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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23

हरिश्चन्द्र का स्वयं को चाण्डाल के हाथों बेचना

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.23.1)

व्यास उवाच । तमेवमुक्त्वा राजानं निर्घृणं निष्ठुरं वचः । तदादाय धनं पूर्णं कुपितः कौशिको ययौ

vyāsa uvāca tamevamuktvā rājānaṁ nirghṛṇaṁ niṣṭhuraṁ vacaḥ tadādāya dhanaṁ pūrṇaṁ kupitaḥ kauśiko yayau

व्यास जी ने कहा — राजा से इस प्रकार निर्दयतापूर्वक कठोर वचन कहकर, वह क्रोधित कौशिक पूरा धन लेकर वहाँ से चला गया।

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.23.2)

विश्वामित्रे गते राजा ततः शोकमुपागतः । श्वासोच्छ्वासं मुहुः कृत्वा प्रोवाचोच्चैरधोमुखः

viśvāmitre gate rājā tataḥ śokamupāgataḥ śvāsocchvāsaṁ muhuḥ kṛtvā provācoccairadhomukhaḥ

विश्वामित्र के चले जाने पर राजा शोक में डूब गया; बार-बार गहरी साँसें लेते हुए, सिर झुकाए, वह ऊँचे स्वर में बोलने लगा —

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.23.3)

वित्तक्रीतेन यस्यार्तिर्मया प्रेतेन गच्छति । स ब्रवीतु त्वरायुक्तो यामे तिष्ठति भास्करः

vittakrītena yasyārtirmayā pretena gacchati sa bravītu tvarāyukto yāme tiṣṭhati bhāskaraḥ

जिसकी पीड़ा धन से खरीदे गए, मृतक के समान इस मुझ पर टिकी हुई है, वह शीघ्र आकर मुझसे बात करे, जब तक सूर्य एक याम (प्रहर) भी आकाश में शेष रहता है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.23.4)

अथाजगाम त्वरितो धर्मश्चाण्डालरूपधृक् । दुर्गन्धो विकृतोरस्कः श्मश्रुलो दन्तुरोऽघृणी

athājagāma tvarito dharmaścāṇḍālarūpadhṛk durgandho vikṛtoraskaḥ śmaśrulo danturo'ghṛṇī

तभी धर्म देवता स्वयं शीघ्रता से चाण्डाल का रूप धारण कर वहाँ आ पहुँचे — दुर्गन्धयुक्त, विकृत छाती वाले, दाढ़ी-मूँछ वाले, टेढ़े दाँतों वाले, निर्दयी,

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.23.5)

कृष्णो लम्बोदरः स्निग्धः करालः पुरुषाधमः । हस्तजर्जरयष्टिश्च शवमाल्यैरलङ्कृतः

kṛṣṇo lambodaraḥ snigdhaḥ karālaḥ puruṣādhamaḥ hastajarjarayaṣṭiśca śavamālyairalaṅkṛtaḥ

काले रंग वाले, लटकते पेट वाले, तैलाक्त, विकराल मुख वाले, अधम पुरुष; अपने हाथ में एक जर्जर लाठी लिए, शवों की मालाओं से सुसज्जित।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.23.6)

चाण्डाल उवाच । अहं गृह्णामि दासत्वे भृत्यार्थः सुमहान्मम । क्षिप्रमाचक्ष्व मौल्यं किमेतत्ते सम्प्रदीयते

cāṇḍāla uvāca ahaṁ gṛhṇāmi dāsatve bhṛtyārthaḥ sumahānmama kṣipramācakṣva maulyaṁ kimetatte sampradīyate

चाण्डाल ने कहा — मैं तुम्हें दासत्व में ग्रहण करता हूँ, मुझे एक अत्यन्त बड़े सेवक की आवश्यकता है; शीघ्र बताओ, तुम्हारा मूल्य क्या है, वह मैं दे दूँगा।

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.23.7)

