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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 31

हिमालय के भवन में पार्वती-जन्म के विषय में देवी का देवताओं से कथन

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.31.1)

जनमेजय उवाच । धराधराधीशमौलावाविरासीत्परं महः । यदुक्तं भवता पूर्वं विस्तरात्तद्वदस्व मे

janamejaya uvāca | dharādharādhīśamaulāvāvirāsītparaṁ mahaḥ | yaduktaṁ bhavatā pūrvaṁ vistarāttadvadasva me

जनमेजय ने कहा — हे मुनिवर, आपने पहले जो यह कहा था कि पर्वतराज हिमालय के मस्तक पर परम तेज प्रकट हुआ था, वह मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.31.2)

को विरज्येत मतिमान् पिबञ्छक्तिकथामृतम् । सुधां तु पिबतां मृत्युः स नैतच्छृण्वतो भवेत्

ko virajyeta matimān pibañchaktikathāmṛtam | sudhāṁ tu pibatāṁ mṛtyuḥ sa naitacchṛṇvato bhavet

कौन बुद्धिमान पुरुष शक्ति की कथा-रूपी अमृत का पान करते हुए उससे विमुख हो सकता है? साधारण सुधा-पान करने वालों को भी मृत्यु आ जाती है, किन्तु इस कथा को सुनने वाले को मृत्यु स्पर्श नहीं कर सकती।

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.31.3)

व्यास उवाच । धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि शिक्षितोऽसि महात्मभिः । भाग्यवानसि यद्देव्यां निर्व्याजा भक्तिरस्ति ते

vyāsa uvāca | dhanyo'si kṛtakṛtyo'si śikṣito'si mahātmabhiḥ | bhāgyavānasi yaddevyāṁ nirvyājā bhaktirasti te

व्यास जी ने कहा — तुम धन्य हो, कृतकृत्य हो, महात्माओं द्वारा सुशिक्षित हो; तुम भाग्यशाली हो, क्योंकि देवी में तुम्हारी निष्कपट भक्ति है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.31.4)

शृणु राजन्पुरा वृत्तं सतीदेहेऽग्निभर्जिते । भ्रान्तः शिवस्तु बभ्राम क्वचिद्देशे स्थिरोऽभवत्

śṛṇu rājanpurā vṛttaṁ satīdehe'gnibharjite | bhrāntaḥ śivastu babhrāma kvaciddeśe sthiro'bhavat

हे राजन्, सुनो — पूर्वकाल में जब सती का शरीर अग्नि में भस्म हो गया था, तब व्यथित शिव भटकते रहे और अन्ततः किसी एक स्थान में स्थिर हो गए।

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.31.5)

प्रपञ्चभानरहितः समाधिगतमानसः । ध्यायन्देवीस्वरूपं तु कालं निन्ये स आत्मवान्

prapañcabhānarahitaḥ samādhigatamānasaḥ | dhyāyandevīsvarūpaṁ tu kālaṁ ninye sa ātmavān

जगत् के प्रति समस्त बोध से रहित, समाधिस्थ मन वाले, आत्मज्ञानी शिव देवी के स्वरूप का ध्यान करते हुए काल व्यतीत करने लगे।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.31.6)

सौभाग्यरहितं जातं त्रैलोक्यं सचराचरम् । शक्तिहीनं जगत्सर्वं साब्धिद्वीपं सपर्वतम्

saubhāgyarahitaṁ jātaṁ trailokyaṁ sacarācaram | śaktihīnaṁ jagatsarvaṁ sābdhidvīpaṁ saparvatam

इस बीच तीनों लोक — चराचर सहित — सौभाग्यहीन हो गए; समुद्रों, द्वीपों और पर्वतों सहित सम्पूर्ण जगत् शक्तिहीन हो गया।

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.31.7)

आनन्दः शुष्कतां यातः सर्वेषां हृदयान्तरे । उदासीनाः सर्वलोकाश्चिन्ताजर्जरचेतसः

ānandaḥ śuṣkatāṁ yātaḥ sarveṣāṁ hṛdayāntare | udāsīnāḥ sarvalokāścintājarjaracetasaḥ

सबके हृदय में आनन्द सूख गया; समस्त लोक उदासीन हो गए, चिन्ता से उनके मन जर्जर हो उठे।

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.31.8)

सदा दुःखोदधौ मग्ना रोगग्रस्तास्तदाभवन् । ग्रहाणां देवतानां च वैपरीत्येन वर्तनम्

sadā duḥkhodadhau magnā rogagrastāstadābhavan | grahāṇāṁ devatānāṁ ca vaiparītyena vartanam

सभी सदा दुःख-सागर में डूबे रहने लगे और रोगग्रस्त हो गए; ग्रहों और देवताओं की गति भी विपरीत होने लगी।

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.31.9)

अधिभूताधिदैवानां सत्यभावान्नृपाभवन् । अथाऽस्मिन्नेव काले तु तारकाख्यो महसुरः

adhibhūtādhidaivānāṁ satyabhāvānnṛpābhavan | athā'sminneva kāle tu tārakākhyo mahasuraḥ

हे राजन्, आधिभौतिक और आधिदैविक उत्पातों की सत्यता प्रकट होने लगी। इसी समय तारक नामक महान् असुर —

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.31.10)

ब्रह्मदत्तवरो दैत्योऽभवत्त्रैलोक्यनायकः । शिवौरसस्तु यः पुत्रः स ते हन्ता भविष्यति

brahmadattavaro daityo'bhavattrailokyanāyakaḥ | śivaurasastu yaḥ putraḥ sa te hantā bhaviṣyati

