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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 32

देवी के व्यष्टि एवं समष्टि स्वरूप का वर्णन

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.32.1)

श्रीदेव्युवाच । शृण्वन्तु निर्जराः सर्वे व्याहरन्त्या वचो मम । यस्य श्रवणमात्रेण मद्रूपत्वं प्रपद्यते

śrīdevyuvāca | śṛṇvantu nirjarāḥ sarve vyāharantyā vaco mama | yasya śravaṇamātreṇa madrūpatvaṁ prapadyate

श्रीदेवी ने कहा — हे देवगण, तुम सब मेरे इन वचनों को सुनो, जिनके श्रवण मात्र से श्रोता मेरे ही स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.32.2)

अहमेवास पूर्वं तु नान्यत्किञ्चिन्नगाधिप । तदात्मरूपं चित्संवित्परब्रह्मैकनामकम्

ahamevāsa pūrvaṁ tu nānyatkiñcinnagādhipa | tadātmarūpaṁ citsaṁvitparabrahmaikanāmakam

हे पर्वतराज, पूर्वकाल में मैं ही थी, अन्य कुछ भी नहीं था; वह आत्मस्वरूप चित्-संवित् और परब्रह्म, इन्हीं नामों से जाना जाता है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.32.3)

अप्रतर्क्यमनिर्देश्यमनौपम्यमनामयम् । तस्य काचित्स्वतः सिद्धा शक्तिर्मायेति विश्रुता

apratarkyamanirdeśyamanaupamyamanāmayam | tasya kācitsvataḥ siddhā śaktirmāyeti viśrutā

वह अतर्क्य, अनिर्देश्य, अनुपम और निर्विकार है; उसकी स्वतः सिद्ध कोई शक्ति है, जो 'माया' के नाम से विख्यात है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.32.4)

न सती सा नासती सा नोभयात्मा विरोधतः । एतद्विलक्षणा काचिद्वस्तुभूतास्ति सर्वदा

na satī sā nāsatī sā nobhayātmā virodhataḥ | etadvilakṣaṇā kācidvastubhūtāsti sarvadā

वह न तो सत् है, न असत् है, विरोध होने के कारण उभयरूप भी नहीं है; वह इन सबसे विलक्षण कोई वस्तुभूत सत्ता है, जो सदा विद्यमान रहती है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.32.5)

पावकस्योष्णतेवेयमुष्णांशोरिव दीधितिः । चन्द्रस्य चन्द्रिकेवेयं ममेयं सहजा ध्रुवा

pāvakasyoṣṇateveyamuṣṇāṁśoriva dīdhitiḥ | candrasya candrikeveyaṁ mameyaṁ sahajā dhruvā

जैसे अग्नि की उष्णता, सूर्य का प्रकाश और चन्द्रमा की चाँदनी, वैसे ही यह माया मेरी सहज और शाश्वत शक्ति है।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.32.6)

तस्यां कर्माणि जीवानां जीवाः कालाश्च सञ्चरे । अभेदेन विलीनाः स्युः सुषुप्तौ व्यवहारवत्

tasyāṁ karmāṇi jīvānāṁ jīvāḥ kālāśca sañcare | abhedena vilīnāḥ syuḥ suṣuptau vyavahāravat

उसी में जीवों के कर्म, जीव और काल संचरित होते हैं; वे सुषुप्ति में व्यवहार के समान अभेद रूप से लीन हो जाते हैं।

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.32.7)

स्वशक्तेश्च समायोगादहं बीजात्मतां गता । स्वाधारावरणात्तस्या दोषत्वं च समागतम्

svaśakteśca samāyogādahaṁ bījātmatāṁ gatā | svādhārāvaraṇāttasyā doṣatvaṁ ca samāgatam

अपनी इसी शक्ति के संयोग से मैं बीज-रूपता को प्राप्त होती हूँ; अपने आधार को आवृत करने के कारण उसमें दोषरूपता भी आ जाती है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.32.8)

चैतन्यस्य समायोगान्निमित्तत्वं च कथ्यते । प्रपञ्चपरिणामाच्च समवायित्वमुच्यते

caitanyasya samāyogānnimittatvaṁ ca kathyate | prapañcapariṇāmācca samavāyitvamucyate

