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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 30

माया का प्राबल्य

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

श्लोक 1 (devibhagavatam.6.30.1)

नारद उवाच । मां दृष्ट्वा नारदं विप्रं विस्मितोऽसौ महीपतिः । क्व गता मम भार्या सा कुतोऽयं मुनिसत्तमः

nārada uvāca | māṁ dṛṣṭvā nāradaṁ vipraṁ vismito'sau mahīpatiḥ | kva gatā mama bhāryā sā kuto'yaṁ munisattamaḥ

नारद ने कहा — मुझे ब्राह्मण नारद के रूप में देखकर वह पृथ्वीपति विस्मित हो उठा — मेरी वह पत्नी कहाँ गई? और यह मुनिश्रेष्ठ कहाँ से आया?

श्लोक 2 (devibhagavatam.6.30.2)

विललाप नृपस्तत्र हा प्रियेति मुहुर्मुहुः । क्व गता मां परित्यज्य विलपन्तं वियोगिनम्

vilalāpa nṛpastatra hā priyeti muhurmuhuḥ | kva gatā māṁ parityajya vilapantaṁ viyoginam

वहाँ राजा बार-बार हा प्रिये! कहकर विलाप करने लगा — मुझे त्यागकर, विरह से विलाप करते हुए मुझे छोड़कर तुम कहाँ चली गईं?

श्लोक 3 (devibhagavatam.6.30.3)

विना त्वां विपुलश्रोणि वृथा मे जीवितं गृहम् । राज्यं कमलपत्राक्षि किं करोमि शुचिस्मिते

vinā tvāṁ vipulaśroṇi vṛthā me jīvitaṁ gṛham | rājyaṁ kamalapatrākṣi kiṁ karomi śucismite

हे विपुलश्रोणि! तुम्हारे बिना मेरा जीवन और घर व्यर्थ है; हे कमलपत्राक्षि, हे शुचिस्मिते! मैं राज्य का क्या करूँ?

श्लोक 4 (devibhagavatam.6.30.4)

न प्राणा मे बहिर्यान्ति विरहेण तवाधुना । गतो वै प्रीतिधर्मस्तु त्वामृते प्राणधारणात्

na prāṇā me bahiryānti viraheṇa tavādhunā | gato vai prītidharmastu tvāmṛte prāṇadhāraṇāt

अब तुम्हारे वियोग से भी मेरे प्राण शरीर से नहीं निकलते; प्रेम-धर्म ही मानो चला गया, फिर भी तुम्हारे बिना यह प्राण-धारण चल रहा है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.6.30.5)

विलपामि विशालाक्षि देहि प्रत्युत्तरं प्रियम् । क्व गता सा मयि प्रीतिर्याभूत्प्रथमसङ्गमे

vilapāmi viśālākṣi dehi pratyuttaraṁ priyam | kva gatā sā mayi prītiryābhūtprathamasaṅgame

हे विशालाक्षि! मैं विलाप कर रहा हूँ, मुझे कोई प्रिय उत्तर दो; हमारे प्रथम मिलन में जो प्रेम था, वह कहाँ चला गया?

श्लोक 6 (devibhagavatam.6.30.6)

निमग्ना किं जले सुभ्रूर्भक्षिता मत्स्यकच्छपैः । गृहीता वरुणेनाशु मम दौर्भाग्ययोगतः

nimagnā kiṁ jale subhrūrbhakṣitā matsyakacchapaiḥ | gṛhītā varuṇenāśu mama daurbhāgyayogataḥ

हे सुभ्रु! क्या तुम जल में डूब गईं? क्या मछलियों-कछुओं ने तुम्हें खा लिया? या मेरे ही दुर्भाग्य से वरुण ने तुम्हें शीघ्र ले लिया?

