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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 31

शुम्भ-वध

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.31.1)

व्यास उवाच । इति तेषां वचः श्रुत्वा शुम्भो दैत्यपतिस्तथा । उवाच सैनिकानाशु कोपाकुलितलोचनः

vyāsa uvāca | iti teṣāṁ vacaḥ śrutvā śumbho daityapatistathā | uvāca sainikānāśu kopākulitalocanaḥ

व्यास जी ने कहा — उनकी यह बात सुनकर दैत्यपति शुम्भ ने क्रोध से व्याकुल नेत्रों से तुरंत सैनिकों से कहा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.31.2)

शुम्भ उवाच । जाल्माः किं श्रूत दुर्वाच्यं कृत्वा जीवितुमुत्सहे । निहत्य सचिवान्भ्रातॄन्निर्लज्जो विचरामि किम्

śumbha uvāca | jālmāḥ kiṁ śrūta durvācyaṁ kṛtvā jīvitumutsahe | nihatya sacivānbhrātṝnnirlajjo vicarāmi kim

शुम्भ ने कहा — "अरे मूर्खो! यह कैसी अपमानजनक बात मुझसे सुनने को कहते हो — मेरे भाई और मंत्रियों को मारे जाने के बाद मैं निर्लज्ज होकर जीवित रहूँ और विचरण करूँ?"

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.31.3)

कालः कर्ता शुभानां वाशुभानां बलवत्तरः । का चिन्ता मम दुर्वारे तस्मिन्नीशेऽप्यरूपके

kālaḥ kartā śubhānāṁ vāśubhānāṁ balavattaraḥ | kā cintā mama durvāre tasminnīśe'pyarūpake

"काल ही शुभ और अशुभ दोनों का कर्ता है, वह सबसे अधिक बलवान है। जब वह अनिवार्य, अरूप ईश्वर स्वयं ही सब कुछ करता है, तो मुझे कैसी चिंता?"

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.31.4)

यद्भवति तद्भवतु यत्करोति करोतु तत् । न मे चिन्तास्ति कुत्रापि मरणाज्जीवनात्तथा

yadbhavati tadbhavatu yatkaroti karotu tat | na me cintāsti kutrāpi maraṇājjīvanāttathā

"जो होना है वह हो, जो करता है वह करे — मुझे मृत्यु से या जीवन से कहीं भी कोई चिंता नहीं है।"

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.31.5)

स कालोऽप्यन्यथाकर्तुं भावितो नेशते क्वचित् । न वर्षति च पर्जन्यः श्रावणे मासि सर्वथा

sa kālo'pyanyathākartuṁ bhāvito neśate kvacit | na varṣati ca parjanyaḥ śrāvaṇe māsi sarvathā

"वह काल भी जो निश्चित हो चुका है, उसे कभी अन्यथा नहीं कर सकता — जैसे श्रावण मास में वर्षा-देव कभी नहीं चूकते।"

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.31.6)

कदाचिन्मार्गशीर्षे वा पौषे माघेऽथ फाल्गुने । अकाले वर्षतीवाशु तस्मान्मुख्यो न चास्त्वयम्

kadācinmārgaśīrṣe vā pauṣe māghe'tha phālgune | akāle varṣatīvāśu tasmānmukhyo na cāstvayam

"किंतु कभी-कभी मार्गशीर्ष, पौष, माघ या फाल्गुन में भी अचानक असमय वर्षा होती है — इसलिए यह मुख्य कारण भी नहीं है।"

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.31.7)

कालो निमित्तमात्रं तु दैवं हि बलवत्तरम् । दैवेन निर्मितं सर्वं नान्यथा भवतीत्यदः

kālo nimittamātraṁ tu daivaṁ hi balavattaram | daivena nirmitaṁ sarvaṁ nānyathā bhavatītyadaḥ

"काल तो केवल निमित्तमात्र है, दैव ही वास्तव में अधिक बलवान है। सब कुछ दैव द्वारा ही निर्मित है, यह अन्यथा नहीं होता — यह निश्चित है।"

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.31.8)

दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम् । जेता यः सर्वदेवानां निशुम्भोऽप्यनया हतः

daivameva paraṁ manye dhikpauruṣamanarthakam | jetā yaḥ sarvadevānāṁ niśumbho'pyanayā hataḥ

"मैं दैव को ही सर्वोपरि मानता हूँ — निष्फल पुरुषार्थ को धिक्कार है! देवताओं का विजेता निशुम्भ भी उसी के द्वारा मारा गया।"

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.31.9)

रक्तबीजो महाशूरः सोऽपि नाशं गतो यदा । तदाहं कीर्तिमुत्सृज्य जीविताशां करोमि किम्

raktabījo mahāśūraḥ so'pi nāśaṁ gato yadā | tadāhaṁ kīrtimutsṛjya jīvitāśāṁ karomi kim

"जब महाशूर रक्तबीज भी नष्ट हो गया, तब मैं अपनी कीर्ति त्यागकर जीवित रहने की आशा क्यों करूँ?"

