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पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 8

देवी के स्वरूप का प्राकट्य

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (devibhagavatam.5.8.1)

व्यास उवाच । तरसा तेऽथ सम्प्राप्य वैकुण्ठं विष्णुवल्लभम् । ददृशुः सर्वशोभाढ्यं दिव्यसद्मविराजितम्

vyāsa uvāca | tarasā te'tha samprāpya vaikuṇṭhaṁ viṣṇuvallabham | dadṛśuḥ sarvaśobhāḍhyaṁ divyasadmavirājitam

व्यास जी ने कहा — वे शीघ्र ही विष्णु के प्रिय धाम वैकुण्ठ में पहुँचे, और उसे सम्पूर्ण शोभा से समृद्ध, दिव्य भवनों से सुशोभित देखा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.5.8.2)

सरोवापीसरिद्भिश्च संयुतं सुखदं शुभम् । हंससारसचक्राह्वैः कूजद्भिश्च विराजितम्

sarovāpīsaridbhiśca saṁyutaṁ sukhadaṁ śubham | haṁsasārasacakrāhvaiḥ kūjadbhiśca virājitam

— जो सरोवरों, बावड़ियों और नदियों से युक्त, सुखदायक तथा शुभ था; और हंस, सारस तथा चक्रवाक पक्षियों के कलरव से सुशोभित था।

श्लोक 3 (devibhagavatam.5.8.3)

चम्पकाशोककह्लारमन्दारबकुलावृतैः । मल्लिकातिलकाम्रातयुतैः कुरबकादिभिः

campakāśokakahlāramandārabakulāvṛtaiḥ | mallikātilakāmrātayutaiḥ kurabakādibhiḥ

— चम्पा, अशोक, कह्लार, मन्दार तथा बकुल वृक्षों से घिरा, तथा मल्लिका, तिलक, आम्र और कुरबक आदि से युक्त।

श्लोक 4 (devibhagavatam.5.8.4)

कोकिलारावसन्नादैः शिखण्डैर्नृत्यरञ्जितैः । भ्रमरारावरम्यैश्च दिव्यैरुपवनैर्युतम्

kokilārāvasannādaiḥ śikhaṇḍairnṛtyarañjitaiḥ | bhramarārāvaramyaiśca divyairupavanairyutam

— कोकिलों की मधुर कूक से गुंजायमान, नाचते हुए मयूरों से सुशोभित, तथा भ्रमरों के गुंजार से रमणीय दिव्य उपवनों से युक्त था।

श्लोक 5 (devibhagavatam.5.8.5)

सुनन्दनन्दनाद्यैश्च पार्षदैर्भक्तितत्परैः । संस्तुवद्भिर्युतं भक्तैरनन्यभववृत्तिभिः

sunandanandanādyaiśca pārṣadairbhaktitatparaiḥ | saṁstuvadbhiryutaṁ bhaktairananyabhavavṛttibhiḥ

— सुनन्द, नन्दन आदि भक्तिपरायण पार्षदों से युक्त, जो अनन्यभाव से स्तुति करते थे तथा जिनकी सम्पूर्ण वृत्ति उन्हीं में लीन थी।

श्लोक 6 (devibhagavatam.5.8.6)

प्रासादै रत्नखचितैः काञ्चनैश्चित्रमण्डितैः । अभ्रंलिहैर्विराजद्भिः संयुतं शुभसद्मकैः

prāsādai ratnakhacitaiḥ kāñcanaiścitramaṇḍitaiḥ | abhraṁlihairvirājadbhiḥ saṁyutaṁ śubhasadmakaiḥ

— रत्नजड़ित, स्वर्णिम, विचित्र चित्रों से अलंकृत, आकाश को छूते हुए, शुभ भवनों से सुशोभित था।

श्लोक 7 (devibhagavatam.5.8.7)

गायद्भिर्देवगन्धर्वैर्नृत्यद्भिरप्सरोगणैः । रञ्जितं किन्नरैः शश्वद्रक्तकण्ठेर्मनोहरैः

gāyadbhirdevagandharvairnṛtyadbhirapsarogaṇaiḥ | rañjitaṁ kinnaraiḥ śaśvadraktakaṇṭhermanoharaiḥ

— गाते हुए देवगन्धर्वों, नाचती हुई अप्सराओं तथा सदैव मधुर-कण्ठ वाले, मनोहर किन्नरों से रम्य था।

श्लोक 8 (devibhagavatam.5.8.8)

मुनिभिश्च तथा शान्तैर्वेदपाठकृतादरैः । स्तुवद्भिः श्रुतिसूक्तैश्च मण्डितं सदनं हरेः

munibhiśca tathā śāntairvedapāṭhakṛtādaraiḥ | stuvadbhiḥ śrutisūktaiśca maṇḍitaṁ sadanaṁ hareḥ

— तथा वेदपाठ में तत्पर, शान्त मुनियों से सुशोभित था, जो श्रुति-सूक्तों से स्तुति करते थे — इस प्रकार हरि का वह धाम सुसज्जित था।

श्लोक 9 (devibhagavatam.5.8.9)

ते च विष्णुगृहं प्राप्य द्वारपालौ शुभाकृती । वीक्ष्योचुर्जयविजयौ हेमयष्टिधरौ स्थितौ

te ca viṣṇugṛhaṁ prāpya dvārapālau śubhākṛtī | vīkṣyocurjayavijayau hemayaṣṭidharau sthitau

विष्णु के भवन में पहुँचकर, उन्होंने स्वर्ण-दण्ड धारण किए, सुन्दर आकृति वाले द्वारपाल जय और विजय को देखा, और उनसे कहा।

