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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3

च्यवन-सुकन्या का गार्हस्थ्य जीवन

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.3.1)

व्यास उवाच । इति पप्रच्छ तान्सर्वान् राजा चिन्ताकुलस्तथा । पर्यपृच्छत्सुहृद्वर्गं साम्ना चोग्रतयापि च

vyāsa uvāca iti papraccha tānsarvān rājā cintākulastathā paryapṛcchatsuhṛdvargaṁ sāmnā cogratayāpi ca

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार चिंताकुल राजा ने उन सबसे पूछा, तथा अपने मित्रवर्ग से भी कोमलता और कठोरता दोनों प्रकार से पूछताछ की।

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.3.2)

पीड्यमानं जनं वीक्ष्य पितरं दुःखितं तथा । विचिन्त्य शूलभेदं सा सुकन्या चेदमब्रवीत्

pīḍyamānaṁ janaṁ vīkṣya pitaraṁ duḥkhitaṁ tathā vicintya śūlabhedaṁ sā sukanyā cedamabravīt

पीड़ित प्रजा को और अपने दुःखी पिता को देखकर, कांटे से हुए भेदन का स्मरण करते हुए सुकन्या ने यह कहा।

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.3.3)

वने मया पितस्तत्र वल्मीको वीरुधावृतः । क्रीडन्त्या सुदृढो दृष्टश्छिद्रद्वयसमन्वितः

vane mayā pitastatra valmīko vīrudhāvṛtaḥ krīḍantyā sudṛḍho dṛṣṭaśchidradvayasamanvitaḥ

"हे पिता! वन में खेलते समय मैंने वहाँ लताओं से आच्छादित एक दृढ़ बाँबी देखी, जिसमें दो छिद्र थे।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.3.4)

तत्र खद्योतवद्दीप्तज्योतीषी वीक्षिते मया । सूच्याविद्धे महाराज पुनः खद्योतशङ्कया

tatra khadyotavaddīptajyotīṣī vīkṣite mayā sūcyāviddhe mahārāja punaḥ khadyotaśaṅkayā

वहाँ मुझे जुगनू के समान दो चमकती ज्योतियाँ दिखीं। हे महाराज! जुगनू समझकर मैंने उन्हें पुनः सुई से छेद दिया।

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.3.5)

जलक्लिन्ना तदा सूची मया दृष्टा पितः किल । हाहेति च श्रुतः शब्दो मन्दो वल्मीकमध्यतः

jalaklinnā tadā sūcī mayā dṛṣṭā pitaḥ kila hāheti ca śrutaḥ śabdo mando valmīkamadhyataḥ

तब, हे पिता, मैंने अपनी सुई को गीली देखा; और बाँबी के भीतर से "हाय!" जैसी एक मन्द ध्वनि सुनाई दी।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.3.6)

तदाहं विस्मिता राजन्किमेतदिति शङ्कया । न जाने किं मया विद्धं तस्मिन्वल्मीकमण्डले

tadāhaṁ vismitā rājankimetaditi śaṅkayā na jāne kiṁ mayā viddhaṁ tasminvalmīkamaṇḍale

तब, हे राजन्, मैं "यह क्या है" की शंका से चकित हो गई — मुझे नहीं पता कि उस बाँबी में मैंने क्या छेद दिया है।"

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.3.7)

राजा श्रुत्वा तु शर्यातिः सुकन्यावचनं मृदु । मुनेस्तद्धेलनं ज्ञात्वा वल्मीकं क्षिप्रमभ्यगात्

rājā śrutvā tu śaryātiḥ sukanyāvacanaṁ mṛdu munestaddhelanaṁ jñātvā valmīkaṁ kṣipramabhyagāt

सुकन्या के कोमल वचन सुनकर राजा शर्याति ने मुनि के प्रति हुए इस अपराध को समझा और तुरन्त उस बाँबी की ओर गए।

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.3.8)

तत्रापश्यत्तपोवृद्धं च्यवनं दुःखितं भृशम् । स्फोटयामास वल्मीकं मुनिदेहावृतं भृशम्

tatrāpaśyattapovṛddhaṁ cyavanaṁ duḥkhitaṁ bhṛśam sphoṭayāmāsa valmīkaṁ munidehāvṛtaṁ bhṛśam

वहाँ उन्होंने तप में वृद्ध, अत्यंत दुःखी च्यवन मुनि को देखा; उन्होंने मुनि के शरीर को घेरे हुए उस बाँबी को तोड़ डाला।

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.3.9)