ब्रह्मा से वरदान पाकर वह दैत्य तीनों लोकों का स्वामी बन गया — यह वरदान था कि केवल शिव के औरस पुत्र द्वारा ही उसका वध होगा।

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.31.11)

इति कल्पितमृत्युः स देवदेवैर्महासुरः । शिवौरससुताभावाज्जगर्ज च ननन्द च

iti kalpitamṛtyuḥ sa devadevairmahāsuraḥ | śivaurasasutābhāvājjagarja ca nananda ca

इस प्रकार अपनी मृत्यु की शर्त जानकर वह महान् असुर देवताओं के समक्ष गरजने और आनन्दित होने लगा, क्योंकि शिव के औरस पुत्र का सर्वथा अभाव था।

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.31.12)

तेन चोपद्रुताः सर्वे स्वस्थानात्प्रच्युताः सुराः । शिवौरससुताभावाच्चिन्तामापुर्दुरत्ययाम्

tena copadrutāḥ sarve svasthānātpracyutāḥ surāḥ | śivaurasasutābhāvāccintāmāpurduratyayām

उसके द्वारा उत्पीड़ित होकर सभी देवता अपने-अपने स्थानों से च्युत हो गए, और शिव के औरस पुत्र के अभाव के कारण वे अत्यन्त गहरी चिन्ता में डूब गए।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.31.13)

नाङ्गना शङ्करस्यास्ति कथं तत्सुतसम्भवः । अस्माकं भाग्यहीनानां कथं कार्यं भविष्यति

nāṅganā śaṅkarasyāsti kathaṁ tatsutasambhavaḥ | asmākaṁ bhāgyahīnānāṁ kathaṁ kāryaṁ bhaviṣyati

शंकर की तो कोई पत्नी ही नहीं है, फिर उनके पुत्र की उत्पत्ति कैसे होगी? हम अभागों का कार्य अब कैसे सिद्ध होगा?

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.31.14)

इति चिन्तातुराः सर्वे जग्मुर्वैकुण्ठमण्डले । शशंसुर्हरिमेकान्ते स चोपायं जगाद ह

iti cintāturāḥ sarve jagmurvaikuṇṭhamaṇḍale | śaśaṁsurharimekānte sa copāyaṁ jagāda ha

इस प्रकार चिन्तातुर होकर वे सब वैकुण्ठधाम गए और एकान्त में हरि से अपनी व्यथा निवेदन की; तब उन्होंने एक उपाय बताया।

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.31.15)

कुतश्चिन्तातुराः सर्वे कामकल्पद्रुमा शिवा । जागर्ति भूवनेशानी मणिद्वीपाधिवासिनी

kutaścintāturāḥ sarve kāmakalpadrumā śivā | jāgarti bhūvaneśānī maṇidvīpādhivāsinī

विष्णु ने कहा — तुम सब क्यों चिन्तित हो? कामनाओं को पूर्ण करने वाली कल्पवृक्ष-स्वरूपा, कल्याणमयी, भुवनेश्वरी, मणिद्वीप-निवासिनी देवी सदा जाग्रत हैं।

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.31.16)

अस्माकमनया देव तदुपेक्षास्ति नान्यथा । शिक्षैवेयं जगन्मात्रा कृतास्मच्छिक्षणाय च

asmākamanayā deva tadupekṣāsti nānyathā | śikṣaiveyaṁ jaganmātrā kṛtāsmacchikṣaṇāya ca

हे देवगण, यह जो हम पर विपत्ति आई है, वह उसी माता की अवहेलना का परिणाम है, अन्यथा नहीं; जगन्माता ने हमें शिक्षा देने के लिए ही यह विपत्ति रची है।

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.31.17)

लालने ताडने मातुर्नाकारुण्यं यथार्भके । तद्वदेव जगन्मातुर्नियन्त्र्या गुणदोषयोः

lālane tāḍane māturnākāruṇyaṁ yathārbhake | tadvadeva jaganmāturniyantryā guṇadoṣayoḥ

जैसे बालक को दुलारने और ताड़ना देने, दोनों में माता की करुणा में कोई भेद नहीं होता, वैसे ही गुण और दोष दोनों के नियमन में जगन्माता की करुणा भी अभिन्न है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.31.18)

अपराधो भवत्येव तनयस्य पदे पदे । कोऽपरः सहते लोके केवलं मातरं विना

aparādho bhavatyeva tanayasya pade pade | ko'paraḥ sahate loke kevalaṁ mātaraṁ vinā

पुत्र से तो पग-पग पर अपराध होता ही रहता है; परन्तु संसार में माता के अतिरिक्त और कौन उसे सहन करता है?