चैतन्य के संयोग से उसे निमित्त-कारणता कहा जाता है, और जगत् के परिणाम के रूप में उसे उपादान-कारणता कहा जाता है।

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.32.9)

केचित्तां तप इत्याहुस्तमः केचिज्जडं परे । ज्ञानं मायां प्रधानं च प्रकृतिं शक्तिमप्यजाम्

kecittāṁ tapa ityāhustamaḥ kecijjaḍaṁ pare | jñānaṁ māyāṁ pradhānaṁ ca prakṛtiṁ śaktimapyajām

कोई उसे 'तप' कहते हैं, कोई 'तम', कोई 'जड़'; कोई उसे 'ज्ञान', 'माया', 'प्रधान', 'प्रकृति', 'शक्ति' अथवा 'अजा' भी कहते हैं।

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.32.10)

विमर्श इति तां प्राहुः शैवशास्त्रविशारदाः । अविद्यामितरे प्राहुर्वेदतत्त्वार्थचिन्तकाः

vimarśa iti tāṁ prāhuḥ śaivaśāstraviśāradāḥ | avidyāmitare prāhurvedatattvārthacintakāḥ

शैव शास्त्रों के विद्वान उसे 'विमर्श' कहते हैं, और वेद के तत्त्वार्थ का चिन्तन करने वाले अन्य विद्वान उसे 'अविद्या' कहते हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.32.11)

एवं नानाविधानि स्युर्नामानि निगमादिषु । तस्या जडत्वं दृश्यत्वाज्ज्ञाननाशात्ततोऽसती

evaṁ nānāvidhāni syurnāmāni nigamādiṣu | tasyā jaḍatvaṁ dṛśyatvājjñānanāśāttato'satī

इस प्रकार वेदों आदि में उसके अनेक प्रकार के नाम हैं; उसकी जड़ता उसकी दृश्यता के कारण है, और ज्ञान के नाश से वह असत् है।

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.32.12)

चैतन्यस्य न दृश्यत्वं दृश्यत्वे जडमेव तत् । स्वप्रकाशं च चैतन्यं न परेण प्रकाशितम्

caitanyasya na dṛśyatvaṁ dṛśyatve jaḍameva tat | svaprakāśaṁ ca caitanyaṁ na pareṇa prakāśitam

चैतन्य कभी दृश्य नहीं होता; यदि वह दृश्य हो, तो वह जड़ ही होगा। चैतन्य स्वयं-प्रकाश है, वह किसी अन्य से प्रकाशित नहीं होता।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.32.13)

अनवस्थादोषसत्त्वान्न स्वेनापि प्रकाशितम् । कर्मकर्त्रीविरोधः स्यात्तस्मात्तद्दीपवत्स्वयम्

anavasthādoṣasattvānna svenāpi prakāśitam | karmakartrīvirodhaḥ syāttasmāttaddīpavatsvayam

अनवस्था-दोष होने के कारण वह स्वयं द्वारा भी प्रकाशित नहीं होता, क्योंकि इससे कर्म और कर्ता के बीच विरोध होगा; इसलिए वह दीपक के समान स्वयं ही प्रकाशस्वरूप है।

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.32.14)

प्रकाशमानमन्येषां भासकं विद्धि पर्वत । अत एव च नित्यत्वं सिद्धसंवित्तनोर्मम

prakāśamānamanyeṣāṁ bhāsakaṁ viddhi parvata | ata eva ca nityatvaṁ siddhasaṁvittanormama

हे पर्वतराज, यह जान लो कि वह स्वयं प्रकाशमान होकर ही अन्य सबको प्रकाशित करता है; इसीलिए मेरी सिद्ध-संवित् रूपी सत्ता नित्य है।

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.32.15)

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादौ दृश्यस्य व्यभिचारतः । संविदो व्यभिचारश्च नानुभूतोऽस्ति कर्हिचित्

jāgratsvapnasuṣuptyādau dṛśyasya vyabhicārataḥ | saṁvido vyabhicāraśca nānubhūto'sti karhicit

जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में दृश्य पदार्थ बदलते रहते हैं, परन्तु संवित् का परिवर्तन कभी अनुभव में नहीं आता।

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.32.16)