प्रणम्य दण्डवद्भूमौ राजा तं भार्गवं प्रति । तुष्टाव विनयोपेतस्तमुवाच कृताञ्जलिः

praṇamya daṇḍavadbhūmau rājā taṁ bhārgavaṁ prati tuṣṭāva vinayopetastamuvāca kṛtāñjaliḥ

उस भार्गव मुनि के सम्मुख दण्ड की भाँति भूमि पर प्रणाम करके, राजा ने विनयपूर्वक उनकी स्तुति की और हाथ जोड़कर कहा।

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.3.10)

पुत्र्या मम महाभाग क्रीडन्त्या दुष्कृतं कृतम् । अज्ञानाद्बालया ब्रह्मन् कृतं तत्क्षन्तुमर्हसि

putryā mama mahābhāga krīḍantyā duṣkṛtaṁ kṛtam ajñānādbālayā brahman kṛtaṁ tatkṣantumarhasi

"हे महाभाग! मेरी पुत्री ने खेलते हुए, हे ब्रह्मन्, अज्ञानवश यह दुष्कर्म किया है — यह बालिका द्वारा किया गया है, आप इसे क्षमा करने योग्य हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.3.11)

अक्रोधना हि मुनयो भवन्तीति मया श्रुतम् । तस्मात्त्वमपि बालायाः क्षन्तुमर्हसि साम्प्रतम्

akrodhanā hi munayo bhavantīti mayā śrutam tasmāttvamapi bālāyāḥ kṣantumarhasi sāmpratam

मैंने सुना है कि मुनि क्रोधरहित होते हैं; अतः आप भी अभी इस बालिका को क्षमा करने योग्य हैं।"

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.3.12)

व्यास उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्य च्यवनो वाक्यमब्रवीत् । विनयोपनतं दृष्ट्वा राजानं दुःखितं भृशम्

vyāsa uvāca iti śrutvā vacastasya cyavano vākyamabravīt vinayopanataṁ dṛṣṭvā rājānaṁ duḥkhitaṁ bhṛśam

व्यास जी ने कहा — यह वचन सुनकर और विनयपूर्वक झुके, अत्यंत दुःखी राजा को देखकर च्यवन ने यह वचन कहा।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.3.13)

च्यवन उवाच । राजन्नाहं कदाचिद्वै करोमि क्रोधमण्वपि । न मयाद्यैव शप्तस्त्वं दुहित्रा पीडने कृते

cyavana uvāca rājannāhaṁ kadācidvai karomi krodhamaṇvapi na mayādyaiva śaptastvaṁ duhitrā pīḍane kṛte

च्यवन ने कहा — "हे राजन्! मैं कभी भी तनिक भी क्रोध नहीं करता; मैंने आज भी, तुम्हारी पुत्री द्वारा इस पीड़ा के होते हुए भी, तुम्हें शाप नहीं दिया है।

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.3.14)

नेत्रे पीडा समुत्पन्ना मम चाद्य निरागसः । तेन पापेन जानामि दुःखितस्त्वं महीपते

netre pīḍā samutpannā mama cādya nirāgasaḥ tena pāpena jānāmi duḥkhitastvaṁ mahīpate

निरपराध होते हुए भी आज मुझे नेत्रों में पीड़ा हुई है; उस दुर्भाग्य से मुझे ज्ञात है कि तुम भी, हे महीपते, दुःखी हो।

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.3.15)

अपराधं परं कृत्वा देवीभक्तस्य को जनः । सुखं लभेत यदपि भवेत् त्राता शिवः स्वयम्

aparādhaṁ paraṁ kṛtvā devībhaktasya ko janaḥ sukhaṁ labheta yadapi bhavet trātā śivaḥ svayam

देवी के भक्त के प्रति महान अपराध करके भला कौन सुख पा सकता है — भले ही स्वयं शिव उसके रक्षक क्यों न हों?

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.3.16)

किं करोमि महीपाल नेत्रहीनो जरावृतः । अन्धस्य परिचर्यां च कः करिष्यति पार्थिव

kiṁ karomi mahīpāla netrahīno jarāvṛtaḥ andhasya paricaryāṁ ca kaḥ kariṣyati pārthiva

हे महीपाल! नेत्रहीन और वृद्धावस्था से आवृत मैं अब क्या करूँ? हे राजन्! अंधे की सेवा भला कौन करेगा?"