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.31.10)

प्राप्ते काले स्वयं ब्रह्मा परार्धद्वयसम्मिते । निधनं याति तरसा जगत्कर्ता स्वयं प्रभुः

prāpte kāle svayaṁ brahmā parārdhadvayasammite | nidhanaṁ yāti tarasā jagatkartā svayaṁ prabhuḥ

"उचित समय आने पर स्वयं ब्रह्मा भी, जिनकी आयु दो परार्ध है, इस जगत के रचयिता, स्वयं प्रभु भी तुरंत मृत्यु को प्राप्त होते हैं।"

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.31.11)

चतुर्युगसहस्रं तु ब्रह्मणो दिवसे किल । पतन्ति भवनात्पञ्च नव चेन्द्रास्तथा पुनः

caturyugasahasraṁ tu brahmaṇo divase kila | patanti bhavanātpañca nava cendrāstathā punaḥ

"ब्रह्मा के एक दिन में, जो चार युगों के हजार चक्रों के बराबर है, चौदह इंद्र अपने पद से गिर जाते हैं।"

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.31.12)

तथैव द्विगुणे विष्णुर्मरणायोपकल्पते । तथैव द्विगुणे काले शङ्करः शान्तिमेति च

tathaiva dviguṇe viṣṇurmaraṇāyopakalpate | tathaiva dviguṇe kāle śaṅkaraḥ śāntimeti ca

"उससे दुगुने समय में विष्णु भी मृत्यु को प्राप्त होते हैं, और उतने ही दुगुने काल में शंकर भी शांति (लय) को प्राप्त होते हैं।"

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.31.13)

का चिन्ता मरणे मूढा निश्चले दैवनिर्मिते । मही महीधराणाञ्च नाशः सूर्यशशाङ्कयोः

kā cintā maraṇe mūḍhā niścale daivanirmite | mahī mahīdharāṇāñca nāśaḥ sūryaśaśāṅkayoḥ

"हे मूर्ख मन! दैव द्वारा निर्धारित, अटल मृत्यु की क्या चिंता? पृथ्वी और पर्वत भी नष्ट होते हैं, सूर्य और चंद्रमा का भी नाश होता है।"

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.31.14)

जातस्य हि ध्रुवं मृत्युर्धुवं जन्म मृतस्य च । अध्रुवेऽस्मिञ्छरीरे तु रक्षणीयं यशः स्थिरम्

jātasya hi dhruvaṁ mṛtyurdhuvaṁ janma mṛtasya ca | adhruve'smiñcharīre tu rakṣaṇīyaṁ yaśaḥ sthiram

"जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है, और मृत का जन्म भी निश्चित है। इस अस्थिर शरीर में केवल स्थिर यश की ही रक्षा करनी चाहिए।"

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.31.15)

रथो मे कल्प्यतां शीघ्रं गमिष्यामि रणाजिरे । जयो वा मरणं वापि भवत्वद्यैव दैवतः

ratho me kalpyatāṁ śīghraṁ gamiṣyāmi raṇājire | jayo vā maraṇaṁ vāpi bhavatvadyaiva daivataḥ

"मेरा रथ शीघ्र तैयार किया जाए, मैं युद्धभूमि में जाऊँगा। आज ही, दैव के अनुसार, विजय हो या मृत्यु।"

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.31.16)

इत्युक्त्वा सैनिकाञ्छुम्भो रथमास्थाय सत्वरः । प्रययावम्बिका यत्र संस्थिता तु हिमाचले

ityuktvā sainikāñchumbho rathamāsthāya satvaraḥ | prayayāvambikā yatra saṁsthitā tu himācale

सैनिकों से यह कहकर शुम्भ शीघ्रता से रथ पर चढ़कर वहाँ चल पड़ा जहाँ अंबिका हिमाचल पर स्थित थीं।

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.31.17)

सैन्यं प्रचलितं तस्य सङ्गे तत्र चतुर्विधम् । हस्त्यश्वरथपादातिसंयुतं सायुधं बहु

sainyaṁ pracalitaṁ tasya saṅge tatra caturvidham | hastyaśvarathapādātisaṁyutaṁ sāyudhaṁ bahu

उसके साथ चार प्रकार की, हाथी-घोड़े-रथ-पैदल सैनिकों से युक्त, विशाल शस्त्रधारी सेना चल पड़ी।

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.31.18)

तत्र गत्वाचले शुम्भः संस्थितां जगदम्बिकाम् । त्रैलोक्यमोहिनीं कान्तामपश्यत्सिंहवाहिनीम्

tatra gatvācale śumbhaḥ saṁsthitāṁ jagadambikām | trailokyamohinīṁ kāntāmapaśyatsiṁhavāhinīm

