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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8

इक्ष्वाकु वंश का वर्णन

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.8.1)

जनमेजय उवाच । संशयोऽयं महान् ब्रह्मन् वर्तते मम मानसे । ब्रह्मलोकं गतो राजा रेवतीसंयुतः स्वयम्

janamejaya uvāca saṁśayo'yaṁ mahān brahman vartate mama mānase brahmalokaṁ gato rājā revatīsaṁyutaḥ svayam

जनमेजय ने कहा — हे ब्रह्मन्! मेरे मन में यह महान संशय है कि राजा स्वयं रेवती को साथ लेकर ब्रह्मलोक गए।

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.8.2)

मया पूर्वं श्रुतं कृत्स्नं ब्राह्मणेभ्यः कथान्तरे । ब्राह्मणो ब्रह्मविच्छान्तो ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्

mayā pūrvaṁ śrutaṁ kṛtsnaṁ brāhmaṇebhyaḥ kathāntare brāhmaṇo brahmavicchānto brahmalokamavāpnuyāt

मैंने पहले अन्य कथाओं के प्रसंग में ब्राह्मणों से पूरी तरह सुना है कि ब्रह्मवेत्ता, शांत ब्राह्मण ही ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.8.3)

राजा कथं गतस्तत्र रेवतीसंयुतः स्वयम् । सत्यलोकेऽतिदुष्प्रापे भूर्लोकादिति संशयः

rājā kathaṁ gatastatra revatīsaṁyutaḥ svayam satyaloke'tiduṣprāpe bhūrlokāditi saṁśayaḥ

राजा स्वयं रेवती सहित उस अत्यंत दुष्प्राप्य सत्यलोक में भूलोक से कैसे गए — यही मेरा संशय है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.8.4)

मृतः स्वर्गमवाप्नोति सर्वशास्त्रेषु निर्णयः । (मानुषेण तु देहेन ब्रह्मलोके गतिः कथं । ) स्वर्गात्पुनः कथं लोके मानुषे जायते गतिः

mṛtaḥ svargamavāpnoti sarvaśāstreṣu nirṇayaḥ (mānuṣeṇa tu dehena brahmaloke gatiḥ kathaṁ ) svargātpunaḥ kathaṁ loke mānuṣe jāyate gatiḥ

यह सभी शास्त्रों में निर्णीत है कि मरने के बाद ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है — (तो मानव शरीर से ब्रह्मलोक में गति कैसे हुई?) और स्वर्ग से पुनः मनुष्य-लोक में जन्म कैसे होता है?

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.8.5)

एतन्मे संस्ययं विद्वंश्छेत्तुमर्हसि साम्प्रतम् । यथा राजा गतस्तत्र प्रष्टुकामः प्रजापतिम्

etanme saṁsyayaṁ vidvaṁśchettumarhasi sāmpratam yathā rājā gatastatra praṣṭukāmaḥ prajāpatim

हे विद्वान्! अब मेरे इस संशय को दूर करने योग्य हैं आप — कि राजा प्रजापति से पूछने की इच्छा से वहाँ किस प्रकार गए।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.8.6)

व्यास उवाच । मेरोस्तु शिखरे राजन् सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः । इन्द्रलोको वह्निलोको या च संयमिनी पुरी

vyāsa uvāca merostu śikhare rājan sarve lokāḥ pratiṣṭhitāḥ indraloko vahniloko yā ca saṁyaminī purī

व्यास जी ने कहा — हे राजन्! मेरु के शिखर पर सभी लोक स्थित हैं — इन्द्रलोक, अग्निलोक तथा वह यमपुरी जिसे संयमिनी कहते हैं,

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.8.7)

तथैव सत्यलोकश्च कैलासश्च तथा पुनः । वैकुण्ठश्च पुनस्तत्र वैष्णवं पदमुच्यते

tathaiva satyalokaśca kailāsaśca tathā punaḥ vaikuṇṭhaśca punastatra vaiṣṇavaṁ padamucyate

— उसी प्रकार सत्यलोक, फिर कैलास, और फिर वहीं वैकुण्ठ भी, जिसे विष्णु का धाम कहा जाता है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.8.8)

