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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6

च्यवन द्वारा अश्विनीकुमारों के सोमपानाधिकार हेतु संघर्ष

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.6.1)

जनमेजय उवाच । च्यवनेन कथं वैद्यौ तौ कृतौ सोमपायिनौ । वचनं च कथं सत्यं जातं तस्य महात्मनः

janamejaya uvāca cyavanena kathaṁ vaidyau tau kṛtau somapāyinau vacanaṁ ca kathaṁ satyaṁ jātaṁ tasya mahātmanaḥ

जनमेजय ने कहा — च्यवन ने उन दोनों वैद्यों को सोमपायी कैसे बनाया? और उस महात्मा का वचन किस प्रकार सत्य हुआ?

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.6.2)

मानुषस्य बलं कीदृग्देवराजबलं प्रति । निषिद्धौ भिषजौ तेन कृतौ तौ सोमपायिनौ

mānuṣasya balaṁ kīdṛgdevarājabalaṁ prati niṣiddhau bhiṣajau tena kṛtau tau somapāyinau

देवराज के बल के सामने मनुष्य का बल ही क्या है, कि उसने उन निषिद्ध वैद्यों को सोमपायी बना दिया?

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.6.3)

धर्मनिष्ठ तदाश्चर्यं विस्तरेण वद प्रभो । चरितं च्यवनस्याद्य श्रोतुकामोऽस्मि सर्वथा

dharmaniṣṭha tadāścaryaṁ vistareṇa vada prabho caritaṁ cyavanasyādya śrotukāmo'smi sarvathā

हे धर्मनिष्ठ! हे प्रभो! वह आश्चर्यजनक वृत्तान्त विस्तार से कहिए; मैं आज च्यवन का चरित्र सर्वथा सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.6.4)

व्यास उवाच । निशामय महाराज चरितं परमाद्भुतम् । च्यवनस्य मखे तस्मिञ्छर्यातेर्भुवि भारत

vyāsa uvāca niśāmaya mahārāja caritaṁ paramādbhutam cyavanasya makhe tasmiñcharyāterbhuvi bhārata

व्यास जी ने कहा — हे महाराज! हे भारत! शर्याति के उस यज्ञ में च्यवन के परम अद्भुत चरित्र को सुनो।

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.6.5)

सुकन्यां सुन्दरीं प्राप्य च्यवनः सुरसन्निभः । विजहार प्रसन्नात्मा देवकन्यामिवापरः

sukanyāṁ sundarīṁ prāpya cyavanaḥ surasannibhaḥ vijahāra prasannātmā devakanyāmivāparaḥ

सुन्दरी सुकन्या को पाकर देवतुल्य च्यवन प्रसन्नचित्त होकर उसके साथ विहार करने लगे, मानो कोई अन्य देव देवकन्या के साथ।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.6.6)

कदाचिदथ शर्यातिभार्या चिन्तातुरा भृशम् । पतिं प्राह वेपमाना वचनं रुदती प्रिया

kadācidatha śaryātibhāryā cintāturā bhṛśam patiṁ prāha vepamānā vacanaṁ rudatī priyā

एक बार शर्याति की पत्नी अत्यंत चिन्ताकुल होकर, काँपते हुए, रोती हुई, अपने पति से यह वचन बोली —

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.6.7)

राजन् पुत्री त्वया दत्ता मुनयेऽन्धाय कानने । मृता जीवति वा सा तु द्रष्टव्या सर्वथा त्वया

rājan putrī tvayā dattā munaye'ndhāya kānane mṛtā jīvati vā sā tu draṣṭavyā sarvathā tvayā

"हे राजन्! आपने जो पुत्री उस अंधे मुनि को वन में दी थी — वह जीवित है या मृत, उसे आपको हर हाल में देखना होगा।

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.6.8)

गच्छ नाथ मुनेस्तावदाश्रमं द्रष्टुमादरात् । किं करोति सुकन्या सा प्राप्य नाथं तथाविधम्

gaccha nātha munestāvadāśramaṁ draṣṭumādarāt kiṁ karoti sukanyā sā prāpya nāthaṁ tathāvidham

हे नाथ! आदरपूर्वक मुनि के आश्रम में जाकर देखिए — वैसा पति पाकर सुकन्या क्या कर रही है?