वहाँ पर्वत पर जाकर शुम्भ ने त्रिलोक को मोहित करने वाली, सिंहवाहिनी, स्थित जगदंबिका को देखा —

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.31.19)

सर्वाभरणभूषाढ्यां सर्वलक्षणसंवृताम् । स्तूयमानां सुरैः खस्थैर्गन्धर्वयक्षकिन्नरैः

sarvābharaṇabhūṣāḍhyāṁ sarvalakṣaṇasaṁvṛtām | stūyamānāṁ suraiḥ khasthairgandharvayakṣakinnaraiḥ

— समस्त आभूषणों से सुसज्जित, समस्त शुभ लक्षणों से युक्त, आकाश में स्थित देवताओं तथा गंधर्व-यक्ष-किन्नरों द्वारा स्तुति की जाती हुई —

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.31.20)

पुष्पैश्च पूज्यमानाञ्च मन्दारपादपोद्भवैः । कुर्वाणां शङ्खनिनदं घण्टानादं मनोहरम्

puṣpaiśca pūjyamānāñca mandārapādapodbhavaiḥ | kurvāṇāṁ śaṅkhaninadaṁ ghaṇṭānādaṁ manoharam

— कल्पवृक्ष से उत्पन्न पुष्पों से पूजित, मनोहर शंखनाद और घंटानाद करती हुई।

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.31.21)

दृष्ट्वा तां मोहमगमच्छुम्भः कामविमोहितः । पञ्चबाणाहतः कामं मनसा समचिन्तयत्

dṛṣṭvā tāṁ mohamagamacchumbhaḥ kāmavimohitaḥ | pañcabāṇāhataḥ kāmaṁ manasā samacintayat

उन्हें देखकर काम से विमोहित शुम्भ मोहग्रस्त हो गया, और पंचबाणों से आहत होकर मन में इस प्रकार सोचने लगा —

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.31.22)

अहो रूपमिदं सम्यगहो चातुर्यमद्भुतम् । सौकुमार्यञ्ज धैर्यञ्च परस्परविरोधि यत्

aho rūpamidaṁ samyagaho cāturyamadbhutam | saukumāryañja dhairyañca parasparavirodhi yat

"अहा! यह रूप कितना सुंदर है! अहा! यह चातुर्य कितना अद्भुत है! सुकुमारता और धैर्य दोनों, जो परस्पर विरोधी हैं, यहाँ एक साथ हैं!"

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.31.23)

सुकुमारातितन्वङ्गी सद्यः प्रकटयौवना । चित्रमेतदसौ बाला कामभावविवर्जिता

sukumārātitanvaṅgī sadyaḥ prakaṭayauvanā | citrametadasau bālā kāmabhāvavivarjitā

"अत्यंत सुकुमार, तन्वंगी, सद्यः प्रकट यौवना — यह विचित्र है कि यह बाला कामभाव से पूर्णतः रहित है!"

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.31.24)

कामकान्तासमा रूपे सर्वलक्षणलक्षिता । अम्बिकेयं किमेतत्तु हन्ति सर्वान्महाबलान्

kāmakāntāsamā rūpe sarvalakṣaṇalakṣitā | ambikeyaṁ kimetattu hanti sarvānmahābalān

"रूप में साक्षात् कामपत्नी रति के समान, समस्त लक्षणों से युक्त — क्या यह अंबिका ही है जो इन सब महाबलियों का वध कर रही है?"

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.31.25)

उपायः कोऽत्र कर्तव्यो येन मे वशगा भवेत् । न मन्त्रा वा मरालाक्षीसाधने सन्निधौ मम

upāyaḥ ko'tra kartavyo yena me vaśagā bhavet | na mantrā vā marālākṣīsādhane sannidhau mama

"यहाँ ऐसा क्या उपाय करूँ जिससे यह मेरे वश में हो जाए? मेरे सामने न मंत्र और न कोई अन्य साधन इस राजहंसनयना पर काम करता है।"

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.31.26)

सर्वमन्त्रमयी ह्येषा मोहिनी मदगर्विता । सुन्दरीयं कथं मे स्याद्वशगा वरवर्णिनी

sarvamantramayī hyeṣā mohinī madagarvitā | sundarīyaṁ kathaṁ me syādvaśagā varavarṇinī

"यह तो स्वयं समस्त मंत्रों की स्वरूपिणी, मोहिनी और मदगर्विता है। यह सुंदरी, यह वरवर्णिनी मेरे वश में कैसे होगी?"