यथार्जुनः शक्रलोके गतः पार्थो धनुर्धरः । पञ्चवर्षाणि कौन्तेयः स्थितस्तत्र सुरालये

yathārjunaḥ śakraloke gataḥ pārtho dhanurdharaḥ pañcavarṣāṇi kaunteyaḥ sthitastatra surālaye

जैसे धनुर्धर पार्थ अर्जुन इन्द्रलोक गए और वे कौन्तेय पाँच वर्षों तक वहाँ देवलोक में रहे —

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.8.9)

मानुषेणैव देहेन वासवस्य च सन्निधौ । तथैवान्येऽपि भूपालाः ककुत्स्थप्रमुखाः किल

mānuṣeṇaiva dehena vāsavasya ca sannidhau tathaivānye'pi bhūpālāḥ kakutsthapramukhāḥ kila

— अपने मानव शरीर से ही, इन्द्र की उपस्थिति में — उसी प्रकार अन्य ककुत्स्थ आदि राजा भी वहाँ गए हैं।

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.8.10)

स्वर्लोकगतयः पश्चाद्दैत्याश्चापि महाबलाः । जित्वेन्द्रसदनं प्राप्य संस्थितास्तत्र कामतः

svarlokagatayaḥ paścāddaityāścāpi mahābalāḥ jitvendrasadanaṁ prāpya saṁsthitāstatra kāmataḥ

बाद में महाबली दैत्य भी इन्द्र के धाम को जीतकर वहाँ अपनी इच्छानुसार जाकर रहे हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.8.11)

महाभिषः पुरा राजा ब्रह्मलोकं गतः स्वराट् । आगच्छन्तीं नृपो गङ्गामपश्यच्चातिसुन्दरीम्

mahābhiṣaḥ purā rājā brahmalokaṁ gataḥ svarāṭ āgacchantīṁ nṛpo gaṅgāmapaśyaccātisundarīm

प्राचीनकाल में महाभिष नामक स्वराट् राजा ब्रह्मलोक गए थे; वहाँ राजा ने अत्यंत सुन्दरी गंगा को आती हुई देखा।

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.8.12)

वायुनाम्बरमस्यास्तु दैवादपहृतं नृप । किञ्चिन्नग्ना नृपेणाथ दृष्टा सा सुन्दरी तथा

vāyunāmbaramasyāstu daivādapahṛtaṁ nṛpa kiñcinnagnā nṛpeṇātha dṛṣṭā sā sundarī tathā

हे राजन्! दैवयोग से उसका वस्त्र वायु द्वारा उड़ गया; तब राजा ने उस सुन्दरी को कुछ अनावृत देखा।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.8.13)

स्मितं चकार कामार्तः सा च किञ्चिज्जहास वै । ब्रह्मणा तौ तदा दृष्टौ शप्तौ जातौ वसुन्धराम्

smitaṁ cakāra kāmārtaḥ sā ca kiñcijjahāsa vai brahmaṇā tau tadā dṛṣṭau śaptau jātau vasundharām

काम से आतुर होकर उन्होंने मुस्कान दी, और उसने भी कुछ हास्य किया; उन दोनों को उस समय देखकर ब्रह्मा ने शाप दिया, जिससे वे दोनों पृथ्वी पर जन्मे।

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.8.14)

वैकुण्ठेऽपि सुराः सर्वे पीडिता दैत्यदानवैः । गत्वा हरिं जगन्नाथमस्तुवन्कमलापतिम्

vaikuṇṭhe'pi surāḥ sarve pīḍitā daityadānavaiḥ gatvā hariṁ jagannāthamastuvankamalāpatim

वैकुण्ठ में भी, जब देवताओं को दैत्य-दानवों से पीड़ा हुई थी, तब वे सब जगन्नाथ, कमला के पति हरि की शरण में गए और उनकी स्तुति की।

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.8.15)

सन्देहो नात्र कर्तव्यः सर्वथा नृपसत्तम । गम्याः सर्वेऽपि लोकाः स्युर्मानवानां नराधिप

sandeho nātra kartavyaḥ sarvathā nṛpasattama gamyāḥ sarve'pi lokāḥ syurmānavānāṁ narādhipa

हे नृपसत्तम! इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए; हे नराधिप! मनुष्यों के लिए ये सभी लोक गम्य ही हो सकते हैं।

