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षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4

इन्द्र और ब्रह्मा सहित देवताओं का विष्णु की शरण में जाना

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (devibhagavatam.6.4.1)

व्यास उवाच । निर्गतास्ते परावृत्तास्तपोविघ्नकराः सुराः । निराशाः कार्यसंसिद्।ह्ध्यै तं दृष्ट्वा दृढचेतसम्

vyāsa uvāca | nirgatāste parāvṛttāstapovighnakarāḥ surāḥ | nirāśāḥ kāryasaṁsid|hdhyai taṁ dṛṣṭvā dṛḍhacetasam

व्यास ने कहा — तप में विघ्न डालने गए वे देवगण, उसे दृढ़चित्त देखकर, कार्यसिद्धि की आशा त्यागकर लौट आए।

श्लोक 2 (devibhagavatam.6.4.2)

जाते वर्षशते पूर्णे ब्रह्मा लोकपितामहः । तत्राजगाम तरसा हंसारूढश्चतुर्मुखः

jāte varṣaśate pūrṇe brahmā lokapitāmahaḥ | tatrājagāma tarasā haṁsārūḍhaścaturmukhaḥ

सौ वर्ष पूर्ण होने पर, लोकपितामह ब्रह्मा, हंस पर आरूढ़ होकर, चतुर्मुख रूप में शीघ्र वहाँ पधारे।

श्लोक 3 (devibhagavatam.6.4.3)

आगत्य तमुवाचेदं त्वष्ट्टपुत्र सुखी भव । त्यक्त्वा ध्यानं वरं ब्रूहि ददामि तव वाञ्छितम्

āgatya tamuvācedaṁ tvaṣṭṭaputra sukhī bhava | tyaktvā dhyānaṁ varaṁ brūhi dadāmi tava vāñchitam

वहाँ आकर उन्होंने कहा — 'हे त्वष्टापुत्र! सुखी रहो, ध्यान त्यागकर वर माँगो, मैं तुम्हारी अभीष्ट वस्तु प्रदान करूँगा।'

श्लोक 4 (devibhagavatam.6.4.4)

तपसा तेऽद्य तुष्टोऽस्मि त्वां दृष्ट्वा चातिकर्शितम् । वरं वरय भद्रं ते मनोऽभिलषितं तव

tapasā te'dya tuṣṭo'smi tvāṁ dṛṣṭvā cātikarśitam | varaṁ varaya bhadraṁ te mano'bhilaṣitaṁ tava

'तुम्हारी तपस्या से मैं आज संतुष्ट हूँ, तुम्हें इतना कृश देखकर। तुम्हारा कल्याण हो — मन में जो अभिलाषा हो, वह वर माँगो।'

श्लोक 5 (devibhagavatam.6.4.5)

व्यास उवाच । वृत्रस्तदातिविशदां पुरतो निशम्य वाचं सुधासमरसां जगदेककर्तुः । सन्त्यज्य योगकलनां सहसोदतिष्ठ\- त्सञ्जातहर्षनयनाश्रुकलाकलापः

vyāsa uvāca | vṛtrastadātiviśadāṁ purato niśamya vācaṁ sudhāsamarasāṁ jagadekakartuḥ | santyajya yogakalanāṁ sahasodatiṣṭha\- tsañjātaharṣanayanāśrukalākalāpaḥ

व्यास ने कहा — तब वृत्र, जगत् के एकमात्र स्रष्टा की वह अत्यंत स्पष्ट, अमृत के समान मधुर वाणी सामने सुनकर, योगसाधना त्यागकर तत्काल उठ खड़ा हुआ, हर्ष के आँसुओं से उसके नेत्र भर गए।

श्लोक 6 (devibhagavatam.6.4.6)

पादौ प्रणम्य शिरसा प्रणयाद्विधातु\- र्बद्धाञ्जलिः पुरत एव समाससाद । प्रोवाच तं सुवरदं तपसा प्रसन्नं प्रेम्णातिगद्गदगिरा विनयेन नम्रः

pādau praṇamya śirasā praṇayādvidhātu\- rbaddhāñjaliḥ purata eva samāsasāda | provāca taṁ suvaradaṁ tapasā prasannaṁ premṇātigadgadagirā vinayena namraḥ

विधाता के चरणों में स्नेहपूर्वक सिर झुकाकर, हाथ जोड़े हुए वह उनके सामने ही आ गया, और तप से प्रसन्न उस वरदाता से, प्रेमवश गद्गद वाणी में, विनयपूर्वक झुककर बोला।

श्लोक 7 (devibhagavatam.6.4.7)