यदि तस्याप्यनुभवस्तर्ह्ययं येन साक्षिणा । अनुभूतः स एवात्र शिष्टः संविद्वपुः पुरा

yadi tasyāpyanubhavastarhyayaṁ yena sākṣiṇā | anubhūtaḥ sa evātra śiṣṭaḥ saṁvidvapuḥ purā

यदि उसका भी अनुभव माना जाए, तो जिस साक्षी के द्वारा वह अनुभव में आया, वह साक्षी ही यहाँ शेष रहता है — वही पूर्व से संवित्-स्वरूप है।

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.32.17)

अत एव च नित्यत्वं प्रोक्तं सच्छास्त्रकोविदैः । आनन्दरूपता चास्याः परप्रेमास्पदत्वतः

ata eva ca nityatvaṁ proktaṁ sacchāstrakovidaiḥ | ānandarūpatā cāsyāḥ parapremāspadatvataḥ

इसीलिए सत्-शास्त्रों के मर्मज्ञों ने इसकी नित्यता कही है; और यह परम प्रेम का आश्रय होने के कारण आनन्द-स्वरूपा भी है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.32.18)

मा न भूवं हि भूयासमिति प्रेमात्मनि स्थितम् । सर्वस्यान्यस्य मिथ्यात्वादसङ्गत्वं स्फुटं मम

mā na bhūvaṁ hi bhūyāsamiti premātmani sthitam | sarvasyānyasya mithyātvādasaṅgatvaṁ sphuṭaṁ mama

'मैं न रहूँ, ऐसा न हो, मैं सदा रहूँ' — यह प्रेम आत्मा में ही स्थित है; अन्य समस्त वस्तुएँ मिथ्या होने के कारण मेरी असंगता स्पष्ट है।

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.32.19)

अपरिच्छिन्नताप्येवमत एव मता मम । तच्च ज्ञानं नात्मधर्मो धर्मत्वे जडताऽऽत्मनः

aparicchinnatāpyevamata eva matā mama | tacca jñānaṁ nātmadharmo dharmatve jaḍatā''tmanaḥ

इसी प्रकार मेरी अपरिच्छिन्नता भी मानी गई है; और वह ज्ञान आत्मा का धर्म नहीं है, क्योंकि यदि वह धर्म हो, तो आत्मा जड़ हो जाएगा।

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.32.20)

ज्ञानस्य जडशेषत्वं न दृष्टं न च सम्भवि । चिद्धर्मत्वं तथा नास्ति चितश्चिन्न हि भिद्यते

jñānasya jaḍaśeṣatvaṁ na dṛṣṭaṁ na ca sambhavi | ciddharmatvaṁ tathā nāsti citaścinna hi bhidyate

ज्ञान का जड़-आश्रित होना न कभी देखा गया है, न सम्भव है; और यह चित् का धर्म भी नहीं है, क्योंकि चित् से चित् कभी भिन्न नहीं होती।

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.32.21)

तस्मादात्मा ज्ञानरूपः सुखरूपश्च सर्वदा । सत्यः पूर्णोऽप्यसङ्गश्च द्वैतजालविवर्जितः

tasmādātmā jñānarūpaḥ sukharūpaśca sarvadā | satyaḥ pūrṇo'pyasaṅgaśca dvaitajālavivarjitaḥ

इसलिए आत्मा सदा ज्ञान-स्वरूप और सुख-स्वरूप है; वह सत्य, पूर्ण, असंग और द्वैत के जाल से सर्वथा रहित है।

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.32.22)

स पुनः कामकर्मादियुक्तया स्वीयमायया । पूर्वानुभूतसंस्कारात् कालकर्मविपाकतः

sa punaḥ kāmakarmādiyuktayā svīyamāyayā | pūrvānubhūtasaṁskārāt kālakarmavipākataḥ

फिर वही आत्मा, काम-कर्म आदि से युक्त अपनी माया के कारण, पूर्व-अनुभूत संस्कारों तथा काल और कर्म के परिपाक से —

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.32.23)

अविवेकाच्च तत्त्वस्य सिसृक्षावान्प्रजायते । अबुद्धिपूर्वः सर्गोऽयं कथितस्ते नगाधिप

avivekācca tattvasya sisṛkṣāvānprajāyate | abuddhipūrvaḥ sargo'yaṁ kathitaste nagādhipa

