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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 27

नारद का दमयंती से मायामय विवाह

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (devibhagavatam.6.27.1)

नारद उवाच । तत्पुत्र्या वचनं श्रुत्वा राजा धात्रीमुखात्ततः । भार्यां प्रोवाच कैकेयीं समीपस्थां सुलोचनाम्

nārada uvāca | tatputryā vacanaṁ śrutvā rājā dhātrīmukhāttataḥ | bhāryāṁ provāca kaikeyīṁ samīpasthāṁ sulocanām

नारद ने कहा — पुत्री का यह वचन धाय के मुख से सुनकर राजा ने तब निकट बैठी सुनयना पत्नी कैकेयी से कहा —

श्लोक 2 (devibhagavatam.6.27.2)

राजोवाच । यदुक्तं वचनं कान्ते धात्र्या तत्तु त्वया श्रुतम् । वृतोऽयं नारदः कामं मुनिर्वानरवक्त्रभाक्

rājovāca | yaduktaṁ vacanaṁ kānte dhātryā tattu tvayā śrutam | vṛto'yaṁ nāradaḥ kāmaṁ munirvānaravaktrabhāk

राजा ने कहा — हे प्रिये! धाय ने जो वचन कहा, वह तुमने सुना — हमारी पुत्री ने वानरमुख धारी इस मुनि नारद को ही वरण कर लिया है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.6.27.3)

किमिदं चिन्तितं पुत्र्या बुद्धिहीनं विचेष्टितम् । कथमस्मै मया देया कन्या हरिमुखाय सा

kimidaṁ cintitaṁ putryā buddhihīnaṁ viceṣṭitam | kathamasmai mayā deyā kanyā harimukhāya sā

पुत्री का यह कैसा बुद्धिहीन विचार और आचरण है? मैं अपनी उस कन्या को इस वानरमुख को कैसे दे दूँ?

श्लोक 4 (devibhagavatam.6.27.4)

क्वासौ भिक्षुः कुरूपः क्व दमयन्ती ममात्मजा । विपरीतमिदं कार्यं न विधेयं कदाचन

kvāsau bhikṣuḥ kurūpaḥ kva damayantī mamātmajā | viparītamidaṁ kāryaṁ na vidheyaṁ kadācana

कहाँ यह कुरूप भिक्षुक और कहाँ मेरी पुत्री दमयंती? यह विपरीत कार्य कदापि नहीं किया जाना चाहिए।

श्लोक 5 (devibhagavatam.6.27.5)

तामेकान्ते सुकेशान्ते निवारय हठात्सुताम् । युक्त्या मुनिरतां मुग्धां शास्त्रवृद्धानुसारया

tāmekānte sukeśānte nivāraya haṭhātsutām | yuktyā muniratāṁ mugdhāṁ śāstravṛddhānusārayā

हे सुकेशान्ते! एकांत में हठपूर्वक अपनी पुत्री को रोको; युक्तिपूर्वक, शास्त्र और वृद्धों के अनुसार, उस मुनि में आसक्त, मोहग्रस्त कन्या को समझाओ।

श्लोक 6 (devibhagavatam.6.27.6)

इति भर्तृवचः श्रुत्वा जननी तामथाब्रवीत् । च ते रूपं मुनिः क्वासौ वानरास्योऽधनः पुनः

iti bhartṛvacaḥ śrutvā jananī tāmathābravīt | ca te rūpaṁ muniḥ kvāsau vānarāsyo'dhanaḥ punaḥ

पति का यह वचन सुनकर माता ने उससे कहा — और तेरा वह रूप कहाँ, वह मुनि कहाँ, जो अब धनहीन वानरमुख हो गया है?

श्लोक 7 (devibhagavatam.6.27.7)

कथं मोहमवाप्तासि भिक्षुके चतुरा पुनः । लताकोमलदेहा त्वं भस्मरूक्षतनुस्त्वयम्

kathaṁ mohamavāptāsi bhikṣuke caturā punaḥ | latākomaladehā tvaṁ bhasmarūkṣatanustvayam

चतुर होकर भी तू भिक्षुक पर कैसे मोहग्रस्त हो गई? तू लता-सी कोमल देह वाली, और वह भस्म से रूखी देह वाला!