प्राप्तं मया सकलदेवपदं प्रभोऽद्य यद्दर्शनं तव सुदुर्लभमाशु जातम् । वाञ्छास्ति नाथ मनसि प्रवणे दुरापा तां प्रब्रवीमि कमलासन वेत्सि भावम्

prāptaṁ mayā sakaladevapadaṁ prabho'dya yaddarśanaṁ tava sudurlabhamāśu jātam | vāñchāsti nātha manasi pravaṇe durāpā tāṁ prabravīmi kamalāsana vetsi bhāvam

'हे प्रभो! आज मुझे समस्त देवताओं की स्थिति प्राप्त हो गई, क्योंकि आपका अत्यंत दुर्लभ दर्शन मुझे शीघ्र प्राप्त हुआ है। हे नाथ! मेरे भक्तिभाव से पूर्ण मन में एक दुष्प्राप्य इच्छा है — हे कमलासन! मैं वह आपसे कहता हूँ, आप मेरे भाव को जानते ही हैं।'

श्लोक 8 (devibhagavatam.6.4.8)

मृत्युश्च मा भवतु मे किल लोहकाष्ठ\- शुष्कार्द्रवंशनिचयैरपरैश्च शस्त्रैः । वृद्धि प्रयातु मम वीर्यमतीव युद्धे यस्माद्भवामि सबलैरमरैरजेयः

mṛtyuśca mā bhavatu me kila lohakāṣṭha\- śuṣkārdravaṁśanicayairaparaiśca śastraiḥ | vṛddhi prayātu mama vīryamatīva yuddhe yasmādbhavāmi sabalairamarairajeyaḥ

'मेरी मृत्यु लोहे, काठ, सूखे-गीले बाँस के ढेर अथवा अन्य किसी शस्त्र से न हो; मेरा पराक्रम युद्ध में अत्यधिक बढ़े, जिससे मैं समस्त सेनाओं सहित अमरों द्वारा भी अजेय बन जाऊँ।'

श्लोक 9 (devibhagavatam.6.4.9)

व्यास उवाच । इत्थं सम्प्रार्थितो ब्रह्मा तमाह प्रहसन्निव । उत्तिष्ठ गच्छ भद्रं ते वाञ्छितं सफलं सदा

vyāsa uvāca | itthaṁ samprārthito brahmā tamāha prahasanniva | uttiṣṭha gaccha bhadraṁ te vāñchitaṁ saphalaṁ sadā

व्यास ने कहा — इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर ब्रह्मा मुस्कुराते हुए-से बोले — 'उठो, जाओ, तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारी अभीष्ट इच्छा सदा सफल होगी।'

श्लोक 10 (devibhagavatam.6.4.10)

न शुष्केण न चार्द्रेण न पाषाणेन दारुणा । भविष्यति च ते मृत्युरिति सत्यं ब्रवीम्यहम्

na śuṣkeṇa na cārdreṇa na pāṣāṇena dāruṇā | bhaviṣyati ca te mṛtyuriti satyaṁ bravīmyaham

'न सूखे से, न गीले से, न पत्थर से, न काठ से तुम्हारी मृत्यु होगी — यह मैं सत्य कहता हूँ।'

श्लोक 11 (devibhagavatam.6.4.11)

इति दत्त्वा वरं ब्रह्मा जगाम भुवनं परम् । वृत्रस्तु तं वरं लब्धा मुदितः स्वगृहं ययौ

iti dattvā varaṁ brahmā jagāma bhuvanaṁ param | vṛtrastu taṁ varaṁ labdhā muditaḥ svagṛhaṁ yayau

ऐसा वर देकर ब्रह्मा अपने परम लोक को चले गए; वृत्र वह वर पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घर गया।

श्लोक 12 (devibhagavatam.6.4.12)

शशंस पितुरग्रे तद्वरदानं महामतिः । त्वष्टा तु मुदितः प्राप्तं पुत्रं प्राप्तवरं तदा

śaśaṁsa pituragre tadvaradānaṁ mahāmatiḥ | tvaṣṭā tu muditaḥ prāptaṁ putraṁ prāptavaraṁ tadā

उस महामति ने पिता के सामने वह वरदान सुनाया; त्वष्टा तब वर पाए हुए पुत्र को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए।

श्लोक 13 (devibhagavatam.6.4.13)

स्वस्ति तेऽस्तु महाभाग जहि शक्रं रिपुं मम । हत्वागच्छ त्रिशिरसो हन्तारं पापसंयुतम्

svasti te'stu mahābhāga jahi śakraṁ ripuṁ mama | hatvāgaccha triśiraso hantāraṁ pāpasaṁyutam

'हे महाभाग! तुम्हारा कल्याण हो, मेरे शत्रु शक्र का वध करो। त्रिशिरा के पापयुक्त हन्ता को मारकर लौट आओ।'

श्लोक 14 (devibhagavatam.6.4.14)

भव त्वं त्रिदशाधीशः सम्प्राप्य विजयं रणे । ममाधिं छिन्धि विपुलं पुत्रनाशसमुद्भवम्

bhava tvaṁ tridaśādhīśaḥ samprāpya vijayaṁ raṇe | mamādhiṁ chindhi vipulaṁ putranāśasamudbhavam