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.31.19)

तस्माद्यूयं पराम्बां तां शरणं यात मा चिरम् । निर्व्याजया चित्तवृत्त्या सा वः कार्यं विधास्यति

tasmādyūyaṁ parāmbāṁ tāṁ śaraṇaṁ yāta mā ciram | nirvyājayā cittavṛttyā sā vaḥ kāryaṁ vidhāsyati

इसलिए तुम सब बिना विलम्ब किए उस परमा माता की शरण में जाओ; निष्कपट चित्तवृत्ति से शरणागत होने पर वह तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध करेंगी।

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.31.20)

इत्यादिश्य सुरान्सर्वान्महाविष्णुः स्वजायया । संयुतो निर्जगामाशु देवैः सह सुराधिपः

ityādiśya surānsarvānmahāviṣṇuḥ svajāyayā | saṁyuto nirjagāmāśu devaiḥ saha surādhipaḥ

समस्त देवताओं को इस प्रकार आदेश देकर, महाविष्णु अपनी पत्नी सहित तथा देवराज इन्द्र आदि देवताओं के साथ शीघ्र ही वहाँ से चल पड़े।

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.31.21)

आजगाम महाशैलं हिमवन्तं नगाधिपम् । अभवंश्च सुराः सर्वे पुरश्चरणकर्मिणः

ājagāma mahāśailaṁ himavantaṁ nagādhipam | abhavaṁśca surāḥ sarve puraścaraṇakarmiṇaḥ

वे महान् पर्वत नगराज हिमवान् के पास पहुँचे, और समस्त देवता पुरश्चरण-कर्म में संलग्न हो गए।

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.31.22)

अम्बायज्ञविधानज्ञा अम्बायज्ञं च चक्रिरे । तृतीयादिव्रतान्याशु चक्रुः सर्वे सुरा नृप

ambāyajñavidhānajñā ambāyajñaṁ ca cakrire | tṛtīyādivratānyāśu cakruḥ sarve surā nṛpa

अम्बा-यज्ञ की विधि जानने वाले उन देवताओं ने अम्बा-यज्ञ किया, हे राजन्, और शीघ्र ही सभी देवताओं ने तृतीया आदि व्रत भी किए।

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.31.23)

केचित्समाधिनिष्णाताः केचिन्नामपरायणाः । केचित्सूक्तपराः केचिन्नामपारायणोत्सुकाः

kecitsamādhiniṣṇātāḥ kecinnāmaparāyaṇāḥ | kecitsūktaparāḥ kecinnāmapārāyaṇotsukāḥ

कोई समाधि में लीन हुए, कोई नाम-जप में तत्पर हुए; कोई सूक्त-पाठ में लगे, कोई नाम के सतत पारायण में उत्सुक हुए।

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.31.24)

मन्त्रपारायणपराः केचित्कृच्छ्रादिकारिणः । अन्तर्यागपराः केचित्केचिन्न्यासपरायणाः

mantrapārāyaṇaparāḥ kecitkṛcchrādikāriṇaḥ | antaryāgaparāḥ kecitkecinnyāsaparāyaṇāḥ

कोई मन्त्र-पारायण में लगे, कोई कृच्छ्र आदि कठोर व्रतों का पालन करने लगे; कोई अन्तर्याग (आन्तरिक पूजा) में लीन हुए, कोई न्यास-विधि में तत्पर हुए।

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.31.25)

हृल्लेखया पराशक्तेः पूजां चक्रुरतन्द्रिताः । इत्येवं बहुवर्षाणि कालोऽगाज्जनमेजय

hṛllekhayā parāśakteḥ pūjāṁ cakruratandritāḥ | ityevaṁ bahuvarṣāṇi kālo'gājjanamejaya

उन्होंने अथक होकर हृल्लेखा मन्त्र द्वारा परा शक्ति की पूजा की। हे जनमेजय, इस प्रकार बहुत वर्षों तक समय बीत गया।

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.31.26)

अकस्माच्चैत्रमासीयनवम्यां च भृगोर्दिने । प्रादुर्बभूव पुरतस्तन्महः श्रुतिबोधितम्

akasmāccaitramāsīyanavamyāṁ ca bhṛgordine | prādurbabhūva puratastanmahaḥ śrutibodhitam

फिर अचानक चैत्र मास की नवमी को, शुक्रवार के दिन, वह वेदों द्वारा वर्णित परम तेज उनके सामने प्रकट हुआ।

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.31.27)

चतुर्दिक्षु चतुर्वेदैर्मूर्तिमद्भिरभिष्टुतम् । कोटिसूर्यप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशीतलम्

caturdikṣu caturvedairmūrtimadbhirabhiṣṭutam | koṭisūryapratīkāśaṁ candrakoṭisuśītalam

चारों दिशाओं में मूर्तिमान् चारों वेदों द्वारा स्तुत, वह करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी और करोड़ों चन्द्रमाओं के समान शीतल था।

श्लोक 28 (devibhagavatam.7.31.28)

विद्युत्कोटिसमानाभमरुणं तत्परं महः । नैव चोर्ध्वं न तिर्यक्च न मध्ये परिजग्रभत्

vidyutkoṭisamānābhamaruṇaṁ tatparaṁ mahaḥ | naiva cordhvaṁ na tiryakca na madhye parijagrabhat

करोड़ों बिजलियों के समान कान्तिमान् वह अरुण-वर्ण परम तेज न ऊपर था, न तिरछा, न मध्य में — वह किसी सीमा में समाया नहीं जा सकता था।

श्लोक 29 (devibhagavatam.7.31.29)

आद्यन्तरहितं तत्तु न हस्ताद्यङ्गसंयुतम् । न च स्त्रीरूपमथवा न पुंरूपमथोभयम्

ādyantarahitaṁ tattu na hastādyaṅgasaṁyutam | na ca strīrūpamathavā na puṁrūpamathobhayam

वह आदि-अन्त से रहित था, हाथ आदि अंगों से युक्त नहीं था; न वह स्त्री-रूप था, न पुरुष-रूप, न दोनों ही।

श्लोक 30 (devibhagavatam.7.31.30)

