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सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9

मान्धाता की उत्पत्ति

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (devibhagavatam.7.9.1)

व्यास उवाच । कदाचिदष्टकाश्राद्धे विकुक्षिं पृथिवीपतिः । आज्ञापयदसम्मूढो मांसमानय सत्वरम्

vyāsa uvāca kadācidaṣṭakāśrāddhe vikukṣiṁ pṛthivīpatiḥ ājñāpayadasammūḍho māṁsamānaya satvaram

व्यास जी ने कहा — एक बार अष्टका-श्राद्ध के अवसर पर पृथ्वीपति (इक्ष्वाकु) ने स्पष्ट मन से विकुक्षि को आज्ञा दी — "शीघ्र मांस ले आओ।

श्लोक 2 (devibhagavatam.7.9.2)

मेध्यं श्राद्धार्थमधुना वने गत्वा सूतादरात् । उत्युक्तोऽसौ तथेत्याशु जगाम वनमस्त्रभृत्

medhyaṁ śrāddhārthamadhunā vane gatvā sūtādarāt utyukto'sau tathetyāśu jagāma vanamastrabhṛt

श्राद्ध के लिए अभी शुद्ध मांस वन में जाकर सारथी के साथ आदरपूर्वक लाओ।" ऐसा कहे जाने पर वह "जो आज्ञा" कहकर शस्त्रधारी होकर वन को चल पड़ा।

श्लोक 3 (devibhagavatam.7.9.3)

गत्वा जघान बाणैः स वराहान्सूकरान्मृगान् । शशांश्चापि परिश्रान्तो बभूवाथ बुभूक्षितः

gatvā jaghāna bāṇaiḥ sa varāhānsūkarānmṛgān śaśāṁścāpi pariśrānto babhūvātha bubhūkṣitaḥ

वहाँ जाकर उसने बाणों से वराह, सूकर तथा मृगों को मारा, और खरगोशों को भी; फिर वह थक गया और भूख से व्याकुल हो उठा।

श्लोक 4 (devibhagavatam.7.9.4)

विस्मृता चाष्टका तस्य शशं चाददसौ वने । शेषं निवेदयामास पित्रे मांसमनुत्तमम्

vismṛtā cāṣṭakā tasya śaśaṁ cādadasau vane śeṣaṁ nivedayāmāsa pitre māṁsamanuttamam

अष्टका-नियम को भूलकर उसने वन में ही एक खरगोश खा लिया; और शेष उत्तम मांस अपने पिता को समर्पित कर दिया।

श्लोक 5 (devibhagavatam.7.9.5)

प्रोक्षणाय समानीतं मांसं दृष्ट्वा गुरुस्तदा । अनर्हमिति तज्ज्ञात्वा चुकोप मुनिसत्तमः

prokṣaṇāya samānītaṁ māṁsaṁ dṛṣṭvā gurustadā anarhamiti tajjñātvā cukopa munisattamaḥ

अभिषेचन हेतु लाए गए उस मांस को देखकर गुरु वसिष्ठ ने उसे अनुचित जानकर क्रोध किया, वे मुनिश्रेष्ठ थे।

श्लोक 6 (devibhagavatam.7.9.6)

भुक्तशेषं तु न श्राद्धे प्रोक्षणीयमिति स्थितिः । राज्ञे निवेदयामास वसिष्ठः पाकदूषणम्

bhuktaśeṣaṁ tu na śrāddhe prokṣaṇīyamiti sthitiḥ rājñe nivedayāmāsa vasiṣṭhaḥ pākadūṣaṇam

"भोजन का शेष श्राद्ध में अभिषेचन के योग्य नहीं होता" — यह नियम है; वसिष्ठ ने राजा को इस भोजन-दूषण की सूचना दी।

श्लोक 7 (devibhagavatam.7.9.7)

पुत्रस्य कर्म तज्ज्ञात्वा भूपतिर्गुरुणोदितम् । चुकोप विधिलोपात्तं देशान्निःसारयत्ततः

putrasya karma tajjñātvā bhūpatirguruṇoditam cukopa vidhilopāttaṁ deśānniḥsārayattataḥ

गुरु द्वारा बताए गए पुत्र के इस कर्म को जानकर राजा को विधि-भंग पर क्रोध आया, और उन्होंने उसे राज्य से निकाल दिया।

श्लोक 8 (devibhagavatam.7.9.8)

शशाप इति विख्यातो नाम्ना जातो नृपात्मजः । गतो वने शशादस्तु पितृकोपादसम्भ्रमः

śaśāpa iti vikhyāto nāmnā jāto nṛpātmajaḥ gato vane śaśādastu pitṛkopādasambhramaḥ

वह राजपुत्र शशाद नाम से विख्यात हुआ; और पिता के क्रोध के कारण शशाद बिना विचलित हुए वन को चले गए।