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.3.17)

राजोवाच - सेवका बहवः सेवां करिष्यन्ति तवानिशम् । क्षमस्व मुनिशार्दूल स्वल्पक्रोधा हि तापसाः

rājovāca - sevakā bahavaḥ sevāṁ kariṣyanti tavāniśam kṣamasva muniśārdūla svalpakrodhā hi tāpasāḥ

राजा ने कहा — "बहुत से सेवक निरन्तर आपकी सेवा करेंगे। हे मुनिश्रेष्ठ! क्षमा कीजिए, तपस्वी तो अल्पक्रोधी ही होते हैं।"

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.3.18)

च्यवन उवाच । अन्धोऽहं निर्जनो राजंस्तपस्तप्तुं कथं क्षमः । त्वदीयाः सेवकाः किं ते करिष्यन्ति मम प्रियम्

cyavana uvāca andho'haṁ nirjano rājaṁstapastaptuṁ kathaṁ kṣamaḥ tvadīyāḥ sevakāḥ kiṁ te kariṣyanti mama priyam

च्यवन ने कहा — "हे राजन्! अंधा और अकेला मैं तपस्या करने में कैसे समर्थ हो सकता हूँ? तुम्हारे सेवक मेरे लिए क्या भला करेंगे?

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.3.19)

क्षमापयसि चेन्मां त्वं कुरु मे वचनं नृप । देहि मे परिचर्यार्थं कन्यां कमललोचनाम्

kṣamāpayasi cenmāṁ tvaṁ kuru me vacanaṁ nṛpa dehi me paricaryārthaṁ kanyāṁ kamalalocanām

यदि तुम मुझसे क्षमा चाहते हो तो मेरा यह वचन करो, हे राजन् — अपनी कमल-नयनी पुत्री को मेरी सेवा हेतु मुझे दे दो।

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.3.20)

तुष्येऽनया महाराज पुत्र्या तव महामते । करिष्यामि तपश्चाहं सा मे सेवां करिष्यति

tuṣye'nayā mahārāja putryā tava mahāmate kariṣyāmi tapaścāhaṁ sā me sevāṁ kariṣyati

हे महाराज! हे महामते! मैं तुम्हारी इस पुत्री से संतुष्ट हो जाऊँगा; मैं तपस्या करूँगा और वह मेरी सेवा करेगी।

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.3.21)

एवं कृते सुखं मे स्यात्तव चैव भविष्यति । सन्तुष्टे मयि राजेन्द्र सैनिकानां न संशयः

evaṁ kṛte sukhaṁ me syāttava caiva bhaviṣyati santuṣṭe mayi rājendra sainikānāṁ na saṁśayaḥ

ऐसा होने पर मुझे भी सुख होगा और तुम्हें भी; हे राजेन्द्र! मेरे संतुष्ट होने पर तुम्हारे सैनिकों को भी सुख होगा, इसमें संशय नहीं।"

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.3.22)

विचिन्त्य मनसा भूप कन्यादानं समाचर । न चात्र दूषणं किञ्चित्तापसोऽहं यतव्रतः

vicintya manasā bhūpa kanyādānaṁ samācara na cātra dūṣaṇaṁ kiñcittāpaso'haṁ yatavrataḥ

"मन में विचार करके कन्यादान करो; इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि मैं व्रतनिष्ठ तपस्वी हूँ।"

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.3.23)

व्यास उवाच । शर्यातिर्वचनं श्रुत्वा मुनेश्चिन्तातुरोऽभवत् । न दास्येऽप्यथवा दास्ये किञ्चिन्नोवाच भारत

vyāsa uvāca śaryātirvacanaṁ śrutvā muneścintāturo'bhavat na dāsye'pyathavā dāsye kiñcinnovāca bhārata

व्यास जी ने कहा — मुनि का यह वचन सुनकर शर्याति चिंता से व्याकुल हो गए; "दूँ या न दूँ" — हे भारत! वे कुछ न बोले।

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.3.24)

कथमन्धाय वृद्धाय कुरूपाय सुतामिमाम् । देवकन्योपमां दत्त्वा सुखी स्यामात्मसम्भवाम्

kathamandhāya vṛddhāya kurūpāya sutāmimām devakanyopamāṁ dattvā sukhī syāmātmasambhavām

"देवकन्या के समान इस पुत्री को अंधे, वृद्ध और कुरूप को देकर मैं कैसे सुखी हो सकता हूँ?

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.3.25)

को वात्मनः सुखार्थाय पुत्र्याः संसारजं सुखम् । हरतेऽल्पमतिः पापो जानन्नपि शुभाशुभम्

ko vātmanaḥ sukhārthāya putryāḥ saṁsārajaṁ sukham harate'lpamatiḥ pāpo jānannapi śubhāśubham

भला-बुरा जानते हुए भी कौन अल्पबुद्धि पापी अपने ही सुख के लिए अपनी पुत्री के सांसारिक सुख को छीन लेगा?