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.31.27)

पातालगमनं मेऽद्य न युक्तं समराङ्गणात् । सामदानविभेदैश्च नेयं साध्या महाबला

pātālagamanaṁ me'dya na yuktaṁ samarāṅgaṇāt | sāmadānavibhedaiśca neyaṁ sādhyā mahābalā

"अभी युद्धभूमि से पाताल जाना मेरे लिए उचित नहीं। यह महाबला साम, दान और भेद से भी साध्य नहीं है।"

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.31.28)

किं कर्तव्यं च गन्तव्यं विषमे समुपस्थिते । मरणं नोत्तमं चात्र स्त्रीकृतं तु यशोऽपहृत्

kiṁ kartavyaṁ ca gantavyaṁ viṣame samupasthite | maraṇaṁ nottamaṁ cātra strīkṛtaṁ tu yaśo'pahṛt

"अब क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, जब यह विषम स्थिति सामने आ खड़ी है? यहाँ मृत्यु भी उत्तम नहीं, किंतु स्त्री द्वारा छीना गया यश तो —"

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.31.29)

मरणमृषिभिः प्रोक्तं सङ्गरे मङ्गलास्पदम् । यत्तत्समानबलयोर्योधयोर्युध्यतोः किल

maraṇamṛṣibhiḥ proktaṁ saṅgare maṅgalāspadam | yattatsamānabalayoryodhayoryudhyatoḥ kila

"— ऋषियों ने युद्ध में मृत्यु को ही मंगल का स्थान बताया है, किंतु यह तभी सत्य है जब समान बलवाले दो योद्धा आपस में युद्ध करें।"

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.31.30)

प्राप्तेयं दैवरचिता नारी नरशतोत्तमा । नाशायास्मत्कुलस्येह सर्वथातिबलाबला

prāpteyaṁ daivaracitā nārī naraśatottamā | nāśāyāsmatkulasyeha sarvathātibalābalā

"यह स्त्री, सैकड़ों पुरुषों से श्रेष्ठ, दैव द्वारा रची गई है, आई है — यद्यपि निर्बल जान पड़ती है, वस्तुतः अत्यंत बलशाली है, हमारे कुल के नाश के लिए।"

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.31.31)

वृथा किं सामवाक्यानि मया योज्यानि साम्प्रतम् । हननायागता ह्येषा किं नु साम्ना प्रसीदति

vṛthā kiṁ sāmavākyāni mayā yojyāni sāmpratam | hananāyāgatā hyeṣā kiṁ nu sāmnā prasīdati

"अब व्यर्थ ही मैं सामवचन क्यों प्रयुक्त करूँ? यह तो मारने के लिए ही आई है — क्या साम से यह प्रसन्न होगी?"

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.31.32)

न दानैश्चालितुं योग्या नानाशस्त्रविभूषिता । भेदस्तु विफलः कामं सर्वदेववशानुगा

na dānaiścālituṁ yogyā nānāśastravibhūṣitā | bhedastu viphalaḥ kāmaṁ sarvadevavaśānugā

"दानों से भी यह विचलित होने योग्य नहीं, अनेक शस्त्रों से विभूषित है; भेद भी निश्चय ही निष्फल होगा, क्योंकि यह सभी देवताओं के वश में है।"

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.31.33)

तस्मात्तु मरणं श्रेयो न सङ्ग्रामे पलायनम् । जयो वा मरणं वाद्य भवत्वेव यथाविधि

tasmāttu maraṇaṁ śreyo na saṅgrāme palāyanam | jayo vā maraṇaṁ vādya bhavatveva yathāvidhi

"इसलिए मृत्यु ही श्रेयस्कर है, युद्ध से पलायन नहीं। आज विजय हो या मृत्यु, जैसा विधान हो वैसा ही हो।"

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.31.34)

व्यास उवाच । इति सञ्चिन्त्य मनसा शुम्भः सत्त्वाश्रितोऽभवत् । युद्धाय सुस्थिरो भूत्वा तामुवाच पुरःस्थिताम्

vyāsa uvāca | iti sañcintya manasā śumbhaḥ sattvāśrito'bhavat | yuddhāya susthiro bhūtvā tāmuvāca puraḥsthitām

व्यास जी ने कहा — मन में ऐसा विचार करके शुम्भ अपने साहस का आश्रय लेकर, युद्ध के लिए स्थिर होकर सामने खड़ी उस देवी से बोला।

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.31.35)

देवि युध्यस्व कान्तेऽद्य मृथायं ते परिश्रमः । मूर्खासि किल नारीणां नायं धर्मः कदाचन

devi yudhyasva kānte'dya mṛthāyaṁ te pariśramaḥ | mūrkhāsi kila nārīṇāṁ nāyaṁ dharmaḥ kadācana

"हे देवी! हे कांते! आज युद्ध कर लो, यह तुम्हारा व्यर्थ का परिश्रम है। तुम मूर्ख हो — यह स्त्रियों का धर्म कभी नहीं है।"

