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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 16

यज्ञपशु ब्राह्मणपुत्र के वध हेतु विश्वामित्र का निषेध

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.16.1)

व्यास उवाच । गतेऽथ वरुणे राजा रोगेणातीव पीडितः । दुःखाद्दुःखं परं प्राप्य व्यथितोऽभूद् भृशं तदा

vyāsa uvāca gate'tha varuṇe rājā rogeṇātīva pīḍitaḥ duḥkhādduḥkhaṁ paraṁ prāpya vyathito'bhūd bhṛśaṁ tadā

व्यास जी ने कहा — तदनन्तर वरुण के चले जाने पर राजा रोग से अत्यन्त पीड़ित हो गया; दुःख पर दुःख पाकर वह उस समय अत्यन्त व्यथित हो उठा।

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.16.2)

कुमारोऽसौ वने श्रुत्वा पितरं रोगपीडितम् । गमनाय मतिं राजंश्चकार स्नेहयन्त्रितः

kumāro'sau vane śrutvā pitaraṁ rogapīḍitam gamanāya matiṁ rājaṁścakāra snehayantritaḥ

वन में रहने वाले उस कुमार (रोहित) ने अपने पिता को रोग से पीड़ित सुनकर, स्नेह से बंधे हुए, घर जाने का निश्चय किया।

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.16.3)

संवत्सरे व्यतीते तु पितरं द्रष्टुमादरात् । गन्तुकामं तु तं ज्ञात्वा शक्रस्तत्राजगाम ह

saṁvatsare vyatīte tu pitaraṁ draṣṭumādarāt gantukāmaṁ tu taṁ jñātvā śakrastatrājagāma ha

एक वर्ष बीत जाने पर, आदरपूर्वक पिता के दर्शन के लिए जाने की इच्छा करते हुए उसे जानकर, इन्द्र वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.16.4)

वासवस्तु तदा रूपं कृत्वा विप्रस्य सत्वरः । वारयामास युक्त्या वै कुमारं गन्तुमुद्यतम्

vāsavastu tadā rūpaṁ kṛtvā viprasya satvaraḥ vārayāmāsa yuktyā vai kumāraṁ gantumudyatam

वासव (इन्द्र) ने तत्काल ब्राह्मण का रूप धारण करके, जाने को उद्यत उस कुमार को युक्ति से रोक दिया।

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.16.5)

इन्द्र उवाच । राजपुत्र न जानासि राजनीतिं सुदुर्लभाम् । अतः करोषि मूढस्त्वं गमनाय मतिं वृथा

indra uvāca rājaputra na jānāsi rājanītiṁ sudurlabhām ataḥ karoṣi mūḍhastvaṁ gamanāya matiṁ vṛthā

इन्द्र ने कहा — हे राजपुत्र! तुम अत्यन्त दुर्लभ राजनीति को नहीं जानते; इसीलिए हे मूढ़! तुम व्यर्थ ही जाने का विचार कर रहे हो।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.16.6)

पिता तव महाभाग ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । कारयिष्यति होमं ते ज्वलितेऽथ विभावसौ

pitā tava mahābhāga brāhmaṇairvedapāragaiḥ kārayiṣyati homaṁ te jvalite'tha vibhāvasau

हे महाभाग! तुम्हारे पिता वेदपारंगत ब्राह्मणों से प्रज्वलित अग्नि में तुम्हारे लिए होम करवाएँगे।

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.16.7)

आत्मा हि वल्लभस्तात सर्वेषां प्राणिनां खलु । तदर्थे वल्लभाः सन्ति पुत्रदारधनादयः

ātmā hi vallabhastāta sarveṣāṁ prāṇināṁ khalu tadarthe vallabhāḥ santi putradāradhanādayaḥ

हे तात! निश्चय ही सब प्राणियों को अपना शरीर ही सबसे प्रिय होता है; पुत्र, पत्नी, धन आदि तो उसी (शरीर) के लिए प्रिय होते हैं।

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.16.8)

आत्मनो देहरक्षार्थं हत्वा त्वां वल्लभं सुतम् । हवनं कारयित्वासौ रोगमुक्तो भविष्यति

ātmano deharakṣārthaṁ hatvā tvāṁ vallabhaṁ sutam havanaṁ kārayitvāsau rogamukto bhaviṣyati

