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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 29

रक्तबीज-वध एवं निशुम्भ का युद्ध-प्रस्थान

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.29.1)

व्यास उवाच । वरदानमिदं तस्य दानवस्य शिवार्पितम् । अत्यद्भुततरं राजञ्छ्रुणु तत्प्रब्रवीम्यहम्

vyāsa uvāca | varadānamidaṁ tasya dānavasya śivārpitam | atyadbhutataraṁ rājañchruṇu tatprabravīmyaham

व्यास जी ने कहा — हे राजन्! शिव द्वारा उस दानव को दिया गया यह वरदान अत्यंत अद्भुत है, सुनिए, मैं वह कहता हूँ।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.29.2)

तस्य देहाद्रक्तबिन्दुर्यदा पतति भूतले । समुत्पतन्ति दैतेयास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः

tasya dehādraktabinduryadā patati bhūtale | samutpatanti daiteyāstadrūpāstatparākramāḥ

उसके शरीर से जब भी रक्त की एक बूंद पृथ्वी पर गिरती, तभी उसी के रूप और पराक्रम वाला एक दैत्य वहाँ उत्पन्न हो जाता था।

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.29.3)

असङ्ख्याता महावीर्या दानवा रक्तसम्भवाः । प्रभवन्त्विति रुद्रेण दत्तोऽस्त्यत्यद्भुतो वरः

asaṅkhyātā mahāvīryā dānavā raktasambhavāḥ | prabhavantviti rudreṇa datto'styatyadbhuto varaḥ

"उसके रक्त से असंख्य महापराक्रमी दानव उत्पन्न हों" — रुद्र द्वारा दिया गया यह अत्यंत अद्भुत वरदान था।

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.29.4)

स तेन वरदानेन दर्पितः क्रोधसंयुतः । अभ्यगात्तरसा सङ्ख्ये हन्तुं देवीं सकालिकाम्

sa tena varadānena darpitaḥ krodhasaṁyutaḥ | abhyagāttarasā saṅkhye hantuṁ devīṁ sakālikām

उस वरदान से गर्वित और क्रोध से भरा हुआ वह तुरंत कालिका सहित देवी को मारने के लिए युद्ध में बढ़ा।

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.29.5)

स दृष्ट्वा वैष्णवीं शक्तिं गरुडोपरिसंस्थिताम् । शक्त्या जघान दैत्येन्द्रस्तां वै कमललोचनाम्

sa dṛṣṭvā vaiṣṇavīṁ śaktiṁ garuḍoparisaṁsthitām | śaktyā jaghāna daityendrastāṁ vai kamalalocanām

गरुड़ पर आरूढ़ वैष्णवी शक्ति को देखकर उस दैत्येंद्र ने कमललोचना उस देवी पर शक्ति से प्रहार किया।

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.29.6)

गदया वारयामास शक्तिः सा शक्तिसंयुता । अताडयच्च चक्रेण रक्तबीजं महासुरम्

gadayā vārayāmāsa śaktiḥ sā śaktisaṁyutā | atāḍayacca cakreṇa raktabījaṁ mahāsuram

शक्ति से युक्त उस देवी ने गदा से उस प्रहार को रोक दिया और चक्र से महादानव रक्तबीज पर प्रहार किया।

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.29.7)

रथाङ्गहतदेहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् । वज्राहतगिरेः शृङ्गान्निर्झरा इव गैरिका

rathāṅgahatadehāttu bahu susrāva śoṇitam | vajrāhatagireḥ śṛṅgānnirjharā iva gairikā

चक्र से आहत उसके शरीर से बहुत सा रक्त बहने लगा, मानो वज्र से टूटे पर्वत-शिखर से गैरिक धारा बह रही हो।

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.29.8)

यत्र यत्र यदा भूमौ पतन्ति रक्तबिन्दवः । समुत्तस्थुस्तदाकाराः पुरुषाश्च सहस्रशः

yatra yatra yadā bhūmau patanti raktabindavaḥ | samuttasthustadākārāḥ puruṣāśca sahasraśaḥ

