Skip to main content

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 21

विश्वामित्र की अन्तिम चेतावनी और रानी का निवेदन

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.21.1)

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो विश्वामित्रो महातपाः । अन्तकेन समः क्रुद्धो धनं स्वं याचितुं हृदा

etasminnantare prāpto viśvāmitro mahātapāḥ antakena samaḥ kruddho dhanaṁ svaṁ yācituṁ hṛdā

इसी बीच महातपस्वी विश्वामित्र वहाँ आ पहुँचे, यमराज के समान क्रोधित, अपने हृदय में अपना धन माँगने के लिए दृढ़ निश्चय किए हुए।

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.21.2)

तमालोक्य हरिश्चन्द्रः पपात भुवि मूर्च्छितः । स वारिणा तमभ्युक्ष्य राजानमिदमब्रवीत्

tamālokya hariścandraḥ papāta bhuvi mūrcchitaḥ sa vāriṇā tamabhyukṣya rājānamidamabravīt

उन्हें देखते ही हरिश्चन्द्र भूमि पर मूर्च्छित होकर गिर पड़े; उन्होंने जल से उन्हें सींचकर राजा से यह कहा —

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.21.3)

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजेन्द्र स्वां ददस्वेष्टदक्षिणाम् । ऋणं धारयतां दुःखमहन्यहनि वर्धते

uttiṣṭhottiṣṭha rājendra svāṁ dadasveṣṭadakṣiṇām ṛṇaṁ dhārayatāṁ duḥkhamahanyahani vardhate

हे राजेन्द्र! उठो, उठो, अपनी वांछित दक्षिणा दे दो; ऋण धारण करने वालों का दुःख प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.21.4)

आप्यायमानः स तदा हिमशीतेन वारिणा । अवाप्य चेतनां राजा विश्वामित्रमवेक्ष्य च

āpyāyamānaḥ sa tadā himaśītena vāriṇā avāpya cetanāṁ rājā viśvāmitramavekṣya ca

बर्फ के समान शीतल उस जल से सिंचित होकर, चेतना पाकर, राजा ने विश्वामित्र की ओर देखा,

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.21.5)

पुनर्मोहं समापेदे ह्यथ क्रोधं ययौ मुनिः समाश्वास्य च राजानं वाक्यमाह द्विजोत्तमः

punarmohaṁ samāpede hyatha krodhaṁ yayau muniḥ samāśvāsya ca rājānaṁ vākyamāha dvijottamaḥ

और फिर से मूर्च्छित हो गया; तब मुनि क्रोध से भर गए, और उस ब्राह्मणश्रेष्ठ ने राजा को समझाकर यह वचन कहा।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.21.6)

विश्वामित्र उवाच । दीयतां दक्षिणा सा मे यदि धैर्यमवेक्षसे । सत्येनार्कः प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी

viśvāmitra uvāca dīyatāṁ dakṣiṇā sā me yadi dhairyamavekṣase satyenārkaḥ pratapati satye tiṣṭhati medinī

विश्वामित्र ने कहा — यदि तुम धैर्य रखते हो, तो मुझे मेरी वह दक्षिणा दो; सत्य के ही बल से सूर्य तपता है, सत्य पर ही यह पृथ्वी टिकी है।

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.21.7)

सत्ये प्रोक्तः परो धर्मः स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः । अश्वमेधसहस्रं तु सत्यं च तुलया धृतम्

satye proktaḥ paro dharmaḥ svargaḥ satye pratiṣṭhitaḥ aśvamedhasahasraṁ tu satyaṁ ca tulayā dhṛtam

सत्य में ही परम धर्म कहा गया है, सत्य में ही स्वर्ग प्रतिष्ठित है; एक ओर सहस्र अश्वमेध यज्ञ रखे जाएँ और दूसरी ओर सत्य, तराजू पर तौले जाएँ,

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.21.8)

अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेकं विशिष्यते । अथवा किं ममैतेन प्रोक्तेनास्ति प्रयोजनम्

aśvamedhasahasrāddhi satyamekaṁ viśiṣyate athavā kiṁ mamaitena proktenāsti prayojanam

तो सहस्र अश्वमेध यज्ञों से भी सत्य ही श्रेष्ठ ठहरता है। अथवा मुझे इस कहे हुए से क्या प्रयोजन है?