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.8.16)

अवश्यं कृतपुण्यानां तापसानां नराधिप । पुण्यसद्भाव एवात्र गमने कारणं नृप

avaśyaṁ kṛtapuṇyānāṁ tāpasānāṁ narādhipa puṇyasadbhāva evātra gamane kāraṇaṁ nṛpa

हे नराधिप! पुण्य करने वाले तपस्वियों के लिए यह अवश्य सम्भव है; हे राजन्! यहाँ पुण्य की सद्भावना ही उस गमन का कारण है —

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.8.17)

तथैव यजमानानां यज्ञेन भावितात्मनाम् । जनमेजय उवाच । रेवतो रेवतीं कन्यां गृहीत्वा चारुलोचनाम्

tathaiva yajamānānāṁ yajñena bhāvitātmanām janamejaya uvāca revato revatīṁ kanyāṁ gṛhītvā cārulocanām

— और वैसे ही यज्ञ द्वारा जिनकी आत्मा शुद्ध हुई हो, उन यजमानों के लिए भी। जनमेजय ने कहा — रेवत, चारुलोचना पुत्री रेवती को लेकर —

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.8.18)

ब्रह्मलोकं गतः पश्चात्किं कृतं तेने भूभुजा । ब्रह्मणा किं समादिष्टं कस्मै दत्ता सुता पुनः

brahmalokaṁ gataḥ paścātkiṁ kṛtaṁ tene bhūbhujā brahmaṇā kiṁ samādiṣṭaṁ kasmai dattā sutā punaḥ

— ब्रह्मलोक गए। इसके बाद उस भूपति ने क्या किया? ब्रह्मा ने क्या आदेश दिया? पुत्री अंततः किसे दी गई?

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.8.19)

तत्सर्वं विस्तराद्बह्मन् कथय त्वं ममाधुना । व्यास उवाच । निशामय महीपाल राजा रेवतकः किल

tatsarvaṁ vistarādbahman kathaya tvaṁ mamādhunā vyāsa uvāca niśāmaya mahīpāla rājā revatakaḥ kila

हे ब्रह्मन्! वह सब मुझे अब विस्तार से बताइए।" व्यास जी ने कहा — "हे महीपाल! सुनो, राजा रेवतक —

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.8.20)

पुत्र्या वरं परिप्रष्टुं ब्रह्मलोकं गतो यदा । आवर्तमाने गान्धर्वे स्थितो लब्धक्षणः क्षणम्

putryā varaṁ paripraṣṭuṁ brahmalokaṁ gato yadā āvartamāne gāndharve sthito labdhakṣaṇaḥ kṣaṇam

— पुत्री के लिए वर पूछने ब्रह्मलोक गए, तब वहाँ गन्धर्व-गायन चल रहा था; उन्होंने वहीं ठहरकर उचित क्षण की प्रतीक्षा की।

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.8.21)

शृण्वन्नतृप्यद्धृष्टात्मा सभायां तु सकन्यकः । समाप्ते तत्र गान्धर्वे प्रणम्य परमेश्वरम्

śṛṇvannatṛpyaddhṛṣṭātmā sabhāyāṁ tu sakanyakaḥ samāpte tatra gāndharve praṇamya parameśvaram

सभा में प्रसन्नचित्त होकर अपनी पुत्री सहित सुनते हुए भी वे तृप्त न हुए। वह गन्धर्व-गायन समाप्त होने पर परमेश्वर को प्रणाम करके —

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.8.22)

दर्शयित्वा सुतां तस्मै स्वाभिप्रायं न्यवेदयत् । राजोवाच - वरं कथय देवेश कन्येयं मम पुत्रिका

darśayitvā sutāṁ tasmai svābhiprāyaṁ nyavedayat rājovāca - varaṁ kathaya deveśa kanyeyaṁ mama putrikā

— अपनी पुत्री दिखाकर उन्होंने अपना अभिप्राय बताया। राजा ने कहा — "हे देवेश! वर बताइए, यह मेरी पुत्री है —

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.8.23)