जहाँ-जहाँ जब भी वे रक्त की बूंदें भूमि पर गिरतीं, वहाँ-वहाँ उसी के आकार वाले सहस्रों पुरुष उठ खड़े होते।

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.29.9)

ऐन्द्री तमसुरं घोरं वज्रेणाभिजघान च । रक्तबीजं क्रुधाऽऽविष्टा निःससार च शोणितम्

aindrī tamasuraṁ ghoraṁ vajreṇābhijaghāna ca | raktabījaṁ krudhā''viṣṭā niḥsasāra ca śoṇitam

ऐंद्री ने क्रोध से भरकर उस भयंकर असुर रक्तबीज पर वज्र से प्रहार किया, जिससे रक्त और भी बह निकला।

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.29.10)

ततस्तत्क्षतजाज्जाता रक्तबीजा ह्यनेकशः । तद्वीर्याश्च तदाकारा सायुधा युद्धदुर्मदाः

tatastatkṣatajājjātā raktabījā hyanekaśaḥ | tadvīryāśca tadākārā sāyudhā yuddhadurmadāḥ

उस बहते रक्त से अनेक रक्तबीज उत्पन्न हुए, उसी के समान पराक्रम और आकार वाले, शस्त्रधारी, युद्ध में उन्मत्त।

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.29.11)

ब्रह्माणी ब्रह्मदण्डेन कुपिता ह्यहनद् भृशम् । माहेश्वरी त्रिशूलेन दारयामास दानवम्

brahmāṇī brahmadaṇḍena kupitā hyahanad bhṛśam | māheśvarī triśūlena dārayāmāsa dānavam

क्रुद्ध ब्रह्माणी ने ब्रह्मदंड से उसे भीषण प्रहार किया, और माहेश्वरी ने त्रिशूल से उस दानव को चीर डाला।

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.29.12)

नारसिंही नखाघातैस्तं विव्याध महासुरम् । अहनत्तुण्डघातेन क्रुद्धा तं राक्षसाधमम्

nārasiṁhī nakhāghātaistaṁ vivyādha mahāsuram | ahanattuṇḍaghātena kruddhā taṁ rākṣasādhamam

नारसिंही ने अपने नखों के प्रहारों से उस महादानव को घायल किया, और क्रुद्ध होकर उस अधम राक्षस को अपने थूथन की चोट से मारा।

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.29.13)

कौमारी च तथा शक्त्या वक्षस्येनमताडयत् । सोऽपि क्रुद्धः शरासारैर्बिभेद निशितैश्च ताः

kaumārī ca tathā śaktyā vakṣasyenamatāḍayat | so'pi kruddhaḥ śarāsārairbibheda niśitaiśca tāḥ

कौमारी ने भी अपनी शक्ति से उसकी छाती पर प्रहार किया; वह भी क्रुद्ध होकर तीक्ष्ण बाणों की वर्षा से उन सबको बींध डालने लगा।

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.29.14)

गदाशक्तिप्रहारैस्तु मातॄः सर्वाः पृथक्पृथक् । शक्तयस्तं शराघातैर्विव्यधुस्तत्प्रकोपिताः

gadāśaktiprahāraistu mātṝḥ sarvāḥ pṛthakpṛthak | śaktayastaṁ śarāghātairvivyadhustatprakopitāḥ

गदा और शक्ति के प्रहारों से उसने सभी मातृगण को अलग-अलग मारा; क्रोधित शक्तियों ने भी उस पर बाणों की वर्षा की।

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.29.15)

तस्य शस्त्राणि चिच्छेद चण्डिका स्वशरैः शितैः । जघानान्यैश्च विशिखैस्तं देवी कुपिता भृशम्

tasya śastrāṇi ciccheda caṇḍikā svaśaraiḥ śitaiḥ | jaghānānyaiśca viśikhaistaṁ devī kupitā bhṛśam

चंडिका ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उसके शस्त्रों को काट डाला, और अत्यंत क्रुद्ध देवी ने अन्य बाणों से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.29.16)

तस्य देहाच्च सुस्राव रुधिरं बहुधा तु यत् । तस्मात्तत्सदृशाः शूराः प्रादुरासन्सहस्रशः

tasya dehācca susrāva rudhiraṁ bahudhā tu yat | tasmāttatsadṛśāḥ śūrāḥ prādurāsansahasraśaḥ