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.6.9)

पुत्रीदुःखेन राजर्षे दग्धास्मि सर्वथा हृदि । तामानय विशालाक्षीं तपःक्षामां मदन्तिके

putrīduḥkhena rājarṣe dagdhāsmi sarvathā hṛdi tāmānaya viśālākṣīṁ tapaḥkṣāmāṁ madantike

हे राजर्षे! पुत्री के दुःख से मेरा हृदय पूरी तरह जल रहा है। उस विशालाक्षी, तप से क्षीण हुई पुत्री को मेरे पास लाइए।

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.6.10)

पश्यामि सर्वथा पुत्रीं कृशाङ्गीं वल्कलावृताम् । अन्धं पतिं समासाद्य दुःखभाजं कृशोदरीम्

paśyāmi sarvathā putrīṁ kṛśāṅgīṁ valkalāvṛtām andhaṁ patiṁ samāsādya duḥkhabhājaṁ kṛśodarīm

मैं अपनी कृशांगी पुत्री को, वल्कल से ढकी हुई, अंधे पति को पाकर दुःखभागिनी बनी उस कृशोदरी को अपनी आँखों से देखना चाहती हूँ।"

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.6.11)

शर्यातिरुवाच - गच्छामोऽद्य विशालाक्षि सुकन्यां द्रष्टुमादरात् । प्रियपुत्रीं वरारोहे मुनिं तं संशितव्रतम्

śaryātiruvāca - gacchāmo'dya viśālākṣi sukanyāṁ draṣṭumādarāt priyaputrīṁ varārohe muniṁ taṁ saṁśitavratam

शर्याति ने कहा — "हे विशालाक्षी! हे वरारोहे! आज हम आदरपूर्वक अपनी प्रिय पुत्री सुकन्या को और उस दृढ़व्रती मुनि को देखने जाएँगे।"

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.6.12)

व्यास उवाच । एवमुक्त्व तु शर्यातिः कामिनीं शोकसङ्कुलाम् । जगाम रथमारुह्य त्वरितश्चाश्रमं मुनेः

vyāsa uvāca evamuktva tu śaryātiḥ kāminīṁ śokasaṅkulām jagāma rathamāruhya tvaritaścāśramaṁ muneḥ

व्यास जी ने कहा — ऐसा कहकर शोकाकुल पत्नी से शर्याति रथ पर चढ़कर शीघ्रता से मुनि के आश्रम की ओर चल पड़े।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.6.13)

गत्वाऽऽश्रमसमीपे तु तमपश्यन्महीपतिः । नवयौवनसम्पन्नं देवपुत्रोपमं मुनिम्

gatvā''śramasamīpe tu tamapaśyanmahīpatiḥ navayauvanasampannaṁ devaputropamaṁ munim

आश्रम के समीप पहुँचकर राजा ने वहाँ नवयौवन से सम्पन्न, देवपुत्र-समान उस मुनि को देखा।

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.6.14)

तं विलोक्यामराकारं विस्मयं नृपतिर्गतः । किं कृतं कुत्सितं कर्म पुत्र्या लोकविगर्हितम्

taṁ vilokyāmarākāraṁ vismayaṁ nṛpatirgataḥ kiṁ kṛtaṁ kutsitaṁ karma putryā lokavigarhitam

देव-सम रूप वाले उसे देखकर राजा विस्मित हो गए — "मेरी पुत्री ने यह कौन-सा निंदनीय, लोक-गर्हित कार्य किया है?

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.6.15)

निहतोऽसौ मुनिर्वृद्धस्त्वनयान्यः पतिः कृतः । कामपीडितया कामं प्रशान्तोऽप्यतिनिर्धनः

nihato'sau munirvṛddhastvanayānyaḥ patiḥ kṛtaḥ kāmapīḍitayā kāmaṁ praśānto'pyatinirdhanaḥ

क्या उस वृद्ध मुनि को मारकर इसने कोई और पति बना लिया है — काम से पीड़ित होकर, जबकि वह मुनि तो शांत और सर्वथा निर्धन ही थे?