व्यास उवाच । तं तादृशमथालक्ष्य क्रूरदृष्टिं सुनिर्घृणम् । वदन्तमतिदुःशीलं कस्त्वमित्याह पार्थिवः

vyāsa uvāca taṁ tādṛśamathālakṣya krūradṛṣṭiṁ sunirghṛṇam vadantamatiduḥśīlaṁ kastvamityāha pārthivaḥ

व्यास जी ने कहा — उस भयानक क्रूर दृष्टि वाले, अत्यन्त निर्दयी, दुःशील बोलने वाले को देखकर, राजा ने पूछा — तुम कौन हो?

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.23.8)

चाण्डाल उवाच । चाण्डालोऽहमिह ख्यातः प्रवीरेति नृपोत्तम । शासने सर्वदा तिष्ठ मृतचैलापहारकः

cāṇḍāla uvāca cāṇḍālo'hamiha khyātaḥ pravīreti nṛpottama śāsane sarvadā tiṣṭha mṛtacailāpahārakaḥ

चाण्डाल ने कहा — हे राजश्रेष्ठ! मैं यहाँ चाण्डाल के रूप में जाना जाता हूँ, मेरा नाम प्रवीर है; सदा मेरे शासन में रहो — मैं मृतकों के वस्त्र उतारने वाला हूँ।

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.23.9)

एवमुक्तस्तदा राजा वचनं चेदमब्रवीत् । ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि गृह्णात्विति मतिर्मम

evamuktastadā rājā vacanaṁ cedamabravīt brāhmaṇaḥ kṣatriyo vāpi gṛhṇātviti matirmama

इस प्रकार कहे जाने पर राजा ने यह वचन कहा — मेरी बुद्धि तो यही है कि मुझे ब्राह्मण या क्षत्रिय ही ग्रहण करे।

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.23.10)

उत्तमस्योत्तमो धर्मो मध्यमस्य च मध्यमः । अधमस्याधमश्चैव इति प्राहुर्मनीषिणः

uttamasyottamo dharmo madhyamasya ca madhyamaḥ adhamasyādhamaścaiva iti prāhurmanīṣiṇaḥ

उत्तम का धर्म उत्तम ही होता है, मध्यम का मध्यम, और अधम का अधम — ऐसा विद्वान लोग कहते हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.23.11)

चाण्डाल उवाच । एवमेव त्वया धर्मः कथितो नृपसत्तम । अविचार्य त्वया राजन्नधुनोक्तं ममाग्रतः

cāṇḍāla uvāca evameva tvayā dharmaḥ kathito nṛpasattama avicārya tvayā rājannadhunoktaṁ mamāgrataḥ

चाण्डाल ने कहा — हे राजश्रेष्ठ! तुमने यह धर्म ऐसे ही कह दिया है, हे राजन्! बिना विचार किए ही तुमने यह मेरे सामने कह दिया है।

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.23.12)

विचारयित्वा यो ब्रूते सोऽभीष्टं लभते नरः । सामान्यमेव तत्प्रोक्तमविचार्य त्वयानघ

vicārayitvā yo brūte so'bhīṣṭaṁ labhate naraḥ sāmānyameva tatproktamavicārya tvayānagha

जो विचार करके बोलता है, वही मनुष्य अपना इच्छित प्राप्त करता है; तुमने जो कहा, हे निष्पाप, वह तो बिना विचार किए ही एक सामान्य कथन है।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.23.13)

यदि सत्यं प्रमाणं ते गृहीतोऽसि न संशयः । हरिश्चन्द्र उवाच । असत्यान्नरके गच्छेत्सद्यः क्रूरे नराधमः

yadi satyaṁ pramāṇaṁ te gṛhīto'si na saṁśayaḥ hariścandra uvāca asatyānnarake gacchetsadyaḥ krūre narādhamaḥ