उसके शरीर से जो रक्त अनेक धाराओं में बहा, उससे उसी के समान सहस्रों शूरवीर पुनः प्रकट हो गए।

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.29.17)

रक्तबीजैर्जगद्व्याप्तं रुधिरौघसमुद्भवैः । सन्नद्धैः सायुधैः कामं कुर्वद्भिर्युद्धमद्भुतम्

raktabījairjagadvyāptaṁ rudhiraughasamudbhavaiḥ | sannaddhaiḥ sāyudhaiḥ kāmaṁ kurvadbhiryuddhamadbhutam

रक्त की धारा से उत्पन्न रक्तबीजों से समस्त जगत भर गया, वे सुसज्जित, शस्त्रधारी, अद्भुत युद्ध करने लगे।

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.29.18)

प्रहरन्तश्च तान्दृष्ट्वा रक्तबीजाननेकशः । भयभीताः सुरास्त्रेसुर्विषण्णाः शोककर्षिताः

praharantaśca tāndṛṣṭvā raktabījānanekaśaḥ | bhayabhītāḥ surāstresurviṣaṇṇāḥ śokakarṣitāḥ

उन अनेक रक्तबीजों को प्रहार करते देखकर देवता भयभीत, कांपते, दुखी और शोक से ग्रस्त हो गए।

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.29.19)

कथमद्य क्षयं दैत्या गमिष्यन्ति सहस्रशः । महाकाया महावीर्या दानवा रक्तसम्भवाः

kathamadya kṣayaṁ daityā gamiṣyanti sahasraśaḥ | mahākāyā mahāvīryā dānavā raktasambhavāḥ

"आज ये महाकाय, महापराक्रमी, रक्त से उत्पन्न सहस्रों दैत्य कैसे नष्ट होंगे?"

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.29.20)

एकैव चण्डिकात्रास्ति तथा काली च मातरः । एताभिर्दानवाः सर्वे जेतव्याः कष्टमेव तत्

ekaiva caṇḍikātrāsti tathā kālī ca mātaraḥ | etābhirdānavāḥ sarve jetavyāḥ kaṣṭameva tat

"यहाँ केवल एक चंडिका, काली और मातृगण ही हैं। इनके द्वारा इन सभी दानवों को जीतना अत्यंत कठिन कार्य है।"

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.29.21)

निशुम्भो वाथ शुम्भो वा सहसा बलसंवृतः । आगमिष्यति सङ्ग्रामे ततोऽनर्थो महान्भवेत्

niśumbho vātha śumbho vā sahasā balasaṁvṛtaḥ | āgamiṣyati saṅgrāme tato'nartho mahānbhavet

"यदि निशुम्भ या शुम्भ भी अपनी सेना सहित अचानक युद्ध में आ जाएँ, तो एक बड़ा अनर्थ हो जाएगा।"

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.29.22)

व्यास उवाच । एवं देवा भयोद्विग्नाश्चिन्तामापुर्महत्तराम् । यदा तदाम्बिका प्राह कालीं कमललोचनाम्

vyāsa uvāca | evaṁ devā bhayodvignāścintāmāpurmahattarām | yadā tadāmbikā prāha kālīṁ kamalalocanām

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार भय से व्याकुल देवगण जब गहरी चिंता में डूबे थे, तब अंबिका ने कमललोचना काली से कहा।

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.29.23)

चामुण्डे कुरु विस्तीर्णं वदनं त्वरिता भृशम् । मच्छस्त्रपातसम्भूतं रुधिरं पिब सत्वरा

cāmuṇḍe kuru vistīrṇaṁ vadanaṁ tvaritā bhṛśam | macchastrapātasambhūtaṁ rudhiraṁ piba satvarā

"हे चामुंडे! तुरंत अपना मुख विस्तृत कर लो और मेरे शस्त्रों के प्रहार से उत्पन्न रक्त को तत्काल पी जाओ।"

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.29.24)