श्लोक 8 (devibhagavatam.6.27.8)

वार्ता वानरवक्त्रेण कथं युक्ता तवानघे । का प्रीतिः कुत्सिते पुंसि भविष्यति शुचिस्मिते

vārtā vānaravaktreṇa kathaṁ yuktā tavānaghe | kā prītiḥ kutsite puṁsi bhaviṣyati śucismite

हे निष्पाप! वानरमुख के साथ बातचीत भी तुझे कैसे शोभा देती है? हे शुचिस्मिते! इस निंदित पुरुष में क्या प्रेम होगा?

श्लोक 9 (devibhagavatam.6.27.9)

वरस्ते राजपुत्रोऽस्तु मा कुरु त्वं वृथा हठम् । पिता ते दुःखमाप्नोति श्रुत्वा धात्रीमुखाद्वचः

varaste rājaputro'stu mā kuru tvaṁ vṛthā haṭham | pitā te duḥkhamāpnoti śrutvā dhātrīmukhādvacaḥ

तेरा पति कोई राजपुत्र हो, व्यर्थ हठ मत कर; धाय के मुख से यह वचन सुनकर तेरे पिता को दुःख होता है।

श्लोक 10 (devibhagavatam.6.27.10)

लग्नां बुबूलवृक्षेण कोमलां मालतीलताम् । दृष्ट्वा कस्य मनः खेदं चतुरस्य न गच्छति

lagnāṁ bubūlavṛkṣeṇa komalāṁ mālatīlatām | dṛṣṭvā kasya manaḥ khedaṁ caturasya na gacchati

कोमल मालती-लता को किसी नीच काँटेदार वृक्ष से लिपटी देखकर किस चतुर के मन को खेद नहीं होता?

श्लोक 11 (devibhagavatam.6.27.11)

दासेरकाय ताम्बूलीदलानि कोमलानि कः । ददाति भक्षणार्थाय मूर्खोऽपि धरणीतले

dāserakāya tāmbūlīdalāni komalāni kaḥ | dadāti bhakṣaṇārthāya mūrkho'pi dharaṇītale

कोमल पान के पत्ते खाने के लिए किसी दास को कौन मूर्ख भी इस पृथ्वी पर देता है?

श्लोक 12 (devibhagavatam.6.27.12)

वीक्ष्य त्वां करसंलग्नां नारदस्य समीपतः । विवाहे वर्तमाने तु कस्य चेतो न दह्यति

vīkṣya tvāṁ karasaṁlagnāṁ nāradasya samīpataḥ | vivāhe vartamāne tu kasya ceto na dahyati

विवाह होते समय तुझे नारद के हाथ में हाथ डाले देखकर किसका हृदय नहीं जलेगा?

श्लोक 13 (devibhagavatam.6.27.13)

कुमुखेन समं वार्ता न रुचिं जनयत्यतः । आमृतेस्तु कथं कालः क्षपितव्यस्त्वयामुना

kumukhena samaṁ vārtā na ruciṁ janayatyataḥ | āmṛtestu kathaṁ kālaḥ kṣapitavyastvayāmunā

उस कुमुख के साथ बातचीत भी रुचिकर नहीं होती; फिर मृत्यु तक का समय तू उसके साथ कैसे बिताएगी?

श्लोक 14 (devibhagavatam.6.27.14)

नारद उवाच । इति मातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती भृशातुरा । मातरं प्राह तन्वङ्गी मयि सा कृतनिश्चया

nārada uvāca | iti māturvacaḥ śrutvā damayantī bhṛśāturā | mātaraṁ prāha tanvaṅgī mayi sā kṛtaniścayā

नारद ने कहा — माता का यह वचन सुनकर अत्यंत व्याकुल, कृशांगी दमयंती ने, जो मेरे प्रति दृढ़निश्चयी थी, माता से कहा —

श्लोक 15 (devibhagavatam.6.27.15)

किं मुखेन च रूपेण मूर्खस्य च धनेन किम् । किं राज्येनाविदग्धस्य रसमार्गाविदोऽस्य च

kiṁ mukhena ca rūpeṇa mūrkhasya ca dhanena kim | kiṁ rājyenāvidagdhasya rasamārgāvido'sya ca

मुख और रूप से क्या लाभ, मूर्ख के धन से भी क्या लाभ? रस-मार्ग से अनभिज्ञ, अपरिष्कृत के राज्य से भी क्या लाभ?