श्लोक 9 (devibhagavatam.7.9.9)

वन्येन वर्तयन्कालं नीतवान् धर्मतत्परः । पितर्युपरते राज्यं प्राप्तं तेन महात्मना

vanyena vartayankālaṁ nītavān dharmatatparaḥ pitaryuparate rājyaṁ prāptaṁ tena mahātmanā

वे धर्मपरायण, वन्य पदार्थों पर जीवन-यापन करते हुए काल बिताते रहे; पिता के स्वर्गवासी होने पर उस महात्मा को राज्य प्राप्त हुआ।

श्लोक 10 (devibhagavatam.7.9.10)

शशादस्त्वकरोद्राज्यमयोध्यायाः पतिः स्वयम् । यज्ञाननेकशः पूर्णांश्चकार सरयूतटे

śaśādastvakarodrājyamayodhyāyāḥ patiḥ svayam yajñānanekaśaḥ pūrṇāṁścakāra sarayūtaṭe

शशाद ने स्वयं अयोध्या के स्वामी होकर राज्य किया, और सरयू के तट पर अनेकों पूर्ण यज्ञ किए।

श्लोक 11 (devibhagavatam.7.9.11)

शशादस्याभवत्पुत्रः ककुत्स्थ इति विश्रुतः । तस्यैव नामभेदाद्वै इन्द्रवाहः पुरञ्जयः

śaśādasyābhavatputraḥ kakutstha iti viśrutaḥ tasyaiva nāmabhedādvai indravāhaḥ purañjayaḥ

शशाद का पुत्र ककुत्स्थ नाम से विख्यात हुआ; उसी के अन्य नाम भी थे — इन्द्रवाह और पुरञ्जय।

श्लोक 12 (devibhagavatam.7.9.12)

जनमेजय उवाच । नामभेदः कथं जातो राजपुत्रस्य चानघ । कारणं ब्रूहि मे सर्वं कर्मणा येन चाभवत्

janamejaya uvāca nāmabhedaḥ kathaṁ jāto rājaputrasya cānagha kāraṇaṁ brūhi me sarvaṁ karmaṇā yena cābhavat

जनमेजय ने कहा — हे निष्पाप! उस राजपुत्र का नाम-भेद कैसे हुआ? किस कर्म से यह हुआ, वह सारा कारण मुझे बताइए।

श्लोक 13 (devibhagavatam.7.9.13)

व्यास उवाच । शशादे स्वर्गते राजा ककुत्स्थ इति चाभवत् । [राज्यं चकार धर्मज्ञः पितृपैतामहं बलात् ।] एतस्मिन्नन्तरे देवा दैत्यैः सर्वे पराजिताः

vyāsa uvāca śaśāde svargate rājā kakutstha iti cābhavat [rājyaṁ cakāra dharmajñaḥ pitṛpaitāmahaṁ balāt ] etasminnantare devā daityaiḥ sarve parājitāḥ

व्यास जी ने कहा — शशाद के स्वर्गवासी होने पर वह राजा ककुत्स्थ नाम से जाने गए। [उस धर्मज्ञ ने अपने पिता-पितामह का राज्य बल-पूर्वक चलाया।] इसी बीच सभी देवता दैत्यों द्वारा पराजित हुए —

श्लोक 14 (devibhagavatam.7.9.14)

जग्मुस्त्रिलोकाधिपतिं विष्णुं शरणमव्ययम् । तान्प्रोवाच महाविष्णुस्तदा देवान्सनातनः

jagmustrilokādhipatiṁ viṣṇuṁ śaraṇamavyayam tānprovāca mahāviṣṇustadā devānsanātanaḥ

— और वे तीनों लोकों के अविनाशी स्वामी विष्णु की शरण में गए। तब उन सनातन महाविष्णु ने देवताओं से यह कहा।

श्लोक 15 (devibhagavatam.7.9.15)

विष्णुरुवाच - पार्ष्णिग्राहं महीपालं प्रार्थयन्तु शशादजम् । स हनिष्यति वै दैत्यान्सङ्ग्रामे सुरसत्तमाः

viṣṇuruvāca - pārṣṇigrāhaṁ mahīpālaṁ prārthayantu śaśādajam sa haniṣyati vai daityānsaṅgrāme surasattamāḥ

विष्णु ने कहा — "शशाद के पुत्र उस भूपाल को अपना पार्ष्णिग्राह (रक्षक) बनने की प्रार्थना करो; हे सुरसत्तम! वह युद्ध में दैत्यों को अवश्य मारेगा।

श्लोक 16 (devibhagavatam.7.9.16)

आगमिष्यति धर्मात्मा साहाय्यार्थं धनुर्धरः । पराशक्तेः प्रसादेन सामर्थ्यं तस्य चातुलम्