भक्षयन्ती चर रणे दानवानद्य कामतः । हनिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्गदासिमुसलैस्तथा

bhakṣayantī cara raṇe dānavānadya kāmataḥ | haniṣyāmi śaraistīkṣṇairgadāsimusalaistathā

"आज युद्ध में इच्छानुसार दानवों को खाती हुई विचरण करो; मैं तीक्ष्ण बाणों, गदा, तलवार और मूसल से उसे मारूँगी।"

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.29.25)

तथा कुरु विशालाक्षि पानं तद्रुधिरस्य च । बिन्दुमात्रं यथा भूम्यां न पतेदपि साम्प्रतम्

tathā kuru viśālākṣi pānaṁ tadrudhirasya ca | bindumātraṁ yathā bhūmyāṁ na patedapi sāmpratam

"हे विशालाक्षि! उसका रक्त इस प्रकार पी लो कि अब एक बूंद भी भूमि पर न गिरे।"

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.29.26)

भक्ष्यमाणास्तदा दैत्या न चोत्पत्स्यन्ति चापरे । एवमेषां क्षयो नूनं भविष्यति न चान्यथा

bhakṣyamāṇāstadā daityā na cotpatsyanti cāpare | evameṣāṁ kṣayo nūnaṁ bhaviṣyati na cānyathā

"इस प्रकार खाए जाने पर नए दैत्य उत्पन्न नहीं होंगे। इसी विधि से निश्चय ही उनका नाश होगा, अन्यथा नहीं।"

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.29.27)

घातयिष्याम्यहं दैत्यं त्वं भक्षय च सत्वरा । पिबन्ती क्षतजं सर्वं यतमानारिसङ्क्षये

ghātayiṣyāmyahaṁ daityaṁ tvaṁ bhakṣaya ca satvarā | pibantī kṣatajaṁ sarvaṁ yatamānārisaṅkṣaye

"मैं दैत्य पर प्रहार करूँगी, तुम शीघ्रता से उसे खा जाओ, शत्रु के संहार के प्रयास में समस्त रक्त पीती हुई।"

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.29.28)

इत्थं दैत्यक्षयं कृत्वा दत्त्वा राज्यं सुरालयम् । इन्द्राय सुस्थिरं सर्वं गमिष्यामो यथासुखम्

itthaṁ daityakṣayaṁ kṛtvā dattvā rājyaṁ surālayam | indrāya susthiraṁ sarvaṁ gamiṣyāmo yathāsukham

"इस प्रकार दैत्य का नाश करके, स्वर्ग का राज्य इंद्र को दृढ़तापूर्वक सौंपकर, हम सुखपूर्वक अपने स्थान को लौट जाएँगे।"

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.29.29)

व्यास उवाच । इत्युक्ताम्बिकया देवी चामुण्डा चण्डविक्रमा । पपौ च क्षतजं सर्वं रक्तबीजशरीरजम्

vyāsa uvāca | ityuktāmbikayā devī cāmuṇḍā caṇḍavikramā | papau ca kṣatajaṁ sarvaṁ raktabījaśarīrajam

व्यास जी ने कहा — अंबिका के ऐसा कहने पर अत्यंत पराक्रमी देवी चामुंडा ने रक्तबीज के शरीर से निकलने वाला सारा रक्त पी लिया।

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.29.30)

अम्बिका तं जघानाशु खड्गेन मुसलेन च । चखाद देहशकलांश्चामुण्डा तान्कृशोदरी

ambikā taṁ jaghānāśu khaḍgena musalena ca | cakhāda dehaśakalāṁścāmuṇḍā tānkṛśodarī

अंबिका ने खड्ग और मूसल से तुरंत उस पर प्रहार किया, और कृशोदरी चामुंडा ने उसके शरीर के टुकड़ों को खा लिया।

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.29.31)

सोऽपि क्रुद्धो गदाघातैश्चामुण्डां समघातयत् । तथापि सा पपावाशु क्षतजं तमभक्षयत्

so'pi kruddho gadāghātaiścāmuṇḍāṁ samaghātayat | tathāpi sā papāvāśu kṣatajaṁ tamabhakṣayat

वह भी क्रुद्ध होकर गदा के प्रहारों से चामुंडा पर वार करता रहा, फिर भी वे तुरंत उसका रक्त पीती और उसे खाती रहीं।

