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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 35

देवी गीता में मंत्र-सिद्धि के साधन का वर्णन

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.35.1)

हिमालय उवाच । योगं वद महेशानि साङ्गं संवित्प्रदायकम् । कृतेन येन योग्योऽहं भवेयं तत्त्वदर्शने

himālaya uvāca | yogaṁ vada maheśāni sāṅgaṁ saṁvitpradāyakam | kṛtena yena yogyo'haṁ bhaveyaṁ tattvadarśane

हिमालय ने कहा — हे महेश्वरि, मुझे अंगों सहित वह योग बताइए, जो संवित् प्रदान करने वाला है, जिसके अभ्यास से मैं तत्त्व-दर्शन के योग्य हो सकूँ।

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.35.2)

श्रीदेव्युवाच । न योगो नभसः पृष्ठे न भूमौ न रसातले । ऐक्यं जीवात्मनोराहुर्योगं योगविशारदाः

śrīdevyuvāca | na yogo nabhasaḥ pṛṣṭhe na bhūmau na rasātale | aikyaṁ jīvātmanorāhuryogaṁ yogaviśāradāḥ

श्रीदेवी ने कहा — योग न आकाश में है, न पृथ्वी पर, न रसातल में; योग-विशारद जीवात्मा और परमात्मा की एकता को ही योग कहते हैं।

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.35.3)

तत्प्रत्यूहाः षडाख्याता योगविघ्नकरानघ । कामक्रोधौ लोभमोहौ मदमात्सर्यसंज्ञकौ

tatpratyūhāḥ ṣaḍākhyātā yogavighnakarānagha | kāmakrodhau lobhamohau madamātsaryasaṁjñakau

हे निष्पाप, उसमें छह विघ्न कहे गए हैं, जो योग में बाधा डालते हैं — काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.35.4)

योगाङ्गैरेव भित्त्वा तान्योगिनो योगमाप्नुयुः । यमं नियममासनप्राणायामौ ततः परम्

yogāṅgaireva bhittvā tānyogino yogamāpnuyuḥ | yamaṁ niyamamāsanaprāṇāyāmau tataḥ param

योग के अंगों से ही उन्हें भेदकर योगी योग को प्राप्त करते हैं — यम, नियम, आसन, फिर प्राणायाम —

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.35.5)

प्रत्याहारं धारणाख्यं ध्यानं सार्धं समाधिना । अष्टाङ्गान्याहुरेतानि योगिनां योगसाधने

pratyāhāraṁ dhāraṇākhyaṁ dhyānaṁ sārdhaṁ samādhinā | aṣṭāṅgānyāhuretāni yogināṁ yogasādhane

प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, तथा समाधि — योग की साधना में योगीजन इन्हें अष्टांग कहते हैं।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.35.6)

अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयाऽऽर्जवम् । क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश

ahiṁsā satyamasteyaṁ brahmacaryaṁ dayā''rjavam | kṣamā dhṛtirmitāhāraḥ śaucaṁ ceti yamā daśa

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, आर्जव, क्षमा, धृति, मिताहार और शौच — ये दस यम हैं।

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.35.7)

तपः सन्तोष आस्तिक्यं दानं देवस्य पूजनम् । सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो हुतम्

tapaḥ santoṣa āstikyaṁ dānaṁ devasya pūjanam | siddhāntaśravaṇaṁ caiva hrīrmatiśca japo hutam

तप, सन्तोष, आस्तिकता, दान, देव-पूजन, सिद्धान्त-श्रवण, ह्री, मति, जप और हवन —

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.35.8)

दशैते नियमाः प्रोक्ता मया पर्वतनायक । पद्मासनं स्वस्तिकं च भद्रं वज्रासनं तथा

daśaite niyamāḥ proktā mayā parvatanāyaka | padmāsanaṁ svastikaṁ ca bhadraṁ vajrāsanaṁ tathā

हे पर्वतनायक, ये दस नियम मेरे द्वारा कहे गए हैं। पद्मासन, स्वस्तिकासन, भद्रासन, तथा वज्रासन —

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.35.9)

वीरासनमिति प्रोक्तं क्रमादासनपञ्चकम् । ऊर्वोरुपरि विन्यस्य सम्यक्पादतले शुभे

vīrāsanamiti proktaṁ kramādāsanapañcakam | ūrvorupari vinyasya samyakpādatale śubhe

और वीरासन — इस प्रकार क्रमशः पाँच आसन कहे गए हैं। दोनों जंघाओं पर दोनों शुभ पादतलों को भली-भाँति रखकर —

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.35.10)