श्लोक 10 (devibhagavatam.5.8.10)

गत्वैकोऽप्युभयोर्मध्ये निवेदयतु सङ्गतान् । द्वारस्थान् ब्रह्मरुद्रादीन्विष्णुदर्शनलालसान्

gatvaiko'pyubhayormadhye nivedayatu saṅgatān | dvārasthān brahmarudrādīnviṣṇudarśanalālasān

'आप दोनों में से कोई एक जाकर निवेदन करें कि द्वार पर ब्रह्मा, रुद्र आदि एकत्रित हैं, जो विष्णु के दर्शन के लिए उत्सुक हैं।'

श्लोक 11 (devibhagavatam.5.8.11)

व्यास उवाच । विजयस्तद्वचः श्रुत्वा गत्वाथ विष्णुसन्निधौ । सर्वान्समागतान्देवान्प्रणम्योवाच सत्वरः

vyāsa uvāca | vijayastadvacaḥ śrutvā gatvātha viṣṇusannidhau | sarvānsamāgatāndevānpraṇamyovāca satvaraḥ

व्यास जी ने कहा — विजय यह वचन सुनकर, विष्णु के समीप जाकर, प्रणाम करते हुए शीघ्र ही उन्हें एकत्रित सभी देवताओं के विषय में बताने लगा।

श्लोक 12 (devibhagavatam.5.8.12)

विजय उवाच । देवदेव महाराज रमाकान्त सुरारिहन् । समागताः सुराः सर्वे द्वारि तिष्ठन्ति वै विभो

vijaya uvāca | devadeva mahārāja ramākānta surārihan | samāgatāḥ surāḥ sarve dvāri tiṣṭhanti vai vibho

विजय ने कहा — हे देवदेव! हे महाराज! हे रमाकान्त! हे सुरारिहन्! हे विभो! सभी देवता एकत्रित होकर द्वार पर खड़े हैं।

श्लोक 13 (devibhagavatam.5.8.13)

ब्रह्मा रुद्रस्तथेन्द्रश्च वरुणः पावको यमः । स्तुवन्ति वेदवाक्यैस्त्वाममरा दर्शनार्थिनः

brahmā rudrastathendraśca varuṇaḥ pāvako yamaḥ | stuvanti vedavākyaistvāmamarā darśanārthinaḥ

ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, अग्नि तथा यम — ये सभी अमर देव आपके दर्शन के इच्छुक होकर वेद-वाक्यों से आपकी स्तुति कर रहे हैं।

श्लोक 14 (devibhagavatam.5.8.14)

व्यास उवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णर्विजयस्य रमापतिः । निर्जगाम गृहात्तूर्णं सुरान्समधिकोत्सवः

vyāsa uvāca | tacchrutvā vacanaṁ viṣṇarvijayasya ramāpatiḥ | nirjagāma gṛhāttūrṇaṁ surānsamadhikotsavaḥ

व्यास जी ने कहा — विजय के इन वचनों को सुनकर, रमापति विष्णु अत्यंत हर्षपूर्वक तुरन्त अपने भवन से देवताओं के पास निकल आए।

श्लोक 15 (devibhagavatam.5.8.15)

गत्वा वीक्ष्य हरिर्देवान्द्वारस्थाञ्छ्रमकर्शितान् । प्रीतिप्रवणया दृष्ट्या प्रीणयामास दुःखितान्

gatvā vīkṣya harirdevāndvārasthāñchramakarśitān | prītipravaṇayā dṛṣṭyā prīṇayāmāsa duḥkhitān

वहाँ जाकर हरि ने द्वार पर खड़े, थकान से क्षीण देवताओं को देखा, और स्नेहपूर्ण दृष्टि से उन दुःखी देवताओं को सान्त्वना दी।

श्लोक 16 (devibhagavatam.5.8.16)

प्रणेमुस्ते सुराः सर्वे देवदेवं जनार्दनम् । तुष्टुवुश्च सुरारिघ्नं वाग्भिर्वेदविनिश्चितम्

praṇemuste surāḥ sarve devadevaṁ janārdanam | tuṣṭuvuśca surārighnaṁ vāgbhirvedaviniścitam

सभी देवताओं ने उस देवदेव जनार्दन को प्रणाम किया, और वेद-निश्चित वाणी से उस सुरारि-नाशक की स्तुति की।

श्लोक 17 (devibhagavatam.5.8.17)

देवा ऊचुः । देवदेव जगन्नाथ सृष्टिस्थित्यन्तकारक । दयासिन्धो महाराज त्राहि नः शरणागतान्

devā ūcuḥ | devadeva jagannātha sṛṣṭisthityantakāraka | dayāsindho mahārāja trāhi naḥ śaraṇāgatān

देवताओं ने कहा — हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे सृष्टि-स्थिति-संहारकर्ता! हे दयासिन्धो! हे महाराज! शरणागत हम पर कृपा कर हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 18 (devibhagavatam.5.8.18)

विष्णुरुवाच । विशन्तु निर्जराः सर्वे कुशलं कथयन्तु वः । आसनेषु किमर्थं वै मिलिताः समुपागताः

viṣṇuruvāca | viśantu nirjarāḥ sarve kuśalaṁ kathayantu vaḥ | āsaneṣu kimarthaṁ vai militāḥ samupāgatāḥ

विष्णु ने कहा — सभी देवता भीतर प्रवेश करें; अपनी कुशलता कहें। यह बताइए कि आप सब एकत्रित होकर किस प्रयोजन से यहाँ आए हैं?