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.29.32)

येऽन्ये रुधिरजाः क्रूरा रक्तबीजा महाबलाः । तेऽपि निष्पातिताः सर्वे भक्षिता गतशोणिताः

ye'nye rudhirajāḥ krūrā raktabījā mahābalāḥ | te'pi niṣpātitāḥ sarve bhakṣitā gataśoṇitāḥ

उसके रक्त से उत्पन्न अन्य जो भी क्रूर, महाबली रक्तबीज थे, वे सभी भी गिराए गए और रक्तहीन होकर खा लिए गए।

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.29.33)

कृत्रिमा भक्षिताः सर्वे यस्तु स्वाभाविकोऽसुरः । सोऽपि प्रपातितो हत्वा खड्गेनातिविखण्डितः

kṛtrimā bhakṣitāḥ sarve yastu svābhāviko'suraḥ | so'pi prapātito hatvā khaḍgenātivikhaṇḍitaḥ

सभी कृत्रिम दानव खा लिए गए; और जो वास्तविक असुर था, वह भी खड्ग से अत्यंत खंड-खंड होकर गिराया गया।

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.29.34)

रक्तबीजे हते रौद्रे ये चान्ये दानवा रणे । पलायनं ततः कृत्वा गतास्ते भयकम्पिताः

raktabīje hate raudre ye cānye dānavā raṇe | palāyanaṁ tataḥ kṛtvā gatāste bhayakampitāḥ

उस भयंकर रक्तबीज के मारे जाने पर युद्धभूमि में शेष रहे अन्य दानव भयभीत होकर काँपते हुए भाग खड़े हुए।

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.29.35)

हाहेति विब्रुवन्तस्ते शुम्भं प्रोचुः सविह्वलाः । रुथिरारक्तदेहाश्च विगतास्त्रा विचेतसः

hāheti vibruvantaste śumbhaṁ procuḥ savihvalāḥ | ruthirāraktadehāśca vigatāstrā vicetasaḥ

वे "हाय-हाय" कहते, व्याकुल, रक्त से लथपथ शरीर वाले, शस्त्रहीन, विचलित मन वाले शुम्भ के पास जाकर बोले —

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.29.36)

राजन्नम्बिकया रक्तबीजोऽसौ विनिपातितः । चामुण्डा तस्य देहात्तु पपौ सर्वं च शोणितम्

rājannambikayā raktabījo'sau vinipātitaḥ | cāmuṇḍā tasya dehāttu papau sarvaṁ ca śoṇitam

"हे राजन्! अंबिका ने रक्तबीज को गिरा दिया है, और चामुंडा ने उसके शरीर का सारा रक्त पी लिया है।"

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.29.37)

ये चान्ये दानवाः शूरा वाहनेनातिरंहसा । सिंहेन निहताः सर्वे काल्या च भक्षिताः परे

ye cānye dānavāḥ śūrā vāhanenātiraṁhasā | siṁhena nihatāḥ sarve kālyā ca bhakṣitāḥ pare

"जो अन्य शूरवीर दानव थे, वे सब उनके अत्यंत वेगवान वाहन सिंह द्वारा मारे गए, और शेष काली द्वारा खाए गए।"

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.29.38)

वयं त्वां कथितुं राजन्नागता युद्धचेष्टितम् । चरितञ्च तथा देव्याः सङ्ग्रामे परमाद्भुतम्

vayaṁ tvāṁ kathituṁ rājannāgatā yuddhaceṣṭitam | caritañca tathā devyāḥ saṅgrāme paramādbhutam

"हे राजन्! हम आपको युद्ध का यह वृत्तांत और देवी का यह अत्यंत अद्भुत चरित्र बताने आए हैं।"

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.29.39)

अजेयेयं महाराज सर्वथा दैत्यदानवैः । गन्धर्वासुरयक्षैश्च पन्नगोरगराक्षसैः

ajeyeyaṁ mahārāja sarvathā daityadānavaiḥ | gandharvāsurayakṣaiśca pannagoragarākṣasaiḥ