āgamiṣyati dharmātmā sāhāyyārthaṁ dhanurdharaḥ parāśakteḥ prasādena sāmarthyaṁ tasya cātulam

वह धर्मात्मा धनुर्धर सहायता के लिए आएगा; परा शक्ति की कृपा से उसका सामर्थ्य अतुलनीय है।"

श्लोक 17 (devibhagavatam.7.9.17)

हरेः सुवचनाद्देवा ययुः सर्वे सवासवाः । अयोध्यायां महाराज शशादतनयं प्रति

hareḥ suvacanāddevā yayuḥ sarve savāsavāḥ ayodhyāyāṁ mahārāja śaśādatanayaṁ prati

हरि के इस सुन्दर वचन से सभी देवता इन्द्र सहित, हे महाराज, अयोध्या में शशाद के पुत्र के पास गए।

श्लोक 18 (devibhagavatam.7.9.18)

तानागतान् सुरान् राजा पूजयामास धर्मतः । पप्रच्छागमने राजा प्रयोजनमतन्द्रितः

tānāgatān surān rājā pūjayāmāsa dharmataḥ papracchāgamane rājā prayojanamatandritaḥ

राजा ने वहाँ आए हुए उन देवताओं का धर्मपूर्वक सत्कार किया, और सचेत होकर उनके आगमन का प्रयोजन पूछा।

श्लोक 19 (devibhagavatam.7.9.19)

राजोवाच - धन्योऽहं पावितश्चास्मि जीवितं सफलं मम । यदागत्य गृहे देवा ददुश्च दर्शनं महत्

rājovāca - dhanyo'haṁ pāvitaścāsmi jīvitaṁ saphalaṁ mama yadāgatya gṛhe devā daduśca darśanaṁ mahat

राजा ने कहा — "मैं धन्य हूँ, पवित्र हो गया हूँ, मेरा जीवन सफल हो गया, कि देवगण मेरे घर पधारकर यह महान दर्शन दे रहे हैं।

श्लोक 20 (devibhagavatam.7.9.20)

ब्रुवन्तु कृत्यं देवेशा दुःसाध्यमपि मानवैः । करिष्यामि महत्कार्यं सर्वथा भवतां महत्

bruvantu kṛtyaṁ deveśā duḥsādhyamapi mānavaiḥ kariṣyāmi mahatkāryaṁ sarvathā bhavatāṁ mahat

हे देवेशो! कार्य बताइए, भले ही वह मनुष्यों के लिए दुःसाध्य क्यों न हो; मैं आपका वह महान कार्य सर्वथा पूर्ण करूँगा।"

श्लोक 21 (devibhagavatam.7.9.21)

देवा ऊचुः - साहाय्यं कुरु राजेन्द्र सखा भव शचीपतेः । सङ्ग्रामे जय दैत्येन्द्रान्दुर्जयांस्त्रिदशैरपि

devā ūcuḥ - sāhāyyaṁ kuru rājendra sakhā bhava śacīpateḥ saṅgrāme jaya daityendrāndurjayāṁstridaśairapi

देवताओं ने कहा — "हे राजेन्द्र! सहायता कीजिए, इन्द्र के मित्र बनिए; युद्ध में तीस देवताओं के लिए भी दुर्जय उन दैत्यराजों को जीतिए।

श्लोक 22 (devibhagavatam.7.9.22)

पराशक्तिप्रसादेन दुर्लभं नास्ति ते क्वचित् । विष्णुना प्रेरिताश्चैवमागतास्तव सन्निधौ

parāśaktiprasādena durlabhaṁ nāsti te kvacit viṣṇunā preritāścaivamāgatāstava sannidhau

परा शक्ति की कृपा से आपके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। विष्णु द्वारा प्रेरित होकर हम इस प्रकार आपके सामने आए हैं।"

श्लोक 23 (devibhagavatam.7.9.23)

राजोवाच - पार्ष्णिग्राहो भवाम्यद्य देवानां सुरसत्तमाः । इन्द्रो मे वाहनं तत्र भवेद्यदि सुराधिपः

rājovāca - pārṣṇigrāho bhavāmyadya devānāṁ surasattamāḥ indro me vāhanaṁ tatra bhavedyadi surādhipaḥ

राजा ने कहा — "हे सुरसत्तमो! मैं आज देवताओं का पार्ष्णिग्राह बनूँगा, यदि सुराधिप इन्द्र वहाँ मेरा वाहन बनें।

श्लोक 24 (devibhagavatam.7.9.24)

सङ्ग्रामं तु करिष्यामि दैत्यैर्देवकृतेऽधुना । आरुह्येन्द्रं गमिष्यामि सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम्

saṅgrāmaṁ tu kariṣyāmi daityairdevakṛte'dhunā āruhyendraṁ gamiṣyāmi satyametadbravīmyaham