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.31.36)

नारीणां लोचने बाणा भ्रुवावेव शरासनम् । हावभावास्तु शस्त्राणि पुमाँल्लक्ष्यं विचक्षणः

nārīṇāṁ locane bāṇā bhruvāveva śarāsanam | hāvabhāvāstu śastrāṇi pumā~llakṣyaṁ vicakṣaṇaḥ

"स्त्रियों के नेत्र ही बाण हैं, भौंहें ही धनुष हैं। हाव-भाव ही उनके शस्त्र हैं, और चतुर पुरुष ही उनका लक्ष्य है।"

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.31.37)

सन्नाहश्चाङ्गरागोऽत्र रथश्चापि मनोरथः । मन्दप्रजल्पितं भेरीशब्दो नान्यः कदाचन

sannāhaścāṅgarāgo'tra rathaścāpi manorathaḥ | mandaprajalpitaṁ bherīśabdo nānyaḥ kadācana

"उनका कवच अंगराग है, उनका रथ मनोरथ है। उनकी मंद बातचीत ही भेरी की ध्वनि है, अन्य कुछ नहीं।"

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.31.38)

अन्यास्त्रधारणं स्त्रीणां विडम्बनमसंशयम् । लज्जैव भूषणं कान्ते न च धार्ष्ट्यं कदाचन

anyāstradhāraṇaṁ strīṇāṁ viḍambanamasaṁśayam | lajjaiva bhūṣaṇaṁ kānte na ca dhārṣṭyaṁ kadācana

"स्त्रियों का अन्य शस्त्र धारण करना निस्संदेह उपहास ही है। हे कांते! लज्जा ही आभूषण है, धृष्टता कभी नहीं।"

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.31.39)

युध्यमाना वरा नारी कर्कशेवाभिदृश्यते । स्तनौ सङ्गोपनीयौ वा धनुषः कर्षणे कथम्

yudhyamānā varā nārī karkaśevābhidṛśyate | stanau saṅgopanīyau vā dhanuṣaḥ karṣaṇe katham

"युद्ध करती हुई श्रेष्ठ स्त्री कठोर सी दिखती है — और धनुष खींचते समय भला स्तन कैसे ढँके जा सकते हैं?"

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.31.40)

क्व मन्दगमनं कुत्र गदामादाय धावनम् । बुद्धिदा कालिका तेऽत्र चामुण्डा परनायिका

kva mandagamanaṁ kutra gadāmādāya dhāvanam | buddhidā kālikā te'tra cāmuṇḍā paranāyikā

"कहाँ वह मंद चाल, और कहाँ गदा उठाकर दौड़ना! तुम्हें यह बुद्धि कालिका या चामुंडा नामक नेत्री ने ही दी होगी।"

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.31.41)

चण्डिका मन्त्रमध्यस्था लालनेऽसुस्वरा शिवा । वाहनं मृगराडास्ते सर्वसत्त्वभयङ्करः

caṇḍikā mantramadhyasthā lālane'susvarā śivā | vāhanaṁ mṛgarāḍāste sarvasattvabhayaṅkaraḥ

"चंडिका मंत्रों के मध्य रहने वाली, लाड़ में भी कर्कश स्वर वाली, अशुभ शिवा है; इसका वाहन सिंह सभी प्राणियों को भयभीत करने वाला है।"

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.31.42)

वीणानादं परित्यज्य घण्टानादं करोषि यत् । रूपयौवनयोः सर्वं विरोधि वरवर्णिनि

vīṇānādaṁ parityajya ghaṇṭānādaṁ karoṣi yat | rūpayauvanayoḥ sarvaṁ virodhi varavarṇini

"वीणा की ध्वनि छोड़कर तुम घंटानाद कर रही हो — हे वरवर्णिनी! यह सब तुम्हारे रूप और यौवन के सर्वथा विपरीत है।"

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.31.43)

यदि ते सङ्गरेच्छास्ति कुरूपा भव भामिनि । लम्बोष्ठी कुनखी क्रूरा ध्वाङ्क्षवर्णा विलोचना

yadi te saṅgarecchāsti kurūpā bhava bhāmini | lamboṣṭhī kunakhī krūrā dhvāṅkṣavarṇā vilocanā

"यदि युद्ध की इच्छा हो तो, हे भामिनी! पहले कुरूपा बन जाओ — लटकते होंठ, कुरूप नाखून, क्रूर, कौवे के रंग वाली, विकृत नेत्रों वाली —"

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.31.44)

लम्बपादा कुदन्ती च मार्जारनयनाकृतिः । ईदृशं रूपमास्थाय तिष्ठ युद्धे स्थिरा भव

lambapādā kudantī ca mārjāranayanākṛtiḥ | īdṛśaṁ rūpamāsthāya tiṣṭha yuddhe sthirā bhava