दीप्त्या पिधानं नेत्राणां तेषामासीन्महीपते । पुनश्च धैर्यमालम्ब्य यावत्ते ददृशुः सुराः

dīptyā pidhānaṁ netrāṇāṁ teṣāmāsīnmahīpate | punaśca dhairyamālambya yāvatte dadṛśuḥ surāḥ

हे राजन्, उसकी दीप्ति से उनके नेत्र चौंधिया गए; फिर जब देवताओं ने पुनः धैर्य धारण करके देखा —

श्लोक 31 (devibhagavatam.7.31.31)

तावत्तदेव स्त्रीरूपेणाभाद्दिव्यं मनोहरम् । अतीव रमणीयाङ्गीं कुमारीं नवयौवनाम्

tāvattadeva strīrūpeṇābhāddivyaṁ manoharam | atīva ramaṇīyāṅgīṁ kumārīṁ navayauvanām

उसी समय वह दिव्य तेज मनोहर स्त्री-रूप में प्रकट हुआ — अत्यन्त रमणीय अंगों वाली, नवयौवना कुमारी के रूप में।

श्लोक 32 (devibhagavatam.7.31.32)

उद्यत्पीनकुचद्वन्द्वनिन्दिताम्भोजकुड्मलाम् । रणत्किङ्किणिकाजालसिञ्जन्मञ्जीरमेखलाम्

udyatpīnakucadvandvaninditāmbhojakuḍmalām | raṇatkiṅkiṇikājālasiñjanmañjīramekhalām

उसके उभरे हुए दोनों स्तन कमल की कली को भी लज्जित करने वाले थे; उसकी करधनी में बजते हुए घुँघरुओं तथा नूपुरों की मधुर झंकार गूँज रही थी।

श्लोक 33 (devibhagavatam.7.31.33)

कनकाङ्गदकेयूरग्रैवेयकविभूषिताम् । अनर्घ्यमणिसम्भिन्नगलबन्धविराजिताम्

kanakāṅgadakeyūragraiveyakavibhūṣitām | anarghyamaṇisambhinnagalabandhavirājitām

वह स्वर्ण के अंगद, केयूर और कण्ठहार से विभूषित थी, तथा अमूल्य मणियों से जड़े गलबन्ध से सुशोभित थी।

श्लोक 34 (devibhagavatam.7.31.34)

तनुकेतकसंराजन्नीलभ्रमरकुन्तलाम् । नितम्बबिम्बसुभगां रोमराजिविराजिताम्

tanuketakasaṁrājannīlabhramarakuntalām | nitambabimbasubhagāṁ romarājivirājitām

उसके सुकुमार शरीर पर केतकी-पुष्प के समान सुशोभित, भ्रमर के समान काले, घुँघराले केश लहरा रहे थे; उसके सुडौल नितम्ब-बिम्ब रोमराजि से और भी शोभायमान हो रहे थे।

श्लोक 35 (devibhagavatam.7.31.35)

कर्पूरशकलोन्मिश्रताम्बूलपूरिताननाम् । कनत्कनकताटङ्कविटङ्कवदनाम्बुजाम्

karpūraśakalonmiśratāmbūlapūritānanām | kanatkanakatāṭaṅkaviṭaṅkavadanāmbujām

उसका मुख कर्पूर-मिश्रित ताम्बूल से पूर्ण था; उसके देदीप्यमान स्वर्ण-कर्णफूलों से उसका मुखकमल और भी शोभा पा रहा था।

श्लोक 36 (devibhagavatam.7.31.36)

अष्टमीचन्द्रबिम्बाभललाटामायतभ्रुवम् । रक्तारविन्दनयनामुन्नसां मधुराधराम्

aṣṭamīcandrabimbābhalalāṭāmāyatabhruvam | raktāravindanayanāmunnasāṁ madhurādharām

उसका ललाट अष्टमी के चन्द्रमा के समान था, उसकी भौंहें विस्तृत थीं; उसके नेत्र लाल कमल के समान थे, नासिका उन्नत थी और अधर मधुर थे।

श्लोक 37 (devibhagavatam.7.31.37)

कुन्दकुड्मलदन्ताग्रां मुक्ताहारविराजिताम् । रत्नसम्भिन्नमुकुटां चन्द्ररेखावतंसिनीम्

kundakuḍmaladantāgrāṁ muktāhāravirājitām | ratnasambhinnamukuṭāṁ candrarekhāvataṁsinīm

उसके दाँतों के अग्रभाग कुन्द-कली के समान थे; वह मोतियों के हार से सुशोभित थी, रत्नजड़ित मुकुट धारण किए थी और चन्द्ररेखा को आभूषण के रूप में पहने हुए थी।

श्लोक 38 (devibhagavatam.7.31.38)

मल्लिकामालतीमालाकेशपाशविराजिताम् । काश्मीरबिन्दुनिटिलां नेत्रत्रयविलासिनीम्

mallikāmālatīmālākeśapāśavirājitām | kāśmīrabinduniṭilāṁ netratrayavilāsinīm

मल्लिका और मालती के पुष्पों की माला से उसके केशपाश सुशोभित थे; उसके ललाट पर केसर की बिन्दी थी, और उसके तीन नेत्र सुशोभित हो रहे थे।

श्लोक 39 (devibhagavatam.7.31.39)

पाशाङ्कुशवराभीतिचतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् । रक्तवस्त्रपरीधानां दाडिमीकुसुमप्रभाम्

pāśāṅkuśavarābhīticaturbāhuṁ trilocanām | raktavastraparīdhānāṁ dāḍimīkusumaprabhām