श्लोक 16 (devibhagavatam.6.27.16)

हरिण्योऽपि वने धन्या या नादेन विमोहिताः । मातः प्राणान्प्रयच्छन्ति धिङ्मूर्खान्मानुषान्भुवि

hariṇyo'pi vane dhanyā yā nādena vimohitāḥ | mātaḥ prāṇānprayacchanti dhiṅmūrkhānmānuṣānbhuvi

हे माता! वन की हरिणियाँ भी धन्य हैं, जो स्वर-नाद से मोहित होकर प्राण त्याग देती हैं; धिक्कार है उन मूर्ख मनुष्यों को इस भूमि पर!

श्लोक 17 (devibhagavatam.6.27.17)

नारदो वेत्ति यां विद्यां मातः सप्तस्वरात्मिकाम् । तृतीयः कोऽपि नो वेद शिवादन्यः पुमान्किल

nārado vetti yāṁ vidyāṁ mātaḥ saptasvarātmikām | tṛtīyaḥ ko'pi no veda śivādanyaḥ pumānkila

हे माता! नारद जिस सप्तस्वरात्मक विद्या को जानते हैं, उसे शिव के अतिरिक्त कोई तीसरा नहीं जानता।

श्लोक 18 (devibhagavatam.6.27.18)

मूर्खेण सह संवासो मरणं तत्क्षणे क्षणे । रूपवान्धनवांस्त्याज्यो गुणहीनो नरः सदा

mūrkheṇa saha saṁvāso maraṇaṁ tatkṣaṇe kṣaṇe | rūpavāndhanavāṁstyājyo guṇahīno naraḥ sadā

मूर्ख के साथ रहना क्षण-क्षण में मृत्यु के समान है; रूपवान और धनवान होकर भी गुणहीन पुरुष सदा त्याज्य है।

श्लोक 19 (devibhagavatam.6.27.19)

धिङ्मैत्रीं मूर्खभूपाले वृथा गर्वसमन्विते । गुणज्ञे भिक्षुके श्रेष्ठा वचनात्सुखदायिनी

dhiṅmaitrīṁ mūrkhabhūpāle vṛthā garvasamanvite | guṇajñe bhikṣuke śreṣṭhā vacanātsukhadāyinī

व्यर्थ अभिमान से युक्त मूर्ख राजा से मित्रता को धिक्कार है; गुणज्ञ भिक्षुक श्रेष्ठ है, जिसका वचन ही सुखदायी है।

श्लोक 20 (devibhagavatam.6.27.20)

स्वरज्ञो ग्रामवित्कामं मूर्च्छनाज्ञानभेदभाक् । दुर्लभः पुरुषश्चाष्टरसज्ञो दुर्बलोऽपि वै

svarajño grāmavitkāmaṁ mūrcchanājñānabhedabhāk | durlabhaḥ puruṣaścāṣṭarasajño durbalo'pi vai

स्वर को जानने वाला, ग्राम-राग का ज्ञाता, मूर्च्छना और भेदों को जानने वाला, आठों रसों का ज्ञाता पुरुष दुर्लभ है, चाहे वह शरीर से दुर्बल ही क्यों न हो।

श्लोक 21 (devibhagavatam.6.27.21)

यथा नयति कैलासं गङ्गा चैव सरस्वती । तथा नयति कैलासं स्वरज्ञानविशारदः

yathā nayati kailāsaṁ gaṅgā caiva sarasvatī | tathā nayati kailāsaṁ svarajñānaviśāradaḥ