"— लटकते पैरों वाली, टेढ़े दाँतों वाली, बिल्ली जैसी आँखों वाली। ऐसा रूप धारण करके ही युद्ध में स्थिर रहो।"

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.31.45)

कर्कशं वचनं ब्रूहि ततो युद्धं करोम्यहम् । ईदृशीं सुदतीं दृष्ट्वा न मे पाणिः प्रसीदति

karkaśaṁ vacanaṁ brūhi tato yuddhaṁ karomyaham | īdṛśīṁ sudatīṁ dṛṣṭvā na me pāṇiḥ prasīdati

"कठोर वचन बोलो, तभी मैं युद्ध करूँगा। इस प्रकार सुंदर दाँतों वाली को देखकर मेरा हाथ प्रसन्न नहीं होता —"

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.31.46)

हन्तुं त्वां मृगशावाक्षि कामकान्तोपमे मृधे । व्यास उवाच । इति ब्रुवाणं कामार्तं वीक्ष्य तं जगदम्बिका

hantuṁ tvāṁ mṛgaśāvākṣi kāmakāntopame mṛdhe | vyāsa uvāca | iti bruvāṇaṁ kāmārtaṁ vīkṣya taṁ jagadambikā

"— हे मृगशावाक्षि, कामदेव की प्रिया के समान इस युद्ध में तुम्हें मारने के लिए।" व्यास जी ने कहा — कामातुर होकर ऐसा बोलते हुए उसे देखकर जगदंबिका ने —

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.31.47)

स्मितपूर्वमिदं वाक्यमुवाच भरतोत्तम । देव्युवाच । किं विषीदसि मन्दात्मन् कामबाणविमोहितः

smitapūrvamidaṁ vākyamuvāca bharatottama | devyuvāca | kiṁ viṣīdasi mandātman kāmabāṇavimohitaḥ

— हे भरतश्रेष्ठ! मुस्कुराते हुए यह वचन कहा। देवी ने कहा — "हे मंदात्मन्! कामबाण से मोहित होकर क्यों विषाद कर रहे हो?"

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.31.48)

प्रेक्षिकाहं स्थिता मूढ कुरु कालिकया मृधम् । चामुण्डया वा कुर्वेते तव योग्ये रणाङ्गणे

prekṣikāhaṁ sthitā mūḍha kuru kālikayā mṛdham | cāmuṇḍayā vā kurvete tava yogye raṇāṅgaṇe

"हे मूर्ख! मैं तो यहाँ केवल दर्शक बनकर खड़ी हूँ। कालिका से युद्ध करो, या चामुंडा से — रणभूमि में वे ही तुम्हारे योग्य हैं।"

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.31.49)

प्रहरस्व यथाकामं नाहं त्वां योद्धमुत्सहे । इत्युक्त्वा कालिकां प्राह देवी मधुरया गिरा

praharasva yathākāmaṁ nāhaṁ tvāṁ yoddhamutsahe | ityuktvā kālikāṁ prāha devī madhurayā girā

"जैसी इच्छा हो वैसे प्रहार करो, मैं तुमसे युद्ध करने की इच्छा नहीं रखती।" ऐसा कहकर देवी ने मधुर वाणी में कालिका से कहा —

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.31.50)

जह्येनं कालिके क्रूरे कुरूपप्रियमाहवे । व्यास उवाच । इत्युक्ता कालिका कालप्रेरिता कालरूपिणी

jahyenaṁ kālike krūre kurūpapriyamāhave | vyāsa uvāca | ityuktā kālikā kālapreritā kālarūpiṇī

"हे क्रूर कालिके! कुरूपता को प्रिय मानने वाले इस युद्ध-प्रेमी को समाप्त कर दो।" व्यास जी ने कहा — इस प्रकार आदेश दिए जाने पर काल-प्रेरित, कालरूपिणी कालिका ने —

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.31.51)

गदां प्रगृह्य तरसा तस्थावाजौ कृतोद्यमा । तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयानकम्

gadāṁ pragṛhya tarasā tasthāvājau kṛtodyamā | tayoḥ parasparaṁ yuddhaṁ babhūvātibhayānakam

— तुरंत अपनी गदा उठाकर युद्ध के लिए दृढ़ता से खड़ी हो गई। उन दोनों में परस्पर अत्यंत भयंकर युद्ध होने लगा।

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.31.52)

पश्यतां सर्वदेवानां मुनीनाञ्च महात्मनाम् । गदामुद्यम्य शुम्भोऽथ जघान कालिकां रणे

paśyatāṁ sarvadevānāṁ munīnāñca mahātmanām | gadāmudyamya śumbho'tha jaghāna kālikāṁ raṇe