'युद्ध में विजय प्राप्त कर तुम त्रिदेवाधीश (देवताओं के स्वामी) बनो; पुत्रनाश से उत्पन्न मेरी विशाल व्यथा को दूर करो।'

श्लोक 15 (devibhagavatam.6.4.15)

जीवतो वाक्यकरणात्क्षयाहे भूरिभोजनात् । गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता

jīvato vākyakaraṇātkṣayāhe bhūribhojanāt | gayāyāṁ piṇḍadānācca tribhiḥ putrasya putratā

'जीवित पिता की आज्ञा-पालन से, श्राद्ध के दिन प्रचुर भोजन कराने से, और गया में पिण्डदान से — इन तीन बातों से पुत्र की पुत्रता सिद्ध होती है।'

श्लोक 16 (devibhagavatam.6.4.16)

तस्मात्पुत्र ममात्यर्थं दुःखं नाशितुमर्हसि । त्रिशिरा मम चित्तात्तु नापसर्पति कर्हिचित्

tasmātputra mamātyarthaṁ duḥkhaṁ nāśitumarhasi | triśirā mama cittāttu nāpasarpati karhicit

'अतः हे पुत्र! तुम मेरे अत्यंत दुःख का नाश करने के योग्य हो; त्रिशिरा मेरे चित्त से कभी भी दूर नहीं हटता।'

श्लोक 17 (devibhagavatam.6.4.17)

सुशीलः सत्यवादी च तापसो वेदवित्तमः । अपराधं विना तेन निहतः पापबुद्धिना

suśīlaḥ satyavādī ca tāpaso vedavittamaḥ | aparādhaṁ vinā tena nihataḥ pāpabuddhinā

'सुशील, सत्यवादी, तपस्वी, वेदों में सर्वश्रेष्ठ पंडित — बिना किसी अपराध के ही उस पापबुद्धि द्वारा वह मार डाला गया।'

श्लोक 18 (devibhagavatam.6.4.18)

व्यास उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा वृत्रः परमदुर्जयः । रथमारुह्य तरसा निर्जगाम पितुर्गृहात्

vyāsa uvāca | iti tasya vacaḥ śrutvā vṛtraḥ paramadurjayaḥ | rathamāruhya tarasā nirjagāma piturgṛhāt

व्यास ने कहा — पिता के इन वचनों को सुनकर परम दुर्जय वृत्र रथ पर आरूढ़ होकर शीघ्र पिता के घर से निकल पड़ा।

श्लोक 19 (devibhagavatam.6.4.19)

रणदुन्दुभिनिर्घोषं शङ्खनादं महाबलम् । कारयित्वा प्रयाणं स चकार मदगर्वितः

raṇadundubhinirghoṣaṁ śaṅkhanādaṁ mahābalam | kārayitvā prayāṇaṁ sa cakāra madagarvitaḥ

युद्ध के नगाड़ों की गर्जना और शंखनाद कराकर, महाबली, मद से गर्वित वह प्रस्थान करने लगा।

श्लोक 20 (devibhagavatam.6.4.20)

निर्ययौ नयसंयुक्तः सेवकानिति संवदन् । हत्वा शक्रं ग्रहीष्यामि सुरराज्यमकण्टकम्

niryayau nayasaṁyuktaḥ sevakāniti saṁvadan | hatvā śakraṁ grahīṣyāmi surarājyamakaṇṭakam

नीतियुक्त होकर वह सेवकों से कहता हुआ निकला — 'शक्र को मारकर मैं देवराज्य को निष्कण्टक रूप से ग्रहण करूँगा।'

श्लोक 21 (devibhagavatam.6.4.21)

इत्युक्त्वा निर्जगामाशु स्वसैन्यपरिवारितः । महता सैन्यनादेन भीषयन्नमरावतीम्

ityuktvā nirjagāmāśu svasainyaparivāritaḥ | mahatā sainyanādena bhīṣayannamarāvatīm

ऐसा कहकर वह अपनी सेना से घिरा हुआ शीघ्र निकल पड़ा, अपनी विशाल सेना की गर्जना से अमरावती को भयभीत करता हुआ।

श्लोक 22 (devibhagavatam.6.4.22)

तमागच्छन्तमाज्ञाय तुराषाडपि सत्वरः । सेनोद्योगं भयत्रस्तः कारयामास भारत

tamāgacchantamājñāya turāṣāḍapi satvaraḥ | senodyogaṁ bhayatrastaḥ kārayāmāsa bhārata

उसे आते हुए जानकर तुराषाट् (इन्द्र) भी शीघ्र, भय से कांपते हुए, हे भारत, अपनी सेना तैयार करवाने लगे।