जैसे गंगा और सरस्वती कैलाश तक ले जाती हैं, वैसे ही स्वर-विज्ञान में निपुण व्यक्ति भी कैलाश तक ले जाता है।

श्लोक 22 (devibhagavatam.6.27.22)

स्वरमानं तु यो वेद स देवो मानुषोऽपि सन् । सप्तभेदं न यो वेद स पशुः सुरराडपि

svaramānaṁ tu yo veda sa devo mānuṣo'pi san | saptabhedaṁ na yo veda sa paśuḥ surarāḍapi

जो स्वर-मान को जानता है, वह मनुष्य होकर भी देवता है; और जो सातों भेदों को नहीं जानता, वह देवराज होकर भी पशु है।

श्लोक 23 (devibhagavatam.6.27.23)

मूर्च्छनातानमार्गं तु श्रुत्वा मोदं न याति यः । स पशुः सर्वथा ज्ञेयो हरिणाः पशवो न हि

mūrcchanātānamārgaṁ tu śrutvā modaṁ na yāti yaḥ | sa paśuḥ sarvathā jñeyo hariṇāḥ paśavo na hi

जो मूर्च्छना और तान के मार्ग को सुनकर आनंदित नहीं होता, वह सर्वथा पशु ही जानना चाहिए — हरिण तो पशु नहीं हैं।

श्लोक 24 (devibhagavatam.6.27.24)

वरं विषधरः सर्पः श्रुत्वा नादं मनोहरम् । अश्रोत्रोऽपि मुदं याति धिक्सकर्णांश्च मानवान्

varaṁ viṣadharaḥ sarpaḥ śrutvā nādaṁ manoharam | aśrotro'pi mudaṁ yāti dhiksakarṇāṁśca mānavān

विषधर सर्प भी श्रेष्ठ है, जो मनोहर नाद सुनकर, कर्णहीन होकर भी आनंदित हो जाता है; धिक्कार है उन कान वाले मनुष्यों को जो नहीं होते!

श्लोक 25 (devibhagavatam.6.27.25)

बालोऽपि सुस्वरं गेयं श्रुत्वा मुदितमानसः । जायते किन्तु ते वृद्धा न जानन्ति धिगस्तु तान्

bālo'pi susvaraṁ geyaṁ śrutvā muditamānasaḥ | jāyate kintu te vṛddhā na jānanti dhigastu tān

बालक भी सुस्वर गीत सुनकर प्रसन्नमन हो जाता है, परन्तु ये वृद्ध लोग नहीं समझते — धिक्कार है उन्हें!

श्लोक 26 (devibhagavatam.6.27.26)

पिता मे किं न जानाति नारदस्य गुणान् बत । द्वितीयः सामगो नास्ति त्रिषु लोकेषु तत्समः

pitā me kiṁ na jānāti nāradasya guṇān bata | dvitīyaḥ sāmago nāsti triṣu lokeṣu tatsamaḥ

क्या मेरे पिता नारद के गुणों को नहीं जानते? तीनों लोकों में उनके समान दूसरा कोई सामगायक नहीं है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.6.27.27)

तस्मादसौ मया नूनं वृतः पूर्वं समागमात् । पश्चाच्छापवशाज्जातो वानरास्यो गुणाकरः

tasmādasau mayā nūnaṁ vṛtaḥ pūrvaṁ samāgamāt | paścācchāpavaśājjāto vānarāsyo guṇākaraḥ

इसलिए मैंने निश्चय ही उन्हें पहली भेंट में ही वरण कर लिया था; बाद में शापवश ही वे गुणों की खान वानरमुख हो गए।

श्लोक 28 (devibhagavatam.6.27.28)

किन्नरा न प्रियाः कस्य भवन्ति तुरगाननाः । गानविद्यासमायुक्ताः किं मुखेन वरेण ह

kinnarā na priyāḥ kasya bhavanti turagānanāḥ | gānavidyāsamāyuktāḥ kiṁ mukhena vareṇa ha

घोड़े के मुख वाले किन्नर भी किसे प्रिय नहीं होते, जब वे गान-विद्या से सम्पन्न हों? पति में सुंदर मुख से क्या लाभ?

