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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 34

देवी गीता में ज्ञान को मोक्ष का हेतु बताया जाना

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.34.1)

श्री देव्युवाच । क्व यूयं मन्दभाग्या वै क्वेदं रूपं महाद्भुतम् । तथापि भक्तवात्सल्यादीदृशं दर्शितं मया

śrī devyuvāca | kva yūyaṁ mandabhāgyā vai kvedaṁ rūpaṁ mahādbhutam | tathāpi bhaktavātsalyādīdṛśaṁ darśitaṁ mayā

श्रीदेवी ने कहा — कहाँ तुम अल्पभाग्य प्राणी, और कहाँ यह महाअद्भुत रूप? फिर भी भक्तवत्सलता के कारण मैंने तुम्हें ऐसा रूप दिखाया।

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.34.2)

न वेदाध्ययनैर्योगैर्न दानैस्तपसेज्यया । रूपं द्रष्टुमिदं शक्यं केवलं मत्कृपां विना

na vedādhyayanairyogairna dānaistapasejyayā | rūpaṁ draṣṭumidaṁ śakyaṁ kevalaṁ matkṛpāṁ vinā

वेदाध्ययन से, योग से, दान से, तप से अथवा यज्ञ से भी यह रूप देखा नहीं जा सकता — मेरी कृपा के बिना यह असम्भव है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.34.3)

प्रकृतं शृणु राजेन्द्र परमात्मात्र जीवताम् । उपाधियोगात्सम्प्राप्तः कर्तृत्वादिकमप्युत

prakṛtaṁ śṛṇu rājendra paramātmātra jīvatām | upādhiyogātsamprāptaḥ kartṛtvādikamapyuta

हे राजेन्द्र, अब प्रकृत विषय सुनो — यहाँ परमात्मा ही उपाधि के संयोग से जीवों का कर्तृत्व आदि प्राप्त करता है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.34.4)

क्रियाः करोति विविधा धर्माधर्मैकहेतवः । नाना योनीस्ततः प्राप्य सुखदुःखैश्च युज्यते

kriyāḥ karoti vividhā dharmādharmaikahetavaḥ | nānā yonīstataḥ prāpya sukhaduḥkhaiśca yujyate

वह नाना प्रकार की क्रियाएँ करता है, जो धर्म और अधर्म दोनों का कारण बनती हैं; उनसे अनेक योनियाँ प्राप्त कर वह सुख-दुःख से युक्त होता है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.34.5)

पुनस्तत्संस्कृतिवशान्नानाकर्मरतः सदा । नानादेहान्समाप्नोति सुखदुःखैश्च युज्यते

punastatsaṁskṛtivaśānnānākarmarataḥ sadā | nānādehānsamāpnoti sukhaduḥkhaiśca yujyate

फिर उन्हीं संस्कारों के वशीभूत होकर वह सदा नाना कर्मों में लगा रहता है, नाना शरीर प्राप्त करता है, और सुख-दुःख से युक्त होता रहता है।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.34.6)

घटीयन्त्रवदेतस्य न विरामः कदापि हि । अज्ञानमेव मूलं स्यात्ततः कामः क्रियास्ततः

ghaṭīyantravadetasya na virāmaḥ kadāpi hi | ajñānameva mūlaṁ syāttataḥ kāmaḥ kriyāstataḥ

रहट के यन्त्र के समान इसका कभी विराम नहीं होता। इसका मूल कारण अज्ञान ही है, उससे कामना उत्पन्न होती है, और कामना से क्रियाएँ।

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.34.7)

तस्मादज्ञाननाशाय यतेत नियतं नरः । एतद्धि जन्मसाफल्यं यदज्ञानस्य नाशनम्

tasmādajñānanāśāya yateta niyataṁ naraḥ | etaddhi janmasāphalyaṁ yadajñānasya nāśanam

इसलिए मनुष्य को अज्ञान के नाश के लिए सदा प्रयत्न करना चाहिए; क्योंकि अज्ञान का नाश ही जन्म की सार्थकता है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.34.8)