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.21.9)

मदीयां दक्षिणां राजन्न दास्यति भवान्यदि । अस्ताचलगते ह्यर्के शप्स्यामि त्वामतो ध्रुवम्

madīyāṁ dakṣiṇāṁ rājanna dāsyati bhavānyadi astācalagate hyarke śapsyāmi tvāmato dhruvam

हे राजन्! यदि आप मुझे मेरी दक्षिणा नहीं देंगे, तो सूर्य के अस्ताचल में जाते ही मैं निश्चय ही तुम्हें शाप दे दूँगा।

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.21.10)

इत्युक्त्वा स ययौ विप्रो राजा चासीद्भयातुरः । दुःखीभूतोऽवनौ निःस्वो नृशंसमुनिनार्दितः

ityuktvā sa yayau vipro rājā cāsīdbhayāturaḥ duḥkhībhūto'vanau niḥsvo nṛśaṁsamuninārditaḥ

यह कहकर वह ब्राह्मण चला गया, और राजा भय से अत्यन्त व्याकुल हो गया; उस निर्मम मुनि से पीड़ित, निर्धन राजा भूमि पर पड़ा अत्यन्त दुःखी हो गया।

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.21.11)

सूत उवाच । एतस्मिन्नन्तरे तत्र ब्राह्मणो वेदपारगः । ब्राह्मणैर्बहुभिः सार्धं निर्ययौ स्वगृहाद् बहिः

sūta uvāca etasminnantare tatra brāhmaṇo vedapāragaḥ brāhmaṇairbahubhiḥ sārdhaṁ niryayau svagṛhād bahiḥ

सूत जी ने कहा — इसी बीच वहाँ वेदपारंगत एक ब्राह्मण, कई अन्य ब्राह्मणों के साथ, अपने ही घर से बाहर निकला।

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.21.12)

ततो राज्ञी तु तं दृष्ट्वा आयान्तं तापसं स्थितम् । उवाच वाक्यं राजानं धर्मार्थसहितं तदा

tato rājñī tu taṁ dṛṣṭvā āyāntaṁ tāpasaṁ sthitam uvāca vākyaṁ rājānaṁ dharmārthasahitaṁ tadā

तब रानी ने उस तपस्वी को वहाँ आता हुआ देखकर, राजा से धर्म और अर्थ से युक्त यह वचन कहा।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.21.13)

त्रयाणामपि वर्णानां पिता ब्राह्मण उच्यते । पितृद्रव्यं हि पुत्रेण ग्रहीतव्यं न संशयः

trayāṇāmapi varṇānāṁ pitā brāhmaṇa ucyate pitṛdravyaṁ hi putreṇa grahītavyaṁ na saṁśayaḥ

तीनों वर्णों का भी पिता ब्राह्मण ही कहलाता है; पिता का धन पुत्र के द्वारा ग्रहण किया जाना चाहिए, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.21.14)

तस्मादयं प्रार्थनीयो धनार्थमिति मे मतिः । राजोवाच । नाहं प्रतिग्रहं काङ्क्षे क्षत्रियोऽहं सुमध्यमे

tasmādayaṁ prārthanīyo dhanārthamiti me matiḥ rājovāca nāhaṁ pratigrahaṁ kāṅkṣe kṣatriyo'haṁ sumadhyame

इसलिए मेरे विचार में धन के लिए इसी से याचना करनी चाहिए। राजा ने कहा — हे सुमध्यमे! मैं दान ग्रहण करने की इच्छा नहीं रखता, मैं क्षत्रिय हूँ।