अपने शरीर की रक्षा के लिए तुम्हें, अपने प्रिय पुत्र को, मार कर हवन करवा देने पर ही वह (तुम्हारा पिता) रोगमुक्त हो सकेगा।

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.16.9)

तस्मात्त्वया न गन्तव्यं राजपुत्र पितुर्गृहे । मृते पितरि गन्तव्यं राज्यार्थे सर्वथा पुनः

tasmāttvayā na gantavyaṁ rājaputra piturgṛhe mṛte pitari gantavyaṁ rājyārthe sarvathā punaḥ

इसलिए हे राजपुत्र! तुम्हें पिता के घर नहीं जाना चाहिए; पिता के मर जाने पर ही राज्य के लिए सर्वथा फिर जाना चाहिए।

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.16.10)

एवं निषेधितस्तत्र वासवेन नृपात्मजः । वनमध्ये स्थितः कामं पुनः संवत्सरं नृप

evaṁ niṣedhitastatra vāsavena nṛpātmajaḥ vanamadhye sthitaḥ kāmaṁ punaḥ saṁvatsaraṁ nṛpa

इस प्रकार वासव द्वारा रोका गया वह राजपुत्र वहाँ वन में ही, हे राजन्! अपनी इच्छा से पुनः एक वर्ष तक ठहर गया।

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.16.11)

अत्यन्तं दुःखितं श्रुत्वा हरिश्चन्द्रं तदाऽऽत्मजः । गमनाय मतिं चक्रे मरणे कृतनिश्चयः

atyantaṁ duḥkhitaṁ śrutvā hariścandraṁ tadā''tmajaḥ gamanāya matiṁ cakre maraṇe kṛtaniścayaḥ

हरिश्चन्द्र को अत्यन्त दुःखी सुनकर उस पुत्र ने फिर से जाने का विचार किया, इस बार मृत्यु का भी निश्चय करके।

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.16.12)

तुषाराड् द्विजरूपेण तत्रागत्य च रोहितम् । निवारयामास सुतं युक्तिवाक्यैः पुनः पुनः

tuṣārāḍ dvijarūpeṇa tatrāgatya ca rohitam nivārayāmāsa sutaṁ yuktivākyaiḥ punaḥ punaḥ

तुषाराट् (इन्द्र) ने पुनः ब्राह्मण का रूप धारण कर वहाँ आकर, बार-बार युक्तिपूर्ण वचनों से रोहित पुत्र को रोक दिया।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.16.13)

हरिश्चन्द्रोऽतिदुःखार्तो वसिष्ठं स्वपुरोहितम् । पप्रच्छ रोगनाशाय तत्रोपायं सुनिश्चितम्

hariścandro'tiduḥkhārto vasiṣṭhaṁ svapurohitam papraccha roganāśāya tatropāyaṁ suniścitam

अत्यन्त दुःख से पीड़ित हरिश्चन्द्र ने अपने पुरोहित वसिष्ठ से रोग के नाश के लिए वहाँ निश्चित उपाय पूछा।

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.16.14)

तमाह ब्रह्मणः पुत्रो यज्ञं कुरु नृपोत्तम । क्रयक्रीतेन पुत्रेण शापमोक्षो भविष्यति

tamāha brahmaṇaḥ putro yajñaṁ kuru nṛpottama krayakrītena putreṇa śāpamokṣo bhaviṣyati

ब्रह्मा के पुत्र (वसिष्ठ) ने उससे कहा — हे राजश्रेष्ठ! यज्ञ करो; मोल लेकर लाए गए पुत्र से शाप का मोचन हो जाएगा।

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.16.15)

पुत्रा दशविधां प्रोक्ता ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । द्रव्येणानीय तस्मात्त्वं पुत्रं कुरु नृपोत्तम

putrā daśavidhāṁ proktā brāhmaṇairvedapāragaiḥ dravyeṇānīya tasmāttvaṁ putraṁ kuru nṛpottama

वेदपारंगत ब्राह्मणों ने पुत्र दस प्रकार के कहे हैं; अतः हे राजश्रेष्ठ! तुम धन देकर एक पुत्र ले आओ।

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.16.16)