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.6.16)

दुःसहयोऽयं पुष्पधन्वा विशेषेण च यौवने । कुले कलङ्कः सुमहाननया मानवे कृतः

duḥsahayo'yaṁ puṣpadhanvā viśeṣeṇa ca yauvane kule kalaṅkaḥ sumahānanayā mānave kṛtaḥ

यह पुष्पधन्वा (कामदेव) दुःसह है, विशेषतः यौवन में; इस मानव कन्या ने हमारे कुल पर यह अत्यंत बड़ा कलंक लगा दिया है।

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.6.17)

धिक्तस्य जीवितं लोके यस्य पुत्री हि कुत्सिता । सर्वपापैस्तु दुःखाय पुत्री भवति देहिनाम्

dhiktasya jīvitaṁ loke yasya putrī hi kutsitā sarvapāpaistu duḥkhāya putrī bhavati dehinām

धिक्कार है उस मनुष्य के जीवन को जिसकी पुत्री कलंकित हो! सभी पापों से युक्त पुत्री माता-पिता के लिए दुःख का कारण बनती है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.6.18)

मया त्वनुचितं कर्म कृतं स्वार्थस्य सिद्धये । वृद्धायान्धाय या दत्ता पुत्री सर्वात्मना किल

mayā tvanucitaṁ karma kṛtaṁ svārthasya siddhaye vṛddhāyāndhāya yā dattā putrī sarvātmanā kila

मैंने ही अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए अनुचित कार्य किया, जो पुत्री को पूर्णतः वृद्ध और अंधे को दे दिया।

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.6.19)

कन्या योग्याय दातव्या पित्रा सर्वात्मना किल । तादृशं हि फलं प्राप्तं यादृशं वै कृतं मया

kanyā yogyāya dātavyā pitrā sarvātmanā kila tādṛśaṁ hi phalaṁ prāptaṁ yādṛśaṁ vai kṛtaṁ mayā

पिता को कन्या सर्वथा योग्य वर को ही देनी चाहिए थी; और मुझे वैसा ही फल मिला जैसा कर्म मैंने किया।

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.6.20)

हन्मि चेदद्य तनयां दुःशीलां पापकारिणीम् । स्त्रीहत्या दुस्तरा स्यान्मे तथा पुत्र्या विशेषतः

hanmi cedadya tanayāṁ duḥśīlāṁ pāpakāriṇīm strīhatyā dustarā syānme tathā putryā viśeṣataḥ

यदि मैं आज इस दुःशीला, पापिनी पुत्री को मार दूँ, तो मेरे लिए स्त्री-हत्या का पाप और विशेषतः पुत्री-हत्या का पाप, दुस्तर होगा।

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.6.21)

मनुवंशस्तु विख्यातः सकलङ्कः कृतो मया । लोकापवादो बलवान्दुस्त्याज्या स्नेहशृङ्खला

manuvaṁśastu vikhyātaḥ sakalaṅkaḥ kṛto mayā lokāpavādo balavāndustyājyā snehaśṛṅkhalā

मेरे द्वारा विख्यात मनुवंश कलंकित हो गया है। लोकनिंदा प्रबल है, फिर भी स्नेह की यह श्रृंखला त्यागी नहीं जा सकती।"

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.6.22)

किं करोमीति चिन्ताब्धौ यदा मग्नः स पार्थिवः । सुकन्यया तदा दैवाद्दृष्टश्चिन्ताकुलः पिता

kiṁ karomīti cintābdhau yadā magnaḥ sa pārthivaḥ sukanyayā tadā daivāddṛṣṭaścintākulaḥ pitā

जब वह राजा "क्या करूँ" इस चिंता-सागर में डूबा हुआ था, तभी संयोगवश चिंताकुल पिता को सुकन्या ने देख लिया।

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.6.23)

सा दृष्ट्वा तं जगामाशु सुकन्या पितुरन्तिके । गत्वा पप्रच्छ भूपालं प्रेमपूरितमानसा

sā dṛṣṭvā taṁ jagāmāśu sukanyā piturantike gatvā papraccha bhūpālaṁ premapūritamānasā

उन्हें देखकर सुकन्या तुरन्त अपने पिता के समीप गई, और प्रेम से भरे हृदय से जाकर राजा से पूछा।

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.6.24)

किं विचारयसे राजंश्चिन्ताव्याकुलिताननः । उपविष्टं मुनिं वीक्ष्य युवानमम्बुजेक्षणम्

kiṁ vicārayase rājaṁścintāvyākulitānanaḥ upaviṣṭaṁ muniṁ vīkṣya yuvānamambujekṣaṇam

"हे राजन्! आप क्या सोच रहे हैं, आपका मुख चिंता से व्याकुल है?" — यह उसने कहा, राजा को युवा और कमलनयन मुनि की ओर देखते हुए पाकर।

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.6.25)

एह्येहि पुरुषव्याघ्र प्रणमस्व पतिं मम । मा विषादं नृपश्रेष्ठ साम्प्रतं कुरु मानव

ehyehi puruṣavyāghra praṇamasva patiṁ mama mā viṣādaṁ nṛpaśreṣṭha sāmprataṁ kuru mānava

"आइए, आइए, हे पुरुषश्रेष्ठ! मेरे पति को प्रणाम कीजिए। हे नृपश्रेष्ठ! अब विषाद मत कीजिए, हे मानव!"