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.3.26)

प्राप्य सा च्यवनं सुभ्रूः पञ्चबाणशरार्दिता । अन्धं वृद्धं पतिं प्राप्य कथं कालं नयिष्यति

prāpya sā cyavanaṁ subhrūḥ pañcabāṇaśarārditā andhaṁ vṛddhaṁ patiṁ prāpya kathaṁ kālaṁ nayiṣyati

काम के पाँच बाणों से पीड़ित यह सुभ्रू, च्यवन को पाकर, अंधे-वृद्ध पति को पाकर किस प्रकार समय बिताएगी?

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.3.27)

यौवने दुर्जयः कामो विशेषेण सुरूपया । आत्मतुल्यं पतिं प्राप्य किमु वृद्धं विलोचनम्

yauvane durjayaḥ kāmo viśeṣeṇa surūpayā ātmatulyaṁ patiṁ prāpya kimu vṛddhaṁ vilocanam

यौवन में काम को जीतना कठिन है, विशेषतः इतनी सुन्दरी के लिए — उसे तो अपने समान पति चाहिए, यह वृद्ध और नेत्रहीन क्यों?

श्लोक 28 (devibhagavatam.7.3.28)

गौतमं तापसं प्राप्य रूपयौवनसंयुता । अहल्या वासवेनाशु वञ्चिता वरवर्णिनी

gautamaṁ tāpasaṁ prāpya rūpayauvanasaṁyutā ahalyā vāsavenāśu vañcitā varavarṇinī

रूप-यौवन से सम्पन्न वरवर्णिनी अहल्या, तपस्वी गौतम को पाकर भी, इन्द्र द्वारा शीघ्र ही छली गई थी।

श्लोक 29 (devibhagavatam.7.3.29)

शप्ता च पतिना पश्चाज्ज्ञात्वा धर्मविपर्ययम् । तस्माद्भवतु मे दुःखं न ददामि सुकन्यकाम्

śaptā ca patinā paścājjñātvā dharmaviparyayam tasmādbhavatu me duḥkhaṁ na dadāmi sukanyakām

और बाद में धर्म के उल्लंघन को जानकर वह पति द्वारा शापित हुई। अतः मेरा दुःख भले ही बना रहे, मैं सुकन्या को नहीं दूँगा।"

श्लोक 30 (devibhagavatam.7.3.30)

इति सञ्चिन्त्य शर्यातिर्विमना स्वगृहं ययौ । सचिवांश्च समादाय मन्त्रं चक्रेऽतिदुःखितः

iti sañcintya śaryātirvimanā svagṛhaṁ yayau sacivāṁśca samādāya mantraṁ cakre'tiduḥkhitaḥ

ऐसा सोचकर व्यथित मन से शर्याति अपने घर लौट गए; मंत्रियों को बुलाकर अत्यंत दुःखी होकर उन्होंने मंत्रणा की।

श्लोक 31 (devibhagavatam.7.3.31)

भो मन्त्रिणो ब्रुवन्त्वद्य किं कर्तव्यं मयाधुना । पुत्री देयाथ विप्राय भोक्तव्यं दुःखमेव वा

bho mantriṇo bruvantvadya kiṁ kartavyaṁ mayādhunā putrī deyātha viprāya bhoktavyaṁ duḥkhameva vā

"हे मंत्रियो! बताओ अब मुझे क्या करना चाहिए — पुत्री ब्राह्मण को दे दूँ, या केवल दुःख ही भोगूँ?

श्लोक 32 (devibhagavatam.7.3.32)

विचारयध्वं मिलिता हितं स्यान्मम वै कथम् । मन्त्रिण ऊचुः - किं ब्रूमोऽस्मिन्महाराज सङ्कटेऽतिदुरासदे

vicārayadhvaṁ militā hitaṁ syānmama vai katham mantriṇa ūcuḥ - kiṁ brūmo'sminmahārāja saṅkaṭe'tidurāsade

मिलकर विचार करो कि मेरा वास्तविक हित किसमें है।" मंत्रियों ने कहा — "हे महाराज! इस अत्यंत दुरूह संकट में हम क्या कहें?