वरुणोऽपि प्रसन्नः सन्सुखकारी भविष्यति । लोभात्कोऽपि द्विजः पुत्रं प्रदास्यति स्वराष्ट्रजः

varuṇo'pi prasannaḥ sansukhakārī bhaviṣyati lobhātko'pi dvijaḥ putraṁ pradāsyati svarāṣṭrajaḥ

वरुण भी प्रसन्न होकर सुखकारी हो जाएँगे; लोभवश तुम्हारे ही राज्य में उत्पन्न कोई न कोई ब्राह्मण अपना पुत्र दे ही देगा।

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.16.17)

एवं प्रमोदितो राजा वसिष्ठेन महामना । प्रधानं प्रेरयामास तदन्वेषणकाम्यया

evaṁ pramodito rājā vasiṣṭhena mahāmanā pradhānaṁ prerayāmāsa tadanveṣaṇakāmyayā

इस प्रकार वसिष्ठ द्वारा प्रसन्न किए गए उदारचित्त राजा ने उसकी खोज की इच्छा से अपने प्रधान (मन्त्री) को भेजा।

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.16.18)

अजीगर्तो द्विजः कश्चिद्विषये तस्य भूपतेः । तस्यासंश्च त्रयः पुत्रा निर्धनस्य विशेषतः

ajīgarto dvijaḥ kaścidviṣaye tasya bhūpateḥ tasyāsaṁśca trayaḥ putrā nirdhanasya viśeṣataḥ

उस राजा के राज्य में अजीगर्त नाम का एक ब्राह्मण था, जो विशेष रूप से निर्धन था और जिसके तीन पुत्र थे।

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.16.19)

प्रधानेनाप्यसौ पृष्टः पुत्रार्थं दुर्बलो द्विजः । गवां शतं ददामीति देहि पुत्रं मखाय वै

pradhānenāpyasau pṛṣṭaḥ putrārthaṁ durbalo dvijaḥ gavāṁ śataṁ dadāmīti dehi putraṁ makhāya vai

प्रधानमन्त्री द्वारा पूछे जाने पर उस दुर्बल ब्राह्मण ने पुत्र के बदले कहा — मैं सौ गायें दूँगा, तुम यज्ञ के लिए एक पुत्र दे दो।

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.16.20)

शुनःपुच्छः शुनःशेपः शुनोलाङ्गूल इत्यमी । तेषामेकतमं देहि ददामि तु गवां शतम्

śunaḥpucchaḥ śunaḥśepaḥ śunolāṅgūla ityamī teṣāmekatamaṁ dehi dadāmi tu gavāṁ śatam

शुनःपुच्छ, शुनःशेप और शुनोलाङ्गूल — ये (मेरे तीन पुत्र) हैं; इनमें से किसी एक को दे दो, मैं सौ गायें दे दूँगा।

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.16.21)

अजीगर्तस्तु तच्छ्रुत्वा क्षुधया पीडितो भृशम् । पुत्रं च कतमं तेभ्यो विक्रेतुं वै मनो दधे

ajīgartastu tacchrutvā kṣudhayā pīḍito bhṛśam putraṁ ca katamaṁ tebhyo vikretuṁ vai mano dadhe

यह सुनकर, भूख से अत्यन्त पीड़ित अजीगर्त ने उनमें से किस पुत्र को बेचा जाए, इसका विचार किया।

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.16.22)

कार्याधिकारिणं ज्येष्ठं मत्वा नासावदादमुम् । कनिष्ठं नाप्यदान्माता ममैष इति वादिनी

kāryādhikāriṇaṁ jyeṣṭhaṁ matvā nāsāvadādamum kaniṣṭhaṁ nāpyadānmātā mamaiṣa iti vādinī

ज्येष्ठ पुत्र को कार्यों में अधिकारी मानकर उसने उसे नहीं दिया, और कनिष्ठ को भी माता ने यह कहकर नहीं दिया कि 'यह मेरा प्रिय है'।

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.16.23)

मध्यमं च शुनःशेपं ददौ गवां शतेन च । आनिनाय पशुं चक्रे नरमेधे नराधिपः

madhyamaṁ ca śunaḥśepaṁ dadau gavāṁ śatena ca ānināya paśuṁ cakre naramedhe narādhipaḥ

तब उसने मध्यम पुत्र शुनःशेप को सौ गायों के बदले दे दिया; और राजा ने उस पशुरूप (मनुष्य) को नरमेध यज्ञ के लिए ले आने की व्यवस्था की।