यदि सत्य ही तुम्हारे लिए प्रमाण है, तो निःसन्देह तुम गृहीत हो चुके हो (अर्थात् मेरे ही हो गए हो)। हरिश्चन्द्र ने कहा — असत्य से तो अधम मनुष्य तत्काल घोर नरक को प्राप्त होता है,

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.23.14)

ततश्चाण्डालता साध्वी न वरा मे ह्यसत्यता । व्यास उवाच । तस्यैवं वदतः प्राप्तो विश्वामित्रस्तपोनिधिः

tataścāṇḍālatā sādhvī na varā me hyasatyatā vyāsa uvāca tasyaivaṁ vadataḥ prāpto viśvāmitrastaponidhiḥ

इसलिए चाण्डालत्व ही मुझे भला लगता है, असत्यता कदापि नहीं। व्यास जी ने कहा — उसके इस प्रकार कहते ही वहाँ तपोनिधि विश्वामित्र आ पहुँचे,

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.23.15)

क्रोधामर्षविवृत्ताक्षः प्राह चेदं नराधिपम् । चाण्डालोऽयं मनस्थं ते दातुं वित्तमुपस्थितः

krodhāmarṣavivṛttākṣaḥ prāha cedaṁ narādhipam cāṇḍālo'yaṁ manasthaṁ te dātuṁ vittamupasthitaḥ

क्रोध और असहनशीलता से आँखें फैलाए हुए, उन्होंने राजा से यह कहा — यह चाण्डाल तुम्हें अपने मन में जो धन चाहिए, वह देने के लिए उपस्थित है।

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.23.16)

कस्मान्न दीयते मह्यमशेषा यज्ञदक्षिणा । राजोवाच । भगवन्सूर्यवंशोत्थमात्मानं वेद्मि कौशिक

kasmānna dīyate mahyamaśeṣā yajñadakṣiṇā rājovāca bhagavansūryavaṁśotthamātmānaṁ vedmi kauśika

तो फिर मुझे मेरी सम्पूर्ण यज्ञ-दक्षिणा क्यों नहीं दी जा रही? राजा ने कहा — हे भगवन्! हे कौशिक! मैं अपने को सूर्यवंश में उत्पन्न जानता हूँ,

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.23.17)

कथं चाण्डालदासत्वं गमिष्ये वित्तकामतः । विश्वामित्र उवाच । यदि चाण्डालवित्तं त्वमात्मविक्रयजं मम

kathaṁ cāṇḍāladāsatvaṁ gamiṣye vittakāmataḥ viśvāmitra uvāca yadi cāṇḍālavittaṁ tvamātmavikrayajaṁ mama

मैं धन के लोभ से चाण्डाल का दासत्व कैसे स्वीकार करूँ? विश्वामित्र ने कहा — यदि तुम अपने ही विक्रय से प्राप्त यह चाण्डाल का धन

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.23.18)

न प्रदास्यसि चेत्तर्हि शप्स्यामि त्वामसंशयम् । चाण्डालादथवा विप्राद्देहि मे दक्षिणाधनम्

na pradāsyasi cettarhi śapsyāmi tvāmasaṁśayam cāṇḍālādathavā viprāddehi me dakṣiṇādhanam

मुझे नहीं दोगे, तो निःसन्देह मैं तुम्हें शाप दे दूँगा; चाहे चाण्डाल से हो या ब्राह्मण से, मुझे मेरी दक्षिणा का धन दो।

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.23.19)

विना चाण्डालमधुना नान्यः कश्चिद्धनप्रदः । धनेनाहं विना राजन्न यास्यामि न संशयः

vinā cāṇḍālamadhunā nānyaḥ kaściddhanapradaḥ dhanenāhaṁ vinā rājanna yāsyāmi na saṁśayaḥ

इस समय चाण्डाल के अतिरिक्त और कोई धन देने वाला नहीं है; हे राजन्! मैं धन के बिना यहाँ से नहीं जाऊँगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.23.20)