अङ्गुष्ठौ च निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमात्ततः । पद्मासनमिति प्रोक्तं योगिनां हृदयङ्गमम्

aṅguṣṭhau ca nibadhnīyāddhastābhyāṁ vyutkramāttataḥ | padmāsanamiti proktaṁ yogināṁ hṛdayaṅgamam

फिर दोनों हाथों से आड़े क्रम में दोनों अंगूठों को पकड़ना चाहिए — यही योगियों के हृदय को प्रिय पद्मासन कहा गया है।

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.35.11)

जानूर्वोरन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले शुभे । ऋजुकायो विशेद्योगी स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते

jānūrvorantare samyakkṛtvā pādatale śubhe | ṛjukāyo viśedyogī svastikaṁ tatpracakṣate

दोनों जानु और जंघा के बीच दोनों शुभ पादतलों को भली-भाँति रखकर, सीधे शरीर से योगी बैठे — इसे स्वस्तिकासन कहते हैं।

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.35.12)

सीवन्याः पार्श्वयोर्न्यस्य गुल्फयुग्मं सुनिश्चितम् । वृषणाधः पादपार्ष्णी पार्ष्णिभ्यां परिबन्धयेत्

sīvanyāḥ pārśvayornyasya gulphayugmaṁ suniścitam | vṛṣaṇādhaḥ pādapārṣṇī pārṣṇibhyāṁ paribandhayet

सीवनी के दोनों ओर दोनों गुल्फों को दृढ़तापूर्वक रखकर, वृषण के नीचे दोनों पादों की एड़ियों को दोनों एड़ियों से बाँध देना चाहिए।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.35.13)

भद्रासनमिति प्रोक्तं योगिभिः परिपूजितम् । उर्वोः पादौ क्रमान्न्यस्य जान्वोः प्रत्यङ्मुखाङ्गुली

bhadrāsanamiti proktaṁ yogibhiḥ paripūjitam | urvoḥ pādau kramānnyasya jānvoḥ pratyaṅmukhāṅgulī

इसे भद्रासन कहा जाता है, जो योगियों द्वारा पूजित है। दोनों जंघाओं पर क्रमशः दोनों पैरों को रखकर, दोनों जानुओं पर उँगलियाँ विपरीत दिशा में करके —

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.35.14)

करौ विदध्यादाख्यातं वज्रासनमनुत्तमम् । एकं पादमधः कृत्वा विन्यस्योरुं तथोत्तरे

karau vidadhyādākhyātaṁ vajrāsanamanuttamam | ekaṁ pādamadhaḥ kṛtvā vinyasyoruṁ tathottare

दोनों हाथों को उन पर रखना चाहिए — इसे सर्वश्रेष्ठ वज्रासन कहा गया है। एक पैर को नीचे रखकर, उस पर जंघा को रखकर —

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.35.15)

ऋजुकायो विशेद्योगी वीरासनमितीरितम् । इडयाऽऽकर्षयेद्वायुं बाह्यं षोडशमात्रया

ṛjukāyo viśedyogī vīrāsanamitīritam | iḍayā''karṣayedvāyuṁ bāhyaṁ ṣoḍaśamātrayā

सीधे शरीर से योगी बैठे — इसे वीरासन कहा गया है। इड़ा नाड़ी से सोलह मात्रा में बाह्य वायु को खींचना चाहिए।

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.35.16)

धारयेत्पूरितं योगी चतुःषष्ट्या तु मात्रया । सुषुम्नामध्यगं सम्यग्द्वात्रिंशन्मात्रया शनैः

dhārayetpūritaṁ yogī catuḥṣaṣṭyā tu mātrayā | suṣumnāmadhyagaṁ samyagdvātriṁśanmātrayā śanaiḥ

फिर योगी उस पूरित वायु को चौंसठ मात्रा तक धारण करे। फिर उसे सुषुम्ना के मध्य में भली-भाँति बत्तीस मात्रा में धीरे-धीरे —

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.35.17)

नाड्या पिङ्गलया चैव रेचयेद्योगवित्तमः । प्राणायाममिमं प्राहूर्योगशास्त्रविशारदाः

nāḍyā piṅgalayā caiva recayedyogavittamaḥ | prāṇāyāmamimaṁ prāhūryogaśāstraviśāradāḥ

योग के परम ज्ञाता को पिंगला नाड़ी से उसे बाहर निकालना चाहिए। योग-शास्त्र के विशारद इसी को प्राणायाम कहते हैं।

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.35.18)