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.21.15)

याचनं खलु विप्राणां क्षत्रियाणां न विद्यते । गुरुर्हि विप्रो वर्णानां पूजनीयोऽस्ति सर्वदा

yācanaṁ khalu viprāṇāṁ kṣatriyāṇāṁ na vidyate gururhi vipro varṇānāṁ pūjanīyo'sti sarvadā

ब्राह्मणों की तो याचना होती है, पर क्षत्रियों की याचना कहीं नहीं देखी जाती; ब्राह्मण तो सभी वर्णों का गुरु है, वह सदा पूजनीय ही होता है।

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.21.16)

तस्माद् गुरुर्न याच्यः स्यात्क्षत्रियाणां विशेषतः । यजनाध्ययनं दानं क्षत्रियस्य विधीयते

tasmād gururna yācyaḥ syātkṣatriyāṇāṁ viśeṣataḥ yajanādhyayanaṁ dānaṁ kṣatriyasya vidhīyate

इसलिए गुरु से, विशेष रूप से क्षत्रियों के द्वारा, कभी याचना नहीं करनी चाहिए; क्षत्रिय के लिए तो यजन, अध्ययन और दान ही विहित हैं,

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.21.17)

शरणागतानामभयं प्रजानां प्रतिपालनम् । न चाप्येवं तु वक्तव्यं देहीति कृपणं वचः

śaraṇāgatānāmabhayaṁ prajānāṁ pratipālanam na cāpyevaṁ tu vaktavyaṁ dehīti kṛpaṇaṁ vacaḥ

शरणागतों को अभय देना और प्रजा का पालन करना — यही उसका धर्म है; उसे कभी भी इस प्रकार दीन वचन नहीं कहना चाहिए, 'दे दो, दे दो।'

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.21.18)

ददामीत्येव मे देवि हृदये निहितं वचः । अर्जितं कुत्रचिद् द्रव्यं ब्राह्मणाय ददाम्यहम्

dadāmītyeva me devi hṛdaye nihitaṁ vacaḥ arjitaṁ kutracid dravyaṁ brāhmaṇāya dadāmyaham

हे देवी! मेरे हृदय में तो केवल 'मैं दूँगा' — यही वचन बसा हुआ है; कहीं से भी अर्जित धन को ही मैं इस ब्राह्मण को दूँगा।

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.21.19)

पत्न्युवाच । कालः समविषमकरः परिभवसम्मानमानदः कालः । कालः करोति पुरुषं दातारं याचितारं च

patnyuvāca kālaḥ samaviṣamakaraḥ paribhavasammānamānadaḥ kālaḥ kālaḥ karoti puruṣaṁ dātāraṁ yācitāraṁ ca

पत्नी ने कहा — काल ही सम-विषम करने वाला है, काल ही अपमान और सम्मान देने वाला है; काल ही मनुष्य को दाता और याचक दोनों बना देता है।

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.21.20)

विप्रेण विदुषा राजा क्रुद्धेनातिबलीयसा । राज्यान्निरस्तः सौख्याच्च पश्य कालस्य चेष्टितम्

vipreṇa viduṣā rājā kruddhenātibalīyasā rājyānnirastaḥ saukhyācca paśya kālasya ceṣṭitam

अत्यन्त क्रोधित, विद्वान् और अत्यन्त बलशाली उस ब्राह्मण के द्वारा राजा राज्य से और सुख से भी वंचित कर दिया गया है — देखिए काल की यह लीला।

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.21.21)

राजोवाच । असिना तीक्ष्णधारेण वरं जिह्वा द्विधा कृता । न तु मानं परित्यज्य देहि देहीति भाषितम्

rājovāca asinā tīkṣṇadhāreṇa varaṁ jihvā dvidhā kṛtā na tu mānaṁ parityajya dehi dehīti bhāṣitam

