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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18

शिव-प्रसाद से लक्ष्मी द्वारा भगवती की आराधना

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (devibhagavatam.6.18.1)

जनमेजय उवाच । इति शप्ता भगवता सिन्धुजा कोपयोगतः । कथं सा वडवा जाता रेवन्तेन च किं कृतम्

janamejaya uvāca | iti śaptā bhagavatā sindhujā kopayogataḥ | kathaṁ sā vaḍavā jātā revantena ca kiṁ kṛtam

जनमेजय ने कहा — इस प्रकार भगवान द्वारा क्रोधवश शापित होकर वह समुद्रजा घोड़ी कैसे बनी, और रेवंत ने क्या किया?

श्लोक 2 (devibhagavatam.6.18.2)

कस्मिन्देशेऽब्धिजा देवी वडवारूपधारिणी । संस्थितैकाकिनी बाला परोषित्पतिका यथा

kasmindeśe'bdhijā devī vaḍavārūpadhāriṇī | saṁsthitaikākinī bālā paroṣitpatikā yathā

वह अब्धिजा देवी, घोड़ी का रूप धारण किए हुए, किस देश में अकेली रहीं, मानो पति-प्रवासिनी बाला हो?

श्लोक 3 (devibhagavatam.6.18.3)

कालं कियन्तमायुष्मन् वियुक्ता पतिना रमा । संस्थिता विजनेऽरण्ये किं कृतं च तया पुनः

kālaṁ kiyantamāyuṣman viyuktā patinā ramā | saṁsthitā vijane'raṇye kiṁ kṛtaṁ ca tayā punaḥ

हे आयुष्मन्! पति से वियुक्त रमा कितने समय तक निर्जन वन में रहीं, और उन्होंने फिर क्या किया?

श्लोक 4 (devibhagavatam.6.18.4)

समागमं कदा प्राप्ता वासुदेवस्य सिन्धुजा । पुत्रः कथं तया प्राप्तो नारायणवियुक्तया

samāgamaṁ kadā prāptā vāsudevasya sindhujā | putraḥ kathaṁ tayā prāpto nārāyaṇaviyuktayā

वह समुद्रजा वासुदेव से कब मिलीं? नारायण से वियुक्त होकर उन्हें पुत्र कैसे प्राप्त हुआ?

श्लोक 5 (devibhagavatam.6.18.5)

एतद्वृत्तान्तमार्येश कथयस्व सविस्तरम् । श्रोतुकामोऽस्मि विप्रेन्द्र कथाख्यानमनुत्तमम्

etadvṛttāntamāryeśa kathayasva savistaram | śrotukāmo'smi viprendra kathākhyānamanuttamam

हे आर्येश! यह सारा वृत्तांत विस्तार से कहिए। हे विप्रेंद्र! मैं यह अनुपम कथाख्यान सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 6 (devibhagavatam.6.18.6)

सूत उवाच । इति पृष्टस्तदा व्यासः परीक्षित्तनयेन वै । कथयामास भो विप्राः कथामेतां सुविस्तराम्

sūta uvāca | iti pṛṣṭastadā vyāsaḥ parīkṣittanayena vai | kathayāmāsa bho viprāḥ kathāmetāṁ suvistarām

सूत जी ने कहा — परीक्षित-पुत्र द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, व्यास जी ने, हे विप्रो! यह कथा विस्तारपूर्वक कही।

श्लोक 7 (devibhagavatam.6.18.7)

व्यास उवाच । शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम् । पावनीं सुखदां कर्णे विशदाक्षरसंयुताम्

vyāsa uvāca | śṛṇu rājan pravakṣyāmi kathāṁ paurāṇikīṁ śubhām | pāvanīṁ sukhadāṁ karṇe viśadākṣarasaṁyutām

व्यास जी ने कहा — हे राजन्! सुनो, मैं यह शुभ पौराणिक कथा कहूँगा — पावन, सुखदायक और स्पष्ट अक्षरों से युक्त।

श्लोक 8 (devibhagavatam.6.18.8)

रेवन्तस्तु रमां दृष्ट्वा शप्ता देवेन कामिनीम् । भयार्तः प्रययौ दूरात्प्रणम्य जगतां पतिम्

revantastu ramāṁ dṛṣṭvā śaptā devena kāminīm | bhayārtaḥ prayayau dūrātpraṇamya jagatāṁ patim

रेवंत, रमा को भगवान द्वारा शापित देखकर, भयभीत होकर दूर से जगत्पति को प्रणाम कर वहाँ से चला गया।