श्लोक 7 (devibhagavatam.6.30.7)

धन्या सुचारुसर्वाङ्गि या त्वं पुत्रैः समागता । अकृत्रिमस्तु पुत्रेषु स्नेहस्तेऽमृतभाषिणि

dhanyā sucārusarvāṅgi yā tvaṁ putraiḥ samāgatā | akṛtrimastu putreṣu snehaste'mṛtabhāṣiṇi

हे सुचारु-सर्वांगी! तुम धन्य थीं, जो पुत्रों सहित थीं; हे अमृतभाषिणी! पुत्रों के प्रति तुम्हारा स्नेह सच्चा था।

श्लोक 8 (devibhagavatam.6.30.8)

न युक्तमधुना यन्मां विहाय त्रिदिवं गता । विलपन्तं पतिं दीनं पुत्रस्नेहेन यन्त्रिता

na yuktamadhunā yanmāṁ vihāya tridivaṁ gatā | vilapantaṁ patiṁ dīnaṁ putrasnehena yantritā

यह उचित नहीं कि पुत्र-स्नेह से बँधी तुम मुझ दीन, विलाप करते पति को छोड़कर स्वर्ग चली गईं।

श्लोक 9 (devibhagavatam.6.30.9)

उभयं मे गतं कान्ते पुत्रास्त्वं प्राणवल्लभा । तथापि मरणं नास्ति दुःखितस्य भृशं प्रिये

ubhayaṁ me gataṁ kānte putrāstvaṁ prāṇavallabhā | tathāpi maraṇaṁ nāsti duḥkhitasya bhṛśaṁ priye

हे कांते! मुझसे दोनों ही चले गए — पुत्र भी और प्राणों से प्रिय तुम भी; फिर भी, हे प्रिये, इतने दुःखी होने पर भी मृत्यु नहीं आती।

श्लोक 10 (devibhagavatam.6.30.10)

किं करोमि क्व गच्छामि रामो नास्ति महीतले । रामाविरहजं दुःखं जानाति रघुनन्दनः

kiṁ karomi kva gacchāmi rāmo nāsti mahītale | rāmāvirahajaṁ duḥkhaṁ jānāti raghunandanaḥ

मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? इस पृथ्वी पर कोई अन्य राम नहीं — रघुनंदन राम ही अपनी प्रिया के वियोग से उत्पन्न दुःख को जानते हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.6.30.11)

विधिना निष्ठुरेणात्र विपरीतं कृतं भुवि । दम्पत्योर्मरणं भिन्नं सर्वथा समचित्तयोः

vidhinā niṣṭhureṇātra viparītaṁ kṛtaṁ bhuvi | dampatyormaraṇaṁ bhinnaṁ sarvathā samacittayoḥ

निष्ठुर विधाता ने यहाँ पृथ्वी पर यह विपरीत किया कि समान-चित्त वाले दंपत्ति की मृत्यु भी अलग-अलग हो जाती है।

श्लोक 12 (devibhagavatam.6.30.12)

उपकारस्तु नारीणां मुनिभिर्विहितः किल । यदुक्तं धर्मशास्त्रेषु ज्वलनं पतिना सह

upakārastu nārīṇāṁ munibhirvihitaḥ kila | yaduktaṁ dharmaśāstreṣu jvalanaṁ patinā saha

मुनियों ने निश्चय ही स्त्रियों के लिए यह उपकार विधान किया है, जो धर्मशास्त्रों में कहा गया है — पति के साथ अग्नि में प्रवेश।

श्लोक 13 (devibhagavatam.6.30.13)

एवं विलपमानं तं राजानं भगवान्हरिः । निवारयामास तदा वचनैर्युक्तियोजितैः

evaṁ vilapamānaṁ taṁ rājānaṁ bhagavānhariḥ | nivārayāmāsa tadā vacanairyuktiyojitaiḥ

इस प्रकार विलाप करते हुए उस राजा को भगवान हरि ने तब युक्तिपूर्ण वचनों से रोका —

श्लोक 14 (devibhagavatam.6.30.14)