और तत्त्व के अविवेक के कारण, सृष्टि करने की इच्छा से युक्त हो जाता है। हे पर्वतराज, यह सृष्टि विचारपूर्वक नहीं, अपितु स्वभावतः होती है — यह मैंने तुमसे कहा।

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.32.24)

एतद्धि यन्मया प्रोक्तं मम रूपमलौकिकम् । अव्याकृतं तदव्यक्तं मायाशबलमित्यपि

etaddhi yanmayā proktaṁ mama rūpamalaukikam | avyākṛtaṁ tadavyaktaṁ māyāśabalamityapi

यह जो मैंने कहा, वह मेरा लोकोत्तर स्वरूप है, जिसे 'अव्याकृत', 'अव्यक्त' और 'मायाशबल' भी कहा जाता है।

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.32.25)

प्रोच्यते सर्वशास्त्रेषु सर्वकारणकारणम् । तत्त्वानामादिभूतं च सच्चिदानन्दविग्रहम्

procyate sarvaśāstreṣu sarvakāraṇakāraṇam | tattvānāmādibhūtaṁ ca saccidānandavigraham

समस्त शास्त्रों में इसे समस्त कारणों का कारण, समस्त तत्त्वों का आदि स्रोत, और सच्चिदानन्द-स्वरूप कहा गया है।

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.32.26)

सर्वकर्मघनीभूतमिच्छाज्ञानक्रियाश्रयम् । ह्रीङ्कारमन्त्रवाच्यं तदादितत्त्वं तदुच्यते

sarvakarmaghanībhūtamicchājñānakriyāśrayam | hrīṅkāramantravācyaṁ tadāditattvaṁ taducyate

यह समस्त कर्मों के सघन रूप में, इच्छा-ज्ञान-क्रिया का आश्रय, ह्रींकार मन्त्र द्वारा वाच्य वही आदि-तत्त्व कहलाता है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.32.27)

तस्मादाकाश उत्पन्नः शब्दतन्मात्ररूपकः । भवेत्स्पर्शात्मको वायुस्तेजोरूपात्मकं पुनः

tasmādākāśa utpannaḥ śabdatanmātrarūpakaḥ | bhavetsparśātmako vāyustejorūpātmakaṁ punaḥ

उससे शब्द-तन्मात्रा वाला आकाश उत्पन्न हुआ; फिर स्पर्श-तन्मात्रा वाला वायु, और फिर रूप-तन्मात्रा वाला तेज उत्पन्न हुआ।

श्लोक 28 (devibhagavatam.7.32.28)

जलं रसात्मकं पश्चात्ततो गन्धात्मिका धरा । शब्दैकगुण आकाशो वायुः स्पर्शरवान्वितः

jalaṁ rasātmakaṁ paścāttato gandhātmikā dharā | śabdaikaguṇa ākāśo vāyuḥ sparśaravānvitaḥ

फिर रस-तन्मात्रा वाला जल, और उससे गन्ध-तन्मात्रा वाली पृथ्वी उत्पन्न हुई। आकाश में शब्द ही एक गुण है, वायु में स्पर्श और शब्द दोनों हैं।

श्लोक 29 (devibhagavatam.7.32.29)

शब्दस्पर्शरूपगुणं तेज इत्युच्यते बुधैः । शब्दस्पर्शरूपरसैरापो वेदगुणाः स्मृताः

śabdasparśarūpaguṇaṁ teja ityucyate budhaiḥ | śabdasparśarūparasairāpo vedaguṇāḥ smṛtāḥ

विद्वान कहते हैं कि तेज में शब्द, स्पर्श और रूप — तीन गुण हैं; जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रस — चार गुण माने जाते हैं।

श्लोक 30 (devibhagavatam.7.32.30)

शब्दस्पर्शरूपरसगन्धैः पञ्चगुणा धरा । तेभ्योऽभवन्महत्सूत्रं यल्लिङ्गं परिचक्षते

śabdasparśarūparasagandhaiḥ pañcaguṇā dharā | tebhyo'bhavanmahatsūtraṁ yalliṅgaṁ paricakṣate