पुरुषार्थसमाप्तिश्च जीवन्मुक्तदशापि च । अज्ञाननाशने शक्ता विद्यैव तु पटीयसी

puruṣārthasamāptiśca jīvanmuktadaśāpi ca | ajñānanāśane śaktā vidyaiva tu paṭīyasī

पुरुषार्थ की पूर्णता और जीवन्मुक्ति की अवस्था भी उसी से प्राप्त होती है। अज्ञान का नाश करने में केवल विद्या ही समर्थ और सर्वाधिक शक्तिशाली है।

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.34.9)

न कर्म तज्जं नोपास्तिर्विरोधाभावतो गिरे । प्रत्युताशाज्ञाननाशे कर्मणा नैव भाव्यताम्

na karma tajjaṁ nopāstirvirodhābhāvato gire | pratyutāśājñānanāśe karmaṇā naiva bhāvyatām

हे पर्वत, न तो कर्म और न कर्मजन्य उपासना ही अज्ञान का नाश कर सकती है, क्योंकि इनमें अज्ञान के साथ कोई विरोध नहीं है; इसके विपरीत, अज्ञान के नाश की आशा कर्म से कभी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.34.10)

अनर्थदानि कर्माणि पुनः पुनरुशन्ति हि । ततो रागस्ततो दोषस्ततोऽनर्थो महान्भवेत्

anarthadāni karmāṇi punaḥ punaruśanti hi | tato rāgastato doṣastato'nartho mahānbhavet

कर्म तो बार-बार अनर्थ ही देते हैं; उनसे राग उत्पन्न होता है, राग से दोष, और दोष से महान् अनर्थ उत्पन्न होता है।

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.34.11)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ज्ञानं सम्पादयेन्नरः । कुर्वन्नेवेह कर्माणीत्यतः कर्माप्यवश्यकम्

tasmātsarvaprayatnena jñānaṁ sampādayennaraḥ | kurvanneveha karmāṇītyataḥ karmāpyavaśyakam

इसलिए मनुष्य को सम्पूर्ण प्रयत्न से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, कर्म करते हुए ही; इसलिए कर्म भी आवश्यक है।

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.34.12)

ज्ञानादेव हि कैवल्यमतः स्यात्तत्समुच्चयः । सहायतां व्रजेत्कर्म ज्ञानस्य हितकारि च

jñānādeva hi kaivalyamataḥ syāttatsamuccayaḥ | sahāyatāṁ vrajetkarma jñānasya hitakāri ca

ज्ञान से ही कैवल्य प्राप्त होता है, इसलिए ज्ञान और कर्म का समुच्चय होना चाहिए; कर्म ज्ञान का सहायक बनकर उसका हितकारी बनता है।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.34.13)

इति केचिद्वदन्त्यत्र तद्विरोधान्न सम्भवेत् । ज्ञानाधृद्ग्रन्थिभेदः स्याद्धृद्ग्रन्थौ कर्मसम्भवः

iti kecidvadantyatra tadvirodhānna sambhavet | jñānādhṛdgranthibhedaḥ syāddhṛdgranthau karmasambhavaḥ

इस प्रकार कुछ विद्वान कहते हैं; परन्तु यहाँ विरोध होने के कारण यह सम्भव नहीं है — ज्ञान से हृदय-ग्रन्थि का भेदन होता है, और हृदय-ग्रन्थि रहते हुए ही कर्म सम्भव है।

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.34.14)

यौगपद्यं न सम्भाव्यं विरोधात्तु ततस्तयोः । तमः प्रकाशयोर्यद्वद्यौगपद्यं न सम्भवि

yaugapadyaṁ na sambhāvyaṁ virodhāttu tatastayoḥ | tamaḥ prakāśayoryadvadyaugapadyaṁ na sambhavi

इसलिए उन दोनों का एक साथ होना, विरोध के कारण, सम्भव नहीं है — जैसे अन्धकार और प्रकाश एक साथ नहीं रह सकते।

