ तुम्हारे प्रेम-क्रीड़ा की साक्षी बनेगी। और इस प्रकार इस 'युद्ध' के योग से, मेरे स्वामी, जो परमार्थ के ज्ञाता हैं —"

श्लोक 56 (devibhagavatam.5.24.56)

जित्वा त्वां सुखशय्यायां परिश्रान्तां करिष्यति । रक्तदेहां नखाघातैर्दन्तैश्च खण्डिताधराम्

jitvā tvāṁ sukhaśayyāyāṁ pariśrāntāṁ kariṣyati | raktadehāṁ nakhāghātairdantaiśca khaṇḍitādharām

"— तुम्हें जीतकर, तुम्हें सुख-शय्या पर थकी हुई कर देंगे, नखों के आघातों से लाल शरीर वाली, दाँतों से कटे अधर वाली —"

श्लोक 57 (devibhagavatam.5.24.57)

स्वेदक्लिन्नां प्रभग्नां त्वां संविधास्यति भूपतिः । भविता मानसः कामो रतिसङ्ग्रामजस्तव

svedaklinnāṁ prabhagnāṁ tvāṁ saṁvidhāsyati bhūpatiḥ | bhavitā mānasaḥ kāmo ratisaṅgrāmajastava

"— पसीने से भीगी, थकी हुई तुम्हें राजा बना देंगे; और तुम्हारे मन की काम-कामना, जो इस प्रेम-युद्ध से उत्पन्न होगी, पूर्ण हो जाएगी।"

श्लोक 58 (devibhagavatam.5.24.58)

दर्शनाद्वश एवास्ते शुम्भः सर्वात्मना प्रिये । वचनं कुरु मे पथ्यं हितकृच्चापि पेशलम्

darśanādvaśa evāste śumbhaḥ sarvātmanā priye | vacanaṁ kuru me pathyaṁ hitakṛccāpi peśalam

"हे प्रिये! तुम्हें देखते ही शुंभ पूर्णतः तुम्हारे वश में हो गए हैं। मेरा यह हितकर और मधुर वचन मान लो।"

श्लोक 59 (devibhagavatam.5.24.59)

भज शुम्भं गणाध्यक्षं माननीयातिमानिनी । मन्दभाग्याश्च ते नूनं ह्यस्त्रयुद्धप्रियाश्च ये

bhaja śumbhaṁ gaṇādhyakṣaṁ mānanīyātimāninī | mandabhāgyāśca te nūnaṁ hyastrayuddhapriyāśca ye

"हे अत्यंत मानिनी, सम्मान की पात्र! गणाध्यक्ष शुंभ को स्वीकार करो। जो स्त्रियाँ शस्त्र-युद्ध में प्रीति रखती हैं, वे निश्चय ही अभागी हैं —"

श्लोक 60 (devibhagavatam.5.24.60)

न तदर्हासि कान्ते त्वं सदा सुरतवल्लभे । अशोकं कुरु राजानं पादाघातविकासितम्

na tadarhāsi kānte tvaṁ sadā suratavallabhe | aśokaṁ kuru rājānaṁ pādāghātavikāsitam

"— हे प्रिये! तुम उसके योग्य नहीं हो, तुम तो सदा प्रेम-क्रीड़ा की ही प्रिय पात्र हो। राजा को अशोक-वृक्ष के समान (चरण-स्पर्श से) प्रफुल्लित करो —"

श्लोक 61 (devibhagavatam.5.24.61)

बकुलं सीधुसेकेन तथा कुरबकं कुरु

bakulaṁ sīdhusekena tathā kurabakaṁ kuru

"— और मधुर मदिरा के सिंचन से बकुल वृक्ष के समान, तथा आलिंगन से कुरबक वृक्ष के समान उन्हें प्रफुल्लित करो।"

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