पृथ्वी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध — ये पाँचों गुण हैं। इन सबसे 'महत्तत्त्व' अथवा 'सूत्र' उत्पन्न हुआ, जिसे 'लिंग' भी कहा जाता है।

श्लोक 31 (devibhagavatam.7.32.31)

सर्वात्मकं तत्सम्प्रोक्तं सूक्ष्मदेहोऽयमात्मनः । अव्यक्तं कारणो देहः स चोक्तः पूर्वमेव हि

sarvātmakaṁ tatsamproktaṁ sūkṣmadeho'yamātmanaḥ | avyaktaṁ kāraṇo dehaḥ sa coktaḥ pūrvameva hi

यह सर्वात्मक कहा जाता है, यही आत्मा का सूक्ष्म शरीर है; और अव्यक्त कारण-शरीर के विषय में तो पहले ही कहा जा चुका है।

श्लोक 32 (devibhagavatam.7.32.32)

यस्मिञ्जगद्बीजरूपं स्थितं लिङ्गोद्भवो यतः । ततः स्थूलानि भूतानि पञ्चीकरणमार्गतः

yasmiñjagadbījarūpaṁ sthitaṁ liṅgodbhavo yataḥ | tataḥ sthūlāni bhūtāni pañcīkaraṇamārgataḥ

जिसमें जगत् बीज-रूप में स्थित है, और जिससे लिंग-शरीर की उत्पत्ति होती है, उसी से पंचीकरण की विधि द्वारा स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 33 (devibhagavatam.7.32.33)

पञ्चसङ्ख्यानि जायन्ते तत्प्रकारस्त्वथोच्यते । पूर्वोक्तानि च भूतानि प्रत्येकं विभजेद् द्विधा

pañcasaṅkhyāni jāyante tatprakārastvathocyate | pūrvoktāni ca bhūtāni pratyekaṁ vibhajed dvidhā

उनकी संख्या पाँच होती है; अब उसकी विधि बताई जाती है — पूर्वोक्त प्रत्येक तत्त्व को दो भागों में बाँटा जाता है।

श्लोक 34 (devibhagavatam.7.32.34)

एकैकं भागमेकस्य चतुर्धा विभजेद् गिरे । स्वस्वेतरद्वितीयांशे योजनात्पञ्च पञ्च ते

ekaikaṁ bhāgamekasya caturdhā vibhajed gire | svasvetaradvitīyāṁśe yojanātpañca pañca te

हे पर्वत, उनमें से एक-एक भाग को पुनः चार भागों में बाँटा जाता है; फिर अपने-अपने आधे भाग को शेष चार तत्त्वों के दूसरे चतुर्थांशों से मिलाने पर वे पाँचों तत्त्व पूर्ण होते हैं।

श्लोक 35 (devibhagavatam.7.32.35)

तत्कार्यं च विराड्देहः स्थूलदेहोऽयमात्मनः । पञ्चभूतस्थसत्त्वांशैः श्रोत्रादीनां समुद्भवः

tatkāryaṁ ca virāḍdehaḥ sthūladeho'yamātmanaḥ | pañcabhūtasthasattvāṁśaiḥ śrotrādīnāṁ samudbhavaḥ

इसका कार्य ही विराट् देह है, यही आत्मा का स्थूल शरीर है; पंचभूतों में स्थित सत्त्व-अंशों से श्रोत्र आदि इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है।

श्लोक 36 (devibhagavatam.7.32.36)

ज्ञानेन्द्रियाणां राजेन्द्र प्रत्येकं मिलितैस्तु तैः । अन्तःकरणमेकं स्याद् वृत्तिभेदाच्चतुर्विधम्

jñānendriyāṇāṁ rājendra pratyekaṁ militaistu taiḥ | antaḥkaraṇamekaṁ syād vṛttibhedāccaturvidham

हे राजेन्द्र, इन सबके मिलने से ज्ञानेन्द्रियाँ बनती हैं; अन्तःकरण एक ही होता है, परन्तु वृत्ति-भेद से वह चार प्रकार का कहलाता है।

श्लोक 37 (devibhagavatam.7.32.37)