समस्त देवताओं और महात्मा मुनियों के देखते-देखते शुम्भ ने गदा उठाकर युद्ध में कालिका पर प्रहार किया।

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.31.53)

कालिका दैत्यराजानं गदया न्यहनद् भृशम् । बभञ्जास्य रथं चण्डी गदया कनकोज्ज्वलम्

kālikā daityarājānaṁ gadayā nyahanad bhṛśam | babhañjāsya rathaṁ caṇḍī gadayā kanakojjvalam

कालिका ने भी दैत्यराज पर गदा से भीषण प्रहार किया, और चंडी ने अपनी गदा से उसका सुवर्णजड़ित रथ तोड़ डाला।

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.31.54)

खरान्हत्वा जघानाशु दारुकं दारुणस्वना । स पदातिर्गदां गुर्वीं समादाय क्रुधान्वितः

kharānhatvā jaghānāśu dārukaṁ dāruṇasvanā | sa padātirgadāṁ gurvīṁ samādāya krudhānvitaḥ

भयंकर स्वर वाली उस देवी ने उसके गधों को मारकर तुरंत सारथी दारुक को भी मार डाला। पैदल होकर, क्रोधित शुम्भ भारी गदा लेकर —

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.31.55)

कालिकाभुजयोर्मध्ये प्रहसन्नहनत्तदा । वञ्चयित्वा गदाघातं खड्गमादाय सत्वरा

kālikābhujayormadhye prahasannahanattadā | vañcayitvā gadāghātaṁ khaḍgamādāya satvarā

— हँसते हुए कालिका की दोनों भुजाओं के बीच प्रहार किया; तब वे तुरंत गदा के प्रहार को टालकर खड्ग उठाकर —

श्लोक 56 (devibhagavatam.5.31.56)

चिच्छेदास्य भुजं सव्यं सायुधं चन्दनार्चितम् । स छिन्नबाहुर्विरथो गदापाणिः परिप्लुतः

cicchedāsya bhujaṁ savyaṁ sāyudhaṁ candanārcitam | sa chinnabāhurviratho gadāpāṇiḥ pariplutaḥ

— चंदन से सुशोभित, शस्त्र सहित उसकी बाईं भुजा काट डाली। भुजा कटने पर, रथहीन होकर, गदा हाथ में लिए वह इधर-उधर उछलने लगा।

श्लोक 57 (devibhagavatam.5.31.57)

अचिरेण समागम्य कालिकामहनत्तदा । काली च करवालेन भुजं तस्याथ दक्षिणम्

acireṇa samāgamya kālikāmahanattadā | kālī ca karavālena bhujaṁ tasyātha dakṣiṇam

वह शीघ्र ही आगे बढ़कर पुनः कालिका पर प्रहार करने लगा; तब काली ने अपनी तलवार से उसकी दाहिनी भुजा भी —

श्लोक 58 (devibhagavatam.5.31.58)

चिच्छेद प्रहसन्ती सा सगदं किल साङ्गदम् । कर्तुं पादप्रहारं स कुपितः प्रययौ जवात्

ciccheda prahasantī sā sagadaṁ kila sāṅgadam | kartuṁ pādaprahāraṁ sa kupitaḥ prayayau javāt

— हँसते हुए, गदा और बाजूबंद सहित काट डाली। तब क्रुद्ध होकर वह पैर से प्रहार करने के लिए तेजी से दौड़ा।

श्लोक 59 (devibhagavatam.5.31.59)

काली चिच्छेद चरणौ खड्गेनास्य त्वरान्विता । सच्छिन्नकरपादोऽपि तिष्ठ तिष्ठेति च ब्रुवन्

kālī ciccheda caraṇau khaḍgenāsya tvarānvitā | sacchinnakarapādo'pi tiṣṭha tiṣṭheti ca bruvan

काली ने तत्परता से अपनी तलवार से उसके दोनों पैर भी काट डाले; हाथ-पैर कटे होने पर भी वह "ठहर, ठहर" कहते हुए —

श्लोक 60 (devibhagavatam.5.31.60)

धावमानो ययावाशु कालिकां भीषयन्निव । तमागच्छन्तमालोक्य कालिका कमलोपमम्

dhāvamāno yayāvāśu kālikāṁ bhīṣayanniva | tamāgacchantamālokya kālikā kamalopamam

— दौड़ता हुआ शीघ्र कालिका की ओर बढ़ा, मानो उन्हें भयभीत करने का प्रयास कर रहा हो। उसे इस तरह आते देखकर कमल के समान नेत्रों वाली कालिका ने —

श्लोक 61 (devibhagavatam.5.31.61)