मैं अभी देवताओं के लिए दैत्यों से युद्ध करूँगा; इन्द्र पर आरूढ़ होकर जाऊँगा — यह मैं सत्य कहता हूँ।"

श्लोक 25 (devibhagavatam.7.9.25)

तदोचुर्वासवं देवाः कर्तव्यं कार्यमद्भुतम् । पत्रं भव नरेन्द्रस्य त्यक्त्वा लज्जां शचीपते

tadocurvāsavaṁ devāḥ kartavyaṁ kāryamadbhutam patraṁ bhava narendrasya tyaktvā lajjāṁ śacīpate

तब देवताओं ने इन्द्र से कहा — यह अद्भुत कार्य अवश्य करना है; हे शचीपते! लज्जा त्यागकर इस नरेन्द्र का वाहन बनिए।

श्लोक 26 (devibhagavatam.7.9.26)

लज्जमानस्तदा शक्रः प्रेरितो हरिणा भृशम् । बभूव वृषभस्तूर्णं रुद्रस्येवापरो महान्

lajjamānastadā śakraḥ prerito hariṇā bhṛśam babhūva vṛṣabhastūrṇaṁ rudrasyevāparo mahān

लज्जित होते हुए भी हरि द्वारा अत्यंत प्रेरित इन्द्र तुरन्त एक वृषभ बन गए — मानो रुद्र के दूसरे विशाल वाहन के समान।

श्लोक 27 (devibhagavatam.7.9.27)

तमारुरोह राजासौ सङ्ग्रामगमनाय वै । स्थितः ककुदि येनास्य ककुत्स्थस्तेन चाभवत्

tamāruroha rājāsau saṅgrāmagamanāya vai sthitaḥ kakudi yenāsya kakutsthastena cābhavat

उस राजा ने युद्ध में जाने के लिए उस पर आरोहण किया; और चूँकि वे उसके ककुद (कूबड़) पर स्थित हुए, इसीलिए वे ककुत्स्थ कहलाए।

श्लोक 28 (devibhagavatam.7.9.28)

इन्द्रो वाहः कृतो येन तेन नाम्नेन्द्रवाहकः । पुरं जितं तु दैत्यानां तेनाभूच्च पुरञ्जयः

indro vāhaḥ kṛto yena tena nāmnendravāhakaḥ puraṁ jitaṁ tu daityānāṁ tenābhūcca purañjayaḥ

जिसके द्वारा इन्द्र को वाहन बनाया गया, उसी से उनका नाम इन्द्रवाहक हुआ; और दैत्यों की नगरी जीतने के कारण वे पुरञ्जय भी हुए।

श्लोक 29 (devibhagavatam.7.9.29)

जित्वा दैत्यान्महाबाहुर्धनं तेषां प्रदत्तवान् । पप्रच्छ चैवं राजर्षेरिति सख्यं बभूव ह

jitvā daityānmahābāhurdhanaṁ teṣāṁ pradattavān papraccha caivaṁ rājarṣeriti sakhyaṁ babhūva ha

उस महाबाहु ने दैत्यों को जीतकर उनका धन देवताओं को दे दिया; और इस प्रकार पूछे जाने पर उस राजर्षि से यह मित्रता स्थापित हुई।

श्लोक 30 (devibhagavatam.7.9.30)

ककुत्स्थश्चातिविख्यातो नृपतिस्तस्य वंशजाः । काकुत्स्था भुवि राजानो बभूवुर्बहुविश्रुताः

kakutsthaścātivikhyāto nṛpatistasya vaṁśajāḥ kākutsthā bhuvi rājāno babhūvurbahuviśrutāḥ

ककुत्स्थ अत्यंत विख्यात राजा बने, और उनके वंशज पृथ्वी पर काकुत्स्थ नाम से बहुविश्रुत राजा हुए।

श्लोक 31 (devibhagavatam.7.9.31)

ककुत्स्थस्याभवत्पुत्रो धर्मपत्न्यां महाबलः । अनेना विश्रुतस्तस्य पृथुः पुत्रश्च वीर्यवान्

kakutsthasyābhavatputro dharmapatnyāṁ mahābalaḥ anenā viśrutastasya pṛthuḥ putraśca vīryavān

ककुत्स्थ की धर्मपत्नी से एक महाबली पुत्र उत्पन्न हुआ; अनेना नाम से विख्यात उनका पुत्र पृथु पराक्रमी थे।

श्लोक 32 (devibhagavatam.7.9.32)

विष्णोरंशः स्मृतः साक्षात्पराशक्तिपदार्चकः । विश्वरन्धिस्तु विज्ञेयः पृथोः पुत्रो नराधिपः

viṣṇoraṁśaḥ smṛtaḥ sākṣātparāśaktipadārcakaḥ viśvarandhistu vijñeyaḥ pṛthoḥ putro narādhipaḥ