श्लोक 33 (devibhagavatam.7.3.33)

दुर्भगाय सुकन्यैषा कथं देयातिसुन्दरी । व्यास उवाच । तदा चिन्ताकुलं वीक्ष्य पितरं मन्त्रिणस्तदा

durbhagāya sukanyaiṣā kathaṁ deyātisundarī vyāsa uvāca tadā cintākulaṁ vīkṣya pitaraṁ mantriṇastadā

इस अत्यंत सुन्दरी सुकन्या को उस अभागे को कैसे दिया जाए?" व्यास जी ने कहा — तब चिंताकुल पिता और मंत्रियों को देखकर —

श्लोक 34 (devibhagavatam.7.3.34)

सुकन्या त्विङ्गितं ज्ञात्वा प्रहस्येदमुवाच ह । पितः कस्माद्भवानद्य चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियः

sukanyā tviṅgitaṁ jñātvā prahasyedamuvāca ha pitaḥ kasmādbhavānadya cintāvyākulitendriyaḥ

— सुकन्या ने संकेत समझकर हँसते हुए यह कहा — "हे पिता! आज आप क्यों इतने चिंता-व्याकुल हैं?

श्लोक 35 (devibhagavatam.7.3.35)

मत्कृते दुःखसंविग्नो विषण्णवदनोऽसि वै । अहं गत्वा मुनिं तत्र समाश्वास्य भयार्दितम्

matkṛte duḥkhasaṁvigno viṣaṇṇavadano'si vai ahaṁ gatvā muniṁ tatra samāśvāsya bhayārditam

मेरे कारण दुःख से विचलित और उदासमुख हैं आप। मैं स्वयं वहाँ जाकर, भयभीत मुनि को सांत्वना देकर —

श्लोक 36 (devibhagavatam.7.3.36)

करिष्यामि प्रसन्नं तमात्मदानेन वै पितः । इति राजा वचः श्रुत्वा भाषितं यत्सुकन्यया

kariṣyāmi prasannaṁ tamātmadānena vai pitaḥ iti rājā vacaḥ śrutvā bhāṣitaṁ yatsukanyayā

— अपने आप को समर्पित करके उन्हें प्रसन्न कर दूँगी, हे पिता।" राजा ने सुकन्या के इन वचनों को सुनकर —

श्लोक 37 (devibhagavatam.7.3.37)

तामुवाच प्रसन्नात्मा सचिवानां च शृण्वताम् । कथं पुत्रि त्वमन्धस्य परिचर्यां वनेऽबला

tāmuvāca prasannātmā sacivānāṁ ca śṛṇvatām kathaṁ putri tvamandhasya paricaryāṁ vane'balā

— मंत्रियों के सुनते हुए, हृदय में कुछ शांत होकर, उससे कहा — "हे पुत्री! तुम एक अबला होकर वन में अंधे की सेवा —

श्लोक 38 (devibhagavatam.7.3.38)

करिष्यसि जरार्तस्य क्रोधनस्य विशेषतः । कथमन्धाय चानेन रूपेण रतिसन्निभाम्

kariṣyasi jarārtasya krodhanasya viśeṣataḥ kathamandhāya cānena rūpeṇa ratisannibhām

— वृद्धावस्था से पीड़ित तथा विशेषतः क्रोधी उस मुनि की, कैसे करोगी? और इस रूप में, कामदेव-सी सुन्दरी को मैं अंधे को —

श्लोक 39 (devibhagavatam.7.3.39)

ददामि जरया ग्रस्तदेहाय सुखवाञ्छया । पित्रा पुत्री प्रदातव्या वयोज्ञातिबलाय च

dadāmi jarayā grastadehāya sukhavāñchayā pitrā putrī pradātavyā vayojñātibalāya ca

— अपने ही सुख की इच्छा से, जिसका शरीर वृद्धावस्था से ग्रस्त है, कैसे दूँ? पिता को अपनी पुत्री उसे देनी चाहिए जो आयु, कुल और बल में उपयुक्त हो —

श्लोक 40 (devibhagavatam.7.3.40)

धनधान्यसमृद्धाय नाधनाय कदाचन । क्व ते रूपं विशालाक्षि क्वासौ वृद्धो वनेचरः

dhanadhānyasamṛddhāya nādhanāya kadācana kva te rūpaṁ viśālākṣi kvāsau vṛddho vanecaraḥ

— जो धन-धान्य से समृद्ध हो, कभी निर्धन को नहीं। हे विशालाक्षी! कहाँ तुम्हारा रूप, और कहाँ वह वृद्ध वनवासी!

श्लोक 41 (devibhagavatam.7.3.41)

कथं देया मया पुत्री तस्मै नातिवराय च । उटजे नियतं वासो यस्य नित्यं मनोहरे

kathaṁ deyā mayā putrī tasmai nātivarāya ca uṭaje niyataṁ vāso yasya nityaṁ manohare

मैं अपनी पुत्री उस असमान वर को कैसे दूँ, जिसका सदा और सर्वदा निवास केवल एक मनोहर कुटी में है?