चकर्त मस्तकं कण्ठाद्रुधिरौघवहं भृशम् । छिन्नेऽसौ मस्तके भूमौ पपात गिरिसन्निभः

cakarta mastakaṁ kaṇṭhādrudhiraughavahaṁ bhṛśam | chinne'sau mastake bhūmau papāta girisannibhaḥ

— उसकी गर्दन से सिर काट डाला, जिससे रक्त की धारा बह निकली। सिर कटने पर वह पर्वत के समान भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 62 (devibhagavatam.5.31.62)

प्राणा विनिर्ययुस्तस्य देहादुत्क्रम्य सत्वरम् । गतासुं पतितं दैत्यं दृष्ट्वा देवाः सवासवाः

prāṇā viniryayustasya dehādutkramya satvaram | gatāsuṁ patitaṁ daityaṁ dṛṣṭvā devāḥ savāsavāḥ

उसके प्राण शीघ्र ही शरीर से निकल गए। उस प्राणहीन गिरे हुए दैत्य को देखकर इंद्र सहित देवताओं ने —

श्लोक 63 (devibhagavatam.5.31.63)

तुष्टुवुस्तां तदा देवीं चामुण्डां कालिकां तथा । ववुर्वाताः शिवास्तत्र दिशश्च विमला भृशम्

tuṣṭuvustāṁ tadā devīṁ cāmuṇḍāṁ kālikāṁ tathā | vavurvātāḥ śivāstatra diśaśca vimalā bhṛśam

— उस देवी, चामुंडा और कालिका की स्तुति की। वहाँ शीतल, शुभ हवाएँ बहने लगीं और दिशाएँ अत्यंत निर्मल हो गईं।

श्लोक 64 (devibhagavatam.5.31.64)

बभूवुश्चाग्नयो होमे प्रदक्षिणशिखाः शुभाः । हतशेषाश्च ये दैत्याः प्रणम्य जगदम्बिकाम्

babhūvuścāgnayo home pradakṣiṇaśikhāḥ śubhāḥ | hataśeṣāśca ye daityāḥ praṇamya jagadambikām

यज्ञ में अग्नियाँ शुभ, दक्षिणावर्त शिखाओं से युक्त होकर प्रज्वलित हुईं; और जो दैत्य वध से शेष बचे थे, वे जगदंबिका को प्रणाम करके —

श्लोक 65 (devibhagavatam.5.31.65)

त्यक्त्वाऽऽयुधानि ते सर्वे पातालं प्रययुर्नृप । एतत्ते सर्वमाख्यातं देव्याश्चरितमुत्तमम्

tyaktvā''yudhāni te sarve pātālaṁ prayayurnṛpa | etatte sarvamākhyātaṁ devyāścaritamuttamam

— सभी शस्त्र त्यागकर, हे राजन्! पाताल को चले गए। यह देवी का सर्वोत्तम चरित्र मैंने आपको पूर्णतः सुना दिया।

श्लोक 66 (devibhagavatam.5.31.66)

शुम्भादीनां वधं चैव सुराणां रक्षणं तथा । एतदाख्यानकं सर्वं पठन्ति भुवि मानवाः

śumbhādīnāṁ vadhaṁ caiva surāṇāṁ rakṣaṇaṁ tathā | etadākhyānakaṁ sarvaṁ paṭhanti bhuvi mānavāḥ

जो भी मनुष्य पृथ्वी पर शुम्भ आदि के वध और देवताओं की रक्षा के इस संपूर्ण आख्यान को पढ़ते हैं —

श्लोक 67 (devibhagavatam.5.31.67)

शृण्वन्ति च सदा भक्त्या ते कृतार्था भवन्ति हि । अपुत्रो लभते पुत्रान्निर्धनश्च धनं बहु

śṛṇvanti ca sadā bhaktyā te kṛtārthā bhavanti hi | aputro labhate putrānnirdhanaśca dhanaṁ bahu

— या सदा भक्तिपूर्वक सुनते हैं, वे कृतार्थ हो जाते हैं; पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होते हैं, निर्धन को प्रचुर धन प्राप्त होता है।

श्लोक 68 (devibhagavatam.5.31.68)

रोगी च मुच्यते रोगात्सर्वान्कामानवाप्नुयात् । शत्रुतो न भयं तस्य य इदं चरितं शुभम् । शृणोति पठते नित्यं मुक्तिमाञ्जायते नरः

rogī ca mucyate rogātsarvānkāmānavāpnuyāt | śatruto na bhayaṁ tasya ya idaṁ caritaṁ śubham | śṛṇoti paṭhate nityaṁ muktimāñjāyate naraḥ

रोगी रोग से मुक्त हो जाता है, और समस्त कामनाएँ प्राप्त करता है; शत्रु से उसे कोई भय नहीं रहता — जो मनुष्य इस शुभ चरित्र को सदा सुनता या पढ़ता है, वह मुक्ति को प्राप्त होता है।

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