देया कस्मै मया ब्रह्मन् प्रष्टुं त्वां समुपागतः । बहवो राजपुत्रा मे वीक्षिताः कुलसम्भवाः

deyā kasmai mayā brahman praṣṭuṁ tvāṁ samupāgataḥ bahavo rājaputrā me vīkṣitāḥ kulasambhavāḥ

— इसे किसे दूँ, हे ब्रह्मन्, यही पूछने मैं यहाँ आया हूँ। मैंने कुलीन राजकुमार बहुत देखे हैं —

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.8.24)

कस्मिंश्चिन्मे मनः कामं नोपतिष्ठति चञ्चलम् । तस्मात्त्वां देवदेवेश प्रष्टुमत्रागतोऽस्म्यहम्

kasmiṁścinme manaḥ kāmaṁ nopatiṣṭhati cañcalam tasmāttvāṁ devadeveśa praṣṭumatrāgato'smyaham

— किन्तु मेरा चंचल मन किसी में भी स्थिर नहीं होता। इसलिए, हे देवदेवेश! मैं यहाँ आपसे पूछने आया हूँ।

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.8.25)

तदाज्ञापय सर्वज्ञ योग्यं राजसुतं वरम् । कुलीनं बलवन्तं च सर्वलक्षणसंयुतम्

tadājñāpaya sarvajña yogyaṁ rājasutaṁ varam kulīnaṁ balavantaṁ ca sarvalakṣaṇasaṁyutam

अतः, हे सर्वज्ञ! योग्य राजकुमार वर बताइए — कुलीन, बलवान तथा सभी शुभ लक्षणों से युक्त,

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.8.26)

दातारं धर्मशीलं च राजपुत्रं समादिश । व्यास उवाच । तदाकर्ण्य जगत्कर्ता वचनं नृपतेस्तदा

dātāraṁ dharmaśīlaṁ ca rājaputraṁ samādiśa vyāsa uvāca tadākarṇya jagatkartā vacanaṁ nṛpatestadā

— दानी और धर्मशील राजकुमार का नाम बताइए।" व्यास जी ने कहा — राजा का यह वचन सुनकर तब जगत्कर्ता ब्रह्मा ने —

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.8.27)

तमुवाच हसन्वाक्यं दृष्ट्वा कालस्य पर्ययम् । ब्रह्मोवाच - राजपुत्रास्त्वया राजन् वरा ये हृदये कृताः

tamuvāca hasanvākyaṁ dṛṣṭvā kālasya paryayam brahmovāca - rājaputrāstvayā rājan varā ye hṛdaye kṛtāḥ

— काल के परिवर्तन को देखकर मुस्कुराते हुए उनसे यह वचन कहा। ब्रह्मा ने कहा — "हे राजन्! जिन राजकुमारों को आपने अपने हृदय में वर के रूप में चुना है —

श्लोक 28 (devibhagavatam.7.8.28)

ग्रस्ताः कालेन ते सर्वे सपितृपौत्रबान्धवाः । सप्तविंशतिमोऽद्यैव द्वापरस्तु प्रवर्तते

grastāḥ kālena te sarve sapitṛpautrabāndhavāḥ saptaviṁśatimo'dyaiva dvāparastu pravartate

— वे सब, अपने पिता-पौत्र-बांधवों सहित, काल द्वारा ग्रस्त हो चुके हैं। आज तो सत्ताईसवाँ द्वापर युग चल रहा है।

श्लोक 29 (devibhagavatam.7.8.29)

वंशजास्ते मृताः सर्वे पुरी दैत्यैर्विलुण्ठिता । सोमवंशोद्भवस्तत्र राजा राज्यं प्रशास्ति हि

vaṁśajāste mṛtāḥ sarve purī daityairviluṇṭhitā somavaṁśodbhavastatra rājā rājyaṁ praśāsti hi

उनके वंशज सभी मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, आपकी नगरी दैत्यों द्वारा लूटी जा चुकी है। वहाँ अब सोमवंश में उत्पन्न एक राजा राज्य कर रहा है।

श्लोक 30 (devibhagavatam.7.8.30)

उग्रसेन इति ख्यातो मथुराधिपतिः किल । ययातिवंशसम्भूतो राजा माथुरमण्डले

ugrasena iti khyāto mathurādhipatiḥ kila yayātivaṁśasambhūto rājā māthuramaṇḍale

उग्रसेन नाम से विख्यात वह मथुरा का अधिपति है, ययाति के वंश में उत्पन्न, जो मथुरा-मण्डल में राज्य करता है।