श्लोक 29 (devibhagavatam.6.27.29)

पितरं ब्रूहि मे मातर्वृतोऽयं मुनिसत्तमः । तस्मात्त्वमाग्रहं त्यक्त्वा देहि तस्मै च मां मुदा

pitaraṁ brūhi me mātarvṛto'yaṁ munisattamaḥ | tasmāttvamāgrahaṁ tyaktvā dehi tasmai ca māṁ mudā

हे माता! पिता से कहो कि मैंने इन मुनिश्रेष्ठ को वरण कर लिया है; इसलिए हठ त्यागकर प्रसन्नतापूर्वक मुझे उन्हीं को दे दो।

श्लोक 30 (devibhagavatam.6.27.30)

नारद उवाच । इति पुत्र्या वचः श्रुत्वा राज्ञी राज्ञे न्यवेदयत् । आग्रहं सुन्दरी ज्ञात्वा सुताया नारदे मुनौ

nārada uvāca | iti putryā vacaḥ śrutvā rājñī rājñe nyavedayat | āgrahaṁ sundarī jñātvā sutāyā nārade munau

नारद ने कहा — पुत्री का यह वचन सुनकर रानी ने राजा से निवेदन किया, पुत्री के नारद मुनि के प्रति दृढ़ आग्रह को जानकर —

श्लोक 31 (devibhagavatam.6.27.31)

विवाहं कुरु राजेन्द्र दमयन्त्याः शुभे दिने । मुनिना स च सर्वज्ञो वृतोऽसौ मनसानया

vivāhaṁ kuru rājendra damayantyāḥ śubhe dine | muninā sa ca sarvajño vṛto'sau manasānayā

हे राजेन्द्र! शुभ दिन देखकर दमयंती का विवाह सम्पन्न कीजिए; उसने मन से इसी सर्वज्ञ मुनि को वरण किया है।

श्लोक 32 (devibhagavatam.6.27.32)

नारद उवाच । इति सञ्चोदितो राज्ञ्या सञ्जयः पृथिवीपतिः । चकार विथिवत्सर्वं विधिं वैवाहिकं ततः

nārada uvāca | iti sañcodito rājñyā sañjayaḥ pṛthivīpatiḥ | cakāra vithivatsarvaṁ vidhiṁ vaivāhikaṁ tataḥ

नारद ने कहा — रानी द्वारा इस प्रकार प्रेरित होकर पृथ्वीपति संजय ने विवाह की सारी विधि यथाविधि सम्पन्न की।

श्लोक 33 (devibhagavatam.6.27.33)

एवं दारग्रहं कृत्वा वानरास्यः परन्तप । स्थितस्तत्रैव मनसा दह्यमानेन चान्वहम्

evaṁ dāragrahaṁ kṛtvā vānarāsyaḥ parantapa | sthitastatraiva manasā dahyamānena cānvaham

हे परंतप! इस प्रकार पत्नी को प्राप्त करने पर भी मैं, वानरमुख, वहीं रहा, मन प्रतिदिन जलता रहा।

श्लोक 34 (devibhagavatam.6.27.34)

यदाऽऽगच्छद्राजसुता सेवार्थं मम सन्निधौ । अभवं दुःखसन्तप्तस्तदाहं वानराननः

yadā''gacchadrājasutā sevārthaṁ mama sannidhau | abhavaṁ duḥkhasantaptastadāhaṁ vānarānanaḥ

जब भी राजकुमारी मेरी सेवा के लिए मेरे समीप आती, तब मैं वानर-मुख होने के कारण दुःख से संतप्त हो जाता था।

श्लोक 35 (devibhagavatam.6.27.35)

दमयन्ती तु मां वीक्ष्य प्रफुल्लवदनाम्बुजा । शोकं वानरवक्त्रत्वान्न चकार कदाचन

damayantī tu māṁ vīkṣya praphullavadanāmbujā | śokaṁ vānaravaktratvānna cakāra kadācana