वे साक्षात् विष्णु के अंश और परा शक्ति के चरणों के पूजक माने जाते हैं; पृथु के पुत्र को विश्वरन्धि नाम से जानना चाहिए।

श्लोक 33 (devibhagavatam.7.9.33)

चन्द्रस्तस्य सुतः श्रीमान् राजा वंशकरः स्मृतः । तत्सुतो युवनाश्वस्तु तेजस्वी बलवत्तरः

candrastasya sutaḥ śrīmān rājā vaṁśakaraḥ smṛtaḥ tatsuto yuvanāśvastu tejasvī balavattaraḥ

उनके श्रीमान् पुत्र चन्द्र राजा वंश-वर्धक माने जाते हैं; उनके पुत्र युवनाश्व तेजस्वी और अत्यंत बलवान थे।

श्लोक 34 (devibhagavatam.7.9.34)

शावन्तो युवनाश्वस्य जज्ञे परमधार्मिकः । शावन्ती निर्मिता तेन पुरी शक्रपुरीसमा

śāvanto yuvanāśvasya jajñe paramadhārmikaḥ śāvantī nirmitā tena purī śakrapurīsamā

युवनाश्व से परमधार्मिक शावन्त उत्पन्न हुए; उन्होंने इन्द्रपुरी के समान शावन्ती नगरी बनवाई।

श्लोक 35 (devibhagavatam.7.9.35)

बृहदश्वस्तु पुत्रोऽभूच्छावन्तस्य महात्मनः । कुवलयाश्वः सुतस्तस्य बभूव पृथिवीपतिः

bṛhadaśvastu putro'bhūcchāvantasya mahātmanaḥ kuvalayāśvaḥ sutastasya babhūva pṛthivīpatiḥ

उस महात्मा शावन्त के पुत्र बृहदश्व हुए; उनके पुत्र कुवलयाश्व पृथ्वी के स्वामी बने।

श्लोक 36 (devibhagavatam.7.9.36)

धुन्धुर्नामा हतो दैत्यस्तेनासौ पृथिवीतले । धुन्धुमारेति विख्यातं नाम प्रापातिविश्रुतम्

dhundhurnāmā hato daityastenāsau pṛthivītale dhundhumāreti vikhyātaṁ nāma prāpātiviśrutam

उनके द्वारा धुन्धु नामक दैत्य मारा गया, जिससे उन्हें पृथ्वी पर धुन्धुमार नाम से अत्यंत विख्यात प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

श्लोक 37 (devibhagavatam.7.9.37)

पुत्रस्तस्य दृढाश्वस्तु पालयामास मेदिनीम् । दृढाश्वस्य सुतः श्रीमान्हर्यश्व इति कीर्तितः

putrastasya dṛḍhāśvastu pālayāmāsa medinīm dṛḍhāśvasya sutaḥ śrīmānharyaśva iti kīrtitaḥ

उनका पुत्र दृढाश्व पृथ्वी का पालन करने लगे; दृढाश्व के श्रीमान् पुत्र हर्यश्व नाम से कीर्तित हुए।

श्लोक 38 (devibhagavatam.7.9.38)

निकुम्भस्तत्सुतः प्रोक्तो बभूव पृथिवीपतिः । बर्हणाश्वो निकुम्भस्य कुशाश्वस्तस्य वै सुतः

nikumbhastatsutaḥ prokto babhūva pṛthivīpatiḥ barhaṇāśvo nikumbhasya kuśāśvastasya vai sutaḥ

उनके पुत्र निकुम्भ पृथ्वी के स्वामी हुए; निकुम्भ के पुत्र बर्हणाश्व, और उनके पुत्र कुशाश्व हुए।

श्लोक 39 (devibhagavatam.7.9.39)

प्रसेनजित्कृशाश्वस्य बलवान्सत्यविक्रमः । तस्य पुत्रो महाभागो यौवनाश्वेति विश्रुतः

prasenajitkṛśāśvasya balavānsatyavikramaḥ tasya putro mahābhāgo yauvanāśveti viśrutaḥ

कुशाश्व के पुत्र प्रसेनजित बलवान और सत्यपराक्रमी थे; उनके महाभाग पुत्र यौवनाश्व नाम से विख्यात हुए।

श्लोक 40 (devibhagavatam.7.9.40)

यौवनाश्वसुतः श्रीमान्मान्धातेति महीपतिः । अष्टोत्तरसहस्रं तु प्रासादा येन निर्मिताः

yauvanāśvasutaḥ śrīmānmāndhāteti mahīpatiḥ aṣṭottarasahasraṁ tu prāsādā yena nirmitāḥ