श्लोक 9 (devibhagavatam.6.18.9)

पितुः सकाशं त्वरितो वीक्ष्य कोपं जगत्पतेः । निवेदयामास कथां भास्कराय स शापजाम्

pituḥ sakāśaṁ tvarito vīkṣya kopaṁ jagatpateḥ | nivedayāmāsa kathāṁ bhāskarāya sa śāpajām

जगत्पति के क्रोध को देखकर, वह शीघ्रता से अपने पिता (सूर्य) के पास गया और शाप की सारी कथा भास्कर को निवेदित की।

श्लोक 10 (devibhagavatam.6.18.10)

दुःखिता सा रमा देवी प्रणम्य जगदीश्वरम् । आज्ञप्ता मानुषं लोकं प्राप्ता कमललोचना

duḥkhitā sā ramā devī praṇamya jagadīśvaram | ājñaptā mānuṣaṁ lokaṁ prāptā kamalalocanā

दुःखी रमा देवी ने जगदीश्वर को प्रणाम कर, उनकी आज्ञा से, वह कमललोचना मनुष्य-लोक को प्राप्त हुईं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.6.18.11)

सूर्यपत्न्या तपस्तप्तं यत्र पूर्वं सुदारुणम् । तत्रैव सा ययावाशु वडवारूपधारिणी

sūryapatnyā tapastaptaṁ yatra pūrvaṁ sudāruṇam | tatraiva sā yayāvāśu vaḍavārūpadhāriṇī

जहाँ पहले सूर्यपत्नी ने अत्यंत भीषण तप किया था, वहीं वह घोड़ी का रूप धारण किए हुए शीघ्र चली गईं।

श्लोक 12 (devibhagavatam.6.18.12)

कालिन्दीतमसासङ्गे सुपर्णाक्षस्य चोत्तरे । सर्वकामप्रदे स्थाने सुरम्यवनमण्डिते

kālindītamasāsaṅge suparṇākṣasya cottare | sarvakāmaprade sthāne suramyavanamaṇḍite

कालिंदी और तमसा के संगम पर, सुपर्णाक्ष के उत्तर में, सर्वकामप्रद, अत्यंत रमणीय वन से सुशोभित स्थान में —

श्लोक 13 (devibhagavatam.6.18.13)

तत्र स्थिता महादेवं शङ्करं वाञ्छितप्रदम् । दध्यौ चैकेन मनसा शूलिनं चन्द्रशेखरम्

tatra sthitā mahādevaṁ śaṅkaraṁ vāñchitapradam | dadhyau caikena manasā śūlinaṁ candraśekharam

वहाँ स्थित होकर उन्होंने एकाग्रचित्त से महादेव शंकर का ध्यान किया — इच्छापूर्ण करने वाले, त्रिशूलधारी, चंद्रशेखर,

श्लोक 14 (devibhagavatam.6.18.14)

पञ्चाननं दशभुजं गौरीदेहार्धधारिणम् । कर्पूरगौरदेहाभं नीलकण्ठं त्रिलोचनम्

pañcānanaṁ daśabhujaṁ gaurīdehārdhadhāriṇam | karpūragauradehābhaṁ nīlakaṇṭhaṁ trilocanam

पंचमुख, दशभुज, गौरी की देह को अपने आधे शरीर में धारण करने वाले, कर्पूर के समान गौरवर्ण देह वाले, नीलकंठ, त्रिनेत्र —

श्लोक 15 (devibhagavatam.6.18.15)

व्याघ्राजिनधरं देवं गजचर्मोत्तरीयकम् । कपालमालाकलितं नागयज्ञोपवीतिनम्

vyāghrājinadharaṁ devaṁ gajacarmottarīyakam | kapālamālākalitaṁ nāgayajñopavītinam

व्याघ्रचर्मधारी, गजचर्म का उत्तरीय पहने, कपालमाला से सुशोभित, नागों को यज्ञोपवीत बनाकर धारण करने वाले —

श्लोक 16 (devibhagavatam.6.18.16)

सागरस्य सुता कृत्वा हयीरूपं मनोहरम् । तस्मिंस्तीर्थे रमादेवी चकार दुश्चरं तपः

sāgarasya sutā kṛtvā hayīrūpaṁ manoharam | tasmiṁstīrthe ramādevī cakāra duścaraṁ tapaḥ

समुद्र-पुत्री ने मनोहर घोड़ी का रूप लेकर उस तीर्थ में दुष्कर तप किया, वह रमा देवी।

श्लोक 17 (devibhagavatam.6.18.17)