भूयो भूयः क्रमात्तस्य बाह्यमेवं समाचरेत् । मात्रावृद्धिः क्रमेणैव सम्यग्द्वादश षोडश

bhūyo bhūyaḥ kramāttasya bāhyamevaṁ samācaret | mātrāvṛddhiḥ krameṇaiva samyagdvādaśa ṣoḍaśa

इस बाह्य क्रिया को बार-बार, क्रमशः इसी विधि से करना चाहिए। मात्रा की वृद्धि क्रमशः बारह और सोलह तक भली-भाँति करनी चाहिए।

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.35.19)

जपध्यानादिभिः सार्धं सगर्भं तं विदुर्बुधाः । तदपेतं विगर्भं च प्राणायामं परे विदुः

japadhyānādibhiḥ sārdhaṁ sagarbhaṁ taṁ vidurbudhāḥ | tadapetaṁ vigarbhaṁ ca prāṇāyāmaṁ pare viduḥ

विद्वान जन जप-ध्यान आदि के साथ किए जाने वाले प्राणायाम को 'सगर्भ' कहते हैं, और उनसे रहित प्राणायाम को अन्य विद्वान 'विगर्भ' कहते हैं।

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.35.20)

क्रमादभ्यस्यतः पुंसो देहे स्वेदोद्गमोऽधमः । मध्यमः कम्पसंयुक्तो भूमित्यागः परो मतः

kramādabhyasyataḥ puṁso dehe svedodgamo'dhamaḥ | madhyamaḥ kampasaṁyukto bhūmityāgaḥ paro mataḥ

क्रमशः अभ्यास करने वाले पुरुष के शरीर में पसीना आना निम्न चिह्न है; कम्पन का होना मध्यम चिह्न है; और भूमि से ऊपर उठ जाना उत्तम चिह्न माना गया है।

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.35.21)

उत्तमस्य गुणावाप्तिर्यावच्छीलनमिष्यते । इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु निरर्गलम्

uttamasya guṇāvāptiryāvacchīlanamiṣyate | indriyāṇāṁ vicaratāṁ viṣayeṣu nirargalam

उत्तम गुणों की प्राप्ति तब तक निरन्तर अभ्यास से होती रहती है। विषयों में निर्बाध रूप से विचरण करने वाली इन्द्रियों को —

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.35.22)

बलादाहरणं तेभ्यः प्रत्याहारोऽभिधीयते । अङ्गुष्ठगुल्फजानूरुमूलाधोलिङ्गनाभिषु

balādāharaṇaṁ tebhyaḥ pratyāhāro'bhidhīyate | aṅguṣṭhagulphajānūrumūlādholiṅganābhiṣu

उन्हें बलपूर्वक विषयों से खींच लेना ही प्रत्याहार कहलाता है। अंगूठे, गुल्फ, जानु, जंघामूल, गुदा, लिंग और नाभि में —

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.35.23)

हृद्ग्रीवाकण्ठदेशेषु लम्बिकायां ततो नसि । भ्रूमध्ये मस्तके मूर्ध्नि द्वादशान्ते यथाविधि

hṛdgrīvākaṇṭhadeśeṣu lambikāyāṁ tato nasi | bhrūmadhye mastake mūrdhni dvādaśānte yathāvidhi

हृदय, ग्रीवा, कण्ठ-प्रदेश, लम्बिका में, फिर नासिका में, भ्रूमध्य में, मस्तक में, मूर्धा में, और द्वादशान्त में — यथाविधि —

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.35.24)

धारणं प्राणमरुतो धारणेति निगद्यते । समाहितेन मनसा चैतन्यान्तरवर्तिना

dhāraṇaṁ prāṇamaruto dhāraṇeti nigadyate | samāhitena manasā caitanyāntaravartinā

प्राण-वायु को स्थिर रूप से धारण करना ही 'धारणा' कहलाता है। एकाग्र मन से, जो चैतन्य में अन्तर्वर्ती रहता है —

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.35.25)

आत्मन्यभीष्टदेवानां ध्यानं ध्यानमिहोच्यते । समत्वभावना नित्यं जीवात्मपरमात्मनोः

ātmanyabhīṣṭadevānāṁ dhyānaṁ dhyānamihocyate | samatvabhāvanā nityaṁ jīvātmaparamātmanoḥ

अपने भीतर इष्टदेव का ध्यान करना यहाँ 'ध्यान' कहलाता है। जीवात्मा और परमात्मा की नित्य समत्व-भावना —

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.35.26)

समाधिमाहुर्मुनयः प्रोक्तमष्टाङ्गलक्षणम् । इदानीं कथये तेऽहं मन्त्रयोगमनुत्तमम्

samādhimāhurmunayaḥ proktamaṣṭāṅgalakṣaṇam | idānīṁ kathaye te'haṁ mantrayogamanuttamam