यौवनाश्व के श्रीमान् पुत्र मान्धाता नामक भूपति हुए, जिन्होंने एक हजार आठ मन्दिर बनवाए —

श्लोक 41 (devibhagavatam.7.9.41)

भगवत्यास्तु तुष्ट्यर्थं महातीर्थेषु मानद । मातृगर्भे न जातोऽसावुत्पन्नो जनकोदरे

bhagavatyāstu tuṣṭyarthaṁ mahātīrtheṣu mānada mātṛgarbhe na jāto'sāvutpanno janakodare

— हे मानद! भगवती की प्रसन्नता के लिए महातीर्थों में। वे माता के गर्भ से नहीं जन्मे, पिता के उदर से उत्पन्न हुए।

श्लोक 42 (devibhagavatam.7.9.42)

निःसारितस्ततः पुत्रः कुक्षिं भित्त्वा पितुः पुनः । राजोवाच - न श्रुतं न च दृष्टं वा भवता तदुदाहृतम्

niḥsāritastataḥ putraḥ kukṣiṁ bhittvā pituḥ punaḥ rājovāca - na śrutaṁ na ca dṛṣṭaṁ vā bhavatā tadudāhṛtam

पुत्र को पिता की कुक्षि को भेदकर बाहर निकाला गया। राजा ने कहा — "आपने जो यह वर्णन किया, ऐसा न कभी सुना और न देखा।

श्लोक 43 (devibhagavatam.7.9.43)

असम्भाव्यं महाभाग तस्य जन्म यथोदितम् । विस्तरेण वदस्वाद्य मान्धातुर्जन्मकारणम्

asambhāvyaṁ mahābhāga tasya janma yathoditam vistareṇa vadasvādya māndhāturjanmakāraṇam

हे महाभाग! उनका यह जन्म-वृत्तान्त असम्भव-सा प्रतीत होता है। आज मुझे विस्तार से मान्धाता के जन्म का कारण बताइए —

श्लोक 44 (devibhagavatam.7.9.44)

राजोदरे यथोत्पन्नः पुत्रः सर्वाङ्गसुन्दरः । व्यास उवाच । यौवनाश्वोऽनपत्योऽभूद्राजा परमधार्मिकः

rājodare yathotpannaḥ putraḥ sarvāṅgasundaraḥ vyāsa uvāca yauvanāśvo'napatyo'bhūdrājā paramadhārmikaḥ

— कि राजा के उदर से सर्वांगसुन्दर पुत्र किस प्रकार उत्पन्न हुआ।" व्यास जी ने कहा — यौवनाश्व राजा, परमधार्मिक होते हुए भी, संतानहीन थे।

श्लोक 45 (devibhagavatam.7.9.45)

भार्याणां च शतं तस्य बभूव नृपतेर्नृप । राजा चिन्तापरः प्रायश्चिन्तयामास नित्यशः

bhāryāṇāṁ ca śataṁ tasya babhūva nṛpaternṛpa rājā cintāparaḥ prāyaścintayāmāsa nityaśaḥ

हे राजन्! उस राजा की सौ पत्नियाँ थीं। राजा सदा चिन्तापरायण होकर निरन्तर चिन्ता में डूबे रहते थे।

श्लोक 46 (devibhagavatam.7.9.46)

अपत्यार्थे यौवनाश्वो दुःखितस्तु वनं गतः । ऋषीणामाश्रमे पुण्ये निर्विण्णः स च पार्थिवः

apatyārthe yauvanāśvo duḥkhitastu vanaṁ gataḥ ṛṣīṇāmāśrame puṇye nirviṇṇaḥ sa ca pārthivaḥ

संतान के लिए दुःखी होकर यौवनाश्व वन को गए; वे उदास राजा ऋषियों के पावन आश्रम में पहुँचे।

श्लोक 47 (devibhagavatam.7.9.47)

मुमोच दुःखितः श्वासांस्तापसानां च पश्यताम् । दृष्ट्वा तु दुःखितं विप्रा बभूवुश्च कृपालवः

mumoca duḥkhitaḥ śvāsāṁstāpasānāṁ ca paśyatām dṛṣṭvā tu duḥkhitaṁ viprā babhūvuśca kṛpālavaḥ

तपस्वियों के देखते हुए वे दुःखी होकर लंबी साँसें छोड़ने लगे। उन्हें दुःखी देखकर विप्रगण दयालु हो उठे।

श्लोक 48 (devibhagavatam.7.9.48)

तमूचुर्ब्राह्मणा राजन्कस्माच्छोचसि पार्थिव । किं ते दुःखं महाराज ब्रूहि सत्यं मनोगतम्

tamūcurbrāhmaṇā rājankasmācchocasi pārthiva kiṁ te duḥkhaṁ mahārāja brūhi satyaṁ manogatam