"हे महाराज! यह देवी दैत्य-दानवों, गंधर्व-असुर-यक्षों, नाग-सर्प-राक्षसों — किसी से भी सर्वथा अजेय है।"

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.29.40)

अन्यास्तत्रागता देव्य इन्द्राणीप्रमुखा भृशम् । युध्यमाना महाराज वाहनैरायुधैर्युताः

anyāstatrāgatā devya indrāṇīpramukhā bhṛśam | yudhyamānā mahārāja vāhanairāyudhairyutāḥ

"हे महाराज! वहाँ इंद्राणी आदि अन्य देवियाँ भी अपने-अपने वाहन और आयुधों सहित घमासान युद्ध करती हुई आईं।"

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.29.41)

ताभिः सर्वं हतं सैन्यं दानवानां वरायुधैः । रक्तबीजोऽपि राजेन्द्र तरसा विनिपातितः

tābhiḥ sarvaṁ hataṁ sainyaṁ dānavānāṁ varāyudhaiḥ | raktabījo'pi rājendra tarasā vinipātitaḥ

"उन्होंने अपने उत्तम शस्त्रों से दानवों की समस्त सेना का संहार कर दिया, और हे राजेंद्र! रक्तबीज भी तुरंत गिरा दिया गया।"

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.29.42)

एकापि दुःसहा देवी किं पुनस्ताभिरन्विता । सिंहोऽपि हन्ति सङ्ग्रामे राक्षसानमितप्रभः

ekāpi duḥsahā devī kiṁ punastābhiranvitā | siṁho'pi hanti saṅgrāme rākṣasānamitaprabhaḥ

"यह देवी अकेली ही असहनीय है, फिर इनसे युक्त होने पर तो कहना ही क्या! अनंत प्रभावशाली उनका सिंह भी युद्ध में राक्षसों को मार डालता है।"

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.29.43)

अतो विचार्य सचिवैर्यद्युक्तं तद्विधीयताम् । न वैरमनया युक्तं सन्धिरेव सुखप्रदः

ato vicārya sacivairyadyuktaṁ tadvidhīyatām | na vairamanayā yuktaṁ sandhireva sukhapradaḥ

"इसलिए मंत्रियों से विचार करके जो उचित हो वही करें। इससे वैर करना ठीक नहीं, संधि ही सुख देने वाली है।"

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.29.44)

आश्चर्यमेतदखिलं यन्नारी हन्ति राक्षसान् । रक्तबीजोऽपि निहतः पीतं तस्यापि शोणितम्

āścaryametadakhilaṁ yannārī hanti rākṣasān | raktabījo'pi nihataḥ pītaṁ tasyāpi śoṇitam

"यह पूरी बात ही आश्चर्यजनक है कि एक स्त्री राक्षसों का वध कर रही है — रक्तबीज भी मारा गया और उसका रक्त तक पी लिया गया।"

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.29.45)

अन्ये निपातिता दैत्याः सङ्ग्रामेऽम्बिकया नृप । चामुण्डया च मांसं वै भक्षितं सकलं रणे

anye nipātitā daityāḥ saṅgrāme'mbikayā nṛpa | cāmuṇḍayā ca māṁsaṁ vai bhakṣitaṁ sakalaṁ raṇe

"हे नृप! अन्य दैत्य भी अंबिका द्वारा युद्ध में मारे गए, और चामुंडा ने युद्ध में उनका सारा मांस खा लिया।"

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.29.46)

वरं पातालगमनं तस्याः सेवाथवा वरा । न तु युद्धं महाराज कार्यमम्बिकया सह

varaṁ pātālagamanaṁ tasyāḥ sevāthavā varā | na tu yuddhaṁ mahārāja kāryamambikayā saha

"उसके सामने पाताल जाना ही श्रेयस्कर है, या उसकी सेवा करना ही अच्छा है — किंतु हे महाराज! अंबिका के साथ युद्ध करना उचित नहीं।"

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.29.47)

न नारी प्राकृता ह्येषा देवकार्यार्थसाधिनी । मायेयं प्रबला देवी क्षपयन्तीयमुत्थिता

na nārī prākṛtā hyeṣā devakāryārthasādhinī | māyeyaṁ prabalā devī kṣapayantīyamutthitā