श्लोक 31 (devibhagavatam.7.8.31)

उग्रसेनात्मजः कंसः सुरद्वेषी महाबलः । दैत्यांशः पितरं सोऽपि कारागारं न्यवेशयत्

ugrasenātmajaḥ kaṁsaḥ suradveṣī mahābalaḥ daityāṁśaḥ pitaraṁ so'pi kārāgāraṁ nyaveśayat

उग्रसेन का पुत्र कंस, देवद्वेषी और महाबली, दैत्य का अंश है — उसने अपने पिता को भी कारागार में डाल दिया।

श्लोक 32 (devibhagavatam.7.8.32)

स्वयं राज्यं चकारासौ नृपाणां मदगर्वितः । मेदिनी चातिभारार्ता ब्रह्माणं शरणं गता

svayaṁ rājyaṁ cakārāsau nṛpāṇāṁ madagarvitaḥ medinī cātibhārārtā brahmāṇaṁ śaraṇaṁ gatā

वह मद से गर्वित होकर स्वयं राज्य करने लगा; और अत्यंत भार से पीड़ित पृथ्वी ब्रह्मा की शरण में गई —

श्लोक 33 (devibhagavatam.7.8.33)

दुष्टराजन्यसैन्यायां भारेणातिसमाकुला । अंशावतरणं तत्र गदितं सुरसत्तमैः

duṣṭarājanyasainyāyāṁ bhāreṇātisamākulā aṁśāvataraṇaṁ tatra gaditaṁ surasattamaiḥ

— दुष्ट राजाओं की सेनाओं के भार से अत्यंत व्याकुल होकर। तब देवताओं के अंशों के अवतरण की घोषणा श्रेष्ठ देवताओं द्वारा की गई।

श्लोक 34 (devibhagavatam.7.8.34)

वासुदेवः समुत्पन्नः कृष्णः कमललोचनः । देवक्यां देवरूपिण्यां योऽसौ नारायणो मुनिः

vāsudevaḥ samutpannaḥ kṛṣṇaḥ kamalalocanaḥ devakyāṁ devarūpiṇyāṁ yo'sau nārāyaṇo muniḥ

देवकी से, जो देवरूपिणी थीं, वासुदेव के पुत्र कमलनयन कृष्ण उत्पन्न हुए — जो स्वयं वे मुनि नारायण हैं —

श्लोक 35 (devibhagavatam.7.8.35)

तपश्चचार दुःसाध्यं धर्मपुत्रः सनातनः । गङ्गातीरे नरसखः पुण्ये बदरिकाश्रमे

tapaścacāra duḥsādhyaṁ dharmaputraḥ sanātanaḥ gaṅgātīre narasakhaḥ puṇye badarikāśrame

— वे धर्मपुत्र सनातन गंगा-तट पर, पुण्य बदरिकाश्रम में, नर सखा सहित, अत्यंत कठिन तपस्या करते रहे हैं।

श्लोक 36 (devibhagavatam.7.8.36)

सोऽवतीर्णो यदुकुले वासुदेवोऽपि विश्रुतः । तेनासौ निहतः पापः कंसः कृष्णेन सत्तम

so'vatīrṇo yadukule vāsudevo'pi viśrutaḥ tenāsau nihataḥ pāpaḥ kaṁsaḥ kṛṣṇena sattama

वे ही यदुकुल में अवतरित हुए हैं, वासुदेव नाम से विख्यात; हे सत्तम! उन्हीं कृष्ण के द्वारा वह पापी कंस मारा गया है।

श्लोक 37 (devibhagavatam.7.8.37)

उग्रसेनाय राज्यं वै दत्तं हत्वा खलं सुतम् । कंसस्य श्वशुरः पापो जरासन्धो महाबलः

ugrasenāya rājyaṁ vai dattaṁ hatvā khalaṁ sutam kaṁsasya śvaśuraḥ pāpo jarāsandho mahābalaḥ

उस दुष्ट पुत्र को मारकर उग्रसेन को राज्य दे दिया गया। फिर कंस का श्वसुर, पापी जरासंध, महाबली —