श्लोक 19 (devibhagavatam.5.8.19)

चिन्तातुराः कथं जाता विषण्णा दीनमानसाः । ब्रह्मरुद्रेण सहिताः कार्यं प्रब्रूत सत्वरम्

cintāturāḥ kathaṁ jātā viṣaṇṇā dīnamānasāḥ | brahmarudreṇa sahitāḥ kāryaṁ prabrūta satvaram

आप ब्रह्मा और रुद्र सहित इतने चिन्तातुर, उदास और दीन-मन क्यों हो गए हैं? शीघ्र ही अपना प्रयोजन बताइए।

श्लोक 20 (devibhagavatam.5.8.20)

देवा ऊचुः । महिषेण महाराज पीडिताः पापकर्मणा । असाध्येनातिदुष्टेन वरदृप्तेन पापिना

devā ūcuḥ | mahiṣeṇa mahārāja pīḍitāḥ pāpakarmaṇā | asādhyenātiduṣṭena varadṛptena pāpinā

देवताओं ने कहा — हे महाराज! हम उस पापकर्मा महिष से पीड़ित हैं — जो असाध्य, अत्यंत दुष्ट, वरदान से गर्वित और पापी है —

श्लोक 21 (devibhagavatam.5.8.21)

यज्ञभागानसौ भुङ्क्ते ब्राह्मणैः प्रतिपादितान् । अमरा गिरिदुर्गेषु भ्रमन्ति च भयातुराः

yajñabhāgānasau bhuṅkte brāhmaṇaiḥ pratipāditān | amarā giridurgeṣu bhramanti ca bhayāturāḥ

— वह ब्राह्मणों द्वारा अर्पित यज्ञ-भागों को स्वयं भोगता है; और देवगण भयभीत होकर पर्वतों के दुर्गम स्थानों में भटक रहे हैं।

श्लोक 22 (devibhagavatam.5.8.22)

वरदानेन धातुः स दुर्जयो मधुसूदन । तस्मात्त्वां शरणं प्राप्ता ज्ञात्वा तत्कार्यगौरवम्

varadānena dhātuḥ sa durjayo madhusūdana | tasmāttvāṁ śaraṇaṁ prāptā jñātvā tatkāryagauravam

हे मधुसूदन! विधाता के वरदान से वह अजेय हो गया है। इसलिए, इस कार्य की गम्भीरता जानकर, हम आपकी शरण में आए हैं।

श्लोक 23 (devibhagavatam.5.8.23)

समर्थोऽसि समुद्धर्तुं दैत्यमायाविशारद । कुरु कृष्ण वधोपायं तस्य दानवमर्दन

samartho'si samuddhartuṁ daityamāyāviśārada | kuru kṛṣṇa vadhopāyaṁ tasya dānavamardana

हे दैत्य-माया-विशारद! आप ही हमें उबारने में समर्थ हैं। हे कृष्ण! हे दानवमर्दन! उसके वध का उपाय कीजिए।

श्लोक 24 (devibhagavatam.5.8.24)

धात्रा तस्मै वरो दत्तो ह्यवध्योऽसि नरैः किल । का स्त्री त्वेवंविधा बाला या हन्यात्तं शठं रणे

dhātrā tasmai varo datto hyavadhyo'si naraiḥ kila | kā strī tvevaṁvidhā bālā yā hanyāttaṁ śaṭhaṁ raṇe

ब्रह्मा ने उसे यह वर दिया है कि वह पुरुषों द्वारा अवध्य है। तो भला ऐसी कौन-सी स्त्री या बालिका है, जो युद्ध में उस दुष्ट को मार सके?

श्लोक 25 (devibhagavatam.5.8.25)

उमा मा वा शची विद्या का समर्थास्य घातने । महिषस्यातिदुष्टस्य वरदानबलादपि

umā mā vā śacī vidyā kā samarthāsya ghātane | mahiṣasyātiduṣṭasya varadānabalādapi

उमा, लक्ष्मी, शची अथवा विद्या (सरस्वती) — इनमें से कौन उस अत्यंत दुष्ट महिष का, उसके वरदान के बल के होते हुए भी, वध करने में समर्थ हो सकती है?

श्लोक 26 (devibhagavatam.5.8.26)

विचिन्त्य बुद्ध्या यत्सर्वं मरणस्यास्य कारणम् । कुरु कार्यं च देवानां भक्तवत्सल भूधर

vicintya buddhyā yatsarvaṁ maraṇasyāsya kāraṇam | kuru kāryaṁ ca devānāṁ bhaktavatsala bhūdhara

हे भक्तवत्सल! हे भूधर! अपनी बुद्धि से उसकी मृत्यु के समस्त कारण का चिन्तन कर, देवताओं का यह कार्य पूर्ण कीजिए।

श्लोक 27 (devibhagavatam.5.8.27)

व्यास उवाच । श्रुत्वा तद्वचनं विष्णुस्तानुवाच हसन्निव । युद्धं कृतं पुरास्माभिस्तथापि न मृतो ह्यसौ

vyāsa uvāca | śrutvā tadvacanaṁ viṣṇustānuvāca hasanniva | yuddhaṁ kṛtaṁ purāsmābhistathāpi na mṛto hyasau

व्यास जी ने कहा — यह वचन सुनकर विष्णु ने मानो मुस्कुराते हुए उनसे कहा — 'हमने पहले भी उससे युद्ध किया था, फिर भी वह मरा नहीं।'

श्लोक 28 (devibhagavatam.5.8.28)

अद्य सर्वसुराणां वै तेजोभी रूपसम्पदा । उत्पन्ना चेद्वरारोहा सा हन्यात्तं रणे बलात्

adya sarvasurāṇāṁ vai tejobhī rūpasampadā | utpannā cedvarārohā sā hanyāttaṁ raṇe balāt