यही मुनियों द्वारा 'समाधि' कहलाती है — इस प्रकार अष्टांग योग का लक्षण कहा गया। अब मैं तुम्हें सर्वश्रेष्ठ मन्त्रयोग कहती हूँ।

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.35.27)

विश्वं शरीरमित्युक्तं पञ्चभूतात्मकं नग । चन्द्रसूर्याग्नितेजोभिर्जीवब्रह्मैक्यरूपकम्

viśvaṁ śarīramityuktaṁ pañcabhūtātmakaṁ naga | candrasūryāgnitejobhirjīvabrahmaikyarūpakam

हे पर्वत, यह शरीर 'विश्व' कहलाता है, जो पंचभूतों से बना है, चन्द्र-सूर्य-अग्नि के तेज से युक्त, तथा जीव-ब्रह्म की एकता का स्वरूप है।

श्लोक 28 (devibhagavatam.7.35.28)

तिस्रः कोट्यस्तदर्धेन शरीरे नाडयो मताः । तासु मुख्या दश प्रोक्तास्ताभ्यस्तिस्रो व्यवस्थिताः

tisraḥ koṭyastadardhena śarīre nāḍayo matāḥ | tāsu mukhyā daśa proktāstābhyastisro vyavasthitāḥ

शरीर में साढ़े तीन करोड़ नाड़ियाँ मानी गई हैं; उनमें दस मुख्य कही गई हैं, और उनमें भी तीन प्रधान मानी गई हैं।

श्लोक 29 (devibhagavatam.7.35.29)

प्रधाना मेरुदण्डेऽत्र चन्द्रसूर्याग्ररूपिणी । इडा वामे स्थिता नाडी शुभ्रा तु चन्द्ररूपिणी

pradhānā merudaṇḍe'tra candrasūryāgrarūpiṇī | iḍā vāme sthitā nāḍī śubhrā tu candrarūpiṇī

वे प्रधान नाड़ियाँ इस मेरुदण्ड में हैं, जो चन्द्र-सूर्य-अग्नि के आगे स्वरूपा हैं। इड़ा नाड़ी बाईं ओर स्थित है, जो श्वेत वर्ण की और चन्द्र-स्वरूपा है।

श्लोक 30 (devibhagavatam.7.35.30)

शक्तिरूपा तु सा नाडी साक्षादमृतविग्रहा । दक्षिणे या पिङ्गलाख्या पुंरूपा सूर्यविग्रहा

śaktirūpā tu sā nāḍī sākṣādamṛtavigrahā | dakṣiṇe yā piṅgalākhyā puṁrūpā sūryavigrahā

वह नाड़ी शक्ति-स्वरूपा है, साक्षात् अमृत-स्वरूपा है। दाहिनी ओर जो पिंगला नाम की नाड़ी है, वह पुरुष-स्वरूपा और सूर्य-स्वरूपा है।

श्लोक 31 (devibhagavatam.7.35.31)

सर्वतेजोमयी सा तु सुषुम्ना वह्निरूपिणी । तस्या मध्ये विचित्राख्ये इच्छाज्ञानक्रियात्मकम्

sarvatejomayī sā tu suṣumnā vahnirūpiṇī | tasyā madhye vicitrākhye icchājñānakriyātmakam

उन दोनों के मध्य में सुषुम्ना है, जो अग्नि-स्वरूपा और सर्वतेजोमयी है। 'विचित्रा' नामक उसके मध्य भाग में इच्छा, ज्ञान और क्रिया-स्वरूप —

श्लोक 32 (devibhagavatam.7.35.32)

मध्ये स्वयम्भूलिङ्गं तु कोटिसूर्यसमप्रभम् । तदूर्ध्वं मायाबीजं तु हरात्माबिन्दुनादकम्

madhye svayambhūliṅgaṁ tu koṭisūryasamaprabham | tadūrdhvaṁ māyābījaṁ tu harātmābindunādakam

उसके मध्य में स्वयम्भू लिंग है, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी है। उसके ऊपर माया-बीज है, जो शिव-स्वरूप बिन्दु और नाद से युक्त है।

श्लोक 33 (devibhagavatam.7.35.33)

तदूर्ध्वं तु शिखाकारा कुण्डली रक्तविग्रहा । देव्यात्मिका तु सा प्रोक्ता मदभिन्ना नगाधिप

tadūrdhvaṁ tu śikhākārā kuṇḍalī raktavigrahā | devyātmikā tu sā proktā madabhinnā nagādhipa