वह चतुर्भुजा थी, अपने हाथों में पाश, अंकुश, वर और अभय मुद्रा धारण किए थी; वह त्रिनेत्रा थी, लाल वस्त्र पहने थी, उसकी कान्ति अनार के फूल के समान थी।

श्लोक 40 (devibhagavatam.7.31.40)

सर्वशृङ्गारवेषाढ्यां सर्वदेवनमस्कृताम् । सर्वाशापूरिकां सर्वमातरं सर्वमोहिनीम्

sarvaśṛṅgāraveṣāḍhyāṁ sarvadevanamaskṛtām | sarvāśāpūrikāṁ sarvamātaraṁ sarvamohinīm

वह समस्त शृंगार-वेश से सम्पन्न थी, समस्त देवताओं द्वारा नमस्कृत थी, समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली, सबकी माता और सबको मोहित करने वाली थी।

श्लोक 41 (devibhagavatam.7.31.41)

प्रसादसुमुखीमम्बां मन्दस्मितमुखाम्बुजाम् । अव्याजकरुणामूर्तिं ददृशुः पुरतः सुराः

prasādasumukhīmambāṁ mandasmitamukhāmbujām | avyājakaruṇāmūrtiṁ dadṛśuḥ purataḥ surāḥ

देवताओं ने अपने सामने उस माता को देखा, जिसका मुख प्रसन्नता से सुन्दर था, जिसके मुखकमल पर मन्द मुस्कान थी, जो निष्कपट करुणा की साक्षात् मूर्ति थी।

श्लोक 42 (devibhagavatam.7.31.42)

दृष्ट्वा तां करुणामुर्तिं प्रणेमुः सकलाः सुराः । वक्तुं नाशक्नुवन् किञ्चिद्वाष्पसंरुद्धनिःस्वनाः

dṛṣṭvā tāṁ karuṇāmurtiṁ praṇemuḥ sakalāḥ surāḥ | vaktuṁ nāśaknuvan kiñcidvāṣpasaṁruddhaniḥsvanāḥ

उस करुणा-मूर्ति को देखकर सभी देवताओं ने प्रणाम किया; अश्रुओं से उनका कण्ठ अवरुद्ध हो गया और वे कुछ भी बोल नहीं पाए।

श्लोक 43 (devibhagavatam.7.31.43)

कथञ्चित्स्थैर्यमालम्ब्य भक्त्या चानतकन्धराः । प्रेमाश्रुपूर्णनयनास्तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम्

kathañcitsthairyamālambya bhaktyā cānatakandharāḥ | premāśrupūrṇanayanāstuṣṭuvurjagadambikām

किसी प्रकार धैर्य धारण कर, भक्तिपूर्वक सिर झुकाए, प्रेमाश्रुओं से भरे नेत्रों के साथ उन्होंने जगदम्बा की स्तुति की।

श्लोक 44 (devibhagavatam.7.31.44)

देवा ऊचुः । नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्

devā ūcuḥ | namo devyai mahādevyai śivāyai satataṁ namaḥ | namaḥ prakṛtyai bhadrāyai niyatāḥ praṇatāḥ sma tām

देवताओं ने कहा — देवी को नमस्कार है, महादेवी को नमस्कार है, शिवा को सदा नमस्कार है; भद्रा प्रकृति को नमस्कार है — हम संयमपूर्वक उन्हें प्रणाम करते हैं।

श्लोक 45 (devibhagavatam.7.31.45)

तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरसि तरसे नमः

tāmagnivarṇāṁ tapasā jvalantīṁ vairocanīṁ karmaphaleṣu juṣṭām | durgāṁ devīṁ śaraṇamahaṁ prapadye sutarasi tarase namaḥ

अग्नि के समान वर्ण वाली, तपस्या से प्रज्ज्वलित, तेजोमयी, कर्मफलों में सेवित होने वाली उस दुर्गा देवी की मैं शरण लेता हूँ — हे तारने वाली, सुगमता से तारने वाली, तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 46 (devibhagavatam.7.31.46)

देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतैतु

devīṁ vācamajanayanta devāstāṁ viśvarūpāḥ paśavo vadanti | sā no mandreṣamūrjaṁ duhānā dhenurvāgasmānupasuṣṭutaitu

देवताओं ने जिस वाणी को देवी रूप में उत्पन्न किया, उसे ही विश्वरूप प्राणी बोलते हैं; वह मधुर तथा बल देने वाली गौ के समान वाणी हम पर कृपापूर्वक बरसे।

श्लोक 47 (devibhagavatam.7.31.47)

कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् । सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम्

kālarātriṁ brahmastutāṁ vaiṣṇavīṁ skandamātaram | sarasvatīmaditiṁ dakṣaduhitaraṁ namāmaḥ pāvanāṁ śivām

कालरात्रि, ब्रह्मा द्वारा स्तुत, वैष्णवी, स्कन्दमाता, सरस्वती, अदिति और दक्ष-पुत्री — उस पवित्र, कल्याणमयी देवी को हम नमस्कार करते हैं।

श्लोक 48 (devibhagavatam.7.31.48)

महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात्

mahālakṣmyai ca vidmahe sarvaśaktyai ca dhīmahi | tanno devī pracodayāt

हम महालक्ष्मी को जानते हैं, सर्वशक्ति का ध्यान करते हैं; वह देवी हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।