'यदि आज सभी देवताओं के तेज से, रूपसम्पन्न कोई श्रेष्ठ नारी उत्पन्न हो, तो वह युद्ध में उसे बलपूर्वक मार सकती है।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.5.8.29)

हयारिं वरदृप्तञ्च मायाशतविशारदम् । हन्तुं योग्या भवेन्नारी शक्त्यंशैर्निर्मिता हि नः

hayāriṁ varadṛptañca māyāśataviśāradam | hantuṁ yogyā bhavennārī śaktyaṁśairnirmitā hi naḥ

'उस वरदान से गर्वित, सैकड़ों मायाओं में निपुण शत्रु का वध करने में योग्य नारी, हम सबकी शक्तियों के अंशों से ही निर्मित हो सकती है।'

श्लोक 30 (devibhagavatam.5.8.30)

प्रार्थयन्तु च तेजोंऽशान्स्त्रियोऽस्माकं तथा पुनः । उत्पन्नैस्तैश्च तेजोंऽशैस्तेजोराशिर्भवेद्यथा

prārthayantu ca tejoṁ'śānstriyo'smākaṁ tathā punaḥ | utpannaistaiśca tejoṁ'śaistejorāśirbhavedyathā

'और हमारी पत्नियाँ भी अपने तेज के अंश अर्पित करें, ताकि उन सभी उत्पन्न तेज-अंशों से एक महान् तेजोराशि बन सके।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.5.8.31)

आयुधानि वयं दद्मः सर्वे रुद्रपुरोगमाः । तस्यै सर्वाणि दिव्यानि त्रिशूलादीनि यानि च

āyudhāni vayaṁ dadmaḥ sarve rudrapurogamāḥ | tasyai sarvāṇi divyāni triśūlādīni yāni ca

'हम सभी, रुद्र को आगे रखकर, उसे अपने समस्त दिव्य आयुध — त्रिशूल आदि — प्रदान करेंगे।'

श्लोक 32 (devibhagavatam.5.8.32)

सर्वायुधधरा नारी सर्वतेजःसमन्विता । हनिष्यति दुरात्मानं तं पापं मदगर्वितम्

sarvāyudhadharā nārī sarvatejaḥsamanvitā | haniṣyati durātmānaṁ taṁ pāpaṁ madagarvitam

'समस्त आयुधों को धारण करने वाली, सबके तेज से युक्त वह नारी, उस दुरात्मा, पापी और मदगर्वित का वध करेगी।'

श्लोक 33 (devibhagavatam.5.8.33)

व्यास उवाच । इत्युक्तवति देवेशे ब्रह्मणो वदनात्ततः । स्वयमेवोद्बभौ तेजोराशिश्चातीव दुःसहः

vyāsa uvāca | ityuktavati deveśe brahmaṇo vadanāttataḥ | svayamevodbabhau tejorāśiścātīva duḥsahaḥ

व्यास जी ने कहा — देवेश (विष्णु) के ऐसा कहते ही, ब्रह्मा के मुख से स्वयं ही एक अत्यंत दुःसह तेजोराशि प्रकट हुई।

श्लोक 34 (devibhagavatam.5.8.34)

रक्तवर्णं शुभाकारं पद्मरागमणिप्रभम् । किञ्चिच्छीतं तथा चोष्णं मरीचिजालमण्डितम्

raktavarṇaṁ śubhākāraṁ padmarāgamaṇiprabham | kiñcicchītaṁ tathā coṣṇaṁ marīcijālamaṇḍitam

— लाल रंग का, शुभ आकार वाला, पद्मराग मणि की-सी आभा से युक्त, कुछ शीतल तथा कुछ उष्ण, किरण-जाल से मण्डित।

श्लोक 35 (devibhagavatam.5.8.35)

निःसृतं हरिणा दृष्टं हरेण च महात्मना । विस्मितौ तौ महाराज बभूवतुरुरुक्रमौ

niḥsṛtaṁ hariṇā dṛṣṭaṁ hareṇa ca mahātmanā | vismitau tau mahārāja babhūvatururukramau

उस निकलती हुई तेजोराशि को हरि तथा महात्मा हर दोनों ने देखा। हे महाराज! वे दोनों महापराक्रमी देव अत्यंत विस्मित हो गए।

श्लोक 36 (devibhagavatam.5.8.36)

शङ्करस्य शरीरात्तु निःसृतं महदद्भुतम् । रौप्यवर्णमभूत्तीव्रं दुर्दर्शं दारुणं महत्

śaṅkarasya śarīrāttu niḥsṛtaṁ mahadadbhutam | raupyavarṇamabhūttīvraṁ durdarśaṁ dāruṇaṁ mahat

तत्पश्चात् शंकर के शरीर से भी एक महान् अद्भुत तेज निकला — जो रजत के समान रंग का, तीव्र, दुर्दर्श, भयंकर तथा विशाल था।

श्लोक 37 (devibhagavatam.5.8.37)

भयङ्करञ्च दैत्यानां देवानां विस्मयप्रदम् । घोररूपं गिरिप्रख्यं तमोगुणमिवापरम्

bhayaṅkarañca daityānāṁ devānāṁ vismayapradam | ghorarūpaṁ giriprakhyaṁ tamoguṇamivāparam

यह दैत्यों के लिए भयंकर और देवताओं के लिए विस्मयकारी था, भयानक रूप वाला, पर्वत के समान विशाल, मानो तमोगुण का ही दूसरा रूप हो।

श्लोक 38 (devibhagavatam.5.8.38)