उसके ऊपर शिखा के आकार वाली कुण्डलिनी है, जो रक्त वर्ण की है। हे पर्वतराज, वह देवी-स्वरूपा और मुझसे अभिन्न कही गई है।

श्लोक 34 (devibhagavatam.7.35.34)

तद्बाह्ये हेमरूपाभं वादिसान्तचतुर्दलम् । द्रुतहेमसमप्रख्यं पद्मं तत्र विचिन्तयेत्

tadbāhye hemarūpābhaṁ vādisāntacaturdalam | drutahemasamaprakhyaṁ padmaṁ tatra vicintayet

उसके बाहर स्वर्ण के समान कान्ति वाला, 'व' से लेकर 'स' तक के चार दलों वाला, पिघले हुए स्वर्ण के समान कमल है — वहाँ उसका ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 35 (devibhagavatam.7.35.35)

तदूर्ध्वं त्वनलप्रख्यं षड्दलं हीरकप्रभम् । बादिलान्तषड्वर्णेन स्वाधिष्ठानमनुत्तमम्

tadūrdhvaṁ tvanalaprakhyaṁ ṣaḍdalaṁ hīrakaprabham | bādilāntaṣaḍvarṇena svādhiṣṭhānamanuttamam

उसके ऊपर अग्नि के समान कान्ति वाला, हीरे के समान चमकीला, छह दलों वाला — 'ब' से लेकर 'ल' तक छह अक्षरों से युक्त — सर्वश्रेष्ठ स्वाधिष्ठान-चक्र है।

श्लोक 36 (devibhagavatam.7.35.36)

मूलमाधारषट्कोणं मूलाधारं ततो विदुः । स्वशब्देन परं लिङ्गं स्वाधिष्ठानं ततो विदुः

mūlamādhāraṣaṭkoṇaṁ mūlādhāraṁ tato viduḥ | svaśabdena paraṁ liṅgaṁ svādhiṣṭhānaṁ tato viduḥ

मूल में स्थित षट्कोण चक्र को मूलाधार जाना जाता है; और 'स्व' शब्द से जिसका अर्थ है परम लिंग, इसीलिए उसे स्वाधिष्ठान जाना जाता है।

श्लोक 37 (devibhagavatam.7.35.37)

तदूर्ध्वं नाभिदेशे तु मणिपूरं महाप्रभम् । मेघाभं विद्युदाभं च बहुतेजोमयं ततः

tadūrdhvaṁ nābhideśe tu maṇipūraṁ mahāprabham | meghābhaṁ vidyudābhaṁ ca bahutejomayaṁ tataḥ

उसके ऊपर नाभि-प्रदेश में महातेजस्वी मणिपूर चक्र है, जो मेघ के समान और बिजली के समान अत्यन्त तेजोमय है।

श्लोक 38 (devibhagavatam.7.35.38)

मणिवद्भिन्नं तत्पद्मं मणिपद्मं तथोच्यते । दशभिश्च दलैर्युक्तं डादिफान्ताक्षरान्वितम्

maṇivadbhinnaṁ tatpadmaṁ maṇipadmaṁ tathocyate | daśabhiśca dalairyuktaṁ ḍādiphāntākṣarānvitam

मणि के समान भिन्न-भिन्न रंगों वाला वह कमल 'मणिपद्म' भी कहलाता है; वह दस दलों से युक्त है, 'ड' से लेकर 'फ' तक के अक्षरों से युक्त है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.7.35.39)

विष्णुनाधिष्ठितं पद्मं विष्ण्वालोकनकारणम् । तदूर्ध्वेऽनाहतं पद्ममुद्यदादित्यसन्निभम्

viṣṇunādhiṣṭhitaṁ padmaṁ viṣṇvālokanakāraṇam | tadūrdhve'nāhataṁ padmamudyadādityasannibham

यह कमल विष्णु द्वारा अधिष्ठित है और विष्णु के दर्शन का कारण है। उसके ऊपर अनाहत-चक्र है, जो उदीयमान सूर्य के समान कान्तिमान है।

श्लोक 40 (devibhagavatam.7.35.40)

कादिठान्तदलैरर्कपत्रैश्च समधिष्ठितम् । तन्मध्ये बाणलिङ्गं तु सूर्यायुतसमप्रभम्

kādiṭhāntadalairarkapatraiśca samadhiṣṭhitam | tanmadhye bāṇaliṅgaṁ tu sūryāyutasamaprabham

यह 'क' से लेकर 'ठ' तक के, अर्क-पत्र जैसे बारह दलों से युक्त है। उसके मध्य में बाणलिंग है, जो दस हजार सूर्यों के समान तेजस्वी है।