परन्तु दमयंती, कमल-सा प्रफुल्लित मुख लिए, मुझे देखकर मेरे वानरमुख के कारण कभी शोक नहीं करती थी।

श्लोक 36 (devibhagavatam.6.27.36)

एवं गच्छति काले तु सहसा पर्वतो मुनिः । कुर्वंस्तीर्थान्यनेकानि द्रष्टुं मां समुपागतः

evaṁ gacchati kāle tu sahasā parvato muniḥ | kurvaṁstīrthānyanekāni draṣṭuṁ māṁ samupāgataḥ

इस प्रकार समय बीतते हुए, एक बार अनेक तीर्थों की यात्रा करते हुए मुनि पर्वत सहसा मुझसे मिलने आ पहुँचे।

श्लोक 37 (devibhagavatam.6.27.37)

मयातिमानितः प्रेम्णा पूजितश्च यथाविधि । आसीन आसने दिव्ये वीक्ष्य मां दुःखितो ह्यभूत्

mayātimānitaḥ premṇā pūjitaśca yathāvidhi | āsīna āsane divye vīkṣya māṁ duḥkhito hyabhūt

मैंने उन्हें अत्यंत आदर और प्रेम से यथाविधि पूजा; दिव्य आसन पर बैठे हुए उन्होंने मुझे देखकर दुःख अनुभव किया।

श्लोक 38 (devibhagavatam.6.27.38)

कृतदारं वानरास्यं दीनं चिन्तातुरं भृशम् । दयावान्मामुवाचेदं पर्वतो मातुलं कृशम्

kṛtadāraṁ vānarāsyaṁ dīnaṁ cintāturaṁ bhṛśam | dayāvānmāmuvācedaṁ parvato mātulaṁ kṛśam

पत्नी-सहित, वानरमुख, दीन और अत्यंत चिंतातुर मुझ कृशकाय को देखकर दयालु पर्वत ने अपने मामा नारद से यह कहा —

श्लोक 39 (devibhagavatam.6.27.39)

मया नारद कोपात्त्वं शप्तोऽसि मुनिसत्तम । निष्कृतिं तस्य शापस्य करोम्यद्य निशामय

mayā nārada kopāttvaṁ śapto'si munisattama | niṣkṛtiṁ tasya śāpasya karomyadya niśāmaya

हे नारद! हे मुनिश्रेष्ठ! मैंने क्रोधवश तुम्हें शाप दिया था; अब सुनो, मैं आज उस शाप का निवारण करता हूँ।

श्लोक 40 (devibhagavatam.6.27.40)

भव त्वं चारुवदनो मम पुण्येन नारद । दृष्ट्वा राजसुतां चित्ते कृपा जाता ममाधुना

bhava tvaṁ cāruvadano mama puṇyena nārada | dṛṣṭvā rājasutāṁ citte kṛpā jātā mamādhunā

हे नारद! मेरे पुण्य से तुम पुनः सुंदर मुख वाले हो जाओ; राजकुमारी को देखकर अब मेरे मन में कृपा उत्पन्न हुई है।

श्लोक 41 (devibhagavatam.6.27.41)

नारद उवाच । मयापि प्रवणं चित्तं कृत्वा श्रुत्वास्य भाषितम् । अनुग्रहः कृतः सद्यस्तस्य शापस्य तत्क्षणात्

nārada uvāca | mayāpi pravaṇaṁ cittaṁ kṛtvā śrutvāsya bhāṣitam | anugrahaḥ kṛtaḥ sadyastasya śāpasya tatkṣaṇāt

नारद ने कहा — उनका यह वचन सुनकर मेरा मन भी द्रवित हो गया; उसी क्षण उस शाप का निवारण सम्पन्न हो गया।

श्लोक 42 (devibhagavatam.6.27.42)

भागिनेय तवाप्यस्तु गमनं सुरसद्मनि । शापस्यानुग्रहः कामं कृतोऽयं पर्वताधुना

bhāgineya tavāpyastu gamanaṁ surasadmani | śāpasyānugrahaḥ kāmaṁ kṛto'yaṁ parvatādhunā