ततो विष्णुशरीरात्तु तेजोराशिमिवापरम् । नीलं सत्त्वगुणोपेतं प्रादुरास महाद्युति

tato viṣṇuśarīrāttu tejorāśimivāparam | nīlaṁ sattvaguṇopetaṁ prādurāsa mahādyuti

तत्पश्चात् विष्णु के शरीर से भी एक और तेजोराशि प्रकट हुई — नीले वर्ण की, सत्त्वगुण से युक्त तथा महान् द्युतिमान्।

श्लोक 39 (devibhagavatam.5.8.39)

ततश्चेन्द्रशरीरात्तु चित्ररूपं दुरासदम् । आविरासीत्सुसंवृत्तं तेजः सर्वगुणात्मकम्

tataścendraśarīrāttu citrarūpaṁ durāsadam | āvirāsītsusaṁvṛttaṁ tejaḥ sarvaguṇātmakam

तत्पश्चात् इन्द्र के शरीर से भी एक विचित्र रूप वाला, दुर्गम्य, सुसंगठित, सर्वगुणात्मक तेज प्रकट हुआ।

श्लोक 40 (devibhagavatam.5.8.40)

कुबेरयमवह्नीनां शरीरेभ्यः समन्ततः । निश्चक्राम महत्तेजो वरुणस्य तथैव च

kuberayamavahnīnāṁ śarīrebhyaḥ samantataḥ | niścakrāma mahattejo varuṇasya tathaiva ca

कुबेर, यम तथा अग्नि के शरीरों से, चारों ओर से, एक महान् तेज निकला, और उसी प्रकार वरुण के शरीर से भी।

श्लोक 41 (devibhagavatam.5.8.41)

अन्येषां चैव देवानां शरीरेभ्योऽतिभास्वरम् । निर्गतं तन्महातेजोराशिरासीन्महोज्ज्वलः

anyeṣāṁ caiva devānāṁ śarīrebhyo'tibhāsvaram | nirgataṁ tanmahātejorāśirāsīnmahojjvalaḥ

और अन्य देवताओं के शरीरों से भी अत्यंत तेजस्वी प्रकाश निकला; और इन सबसे मिलकर एक महान्, अत्यंत उज्ज्वल तेजोराशि बन गई।

श्लोक 42 (devibhagavatam.5.8.42)

तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे देवा विष्णुपुरोगमाः । तेजोराशिं महादिव्यं हिमाचलमिवापरम्

taṁ dṛṣṭvā vismitāḥ sarve devā viṣṇupurogamāḥ | tejorāśiṁ mahādivyaṁ himācalamivāparam

उस महान् दिव्य तेजोराशि को, मानो एक अन्य हिमाचल हो, देखकर विष्णु सहित सभी देवगण अत्यंत विस्मित हो गए।

श्लोक 43 (devibhagavatam.5.8.43)

पश्यतां तत्र देवानां तेजःपुञ्जसमुद्भवा । बभूवातिवरा नारी सुन्दरी विस्मयप्रदा

paśyatāṁ tatra devānāṁ tejaḥpuñjasamudbhavā | babhūvātivarā nārī sundarī vismayapradā

देवताओं के देखते-देखते ही, उस तेजपुंज से एक अत्यंत श्रेष्ठ, सुन्दर नारी उत्पन्न हुई, जो सबको विस्मित करने वाली थी।

श्लोक 44 (devibhagavatam.5.8.44)

त्रिगुणा सा महालक्ष्मीः सर्वदेवशरीरजा । अष्टादशभुजा रम्या त्रिवर्णा विश्वमोहिनी

triguṇā sā mahālakṣmīḥ sarvadevaśarīrajā | aṣṭādaśabhujā ramyā trivarṇā viśvamohinī

वह महालक्ष्मी त्रिगुणात्मिका, सभी देवताओं के शरीर से उत्पन्न, अठारह भुजाओं वाली, रम्य, त्रिवर्णा तथा सम्पूर्ण विश्व को मोहित करने वाली थीं।

श्लोक 45 (devibhagavatam.5.8.45)

श्वेतानना कृष्णनेत्रा संरक्ताधरपल्लवा । ताम्रपाणितला कान्ता दिव्यभूषणभूषिता

śvetānanā kṛṣṇanetrā saṁraktādharapallavā | tāmrapāṇitalā kāntā divyabhūṣaṇabhūṣitā

उनका मुख श्वेत, नेत्र श्याम, अधर लाल पल्लव के समान, हाथों की हथेलियाँ ताम्र वर्ण की, तथा वे दिव्य आभूषणों से अलंकृत, अत्यंत मनोहर थीं।

श्लोक 46 (devibhagavatam.5.8.46)

अष्टादशभुजा देवी सहस्रभुजमण्डिता । सम्भूतासुरनाशाय तेजोराशिसमुद्भवा

aṣṭādaśabhujā devī sahasrabhujamaṇḍitā | sambhūtāsuranāśāya tejorāśisamudbhavā

अठारह भुजाओं वाली, मानो सहस्र-भुजाओं से सुशोभित वह देवी, उस असुर के नाश हेतु तेजोराशि से प्रकट हुई थीं।

श्लोक 47 (devibhagavatam.5.8.47)

जनमेजय उवाच । कृष्ण देव महाभाग सर्वज्ञ मुनिसत्तम । विस्तरं ब्रूहि तस्यास्त्वं शरीरस्य समुद्भवम्

janamejaya uvāca | kṛṣṇa deva mahābhāga sarvajña munisattama | vistaraṁ brūhi tasyāstvaṁ śarīrasya samudbhavam

जनमेजय ने कहा — हे कृष्ण! हे देव! हे महाभाग! हे सर्वज्ञ! हे मुनिसत्तम! उनके शरीर की उत्पत्ति के विषय में मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 48 (devibhagavatam.5.8.48)

एकीभूतं च सर्वेषां तेजः किं वा पृथक् स्थितम् । अङ्गानि चैव तस्यास्तु सर्वतेजोमयानि वा

ekībhūtaṁ ca sarveṣāṁ tejaḥ kiṁ vā pṛthak sthitam | aṅgāni caiva tasyāstu sarvatejomayāni vā

क्या सबका तेज एकीभूत हो गया था, अथवा वह पृथक्-पृथक् ही रहा? और क्या उनके अंग सम्पूर्ण रूप से उसी तेज से बने थे, अथवा...?