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.16.24)

रुदन्तं दुःखितं दीनं वेपमानं भृशातुरम् । यूपे बद्धं निरीक्ष्यामुं चुक्रुशुर्मुनयस्तदा

rudantaṁ duḥkhitaṁ dīnaṁ vepamānaṁ bhṛśāturam yūpe baddhaṁ nirīkṣyāmuṁ cukruśurmunayastadā

रोते हुए, दुःखी, दीन, अत्यन्त आतुर और काँपते हुए उस बालक को यूप (यज्ञ-स्तम्भ) में बँधा देखकर मुनिजन उस समय चिल्ला उठे।

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.16.25)

शामित्राय पशुं चक्रे नरमेधे नराधिपः । शमिता नाददे शस्त्रं तमालम्भयितुं शिशुम्

śāmitrāya paśuṁ cakre naramedhe narādhipaḥ śamitā nādade śastraṁ tamālambhayituṁ śiśum

राजा ने उस पशु को शामित्र-कर्म (वध-कर्म) के लिए नियुक्त किया, परन्तु शमिता (वध करने वाला पुरोहित) ने उस बालक का वध करने के लिए शस्त्र ग्रहण नहीं किया।

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.16.26)

नाहं द्विजसुतं दीनं रुदन्तं करुणं भृशम् । हनिष्यामि स्वलोभार्थमित्युवाचाप्यसौ तदा

nāhaṁ dvijasutaṁ dīnaṁ rudantaṁ karuṇaṁ bhṛśam haniṣyāmi svalobhārthamityuvācāpyasau tadā

वह भी उस समय बोल उठा — मैं इस दीन, अत्यन्त करुणापूर्वक रोते हुए ब्राह्मण-पुत्र को अपने लोभवश नहीं मारूँगा।

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.16.27)

इत्युक्त्वा विररामासौ कर्मणो दुष्करादथ । राजा आभासदः प्राह किं कर्तव्यमिति द्विजाः

ityuktvā virarāmāsau karmaṇo duṣkarādatha rājā ābhāsadaḥ prāha kiṁ kartavyamiti dvijāḥ

ऐसा कहकर वह उस दुष्कर कर्म से विरत हो गया। तब राजा ने उपस्थित ब्राह्मणों से पूछा — अब क्या करना चाहिए?

श्लोक 28 (devibhagavatam.7.16.28)

जातः किलकिलाशब्दो जनानां क्रोशतां तदा । क्रन्दमाने शुनःशेपे सभायां भृशमद्भुतम्

jātaḥ kilakilāśabdo janānāṁ krośatāṁ tadā krandamāne śunaḥśepe sabhāyāṁ bhṛśamadbhutam

तब सभा में शुनःशेप के रोते-चिल्लाते रहने पर, चिल्ला रहे लोगों का अत्यन्त आश्चर्यजनक कोलाहल उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 29 (devibhagavatam.7.16.29)

अजीगर्तस्तदोत्थाय तमुवाच नृपोत्तमम् । राजन् कार्यं करिष्यामि तवाहं सुस्थिरो भव

ajīgartastadotthāya tamuvāca nṛpottamam rājan kāryaṁ kariṣyāmi tavāhaṁ susthiro bhava

तब अजीगर्त उठ खड़ा हुआ और राजश्रेष्ठ से बोला — हे राजन्! मैं यह कार्य कर दूँगा, तुम स्थिर रहो।

श्लोक 30 (devibhagavatam.7.16.30)

वेतनं द्विगुणं देहि हनिष्यामि पशुं किल । कर्तव्यं मखकार्यं वै मया तेऽद्य धनार्थिना

vetanaṁ dviguṇaṁ dehi haniṣyāmi paśuṁ kila kartavyaṁ makhakāryaṁ vai mayā te'dya dhanārthinā

मुझे दुगुना वेतन दो, मैं ही निश्चय ही पशु का वध कर दूँगा; धन का इच्छुक मैं ही आज यह यज्ञ-कार्य पूरा कर दूँगा।

श्लोक 31 (devibhagavatam.7.16.31)