"यह कोई साधारण स्त्री नहीं है, यह देवताओं के कार्य की सिद्धि करने वाली है। यह प्रबल देवी माया ही है, विनाश के लिए ही उठ खड़ी हुई है।"

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.29.48)

व्यास उवाच । इति तेषां वचस्तथ्यं श्रुत्वा कालविमोहितः । मुमूर्षुः प्रत्युवाचेदं शुम्भः प्रस्फुरिताधरः

vyāsa uvāca | iti teṣāṁ vacastathyaṁ śrutvā kālavimohitaḥ | mumūrṣuḥ pratyuvācedaṁ śumbhaḥ prasphuritādharaḥ

व्यास जी ने कहा — उनकी यह सत्य बात सुनकर, किंतु काल से मोहित, मरणासन्न शुम्भ ने काँपते होंठों से यह उत्तर दिया।

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.29.49)

शुम्भ उवाच । यूयं गच्छत पातालं शरणं वा भयातुराः । हनिष्याम्यहमद्यैव ताञ्च ताश्च समुद्यतः

śumbha uvāca | yūyaṁ gacchata pātālaṁ śaraṇaṁ vā bhayāturāḥ | haniṣyāmyahamadyaiva tāñca tāśca samudyataḥ

शुम्भ ने कहा — "तुम भयभीत हो तो पाताल जाओ या कहीं शरण लो। मैं आज ही उसे और उन सबको मार डालूँगा, ऐसा निश्चय कर चुका हूँ।"

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.29.50)

जित्वा सर्वान्सुरानाजौ कृत्वा राज्यं सुपुष्कलम् । कथं नारीभयोद्विग्नः पातालं प्रविशाम्यहम्

jitvā sarvānsurānājau kṛtvā rājyaṁ supuṣkalam | kathaṁ nārībhayodvignaḥ pātālaṁ praviśāmyaham

"युद्ध में सभी देवताओं को जीतकर, विशाल राज्य स्थापित करके, मैं एक स्त्री के भय से व्याकुल होकर पाताल कैसे प्रवेश करूँ?"

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.29.51)

निहत्य पार्षदान्सर्वान् रक्तबीजमुखान् रणे । प्राणत्राणाय गच्छामि हित्वा किं विपुलं यशः

nihatya pārṣadānsarvān raktabījamukhān raṇe | prāṇatrāṇāya gacchāmi hitvā kiṁ vipulaṁ yaśaḥ

"रक्तबीज सहित मेरे सभी साथियों को युद्ध में मारा जा चुका है — क्या मैं अपने प्राणों की रक्षा के लिए इतना विशाल यश त्यागकर चला जाऊँ?"

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.29.52)

मरणं त्वनिवार्यं वै प्राणिनां कालकल्पितम् । तद्भयं जन्मनोपात्तं त्यजेत्को दुर्लभं यशः

maraṇaṁ tvanivāryaṁ vai prāṇināṁ kālakalpitam | tadbhayaṁ janmanopāttaṁ tyajetko durlabhaṁ yaśaḥ

"प्राणियों के लिए मृत्यु तो काल द्वारा निश्चित, अनिवार्य ही है; जन्म के साथ ही उसका भय भी प्राप्त होता है — इस भय से दुर्लभ यश कौन त्यागे?"

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.29.53)

निशुम्भाहं गमिष्यामि रथारूढो रणाजिरे । हत्वा तामागमिष्यामि नागमिष्यामि चान्यथा

niśumbhāhaṁ gamiṣyāmi rathārūḍho raṇājire | hatvā tāmāgamiṣyāmi nāgamiṣyāmi cānyathā

"हे निशुम्भ! मैं रथ पर चढ़कर स्वयं युद्धभूमि में जाऊँगा। उसे मारकर ही लौटूँगा, अन्यथा नहीं लौटूँगा।"

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.29.54)

त्वं तु सेनायुतो वीर पार्ष्णिग्राहो भवस्व मे । तरसा तां शरैस्तीक्ष्णैर्नारीं नय यमालये

tvaṁ tu senāyuto vīra pārṣṇigrāho bhavasva me | tarasā tāṁ śaraistīkṣṇairnārīṁ naya yamālaye