यदा तु सङ्कल्पविकल्पकृत्यं तदा भवेत्तन्मन इत्यभिख्यम् । स्याद् बुद्धिसंज्ञं च यदा प्रवेत्ति सुनिश्चितं संशयहीनरूपम्

yadā tu saṅkalpavikalpakṛtyaṁ tadā bhavettanmana ityabhikhyam | syād buddhisaṁjñaṁ ca yadā pravetti suniścitaṁ saṁśayahīnarūpam

जब वह संकल्प-विकल्प का कार्य करता है, तब उसे 'मन' कहा जाता है; और जब वह संशयरहित, सुनिश्चित रूप से जानता है, तब उसे 'बुद्धि' कहा जाता है।

श्लोक 38 (devibhagavatam.7.32.38)

अनुसन्धानरूपं तच्चित्तं च परिकीर्तितम् । अहङ्कृत्यात्मवृत्त्या तु तदहङ्कारतां गतम्

anusandhānarūpaṁ taccittaṁ ca parikīrtitam | ahaṅkṛtyātmavṛttyā tu tadahaṅkāratāṁ gatam

उसका अनुसन्धान-रूप कार्य 'चित्त' कहलाता है, और जब वह 'मैं' के भाव से युक्त वृत्ति धारण करता है, तब वह 'अहंकार' कहलाता है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.7.32.39)

तेषां रजोंशैर्जातानि क्रमात्कर्मेन्द्रियाणि च । प्रत्येकं मिलितैस्तैतु प्राणो भवति पञ्चधा

teṣāṁ rajoṁśairjātāni kramātkarmendriyāṇi ca | pratyekaṁ militaistaitu prāṇo bhavati pañcadhā

उन्हीं के रज-अंशों से क्रमशः कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं; और उन सबके मिलने से प्राण पाँच प्रकार का हो जाता है।

श्लोक 40 (devibhagavatam.7.32.40)

हृदि प्राणो गुदेऽपानो नाभिस्थस्तु समानकः । कण्ठदेशेऽप्युदानः स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः

hṛdi prāṇo gude'pāno nābhisthastu samānakaḥ | kaṇṭhadeśe'pyudānaḥ syād vyānaḥ sarvaśarīragaḥ

हृदय में प्राण, गुदा में अपान, नाभि में समान, कण्ठ में उदान, और सम्पूर्ण शरीर में व्यान संचरित होता है।

श्लोक 41 (devibhagavatam.7.32.41)

ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च । प्राणादिपञ्चकं चैव धिया च सहितं मनः

jñānendriyāṇi pañcaiva pañcakarmendriyāṇi ca | prāṇādipañcakaṁ caiva dhiyā ca sahitaṁ manaḥ

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, प्राण आदि पाँचों वायु, तथा बुद्धि सहित मन —

श्लोक 42 (devibhagavatam.7.32.42)

एतत्सूक्ष्मशरीरं स्यान्मम लिङ्गं यदुच्यते । तत्र या प्रकृतिः प्रोक्ता सा राजन्द्विविधा स्मृता

etatsūkṣmaśarīraṁ syānmama liṅgaṁ yaducyate | tatra yā prakṛtiḥ proktā sā rājandvividhā smṛtā

यह सत्रह तत्त्व मिलकर मेरा सूक्ष्म शरीर बनते हैं, जिसे 'लिंग-शरीर' कहा जाता है। हे राजन्, वहाँ जो प्रकृति कही गई है, वह दो प्रकार की मानी गई है।

श्लोक 43 (devibhagavatam.7.32.43)

सत्त्वात्मिका तु माया स्यादविद्या गुणमिश्रिता । स्वाश्रयं या तु संरक्षेत्सा मायेति निगद्यते

sattvātmikā tu māyā syādavidyā guṇamiśritā | svāśrayaṁ yā tu saṁrakṣetsā māyeti nigadyate

सत्त्वप्रधान प्रकृति 'माया' कहलाती है, और गुणों से मिश्रित प्रकृति 'अविद्या' कहलाती है; जो अपने आश्रय की रक्षा करती है, वही 'माया' कही जाती है।

श्लोक 44 (devibhagavatam.7.32.44)

तस्यां यत्प्रतिबिम्बं स्याद्बिम्बभूतस्य चेशितुः । स ईश्वरः समाख्यातः स्वाश्रयज्ञानवान्परः

tasyāṁ yatpratibimbaṁ syādbimbabhūtasya ceśituḥ | sa īśvaraḥ samākhyātaḥ svāśrayajñānavānparaḥ