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.34.15)

तस्मात् सर्वाणि कर्माणि वैदिकानि महामते । चित्तशुद्।ह्ध्यन्तमेव स्युस्तानि कुर्यात्प्रयत्नतः

tasmāt sarvāṇi karmāṇi vaidikāni mahāmate | cittaśud|hdhyantameva syustāni kuryātprayatnataḥ

इसलिए, हे महामते, समस्त वैदिक कर्म चित्त-शुद्धि की सीमा तक ही उपयोगी हैं; उन्हें प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए।

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.34.16)

शमो दमस्तितिक्षा च वैराग्यं सत्त्वसम्भवः । तावत्पर्यन्तमेव स्युः कर्माणि न ततः परम्

śamo damastitikṣā ca vairāgyaṁ sattvasambhavaḥ | tāvatparyantameva syuḥ karmāṇi na tataḥ param

शम, दम, तितिक्षा, वैराग्य और सत्त्व-सम्पत्ति — इनके प्राप्त होने तक ही कर्म आवश्यक हैं, इसके आगे नहीं।

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.34.17)

तदन्ते चैव संन्यस्य संश्रयेद् गुरुमात्मवान् । श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं च भक्त्या निर्व्याजया पुनः

tadante caiva saṁnyasya saṁśrayed gurumātmavān | śrotriyaṁ brahmaniṣṭhaṁ ca bhaktyā nirvyājayā punaḥ

उसके पश्चात् आत्मज्ञानी पुरुष को कर्मों का संन्यास करके, निष्कपट भक्तिपूर्वक श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण लेनी चाहिए।

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.34.18)

वेदान्तश्रवणं कुर्यान्नित्यमेवमतन्द्रितः । तत्त्वमस्यादिवाक्यस्य नित्यमर्थं विचारयेत्

vedāntaśravaṇaṁ kuryānnityamevamatandritaḥ | tattvamasyādivākyasya nityamarthaṁ vicārayet

उसे अथक भाव से नित्य वेदान्त का श्रवण करना चाहिए, और 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों के अर्थ पर सतत विचार करना चाहिए।

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.34.19)

तत्त्वमस्यादि वाक्यं तु जीवब्रह्मैक्यबोधकम् । ऐक्ये ज्ञाते निर्भयस्तु मद्रूपो हि प्रजायते

tattvamasyādi vākyaṁ tu jīvabrahmaikyabodhakam | aikye jñāte nirbhayastu madrūpo hi prajāyate

'तत्त्वमसि' आदि वाक्य जीव और ब्रह्म की एकता का बोध कराने वाला है; उस एकता का ज्ञान होने पर मनुष्य निर्भय होकर मेरे ही स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.34.20)

पदार्थावगतिः पूर्वं वाक्यार्थावगतिस्ततः । तत्पदस्य च वाक्यार्थो गिरेऽहं परिकीर्तितः

padārthāvagatiḥ pūrvaṁ vākyārthāvagatistataḥ | tatpadasya ca vākyārtho gire'haṁ parikīrtitaḥ

पहले शब्दों के अर्थ का ज्ञान, फिर वाक्य के अर्थ का ज्ञान होता है। हे पर्वत, 'तत्' पद का वाक्यार्थ मैं ही कही गई हूँ।

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.34.21)

त्वं पदस्य च वाच्यार्थो जीव एव न संशयः । उभयोरैक्यमसिना पदेन प्रोच्यते बुधैः

tvaṁ padasya ca vācyārtho jīva eva na saṁśayaḥ | ubhayoraikyamasinā padena procyate budhaiḥ

'त्वं' पद का वाच्यार्थ जीव ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं; उन दोनों की एकता विद्वानों द्वारा 'असि' पद से कही जाती है।

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.34.22)