श्रीभगवानुवाच । किं विषीदसि राजेन्द्र क्व गता ते प्रियाङ्गना । न श्रुतं किं त्वया शास्त्रं न कृतोऽसौ बुधाश्रयः

śrībhagavānuvāca | kiṁ viṣīdasi rājendra kva gatā te priyāṅganā | na śrutaṁ kiṁ tvayā śāstraṁ na kṛto'sau budhāśrayaḥ

श्रीभगवान ने कहा — हे राजेन्द्र! तुम क्यों विषाद करते हो? तुम्हारी प्रिया कहाँ गई, ऐसा क्यों पूछते हो? क्या तुमने शास्त्र नहीं सुना, ज्ञानियों का आश्रय नहीं लिया?

श्लोक 15 (devibhagavatam.6.30.15)

का सा कस्त्वं क्व संयोगो वियोगः कीदृशस्तव । प्रवाहरूपे संसारे नृणां नौतरतामिव

kā sā kastvaṁ kva saṁyogo viyogaḥ kīdṛśastava | pravāharūpe saṁsāre nṛṇāṁ nautaratāmiva

वह कौन थी, तुम कौन हो, यह संयोग क्या था, और यह वियोग तुम्हारा कैसा है — इस प्रवाहरूप संसार में, जहाँ मनुष्य नौका-यात्रियों के समान हैं?

श्लोक 16 (devibhagavatam.6.30.16)

गृहे गच्छ नृपश्रेष्ठ वृथा ते रुदितेन किम् । संयोगश्च वियोगश्च दैवाधीनः सदा नृणाम्

gṛhe gaccha nṛpaśreṣṭha vṛthā te ruditena kim | saṁyogaśca viyogaśca daivādhīnaḥ sadā nṛṇām

हे राजश्रेष्ठ! घर जाओ, इस व्यर्थ रुदन से क्या लाभ? संयोग और वियोग सदा मनुष्यों के लिए दैव के अधीन होते हैं।

श्लोक 17 (devibhagavatam.6.30.17)

अनया सह ते राजन् संयोगस्त्विह संवृतः । भुक्ता त्वया विशालाक्षी सुन्दरी तनुमध्यमा

anayā saha te rājan saṁyogastviha saṁvṛtaḥ | bhuktā tvayā viśālākṣī sundarī tanumadhyamā

हे राजन्! इसके साथ तुम्हारा संयोग यहाँ अब समाप्त हो गया; उस विशालाक्षी, सुंदरी, तनुमध्यमा का तुमने भोग कर लिया।

श्लोक 18 (devibhagavatam.6.30.18)

न दृष्टौ पितरावस्यास्त्वया प्राप्ता सरोवरे । काकतालीप्रसङ्गेन यद्भूतं तत्तथा गतम्

na dṛṣṭau pitarāvasyāstvayā prāptā sarovare | kākatālīprasaṅgena yadbhūtaṁ tattathā gatam

तुमने इसके माता-पिता को कभी देखा तक नहीं; तुम्हें यह सरोवर में संयोगवश प्राप्त हुई थी; जो हुआ, वह वैसे ही हुआ, और अब बीत चुका।

श्लोक 19 (devibhagavatam.6.30.19)

मा शोकं कुरु राजेन्द्र कालो हि दुरतिक्रमः । कालयोगं समासाद्य भुङ्क्ष्व भोगान् गृहे यथा

mā śokaṁ kuru rājendra kālo hi duratikramaḥ | kālayogaṁ samāsādya bhuṅkṣva bhogān gṛhe yathā

हे राजेन्द्र! शोक मत करो; काल अलंघनीय है। काल के इस योग को स्वीकार कर, घर में पहले की भाँति भोगों का उपभोग करो।

श्लोक 20 (devibhagavatam.6.30.20)