ध्यायमाना परं देवं वैराग्यं समुपाश्रिता । दिव्यं वर्षसहस्रं तु गतं तत्र महीपते

dhyāyamānā paraṁ devaṁ vairāgyaṁ samupāśritā | divyaṁ varṣasahasraṁ tu gataṁ tatra mahīpate

परम देव का ध्यान करते हुए, वैराग्य का आश्रय लेकर, हे भूपते! वहाँ एक सहस्र दिव्य वर्ष बीत गए।

श्लोक 18 (devibhagavatam.6.18.18)

ततस्तुष्टो महादेवो वृषारूढस्त्रिलोचनः । प्रत्यक्षोऽभून्महेशानः पार्वतीसहितः प्रभुः

tatastuṣṭo mahādevo vṛṣārūḍhastrilocanaḥ | pratyakṣo'bhūnmaheśānaḥ pārvatīsahitaḥ prabhuḥ

तब प्रसन्न हुए वृषभारूढ़ त्रिनेत्र महादेव, पार्वती-सहित, साक्षात् प्रत्यक्ष हुए, वे महेश्वर प्रभु।

श्लोक 19 (devibhagavatam.6.18.19)

तत्रैत्य सगणः शम्भुस्तामाह हरिवल्लभाम् । तपस्यन्तीं महाभागामश्विनीरूपधारिणीम्

tatraitya sagaṇaḥ śambhustāmāha harivallabhām | tapasyantīṁ mahābhāgāmaśvinīrūpadhāriṇīm

वहाँ अपने गणों सहित आकर, शंभु ने उस हरिवल्लभा से कहा, जो अश्विनी (घोड़ी) रूप धारण किए तप कर रही थीं —

श्लोक 20 (devibhagavatam.6.18.20)

किं तपस्यसि कल्याणि जगन्मातर्वदस्व मे । सर्वार्थदः पतिस्तेऽस्ति सर्वलोकविधायकः

kiṁ tapasyasi kalyāṇi jaganmātarvadasva me | sarvārthadaḥ patiste'sti sarvalokavidhāyakaḥ

'हे कल्याणि! जगन्माता! तुम किस लिए तप कर रही हो, मुझसे कहो। तुम्हारा पति सर्वार्थदाता, सर्वलोकों का विधाता है।'

श्लोक 21 (devibhagavatam.6.18.21)

हरिं त्यक्त्वाद्य मां कस्मात्स्तौषि देवि जगत्पतिम् । वासुदेवं जगन्नाथं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्

hariṁ tyaktvādya māṁ kasmātstauṣi devi jagatpatim | vāsudevaṁ jagannāthaṁ bhuktimuktipradāyakam

'हे देवि! जगत्पति हरि को छोड़कर आज तुम मुझे क्यों स्तुति कर रही हो — वासुदेव, जगन्नाथ, जो भुक्ति-मुक्ति दोनों के दाता हैं?'

श्लोक 22 (devibhagavatam.6.18.22)

वेदोक्तं वचनं कार्यं नारीणां देवता पतिः । नान्यस्मिन्सर्वथा भावः कर्तव्यः कर्हिचित्क्वचित्

vedoktaṁ vacanaṁ kāryaṁ nārīṇāṁ devatā patiḥ | nānyasminsarvathā bhāvaḥ kartavyaḥ karhicitkvacit

'वेदोक्त वचन का पालन करना चाहिए — स्त्रियों का देवता पति ही है; अन्य किसी में सर्वथा कहीं भी कभी भाव नहीं रखना चाहिए।'

श्लोक 23 (devibhagavatam.6.18.23)

पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां धर्म एव सनातनः । यादृशस्तादृशः सेव्यः सर्वथा शुभकाम्यया

patiśuśrūṣaṇaṁ strīṇāṁ dharma eva sanātanaḥ | yādṛśastādṛśaḥ sevyaḥ sarvathā śubhakāmyayā

'पति की सेवा ही स्त्रियों का सनातन धर्म है; वह जैसा भी हो, कल्याण की कामना से सर्वथा सेव्य है।'

श्लोक 24 (devibhagavatam.6.18.24)

नारायणस्तु सर्वेषां सेव्यो योग्यः सदैव हि । तं त्यक्त्वा देवदेवेशं किं मां ध्यायसि सिन्धुजे

nārāyaṇastu sarveṣāṁ sevyo yogyaḥ sadaiva hi | taṁ tyaktvā devadeveśaṁ kiṁ māṁ dhyāyasi sindhuje

'नारायण ही सबके लिए सदा सेवनीय और योग्य हैं; हे सिंधुजे! उन देवदेवेश को छोड़कर तुम मेरा ध्यान क्यों कर रही हो?'