श्लोक 38 (devibhagavatam.7.8.38)

आगत्य मथुरां क्रोधाच्चकार सङ्गरं मुदा । कृष्णेनासौ जितः सङ्ख्ये जरासन्धो महाबलः

āgatya mathurāṁ krodhāccakāra saṅgaraṁ mudā kṛṣṇenāsau jitaḥ saṅkhye jarāsandho mahābalaḥ

— क्रोध से मथुरा आकर उत्साहपूर्वक युद्ध किया; परन्तु वह महाबली जरासंध कृष्ण द्वारा युद्ध में पराजित हुआ।

श्लोक 39 (devibhagavatam.7.8.39)

प्रेषयामास युद्धाय सबलं यवनं ततः । श्रुत्वाऽऽयान्तं महाशूरं ससैन्यं यवनाधिपम्

preṣayāmāsa yuddhāya sabalaṁ yavanaṁ tataḥ śrutvā''yāntaṁ mahāśūraṁ sasainyaṁ yavanādhipam

तब उसने सेना सहित यवन को युद्ध हेतु भेजा। उस महाशूर, सेना सहित यवनराज को आते हुए सुनकर —

श्लोक 40 (devibhagavatam.7.8.40)

[कृष्णस्तु मथुरां त्यक्त्वा पुरीं द्वारावतीमगात् । प्रभग्नां तां पुरीं कृष्णः शिल्पिभिः सह सङ्गतैः ॥ कारयामास दुर्गाढ्यां हट्टशालाविमण्डिताम् । जीर्णोद्धारं पुरः कृत्वा वासुदेवः प्रतापवान् । उग्रसेनं च राजानं चकार वशवर्तिनम् ॥ ] यादवान्स्थापयामास द्वारवत्यां यदूत्तमः । वासुदेवस्तु तत्राद्य वर्तते बान्धवैः सह

[kṛṣṇastu mathurāṁ tyaktvā purīṁ dvārāvatīmagāt prabhagnāṁ tāṁ purīṁ kṛṣṇaḥ śilpibhiḥ saha saṅgataiḥ kārayāmāsa durgāḍhyāṁ haṭṭaśālāvimaṇḍitām jīrṇoddhāraṁ puraḥ kṛtvā vāsudevaḥ pratāpavān ugrasenaṁ ca rājānaṁ cakāra vaśavartinam ] yādavānsthāpayāmāsa dvāravatyāṁ yadūttamaḥ vāsudevastu tatrādya vartate bāndhavaiḥ saha

[कृष्ण ने मथुरा त्यागकर द्वारावती नगरी को अपनाया। उस टूटी-फूटी नगरी को कृष्ण ने कुशल शिल्पियों के साथ मिलकर सुदृढ़ किलों और बाज़ार-पंक्तियों से सुसज्जित करवाया। इस प्रकार उस प्राचीन नगरी का जीर्णोद्धार करके प्रतापी वासुदेव ने राजा उग्रसेन को भी अपने वश में कर लिया।] उस यदुश्रेष्ठ ने द्वारवती में यादवों को बसाया; और वासुदेव आज भी वहीं अपने बांधवों सहित निवास करते हैं।

श्लोक 41 (devibhagavatam.7.8.41)

तास्याग्रतः स विख्यातो बलदेवो हलायुधः । शेषांशो मुसली वीरो वरोऽस्तु तव सम्मतः

tāsyāgrataḥ sa vikhyāto baladevo halāyudhaḥ śeṣāṁśo musalī vīro varo'stu tava sammataḥ

उनके अग्रज विख्यात बलदेव हैं, हलधारी, शेषनाग के अंशस्वरूप, मुसल धारण करने वाले वीर — वे ही तुम्हारे लिए उपयुक्त वर हैं।

श्लोक 42 (devibhagavatam.7.8.42)

सङ्कर्षणाय देह्याशु कन्यां कमललोचनाम् । रेवतीं बलभद्राय विवाहविधिना ततः

saṅkarṣaṇāya dehyāśu kanyāṁ kamalalocanām revatīṁ balabhadrāya vivāhavidhinā tataḥ

अपनी कमलनयनी पुत्री रेवती को शीघ्र संकर्षण को, बलभद्र को, विवाह-विधि के अनुसार दे दो।