यथागता गता सा तु तथैव वरवर्णिनी । यथा पूर्वं तथा तत्र गच्छ कार्यं कुरु प्रभो

yathāgatā gatā sā tu tathaiva varavarṇinī | yathā pūrvaṁ tathā tatra gaccha kāryaṁ kuru prabho

जैसे वह सुंदरी आई थी, वैसे ही चली गई; पहले की भाँति ही जाओ और अपने कार्य करो, हे प्रभो।

श्लोक 21 (devibhagavatam.6.30.21)

रुदितेन तवाद्यैव नागमिष्यति कामिनी । वृथा शोचसि पृध्वीश योगयुक्तो भवाधुना

ruditena tavādyaiva nāgamiṣyati kāminī | vṛthā śocasi pṛdhvīśa yogayukto bhavādhunā

आज तुम्हारे रोने से वह प्रिया लौटकर नहीं आएगी; हे पृथ्वीश! तुम व्यर्थ शोक करते हो, अब स्थिरचित्त हो जाओ।

श्लोक 22 (devibhagavatam.6.30.22)

भोगः कालवशादेति तथैव प्रतियाति च । नात्र शोकस्तु कर्तव्यो निष्फले भववर्त्मनि

bhogaḥ kālavaśādeti tathaiva pratiyāti ca | nātra śokastu kartavyo niṣphale bhavavartmani

भोग काल के अधीन आता है, और उसी प्रकार चला भी जाता है; इस निष्फल संसार-पथ में शोक नहीं करना चाहिए।

श्लोक 23 (devibhagavatam.6.30.23)

नैकत्र सुखसंयोगो दुःखयोगस्तु नैकतः । घटिकायन्त्रवत्कामं भ्रमणं सुखदुःखयोः

naikatra sukhasaṁyogo duḥkhayogastu naikataḥ | ghaṭikāyantravatkāmaṁ bhramaṇaṁ sukhaduḥkhayoḥ

सुख का संयोग एक ही स्थान पर नहीं रहता, और दुःख का योग भी एक ही स्थान पर नहीं रहता; घटी-यंत्र के समान सुख-दुःख का यह चक्र सदा घूमता रहता है।

श्लोक 24 (devibhagavatam.6.30.24)

मनः कृत्वा स्थिरं भूप कुरु राज्यं यथासुखम् । अथवा न्यस्य दायादे वनं सेवय साम्प्रतम्

manaḥ kṛtvā sthiraṁ bhūpa kuru rājyaṁ yathāsukham | athavā nyasya dāyāde vanaṁ sevaya sāmpratam

हे भूप! मन को स्थिर कर, अपनी इच्छानुसार राज्य करो; अथवा उत्तराधिकारी को सौंपकर अभी वन का आश्रय लो।

श्लोक 25 (devibhagavatam.6.30.25)

दुर्लभो मानुषो देहः प्राणिनां क्षणभङ्गुरः । तस्मिन्प्राप्ते तु कर्तव्यं सर्वथैवात्मसाधनम्

durlabho mānuṣo dehaḥ prāṇināṁ kṣaṇabhaṅguraḥ | tasminprāpte tu kartavyaṁ sarvathaivātmasādhanam

मनुष्य-देह प्राणियों के लिए दुर्लभ है और क्षणभंगुर है; इसे प्राप्त कर सर्वथा आत्म-साधन ही करना चाहिए।

श्लोक 26 (devibhagavatam.6.30.26)

जिह्वोपस्थरसो राजन् पशुयोनिषु वर्तते । ज्ञानं मानुषदेहे वै नान्यासु च कुयोनिषु

jihvopastharaso rājan paśuyoniṣu vartate | jñānaṁ mānuṣadehe vai nānyāsu ca kuyoniṣu

हे राजन्! जिह्वा और इन्द्रियों का रस पशु-योनियों में भी होता है; परन्तु ज्ञान केवल मनुष्य-देह में ही है, अन्य निम्न योनियों में नहीं।