हे भांजे! तुम्हें भी अब देवलोक में जाने का अधिकार प्राप्त हो; अब पर्वत द्वारा यह शाप-निवारण भी सम्पन्न किया गया।

श्लोक 43 (devibhagavatam.6.27.43)

नारद उवाच । जातोऽहं चारुवदनो वचनात्तस्य पश्यतः । राजपुत्री तु सन्तुष्टा मातरं प्राह सत्वरम्

nārada uvāca | jāto'haṁ cāruvadano vacanāttasya paśyataḥ | rājaputrī tu santuṣṭā mātaraṁ prāha satvaram

नारद ने कहा — उनके ही वचन से, उनके देखते-देखते मैं पुनः सुंदर मुख वाला हो गया; तब राजकुमारी अत्यंत संतुष्ट होकर शीघ्र अपनी माता से बोली —

श्लोक 44 (devibhagavatam.6.27.44)

मातस्ते सुमुखो जातो जामाता च महाद्युतिः । वचनात्पर्वतस्याद्य मुक्तशापो मुनेरभूत्

mātaste sumukho jāto jāmātā ca mahādyutiḥ | vacanātparvatasyādya muktaśāpo munerabhūt

हे माता! तुम्हारा जामाता अब सुंदर मुख वाला, महातेजस्वी हो गया है; आज पर्वत के वचन से मुनि शाप-मुक्त हो गए हैं।

श्लोक 45 (devibhagavatam.6.27.45)

तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञ्या कथितं तत्तु राजनि । ययौ द्रष्टुं मुनिं तत्र सञ्जयः प्रीतिमांस्तदा

tacchrutvā vacanaṁ rājñyā kathitaṁ tattu rājani | yayau draṣṭuṁ muniṁ tatra sañjayaḥ prītimāṁstadā

यह सुनकर रानी ने राजा से यह बात कही; तब प्रसन्न होकर संजय मुनि को देखने वहाँ गए।

श्लोक 46 (devibhagavatam.6.27.46)

धनं समर्पितं राज्ञा सन्तुष्टेन तदा महत् । मह्यं च भागिनेयाय पारिबर्हं महात्मना

dhanaṁ samarpitaṁ rājñā santuṣṭena tadā mahat | mahyaṁ ca bhāgineyāya pāribarhaṁ mahātmanā

प्रसन्न राजा ने तब मुझे तथा अपने भांजे-सम पर्वत को भी प्रचुर धन और उस महात्मा द्वारा पारितोषिक अर्पित किया।

श्लोक 47 (devibhagavatam.6.27.47)

एतत्ते सर्वमाख्यातं वर्तनं यत्पुरातनम् । मायाया बलमाहात्म्यं ह्यनुभूतं यथा मया

etatte sarvamākhyātaṁ vartanaṁ yatpurātanam | māyāyā balamāhātmyaṁ hyanubhūtaṁ yathā mayā

यह सब पुरातन वृत्तान्त मैंने तुम्हें सुना दिया, जैसा मैंने स्वयं माया के बल-माहात्म्य का अनुभव किया था।

श्लोक 48 (devibhagavatam.6.27.48)

संसारेऽस्मिन्महाभाग मायागुणकृतेऽनृते । तनुभृत्तु सुखी नास्ति न भूतो न भविष्यति

saṁsāre'sminmahābhāga māyāguṇakṛte'nṛte | tanubhṛttu sukhī nāsti na bhūto na bhaviṣyati

हे महाभाग! इस माया-गुण-रचित मिथ्या संसार में कोई भी देहधारी न कभी सुखी हुआ है, न होगा।

श्लोक 49 (devibhagavatam.6.27.49)

कामक्रोधौ तथा लोभो मत्सरो ममता तथा । अहङ्कारो मदः केन जिताः सर्वे महाबलाः

kāmakrodhau tathā lobho matsaro mamatā tathā | ahaṅkāro madaḥ kena jitāḥ sarve mahābalāḥ

काम-क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, ममता, अहंकार और मद — इन सब महाबली शत्रुओं को किसने जीता है?