वाच्यार्थयोर्विरुद्धत्वादैक्यं नैव घटेत ह । लक्षणातः प्रकर्तव्या तत्त्वमोः श्रुतिसंस्थयोः

vācyārthayorviruddhatvādaikyaṁ naiva ghaṭeta ha | lakṣaṇātaḥ prakartavyā tattvamoḥ śrutisaṁsthayoḥ

इन दोनों पदों के वाच्यार्थों में परस्पर विरोध होने से उनकी एकता सिद्ध नहीं हो पाती; इसलिए श्रुति में स्थित 'तत्' और 'त्वं' पदों की व्याख्या लक्षणा से करनी चाहिए।

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.34.23)

चिन्मात्रं तु तयोर्लक्ष्यं तयोरैक्यस्य सम्भवः । तयोरैक्यं तथा ज्ञात्वा स्वाभेदेनाद्वयो भवेत्

cinmātraṁ tu tayorlakṣyaṁ tayoraikyasya sambhavaḥ | tayoraikyaṁ tathā jñātvā svābhedenādvayo bhavet

उन दोनों का लक्ष्यार्थ केवल चिन्मात्र ही है, तभी उनकी एकता सम्भव होती है। इस प्रकार उनकी एकता को जानकर, अपने अभेद से मनुष्य अद्वय हो जाता है।

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.34.24)

देवदत्तः स एवायमितिवल्लक्षणा स्मृता । स्थूलादि देहरहितो ब्रह्म सम्पद्यते नरः

devadattaḥ sa evāyamitivallakṣaṇā smṛtā | sthūlādi deharahito brahma sampadyate naraḥ

जैसे 'यह वही देवदत्त है' — इस वाक्य में लक्षणा होती है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए। स्थूल आदि शरीरों से रहित होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.34.25)

पञ्चीकृतमहाभूतसम्भूतः स्थूलदेहकः । भोगालयो जराव्याधिसंयुतः सर्वकर्मणाम्

pañcīkṛtamahābhūtasambhūtaḥ sthūladehakaḥ | bhogālayo jarāvyādhisaṁyutaḥ sarvakarmaṇām

पंचीकृत महाभूतों से उत्पन्न यह स्थूल शरीर, भोग का आश्रय, जरा-व्याधि से युक्त, समस्त कर्मों का —

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.34.26)

मिथ्याभूतोऽयमाभाति स्फुटं मायामयत्वतः । सोऽयं स्थूल उपाधिः स्यादात्मनो मे नगेश्वर

mithyābhūto'yamābhāti sphuṭaṁ māyāmayatvataḥ | so'yaṁ sthūla upādhiḥ syādātmano me nageśvara

मायामय होने के कारण यह मिथ्या ही सत्य के समान प्रतीत होता है। हे पर्वतेश्वर, यही मेरी आत्मा का स्थूल उपाधि है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.34.27)

ज्ञानकर्मेन्द्रिययुतं प्राणपञ्चकसंयुतम् । मनोबुद्धियुतं चैतत्सूक्ष्मं तत्कवयो विदुः

jñānakarmendriyayutaṁ prāṇapañcakasaṁyutam | manobuddhiyutaṁ caitatsūkṣmaṁ tatkavayo viduḥ

ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से युक्त, पाँचों प्राणों से युक्त, मन और बुद्धि से युक्त — इसे विद्वान 'सूक्ष्म शरीर' के नाम से जानते हैं।

श्लोक 28 (devibhagavatam.7.34.28)

अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्मदेहोऽयमात्मनः । द्वितीयोऽयमुपाधिः स्यात्सुखादेरवबोधकः

apañcīkṛtabhūtotthaṁ sūkṣmadeho'yamātmanaḥ | dvitīyo'yamupādhiḥ syātsukhāderavabodhakaḥ

यह अपंचीकृत भूतों से उत्पन्न आत्मा का सूक्ष्म शरीर है; यह दूसरा उपाधि है, जो सुख आदि का अनुभव कराने वाला है।

श्लोक 29 (devibhagavatam.7.34.29)