श्लोक 27 (devibhagavatam.6.30.27)

तस्माद्गच्छ गृहं त्यक्त्वा शोकं कान्तासमुद्भवम् । मायेयं भगवत्यास्तु यया सम्मोहितं जगत्

tasmādgaccha gṛhaṁ tyaktvā śokaṁ kāntāsamudbhavam | māyeyaṁ bhagavatyāstu yayā sammohitaṁ jagat

इसलिए पत्नी-वियोगजनित यह शोक त्यागकर घर जाओ; यह तो भगवती की ही माया है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत मोहित है।

श्लोक 28 (devibhagavatam.6.30.28)

नारद उवाच । इत्युक्तो हरिणा राजा प्रणम्य कमलापतिम् । कृत्वा स्नानविधिं सम्यग्जगाम निजमन्दिरम्

nārada uvāca | ityukto hariṇā rājā praṇamya kamalāpatim | kṛtvā snānavidhiṁ samyagjagāma nijamandiram

नारद ने कहा — हरि द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर राजा ने कमलापति को प्रणाम कर, विधिवत स्नान कर, अपने भवन को प्रस्थान किया।

श्लोक 29 (devibhagavatam.6.30.29)

दत्त्वा राज्यं स्वपौत्राय प्राप्य निर्वेदमद्भुतम् । वनं जगाम भूपालस्तत्त्वज्ञानमवाप च

dattvā rājyaṁ svapautrāya prāpya nirvedamadbhutam | vanaṁ jagāma bhūpālastattvajñānamavāpa ca

अपना राज्य अपने ही पौत्र को सौंपकर, अद्भुत वैराग्य को प्राप्त होकर, वह राजा वन को चला गया, और वहाँ तत्त्वज्ञान प्राप्त किया।

श्लोक 30 (devibhagavatam.6.30.30)

गते राजन्यहं वीक्ष्य भगवन्तमधोक्षजम् । तमब्रवं जगन्नाथं हसन्तं मां पुनः पुनः

gate rājanyahaṁ vīkṣya bhagavantamadhokṣajam | tamabravaṁ jagannāthaṁ hasantaṁ māṁ punaḥ punaḥ

राजा के चले जाने पर मैंने भगवान अधोक्षज को बार-बार हँसते हुए देखकर उस जगन्नाथ से कहा —

श्लोक 31 (devibhagavatam.6.30.31)

वञ्चितोऽहं त्वया देव ज्ञातं मायाबलं महत् । स्मरामि चरितं सर्वं स्त्रीदेहे यत्कृतं मया

vañcito'haṁ tvayā deva jñātaṁ māyābalaṁ mahat | smarāmi caritaṁ sarvaṁ strīdehe yatkṛtaṁ mayā

हे देव! आपने मुझे छला; अब मैंने माया के महान बल को जान लिया है। मुझे वह सब कुछ स्मरण है जो मैंने स्त्री-देह में किया।

श्लोक 32 (devibhagavatam.6.30.32)

ब्रूहि मे देवदेवेश प्रविष्टोऽहं सरोवरे । विगतं पूर्वविज्ञानं स्नानादेव कथं हरे

brūhi me devadeveśa praviṣṭo'haṁ sarovare | vigataṁ pūrvavijñānaṁ snānādeva kathaṁ hare

हे देवदेवेश! मुझे बताइए — मैं केवल सरोवर में प्रवेश किया, और केवल स्नान से ही मेरा पूर्व-ज्ञान कैसे लुप्त हो गया, हे हरे?