श्लोक 42 (devibhagavatam.7.3.42)

कथमम्बुजपत्राक्षि कल्पनीयो मया तव । मरणं मे वरं प्राप्तं सैनिकानां तथैव च

kathamambujapatrākṣi kalpanīyo mayā tava maraṇaṁ me varaṁ prāptaṁ sainikānāṁ tathaiva ca

हे कमलपत्राक्षि! तुम्हारे लिए मैं ऐसा कैसे निश्चय कर सकता हूँ? इससे तो मेरी और मेरे सैनिकों की मृत्यु ही श्रेयस्कर होगी —

श्लोक 43 (devibhagavatam.7.3.43)

न ते प्रदानमन्धाय रोचते पिकभाषिणि । भवितव्यं भवत्येव धैर्यं नैव त्यजाम्यहम्

na te pradānamandhāya rocate pikabhāṣiṇi bhavitavyaṁ bhavatyeva dhairyaṁ naiva tyajāmyaham

— हे मधुरभाषिणी! तुम्हें अंधे को देना मुझे नहीं भाता। जो होना है वह तो होगा ही, परन्तु मैं अपना धैर्य नहीं त्यागूँगा।

श्लोक 44 (devibhagavatam.7.3.44)

सुस्थिरा भव सुश्रोणि न दास्येऽन्धाय कर्हिचित् । राज्यं तिष्ठतु वा यातु देहोऽयं च तथैव मे

susthirā bhava suśroṇi na dāsye'ndhāya karhicit rājyaṁ tiṣṭhatu vā yātu deho'yaṁ ca tathaiva me

हे सुश्रोणि! स्थिर रहो, मैं अंधे को तुम्हें कभी नहीं दूँगा — चाहे मेरा राज्य रहे या चला जाए, और यह मेरा शरीर भी।

श्लोक 45 (devibhagavatam.7.3.45)

न त्वां दास्याम्यहं तस्मै नेत्रहीनाय बालिके । सुकन्या तं तदा प्राह श्रुत्व तद्वचनं पितुः

na tvāṁ dāsyāmyahaṁ tasmai netrahīnāya bālike sukanyā taṁ tadā prāha śrutva tadvacanaṁ pituḥ

हे बालिके! मैं तुम्हें उस नेत्रहीन को नहीं दूँगा।" तब पिता के इस वचन को सुनकर सुकन्या ने उनसे कहा —

श्लोक 46 (devibhagavatam.7.3.46)

प्रसन्नवदनातीव स्नेहयुक्तमिदं वचः । सुकन्योवाच - न मे चिन्ता पितः कार्या देहि मां मुनयेऽधुना

prasannavadanātīva snehayuktamidaṁ vacaḥ sukanyovāca - na me cintā pitaḥ kāryā dehi māṁ munaye'dhunā

— अत्यंत प्रसन्न मुख से यह स्नेहपूर्ण वचन। सुकन्या ने कहा — "हे पिता! आप मेरी चिंता न करें, मुझे अभी मुनि को दे दीजिए।

श्लोक 47 (devibhagavatam.7.3.47)

सुखं भवतु सर्वेषां लोकानां मत्कृतेन हि । सेवयिष्यामि सन्तुष्टा पतिं परमपावनम्

sukhaṁ bhavatu sarveṣāṁ lokānāṁ matkṛtena hi sevayiṣyāmi santuṣṭā patiṁ paramapāvanam

मेरे इस कार्य से समस्त लोकों का सुख हो; मैं संतुष्ट होकर अपने परम पवित्र पति की सेवा करूँगी —

श्लोक 48 (devibhagavatam.7.3.48)

भक्त्या परमया चापि वृद्धं च विजने वने । सतीधर्मपरा चाहं चरिष्यामि सुसम्मतम्

bhaktyā paramayā cāpi vṛddhaṁ ca vijane vane satīdharmaparā cāhaṁ cariṣyāmi susammatam

— परम भक्ति से, वृद्ध और निर्जन वन में भी। सतीधर्म में तत्पर होकर मैं सुसम्मत आचरण करूँगी।

श्लोक 49 (devibhagavatam.7.3.49)

न भोगेच्छास्ति मे तात स्वस्थं चित्तं ममानघ । व्यास उवाच । तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या मन्त्रिणो विस्मयं गताः

na bhogecchāsti me tāta svasthaṁ cittaṁ mamānagha vyāsa uvāca tacchrutvā bhāṣitaṁ tasyā mantriṇo vismayaṁ gatāḥ

हे तात! मुझे भोग की इच्छा नहीं है, हे निष्पाप! मेरा चित्त स्वस्थ है।" व्यास जी ने कहा — उसके यह वचन सुनकर मंत्री विस्मित हो गए।