दुःखितस्य धनार्थस्य सदासूया प्रसूयते । व्यास उवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरिश्चन्द्रो मुदान्वितः

duḥkhitasya dhanārthasya sadāsūyā prasūyate vyāsa uvāca tacchrutvā vacanaṁ tasya hariścandro mudānvitaḥ

दुःखी और धन के इच्छुक मनुष्य में सदा घृणा ही उत्पन्न होती है। व्यास जी ने कहा — यह वचन सुनकर हरिश्चन्द्र हर्षित हुए,

श्लोक 32 (devibhagavatam.7.16.32)

तमुवाच ददाम्यद्य गवां शतमनुत्तमम् । तदाकर्ण्य पिता तस्य पुत्रं हन्तुं समुद्यतः

tamuvāca dadāmyadya gavāṁ śatamanuttamam tadākarṇya pitā tasya putraṁ hantuṁ samudyataḥ

और उससे बोले — मैं आज तुम्हें उत्तम सौ गायें दूँगा। यह सुनते ही उसका पिता पुत्र को मारने के लिए उद्यत हो गया।

श्लोक 33 (devibhagavatam.7.16.33)

लोभेनाकुलचित्तोऽसौ शामित्रे कृतनिश्चयः । समुद्यतं च तं दृष्ट्वा जनाः सर्वे सभासदः

lobhenākulacitto'sau śāmitre kṛtaniścayaḥ samudyataṁ ca taṁ dṛṣṭvā janāḥ sarve sabhāsadaḥ

लोभ से व्याकुल चित्त वाला वह, वध-कर्म के लिए दृढ़ निश्चय करके शस्त्र उठाने को उद्यत हुआ; उसे इस प्रकार उद्यत देखकर सभा में बैठे सब लोग

श्लोक 34 (devibhagavatam.7.16.34)

चुक्रुशुर्भृशदुःखार्ता हाहेति जगदुर्वचः । पिशाचोऽयं महापापी क्रूरकर्मा द्विजाकृतिः

cukruśurbhṛśaduḥkhārtā hāheti jagadurvacaḥ piśāco'yaṁ mahāpāpī krūrakarmā dvijākṛtiḥ

अत्यन्त दुःख से पीड़ित होकर 'हाय-हाय' चिल्ला उठे और कठोर वचन बोलने लगे — यह ब्राह्मण के रूप में महापापी, क्रूरकर्मा पिशाच है,

श्लोक 35 (devibhagavatam.7.16.35)

यत्स्वयं स्वसुतं हन्तुमुद्यतः कुलपांसनः । धिक्चाण्डाल किमेतत्ते पापकर्म चिकीर्षितम्

yatsvayaṁ svasutaṁ hantumudyataḥ kulapāṁsanaḥ dhikcāṇḍāla kimetatte pāpakarma cikīrṣitam

जो अपने ही पुत्र को मारने के लिए स्वयं उद्यत है — कुल का कलंक! धिक्कार है तुझे, हे चाण्डाल! यह कैसा पाप-कर्म तू करना चाहता है?

श्लोक 36 (devibhagavatam.7.16.36)

हत्वा सुतं धनं प्राप्य किं सुखं ते भविष्यति । आत्मा वै जायते पुत्र अङ्गाद्वै वेदभाषितम्

hatvā sutaṁ dhanaṁ prāpya kiṁ sukhaṁ te bhaviṣyati ātmā vai jāyate putra aṅgādvai vedabhāṣitam

पुत्र को मारकर धन पाकर तुम्हें क्या सुख मिलेगा? वेद कहता है कि पुत्र मनुष्य के अपने अंग से ही, स्वयं अपने आत्मा के रूप में उत्पन्न होता है।

श्लोक 37 (devibhagavatam.7.16.37)

तत्कथं पापबुद्धे त्वमात्मानं हन्तुमिच्छसि । एवं कोलाहले तत्र जाते कुशिकनन्दनः

tatkathaṁ pāpabuddhe tvamātmānaṁ hantumicchasi evaṁ kolāhale tatra jāte kuśikanandanaḥ

तो हे पापबुद्धि! तुम अपने ही आत्मा को मारने की इच्छा क्यों करते हो? इस प्रकार वहाँ कोलाहल मच जाने पर, कुशिक के पुत्र (विश्वामित्र) ने

श्लोक 38 (devibhagavatam.7.16.38)