श्लोक 33 (devibhagavatam.6.30.33)

योषिद्देहं समासाद्य मोहितोऽहं जगद्गुरो । पतिं प्राप्य नृपश्रेष्ठं पुलोमी वासवं यथा

yoṣiddehaṁ samāsādya mohito'haṁ jagadguro | patiṁ prāpya nṛpaśreṣṭhaṁ pulomī vāsavaṁ yathā

हे जगद्गुरो! स्त्री-देह प्राप्त कर मैं उस श्रेष्ठ राजा को पति पाकर मोहित हो गया, जैसे पुलोमी वासव (इन्द्र) को पाकर।

श्लोक 34 (devibhagavatam.6.30.34)

मनस्तदेव तच्चित्तं देहः स च पुरातनः । लिङ्गं तदेव देवेश स्मृतेर्नाशः कथं हरे

manastadeva taccittaṁ dehaḥ sa ca purātanaḥ | liṅgaṁ tadeva deveśa smṛternāśaḥ kathaṁ hare

मन वही था, चित्त वही था, और वह पुरातन देह भी वही था, हे देवेश! फिर स्मृति का नाश कैसे हुआ, हे हरे?

श्लोक 35 (devibhagavatam.6.30.35)

विस्मयोऽयं महान्मेऽत्र ज्ञाननाशं प्रति प्रभो । कथयाद्य रमाकान्त कारणं परमं च यत्

vismayo'yaṁ mahānme'tra jñānanāśaṁ prati prabho | kathayādya ramākānta kāraṇaṁ paramaṁ ca yat

हे प्रभो! ज्ञान के इस नाश को लेकर मुझे महान विस्मय है; हे रमाकांत! अब इसका परम कारण बताइए।

श्लोक 36 (devibhagavatam.6.30.36)

नारीदेहं मया प्राप्य भुक्ता भोगा ह्यनेकशः । सुरापानं कृतं नित्यं विधिहीनं च भोजनम्

nārīdehaṁ mayā prāpya bhuktā bhogā hyanekaśaḥ | surāpānaṁ kṛtaṁ nityaṁ vidhihīnaṁ ca bhojanam

स्त्री-देह प्राप्त कर मैंने अनेक प्रकार के भोग भोगे; नित्य मदिरापान किया और विधिहीन भोजन किया।

श्लोक 37 (devibhagavatam.6.30.37)

मया तदेव न ज्ञातं नारदोऽहमिति स्फुटम् । जानाम्यद्य यथा सर्वं विविक्तं न तथा तदा

mayā tadeva na jñātaṁ nārado'hamiti sphuṭam | jānāmyadya yathā sarvaṁ viviktaṁ na tathā tadā

मुझे तब यह स्पष्ट रूप से ज्ञात ही नहीं था कि मैं नारद हूँ; आज मुझे सब कुछ जैसा स्पष्ट ज्ञात है, वैसा तब नहीं था।

श्लोक 38 (devibhagavatam.6.30.38)

विष्णुरुवाच । पश्य नारद मायावी विलासोऽयं महामते । देहेषु सर्वजन्तूनां दशाभेदा ह्यनेकशः

viṣṇuruvāca | paśya nārada māyāvī vilāso'yaṁ mahāmate | deheṣu sarvajantūnāṁ daśābhedā hyanekaśaḥ

विष्णु ने कहा — हे नारद! हे महामते! देखो, यह मायावी का ही विलास है — सभी प्राणियों के शरीरों में अनेक प्रकार की दशाएँ होती हैं।

श्लोक 39 (devibhagavatam.6.30.39)

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तुरीया देहिनां दशा । तथा देहान्तरे प्राप्ते सन्देहः कीदृशः पुनः

jāgratsvapnasuṣuptiśca turīyā dehināṁ daśā | tathā dehāntare prāpte sandehaḥ kīdṛśaḥ punaḥ

जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय — ये देहधारियों की दशाएँ हैं; तो फिर देह बदलने पर इस प्रकार का संदेह कैसा?