इदानीमेव मे वित्तं न प्रदास्यसि चेन्नृप । दिनेऽर्धघटिकाशेषे तत्त्वां शापाग्निना दहे

idānīmeva me vittaṁ na pradāsyasi cennṛpa dine'rdhaghaṭikāśeṣe tattvāṁ śāpāgninā dahe

यदि अभी ही, हे राजन्! तुम मुझे मेरा धन नहीं दोगे, तो दिन का आधा घटिका (क्षण) शेष रहते ही मैं तुम्हें शाप की अग्नि से भस्म कर दूँगा।

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.23.21)

व्यास उवाच । हरिश्चन्द्रस्ततो राजा मृत्ववच्छ्रितजीवितः । प्रसीदेति वदन्पादौ ऋषेर्जग्राह विह्वलः

vyāsa uvāca hariścandrastato rājā mṛtvavacchritajīvitaḥ prasīdeti vadanpādau ṛṣerjagrāha vihvalaḥ

व्यास जी ने कहा — तब राजा हरिश्चन्द्र, मृत्यु के समान अपने जीवन को सौंपे हुए, विह्वल होकर, 'प्रसन्न होइए' कहते हुए ऋषि के चरण पकड़ बैठे।

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.23.22)

हरिश्चन्द्र उवाच । दासोऽस्म्यार्तोऽस्मि दीनोऽस्मि त्वद्भक्तश्च विशेषतः । प्रसादं कुरु विप्रर्षे कष्टश्चाण्डालसङ्करः

hariścandra uvāca dāso'smyārto'smi dīno'smi tvadbhaktaśca viśeṣataḥ prasādaṁ kuru viprarṣe kaṣṭaścāṇḍālasaṅkaraḥ

हरिश्चन्द्र ने कहा — मैं दास हूँ, मैं पीड़ित हूँ, मैं दीन हूँ, और विशेष रूप से आपका ही भक्त हूँ; हे ब्रह्मर्षे! कृपा कीजिए — चाण्डाल के साथ यह सम्बन्ध अत्यन्त कष्टकर है,

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.23.23)

भवेयं वित्तशेषेण तव कर्मकरो वशः । तवैव मुनिशार्दूल प्रेष्यश्चित्तानुवर्तकः

bhaveyaṁ vittaśeṣeṇa tava karmakaro vaśaḥ tavaiva muniśārdūla preṣyaścittānuvartakaḥ

परन्तु शेष धन के लिए मैं आपके ही अधीन, आपका सेवक बन जाऊँगा; हे मुनिश्रेष्ठ! मैं आपकी ही इच्छा का अनुसरण करने वाला, आपका ही दास बनूँगा।

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.23.24)

विश्वामित्र उवाच । एवमस्तु महाराज ममैव भव किङ्करः । किन्तु मद्वचनं कार्यं सर्वदैव नराधिप

viśvāmitra uvāca evamastu mahārāja mamaiva bhava kiṅkaraḥ kintu madvacanaṁ kāryaṁ sarvadaiva narādhipa

विश्वामित्र ने कहा — हे महाराज! ऐसा ही हो, तुम मेरे ही सेवक बन जाओ; परन्तु हे राजन्! तुम्हें मेरा वचन सदैव मानना होगा।

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.23.25)

व्यास उवाच । एवमुक्तेऽथ वचने राजा हर्षसमन्वितः । अमन्यत पुनर्जातमात्मानं प्राह कौशिकम्

vyāsa uvāca evamukte'tha vacane rājā harṣasamanvitaḥ amanyata punarjātamātmānaṁ prāha kauśikam

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार यह वचन कहे जाने पर, राजा हर्ष से भर गया; उसने अपने आपको मानो पुनर्जन्म पाया हुआ माना, और कौशिक से यह कहा —

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.23.26)

तवादेशं करिष्यामि सदैवाहं न संशयः । आदेशय द्विजश्रेष्ठ किं करोमि तवानघ

tavādeśaṁ kariṣyāmi sadaivāhaṁ na saṁśayaḥ ādeśaya dvijaśreṣṭha kiṁ karomi tavānagha

मैं सदा आपकी ही आज्ञा का पालन करूँगा, इसमें कोई सन्देह नहीं; हे द्विजश्रेष्ठ! हे निष्पाप! आज्ञा दीजिए, मैं आपके लिए क्या करूँ?