श्लोक 50 (devibhagavatam.7.3.50)

राजा च परमप्रीतो जगाम मुनिसन्निधौ । गत्वा प्रणम्य शिरसा तमुवाच तपोधनम्

rājā ca paramaprīto jagāma munisannidhau gatvā praṇamya śirasā tamuvāca tapodhanam

और राजा अत्यंत प्रसन्न होकर मुनि के समीप गए; जाकर सिर झुकाकर प्रणाम करके उन तपोधन से यह कहा।

श्लोक 51 (devibhagavatam.7.3.51)

स्वामिन् गृहाण पुत्रीं मे सेवार्थं विधिवद्विभो । इत्युक्त्वासौ ददौ पुत्रीं विवाहविधिना नृपः

svāmin gṛhāṇa putrīṁ me sevārthaṁ vidhivadvibho ityuktvāsau dadau putrīṁ vivāhavidhinā nṛpaḥ

"हे स्वामिन्! हे विभो! मेरी पुत्री को सेवा हेतु विधिपूर्वक ग्रहण कीजिए।" ऐसा कहकर राजा ने विवाह-विधि से पुत्री दे दी।

श्लोक 52 (devibhagavatam.7.3.52)

प्रतिगृह्य मुनिः कन्यां प्रसन्नो भार्गवोऽभवत् । पारिबर्हं न जग्राह दीयमानं नृपेण ह

pratigṛhya muniḥ kanyāṁ prasanno bhārgavo'bhavat pāribarhaṁ na jagrāha dīyamānaṁ nṛpeṇa ha

कन्या को स्वीकार करके भार्गव मुनि प्रसन्न हुए; परन्तु राजा द्वारा दिए जा रहे दहेज को उन्होंने ग्रहण नहीं किया।

श्लोक 53 (devibhagavatam.7.3.53)

कन्यामेवाग्रहीत्कामं परिचर्यार्थमात्मनः । प्रसन्नेऽस्मिन्मुनौ जातं सैनिकानां सुखं तदा

kanyāmevāgrahītkāmaṁ paricaryārthamātmanaḥ prasanne'sminmunau jātaṁ sainikānāṁ sukhaṁ tadā

उन्होंने केवल अपनी सेवा के लिए कन्या को ही ग्रहण किया; मुनि के प्रसन्न होते ही सैनिकों को भी उसी क्षण सुख प्राप्त हुआ।

श्लोक 54 (devibhagavatam.7.3.54)

राज्ञश्च परमाह्लादः सञ्जातस्तत्क्षणादपि । दत्त्वा पुत्रीं यदा राजा गमनाय गृहं प्रति

rājñaśca paramāhlādaḥ sañjātastatkṣaṇādapi dattvā putrīṁ yadā rājā gamanāya gṛhaṁ prati

और उसी क्षण राजा को भी परम आनन्द की प्राप्ति हुई। जब राजा पुत्री देकर घर की ओर लौटने को हुए —

श्लोक 55 (devibhagavatam.7.3.55)

मतिं चकार तवङ्गी तदोवाच नृपं सुता । सुकन्योवाच - गृहाण मम वासांसि भूषणानि च मे पितः

matiṁ cakāra tavaṅgī tadovāca nṛpaṁ sutā sukanyovāca - gṛhāṇa mama vāsāṁsi bhūṣaṇāni ca me pitaḥ

— तब उस सुकुमारी ने एक निश्चय किया और राजा से यह कहा। सुकन्या ने कहा — "हे पिता! मेरे वस्त्र और आभूषण वापस ले लीजिए —

श्लोक 56 (devibhagavatam.7.3.56)

वल्कलं परिधानाय प्रयच्छाजिनमुत्तमम् । वेषं तु मुनिपत्नीनां कृत्वा तपसि सेवनम्

valkalaṁ paridhānāya prayacchājinamuttamam veṣaṁ tu munipatnīnāṁ kṛtvā tapasi sevanam

— और पहनने हेतु मुझे वल्कल तथा उत्तम मृगचर्म दीजिए। मुनिपत्नियों का वेश धारण करके मैं तपस्या में सेवा करूँगी —

श्लोक 57 (devibhagavatam.7.3.57)

करिष्यामि तथा तात यथा ते कीर्तिरच्युता । भविष्यति भुवः पृष्ठे तथा स्वर्गे रसातले

kariṣyāmi tathā tāta yathā te kīrtiracyutā bhaviṣyati bhuvaḥ pṛṣṭhe tathā svarge rasātale