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.6.26)

व्यास उवाच । इति पुत्र्या वचं श्रुत्वा शर्यातिः क्रोधपीडितः । प्रोवाच वचनं राजा पुरःस्थां तनयां ततः

vyāsa uvāca iti putryā vacaṁ śrutvā śaryātiḥ krodhapīḍitaḥ provāca vacanaṁ rājā puraḥsthāṁ tanayāṁ tataḥ

व्यास जी ने कहा — पुत्री का यह वचन सुनकर क्रोध से पीड़ित शर्याति ने तब अपनी सामने खड़ी पुत्री से यह वचन कहा।

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.6.27)

राजोवाच - क्व मुनिश्च्यवनः पुत्रि वृद्धोऽन्धस्तापसोत्तमः । कोऽयं युवा मदोन्मत्तः सन्देहोऽत्र महान्मम

rājovāca - kva muniścyavanaḥ putri vṛddho'ndhastāpasottamaḥ ko'yaṁ yuvā madonmattaḥ sandeho'tra mahānmama

राजा ने कहा — "हे पुत्री! वह वृद्ध, अंधा, तपस्वियों में श्रेष्ठ मुनि च्यवन कहाँ है? यह उन्मत्त-सा युवक कौन है? इसमें मुझे बड़ा संशय है।

श्लोक 28 (devibhagavatam.7.6.28)

मुनिः किं निहतः पापे त्वया दुष्कृतकारिणि । नूतनोऽसौ पतिः कामात्कृतः कुलविनाशिनि

muniḥ kiṁ nihataḥ pāpe tvayā duṣkṛtakāriṇi nūtano'sau patiḥ kāmātkṛtaḥ kulavināśini

क्या हे पापिनी! हे दुष्कर्मकारिणी! तूने मुनि को मार डाला और काम-वश यह नया पति बना लिया, हे कुलनाशिनी?

श्लोक 29 (devibhagavatam.7.6.29)

सोऽहं चिन्तातुरस्तं न पश्याम्याश्रमसंस्थितम् । किं कृतं दुष्कृतं कर्म कुलटाचरितं किल

so'haṁ cintāturastaṁ na paśyāmyāśramasaṁsthitam kiṁ kṛtaṁ duṣkṛtaṁ karma kulaṭācaritaṁ kila

मैं चिंताकुल होकर आश्रम में उन्हें कहीं नहीं देख रहा। यह कौन-सा दुष्कर्म, कुलटा-जैसा आचरण किया गया है?

श्लोक 30 (devibhagavatam.7.6.30)

निमग्नोऽहं दुराचारे शोकाब्धौ त्वत्कृतेऽधुना । दृष्ट्वैनं पुरुषं दिव्यमदृष्ट्वा च्यवनं मुनिम्

nimagno'haṁ durācāre śokābdhau tvatkṛte'dhunā dṛṣṭvainaṁ puruṣaṁ divyamadṛṣṭvā cyavanaṁ munim

इस दिव्य पुरुष को देखकर और मुनि च्यवन को न देखकर, तेरे इस दुराचार से मैं अभी शोक-सागर में डूब गया हूँ।"

श्लोक 31 (devibhagavatam.7.6.31)

विहस्य तमुवाचाशु सा श्रुत्वा वचनं पितुः । गृहीत्वाऽऽनीय पितरं भर्तुरन्तिकमादरात्

vihasya tamuvācāśu sā śrutvā vacanaṁ pituḥ gṛhītvā''nīya pitaraṁ bharturantikamādarāt

पिता के वचन सुनकर हँसकर वह तुरन्त बोली, और अपने पिता को हाथ पकड़कर आदरपूर्वक पति के समीप ले आई।

श्लोक 32 (devibhagavatam.7.6.32)

च्यवनोऽसौ मुनिस्तात जामाता ते न संशयः । अश्विभ्यामीदृशः कान्तः कृतः कमललोचनः

cyavano'sau munistāta jāmātā te na saṁśayaḥ aśvibhyāmīdṛśaḥ kāntaḥ kṛtaḥ kamalalocanaḥ