श्लोक 41 (devibhagavatam.7.35.41)

शब्दब्रह्ममयं शब्दानाहतं तत्र दृश्यते । अनाहताख्यं तत्पद्मं मुनिभिः परिकीर्तितम्

śabdabrahmamayaṁ śabdānāhataṁ tatra dṛśyate | anāhatākhyaṁ tatpadmaṁ munibhiḥ parikīrtitam

वहाँ शब्द-ब्रह्म-स्वरूप अनाहत नाद सुनाई देता है। इसीलिए मुनियों ने उस कमल को अनाहत कहा है।

श्लोक 42 (devibhagavatam.7.35.42)

आनन्दसदनं तत्तु पुरुषाधिष्ठितं परम् । तदूर्ध्वं तु विशुद्धाख्यं दलं षोडशपङ्कजम्

ānandasadanaṁ tattu puruṣādhiṣṭhitaṁ param | tadūrdhvaṁ tu viśuddhākhyaṁ dalaṁ ṣoḍaśapaṅkajam

यह आनन्द का सदन है, जो परम पुरुष द्वारा अधिष्ठित है। उसके ऊपर विशुद्ध नामक सोलह दलों वाला कमल है।

श्लोक 43 (devibhagavatam.7.35.43)

स्वरैः षोडशभिर्युक्तं धूम्रवर्णं महाप्रभम् । विशुद्धं तनुते यस्माज्जीवस्य हंसलोकनात्

svaraiḥ ṣoḍaśabhiryuktaṁ dhūmravarṇaṁ mahāprabham | viśuddhaṁ tanute yasmājjīvasya haṁsalokanāt

यह सोलह स्वरों से युक्त है, धूम्र वर्ण का और महातेजस्वी है। यह जीव को हंस के दर्शन से विशुद्ध करता है, इसलिए इसे 'विशुद्ध' कहा जाता है।

श्लोक 44 (devibhagavatam.7.35.44)

विशुद्धं पद्ममाख्यातमाकाशाख्यं महाद्भुतम् । आज्ञाचक्रं तदूर्ध्वं तु आत्मनाधिष्ठितं परम्

viśuddhaṁ padmamākhyātamākāśākhyaṁ mahādbhutam | ājñācakraṁ tadūrdhvaṁ tu ātmanādhiṣṭhitaṁ param

यह विशुद्ध कमल आकाश-स्वरूप और अत्यन्त अद्भुत कहा गया है। उसके ऊपर आज्ञा-चक्र है, जो परम आत्मा द्वारा अधिष्ठित है।

श्लोक 45 (devibhagavatam.7.35.45)

आज्ञासङ्क्रमणं तत्र तेनाज्ञेति प्रकीर्तितम् । द्विदलं हक्षसंयुक्तं पद्मं तत्सुमनोहरम्

ājñāsaṅkramaṇaṁ tatra tenājñeti prakīrtitam | dvidalaṁ hakṣasaṁyuktaṁ padmaṁ tatsumanoharam

वहाँ आज्ञा का संक्रमण होता है, इसलिए इसे 'आज्ञा' कहा जाता है। यह अत्यन्त सुन्दर कमल दो दलों वाला है, 'ह' और 'क्ष' अक्षरों से युक्त है।

श्लोक 46 (devibhagavatam.7.35.46)

कैलासाख्यं तदूर्ध्वं तु रोधिनी तु तदूर्ध्वतः । एवं त्वाधारचक्राणि प्रोक्तानि तव सुव्रत

kailāsākhyaṁ tadūrdhvaṁ tu rodhinī tu tadūrdhvataḥ | evaṁ tvādhāracakrāṇi proktāni tava suvrata

उसके ऊपर कैलास नामक स्थान है, और उसके भी ऊपर रोधिनी है। हे उत्तम व्रतधारी, इस प्रकार तुम्हें आधार-चक्र बताए गए।

श्लोक 47 (devibhagavatam.7.35.47)

सहस्रारयुतं बिन्दुस्थानं तदूर्ध्वमीरितम् । इत्येतत्कथितं सर्वं योगमार्गमनुत्तमम्

sahasrārayutaṁ bindusthānaṁ tadūrdhvamīritam | ityetatkathitaṁ sarvaṁ yogamārgamanuttamam

उसके ऊपर सहस्रार से युक्त बिन्दु-स्थान कहा गया है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण सर्वश्रेष्ठ योग-मार्ग तुम्हें कहा गया।

श्लोक 48 (devibhagavatam.7.35.48)