श्लोक 23 (devibhagavatam.6.4.23)

सर्वानाहूय तरसा लोकपालानरिन्दमः । युद्धार्थं प्रेरयन्सर्वान्व्यरोचत महाद्युतिः

sarvānāhūya tarasā lokapālānarindamaḥ | yuddhārthaṁ prerayansarvānvyarocata mahādyutiḥ

उस अरिन्दम (शत्रुदमन) ने शीघ्र सभी लोकपालों को बुलाया; युद्ध के लिए सबको भेजते हुए वह महातेजस्वी सुशोभित हुआ।

श्लोक 24 (devibhagavatam.6.4.24)

गृध्रन्व्यूहं ततः कृत्वा संस्थितः पाकशासनः । तत्राजगाम वेगात्तु वृत्रः परबलार्दनः

gṛdhranvyūhaṁ tataḥ kṛtvā saṁsthitaḥ pākaśāsanaḥ | tatrājagāma vegāttu vṛtraḥ parabalārdanaḥ

तब पाकशासन गृध्रव्यूह बनाकर स्थित हुआ; वहाँ शत्रुसेना का नाशक वृत्र वेगपूर्वक आ पहुँचा।

श्लोक 25 (devibhagavatam.6.4.25)

देवदानवयोस्तावत्सङ्ग्रामस्तुमुलोऽभवत् । वृत्रवासवयोः सङ्ख्ये मनसा विजयैषिणोः

devadānavayostāvatsaṅgrāmastumulo'bhavat | vṛtravāsavayoḥ saṅkhye manasā vijayaiṣiṇoḥ

तब देवताओं और दानवों के मध्य भीषण युद्ध छिड़ गया — वृत्र और वासव के मध्य, दोनों ही मन से विजय की कामना करते हुए।

श्लोक 26 (devibhagavatam.6.4.26)

एवं परस्परं युद्धे सन्दीप्ते भयदे भृशम् । आकूतं देवताः प्रापुर्दैत्याश्च परमां मुदम्

evaṁ parasparaṁ yuddhe sandīpte bhayade bhṛśam | ākūtaṁ devatāḥ prāpurdaityāśca paramāṁ mudam

इस प्रकार परस्पर युद्ध अत्यंत भयंकर रूप से प्रज्वलित होने पर, देवगण चिंतित हो उठे और दैत्य परम हर्ष को प्राप्त हुए।

श्लोक 27 (devibhagavatam.6.4.27)

तोमरैर्भिन्दिपालैश्च खड्गैः परशुपट्टिशैः । जघ्नुः परस्परं देवदैत्या स्वस्ववरायुधैः

tomarairbhindipālaiśca khaḍgaiḥ paraśupaṭṭiśaiḥ | jaghnuḥ parasparaṁ devadaityā svasvavarāyudhaiḥ

तोमर, भिन्दिपाल, खड्ग, परशु और पट्टिश से, देव और दैत्य अपने-अपने श्रेष्ठ अस्त्रों से परस्पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 28 (devibhagavatam.6.4.28)

एवं युद्धे वर्तमाने दारुणे लोमहर्षणे । शक्रं जग्राह सहसा वृत्रः क्रोधसमन्वितः

evaṁ yuddhe vartamāne dāruṇe lomaharṣaṇe | śakraṁ jagrāha sahasā vṛtraḥ krodhasamanvitaḥ

इस प्रकार भीषण, रोमांचकारी युद्ध चलते हुए, क्रोध से भरे वृत्र ने अकस्मात् शक्र को पकड़ लिया।

श्लोक 29 (devibhagavatam.6.4.29)

अपावृत्य मुखे क्षिप्त्वा स्थितो वृत्रः शतक्रतुम् । मुदितोऽभून्महाराज पूर्ववैरमनुस्मरन्

apāvṛtya mukhe kṣiptvā sthito vṛtraḥ śatakratum | mudito'bhūnmahārāja pūrvavairamanusmaran

मुख को खोलकर उसमें शतक्रतु (इन्द्र) को डालकर वृत्र वहीं खड़ा रहा; हे महाराज! पूर्ववैर का स्मरण करते हुए वह प्रसन्न हुआ।

श्लोक 30 (devibhagavatam.6.4.30)

शक्रे ग्रस्तेऽथ वृत्रेण सम्भ्रान्ता निर्जरास्तदा । चुक्रुशः परमार्तास्ते हा शक्रेति मुहुर्मुहुः

śakre graste'tha vṛtreṇa sambhrāntā nirjarāstadā | cukruśaḥ paramārtāste hā śakreti muhurmuhuḥ

शक्र के वृत्र द्वारा निगले जाने पर देवगण घबरा उठे; वे परम पीड़ित होकर बार-बार 'हा शक्र! हा शक्र!' चिल्लाने लगे।

श्लोक 31 (devibhagavatam.6.4.31)