समीपं नृपतेर्गत्वा तमुवाच दयापरः । विश्वामित्र उवाच । राजन्नमुं शुनःशेपं रुदन्तं भृशदुःखितम्

samīpaṁ nṛpatergatvā tamuvāca dayāparaḥ viśvāmitra uvāca rājannamuṁ śunaḥśepaṁ rudantaṁ bhṛśaduḥkhitam

राजा के पास जाकर, दया से भरकर, उससे कहा। विश्वामित्र ने कहा — हे राजन्! इस अत्यन्त दुःखी, रोते हुए शुनःशेप को —

श्लोक 39 (devibhagavatam.7.16.39)

क्रतुस्ते भविता पूर्णो रोगनाशश्च सर्वथा । दयासमं नास्ति पुण्यं पापं हिंसासमं नहि

kratuste bhavitā pūrṇo roganāśaśca sarvathā dayāsamaṁ nāsti puṇyaṁ pāpaṁ hiṁsāsamaṁ nahi

तुम्हारा यज्ञ पूर्ण हो जाएगा और रोग का नाश भी सर्वथा हो जाएगा, इसके लिए इसे मुक्त कर दो — दया के समान कोई पुण्य नहीं है, हिंसा के समान कोई पाप नहीं है।

श्लोक 40 (devibhagavatam.7.16.40)

रागिणां रोचनार्थाय नोदनेयं विचारय । आत्मदेहस्य रक्षार्थं परदेहनिकृन्तनम्

rāgiṇāṁ rocanārthāya nodaneyaṁ vicāraya ātmadehasya rakṣārthaṁ paradehanikṛntanam

आसक्त मनुष्यों की तुष्टि के लिए दी गई यह प्रेरणा उचित नहीं — इस पर विचार करो; अपने शरीर की रक्षा के लिए दूसरे के शरीर को काट डालना

श्लोक 41 (devibhagavatam.7.16.41)

न कर्तव्यं महाराज सर्वतः शुभमिच्छता । दयया सर्वभूतेषु सन्तुष्टो येन केन च

na kartavyaṁ mahārāja sarvataḥ śubhamicchatā dayayā sarvabhūteṣu santuṣṭo yena kena ca

हे महाराज! सर्वथा कल्याण चाहने वाले को नहीं करना चाहिए; जिस किसी भी उपाय से सब प्राणियों के प्रति दया रखकर सन्तुष्ट रहना चाहिए।

श्लोक 42 (devibhagavatam.7.16.42)

सर्वेन्द्रियोपशान्त्या च तुष्यत्याशु जगत्पतिः । आत्मवत्सर्वभूतेषु चिन्तनीयं नृपोत्तम

sarvendriyopaśāntyā ca tuṣyatyāśu jagatpatiḥ ātmavatsarvabhūteṣu cintanīyaṁ nṛpottama

सब इन्द्रियों के उपशान्त होने से जगत् का स्वामी शीघ्र प्रसन्न हो जाता है; हे राजश्रेष्ठ! सब प्राणियों के प्रति अपने समान भाव से ही विचार करना चाहिए।

श्लोक 43 (devibhagavatam.7.16.43)

जीवितव्यं प्रियं नूनं सर्वेषां सर्वदा किल । त्वमिच्छसि सुखं कर्तुं देहे हत्वा त्वमुं द्विजम्

jīvitavyaṁ priyaṁ nūnaṁ sarveṣāṁ sarvadā kila tvamicchasi sukhaṁ kartuṁ dehe hatvā tvamuṁ dvijam

जीवन तो निश्चय ही सबको सदा प्रिय होता है; तुम अपने शरीर को सुख देने के लिए इस ब्राह्मण को मारकर सुख करना चाहते हो —

श्लोक 44 (devibhagavatam.7.16.44)

कथं नेच्छेदसौ देहं रक्षितुं स्वसुखास्पदम् । पूर्वजन्मकृतं वैरं नानेन सह ते नृप

kathaṁ necchedasau dehaṁ rakṣituṁ svasukhāspadam pūrvajanmakṛtaṁ vairaṁ nānena saha te nṛpa

तो यह भी अपने शरीर की, जो उसके सुख का आधार है, रक्षा क्यों न चाहेगा? हे राजन्! इसके साथ तुम्हारा कोई पूर्वजन्म का वैर तो नहीं है,