श्लोक 25 (devibhagavatam.6.18.25)

लक्ष्मीरुवाच । आशुतोष महेशान शप्ताहं पतिना शिव । मां समुद्धर देवेश शापादस्माद्दयानिधे

lakṣmīruvāca | āśutoṣa maheśāna śaptāhaṁ patinā śiva | māṁ samuddhara deveśa śāpādasmāddayānidhe

लक्ष्मी ने कहा — 'हे महेशान! आशुतोष! हे शिव! मैं अपने पति द्वारा शापित हुई हूँ। हे देवेश! हे दयानिधे! मुझे इस शाप से उद्धार दीजिए।'

श्लोक 26 (devibhagavatam.6.18.26)

तदोक्तं हरिणा शम्भो शापानुग्रहकारणम् । विज्ञप्तेन मया कामं दयायुक्तेन विष्णुना

tadoktaṁ hariṇā śambho śāpānugrahakāraṇam | vijñaptena mayā kāmaṁ dayāyuktena viṣṇunā

'शाप और अनुग्रह दोनों का कारण हरि ने मुझे स्वयं बताया, जब मैंने दयायुक्त विष्णु से प्रार्थना की।'

श्लोक 27 (devibhagavatam.6.18.27)

यदा ते भविता पुत्रस्तदा शापस्य मोक्षणम् । भविष्यति च वैकुण्ठवासस्ते कमलालये

yadā te bhavitā putrastadā śāpasya mokṣaṇam | bhaviṣyati ca vaikuṇṭhavāsaste kamalālaye

'"जब तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा, तभी शाप से मुक्ति होगी, और हे कमलालये! तुम्हारा वैकुंठ-निवास पुनः होगा।"'

श्लोक 28 (devibhagavatam.6.18.28)

इत्युक्ताहं तपस्तप्तुमागतास्मि तपोवने । आराधितो मया देव त्वं सर्वार्थप्रदायकः

ityuktāhaṁ tapastaptumāgatāsmi tapovane | ārādhito mayā deva tvaṁ sarvārthapradāyakaḥ

'ऐसा कहे जाने पर मैं तप करने के लिए इस तपोवन में आई हूँ। हे देव! मैंने आपकी आराधना की है, जो सर्वार्थदाता हैं।'

श्लोक 29 (devibhagavatam.6.18.29)

पतिसङ्गं विना पुत्रं देवदेव लभे कथम् । स तु तिष्ठति वैकुण्ठे त्यक्त्वा वामामनागसम्

patisaṅgaṁ vinā putraṁ devadeva labhe katham | sa tu tiṣṭhati vaikuṇṭhe tyaktvā vāmāmanāgasam

'हे देवाधिदेव! पति के संग के बिना पुत्र कैसे प्राप्त करूँ? वे तो निरपराध इस अबला को त्यागकर वैकुंठ में स्थित हैं।'

श्लोक 30 (devibhagavatam.6.18.30)

वरं मे देहि देवेश यदि तुष्टोऽसि शङ्कर । तव तस्य द्विधा भावो नास्ति नूनं कदाचन

varaṁ me dehi deveśa yadi tuṣṭo'si śaṅkara | tava tasya dvidhā bhāvo nāsti nūnaṁ kadācana

'हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं, हे शंकर! मुझे वर दीजिए। आप और उनके बीच निश्चय ही कभी कोई द्वैत नहीं है।'

श्लोक 31 (devibhagavatam.6.18.31)

मयैतद्गिरिजाकान्त ज्ञातं पत्युः पुरो हर । यस्त्वं योऽसौ पुनर्योऽसौ स त्वं नास्त्यत्र संशयः

mayaitadgirijākānta jñātaṁ patyuḥ puro hara | yastvaṁ yo'sau punaryo'sau sa tvaṁ nāstyatra saṁśayaḥ

'हे गिरिजाकांत! मुझे यह अपने पति के सामने ही ज्ञात हो गया था, हे हर! जो आप हैं वही वे हैं, और जो वे हैं वही आप हैं — इसमें संशय नहीं।'

श्लोक 32 (devibhagavatam.6.18.32)

एकत्वं च मया ज्ञात्वा मया ते स्मरणं कृतम् । अन्यथा मम दोषस्त्वामाश्रयन्त्या भवेच्छिव

ekatvaṁ ca mayā jñātvā mayā te smaraṇaṁ kṛtam | anyathā mama doṣastvāmāśrayantyā bhavecchiva