श्लोक 50 (devibhagavatam.6.27.50)

सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्रय इमे किल । कारणं प्राणिनां देहसम्भवे सर्वथा मुने

sattvaṁ rajastamaścaiva guṇāstraya ime kila | kāraṇaṁ prāṇināṁ dehasambhave sarvathā mune

सत्त्व, रज और तम — ये तीनों गुण ही, हे मुने, प्राणियों के देहधारण के सर्वथा कारण हैं।

श्लोक 51 (devibhagavatam.6.27.51)

कस्मिंश्चित्समये व्यास वनेऽहं विष्णुना सह । गच्छन्हास्यविनोदेन स्त्रीभावं गमितः क्षणात्

kasmiṁścitsamaye vyāsa vane'haṁ viṣṇunā saha | gacchanhāsyavinodena strībhāvaṁ gamitaḥ kṣaṇāt

हे व्यास! एक बार मैं विष्णु के साथ वन में जाते हुए, हास्य-विनोद में क्षणभर में स्त्री-रूप को प्राप्त हो गया।

श्लोक 52 (devibhagavatam.6.27.52)

राजपत्नीत्वमापन्नो मायाबलविमोहितः । पुत्राः प्रसूता बहवो गेहे तस्य नृपस्य ह

rājapatnītvamāpanno māyābalavimohitaḥ | putrāḥ prasūtā bahavo gehe tasya nṛpasya ha

माया के बल से अत्यंत मोहित होकर मैं किसी राजा की पत्नी बन गया; उस राजा के घर में मुझसे अनेक पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 53 (devibhagavatam.6.27.53)

व्यास उवाच । संशयोऽयं महान्साधो श्रुत्वा ते वचनं किल । कथं नारीत्वमापन्नस्त्वं मुने ज्ञानवान्भृशम्

vyāsa uvāca | saṁśayo'yaṁ mahānsādho śrutvā te vacanaṁ kila | kathaṁ nārītvamāpannastvaṁ mune jñānavānbhṛśam

व्यास जी ने कहा — हे साधो! तुम्हारा यह वचन सुनकर मुझे महान संशय हुआ है — तुम जैसा अत्यंत ज्ञानवान मुनि स्त्री-रूप को कैसे प्राप्त हुआ?

श्लोक 54 (devibhagavatam.6.27.54)

कथं च पुरुषो जातो ब्रूहि सर्वमशेषतः । कथं पुत्रास्त्वया जाताः कस्य राज्ञो गृहेऽञ्जसा

kathaṁ ca puruṣo jāto brūhi sarvamaśeṣataḥ | kathaṁ putrāstvayā jātāḥ kasya rājño gṛhe'ñjasā

और तुम पुनः पुरुष कैसे बने? सब कुछ विस्तार से बताओ — तुमसे किस राजा के घर में वास्तव में पुत्र उत्पन्न हुए?

श्लोक 55 (devibhagavatam.6.27.55)

एतदाख्याहि चरितं मायाया महदद्भुतम् । मोहितं च यया सर्वमिदं स्थावरजङ्गमम्

etadākhyāhi caritaṁ māyāyā mahadadbhutam | mohitaṁ ca yayā sarvamidaṁ sthāvarajaṅgamam

माया का यह महान अद्भुत चरित्र बताओ, जिससे यह सम्पूर्ण चराचर जगत मोहित हो जाता है।

श्लोक 56 (devibhagavatam.6.27.56)

न तृप्तिमधिगच्छामि शृण्वंस्तव कथामृतम् । सर्वग्रन्थार्थतत्त्वं च सर्वसंशयनाशनम्

na tṛptimadhigacchāmi śṛṇvaṁstava kathāmṛtam | sarvagranthārthatattvaṁ ca sarvasaṁśayanāśanam

तुम्हारी इस कथामृत को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती — जो सब ग्रंथों के अर्थ का सार और सभी संशयों का नाशक है।

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