राजा ने कहा — तीक्ष्ण धार वाली तलवार से जीभ के दो टुकड़े कर देना बेहतर है, परन्तु अपना मान त्यागकर 'दो, दो' कहना उचित नहीं है।

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.21.22)

क्षत्रियोऽहं महाभागे न याचे किञ्चिदप्यहम् । ददामि वाहं नित्यं हि भुजवीर्यार्जितं धनम्

kṣatriyo'haṁ mahābhāge na yāce kiñcidapyaham dadāmi vāhaṁ nityaṁ hi bhujavīryārjitaṁ dhanam

हे महाभागे! मैं क्षत्रिय हूँ, मैं कुछ भी याचना नहीं करता; मैं तो सदैव अपनी भुजाओं के बल से अर्जित धन ही देता हूँ।

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.21.23)

पत्न्युवाच । यदि ते हि महाराज याचितुं न क्षमं मनः । अहं तु न्यायतो दत्ता देवैरपि सवासवैः

patnyuvāca yadi te hi mahārāja yācituṁ na kṣamaṁ manaḥ ahaṁ tu nyāyato dattā devairapi savāsavaiḥ

पत्नी ने कहा — हे महाराज! यदि याचना करना आपके मन को स्वीकार्य नहीं है, तो मुझे ही तो विधिपूर्वक इन्द्र सहित देवताओं ने भी आपको दिया है।

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.21.24)

अहं शास्या च पत्या च रक्ष्या चैव महाद्युते । मन्मौल्यं सङ्गृहीत्वाथ गुर्वर्थं सम्प्रदीयताम्

ahaṁ śāsyā ca patyā ca rakṣyā caiva mahādyute manmaulyaṁ saṅgṛhītvātha gurvarthaṁ sampradīyatām

हे महातेजस्वी! मैं आपकी आज्ञा के अधीन हूँ, मैं पति की ही हूँ और आपके ही द्वारा रक्षा किए जाने योग्य हूँ; मेरे मूल्य को ग्रहण करके ही गुरु (ब्राह्मण) की दक्षिणा दे दीजिए।

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.21.25)

एतद्वाक्यमुपश्रुत्य हरिश्चन्द्रो महीपतिः । कष्टं कष्टमिति प्रोच्य विललापातिदुःखितः

etadvākyamupaśrutya hariścandro mahīpatiḥ kaṣṭaṁ kaṣṭamiti procya vilalāpātiduḥkhitaḥ

यह वचन सुनकर राजा हरिश्चन्द्र, 'हाय, कैसा कष्ट, कैसा कष्ट' कहकर, अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगे।

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.21.26)

भार्या च भूयः प्राहेदं क्रियतां वचनं मम । विप्रशापाग्निदग्धत्वान्नीचत्वमुपयास्यसि

bhāryā ca bhūyaḥ prāhedaṁ kriyatāṁ vacanaṁ mama vipraśāpāgnidagdhatvānnīcatvamupayāsyasi

उसकी पत्नी ने फिर से कहा — मेरा यह वचन मान लीजिए; अन्यथा ब्राह्मण के शाप-रूपी अग्नि से जलकर आप नीचता को प्राप्त हो जाएँगे।

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.21.27)

न द्युतहेतोर्न च मद्यहेतोर्न राज्यहेतोर्न च भोगहेतोः । ददस्व गुर्वर्थमतो मया त्वं सत्यव्रतत्वं सफलं कुरुष्व

na dyutahetorna ca madyahetorna rājyahetorna ca bhogahetoḥ dadasva gurvarthamato mayā tvaṁ satyavratatvaṁ saphalaṁ kuruṣva

न जुए के कारण, न मदिरा के कारण, न राज्य के कारण, न किसी भोग के कारण — बल्कि केवल गुरु के लिए ही मुझे दे दीजिए; इस प्रकार अपने सत्य-व्रत को सफल कीजिए।

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22