अपावृतं मुखे शक्रं ज्ञात्वा सर्वे दिवौकसः । बृहस्पतिं प्रणम्योचुर्दीना व्यथितचेतसः

apāvṛtaṁ mukhe śakraṁ jñātvā sarve divaukasaḥ | bṛhaspatiṁ praṇamyocurdīnā vyathitacetasaḥ

शक्र के मुख में समा जाने की बात जानकर, समस्त देववासी दीन और व्यथितचित्त होकर बृहस्पति को प्रणाम कर बोले।

श्लोक 32 (devibhagavatam.6.4.32)

किं कर्तव्यं द्विजश्रेष्ठ त्वमस्माकं गुरुः परः । शक्रो ग्रस्तस्तु वृत्रेण रक्षितो देवतान्तरैः

kiṁ kartavyaṁ dvijaśreṣṭha tvamasmākaṁ guruḥ paraḥ | śakro grastastu vṛtreṇa rakṣito devatāntaraiḥ

'हे द्विजश्रेष्ठ! क्या करना चाहिए? आप ही हमारे परम गुरु हैं; शक्र वृत्र द्वारा निगल लिया गया है, अन्य देवताओं द्वारा उसकी रक्षा होनी चाहिए।'

श्लोक 33 (devibhagavatam.6.4.33)

विना शक्रेण किं कुर्मः सर्वे हीनपराक्रमाः । अभिचारं कुरु विभो सत्वरः शक्रमुक्तये

vinā śakreṇa kiṁ kurmaḥ sarve hīnaparākramāḥ | abhicāraṁ kuru vibho satvaraḥ śakramuktaye

'शक्र के बिना हम सब पराक्रमहीन होकर क्या करें? हे विभो! शक्र की मुक्ति के लिए शीघ्र अभिचार (तांत्रिक प्रयोग) कीजिए।'

श्लोक 34 (devibhagavatam.6.4.34)

बृहस्पतिरुवाच । किं कर्तव्यं सुराः क्षिप्तो मुखमध्येऽस्ति वासवः । वृत्रेणोत्सादितो जीवन्नस्ति कोष्ठान्तरे रिपोः

bṛhaspatiruvāca | kiṁ kartavyaṁ surāḥ kṣipto mukhamadhye'sti vāsavaḥ | vṛtreṇotsādito jīvannasti koṣṭhāntare ripoḥ

बृहस्पति ने कहा — 'हे देवगण! क्या किया जाए? वासव उसके मुख के भीतर डाला जा चुका है; वृत्र द्वारा गिराया गया वह शत्रु के उदर में जीवित तो है।'

श्लोक 35 (devibhagavatam.6.4.35)

व्यास उवाच । देवाश्चिन्तातुराः सर्वे तुरासाहं तथाकृतम् । दृष्ट्वा विमृश्य तरसा चक्रुर्यत्नं विमुक्तये

vyāsa uvāca | devāścintāturāḥ sarve turāsāhaṁ tathākṛtam | dṛṣṭvā vimṛśya tarasā cakruryatnaṁ vimuktaye

व्यास ने कहा — तुराषाट् (इन्द्र) की ऐसी दशा देखकर सभी देवगण चिंतित हो उठे; शीघ्र विचार कर वे उनकी मुक्ति के लिए प्रयत्न करने लगे।

श्लोक 36 (devibhagavatam.6.4.36)

असृजन्त महासत्त्वां जृम्भिकां रिपुनाशिनीम् । ततो विजृम्भमाणः स व्यावृतास्यो बभूव ह

asṛjanta mahāsattvāṁ jṛmbhikāṁ ripunāśinīm | tato vijṛmbhamāṇaḥ sa vyāvṛtāsyo babhūva ha

उन्होंने शत्रुनाशिनी महासत्त्वा जृम्भिका (जँभाई की देवी) की सृष्टि की; तब जँभाई लेते हुए वह (वृत्र) मुख खोलने पर विवश हो गया।

श्लोक 37 (devibhagavatam.6.4.37)

विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्यादवापतत् । स्वान्यङ्गान्यपि सङ्क्षिप्य निष्क्रान्तो बलसूदनः

vijṛmbhamāṇasya tato vṛtrasyāsyādavāpatat | svānyaṅgānyapi saṅkṣipya niṣkrānto balasūdanaḥ

वृत्र के जँभाई लेते ही, अपने अंगों को समेटकर, बलसूदन (इन्द्र) उसके मुख से बाहर निकल आया।

श्लोक 38 (devibhagavatam.6.4.38)

ततः प्रभृति लोकेषु जृम्भिका प्राणिसंस्थिता । जहृषुश्च सुराः सर्वे शक्रं दृष्ट्वा विनिर्गतम्

tataḥ prabhṛti lokeṣu jṛmbhikā prāṇisaṁsthitā | jahṛṣuśca surāḥ sarve śakraṁ dṛṣṭvā vinirgatam