अनाद्यनिर्वाच्यमिदमज्ञानं तु तृतीयकः । देहोऽयमात्मनो भाति कारणात्मा नगेश्वर

anādyanirvācyamidamajñānaṁ tu tṛtīyakaḥ | deho'yamātmano bhāti kāraṇātmā nageśvara

अनादि और अनिर्वचनीय अज्ञान ही तीसरा — कारण-शरीर है, जो हे पर्वतेश्वर, आत्मा के शरीर के रूप में प्रतीत होता है।

श्लोक 30 (devibhagavatam.7.34.30)

उपाधिविलये जाते केवलात्मावशिष्यते । देहत्रये पञ्चकोशा अन्तःस्थाः सन्ति सर्वदा

upādhivilaye jāte kevalātmāvaśiṣyate | dehatraye pañcakośā antaḥsthāḥ santi sarvadā

इन उपाधियों का लय होने पर केवल आत्मा ही शेष रहता है। इन तीनों शरीरों के भीतर पाँचों कोश सदा स्थित रहते हैं।

श्लोक 31 (devibhagavatam.7.34.31)

पञ्चकोशपरित्यागे ब्रह्मपुच्छं हि लभ्यते । नेतिनेतीत्यादिवाक्यैर्मम रूपं यदुच्यते

pañcakośaparityāge brahmapucchaṁ hi labhyate | netinetītyādivākyairmama rūpaṁ yaducyate

पाँचों कोशों का त्याग होने पर 'ब्रह्मपुच्छ' प्राप्त होता है — 'नेति नेति' आदि वाक्यों से मेरा जो स्वरूप कहा जाता है, वही यह है।

श्लोक 32 (devibhagavatam.7.34.32)

न जायते म्रियते तत्कदाचिन्नायं भूत्वा न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे

na jāyate mriyate tatkadācinnāyaṁ bhūtvā na babhūva kaścit | ajo nityaḥ śāśvato'yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre

यह न कभी जन्म लेता है, न कभी मरता है; यह उत्पन्न होकर फिर अभाव को प्राप्त नहीं होता। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है — शरीर के मारे जाने पर भी यह मारा नहीं जाता।

श्लोक 33 (devibhagavatam.7.34.33)

हतं चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते

hataṁ cenmanyate hantuṁ hataścenmanyate hatam | ubhau tau na vijānīto nāyaṁ hanti na hanyate

यदि कोई इसे मारने वाला माने, और यदि कोई इसे मारा गया माने, तो वे दोनों ही सत्य को नहीं जानते — यह न तो मारता है, न मारा जाता है।

श्लोक 34 (devibhagavatam.7.34.34)

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमस्य

aṇoraṇīyānmahato mahīyānātmāsya jantornihito guhāyām | tamakratuḥ paśyati vītaśoko dhātuḥ prasādānmahimānamasya

अणु से भी अणु और महान् से भी महान् — यह आत्मा प्राणी के हृदय-गुहा में स्थित है। इच्छारहित, शोकरहित मनुष्य विधाता की कृपा से उसकी महिमा को देख पाता है।

श्लोक 35 (devibhagavatam.7.34.35)

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च

ātmānaṁ rathinaṁ viddhi śarīraṁ rathameva tu | buddhiṁ tu sārathiṁ viddhi manaḥ pragrahameva ca

आत्मा को रथी जानो, शरीर को रथ ही जानो; बुद्धि को सारथि जानो, और मन को लगाम जानो।

श्लोक 36 (devibhagavatam.7.34.36)

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः

indriyāṇi hayānāhurviṣayāṁsteṣu gocarān | ātmendriyamanoyuktaṁ bhoktetyāhurmanīṣiṇaḥ

इन्द्रियों को घोड़े कहा गया है, और विषयों को उनके मार्ग कहा गया है; आत्मा, इन्द्रिय और मन से युक्त होकर भोक्ता कहलाता है — ऐसा मनीषी कहते हैं।

श्लोक 37 (devibhagavatam.7.34.37)