उस माया में जो प्रतिबिम्ब पड़ता है, वह मूल बिम्बभूत ईश्वर का ही प्रतिबिम्ब है; वही ईश्वर कहलाता है, जो अपने आश्रय का पूर्ण ज्ञाता है।

श्लोक 45 (devibhagavatam.7.32.45)

सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वानुग्रहकारकः । अविद्यायां तु यत्किञ्चित्प्रतिबिम्बं नगाधिप

sarvajñaḥ sarvakartā ca sarvānugrahakārakaḥ | avidyāyāṁ tu yatkiñcitpratibimbaṁ nagādhipa

वह सर्वज्ञ, सर्वकर्ता और सबका अनुग्रह करने वाला है। परन्तु, हे पर्वतराज, अविद्या में जो कुछ भी प्रतिबिम्ब पड़ता है —

श्लोक 46 (devibhagavatam.7.32.46)

तदेव जीवसंज्ञं स्यात्सर्वदुःखाश्रयं पुनः । द्वयोरपीह सम्प्रोक्तं देहत्रयमविद्यया

tadeva jīvasaṁjñaṁ syātsarvaduḥkhāśrayaṁ punaḥ | dvayorapīha samproktaṁ dehatrayamavidyayā

वही 'जीव' नाम से जाना जाता है, और समस्त दुःखों का आश्रय बन जाता है। इन दोनों के लिए ही यहाँ अविद्या के कारण तीन-तीन शरीर कहे गए हैं।

श्लोक 47 (devibhagavatam.7.32.47)

देहत्रयाभिमानाच्चाप्यभून्नामत्रयं पुनः । प्राज्ञस्तु कारणात्मा स्यात्सूक्ष्मदेही तु तैजसः

dehatrayābhimānāccāpyabhūnnāmatrayaṁ punaḥ | prājñastu kāraṇātmā syātsūkṣmadehī tu taijasaḥ

इन तीनों शरीरों के अभिमान से ही तीन नाम भी बने: कारण-शरीर से तादात्म्य रखने वाला 'प्राज्ञ' कहलाता है, और सूक्ष्म-शरीरधारी 'तैजस' कहलाता है।

श्लोक 48 (devibhagavatam.7.32.48)

स्थूलदेही तु विश्वाख्यस्त्रिविधः परिकीर्तितः । एवमीशोऽपि सम्प्रोक्त ईशसूत्रविराट्पदैः

sthūladehī tu viśvākhyastrividhaḥ parikīrtitaḥ | evamīśo'pi samprokta īśasūtravirāṭpadaiḥ

और स्थूल-शरीरधारी 'विश्व' कहलाता है — इस प्रकार जीव तीन प्रकार का कहा गया है। इसी प्रकार ईश्वर को भी 'ईश', 'सूत्रात्मा' और 'विराट्' पदों से कहा गया है।

श्लोक 49 (devibhagavatam.7.32.49)

प्रथमो व्यष्टिरूपस्तु समष्ट्यात्मा परः स्मृतः । स हि सर्वेश्वरः साक्षाज्जीवानुग्रहकाम्यया

prathamo vyaṣṭirūpastu samaṣṭyātmā paraḥ smṛtaḥ | sa hi sarveśvaraḥ sākṣājjīvānugrahakāmyayā

इनमें पहला व्यष्टि-स्वरूप है, और दूसरा समष्टि-स्वरूप माना गया है। वही साक्षात् सर्वेश्वर, जीवों पर अनुग्रह करने की इच्छा से —

श्लोक 50 (devibhagavatam.7.32.50)

करोति विविधं विश्वं नानाभोगाश्रयं पुनः । मच्छक्तिप्रेरितो नित्यं मयि राजन्प्रकल्पितः

karoti vividhaṁ viśvaṁ nānābhogāśrayaṁ punaḥ | macchaktiprerito nityaṁ mayi rājanprakalpitaḥ

इस विविध जगत् की रचना करता है, जो नाना प्रकार के भोगों का आश्रय है। हे राजन्, वह सदा मेरी ही शक्ति से प्रेरित है और मुझ में ही कल्पित है।

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