'इस एकत्व को जानकर ही मैंने आपका स्मरण किया है; अन्यथा, हे शिव! आपकी शरण लेना मेरे लिए दोष होता।'

श्लोक 33 (devibhagavatam.6.18.33)

शिव उवाच । कथं ज्ञातस्त्वया देवि मम तस्य च सुन्दरि । ऐक्यभावो हरेर्नूनं सत्यं मे वद सिन्धुजे

śiva uvāca | kathaṁ jñātastvayā devi mama tasya ca sundari | aikyabhāvo harernūnaṁ satyaṁ me vada sindhuje

शिव ने कहा — 'हे देवि, हे सुंदरी! तुम्हें मेरे और हरि के एकत्व-भाव का ज्ञान कैसे हुआ? हे सिंधुजे! मुझे सत्य बताओ।'

श्लोक 34 (devibhagavatam.6.18.34)

एकत्वं च न जानन्ति देवाश्च मुनयस्तथा । ज्ञानिनो वेदतत्त्वज्ञाः कुतर्कोपहताः किल

ekatvaṁ ca na jānanti devāśca munayastathā | jñānino vedatattvajñāḥ kutarkopahatāḥ kila

'यह एकत्व देवता और मुनि भी नहीं जानते; ज्ञानी, वेद-तत्त्वज्ञ भी कुतर्क से आहत होकर इसे नहीं जान पाते।'

श्लोक 35 (devibhagavatam.6.18.35)

मद्भक्ता वासुदेवस्य निन्दका बहवस्तथा । विष्णभक्तास्तु बहवो मम निन्दापरायणाः

madbhaktā vāsudevasya nindakā bahavastathā | viṣṇabhaktāstu bahavo mama nindāparāyaṇāḥ

'मेरे अनेक भक्त वासुदेव की निंदा करने वाले होते हैं, और विष्णु के अनेक भक्त मेरी निंदा में तत्पर रहते हैं —'

श्लोक 36 (devibhagavatam.6.18.36)

भवन्ति कालभेदेन कलौ देवि विशेषतः । कथं ज्ञातस्त्वया भद्रे दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः

bhavanti kālabhedena kalau devi viśeṣataḥ | kathaṁ jñātastvayā bhadre durjñeyo hyakṛtātmabhiḥ

'यह कालभेद से होता है, हे देवि! विशेषकर कलियुग में। हे भद्रे! तुम्हें यह दुर्ज्ञेय तत्त्व, जो अकृतात्मा लोगों के लिए दुर्बोध है, कैसे ज्ञात हुआ?'

श्लोक 37 (devibhagavatam.6.18.37)

सर्वथा त्वैक्यभावस्तु हरेर्मम च दुर्लभः । व्यास उवाच । इति सा शम्भुना पुष्टा तुष्टेन हरिवल्लभा

sarvathā tvaikyabhāvastu harermama ca durlabhaḥ | vyāsa uvāca | iti sā śambhunā puṣṭā tuṣṭena harivallabhā

'हरि और मेरा यह एकत्व सर्वथा दुर्लभ है।' व्यास जी ने कहा — प्रसन्न हुए शंभु द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर हरिवल्लभा रमा ने —

श्लोक 38 (devibhagavatam.6.18.38)

वृत्तान्तं तस्य विज्ञातं प्रवक्तुमुपचक्रमे । शिवं प्रति रमा तत्र प्रसन्नवदना भृशम्

vṛttāntaṁ tasya vijñātaṁ pravaktumupacakrame | śivaṁ prati ramā tatra prasannavadanā bhṛśam

उन्हें जो वृत्तांत ज्ञात हुआ था, वह कहना आरंभ किया — रमा वहाँ शिव के प्रति अत्यंत प्रसन्न मुख से बोलीं।

श्लोक 39 (devibhagavatam.6.18.39)

लक्ष्मीरुवाच । एकदा देवदेवेश विष्णुर्ध्यानपरो रहः । दृष्टो मया तपः कुर्वन्पद्मासनगतो यदा

lakṣmīruvāca | ekadā devadeveśa viṣṇurdhyānaparo rahaḥ | dṛṣṭo mayā tapaḥ kurvanpadmāsanagato yadā

लक्ष्मी ने कहा — 'हे देवदेवेश! एक बार मैंने विष्णु को एकांत में ध्यानमग्न, पद्मासन में बैठे तप करते देखा।'

श्लोक 40 (devibhagavatam.6.18.40)