तभी से लोक में यह जृम्भिका सभी प्राणियों में स्थित हो गई; और शक्र को सकुशल बाहर निकला देखकर सभी देवगण हर्षित हुए।

श्लोक 39 (devibhagavatam.6.4.39)

ततः प्रववृते युद्धं तयोर्लोकभयप्रदम् । वर्षाणामयुतं यावद्दारुणं लोमहर्षणम्

tataḥ pravavṛte yuddhaṁ tayorlokabhayapradam | varṣāṇāmayutaṁ yāvaddāruṇaṁ lomaharṣaṇam

तब उन दोनों के मध्य लोकभयंकर, भीषण और रोमांचकारी युद्ध पुनः छिड़ गया, जो दस हजार वर्षों तक चला।

श्लोक 40 (devibhagavatam.6.4.40)

एकतश्च सुराः सर्वे युद्धाय समुपस्थिताः । एकतो बलवांस्त्वाष्ट्रः सङ्ग्रामे समवर्तत

ekataśca surāḥ sarve yuddhāya samupasthitāḥ | ekato balavāṁstvāṣṭraḥ saṅgrāme samavartata

एक ओर समस्त देवगण युद्ध के लिए खड़े थे; दूसरी ओर बलवान् त्वाष्ट्र (वृत्र) संग्राम में डटा हुआ था।

श्लोक 41 (devibhagavatam.6.4.41)

यदा व्यवर्धत रणे वृत्रो वरमदावृतः । पराजितस्तदा शक्रस्तेजसा तस्य धर्षितः

yadā vyavardhata raṇe vṛtro varamadāvṛtaḥ | parājitastadā śakrastejasā tasya dharṣitaḥ

जब वर के मद से आवृत वृत्र युद्ध में बढ़ता गया, तब उसके तेज से अभिभूत होकर शक्र पराजित हो गया।

श्लोक 42 (devibhagavatam.6.4.42)

विव्यथे मघवा युद्धे ततः प्राप्य पराजयम् । विषादमगमन्देवा दृष्ट्वा शक्रं पराजितम्

vivyathe maghavā yuddhe tataḥ prāpya parājayam | viṣādamagamandevā dṛṣṭvā śakraṁ parājitam

युद्ध में पराजय पाकर मघवान् व्यथित हो उठे; शक्र को पराजित देखकर देवगण विषाद को प्राप्त हुए।

श्लोक 43 (devibhagavatam.6.4.43)

जग्मुस्त्यक्त्वा रणं सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः । गृहीतं देवसदनं वृत्रेणागत्य रंहसा

jagmustyaktvā raṇaṁ sarve devā indrapurogamāḥ | gṛhītaṁ devasadanaṁ vṛtreṇāgatya raṁhasā

इन्द्र-प्रधान समस्त देवगण युद्ध छोड़कर भाग गए; और वृत्र वेगपूर्वक आकर देवसदन पर अधिकार कर बैठा।

श्लोक 44 (devibhagavatam.6.4.44)

देवोद्यानानिसर्वाणि भुङ्क्तेऽसौ दानवो बलात् । ऐरावतोऽपि दैत्येन गृहीतोऽसौ गजोत्तमः

devodyānānisarvāṇi bhuṅkte'sau dānavo balāt | airāvato'pi daityena gṛhīto'sau gajottamaḥ

वह दानव बलपूर्वक देवताओं के समस्त उद्यानों का भोग करने लगा; उस दैत्य ने श्रेष्ठ गजराज ऐरावत को भी अपने अधिकार में ले लिया।

श्लोक 45 (devibhagavatam.6.4.45)

विमानानि च सर्वाणि गृहीतानि विशाम्पते । उच्चैःश्रवा हयवरो जातस्तस्य वशे तदा

vimānāni ca sarvāṇi gṛhītāni viśāmpate | uccaiḥśravā hayavaro jātastasya vaśe tadā

हे विशाम्पते! समस्त विमान भी उसके अधिकार में आ गए; उच्चैःश्रवा नामक श्रेष्ठ अश्व भी उसके वश में आ गया।

श्लोक 46 (devibhagavatam.6.4.46)

कामधेनुः पारिजातो गणश्चाप्सरसां तथा । गृहीतं रत्नमात्रं तु तेन त्वष्ट्टसुतेन ह

kāmadhenuḥ pārijāto gaṇaścāpsarasāṁ tathā | gṛhītaṁ ratnamātraṁ tu tena tvaṣṭṭasutena ha

कामधेनु, पारिजात वृक्ष, तथा अप्सराओं का समूह — त्वष्टापुत्र (वृत्र) ने समस्त रत्नों को अपने अधिकार में ले लिया।

श्लोक 47 (devibhagavatam.6.4.47)