"हे तात! यही मुनि च्यवन आपके जामाता हैं, इसमें संशय नहीं। अश्विनीकुमारों द्वारा यह मेरा कमलनयन प्रियतम ऐसा बनाया गया है।

श्लोक 33 (devibhagavatam.7.6.33)

यदृच्छयात्र सम्प्राप्तौ नासत्यावाश्रमे मम । ताभ्यां करुणया नूनं च्यवनस्तादृशः कृतः

yadṛcchayātra samprāptau nāsatyāvāśrame mama tābhyāṁ karuṇayā nūnaṁ cyavanastādṛśaḥ kṛtaḥ

संयोगवश दोनों नासत्य मेरे इस आश्रम में आए थे; उन्हीं की कृपा से निश्चय ही च्यवन ऐसे बना दिए गए हैं।

श्लोक 34 (devibhagavatam.7.6.34)

नाहं तव सुता तात तथा स्यां पापकारिणी । यथा त्वं मन्यसे राजन् विमूढो रूपसंशये

nāhaṁ tava sutā tāta tathā syāṁ pāpakāriṇī yathā tvaṁ manyase rājan vimūḍho rūpasaṁśaye

हे तात! मैं आपकी पुत्री, वैसी पापिनी नहीं हूँ जैसा आप, हे राजन्, रूप के संशय में मोहित होकर सोच रहे हैं।

श्लोक 35 (devibhagavatam.7.6.35)

प्रणम त्वं मुनिं राजन् भार्गवं च्यवनं पितः । आपृच्छ कारणं सर्वं कथियिष्यति विस्तरम्

praṇama tvaṁ muniṁ rājan bhārgavaṁ cyavanaṁ pitaḥ āpṛccha kāraṇaṁ sarvaṁ kathiyiṣyati vistaram

हे राजन्! हे तात! भार्गव मुनि च्यवन को प्रणाम कीजिए। उनसे सारा कारण पूछिए, वे विस्तार से बताएँगे।"

श्लोक 36 (devibhagavatam.7.6.36)

इति श्रुत्वा वचं पुत्र्या शर्यातिस्त्वरितस्तदा । प्रणनाम मुनिं तत्र गत्वा पप्रच्छ सादरम्

iti śrutvā vacaṁ putryā śaryātistvaritastadā praṇanāma muniṁ tatra gatvā papraccha sādaram

पुत्री का यह वचन सुनकर शर्याति ने तुरन्त वहाँ मुनि को प्रणाम किया और जाकर आदरपूर्वक पूछा।

श्लोक 37 (devibhagavatam.7.6.37)

राजोवाच - कथयस्व स्ववृत्तान्तं भार्गवाशु यथोचितम् । नयने च कथं प्राप्ते क्व गता ते जरा पुनः

rājovāca - kathayasva svavṛttāntaṁ bhārgavāśu yathocitam nayane ca kathaṁ prāpte kva gatā te jarā punaḥ

राजा ने कहा — "हे भार्गव! अपना समस्त वृत्तान्त शीघ्र, जैसा हुआ वैसा ही कहिए। आपके नेत्र कैसे प्राप्त हुए, और आपकी वृद्धावस्था कहाँ चली गई?

श्लोक 38 (devibhagavatam.7.6.38)

संशयोऽयं महान्मेऽस्ति रूपं दृष्ट्वातिसुन्दरम् । वद विस्तरतो ब्रह्मन् श्रुत्वाहं सुखमाप्नुयाम्

saṁśayo'yaṁ mahānme'sti rūpaṁ dṛṣṭvātisundaram vada vistarato brahman śrutvāhaṁ sukhamāpnuyām

यह अत्यंत सुन्दर रूप देखकर मुझे बड़ा संशय है। हे ब्रह्मन्! विस्तार से बताइए, सुनकर मुझे सुख मिलेगा।"

श्लोक 39 (devibhagavatam.7.6.39)

च्यवन उवाच । नासत्यावत्र सम्प्राप्तौ देवानां भिषजावुभौ । उपकारः कृतस्ताभ्यां कृपया नृपसत्तम

cyavana uvāca nāsatyāvatra samprāptau devānāṁ bhiṣajāvubhau upakāraḥ kṛtastābhyāṁ kṛpayā nṛpasattama

च्यवन ने कहा — "हे नृपसत्तम! देवताओं के दोनों वैद्य नासत्य यहाँ आए थे; उन्होंने कृपापूर्वक मुझ पर यह उपकार किया।