श्लोक 49 (devibhagavatam.7.31.49)

नमो विराट्स्वरूपिण्यै नमः सूत्रात्ममूर्तये । नमोऽव्याकृतरूपिण्यै नमः श्रीब्रह्ममूर्तये

namo virāṭsvarūpiṇyai namaḥ sūtrātmamūrtaye | namo'vyākṛtarūpiṇyai namaḥ śrībrahmamūrtaye

विराट-स्वरूपिणी को नमस्कार है, सूत्रात्मा-मूर्ति को नमस्कार है; अव्याकृत-स्वरूपिणी को नमस्कार है, श्रीब्रह्म-मूर्ति को नमस्कार है।

श्लोक 50 (devibhagavatam.7.31.50)

यदज्ञानाज्जगद्भाति रज्जुसर्पस्रगादिवत् । यज्ज्ञानाल्लयमाप्नोति नुमस्तां भुवनेश्वरीम्

yadajñānājjagadbhāti rajjusarpasragādivat | yajjñānāllayamāpnoti numastāṁ bhuvaneśvarīm

जिसके अज्ञान से यह जगत् रस्सी में सर्प अथवा माला के भ्रम के समान प्रतीत होता है, और जिसके ज्ञान से इसका लय हो जाता है, उस भुवनेश्वरी को हम नमस्कार करते हैं।

श्लोक 51 (devibhagavatam.7.31.51)

नुमस्तत्पदलक्ष्यार्थां चिदेकरसरूपिणीम् । अखण्डानन्दरूपां तां वेदतात्पर्यभूमिकाम्

numastatpadalakṣyārthāṁ cidekarasarūpiṇīm | akhaṇḍānandarūpāṁ tāṁ vedatātparyabhūmikām

'तत्' पद के लक्ष्यार्थ-स्वरूपा, चिन्मात्र-रस-रूपा, अखण्ड आनन्द-स्वरूपा, वेद के तात्पर्य की भूमिस्वरूपा — उन्हें हम नमस्कार करते हैं।

श्लोक 52 (devibhagavatam.7.31.52)

पञ्चकोशातिरिक्तां तामवस्थात्रयसाक्षिणीम् । नुमस्त्वम्पदलक्ष्यार्थां प्रत्यगात्मस्वरूपिणीम्

pañcakośātiriktāṁ tāmavasthātrayasākṣiṇīm | numastvampadalakṣyārthāṁ pratyagātmasvarūpiṇīm

पाँचों कोशों से परे, तीनों अवस्थाओं की साक्षी, 'त्वं' पद के लक्ष्यार्थ-स्वरूपा, प्रत्यगात्मा-स्वरूपा — उन्हें हम नमस्कार करते हैं।

श्लोक 53 (devibhagavatam.7.31.53)

नमः प्रणवरूपायै नमो ह्रीङ्कारमूर्तये । नानामन्त्रात्मिकायै ते करुणायै नमो नमः

namaḥ praṇavarūpāyai namo hrīṅkāramūrtaye | nānāmantrātmikāyai te karuṇāyai namo namaḥ

प्रणव-स्वरूपा को नमस्कार है, ह्रींकार-मूर्ति को नमस्कार है; नाना मन्त्रों की आत्मा-स्वरूपा, करुणामयी तुम्हें बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 54 (devibhagavatam.7.31.54)

इति स्तुता तदा देवैर्मणिद्वीपाधिवासिनी । प्राह वाचा मधुरया मत्तकोकिलनिःस्वना

iti stutā tadā devairmaṇidvīpādhivāsinī | prāha vācā madhurayā mattakokilaniḥsvanā

इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुत होकर मणिद्वीप-निवासिनी देवी ने मतवाली कोयल के समान मधुर वाणी में कहा —

श्लोक 55 (devibhagavatam.7.31.55)

श्रीदेव्युवाच । वदन्तु विबुधाः कार्यं यदर्थमिह सङ्गताः । वरदाहं सदा भक्तकामकल्पद्रुमास्मि च

śrīdevyuvāca | vadantu vibudhāḥ kāryaṁ yadarthamiha saṅgatāḥ | varadāhaṁ sadā bhaktakāmakalpadrumāsmi ca

श्रीदेवी ने कहा — हे देवगण, जिस प्रयोजन से तुम यहाँ एकत्र हुए हो, वह कार्य कहो; मैं सदा वर देने वाली हूँ, और भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष हूँ।

श्लोक 56 (devibhagavatam.7.31.56)

तिष्ठन्त्यां मयि का चिन्ता युष्माकं भक्तिशालिनाम् । समुद्धरामि मद्भक्तान्दुःखसंसारसागरात्

tiṣṭhantyāṁ mayi kā cintā yuṣmākaṁ bhaktiśālinām | samuddharāmi madbhaktānduḥkhasaṁsārasāgarāt

जब मैं विद्यमान हूँ, तो भक्तिशाली तुम लोगों को क्या चिन्ता? मैं अपने भक्तों को दुःखमय संसार-सागर से पार उतारती हूँ।

श्लोक 57 (devibhagavatam.7.31.57)

इति प्रतिज्ञां मे सत्यां जानीथ विबुधोत्तमाः । इति प्रेमाकुलां वाणीं श्रुत्वा सन्तुष्टमानसाः

iti pratijñāṁ me satyāṁ jānītha vibudhottamāḥ | iti premākulāṁ vāṇīṁ śrutvā santuṣṭamānasāḥ