— हे तात! मैं ऐसा आचरण करूँगी कि आपकी कीर्ति अक्षुण्ण रहे — इस पृथ्वी पर, स्वर्ग में तथा रसातल में भी।

श्लोक 58 (devibhagavatam.7.3.58)

परलोकसुखायाहं चरिष्यामि दिवानिशम् । दत्त्वान्धाय च वृद्धाय सुन्दरीं युवतीं तु माम्

paralokasukhāyāhaṁ cariṣyāmi divāniśam dattvāndhāya ca vṛddhāya sundarīṁ yuvatīṁ tu mām

परलोक के सुख के लिए मैं दिन-रात आचरण करूँगी, यद्यपि आपने मुझ सुन्दरी युवती को अंधे और वृद्ध को दे दिया है।

श्लोक 59 (devibhagavatam.7.3.59)

चिन्ता त्वया न कर्तव्या शीलनाशसमुद्भवा । अरुन्धती वसिष्ठस्य धर्मपत्नी यथा भुवि

cintā tvayā na kartavyā śīlanāśasamudbhavā arundhatī vasiṣṭhasya dharmapatnī yathā bhuvi

आपको शील-नाश की उत्पन्न होने वाली चिंता नहीं करनी चाहिए। जैसे वसिष्ठ की धर्मपत्नी अरुन्धती इस पृथ्वी पर विख्यात हैं —

श्लोक 60 (devibhagavatam.7.3.60)

तथैवाहं भविष्यामि नात्र कार्या विचारणा । अनसूया यथा साध्वी भार्यात्रेः प्रथिता भुवि

tathaivāhaṁ bhaviṣyāmi nātra kāryā vicāraṇā anasūyā yathā sādhvī bhāryātreḥ prathitā bhuvi

— वैसे ही मैं भी बनूँगी, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है। जैसे अत्रि की साध्वी पत्नी अनसूया इस पृथ्वी पर प्रसिद्ध हैं —

श्लोक 61 (devibhagavatam.7.3.61)

तथैवाहं भविष्यामि पुत्री कीर्तिकरी तव । सुकन्यावचनं श्रुत्वा राजा परमधर्मवित्

tathaivāhaṁ bhaviṣyāmi putrī kīrtikarī tava sukanyāvacanaṁ śrutvā rājā paramadharmavit

— वैसे ही मैं भी आपकी कीर्ति बढ़ाने वाली पुत्री बनूँगी।" सुकन्या के इस वचन को सुनकर परम धर्मज्ञ राजा —

श्लोक 62 (devibhagavatam.7.3.62)

दत्त्वाजिनं रुरोदाशु वीक्ष्य तां चारुहासिनीम् । त्यक्त्वा भूषणवासांसि मुनिवेषधरां सुताम्

dattvājinaṁ rurodāśu vīkṣya tāṁ cāruhāsinīm tyaktvā bhūṣaṇavāsāṁsi muniveṣadharāṁ sutām

— मृगचर्म देकर अपनी उस मधुरहास्य पुत्री को, आभूषण और वस्त्र त्यागकर मुनि-वेश धारण किए देखकर तुरन्त रो पड़े।

श्लोक 63 (devibhagavatam.7.3.63)

विवर्णवदनो भूत्वा स्थितस्तत्रैव पार्थिवः । राज्ञ्यः सर्वाः सुतां दृष्ट्वा वल्कलाजिनधारिणीम्

vivarṇavadano bhūtvā sthitastatraiva pārthivaḥ rājñyaḥ sarvāḥ sutāṁ dṛṣṭvā valkalājinadhāriṇīm

राजा का मुख विवर्ण हो गया और वे वहीं खड़े रह गए। वल्कल और मृगचर्म धारण किए हुए अपनी पुत्री को देखकर सभी रानियाँ —

श्लोक 64 (devibhagavatam.7.3.64)

रुरुदुर्भृशशोकार्ता वेपमाना इवाभवन् । तामापृच्छ्य महीपालो मन्त्रिभिः परिवारितः । ययौ स्वनगरं राजन् मुक्त्वा पुत्रीं शुचार्पिताम्

rurudurbhṛśaśokārtā vepamānā ivābhavan tāmāpṛcchya mahīpālo mantribhiḥ parivāritaḥ yayau svanagaraṁ rājan muktvā putrīṁ śucārpitām

— अत्यंत शोक से पीड़ित होकर रो पड़ीं और मानो कांपने लगीं। उससे विदा लेकर, मंत्रियों से घिरे हुए राजा, हे राजन्, शोकमग्न पुत्री को वहीं छोड़कर अपनी नगरी को लौट गए।

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