श्लोक 40 (devibhagavatam.7.6.40)

मया ताभ्यां वरो दत्त उपकारस्य हेतवे । करिष्यामि मखे राज्ञो भवन्तौ सोमपायिनौ

mayā tābhyāṁ varo datta upakārasya hetave kariṣyāmi makhe rājño bhavantau somapāyinau

उनके उपकार के प्रत्युत्तर में मैंने उन्हें वर दिया — कि राजा के यज्ञ में मैं आप दोनों को सोमपायी बनाऊँगा।

श्लोक 41 (devibhagavatam.7.6.41)

एवं मया वयः प्राप्तं लोचने विमले तथा । स्वस्थो भव महाराज संविशस्वासने शुभे

evaṁ mayā vayaḥ prāptaṁ locane vimale tathā svastho bhava mahārāja saṁviśasvāsane śubhe

इस प्रकार मुझे युवावस्था और निर्मल नेत्र दोनों प्राप्त हुए। हे महाराज! स्वस्थ होइए, इस शुभ आसन पर बैठिए।"

श्लोक 42 (devibhagavatam.7.6.42)

इत्युक्तः स तु विप्रेण सभार्यः पृथिवीपतिः । सुखोपविष्टः कल्याणीः कथाश्चक्रे महात्मना

ityuktaḥ sa tu vipreṇa sabhāryaḥ pṛthivīpatiḥ sukhopaviṣṭaḥ kalyāṇīḥ kathāścakre mahātmanā

इस प्रकार ब्राह्मण द्वारा कहे जाने पर वह पत्नी सहित राजा सुखपूर्वक बैठकर उस महात्मा के साथ कल्याणकारी बातचीत करने लगा।

श्लोक 43 (devibhagavatam.7.6.43)

अथैनं भार्गवं प्राह राजानं परिसान्त्वयन् । याजयिष्यामि राजंस्त्वां सम्भारानुपकल्पय

athainaṁ bhārgavaṁ prāha rājānaṁ parisāntvayan yājayiṣyāmi rājaṁstvāṁ sambhārānupakalpaya

फिर उस भार्गव ने राजा को सान्त्वना देते हुए कहा — "हे राजन्! मैं आपका यज्ञ सम्पन्न कराऊँगा, आप सामग्री एकत्र कीजिए।

श्लोक 44 (devibhagavatam.7.6.44)

मया प्रतिश्रुतं ताभ्यां कर्तव्यौ सोमपौ युवाम् । तत्कर्तव्यं नृपश्रेष्ठ तव यज्ञेऽतिविस्तरे

mayā pratiśrutaṁ tābhyāṁ kartavyau somapau yuvām tatkartavyaṁ nṛpaśreṣṭha tava yajñe'tivistare

मैंने उन दोनों से वचन दिया है कि आपको सोमपायी बनाऊँगा; हे नृपश्रेष्ठ! यह आपके इस विस्तृत यज्ञ में अवश्य पूरा किया जाना है।

श्लोक 45 (devibhagavatam.7.6.45)

इन्द्रं निवारयिष्यामि क्रुद्धं तेजोबलेन वै । पाययिष्यामि राजेन्द्र सोमं सोममखे तव

indraṁ nivārayiṣyāmi kruddhaṁ tejobalena vai pāyayiṣyāmi rājendra somaṁ somamakhe tava

यदि इन्द्र क्रुद्ध हों तो मैं अपने तेज-बल से उन्हें रोक दूँगा; हे राजेन्द्र! तुम्हारे सोम-यज्ञ में मैं उन्हें सोमपान अवश्य कराऊँगा।"

श्लोक 46 (devibhagavatam.7.6.46)

ततः परमसन्तुष्टः शर्यातिः पृथिवीपतिः । च्यवनस्य महाराज तद्वाक्यं प्रत्यपूजयत्

tataḥ paramasantuṣṭaḥ śaryātiḥ pṛthivīpatiḥ cyavanasya mahārāja tadvākyaṁ pratyapūjayat

तब पृथ्वीपति शर्याति अत्यंत संतुष्ट होकर, हे महाराज! च्यवन के इस वचन का सम्मान करने लगे।

श्लोक 47 (devibhagavatam.7.6.47)

सम्मान्य च्यवनं राजा जगाम नगरं प्रति । सभार्यश्चातिसन्तुष्टः कुर्वन्वार्तां मुनेः किल

sammānya cyavanaṁ rājā jagāma nagaraṁ prati sabhāryaścātisantuṣṭaḥ kurvanvārtāṁ muneḥ kila