हे श्रेष्ठ देवगण, मेरी इस प्रतिज्ञा को सत्य जानो — इस प्रकार प्रेम से आकुल वाणी सुनकर देवताओं का मन सन्तुष्ट हो गया।

श्लोक 58 (devibhagavatam.7.31.58)

निर्भया निर्जरा राजन्नूचुर्दुःखं स्वकीयकम् । देवा ऊचुः । नाज्ञातं किञ्चिदप्यत्र भवत्यास्ति जगत्त्रये

nirbhayā nirjarā rājannūcurduḥkhaṁ svakīyakam | devā ūcuḥ | nājñātaṁ kiñcidapyatra bhavatyāsti jagattraye

हे राजन्, निर्भय हुए देवताओं ने अपना दुःख निवेदन किया। देवताओं ने कहा — हे भगवति, तीनों लोकों में आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है।

श्लोक 59 (devibhagavatam.7.31.59)

सर्वज्ञया सर्वसाक्षिरूपिण्या परमेश्वरि । तारकेणासुरेन्द्रेण पीडिताः स्मो दिवानिशम्

sarvajñayā sarvasākṣirūpiṇyā parameśvari | tārakeṇāsurendreṇa pīḍitāḥ smo divāniśam

हे परमेश्वरि, आप सर्वज्ञ हैं, समस्त के साक्षी-स्वरूपा हैं; असुरराज तारक द्वारा हम दिन-रात पीड़ित हैं।

श्लोक 60 (devibhagavatam.7.31.60)

शिवाङ्गजाद्वधस्तस्य निर्मितो ब्रह्मणा शिवे । शिवाङ्गना तु नैवास्ति जानासि त्वं महेश्वरि

śivāṅgajādvadhastasya nirmito brahmaṇā śive | śivāṅganā tu naivāsti jānāsi tvaṁ maheśvari

हे शिवे, ब्रह्मा ने उसका वध शिव के अंग से उत्पन्न पुत्र द्वारा ही निश्चित किया है; परन्तु शिव की तो कोई पत्नी ही नहीं है — हे महेश्वरि, आप तो सब जानती ही हैं।

श्लोक 61 (devibhagavatam.7.31.61)

सर्वज्ञपुरतः किं वा वक्तव्यं पामरैर्जनैः । एतदुद्देशतः प्रोक्तमपरं तर्कयाम्बिके

sarvajñapurataḥ kiṁ vā vaktavyaṁ pāmarairjanaiḥ | etaduddeśataḥ proktamaparaṁ tarkayāmbike

सर्वज्ञ के समक्ष तुच्छ मनुष्य और क्या कहें? यह तो केवल संकेत मात्र कहा गया है, हे अम्बिके, शेष आप स्वयं विचार करें।

श्लोक 62 (devibhagavatam.7.31.62)

सर्वदा चरणाम्भोजे भक्तिः स्यात्तव निश्चला । प्रार्थनीयमिदं मुख्यमपरं देहहेतवे

sarvadā caraṇāmbhoje bhaktiḥ syāttava niścalā | prārthanīyamidaṁ mukhyamaparaṁ dehahetave

आपके चरण-कमलों में हमारी भक्ति सदा अटल बनी रहे — यही हमारी मुख्य प्रार्थना है; शेष सब तो केवल शरीर-निर्वाह के लिए है।

श्लोक 63 (devibhagavatam.7.31.63)

इति तेषां वचः श्रुत्वा प्रोवाच परमेश्वरी । मम शक्तिस्तु या गौरी भविष्यति हिमालये

iti teṣāṁ vacaḥ śrutvā provāca parameśvarī | mama śaktistu yā gaurī bhaviṣyati himālaye

उनकी यह बात सुनकर परमेश्वरी ने कहा — मेरी ही शक्ति जो गौरी के रूप में होगी, वह हिमालय के घर में जन्म लेगी।

श्लोक 64 (devibhagavatam.7.31.64)

शिवाय सा प्रदेया स्यात्सा वः कार्यं विधास्यति । भक्तिर्यच्चरणाम्भोजे भूयाद्युष्माकमादरात्

śivāya sā pradeyā syātsā vaḥ kāryaṁ vidhāsyati | bhaktiryaccaraṇāmbhoje bhūyādyuṣmākamādarāt

वह शिव को अर्पित की जाएगी और तुम्हारा कार्य सिद्ध करेगी; तथा उसके चरण-कमलों में तुम्हारी भक्ति श्रद्धापूर्वक बनी रहे।

श्लोक 65 (devibhagavatam.7.31.65)

हिमालयो हि मनसा मामुपास्तेऽतिभक्तितः । ततस्तस्य गृहे जन्म मम प्रियकरं मतम्

himālayo hi manasā māmupāste'tibhaktitaḥ | tatastasya gṛhe janma mama priyakaraṁ matam

हिमालय अत्यन्त भक्तिपूर्वक मन से मेरी उपासना करते हैं; इसलिए उन्हीं के घर में जन्म लेना मुझे प्रिय प्रतीत होता है।

श्लोक 66 (devibhagavatam.7.31.66)

व्यास उवाच । हिमालयोऽपि तच्छ्रुत्वात्यनुग्रहकरं वचः । बाष्पैः संरुद्धकण्ठाक्षो महाराज्ञीं वचोऽब्रवीत्

vyāsa uvāca | himālayo'pi tacchrutvātyanugrahakaraṁ vacaḥ | bāṣpaiḥ saṁruddhakaṇṭhākṣo mahārājñīṁ vaco'bravīt