श्लोक 49 (devibhagavatam.5.8.49)

भिन्नभागविभागेन जातान्यङ्गानि यानि तु । मुखनासाक्षिभेदेन सर्वत्रैकभवानि च

bhinnabhāgavibhāgena jātānyaṅgāni yāni tu | mukhanāsākṣibhedena sarvatraikabhavāni ca

— अथवा क्या उनके अंग भिन्न-भिन्न भागों के विभाजन से बने थे — मुख, नासिका, नेत्र आदि पृथक्-पृथक्, फिर भी सर्वत्र मिलकर एक शरीर बन गए?

श्लोक 50 (devibhagavatam.5.8.50)

ब्रूहि तद्विस्तरं व्यास शरीराङ्गसमुद्भवम् । बभूव यस्य देवस्य तेजसोऽङ्गं यदद्भुतम्

brūhi tadvistaraṁ vyāsa śarīrāṅgasamudbhavam | babhūva yasya devasya tejaso'ṅgaṁ yadadbhutam

हे व्यास! उस शरीर के अंगों की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन कीजिए — कि किस देवता के तेज से उनका कौन-सा अद्भुत अंग बना।

श्लोक 51 (devibhagavatam.5.8.51)

आयुधाभरणादीनि दत्तानि यैर्यथा यथा । तत्सर्वं श्रोतुकामोऽस्मि त्वन्मुखाम्बुजनिर्गतम्

āyudhābharaṇādīni dattāni yairyathā yathā | tatsarvaṁ śrotukāmo'smi tvanmukhāmbujanirgatam

किसने, किस प्रकार, कौन-से आयुध और आभूषण दिए — यह सब मैं आपके मुखकमल से सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 52 (devibhagavatam.5.8.52)

न हि तृप्याम्यहं ब्रह्मन् सुधामयरसं पिबन् । चरितञ्च महालक्ष्यास्त्वन्मुखाम्भोजनिःसृतम्

na hi tṛpyāmyahaṁ brahman sudhāmayarasaṁ piban | caritañca mahālakṣyāstvanmukhāmbhojaniḥsṛtam

हे ब्रह्मन्! आपके मुखकमल से निकलती हुई, महालक्ष्मी की इस अमृतमय कथा को पीते हुए भी मैं तृप्त नहीं होता।

श्लोक 53 (devibhagavatam.5.8.53)

सूत उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा राज्ञः सत्यवतीसुतः । उवाच मधुरं वाक्यं प्रीणयन्निव भूपतिम्

sūta uvāca | iti tasya vacaḥ śrutvā rājñaḥ satyavatīsutaḥ | uvāca madhuraṁ vākyaṁ prīṇayanniva bhūpatim

सूत जी ने कहा — राजा के इन वचनों को सुनकर, सत्यवती-पुत्र व्यास ने राजा को मानो प्रसन्न करते हुए मधुर वचन कहे।

श्लोक 54 (devibhagavatam.5.8.54)

व्यास उवाच । शृणु राजन्महाभाग विस्तरेण ब्रवीमि ते । यथामति कुरुश्रेष्ठ तस्या देहसमुद्भवम्

vyāsa uvāca | śṛṇu rājanmahābhāga vistareṇa bravīmi te | yathāmati kuruśreṣṭha tasyā dehasamudbhavam

व्यास जी ने कहा — हे महाभाग राजन्! सुनिए, हे कुरुश्रेष्ठ! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपको विस्तार से उनके शरीर की उत्पत्ति बताता हूँ।

श्लोक 55 (devibhagavatam.5.8.55)

न ब्रह्मा न हरिः साक्षान्न रुद्रो न च वासवः । याथातथ्येन तद्रूपं वक्तुमीशः कदाचन

na brahmā na hariḥ sākṣānna rudro na ca vāsavaḥ | yāthātathyena tadrūpaṁ vaktumīśaḥ kadācana

न ब्रह्मा, न स्वयं हरि, न रुद्र और न ही वासव — कोई भी उनके उस स्वरूप का यथार्थ वर्णन कभी नहीं कर सकता।

श्लोक 56 (devibhagavatam.5.8.56)

कथं जानाम्यहं देव्या यद्रूपं यादृशं यतः । वाचारम्भणमात्रं तदुत्पन्नेति ब्रवीमि यत्

kathaṁ jānāmyahaṁ devyā yadrūpaṁ yādṛśaṁ yataḥ | vācārambhaṇamātraṁ tadutpanneti bravīmi yat

तो मैं देवी के उस रूप को, जो जैसा और जहाँ से था, कैसे जान सकता हूँ? जो कुछ भी मैं कहता हूँ — कि 'वे उत्पन्न हुईं' — वह केवल वाणी का आरम्भ मात्र है।

श्लोक 57 (devibhagavatam.5.8.57)

सा नित्या सर्वदैवास्ते देवकार्यार्थसिद्धये । नानारूपा त्वेकरूपा जायते कार्यगौरवात्

sā nityā sarvadaivāste devakāryārthasiddhaye | nānārūpā tvekarūpā jāyate kāryagauravāt