ब्राह्मणों ने उनसे कहा — "हे राजन्! हे पार्थिव! आप क्यों शोक कर रहे हैं? हे महाराज! आपका दुःख क्या है? अपने मन की सच्ची बात कहिए।

श्लोक 49 (devibhagavatam.7.9.49)

प्रतीकारं करिष्यामो दुःखस्य तव सर्वथा । यौवनाश्व उवाच । राज्यं धनं सदश्वाश्च वर्तन्ते मुनयो मम

pratīkāraṁ kariṣyāmo duḥkhasya tava sarvathā yauvanāśva uvāca rājyaṁ dhanaṁ sadaśvāśca vartante munayo mama

हम आपके दुःख का सर्वथा प्रतिकार करेंगे।" यौवनाश्व ने कहा — "हे मुनियो! मेरे पास राज्य, धन तथा उत्तम अश्व सब कुछ है।

श्लोक 50 (devibhagavatam.7.9.50)

भार्याणां च शतं शुद्धं वर्तते विशदप्रभम् । नारातिस्त्रिषु लोकेषु कोऽप्यस्ति बलवान्मम

bhāryāṇāṁ ca śataṁ śuddhaṁ vartate viśadaprabham nārātistriṣu lokeṣu ko'pyasti balavānmama

मेरी सौ पत्नियाँ शुद्ध और उज्ज्वल कान्ति वाली हैं। तीनों लोकों में मेरा कोई बलवान शत्रु नहीं है।

श्लोक 51 (devibhagavatam.7.9.51)

आज्ञाकरास्तु सामन्ता वर्तन्ते मन्त्रिणस्तथा । एकं सन्तानजं दुःखं नान्यत्पश्यामि तापसाः

ājñākarāstu sāmantā vartante mantriṇastathā ekaṁ santānajaṁ duḥkhaṁ nānyatpaśyāmi tāpasāḥ

मेरे सामन्त और मंत्री सभी मेरी आज्ञा मानने वाले हैं। हे तपस्वियो! मुझे संतान का ही एक दुःख है, अन्य कोई नहीं दिखता।

श्लोक 52 (devibhagavatam.7.9.52)

अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च । तस्माच्छोचामि विप्रेन्द्राः सन्तानार्थं भृशं ततः

aputrasya gatirnāsti svargo naiva ca naiva ca tasmācchocāmi viprendrāḥ santānārthaṁ bhṛśaṁ tataḥ

पुत्रहीन की कोई गति नहीं होती, स्वर्ग बिल्कुल नहीं मिलता। इसलिए, हे विप्रेन्द्रो! मैं संतान के लिए अत्यंत शोक कर रहा हूँ।

श्लोक 53 (devibhagavatam.7.9.53)

वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञास्तापसाश्च कृतश्रमाः । इष्टिं सन्तानकामस्य युक्तां ज्ञात्वा दिशन्तु मे

vedaśāstrārthatattvajñāstāpasāśca kṛtaśramāḥ iṣṭiṁ santānakāmasya yuktāṁ jñātvā diśantu me

वेद-शास्त्रों के तत्त्वज्ञ, कठोर परिश्रम करने वाले तपस्वियो! संतान चाहने वाले के लिए उपयुक्त यज्ञ जानकर मुझे बताइए —

श्लोक 54 (devibhagavatam.7.9.54)

कुर्वन्तु मम कार्यं वै कृपा चेदस्ति तापसाः । व्यास उवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञः कृपया पूर्णमानसाः

kurvantu mama kāryaṁ vai kṛpā cedasti tāpasāḥ vyāsa uvāca tacchrutvā vacanaṁ rājñaḥ kṛpayā pūrṇamānasāḥ

— और यदि आपको दया है तो मेरा यह कार्य कर दीजिए, हे तपस्वियो!" व्यास जी ने कहा — राजा का यह वचन सुनकर दया से पूर्ण हृदय वाले वे मुनि —

श्लोक 55 (devibhagavatam.7.9.55)

कारयामासुरव्यग्रास्तस्येष्टिमिन्द्रदेवताम् । कलशः स्थापितस्तत्र जलपूर्णस्तु वाडवैः

kārayāmāsuravyagrāstasyeṣṭimindradevatām kalaśaḥ sthāpitastatra jalapūrṇastu vāḍavaiḥ

— बिना विचलित हुए उसके लिए इन्द्र-देवता को समर्पित यज्ञ करवाने लगे। वहाँ ब्राह्मणों द्वारा जल से भरा कलश स्थापित किया गया,

श्लोक 56 (devibhagavatam.7.9.56)

मन्त्रितो वेदमन्त्रैश्च पुत्रार्थं तस्य भूपतेः । राजा तद्यज्ञसदनं प्रविष्टस्तृषितो निशि

mantrito vedamantraiśca putrārthaṁ tasya bhūpateḥ rājā tadyajñasadanaṁ praviṣṭastṛṣito niśi