यस्त्वविद्वान्भवति चामनस्कश्च सदाशुचिः । न तत्पदमवाप्नोति संसारं चाधिगच्छति

yastvavidvānbhavati cāmanaskaśca sadāśuciḥ | na tatpadamavāpnoti saṁsāraṁ cādhigacchati

जो अज्ञानी है, जिसका मन असंयत है और जो सदा अशुद्ध रहता है, वह उस परम पद को प्राप्त नहीं करता, अपितु संसार को ही प्राप्त होता है।

श्लोक 38 (devibhagavatam.7.34.38)

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते

yastu vijñānavānbhavati samanaskaḥ sadā śuciḥ | sa tu tatpadamāpnoti yasmādbhūyo na jāyate

परन्तु जो ज्ञानवान है, जिसका मन संयत है और जो सदा शुद्ध रहता है, वह उस परम पद को प्राप्त कर लेता है, जहाँ से फिर जन्म नहीं होता।

श्लोक 39 (devibhagavatam.7.34.39)

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति मदीयं यत्परं पदम्

vijñānasārathiryastu manaḥ pragrahavānnaraḥ | so'dhvanaḥ pāramāpnoti madīyaṁ yatparaṁ padam

जिस मनुष्य का सारथि विज्ञान है और मन ही लगाम है, वह मार्ग के पार तक पहुँच जाता है — मेरे उस परम पद तक।

श्लोक 40 (devibhagavatam.7.34.40)

इत्थं श्रुत्या च मत्या च निश्चित्यात्मानमात्मना । भावयेन्मामात्मरूपां निदिध्यासनतोऽपि च

itthaṁ śrutyā ca matyā ca niścityātmānamātmanā | bhāvayenmāmātmarūpāṁ nididhyāsanato'pi ca

इस प्रकार श्रवण और मनन द्वारा आत्मा को आत्मा से ही निश्चित करके, निदिध्यासन के द्वारा भी मुझे आत्मस्वरूपा भावना करनी चाहिए।

श्लोक 41 (devibhagavatam.7.34.41)

योगवृत्तेः पुरा स्वस्मिन्भावयेदक्षरत्रयम् । देवीप्रणवसंज्ञस्य ध्यानार्थं मन्त्रवाच्ययोः

yogavṛtteḥ purā svasminbhāvayedakṣaratrayam | devīpraṇavasaṁjñasya dhyānārthaṁ mantravācyayoḥ

योग-वृत्ति से पहले अपने भीतर तीनों अक्षरों की भावना करनी चाहिए, जो देवी-प्रणव नामक मन्त्र के वाच्य हैं — ध्यान के प्रयोजन से।

श्लोक 42 (devibhagavatam.7.34.42)

हकारः स्थूलदेहः स्याद्रकारः सूक्ष्मदेहकः । ईकारः कारणात्मासौ ह्रीङ्कारोऽहं तुरीयकम्

hakāraḥ sthūladehaḥ syādrakāraḥ sūkṣmadehakaḥ | īkāraḥ kāraṇātmāsau hrīṅkāro'haṁ turīyakam

'ह' कार स्थूल शरीर है, 'र' कार सूक्ष्म शरीर है, 'ई' कार कारण-शरीर है, और सम्पूर्ण 'ह्रीं' कार मैं स्वयं, तुरीय-स्वरूपा हूँ।

श्लोक 43 (devibhagavatam.7.34.43)

एवं समष्टिदेहेऽपि ज्ञात्वा बीजत्रयं क्रमात् । समष्टिव्यष्ट्योरेकत्वं भावयेन्मतिमान्नरः

evaṁ samaṣṭidehe'pi jñātvā bījatrayaṁ kramāt | samaṣṭivyaṣṭyorekatvaṁ bhāvayenmatimānnaraḥ

इसी प्रकार समष्टि-देह में भी इन तीनों बीजाक्षरों को क्रमशः जानकर, बुद्धिमान मनुष्य को समष्टि और व्यष्टि की एकता की भावना करनी चाहिए।