श्लोक 45 (devibhagavatam.7.16.45)

येनामुं हन्तुकामस्त्वं द्विजपुत्रं निरागसम् । यो यं हन्ति विना वैरं स्वकामः सततं पुनः

yenāmuṁ hantukāmastvaṁ dvijaputraṁ nirāgasam yo yaṁ hanti vinā vairaṁ svakāmaḥ satataṁ punaḥ

जिसके कारण तुम इस निरपराध ब्राह्मण-पुत्र को मारना चाहते हो। जो कोई बिना वैर के, केवल अपनी कामना के वशीभूत होकर बार-बार किसी को मारता है,

श्लोक 46 (devibhagavatam.7.16.46)

हन्तारं हन्ति तं प्राप्य जननं जननान्तरे । जनकोऽस्य सुदुष्टात्मा येनासौ ते समर्पितः

hantāraṁ hanti taṁ prāpya jananaṁ jananāntare janako'sya suduṣṭātmā yenāsau te samarpitaḥ

वह मारने वाले को अगले जन्म में पाकर स्वयं उसे मार डालता है। इसका पिता अत्यन्त दुष्टात्मा, धन के लोभ से पापाचारी और दुर्मति है,

श्लोक 47 (devibhagavatam.7.16.47)

स्वात्मजो धनलोभेन पापाचारः सुदुर्मतिः । एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्

svātmajo dhanalobhena pāpācāraḥ sudurmatiḥ eṣṭavyā bahavaḥ putrā yadyeko'pi gayāṁ vrajet

जिसके कारण यह तुम्हें सौंपा गया है। बहुत-से पुत्रों की कामना करनी चाहिए, कि उनमें से एक भी गया-तीर्थ जाकर श्राद्ध करे,

श्लोक 48 (devibhagavatam.7.16.48)

यजेत चाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् । देशमध्ये च यः कश्चित्पापकर्म समाचरेत्

yajeta cāśvamedhena nīlaṁ vā vṛṣamutsṛjet deśamadhye ca yaḥ kaścitpāpakarma samācaret

अश्वमेध यज्ञ करे अथवा नीलवृष का उत्सर्ग करे। इस देश में जो कोई भी पाप-कर्म करता है,

श्लोक 49 (devibhagavatam.7.16.49)

षष्ठांशस्तस्य पापस्य राजा भुङ्क्ते न संशयः । निषेधनीयो राज्ञासौ पापं कर्तुं समुद्यतः

ṣaṣṭhāṁśastasya pāpasya rājā bhuṅkte na saṁśayaḥ niṣedhanīyo rājñāsau pāpaṁ kartuṁ samudyataḥ

उस पाप के छठे अंश का निःसन्देह राजा भोग करता है, यदि राजा पाप करने को उद्यत उस व्यक्ति को न रोके।

श्लोक 50 (devibhagavatam.7.16.50)

न निषिद्धस्त्वया कस्मात्पुत्रं विक्रेतुमुद्यतः । सूर्यवंशे समुत्पन्नस्त्रिशङ्कुतनयः शुभः

na niṣiddhastvayā kasmātputraṁ vikretumudyataḥ sūryavaṁśe samutpannastriśaṅkutanayaḥ śubhaḥ

तुमने इसे पुत्र बेचने से क्यों नहीं रोका? यह त्रिशंकु का शुभ पुत्र सूर्यवंश में उत्पन्न हुआ है —

श्लोक 51 (devibhagavatam.7.16.51)

आर्यस्त्वनार्यवत्कर्म कर्तुमिच्छसि पार्थिव । मोचनान्मुनिपुत्रस्य करणाद्वचनस्य मे

āryastvanāryavatkarma kartumicchasi pārthiva mocanānmuniputrasya karaṇādvacanasya me

हे राजन्! तुम आर्य होकर भी अनार्यों जैसा कर्म करना चाहते हो — इस मुनिपुत्र को मुक्त करके और मेरा यह वचन मानकर

श्लोक 52 (devibhagavatam.7.16.52)

तव देहे सुखं राजन् भविष्यत्यविचारणात् । पिता ते शापयोगेन चाण्डालत्वमुपागतः

tava dehe sukhaṁ rājan bhaviṣyatyavicāraṇāt pitā te śāpayogena cāṇḍālatvamupāgataḥ