आदौ पूरकयोगेनाप्याधारे योजयेन्मनः । गुदमेढ्रान्तरे शक्तिस्तामाकुञ्च्य प्रबोधयेत्

ādau pūrakayogenāpyādhāre yojayenmanaḥ | gudameḍhrāntare śaktistāmākuñcya prabodhayet

पहले पूरक-प्राणायाम की विधि से मन को मूलाधार में स्थिर करना चाहिए। गुदा और लिंग के मध्य में जो शक्ति है, उसे संकुचित करके जगाना चाहिए।

श्लोक 49 (devibhagavatam.7.35.49)

लिङ्गभेदक्रमेणैव बिन्दुचक्रं च प्रापयेत् । शम्भुना तां परां शक्तिमेकीभूतां विचिन्तयेत्

liṅgabhedakrameṇaiva binducakraṁ ca prāpayet | śambhunā tāṁ parāṁ śaktimekībhūtāṁ vicintayet

फिर लिंग-भेद की विधि से उसे बिन्दु-चक्र तक पहुँचाना चाहिए, और उस परम शक्ति को शिव के साथ एकीभूत हुई भावना करनी चाहिए।

श्लोक 50 (devibhagavatam.7.35.50)

तत्रोत्थितामृतं यत्तु द्रुतलाक्षारसोपमम् । पाययित्वा तु तां शक्तिं मायाख्यां योगसिद्धिदाम्

tatrotthitāmṛtaṁ yattu drutalākṣārasopamam | pāyayitvā tu tāṁ śaktiṁ māyākhyāṁ yogasiddhidām

वहाँ उत्पन्न होने वाला अमृत, जो पिघले हुए लाख के रस के समान है, उस माया नामक, योग-सिद्धि देने वाली शक्ति को पिलाकर —

श्लोक 51 (devibhagavatam.7.35.51)

षड्चक्रदेवतास्तत्र सन्तर्प्यामृतधारया । आनयेत्तेन मार्गेण मूलाधारं ततः सुधीः

ṣaḍcakradevatāstatra santarpyāmṛtadhārayā | ānayettena mārgeṇa mūlādhāraṁ tataḥ sudhīḥ

और उस अमृत-धारा से छहों चक्रों के देवताओं को तृप्त करके, बुद्धिमान योगी उसी मार्ग से उसे पुनः मूलाधार में ले आए।

श्लोक 52 (devibhagavatam.7.35.52)

एवमभ्यस्यमानस्याप्यहन्यहनि निश्चितम् । पूर्वोक्तदूषिता मन्त्राः सर्वे सिध्यन्ति नान्यथा

evamabhyasyamānasyāpyahanyahani niścitam | pūrvoktadūṣitā mantrāḥ sarve sidhyanti nānyathā

इस प्रकार दिन-प्रतिदिन निश्चित रूप से अभ्यास करते रहने से, पहले बताए गए दोषयुक्त मन्त्र भी सिद्ध हो जाते हैं, अन्यथा नहीं।

श्लोक 53 (devibhagavatam.7.35.53)

जरामरणदुःखाद्यैर्मुच्यते भवबन्धनात् । ये गुणाः सन्ति देव्या मे जगन्मातुर्यथा तथा

jarāmaraṇaduḥkhādyairmucyate bhavabandhanāt | ye guṇāḥ santi devyā me jaganmāturyathā tathā

मनुष्य जरा, मृत्यु, दुःख आदि से तथा संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है। जगन्माता मुझ देवी में जो गुण हैं, वैसे ही —

श्लोक 54 (devibhagavatam.7.35.54)

ते गुणाः साधकवरे भवन्त्येव न चान्यथा । इत्येवं कथितं तात वायुधारणमुत्तमम्

te guṇāḥ sādhakavare bhavantyeva na cānyathā | ityevaṁ kathitaṁ tāta vāyudhāraṇamuttamam

वे ही गुण उत्तम साधक में भी प्रकट होते हैं, अन्यथा नहीं। हे तात, इस प्रकार यह सर्वश्रेष्ठ वायु-धारणा तुम्हें बताई गई।

श्लोक 55 (devibhagavatam.7.35.55)

इदानीं धारणाख्यं तु शृणुष्वावहितो मम । दिक्कालाद्यनवच्छिन्नदेव्यां चेतो विधाय च

idānīṁ dhāraṇākhyaṁ tu śṛṇuṣvāvahito mama | dikkālādyanavacchinnadevyāṁ ceto vidhāya ca

अब सावधान होकर मुझसे धारणा नामक विधि सुनो। दिशा, काल आदि से अछिन्न मुझ देवी में मन को स्थिर करके —

श्लोक 56 (devibhagavatam.7.35.56)