श्लोक 44 (devibhagavatam.7.34.44)

समाधिकालात्पूर्वं तु भावयित्वैवमादृतः । ततो ध्यायेन्निलीनाक्षो देवीं मां जगदीश्वरीम्

samādhikālātpūrvaṁ tu bhāvayitvaivamādṛtaḥ | tato dhyāyennilīnākṣo devīṁ māṁ jagadīśvarīm

समाधि के समय से पहले इस प्रकार श्रद्धापूर्वक भावना करके, फिर नेत्र बन्द कर मुझ जगदीश्वरी देवी का ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 45 (devibhagavatam.7.34.45)

प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ । निवृत्तविषयाकाङ्क्षो वीतदोषो विमत्सरः

prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau | nivṛttaviṣayākāṅkṣo vītadoṣo vimatsaraḥ

नासिका के भीतर संचरित होने वाले प्राण और अपान को समान करके, विषयों की आकांक्षा से रहित, दोषरहित और मात्सर्यरहित होकर —

श्लोक 46 (devibhagavatam.7.34.46)

भक्त्या निर्व्याजया युक्तो गुहायां निःस्वने स्थले । हकारं विश्वमात्मानं रकारे प्रविलापयेत्

bhaktyā nirvyājayā yukto guhāyāṁ niḥsvane sthale | hakāraṁ viśvamātmānaṁ rakāre pravilāpayet

निष्कपट भक्ति से युक्त होकर, गुहा में अथवा निःशब्द स्थान में, 'ह' कार-रूप विश्व-आत्मा को 'र' कार में लय करना चाहिए।

श्लोक 47 (devibhagavatam.7.34.47)

रकारं तैजसं देवमीकारे प्रविलापयेत् । ईकारं प्राज्ञमात्मानं ह्रीङ्कारे प्रविलापयेत्

rakāraṁ taijasaṁ devamīkāre pravilāpayet | īkāraṁ prājñamātmānaṁ hrīṅkāre pravilāpayet

फिर 'र' कार-रूप तैजस देव को 'ई' कार में लय करना चाहिए; और 'ई' कार-रूप प्राज्ञ-आत्मा को सम्पूर्ण 'ह्रीं' कार में लय करना चाहिए।

श्लोक 48 (devibhagavatam.7.34.48)

वाच्यवाचकताहीनं द्वैतभावविवर्जितम् । अखण्डं सच्चिदानन्दं भावयेत्तच्छिखान्तरे

vācyavācakatāhīnaṁ dvaitabhāvavivarjitam | akhaṇḍaṁ saccidānandaṁ bhāvayettacchikhāntare

उस बिन्दु के अन्त में वाच्य-वाचक भाव से रहित, द्वैत-भाव से रहित, अखण्ड सच्चिदानन्द की भावना करनी चाहिए।

श्लोक 49 (devibhagavatam.7.34.49)

इति ध्यानेन मां राजन् साक्षात्कृत्य नरोत्तमः । मद्रूप एव भवति द्वयोरप्येकता यतः

iti dhyānena māṁ rājan sākṣātkṛtya narottamaḥ | madrūpa eva bhavati dvayorapyekatā yataḥ

हे राजन्, इस ध्यान के द्वारा श्रेष्ठ मनुष्य मुझे साक्षात् करके मेरे ही स्वरूप को प्राप्त हो जाता है, क्योंकि तब दोनों की एकता हो जाती है।

श्लोक 50 (devibhagavatam.7.34.50)

योगयुक्त्यानया दृष्ट्वा मामात्मानं परात्परम् । अज्ञानस्य सकार्यस्य तत्क्षणे नाशको भवेत्

yogayuktyānayā dṛṣṭvā māmātmānaṁ parātparam | ajñānasya sakāryasya tatkṣaṇe nāśako bhavet

इस योग-विधि से मुझ परात्पर आत्मा को देखकर, वह उसी क्षण अपने कार्य सहित अज्ञान का नाशक बन जाता है।

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