व्यास जी ने कहा — हिमालय भी उस अत्यन्त अनुग्रहमयी वाणी को सुनकर, अश्रुओं से कण्ठ और नेत्र अवरुद्ध होते हुए, उस महारानी से बोले —

श्लोक 67 (devibhagavatam.7.31.67)

महत्तरं तं कुरुषे यस्यानुग्रहमिच्छसि । नोचेत्क्वाहं जडः स्थाणुः क्व त्वं सच्चित्स्वरूपिणी

mahattaraṁ taṁ kuruṣe yasyānugrahamicchasi | nocetkvāhaṁ jaḍaḥ sthāṇuḥ kva tvaṁ saccitsvarūpiṇī

आप जिस पर कृपा करना चाहती हैं, उसे ही महान् बना देती हैं; अन्यथा कहाँ मैं जड़ पर्वत, और कहाँ आप सत्-चित्-स्वरूपा?

श्लोक 68 (devibhagavatam.7.31.68)

असम्भाव्यं जन्मशतैस्त्वत्पितृत्वं ममानघे । अश्वमेधादिपुण्यैर्वा पुण्यैर्वा तत्समाधिजैः

asambhāvyaṁ janmaśataistvatpitṛtvaṁ mamānaghe | aśvamedhādipuṇyairvā puṇyairvā tatsamādhijaiḥ

हे निष्पाप, सैकड़ों जन्मों में भी, अश्वमेध आदि पुण्यों से भी, अथवा समाधि से उत्पन्न पुण्यों से भी, आपका पितृत्व मुझे असम्भव प्रतीत होता है।

श्लोक 69 (devibhagavatam.7.31.69)

अद्य प्रपञ्चे कीर्तिः स्याज्जगन्माता सुताभवत् । अहो हिमालयस्यास्य धन्योऽसौ भाग्यवानिति

adya prapañce kīrtiḥ syājjaganmātā sutābhavat | aho himālayasyāsya dhanyo'sau bhāgyavāniti

आज संसार में यह कीर्ति फैलेगी कि जगन्माता ने पुत्री के रूप में जन्म लिया — 'अहो! यह हिमालय धन्य है, यह भाग्यवान् है!' — ऐसा सब कहेंगे।

श्लोक 70 (devibhagavatam.7.31.70)

यस्यास्तु जठरे सन्ति ब्रह्माण्डानां च कोटयः । सैव यस्य सुता जाता को वा स्यात्तत्समो भुवि

yasyāstu jaṭhare santi brahmāṇḍānāṁ ca koṭayaḥ | saiva yasya sutā jātā ko vā syāttatsamo bhuvi

जिसके उदर में करोड़ों ब्रह्माण्ड समाए हुए हैं, वही जिसकी पुत्री के रूप में जन्म ले — भला पृथ्वी पर उसके समान भाग्यशाली और कौन होगा?

श्लोक 71 (devibhagavatam.7.31.71)

न जानेऽस्मत्पितॄणां किं स्थानं स्यान्निर्मितं परम् । एतादृशानां वासाय येषां वंशेऽस्ति मादृशः

na jāne'smatpitṝṇāṁ kiṁ sthānaṁ syānnirmitaṁ param | etādṛśānāṁ vāsāya yeṣāṁ vaṁśe'sti mādṛśaḥ

मुझे नहीं ज्ञात कि हमारे पितरों ने ऐसा कौन-सा उत्कृष्ट स्थान प्राप्त किया होगा, जिनके वंश में मेरे जैसा भाग्यशाली उत्पन्न हुआ।

श्लोक 72 (devibhagavatam.7.31.72)

इदं यथा च दत्तं मे कृपया प्रेमपूर्णया । सर्ववेदान्तसिद्धं च त्वद्रूपं ब्रूहि मे तथा

idaṁ yathā ca dattaṁ me kṛpayā premapūrṇayā | sarvavedāntasiddhaṁ ca tvadrūpaṁ brūhi me tathā

जैसे आपने प्रेमपूर्ण कृपा से यह वर मुझे दिया, वैसे ही मुझे अपना वह स्वरूप भी बताइए, जो समस्त वेदान्त द्वारा सिद्ध है।

श्लोक 73 (devibhagavatam.7.31.73)

योगं च भक्तिसहितं ज्ञानं च श्रुतिसम्मतम् । वदस्व परमेशानि त्वमेवाहं यतो भवेः

yogaṁ ca bhaktisahitaṁ jñānaṁ ca śrutisammatam | vadasva parameśāni tvamevāhaṁ yato bhaveḥ

भक्ति सहित योग और श्रुति-सम्मत ज्ञान भी मुझसे कहिए, हे परमेश्वरि, जिससे मैं भी 'तुम्हीं मैं हूँ' — इस भाव को प्राप्त हो सकूँ।

श्लोक 74 (devibhagavatam.7.31.74)

व्यास उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रसन्नमुखपङ्कजा । वक्तुमारभताम्बा सा रहस्यं श्रुतिगूहितम्

vyāsa uvāca | iti tasya vacaḥ śrutvā prasannamukhapaṅkajā | vaktumārabhatāmbā sā rahasyaṁ śrutigūhitam

व्यास जी ने कहा — हिमालय की यह बात सुनकर, प्रसन्न मुखकमल वाली उस माता ने वह रहस्य कहना आरम्भ किया, जो वेदों में गुप्त रखा गया है।

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