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.23.27)

विश्वामित्र उवाच । चाण्डालागच्छ मद्दासमौल्यं किं मे प्रयच्छसि । गृहाण दासं मौल्येन मया दत्तं तवाधुना

viśvāmitra uvāca cāṇḍālāgaccha maddāsamaulyaṁ kiṁ me prayacchasi gṛhāṇa dāsaṁ maulyena mayā dattaṁ tavādhunā

विश्वामित्र ने कहा — हे चाण्डाल! आओ, मेरे इस दास का मूल्य मुझे क्या दोगे? यह दास मोल के बदले ग्रहण करो, आज मैंने इसे तुम्हें दे दिया है।

श्लोक 28 (devibhagavatam.7.23.28)

नास्ति दासेन मे कार्यं वित्ताशा वर्तते मम । व्यास उवाच । एवमुक्ते तदा तेन स्वपचो हृष्टमानसः

nāsti dāsena me kāryaṁ vittāśā vartate mama vyāsa uvāca evamukte tadā tena svapaco hṛṣṭamānasaḥ

मुझे इस दास से कोई काम नहीं है, मुझे तो केवल धन की ही आशा है। व्यास जी ने कहा — यह कहे जाने पर, तब वह स्वपच (चाण्डाल) अत्यन्त प्रसन्न मन से,

श्लोक 29 (devibhagavatam.7.23.29)

आगत्य सन्निधौ तूर्णं विश्वामित्रमभाषत । चाण्डाल उवाच । दशयोजनविस्तीर्णे प्रयागस्य च मण्डले

āgatya sannidhau tūrṇaṁ viśvāmitramabhāṣata cāṇḍāla uvāca daśayojanavistīrṇe prayāgasya ca maṇḍale

शीघ्र ही उनके समक्ष आकर विश्वामित्र से बोला। चाण्डाल ने कहा — दस योजन विस्तार वाले प्रयाग के इस पूरे मण्डल की

श्लोक 30 (devibhagavatam.7.23.30)

भूमिं रत्नमयीं कृत्वा दास्ये तेऽहं द्विजोत्तम । अस्य विक्रयणेनेयमार्तिश्च प्रहता त्वया

bhūmiṁ ratnamayīṁ kṛtvā dāsye te'haṁ dvijottama asya vikrayaṇeneyamārtiśca prahatā tvayā

भूमि को रत्नों से भरकर, हे द्विजोत्तम! मैं आपको दूँगा; इसके बदले, इस विक्रय के द्वारा, आप ही इसकी यह पीड़ा दूर कर दें।

श्लोक 31 (devibhagavatam.7.23.31)

व्यास उवाच । ततो रत्नसहस्राणि सुवर्णमणिमौक्तिकैः । चाण्डालेन प्रदत्तानि जग्राह द्विजसत्तमः

vyāsa uvāca tato ratnasahasrāṇi suvarṇamaṇimauktikaiḥ cāṇḍālena pradattāni jagrāha dvijasattamaḥ

व्यास जी ने कहा — तब उस चाण्डाल के द्वारा दिए गए सुवर्ण, मणि और मोतियों से युक्त सहस्रों रत्नों को उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने ग्रहण कर लिया।

श्लोक 32 (devibhagavatam.7.23.32)

हरिश्चन्द्रस्तथा राजा निर्विकारमुखोऽभवत् । अमन्यत तथा धैर्याद्विश्वामित्रो हि मे पतिः

hariścandrastathā rājā nirvikāramukho'bhavat amanyata tathā dhairyādviśvāmitro hi me patiḥ