— वेदमन्त्रों से मन्त्रित, राजा को पुत्र-प्राप्ति के लिए। रात्रि में प्यासा राजा उस यज्ञशाला में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 57 (devibhagavatam.7.9.57)

विप्रान्दृष्ट्वा शयानान्स पपौ मन्त्रजलं स्वयम् । भार्यार्थं संस्कृतं विप्रैर्मन्त्रितं विधिनोद्धृतम्

viprāndṛṣṭvā śayānānsa papau mantrajalaṁ svayam bhāryārthaṁ saṁskṛtaṁ viprairmantritaṁ vidhinoddhṛtam

सोए हुए ब्राह्मणों को देखकर उसने स्वयं वह मंत्रित जल पी लिया, जो पत्नी के लिए ब्राह्मणों द्वारा संस्कारित और विधिपूर्वक तैयार किया गया था।

श्लोक 58 (devibhagavatam.7.9.58)

पीतं राज्ञा तृषार्तेन तदज्ञानान्नृपोत्तम । व्युदकं कलशं दृष्ट्वा तदा विप्रा विशङ्किताः

pītaṁ rājñā tṛṣārtena tadajñānānnṛpottama vyudakaṁ kalaśaṁ dṛṣṭvā tadā viprā viśaṅkitāḥ

हे नृपोत्तम! प्यास से व्याकुल राजा ने अनजाने में उसे पी लिया। जल-रहित कलश देखकर तब विप्रगण शंकित हो गए।

श्लोक 59 (devibhagavatam.7.9.59)

पप्रच्छुस्ते नृपं केन पीतं जलमिति द्विजाः । राज्ञा पीतं विदित्वा ते ज्ञात्वा दैवबलं महत्

papracchuste nṛpaṁ kena pītaṁ jalamiti dvijāḥ rājñā pītaṁ viditvā te jñātvā daivabalaṁ mahat

उन द्विजों ने राजा से पूछा — "यह जल किसने पिया?" राजा द्वारा पिया गया जानकर, और दैव के महान बल को समझकर —

श्लोक 60 (devibhagavatam.7.9.60)

इष्टिं समापयामासुर्गतास्ते मुनयो गृहान् । गर्भं दधार नृपतिस्ततो मन्त्रबलादथ

iṣṭiṁ samāpayāmāsurgatāste munayo gṛhān garbhaṁ dadhāra nṛpatistato mantrabalādatha

— उन्होंने यज्ञ पूर्ण कर दिया, और वे मुनि अपने-अपने घर लौट गए। फिर उस मंत्र के बल से राजा ने स्वयं गर्भ धारण किया।

श्लोक 61 (devibhagavatam.7.9.61)

ततः काले स उत्पन्नः कुक्षिं भित्त्वाऽस्य दक्षिणाम् । पुत्रं निष्कासमायासुर्मन्त्रिणस्तस्य भूपतेः

tataḥ kāle sa utpannaḥ kukṣiṁ bhittvā'sya dakṣiṇām putraṁ niṣkāsamāyāsurmantriṇastasya bhūpateḥ

फिर समय आने पर वह बालक राजा की दाहिनी कुक्षि को भेदकर उत्पन्न हुआ; राजा के मंत्रियों ने उस पुत्र को बाहर निकाला।

श्लोक 62 (devibhagavatam.7.9.62)

देवानां कृपया तत्र न ममार महीपतिः । कं धास्यति कुमारोऽयं मन्त्रिणश्चुक्रुशुर्भृशम्

devānāṁ kṛpayā tatra na mamāra mahīpatiḥ kaṁ dhāsyati kumāro'yaṁ mantriṇaścukruśurbhṛśam

देवताओं की कृपा से राजा वहाँ नहीं मरे। "यह कुमार किसका दूध पिएगा?" — मंत्री बहुत चिल्ला उठे।

श्लोक 63 (devibhagavatam.7.9.63)

तदेन्द्रो देशिनीं प्रादान्मां धातेत्यवदद्वचः । सोऽभवद्बलवान् राजा मान्धाता पृथिवीपतिः । तदुत्पत्तिस्तु भूपाल कथिता तव विस्तरात्

tadendro deśinīṁ prādānmāṁ dhātetyavadadvacaḥ so'bhavadbalavān rājā māndhātā pṛthivīpatiḥ tadutpattistu bhūpāla kathitā tava vistarāt

तब इन्द्र ने अपनी तर्जनी उँगली देते हुए कहा — "मां धाता" (मुझे चूसे) — और वे बलवान राजा मान्धाता, पृथ्वीपति बने। हे भूपाल! इस प्रकार उनकी उत्पत्ति आपको विस्तार से बताई गई।

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