श्लोक 40 (devibhagavatam.6.30.40)

सुप्तो नरो न जानाति न शृणोति वदत्यपि । पुनः प्रबुद्धो जानाति सर्वं ज्ञातमशेषतः

supto naro na jānāti na śṛṇoti vadatyapi | punaḥ prabuddho jānāti sarvaṁ jñātamaśeṣataḥ

सोया हुआ मनुष्य न जानता है, न सुनता है, न बोलता है भी; पुनः जागने पर वह सब कुछ पूर्णरूप से पुनः जान लेता है।

श्लोक 41 (devibhagavatam.6.30.41)

निद्रया चाल्यते चित्तं भवन्ति स्वप्नसम्भवाः । नानाविधा मनोभेदा मनोभावा ह्यनेकशः

nidrayā cālyate cittaṁ bhavanti svapnasambhavāḥ | nānāvidhā manobhedā manobhāvā hyanekaśaḥ

नींद से चित्त चलायमान होता है, और स्वप्न से उत्पन्न अनेक प्रकार के मनोभेद और अनेक मनोभाव उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 42 (devibhagavatam.6.30.42)

गजो मां हन्तुमायाति न शक्तोऽस्मि पलायने । किं करोमि न मे स्थानं यत्र गच्छामि सत्वरः

gajo māṁ hantumāyāti na śakto'smi palāyane | kiṁ karomi na me sthānaṁ yatra gacchāmi satvaraḥ

मुझे मारने हाथी आ रहा है, मैं भाग नहीं सकता, मैं क्या करूँ, मेरा कोई स्थान नहीं, कहाँ शीघ्र जाऊँ — स्वप्न में ऐसा सोचा जाता है।

श्लोक 43 (devibhagavatam.6.30.43)

मृतं पितामहं स्वप्ने पश्यति स्वगृहागतम् । संयोगस्तेन वार्ता च भोजनं सह मन्यते

mṛtaṁ pitāmahaṁ svapne paśyati svagṛhāgatam | saṁyogastena vārtā ca bhojanaṁ saha manyate

स्वप्न में मृत पितामह को अपने घर आया देखता है; और उससे मिलना, बातचीत और साथ भोजन करना भी मान लेता है।

श्लोक 44 (devibhagavatam.6.30.44)

प्रबुद्धः खलु जानाति स्वप्ने दृष्टं सुखासुखम् । स्मृत्वा सर्वं जनेभ्यस्तु विस्तरात्प्रवदत्यपि

prabuddhaḥ khalu jānāti svapne dṛṣṭaṁ sukhāsukham | smṛtvā sarvaṁ janebhyastu vistarātpravadatyapi

जागने पर वह निश्चय ही जानता है कि स्वप्न में देखा गया सुख-दुःख मात्र स्वप्न था; सब कुछ स्मरण कर वह लोगों को विस्तार से सुनाता भी है।

श्लोक 45 (devibhagavatam.6.30.45)

स्वप्नेकोऽपि न जानाति भ्रमोऽयमिति निश्चयः । तथा तथैव विभवो मायाया दुर्गमः किल

svapneko'pi na jānāti bhramo'yamiti niścayaḥ | tathā tathaiva vibhavo māyāyā durgamaḥ kila

परन्तु स्वप्न में कोई भी नहीं जानता कि यह भ्रम है — यह निश्चित है; उसी प्रकार माया का यह ऐश्वर्य भी दुर्गम है।

श्लोक 46 (devibhagavatam.6.30.46)

नाहं नारद जानामि पारं परमदुर्घटम् । गुणानां किल मायाया नैव शम्भुर्न पद्मजः

nāhaṁ nārada jānāmi pāraṁ paramadurghaṭam | guṇānāṁ kila māyāyā naiva śambhurna padmajaḥ

हे नारद! मैं भी इस परम दुर्घट के पार को नहीं जानता; माया के गुणों को न तो शम्भु जानते हैं, न पद्मज।

श्लोक 47 (devibhagavatam.6.30.47)