तदाहं विस्मिता देवं तमपृच्छं पतिं किल । प्रबुद्धं सुप्रसन्नं च ज्ञात्वा विनयपूर्वकम्

tadāhaṁ vismitā devaṁ tamapṛcchaṁ patiṁ kila | prabuddhaṁ suprasannaṁ ca jñātvā vinayapūrvakam

'तब मैं विस्मित होकर उन देव, अपने पति से, उन्हें जागृत और अत्यंत प्रसन्न जानकर, विनयपूर्वक पूछने लगी —'

श्लोक 41 (devibhagavatam.6.18.41)

देवदेव जगन्नाथ यदाहं निर्गतार्णवात् । मथ्यमानात्सुरैर्दैत्यैः सर्वैर्ब्रह्मादिभिः प्रभो

devadeva jagannātha yadāhaṁ nirgatārṇavāt | mathyamānātsurairdaityaiḥ sarvairbrahmādibhiḥ prabho

'"हे देवदेव! जगन्नाथ! जब मैं समुद्र से, जो देवों-दैत्यों तथा ब्रह्मा आदि सभी द्वारा मंथित हो रहा था, उत्पन्न हुई थी, हे प्रभो!"'

श्लोक 42 (devibhagavatam.6.18.42)

वीक्षिताश्च मया सर्वे पतिकामनया तदा । वृतस्त्वं सर्वदेवेभ्यः श्रेष्ठोऽसीति विनिश्चयात्

vīkṣitāśca mayā sarve patikāmanayā tadā | vṛtastvaṁ sarvadevebhyaḥ śreṣṭho'sīti viniścayāt

'"तब पति की कामना से मैंने सभी को देखा, और यह निश्चय करके कि आप सभी देवों में श्रेष्ठ हैं, आपको वरण किया।"'

श्लोक 43 (devibhagavatam.6.18.43)

त्वं कं ध्यायसि सर्वेश संशयोऽयं महान्मम । प्रियोऽसि कैटभारे मे कथयस्व मनोगतम्

tvaṁ kaṁ dhyāyasi sarveśa saṁśayo'yaṁ mahānmama | priyo'si kaiṭabhāre me kathayasva manogatam

'"हे सर्वेश! आप किसका ध्यान करते हैं? यह मेरा बड़ा संशय है। हे कैटभारे! आप मुझे प्रिय हैं, अपने मन की बात बताइए।"'

श्लोक 44 (devibhagavatam.6.18.44)

विष्णुरुवाच । शृणु कान्ते प्रवक्ष्यामि यं ध्यायामि सुरोत्तमम् । आशुतोषं महेशानं गिरिजावल्लभं हृदि

viṣṇuruvāca | śṛṇu kānte pravakṣyāmi yaṁ dhyāyāmi surottamam | āśutoṣaṁ maheśānaṁ girijāvallabhaṁ hṛdi

'विष्णु ने कहा — "सुनो, प्रिये! मैं बताता हूँ, जिस सुरश्रेष्ठ का मैं हृदय में ध्यान करता हूँ — आशुतोष महेशान, गिरिजा के प्रियतम।"'

श्लोक 45 (devibhagavatam.6.18.45)

कदाचिद्देवदेवो मां ध्यायत्यमितविक्रमः । ध्यायाम्यहं च देवेशं शङ्करं त्रिपुरान्तकम्

kadāciddevadevo māṁ dhyāyatyamitavikramaḥ | dhyāyāmyahaṁ ca deveśaṁ śaṅkaraṁ tripurāntakam

'"कभी-कभी अमित पराक्रमी देवाधिदेव मेरा ध्यान करते हैं, और मैं भी उन देवेश शंकर, त्रिपुरांतक का ध्यान करता हूँ।"'

श्लोक 46 (devibhagavatam.6.18.46)

शिवस्याहं प्रियः प्राणः शङ्करस्तु तथा मम । उभयोरन्तरं नास्ति मिथः संसक्तचेतसोः

śivasyāhaṁ priyaḥ prāṇaḥ śaṅkarastu tathā mama | ubhayorantaraṁ nāsti mithaḥ saṁsaktacetasoḥ

'"मैं शिव का प्रिय प्राण हूँ, और शंकर भी वैसे ही मेरे प्रिय हैं; परस्पर आसक्त-चित्त हम दोनों में कोई अंतर नहीं है।"'

श्लोक 47 (devibhagavatam.6.18.47)