स्थानभ्रष्टाः सुराः सर्वे गिरिदुर्गेषु संस्थिताः । दुःखमापुः परिभ्रष्टा यज्ञभागात्सुरालयात्

sthānabhraṣṭāḥ surāḥ sarve giridurgeṣu saṁsthitāḥ | duḥkhamāpuḥ paribhraṣṭā yajñabhāgātsurālayāt

अपने स्थान से भ्रष्ट होकर सभी देवगण पर्वत-दुर्गों में जा बसे; यज्ञ-भाग और देवलोक दोनों से वंचित होकर वे दुःखी हुए।

श्लोक 48 (devibhagavatam.6.4.48)

वृत्रः सुरपदं प्राप्य बभूव मदगर्वितः । त्वष्टातीव सुखं प्राप्य मुमोद सुतसंयुतः

vṛtraḥ surapadaṁ prāpya babhūva madagarvitaḥ | tvaṣṭātīva sukhaṁ prāpya mumoda sutasaṁyutaḥ

वृत्र देवपद प्राप्त कर मद से गर्वित हो गया; त्वष्टा भी अत्यंत सुख प्राप्त कर अपने पुत्र सहित आनंदित हुए।

श्लोक 49 (devibhagavatam.6.4.49)

अमन्त्रयन्हितं देवा मुनिभिः सह भारत । किं कर्तव्यमिति प्राप्ते विचिन्त्य भयमोहिताः

amantrayanhitaṁ devā munibhiḥ saha bhārata | kiṁ kartavyamiti prāpte vicintya bhayamohitāḥ

हे भारत! देवगण मुनियों के साथ मिलकर अपने हित के विषय में विचार करने लगे; भय से मोहित होकर वे सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए।

श्लोक 50 (devibhagavatam.6.4.50)

जग्मुः कैलासमचलं सुराः शक्रसमन्विताः । महादेवं प्रणम्योचुः प्रह्वाः प्राञ्जलयो भृशम्

jagmuḥ kailāsamacalaṁ surāḥ śakrasamanvitāḥ | mahādevaṁ praṇamyocuḥ prahvāḥ prāñjalayo bhṛśam

शक्र सहित देवगण कैलास पर्वत गए; महादेव को प्रणाम कर, अत्यंत विनम्र होकर, हाथ जोड़े हुए वे बोले।

श्लोक 51 (devibhagavatam.6.4.51)

देवदेव महादेव कृपासिन्धो महेश्वर । रक्षास्मान्भयभीतांस्तु वृत्रेणातिपराजितान्

devadeva mahādeva kṛpāsindho maheśvara | rakṣāsmānbhayabhītāṁstu vṛtreṇātiparājitān

'हे देवदेव! हे महादेव! हे कृपासिन्धो! हे महेश्वर! वृत्र द्वारा पूर्णतः पराजित, भय से त्रस्त हम सबकी रक्षा कीजिए।'

श्लोक 52 (devibhagavatam.6.4.52)

गृहीतं देवसदनं तेन देव बलीयसा । किं कर्तव्यमतः शम्भो ब्रूहि सत्यं शिवाद्य नः

gṛhītaṁ devasadanaṁ tena deva balīyasā | kiṁ kartavyamataḥ śambho brūhi satyaṁ śivādya naḥ

'हे देव! उस अत्यंत बलवान् ने हमारा देवसदन छीन लिया है; अब हमें क्या करना चाहिए, हे शम्भो? हे शिव! आज हमें सत्य बताइए।'

श्लोक 53 (devibhagavatam.6.4.53)

किं कुर्मः क्व च गच्छामः स्थानभ्रष्टा महेश्वर । दुःखस्य नाधिगच्छामो विनाशोपायमीश्वर

kiṁ kurmaḥ kva ca gacchāmaḥ sthānabhraṣṭā maheśvara | duḥkhasya nādhigacchāmo vināśopāyamīśvara

'हे महेश्वर! हम क्या करें, कहाँ जाएँ, अपने स्थान से भ्रष्ट होकर? हे ईश्वर! हमें इस दुःख के नाश का कोई उपाय नहीं सूझता।'

श्लोक 54 (devibhagavatam.6.4.54)

साहाय्यं कुरु भूतेश व्यथिताः स्म कृपानिधे । वृत्रं जहि मदोत्सिक्तं वरदानबलाद्विभो

sāhāyyaṁ kuru bhūteśa vyathitāḥ sma kṛpānidhe | vṛtraṁ jahi madotsiktaṁ varadānabalādvibho

'हे भूतेश! हमारी सहायता कीजिए, हम व्यथित हैं, हे कृपानिधे! हे विभो! वरदान के बल से उन्मत्त वृत्र का वध कीजिए।'

श्लोक 55 (devibhagavatam.6.4.55)