कोऽन्यो ज्ञातुं समर्थोऽभून्मानतो मन्दधीः पुनः । मायागुणपरिज्ञानं न कस्यापि भवेदिह

ko'nyo jñātuṁ samartho'bhūnmānato mandadhīḥ punaḥ | māyāguṇaparijñānaṁ na kasyāpi bhavediha

फिर कोई अन्य मंदबुद्धि अभिमानवश इसे जानने में कैसे समर्थ हो सकता है? माया के गुणों का पूर्ण ज्ञान यहाँ किसी को भी नहीं है।

श्लोक 48 (devibhagavatam.6.30.48)

गुणत्रयकृतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । विना गुणैर्न संसारो वर्तते किञ्चिदप्यदः

guṇatrayakṛtaṁ sarvaṁ jagatsthāvarajaṅgamam | vinā guṇairna saṁsāro vartate kiñcidapyadaḥ

यह सम्पूर्ण चराचर जगत तीनों गुणों से रचित है; गुणों के बिना यह संसार तनिक भी नहीं होता।

श्लोक 49 (devibhagavatam.6.30.49)

अहं सत्त्वप्रधानोऽस्मि रजस्तमसमन्वितः । न कदाचित्त्रिभिर्हीनो भवामि भुवनेश्वरः

ahaṁ sattvapradhāno'smi rajastamasamanvitaḥ | na kadācittribhirhīno bhavāmi bhuvaneśvaraḥ

मैं स्वयं सत्त्वप्रधान हूँ, फिर भी रज और तम से युक्त हूँ; हे भुवनेश्वर! मैं कभी भी इन तीनों से रहित नहीं होता।

श्लोक 50 (devibhagavatam.6.30.50)

तथा ब्रह्मा पिता तेऽत्र रजोमुख्यः प्रकीर्तितः । तमःसत्त्वसमायुक्तो न ताभ्यामुज्झितः किल

tathā brahmā pitā te'tra rajomukhyaḥ prakīrtitaḥ | tamaḥsattvasamāyukto na tābhyāmujjhitaḥ kila

इसी प्रकार तुम्हारे पिता ब्रह्मा भी रजःप्रधान कहे गए हैं, परन्तु तम और सत्त्व से भी युक्त हैं, इन दोनों से कभी मुक्त नहीं।

श्लोक 51 (devibhagavatam.6.30.51)

शिवस्तथा तमोमुख्यो रजःसत्त्वसमावृतः । गुणत्रयविहीनस्तु नैव कोऽपि मया श्रुतः

śivastathā tamomukhyo rajaḥsattvasamāvṛtaḥ | guṇatrayavihīnastu naiva ko'pi mayā śrutaḥ

शिव भी तमःप्रधान हैं, परन्तु रज और सत्त्व से आवृत हैं; तीनों गुणों से रहित कोई भी मैंने कभी नहीं सुना।

श्लोक 52 (devibhagavatam.6.30.52)

तस्मान्मोहो न कर्तव्यः संसारेऽस्मिन्मुनीश्वर । मायाविनिर्मितेऽसारेऽपारे परमदुर्घटे

tasmānmoho na kartavyaḥ saṁsāre'sminmunīśvara | māyāvinirmite'sāre'pāre paramadurghaṭe

इसलिए, हे मुनीश्वर! माया द्वारा रचित इस असार, अपार, परम दुर्घट संसार में मोह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 53 (devibhagavatam.6.30.53)

दृष्टा माया त्वयाद्यैव भुक्ता भोगा ह्यनेकशः । किं पृच्छसि महाभाग तस्याश्चरितमद्भुतम्

dṛṣṭā māyā tvayādyaiva bhuktā bhogā hyanekaśaḥ | kiṁ pṛcchasi mahābhāga tasyāścaritamadbhutam

तुमने स्वयं ही आज माया को देखा और उसके अनेक भोग भी भोगे; हे महाभाग! फिर उसके अद्भुत चरित्र के विषय में क्यों पूछते हो?

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31