नरकं यान्ति ते नूनं ये द्विषन्ति महेश्वरम् । भक्ता मम विशालाक्षि सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम्

narakaṁ yānti te nūnaṁ ye dviṣanti maheśvaram | bhaktā mama viśālākṣi satyametadbravīmyaham

'"जो महेश्वर से द्वेष करते हैं, वे निश्चय ही नरक को जाते हैं, चाहे वे मेरे भक्त ही क्यों न हों, हे विशालाक्षि! यह मैं सत्य कह रहा हूँ।"'

श्लोक 48 (devibhagavatam.6.18.48)

इत्युक्तं देवदेवेन विष्णुना प्रभविष्णुना । एकान्ते किल पृष्टेन मया शैलसुताप्रिय

ityuktaṁ devadevena viṣṇunā prabhaviṣṇunā | ekānte kila pṛṣṭena mayā śailasutāpriya

'हे शैलसुतापति! एकांत में मेरे द्वारा पूछे जाने पर देवदेव, प्रभावशाली विष्णु ने ऐसा कहा।'

श्लोक 49 (devibhagavatam.6.18.49)

तस्मात्त्वां वल्लभं विष्णोर्ज्ञात्वा ध्यातवती ह्यहम् । तथा कुरु महेशान यथा मे प्रियसङ्गमः

tasmāttvāṁ vallabhaṁ viṣṇorjñātvā dhyātavatī hyaham | tathā kuru maheśāna yathā me priyasaṅgamaḥ

'इसलिए आपको विष्णु का प्रियतम जानकर ही मैंने आपका ध्यान किया है। हे महेशान! ऐसा कीजिए, जिससे मुझे मेरे प्रियतम का संग प्राप्त हो।'

श्लोक 50 (devibhagavatam.6.18.50)

व्यास उवाच । इति श्रियो वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच महेश्वरः । तामाश्वास्य प्रियैर्वाक्यैर्यथार्थं वाक्यकोविदः

vyāsa uvāca | iti śriyo vacaḥ śrutvā pratyuvāca maheśvaraḥ | tāmāśvāsya priyairvākyairyathārthaṁ vākyakovidaḥ

व्यास जी ने कहा — श्री (लक्ष्मी) की यह बात सुनकर, वाणी में निपुण महेश्वर ने उन्हें प्रिय और यथार्थ वचनों से सांत्वना देते हुए उत्तर दिया।

श्लोक 51 (devibhagavatam.6.18.51)

स्वस्था भव पृथुश्रोणि तुष्टोऽहं तपसा तव । समागमस्ते पतिना भविष्यति न संशयः

svasthā bhava pṛthuśroṇi tuṣṭo'haṁ tapasā tava | samāgamaste patinā bhaviṣyati na saṁśayaḥ

'हे पृथुश्रोणि! स्वस्थ हो जाओ, तुम्हारे तप से मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा पति से पुनर्मिलन अवश्य होगा, इसमें संशय नहीं।'

श्लोक 52 (devibhagavatam.6.18.52)

अत्रैव हयरूपेण भगवाञ्जगदीश्वरः । आगमिष्यति ते कामं पूर्णं कर्तुं मयेरितः

atraiva hayarūpeṇa bhagavāñjagadīśvaraḥ | āgamiṣyati te kāmaṁ pūrṇaṁ kartuṁ mayeritaḥ

'यहीं घोड़े के रूप में भगवान जगदीश्वर, मेरे भेजे जाने पर, तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने आएँगे।'

श्लोक 53 (devibhagavatam.6.18.53)

तथाहं प्रेरयिष्यामि तं देवं मधुसूदनम् । यथासौ हयरूपेण त्वामेष्यति मदातुरः

tathāhaṁ prerayiṣyāmi taṁ devaṁ madhusūdanam | yathāsau hayarūpeṇa tvāmeṣyati madāturaḥ

'मैं उन देव मधुसूदन को इस प्रकार प्रेरित करूँगा, कि वे घोड़े के रूप में, प्रेमातुर होकर तुम्हारे पास आएँगे।'

श्लोक 54 (devibhagavatam.6.18.54)

पुत्रस्ते भविता सुभ्रु नारायणसमः क्षितौ । भविष्यति स भूपालः सर्वलोकनमस्कृतः

putraste bhavitā subhru nārāyaṇasamaḥ kṣitau | bhaviṣyati sa bhūpālaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ

'हे सुभ्रु! तुम्हें पृथ्वी पर नारायण के समान एक पुत्र प्राप्त होगा; वह सर्वलोक-वंदित राजा होगा।'

श्लोक 55 (devibhagavatam.6.18.55)