तन्मयो भवति क्षिप्रं जीवब्रह्मैक्ययोजनात् । अथवा समलं चेतो यदि क्षिप्रं न सिद्।ह्ध्यति

tanmayo bhavati kṣipraṁ jīvabrahmaikyayojanāt | athavā samalaṁ ceto yadi kṣipraṁ na sid|hdhyati

जीव-ब्रह्म की एकता में स्थापित होने से मनुष्य शीघ्र ही उसी में तन्मय हो जाता है। अथवा यदि मलसहित मन शीघ्र सिद्ध न हो, तो —

श्लोक 57 (devibhagavatam.7.35.57)

तदावयवयोगेन योगी योगान्समभ्यसेत् । मदीयहस्तपादादावङ्गे तु मधुरे नग

tadāvayavayogena yogī yogānsamabhyaset | madīyahastapādādāvaṅge tu madhure naga

तब योगी को अवयव-योग द्वारा योग का अभ्यास करना चाहिए — हे पर्वत, मेरे हाथ, पैर आदि किसी एक मधुर अंग पर —

श्लोक 58 (devibhagavatam.7.35.58)

चित्तं संस्थापयेन्मन्त्री स्थानस्थानजयात्पुनः । विशुद्धचित्तः सर्वस्मिन्रूपे संस्थापयेन्मनः

cittaṁ saṁsthāpayenmantrī sthānasthānajayātpunaḥ | viśuddhacittaḥ sarvasminrūpe saṁsthāpayenmanaḥ

साधक को चित्त को स्थिर करना चाहिए, और एक-एक स्थान को जीतते हुए क्रमशः आगे बढ़ना चाहिए। फिर विशुद्ध-चित्त होकर सम्पूर्ण रूप में मन को स्थिर करना चाहिए।

श्लोक 59 (devibhagavatam.7.35.59)

यावन्मनो लयं याति देव्यां संविदि पर्वत । तावदिष्टमनुं मन्त्री जपहोमैः समभ्यसेत्

yāvanmano layaṁ yāti devyāṁ saṁvidi parvata | tāvadiṣṭamanuṁ mantrī japahomaiḥ samabhyaset

हे पर्वत, जब तक मन देवी की संवित् में लय को प्राप्त न हो, तब तक साधक को अपने इष्ट-मन्त्र का जप और हवन द्वारा अभ्यास करते रहना चाहिए।

श्लोक 60 (devibhagavatam.7.35.60)

मन्त्राभ्यासेन योगेन ज्ञेयज्ञानाय कल्पते । न योगेन विना मन्त्रो न मन्त्रेण विना हि सः

mantrābhyāsena yogena jñeyajñānāya kalpate | na yogena vinā mantro na mantreṇa vinā hi saḥ

मन्त्र-अभ्यास योग के द्वारा ही ज्ञेय के ज्ञान के योग्य बनता है। योग के बिना मन्त्र सफल नहीं होता, और मन्त्र के बिना वह सफल नहीं होता।

श्लोक 61 (devibhagavatam.7.35.61)

द्वयोरभ्यासयोगो हि ब्रह्मसंसिद्धिकारणम् । तमः परिवृते गेहे घटो दीपेन दृश्यते

dvayorabhyāsayogo hi brahmasaṁsiddhikāraṇam | tamaḥ parivṛte gehe ghaṭo dīpena dṛśyate

इसलिए दोनों के मिले-जुले अभ्यास से ही ब्रह्म-सिद्धि होती है। जैसे अन्धकार से घिरे हुए घर में घट दीपक के द्वारा दिखाई देता है —

श्लोक 62 (devibhagavatam.7.35.62)

एवं मायावृतो ह्यात्मा मनुना गोचरीकृतः । इति योगविधिः कृत्स्नः साङ्गः प्रोक्तो मयाऽधुना

evaṁ māyāvṛto hyātmā manunā gocarīkṛtaḥ | iti yogavidhiḥ kṛtsnaḥ sāṅgaḥ prokto mayā'dhunā

वैसे ही माया से आवृत आत्मा मन्त्र के द्वारा गोचर होता है। इस प्रकार अब मैंने तुम्हें अंगों सहित सम्पूर्ण योग-विधि बताई।

श्लोक 63 (devibhagavatam.7.35.63)

गुरूपदेशतो ज्ञेयो नान्यथा शास्त्रकोटिभिः

gurūpadeśato jñeyo nānyathā śāstrakoṭibhiḥ

इसे केवल गुरु के उपदेश से ही जानना चाहिए, करोड़ों शास्त्रों से भी अन्यथा नहीं।

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