वे नित्य हैं, सदा विद्यमान रहती हैं; देवकार्य की सिद्धि हेतु, यद्यपि वे एकरूप हैं, तथापि कार्य की गम्भीरता के अनुसार नाना रूप धारण करती प्रतीत होती हैं।

श्लोक 58 (devibhagavatam.5.8.58)

यथा नटो रङ्गगतो नानारूपो भवत्यसौ । एकरूपस्वभावोऽपि लोकरञ्जनहेतवे

yathā naṭo raṅgagato nānārūpo bhavatyasau | ekarūpasvabhāvo'pi lokarañjanahetave

जैसे रंगमंच पर स्थित नट, अपने स्वभाव से एकरूप होते हुए भी, लोगों को रिझाने के लिए नाना रूप धारण कर लेता है —

श्लोक 59 (devibhagavatam.5.8.59)

तथैषा देवकार्यार्थमरूपापि स्वलीलया । करोति बहुरूपाणि निर्गुणा सगुणानि च

tathaiṣā devakāryārthamarūpāpi svalīlayā | karoti bahurūpāṇi nirguṇā saguṇāni ca

— वैसे ही वे, यद्यपि निराकार हैं, देवकार्य हेतु अपनी लीला से नाना रूप धारण करती हैं, और निर्गुण होते हुए भी सगुण रूप ग्रहण कर लेती हैं।

श्लोक 60 (devibhagavatam.5.8.60)

कार्यकर्मानुसारेण नामानि प्रभवन्ति हि । धात्वर्थगुणयुक्तानि गौणानि सुबहून्यपि

kāryakarmānusāreṇa nāmāni prabhavanti hi | dhātvarthaguṇayuktāni gauṇāni subahūnyapi

कार्य-कर्म के अनुसार ही अनेक नाम उत्पन्न होते हैं — जो धातु के अर्थ और गुण से युक्त, बहुधा गौण होते हैं।

श्लोक 61 (devibhagavatam.5.8.61)

तद्वै बुद्ध्यनुसारेण प्रब्रवीमि नराधिप । यथा तेजःसमुद्भूतं रूपं तस्या मनोहरम्

tadvai buddhyanusāreṇa prabravīmi narādhipa | yathā tejaḥsamudbhūtaṁ rūpaṁ tasyā manoharam

तो हे नराधिप! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार बताता हूँ कि उस तेज से उनका वह मनोहर रूप कैसे उत्पन्न हुआ।

श्लोक 62 (devibhagavatam.5.8.62)

शङ्करस्य च यत्तेजस्तेन तन्मुखपङ्कजम् । श्वेतवर्णं शुभाकारमजायत महत्तरम्

śaṅkarasya ca yattejastena tanmukhapaṅkajam | śvetavarṇaṁ śubhākāramajāyata mahattaram

शंकर के जिस तेज से उनका वह श्वेत वर्ण, शुभ आकार वाला महान् मुखकमल उत्पन्न हुआ।

श्लोक 63 (devibhagavatam.5.8.63)

केशास्तस्यास्तथा स्निग्धा याम्येन तेजसाभवन् । वक्राग्राश्चातिदीर्घा वै मेघवर्णा मनोहराः

keśāstasyāstathā snigdhā yāmyena tejasābhavan | vakrāgrāścātidīrghā vai meghavarṇā manoharāḥ

यम के तेज से उनके वे चिकने, घुँघराली नोक वाले, अत्यंत लम्बे, मेघ के समान श्याम और मनोहर केश बने।

श्लोक 64 (devibhagavatam.5.8.64)

नयनत्रितयं तस्या जज्ञे पावकतेजसा । कृष्णं रक्तं तथा श्वेतं वर्णत्रयविभूषितम्

nayanatritayaṁ tasyā jajñe pāvakatejasā | kṛṣṇaṁ raktaṁ tathā śvetaṁ varṇatrayavibhūṣitam

अग्नि के तेज से उनके वे तीन नेत्र उत्पन्न हुए, जो काले, लाल और श्वेत — तीन रंगों से सुशोभित थे।

श्लोक 65 (devibhagavatam.5.8.65)

वक्रे स्निग्धे कृष्णवर्णे सन्ध्ययोस्तेजसा भ्रुवौ । जाते देव्याः सुतेजस्के कामस्य धनुषीव ते

vakre snigdhe kṛṣṇavarṇe sandhyayostejasā bhruvau | jāte devyāḥ sutejaske kāmasya dhanuṣīva te

दोनों संध्याओं के तेज से उनकी वक्र, स्निग्ध, श्यामवर्णा भौंहें उत्पन्न हुईं, जो कामदेव के धनुष के समान अत्यंत तेजस्वी थीं।

श्लोक 66 (devibhagavatam.5.8.66)

वायोश्च तेजसा शस्तौ श्रवणौ सम्बभूवतुः । नातिदीर्घो नातिह्रस्वौ दोलाविव मनोभुवः

vāyośca tejasā śastau śravaṇau sambabhūvatuḥ | nātidīrgho nātihrasvau dolāviva manobhuvaḥ

वायु के तेज से उनके वे उत्तम कर्ण उत्पन्न हुए, जो न अधिक लम्बे थे, न अधिक छोटे — मानो कामदेव के हिंडोले हों।

श्लोक 67 (devibhagavatam.5.8.67)

तिलपुष्पसमाकारा नासिका सुमनोहरा । सञ्जाता स्निग्धवर्णा वै धनदस्य च तेजसा

tilapuṣpasamākārā nāsikā sumanoharā | sañjātā snigdhavarṇā vai dhanadasya ca tejasā