तुम्हें बिना किसी विचार के अपने शरीर में सुख प्राप्त होगा। तुम्हारे पिता शाप के प्रभाव से चाण्डालत्व को प्राप्त हुए थे,

श्लोक 53 (devibhagavatam.7.16.53)

मयासौ तेन देहेन स्वर्लोकं प्रापितः किल । तेनैव प्रीतियोगेन कुरु मे वचनं नृप

mayāsau tena dehena svarlokaṁ prāpitaḥ kila tenaiva prītiyogena kuru me vacanaṁ nṛpa

मैंने ही उन्हें उस देह के साथ स्वर्गलोक भिजवाया था; उसी प्रेम के नाते तुम मेरा यह वचन मान लो, हे राजन्!

श्लोक 54 (devibhagavatam.7.16.54)

मुञ्चैनं बालकं दीनं रुदन्तं भृशमातुरम् । याचितोऽसि मया नूनं यज्ञेऽस्मिन् राजसूयके

muñcainaṁ bālakaṁ dīnaṁ rudantaṁ bhṛśamāturam yācito'si mayā nūnaṁ yajñe'smin rājasūyake

इस दीन, रोते हुए, अत्यन्त व्याकुल बालक को मुक्त कर दो; इस राजसूय यज्ञ में मैंने तुमसे यही याचना की है।

श्लोक 55 (devibhagavatam.7.16.55)

प्रार्थनाभङ्गजं दोषं कथं त्वं नावबुध्यसे । प्रार्थितं सर्वदा देयं मखेऽस्मिन्नृपसत्तम

prārthanābhaṅgajaṁ doṣaṁ kathaṁ tvaṁ nāvabudhyase prārthitaṁ sarvadā deyaṁ makhe'sminnṛpasattama

प्रार्थना भंग करने से उत्पन्न दोष को तुम क्यों नहीं समझते? हे राजश्रेष्ठ! इस यज्ञ में जो कुछ भी माँगा जाए, वह सदा दे देना चाहिए,

श्लोक 56 (devibhagavatam.7.16.56)

अन्यथा पापमेव स्यात्तव राजन्न संशयः । व्यास उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा कौशिकस्य नृपोतमः

anyathā pāpameva syāttava rājanna saṁśayaḥ vyāsa uvāca iti tasya vacaḥ śrutvā kauśikasya nṛpotamaḥ

अन्यथा हे राजन्! निःसन्देह पाप ही होगा। व्यास जी ने कहा — कौशिक (विश्वामित्र) के इस वचन को सुनकर राजश्रेष्ठ ने

श्लोक 57 (devibhagavatam.7.16.57)

प्रत्युवाच महाराज कौशिकं मुनिसत्तमम् । जलोदरेण गाधेय दुःखितोऽहं भृशं मुने

pratyuvāca mahārāja kauśikaṁ munisattamam jalodareṇa gādheya duḥkhito'haṁ bhṛśaṁ mune

महाराज कौशिक, उन मुनिश्रेष्ठ को उत्तर दिया — हे गाधि-पुत्र! मैं जलोदर से अत्यन्त दुःखी हूँ, हे मुने!

श्लोक 58 (devibhagavatam.7.16.58)

तस्मान्न मोचयाम्येनमन्यत्प्रार्थय कौशिक । न त्वया विग्रहः कार्यः कार्येऽस्मिन्मम सर्वथा

tasmānna mocayāmyenamanyatprārthaya kauśika na tvayā vigrahaḥ kāryaḥ kārye'sminmama sarvathā

इसलिए मैं इसे मुक्त नहीं करूँगा; कुछ और वर माँगो, हे कौशिक! इस कार्य में तुम्हें मुझसे सर्वथा विवाद नहीं करना चाहिए।

श्लोक 59 (devibhagavatam.7.16.59)

तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञो विश्वामित्रोऽतिकोपनः । बभूव दुःखसन्तप्तो वीक्ष्य दीनं द्विजात्मजम्

tacchrutvā vacanaṁ rājño viśvāmitro'tikopanaḥ babhūva duḥkhasantapto vīkṣya dīnaṁ dvijātmajam

राजा के इस वचन को सुनकर विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधित हो उठे, और उस दीन ब्राह्मण-पुत्र को देखकर वे दुःख से सन्तप्त हो गए।

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