श्लोक 43 (devibhagavatam.7.8.43)

दत्त्वा पुत्रीं नृपश्रेष्ठ गच्छ त्वं बदरिकाश्रमम् । तपस्तप्तुं सुरारामं पावनं कामदं नृणाम्

dattvā putrīṁ nṛpaśreṣṭha gaccha tvaṁ badarikāśramam tapastaptuṁ surārāmaṁ pāvanaṁ kāmadaṁ nṛṇām

हे नृपश्रेष्ठ! पुत्री देकर तुम स्वयं बदरिकाश्रम जाओ — तपस्या करने के लिए, वह देवताओं का पावन उद्यान, मनुष्यों की कामनाएँ पूर्ण करने वाला।"

श्लोक 44 (devibhagavatam.7.8.44)

व्यास उवाच । इति राजा समादिष्टो ब्रह्मणा पद्मयोनिना । जगाम तरसा राजन् द्वारकां कन्ययान्वितः

vyāsa uvāca iti rājā samādiṣṭo brahmaṇā padmayoninā jagāma tarasā rājan dvārakāṁ kanyayānvitaḥ

व्यास जी ने कहा — कमलयोनि ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार आदेश पाकर राजा शीघ्रता से, हे राजन्, पुत्री सहित द्वारका गए।

श्लोक 45 (devibhagavatam.7.8.45)

ददौ तां बलदेवाय कन्यां वै शुभलक्षणाम् । ततस्तप्त्वा तपस्तीव्रं नृपतिः कालपर्यये

dadau tāṁ baladevāya kanyāṁ vai śubhalakṣaṇām tatastaptvā tapastīvraṁ nṛpatiḥ kālaparyaye

उन्होंने वह शुभलक्षणा कन्या बलदेव को दे दी; फिर तीव्र तपस्या करके वह राजा, काल बीतने पर —

श्लोक 46 (devibhagavatam.7.8.46)

जगाम त्रिदशावासं त्यक्त्वा देहं सरित्तटे । राजोवाच - भगवन्महदाश्चर्यं भवता समुदाहृतम्

jagāma tridaśāvāsaṁ tyaktvā dehaṁ sarittaṭe rājovāca - bhagavanmahadāścaryaṁ bhavatā samudāhṛtam

— नदी-तट पर शरीर त्यागकर देवलोक चले गए। राजा (जनमेजय) ने कहा — "हे भगवन्! आपने महान आश्चर्य का वर्णन किया है।

श्लोक 47 (devibhagavatam.7.8.47)

रेवतस्तु स्थितस्तत्र ब्रह्मलोके सुतार्थतः । युगानां तु गतं तत्र शतमष्टोत्तरं किल

revatastu sthitastatra brahmaloke sutārthataḥ yugānāṁ tu gataṁ tatra śatamaṣṭottaraṁ kila

रेवत तो पुत्री के लिए वहाँ ब्रह्मलोक में रहे, और वहाँ एक सौ आठ युग बीत गए —

श्लोक 48 (devibhagavatam.7.8.48)

कन्या वृद्धा न सञ्जाता राजा वातितरां नु किम् । एतावन्तं तथा कालमायुः पूर्णं तयोः कथम्

kanyā vṛddhā na sañjātā rājā vātitarāṁ nu kim etāvantaṁ tathā kālamāyuḥ pūrṇaṁ tayoḥ katham

— फिर भी पुत्री वृद्धा न हुई, और शायद राजा भी नहीं। इतने विशाल काल तक उन दोनों की आयु पूर्ण कैसे बनी रही?"