च्यवन का सम्मान करके राजा अपनी पत्नी सहित, अत्यंत संतुष्ट होकर, मुनि की चर्चा करते हुए नगर की ओर चल पड़े।

श्लोक 48 (devibhagavatam.7.6.48)

प्रशस्तेहनि यज्ञीये सर्वकामसमृद्धिमान् । कारयामास शर्यातिर्यज्ञायतनमुत्तमम्

praśastehani yajñīye sarvakāmasamṛddhimān kārayāmāsa śaryātiryajñāyatanamuttamam

यज्ञ के लिए उपयुक्त शुभ दिन पर, सभी अभीष्ट साधनों से समृद्ध शर्याति ने एक उत्तम यज्ञशाला बनवाई।

श्लोक 49 (devibhagavatam.7.6.49)

समानीय मुनीन्पूज्यान्वसिष्ठप्रमुखानसौ । भार्गवो याजयामास च्यवनः पृथिवीपतिम्

samānīya munīnpūjyānvasiṣṭhapramukhānasau bhārgavo yājayāmāsa cyavanaḥ pṛthivīpatim

वसिष्ठ आदि पूज्य मुनियों को बुलाकर उस भार्गव च्यवन ने राजा से यज्ञ सम्पन्न कराया।

श्लोक 50 (devibhagavatam.7.6.50)

वितते तु तथा यज्ञे देवाः सर्वे सवासवाः । आजग्मुश्चाश्विनौ तत्र सोमार्थमुपजग्मतुः

vitate tu tathā yajñe devāḥ sarve savāsavāḥ ājagmuścāśvinau tatra somārthamupajagmatuḥ

यज्ञ के विस्तृत हो जाने पर इन्द्र सहित सभी देवता वहाँ आए, और दोनों अश्विनीकुमार भी सोम प्राप्त करने की इच्छा से वहाँ पहुँचे।

श्लोक 51 (devibhagavatam.7.6.51)

इन्द्रस्तु शङ्कितस्तत्र वीक्ष्य तावश्विनावुभौ । पप्रच्छ च सुरान्सर्वान्किमेतौ समुपागतौ

indrastu śaṅkitastatra vīkṣya tāvaśvināvubhau papraccha ca surānsarvānkimetau samupāgatau

इन्द्र ने वहाँ उन दोनों अश्विनीकुमारों को देखकर शंकित होकर सभी देवताओं से पूछा — "ये दोनों यहाँ क्यों आए हैं?

श्लोक 52 (devibhagavatam.7.6.52)

चिकित्सकौ न सोमार्हौ केनानीताविहेति च । नाब्रुवन्नमरास्तत्र राज्ञस्तु वितते मखे

cikitsakau na somārhau kenānītāviheti ca nābruvannamarāstatra rājñastu vitate makhe

वैद्य होने के कारण ये सोम के अधिकारी नहीं हैं, इन्हें यहाँ कौन लाया है?" राजा के उस यज्ञ में वहाँ देवता कुछ न बोले।

श्लोक 53 (devibhagavatam.7.6.53)

अगृह्णाच्च्यवनः सोममश्विनोर्देवयोस्तदा । शक्रस्तं वारयामास मा गृहाणैतयोर्ग्रहम्

agṛhṇāccyavanaḥ somamaśvinordevayostadā śakrastaṁ vārayāmāsa mā gṛhāṇaitayorgraham

तब च्यवन ने दोनों अश्विनी देवों के लिए सोम-पात्र ग्रहण किया। इन्द्र ने उन्हें रोका — "इन दोनों के लिए सोम-पात्र मत लो।"

श्लोक 54 (devibhagavatam.7.6.54)

तमाह च्यवनस्तत्र कथमेतौ रवेः सुतौ । न ग्रहार्हौ च नासत्यौ ब्रूहि सत्यं शचीपते

tamāha cyavanastatra kathametau raveḥ sutau na grahārhau ca nāsatyau brūhi satyaṁ śacīpate

च्यवन ने वहाँ उनसे कहा — "सूर्य के इन दोनों पुत्रों को — इन नासत्यों को — सोम-पात्र का अधिकार क्यों नहीं है? हे शचीपते! सत्य बताइए।

श्लोक 55 (devibhagavatam.7.6.55)

न सङ्करौ समुत्पन्नौ धर्मपत्नीसुतौ रवेः । केन दोषेण देवेन्द्र नार्हौ सोमं भिषग्वरौ

na saṅkarau samutpannau dharmapatnīsutau raveḥ kena doṣeṇa devendra nārhau somaṁ bhiṣagvarau

ये सूर्य की धर्मपत्नी के पुत्र हैं, किसी संकर वर्ण से उत्पन्न नहीं। हे देवेन्द्र! किस दोष से ये दोनों श्रेष्ठ वैद्य सोम के अयोग्य हैं?