सुतं प्राप्य महाभागे त्वं तेन पतिना सह । गन्तासि देवि वैकुण्ठं प्रिया तस्य भविष्यसि

sutaṁ prāpya mahābhāge tvaṁ tena patinā saha | gantāsi devi vaikuṇṭhaṁ priyā tasya bhaviṣyasi

'हे महाभागे! उस पुत्र को प्राप्त कर, तुम अपने उसी पति के साथ वैकुंठ को जाओगी, और पुनः उनकी प्रिया बनोगी।'

श्लोक 56 (devibhagavatam.6.18.56)

एकवीरेति नाम्नासौ ख्यातिं यास्यति ते सुतः । तस्मात्तु हैहयो वंशो भुवि विस्तारमेष्यति

ekavīreti nāmnāsau khyātiṁ yāsyati te sutaḥ | tasmāttu haihayo vaṁśo bhuvi vistārameṣyati

'तुम्हारा वह पुत्र "एकवीर" नाम से ख्याति पाएगा; और उसी से हैहय-वंश पृथ्वी पर विस्तार पाएगा।'

श्लोक 57 (devibhagavatam.6.18.57)

परं तु विस्मृतासि त्वं हृदिस्थां परमेश्वरीम् । मदान्धा मत्तचित्ता च तेन ते फलमीदृशम्

paraṁ tu vismṛtāsi tvaṁ hṛdisthāṁ parameśvarīm | madāndhā mattacittā ca tena te phalamīdṛśam

'परंतु तुम अपने हृदय में स्थित परमेश्वरी को भूल गई थीं, मद से अंधी और मत्तचित्त होकर — इसीलिए तुम्हें ऐसा फल मिला।'

श्लोक 58 (devibhagavatam.6.18.58)

अतस्तद्दोषशान्त्यर्थं हृदिस्थां परदेवताम् । शरणं याहि सर्वात्मभावेन जलधेः सुते

atastaddoṣaśāntyarthaṁ hṛdisthāṁ paradevatām | śaraṇaṁ yāhi sarvātmabhāvena jaladheḥ sute

'इसलिए उस दोष की शांति के लिए, हे जलधि-सुते! हृदयस्थ परादेवता की सर्वात्मभाव से शरण लो।'

श्लोक 59 (devibhagavatam.6.18.59)

अन्यथा तव चित्तं तु कथं गच्छेद्धयोत्तमे । व्यास उवाच । इति दत्त्वा वरं देव्यै भगवाञ्छैलजापतिः

anyathā tava cittaṁ tu kathaṁ gaccheddhayottame | vyāsa uvāca | iti dattvā varaṁ devyai bhagavāñchailajāpatiḥ

'अन्यथा, हे हयोत्तमे! तुम्हारा चित्त कैसे स्थिर होगा?' व्यास जी ने कहा — देवी को इस प्रकार वर देकर, वे भगवान शैलजापति (शिव) —

श्लोक 60 (devibhagavatam.6.18.60)

अन्तर्धानं गतः साक्षादुमया सहितः शिवः । सापि तत्रैव चार्वङ्गी संस्थिता कमलासना

antardhānaṁ gataḥ sākṣādumayā sahitaḥ śivaḥ | sāpi tatraiva cārvaṅgī saṁsthitā kamalāsanā

उमा-सहित साक्षात् अंतर्धान हो गए। वह चारु-अंगी भी वहीं कमलासन पर स्थित रहीं,

श्लोक 61 (devibhagavatam.6.18.61)

ध्यायन्ती चरणाम्भोजं देव्याः परमशोभनम् । देवासुरशिरोरत्ननिघृष्टनखमण्डलम्

dhyāyantī caraṇāmbhojaṁ devyāḥ paramaśobhanam | devāsuraśiroratnanighṛṣṭanakhamaṇḍalam

देवी के परम शोभन चरण-कमल का ध्यान करते हुए, जिसके नखमंडल देवों और असुरों के मुकुट-रत्नों से घर्षित रहते हैं,

श्लोक 62 (devibhagavatam.6.18.62)

प्रेमगद्गदया वाचा तुष्टाव च मुहुर्मुहुः । प्रतीक्षमाणा भर्तारं हयरूपधरं हरिम्

premagadgadayā vācā tuṣṭāva ca muhurmuhuḥ | pratīkṣamāṇā bhartāraṁ hayarūpadharaṁ harim

प्रेम से गद्गद वाणी में बार-बार उनकी स्तुति करती हुईं, अपने पति, घोड़े का रूप धारण करने वाले हरि की प्रतीक्षा करती हुईं।

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