श्लोक 49 (devibhagavatam.7.8.49)

व्यास उवाच । न जरा क्षुपित्पासा वा न मृत्युर्न भयं पुनः । न तु ग्लानिः प्रभवति ब्रह्मलोके सदानघ

vyāsa uvāca na jarā kṣupitpāsā vā na mṛtyurna bhayaṁ punaḥ na tu glāniḥ prabhavati brahmaloke sadānagha

व्यास जी ने कहा — हे निष्पाप! ब्रह्मलोक में न वृद्धावस्था होती है, न भूख-प्यास, न मृत्यु, न भय, और न कभी थकान होती है।

श्लोक 50 (devibhagavatam.7.8.50)

मेरुं गतस्य शर्यातेः सन्तती राक्षसैर्हता । गताः कुशस्थलीं त्यक्त्वा भयभीता इतस्ततः

meruṁ gatasya śaryāteḥ santatī rākṣasairhatā gatāḥ kuśasthalīṁ tyaktvā bhayabhītā itastataḥ

शर्याति के मेरु पर्वत जाने पर उनकी संतति राक्षसों द्वारा मार डाली गई; भयभीत होकर लोग कुशस्थली को त्यागकर इधर-उधर चले गए।

श्लोक 51 (devibhagavatam.7.8.51)

मनोश्च क्षुवतः पुत्र उत्पन्नो वीर्यवत्तरः । इक्ष्वाकुरिति विख्यातः सूर्यवंशकरस्तु सः

manośca kṣuvataḥ putra utpanno vīryavattaraḥ ikṣvākuriti vikhyātaḥ sūryavaṁśakarastu saḥ

मनु के पुत्र क्षुव से एक अत्यंत पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ, जो इक्ष्वाकु नाम से विख्यात, सूर्यवंश का प्रवर्तक हुआ।

श्लोक 52 (devibhagavatam.7.8.52)

वंशार्थं तप आतिष्ठद्देवीं ध्यात्वा निरन्तरम् । नारदस्योपदेशेन प्राप्य दीक्षामनुत्तमाम्

vaṁśārthaṁ tapa ātiṣṭhaddevīṁ dhyātvā nirantaram nāradasyopadeśena prāpya dīkṣāmanuttamām

वंश की वृद्धि के लिए उन्होंने नारद के उपदेश से सर्वोत्तम दीक्षा पाकर, निरन्तर देवी का ध्यान करते हुए तपस्या की।

श्लोक 53 (devibhagavatam.7.8.53)

तस्य पुत्रशतं राजन्निक्ष्वाकोरिति विश्रुतम् । विकुक्षिः प्रथमस्तेषां बलवीर्यसमन्वितः

tasya putraśataṁ rājannikṣvākoriti viśrutam vikukṣiḥ prathamasteṣāṁ balavīryasamanvitaḥ

हे राजन्! उनके सौ पुत्र हुए, जो इक्ष्वाकु-पुत्र कहलाए; उनमें बल-पराक्रम से युक्त विकुक्षि प्रथम थे।

श्लोक 54 (devibhagavatam.7.8.54)

अयोध्यायां स्थितो राजा इक्ष्वाकुरिति विश्रुतः । शकुनिप्रमुखाः पुत्रा पञ्चाशद्बलवत्तराः

ayodhyāyāṁ sthito rājā ikṣvākuriti viśrutaḥ śakunipramukhāḥ putrā pañcāśadbalavattarāḥ

इक्ष्वाकु नाम से विख्यात राजा अयोध्या में निवास करते थे; उनके पुत्र, शकुनि आदि, पचास अत्यंत बलवान थे।

श्लोक 55 (devibhagavatam.7.8.55)

उत्तरापथदेशस्य रक्षितारः कृताः किल । दक्षिणस्यां तथा राजन्नादिष्टास्तेन ते सुताः

uttarāpathadeśasya rakṣitāraḥ kṛtāḥ kila dakṣiṇasyāṁ tathā rājannādiṣṭāstena te sutāḥ

उन्हें उत्तरापथ प्रदेश का रक्षक बनाया गया; और उसी प्रकार, हे राजन्, अन्य पुत्रों को दक्षिण की ओर नियुक्त किया गया —

श्लोक 56 (devibhagavatam.7.8.56)

चत्वारिंशत्तथाष्टौ च रक्षणार्थं महात्मना । अन्यौ द्वौ संस्थितौ पार्श्वे सेवार्थं तस्य भूपतेः

catvāriṁśattathāṣṭau ca rakṣaṇārthaṁ mahātmanā anyau dvau saṁsthitau pārśve sevārthaṁ tasya bhūpateḥ

— उस महात्मा द्वारा अड़तालीस पुत्र रक्षा हेतु; शेष दो पुत्र उस राजा की सेवा हेतु उनके ही पास रहे।

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