श्लोक 56 (devibhagavatam.7.6.56)

निर्णयोऽत्र मखे शक्र कर्तव्यः सर्वदैवतैः । ग्राहयिष्यामहं सोमं कृतौ तौ सोमपौ मया

nirṇayo'tra makhe śakra kartavyaḥ sarvadaivataiḥ grāhayiṣyāmahaṁ somaṁ kṛtau tau somapau mayā

हे शक्र! इस यज्ञ में सभी देवताओं द्वारा इसका निर्णय होना चाहिए। मैं तो उन्हें सोम अवश्य ग्रहण कराऊँगा — मैंने उन्हें पहले ही सोमपायी बना दिया है।

श्लोक 57 (devibhagavatam.7.6.57)

प्रेरितोऽसौ मया राजा मखाय मघवन्किल । एतदर्थं करिष्यामि सत्यं मे वचनं विभो

prerito'sau mayā rājā makhāya maghavankila etadarthaṁ kariṣyāmi satyaṁ me vacanaṁ vibho

हे मघवन्! मैंने ही इस राजा को इसी उद्देश्य से यज्ञ के लिए प्रेरित किया था। हे विभो! मैं यह अवश्य करूँगा, मेरा वचन सत्य होगा।

श्लोक 58 (devibhagavatam.7.6.58)

आभ्यामुपकृतः शक्र तथा दत्तं नवं वयः । तस्मात्प्रत्युपकारस्तु कर्तव्यः सर्वथा मया

ābhyāmupakṛtaḥ śakra tathā dattaṁ navaṁ vayaḥ tasmātpratyupakārastu kartavyaḥ sarvathā mayā

हे शक्र! इन दोनों ने मुझ पर उपकार किया और मुझे नया यौवन प्रदान किया। अतः मुझे हर हाल में इसका प्रत्युपकार करना ही होगा।"

श्लोक 59 (devibhagavatam.7.6.59)

इन्द्र उवाच । चिकित्सकौ कृतावेतौ नासत्यौ निन्दितौ सुरैः । उभावेतौ न सोमार्हौ मा गृहाणैतयोर्ग्रहम्

indra uvāca cikitsakau kṛtāvetau nāsatyau ninditau suraiḥ ubhāvetau na somārhau mā gṛhāṇaitayorgraham

इन्द्र ने कहा — "ये दोनों नासत्य केवल वैद्य बना दिए गए हैं, देवताओं द्वारा निंदित हैं। ये दोनों सोम के अधिकारी नहीं हैं — इनके लिए सोम-पात्र मत लो।"

श्लोक 60 (devibhagavatam.7.6.60)

च्यवन उवाच । अहल्याजार संयच्छ कोपं चाद्य निरर्थकम् । वृत्रघ्न किं हि नासत्यौ न सोमार्हौ सुरात्मजौ

cyavana uvāca ahalyājāra saṁyaccha kopaṁ cādya nirarthakam vṛtraghna kiṁ hi nāsatyau na somārhau surātmajau

च्यवन ने कहा — "हे अहल्या के उपपति! हे वृत्रघ्न! आज यह निरर्थक क्रोध शांत कीजिए। देवपुत्र नासत्य सोम के अयोग्य क्यों हों?

श्लोक 61 (devibhagavatam.7.6.61)

एवं विवादे समुपस्थिते च न कोऽपि वाचं तमुवाच भूप । ग्रहं तयोर्भार्गवतिग्मतेजाः सङ्ग्राहयामास तपोबलेन

evaṁ vivāde samupasthite ca na ko'pi vācaṁ tamuvāca bhūpa grahaṁ tayorbhārgavatigmatejāḥ saṅgrāhayāmāsa tapobalena

इस प्रकार विवाद उत्पन्न होने पर, हे राजन्, कोई भी उनके इस कथन का उत्तर न दे सका; और उस तीव्र-तेजस्वी भार्गव ने अपने तप-बल से उन दोनों के लिए सोम-पात्र ग्रहण करा दिया।

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