"तुम, हे वीर! सेना सहित मेरे पीछे रक्षक बनकर रहो। मैं तीक्ष्ण बाणों से शीघ्र ही उस स्त्री को यमलोक भेज दूँगा।"

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.29.55)

निशुम्भ उवाच । अहमद्य हनिष्यामि गत्वा दुष्टाञ्च कालिकाम् । आगमिष्याम्यहं शीघ्रं गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्

niśumbha uvāca | ahamadya haniṣyāmi gatvā duṣṭāñca kālikām | āgamiṣyāmyahaṁ śīghraṁ gṛhītvā tāmathāmbikām

निशुम्भ ने कहा — "नहीं, मैं ही आज जाकर उस दुष्ट कालिका को मार डालूँगा। मैं शीघ्र ही अंबिका को भी पकड़कर लौट आऊँगा।"

श्लोक 56 (devibhagavatam.5.29.56)

मा चिन्तां कुरु राजेन्द्र वराकायास्तु कारणे । क्वैषा बाला क्व मे बाहुवीर्यं विश्ववशङ्करम्

mā cintāṁ kuru rājendra varākāyāstu kāraṇe | kvaiṣā bālā kva me bāhuvīryaṁ viśvavaśaṅkaram

"हे राजेंद्र! इस तुच्छ के कारण चिंता मत कीजिए। कहाँ यह बाला और कहाँ विश्व को वश में करने वाला मेरा भुजबल!"

श्लोक 57 (devibhagavatam.5.29.57)

त्यक्त्वाऽऽर्तिं विपुलां भ्रातर्भुङ्क्ष भोगाननुत्तमान् । आनयिष्याम्यहं कामं मानिनीं मानसंयुताम्

tyaktvā''rtiṁ vipulāṁ bhrātarbhuṅkṣa bhogānanuttamān | ānayiṣyāmyahaṁ kāmaṁ māninīṁ mānasaṁyutām

"हे भ्राता! अपनी विशाल पीड़ा त्यागकर श्रेष्ठ भोगों का आनंद लीजिए। मैं ही इच्छानुसार उस मानिनी, गर्वीली स्त्री को ले आऊँगा।"

श्लोक 58 (devibhagavatam.5.29.58)

मयि तिष्ठति ते राजन्न युक्तं गमनं रणे । गत्वाहमानयिष्यामि तवार्थे वै जयश्रियम्

mayi tiṣṭhati te rājanna yuktaṁ gamanaṁ raṇe | gatvāhamānayiṣyāmi tavārthe vai jayaśriyam

"हे राजन्! मेरे रहते हुए आपका स्वयं युद्ध में जाना उचित नहीं। मैं जाकर आपके लिए विजय-श्री लाऊँगा।"

श्लोक 59 (devibhagavatam.5.29.59)

व्यास उवाच । इत्युक्त्वा भ्रातरं ज्येष्ठं कनीयान्बलगर्वितः । रथमास्थाय विपुलं सन्नद्धः स्वबलावृतः

vyāsa uvāca | ityuktvā bhrātaraṁ jyeṣṭhaṁ kanīyānbalagarvitaḥ | rathamāsthāya vipulaṁ sannaddhaḥ svabalāvṛtaḥ

व्यास जी ने कहा — अपने बड़े भाई से ऐसा कहकर बल के अभिमान से भरा वह छोटा भाई विशाल रथ पर चढ़कर, सुसज्जित होकर, अपनी सेना से घिरा हुआ —

श्लोक 60 (devibhagavatam.5.29.60)

जगाम तरसा तूर्णं सङ्गरे कृतमङ्गलः । संस्तुतो बन्दिसूतैश्च सायुधः सपरिष्करः

jagāma tarasā tūrṇaṁ saṅgare kṛtamaṅgalaḥ | saṁstuto bandisūtaiśca sāyudhaḥ sapariṣkaraḥ

— मंगल कार्य करके शीघ्रता से युद्ध की ओर चल पड़ा, बंदीजनों और सूतों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ, शस्त्रों और साज-सज्जा से युक्त।

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