शिव उवाच । ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा वयं सर्वे हरेः क्षयम् । गत्वा समेत्य तं विष्णुं चिन्तयामो वधोद्यमम्

śiva uvāca | brahmāṇaṁ purataḥ kṛtvā vayaṁ sarve hareḥ kṣayam | gatvā sametya taṁ viṣṇuṁ cintayāmo vadhodyamam

शिव ने कहा — 'ब्रह्मा को आगे करके हम सब हरि के धाम को चलें; वहाँ जाकर विष्णु से मिलकर हम उसके वध का उपाय सोचेंगे।'

श्लोक 56 (devibhagavatam.6.4.56)

स शक्तश्च छलज्ञश्च बलवान्बुद्धिमत्तरः । शरण्यश्च दयाब्धिश्च वासुदेवो जनार्दनः

sa śaktaśca chalajñaśca balavānbuddhimattaraḥ | śaraṇyaśca dayābdhiśca vāsudevo janārdanaḥ

'वे समर्थ, छलज्ञ, बलवान्, अत्यंत बुद्धिमान् हैं; वासुदेव जनार्दन शरणागतवत्सल और करुणासागर भी हैं।'

श्लोक 57 (devibhagavatam.6.4.57)

विना तं देवदेवेशं नार्थसिद्धिर्भविष्यति । तस्मात्तत्र च गन्तव्यं सर्वकार्यार्थसिद्धये

vinā taṁ devadeveśaṁ nārthasiddhirbhaviṣyati | tasmāttatra ca gantavyaṁ sarvakāryārthasiddhaye

'उस देवाधिदेव के बिना कोई कार्यसिद्धि नहीं होगी; अतः समस्त कार्यों की सिद्धि के लिए वहीं जाना चाहिए।'

श्लोक 58 (devibhagavatam.6.4.58)

व्यास उवाच । इति सञ्चिन्त्य ते सर्वे ब्रह्मा शक्रः सशङ्करः । जग्मुर्विष्णोः क्षयं देवाः शरण्यं भक्तवत्सलम्

vyāsa uvāca | iti sañcintya te sarve brahmā śakraḥ saśaṅkaraḥ | jagmurviṣṇoḥ kṣayaṁ devāḥ śaraṇyaṁ bhaktavatsalam

व्यास ने कहा — ऐसा विचार कर ब्रह्मा, शक्र और शंकर सहित सभी देवगण भक्तवत्सल शरणागतवत्सल विष्णु के धाम को गए।

श्लोक 59 (devibhagavatam.6.4.59)

गत्वा विष्णुपदं देवास्तुष्टुवुः परमेश्वरम् । हरिं पुरुषसूक्तेन वेदोक्तेन जगद्गुरुम्

gatvā viṣṇupadaṁ devāstuṣṭuvuḥ parameśvaram | hariṁ puruṣasūktena vedoktena jagadgurum

विष्णुधाम पहुँचकर देवताओं ने परमेश्वर, जगद्गुरु हरि की वेदोक्त पुरुषसूक्त से स्तुति की।

श्लोक 60 (devibhagavatam.6.4.60)

प्रत्यक्षोऽभूज्जगन्नाथस्तेषां स कमलापतिः । सम्मान्य च सुरान्सर्वानित्युवाच पुरःस्थितः

pratyakṣo'bhūjjagannāthasteṣāṁ sa kamalāpatiḥ | sammānya ca surānsarvānityuvāca puraḥsthitaḥ

वह जगन्नाथ, कमलापति, उनके समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट हुए; समस्त देवताओं का सम्मान करते हुए, सामने खड़े होकर वे इस प्रकार बोले।

श्लोक 61 (devibhagavatam.6.4.61)

किमागताः स्म लोकेशा हरब्रह्मसमन्विताः । कारणं कथयध्वं वः सर्वेषां सुरसत्तमाः

kimāgatāḥ sma lokeśā harabrahmasamanvitāḥ | kāraṇaṁ kathayadhvaṁ vaḥ sarveṣāṁ surasattamāḥ

'हे लोकेशो! हर और ब्रह्मा सहित आप सब क्यों पधारे हैं? हे सुरश्रेष्ठो! अपने सबके आगमन का कारण बताइए।'

श्लोक 62 (devibhagavatam.6.4.62)

व्यास उवाच । इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं नोचुर्देवा रमापतिम् । चिन्ताविष्टाः स्थिताः प्रायः सर्वेप्राञ्जलयस्तथा

vyāsa uvāca | iti śrutvā harervākyaṁ nocurdevā ramāpatim | cintāviṣṭāḥ sthitāḥ prāyaḥ sarveprāñjalayastathā

व्यास ने कहा — हरि के इस वचन को सुनकर देवगण रमापति से कुछ न बोले; चिंता में मग्न होकर वे प्रायः मौन खड़े रहे, सभी हाथ जोड़े हुए।

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