धनद (कुबेर) के तेज से उनकी वह तिल-पुष्प के समान आकार वाली, अत्यंत मनोहर, स्निग्धवर्णा नासिका बनी।

श्लोक 68 (devibhagavatam.5.8.68)

दन्ताः शिखरिणः श्लक्ष्णाः कुन्दाग्रसदृशाः समाः । सञ्जाताः सुप्रभा राजन् प्राजापत्येन तेजसा

dantāḥ śikhariṇaḥ ślakṣṇāḥ kundāgrasadṛśāḥ samāḥ | sañjātāḥ suprabhā rājan prājāpatyena tejasā

हे राजन्! प्रजापति (ब्रह्मा) के तेज से उनके वे नुकीले, चिकने, कुन्द-कली के समान समान तथा अत्यंत उज्ज्वल दाँत उत्पन्न हुए।

श्लोक 69 (devibhagavatam.5.8.69)

अधरश्चातिरक्तोऽस्याः सञ्जातोऽरुणतेजसा । उत्तरोष्ठस्तथा रम्यः कार्तिकेयस्य तेजसा

adharaścātirakto'syāḥ sañjāto'ruṇatejasā | uttaroṣṭhastathā ramyaḥ kārtikeyasya tejasā

अरुण (उषा) के तेज से उनका वह अत्यंत लाल अधरोष्ठ बना; और कार्तिकेय के तेज से उनका वह रम्य उत्तरोष्ठ बना।

श्लोक 70 (devibhagavatam.5.8.70)

अष्टादशभुजाकारा बाहवो विष्णुतेजसा । वसूनां तेजसाङ्गुल्यो रक्तवर्णास्तथाभवन्

aṣṭādaśabhujākārā bāhavo viṣṇutejasā | vasūnāṁ tejasāṅgulyo raktavarṇāstathābhavan

विष्णु के तेज से उनकी वे अठारह भुजाएँ बनीं; और वसुओं के तेज से उनकी लाल वर्ण की अंगुलियाँ बनीं।

श्लोक 71 (devibhagavatam.5.8.71)

सौम्येन तेजसा जातं स्तनयोर्युग्ममुत्तमम् । ऐन्द्रेणास्यास्तथा मध्यं जातं त्रिवलिसंयुतम्

saumyena tejasā jātaṁ stanayoryugmamuttamam | aindreṇāsyāstathā madhyaṁ jātaṁ trivalisaṁyutam

चन्द्रमा के सौम्य तेज से उनका वह उत्तम स्तन-युगल बना; और इन्द्र के तेज से उनकी त्रिवलियों से युक्त कटि बनी।

श्लोक 72 (devibhagavatam.5.8.72)

जङ्घोरू वरुणस्याथ तेजसा सम्बभूवतुः । नितम्बः स तु सञ्जातो विपुलस्तेजसा भुवः

jaṅghorū varuṇasyātha tejasā sambabhūvatuḥ | nitambaḥ sa tu sañjāto vipulastejasā bhuvaḥ

वरुण के तेज से उनकी पिण्डलियाँ और जंघाएँ बनीं; और पृथ्वी के तेज से उनका वह विशाल नितम्ब बना।

श्लोक 73 (devibhagavatam.5.8.73)

एवं नारी शुभाकारा सुरूपा सुस्वरा भृशम् । समुत्पन्ना तथा राजंस्तेजोराशिसमुद्भवा

evaṁ nārī śubhākārā surūpā susvarā bhṛśam | samutpannā tathā rājaṁstejorāśisamudbhavā

इस प्रकार, हे राजन्! उस तेजोराशि से एक शुभाकार, सुरूपा तथा अत्यंत सुस्वरा नारी उत्पन्न हुई।

श्लोक 74 (devibhagavatam.5.8.74)

तां दृष्ट्वा सुष्ठुसर्वाङ्गीं सुदतीं चारुलोचनाम् । मुदं प्रापुः सुराः सर्वे महिषेण प्रपीडिताः

tāṁ dṛṣṭvā suṣṭhusarvāṅgīṁ sudatīṁ cārulocanām | mudaṁ prāpuḥ surāḥ sarve mahiṣeṇa prapīḍitāḥ

उन्हें, सर्वांग सुन्दर, सुन्दर दन्त तथा मनोहर नेत्रों वाली, देखकर, महिष द्वारा पीड़ित सभी देवता हर्षित हो उठे।

श्लोक 75 (devibhagavatam.5.8.75)

विष्णुस्त्वाह सुरान्सर्वान्भूषणान्यायुधानि च । प्रयच्छन्तु शुभान्यस्यै देवाः सर्वाणि साम्प्रतम्

viṣṇustvāha surānsarvānbhūṣaṇānyāyudhāni ca | prayacchantu śubhānyasyai devāḥ sarvāṇi sāmpratam

तब विष्णु ने सभी देवताओं से कहा — 'सभी देवगण अब इन्हें अपने समस्त शुभ आभूषण और आयुध अर्पित करें।'

श्लोक 76 (devibhagavatam.5.8.76)

स्वायुधेभ्यः समुत्पाद्य तेजोयुक्तानि सत्वराः । समर्पयन्तु सर्वेऽद्य देव्यै नानायुधानि वै

svāyudhebhyaḥ samutpādya tejoyuktāni satvarāḥ | samarpayantu sarve'dya devyai nānāyudhāni vai

'सभी देवगण अपने-अपने आयुधों से तेजयुक्त प्रतिरूप उत्पन्न कर, आज उन्हें विविध आयुध शीघ्र ही अर्पित करें।'

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