राजा हरिश्चन्द्र का मुख भी उस समय पूर्णतः निर्विकार रहा; उसने धैर्यपूर्वक यह सोचा कि विश्वामित्र ही अब मेरे स्वामी हैं,

श्लोक 33 (devibhagavatam.7.23.33)

तत्तदेव मया कार्यं यदयं कारयिष्यति । अथान्तरिक्षे सहसा वागुवाचाशरीरिणी

tattadeva mayā kāryaṁ yadayaṁ kārayiṣyati athāntarikṣe sahasā vāguvācāśarīriṇī

मुझे वही करना है, जो यह करवाएगा। तभी आकाश में सहसा एक अशरीरी वाणी गूँज उठी —

श्लोक 34 (devibhagavatam.7.23.34)

अनृणोऽसि महाभाग दत्ता सा दक्षिणा त्वया । ततो दिवः पुष्पवृष्टिः पपात नृपमूर्धनि

anṛṇo'si mahābhāga dattā sā dakṣiṇā tvayā tato divaḥ puṣpavṛṣṭiḥ papāta nṛpamūrdhani

हे महाभाग! तुम अब ऋणमुक्त हो, तुमने वह दक्षिणा दे दी है। तत्पश्चात् स्वर्ग से राजा के सिर पर पुष्पों की वर्षा होने लगी।

श्लोक 35 (devibhagavatam.7.23.35)

साधु साध्विति तं देवाः प्रोचुः सेन्द्रा महौजसः । हर्षेण महताऽऽविष्टो राजा कौशिकमब्रवीत्

sādhu sādhviti taṁ devāḥ procuḥ sendrā mahaujasaḥ harṣeṇa mahatā''viṣṭo rājā kauśikamabravīt

इन्द्र सहित महातेजस्वी देवताओं ने उसे 'साधु, साधु' कहकर सराहा; अत्यन्त हर्ष से भरकर राजा ने कौशिक से यह कहा —

श्लोक 36 (devibhagavatam.7.23.36)

राजोवाच । त्वं हि माता पिता चैव त्वं हि बन्धुर्महामते । यदर्थं मोचितोऽहं ते क्षणाच्चैवानृणीकृतः

rājovāca tvaṁ hi mātā pitā caiva tvaṁ hi bandhurmahāmate yadarthaṁ mocito'haṁ te kṣaṇāccaivānṛṇīkṛtaḥ

राजा ने कहा — हे महामते! आप ही मेरी माता हैं, आप ही मेरे पिता हैं, आप ही मेरे बन्धु हैं — जिनके ही कारण मैं मुक्त हुआ, और एक ही क्षण में ऋणमुक्त कर दिया गया।

श्लोक 37 (devibhagavatam.7.23.37)

किं करोमि महाबाहो श्रेयो मे वचनं तव । एवमुक्ते तु वचने नृपं मुनिरभाषत

kiṁ karomi mahābāho śreyo me vacanaṁ tava evamukte tu vacane nṛpaṁ munirabhāṣata

हे महाबाहो! अब मैं क्या करूँ, आपका वचन ही मेरे लिए कल्याणकारी है। यह वचन कहे जाने पर, मुनि ने राजा से यह कहा —

श्लोक 38 (devibhagavatam.7.23.38)

विश्वामित्र उवाच । चाण्डालवचनं कार्यमद्यप्रभृति ते नृप । स्वस्ति तेऽस्विति तं प्रोच्य तदादाय धनं ययौ

viśvāmitra uvāca cāṇḍālavacanaṁ kāryamadyaprabhṛti te nṛpa svasti te'sviti taṁ procya tadādāya dhanaṁ yayau

विश्वामित्र ने कहा — हे राजन्! अब से इस चाण्डाल का वचन ही तुम्हें मानना है। 'तुम्हारा कल्याण हो' — ऐसा कहकर, वह धन लेकर वहाँ से चले गए।

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