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अष्टम स्कन्ध · अध्याय 14

सूर्य की गति

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (devibhagavatam.8.14.1)

नारायण उवाच । ततः परस्तादचलो लोकालोकेति नामकः । अन्तराले च लोकालोकयोर्यः परिकल्पितः

nārāyaṇa uvāca | tataḥ parastādacalo lokāloketi nāmakaḥ | antarāle ca lokālokayoryaḥ parikalpitaḥ

नारायण ने कहा — उससे परे लोकालोक नामक एक अचल पर्वत है, जो लोक और अलोक के मध्य में स्थित माना गया है।

श्लोक 2 (devibhagavatam.8.14.2)

यावदस्ति च देवर्षे ह्यन्तरं मानसोत्तरात् । सुमेरोस्तावती शुद्धा काञ्चनी भूमिरस्ति हि

yāvadasti ca devarṣe hyantaraṁ mānasottarāt | sumerostāvatī śuddhā kāñcanī bhūmirasti hi

हे देवर्षे! मानसोत्तर से जितना अन्तर है, सुमेरु से भी उतना ही शुद्ध स्वर्णमय भूमि है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.8.14.3)

दर्पणोदरतुल्या सा सर्वप्राणिविवर्जिता । यस्यां पदार्थः प्रहितो न किञ्चित्प्रत्युदीयते

darpaṇodaratulyā sā sarvaprāṇivivarjitā | yasyāṁ padārthaḥ prahito na kiñcitpratyudīyate

वह भूमि दर्पण की सतह के समान है, समस्त प्राणियों से रहित; उस पर जो भी वस्तु फेंकी जाए, वह कुछ भी प्रतिबिम्बित होकर वापस नहीं आती।

श्लोक 4 (devibhagavatam.8.14.4)

अतः सर्वप्राणिसङ्घरहिता सा च नारद । लोकालोक इति व्याख्या यदत्र परिकल्पिता

ataḥ sarvaprāṇisaṅgharahitā sā ca nārada | lokāloka iti vyākhyā yadatra parikalpitā

इसलिए हे नारद! समस्त प्राणि-समूहों से रहित होने के कारण, यहाँ इसकी 'लोकालोक' यह व्याख्या की गयी है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.8.14.5)

लोकालोकान्तरे चास्य वर्तते सर्वदा स्थितिः । ईश्वरेण स लोकानां त्रयाणामन्तगः कृतः

lokālokāntare cāsya vartate sarvadā sthitiḥ | īśvareṇa sa lokānāṁ trayāṇāmantagaḥ kṛtaḥ

लोकालोक के मध्य में ही इसकी स्थिति सदैव बनी रहती है। ईश्वर ने इसे तीनों लोकों की सीमा बनाया है।

श्लोक 6 (devibhagavatam.8.14.6)

सूर्यादीनां ध्रुवान्तानां रश्मयो यद्वशादिह । अर्वाचीनाश्च त्रीँल्लोकानातन्वानाः कदापि हि

sūryādīnāṁ dhruvāntānāṁ raśmayo yadvaśādiha | arvācīnāśca trī~llokānātanvānāḥ kadāpi hi

जिसके प्रभाव से सूर्य से लेकर ध्रुव तक की किरणें यहाँ भीतर की ओर ही तीनों लोकों को व्याप्त करती हैं, और कभी भी —

श्लोक 7 (devibhagavatam.8.14.7)

पराचीनत्वभाजो हि न भवन्ति च नारद । तावदुन्नहनायामः पर्वतेन्द्रो महोदयः

parācīnatvabhājo hi na bhavanti ca nārada | tāvadunnahanāyāmaḥ parvatendro mahodayaḥ

— बाहर की ओर विस्तृत होती हैं, हे नारद! वह महान् और अत्यन्त उन्नत पर्वतराज ऊँचाई और विस्तार में समान है,

श्लोक 8 (devibhagavatam.8.14.8)

एतावाँल्लोकविन्यासोऽयं संस्थामानलक्षणैः । कविभिः स तु पञ्चाशत्कोटिभिर्गणितस्य च

etāvā~llokavinyāso'yaṁ saṁsthāmānalakṣaṇaiḥ | kavibhiḥ sa tu pañcāśatkoṭibhirgaṇitasya ca

— और लोकों की यह सम्पूर्ण रचना, अपने माप और लक्षणों सहित, विद्वानों (कवियों) द्वारा पचास करोड़ योजन के रूप में गिनी गयी है,

श्लोक 9 (devibhagavatam.8.14.9)

भूगोलस्य चतुर्थांशो लोकालोकाचलो मुने । तस्योपरि चतुर्दिक्षु ब्रह्मणा चात्मयोनिना

bhūgolasya caturthāṁśo lokālokācalo mune | tasyopari caturdikṣu brahmaṇā cātmayoninā

— जिसमें से लोकालोक पर्वत, हे मुने! भूगोल के चौथे भाग के बराबर है। उसके ऊपर चारों दिशाओं में स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा —

श्लोक 10 (devibhagavatam.8.14.10)

निवेशिता दिग्गजा ये तन्नामानि निबोधत । ऋषभः पुष्पचूडोऽथ वामनोऽथापराजितः

niveśitā diggajā ye tannāmāni nibodhata | ṛṣabhaḥ puṣpacūḍo'tha vāmano'thāparājitaḥ

— दिग्गज स्थापित किये गये हैं; उनके नाम सुनो — ऋषभ, पुष्पचूड, वामन तथा अपराजित।

श्लोक 11 (devibhagavatam.8.14.11)

एते समस्तलोकस्य स्थितिहेतव ईरिताः । तेषां च स्वविभूतीनां बहुवीर्योपबृंहणम्

ete samastalokasya sthitihetava īritāḥ | teṣāṁ ca svavibhūtīnāṁ bahuvīryopabṛṁhaṇam

ये समस्त लोक की स्थिरता के कारण कहे गये हैं। तथा उनकी अपनी विभूतियों (पत्नियों) के महान् वीर्य की वृद्धि —

श्लोक 12 (devibhagavatam.8.14.12)

विशुद्धसत्त्वं चैश्वर्यं वर्धयन्भगवान् हरिः । आस्ते सिद्ध्यष्टकोपेतो विष्वक्सेनादिसंवृतः

viśuddhasattvaṁ caiśvaryaṁ vardhayanbhagavān hariḥ | āste siddhyaṣṭakopeto viṣvaksenādisaṁvṛtaḥ

— जिनकी सत्त्वशुद्धि और ऐश्वर्य को बढ़ाते हुए भगवान् हरि, अष्ट सिद्धियों से युक्त, विष्वक्सेन आदि से घिरे हुए, वहाँ विराजमान हैं।

श्लोक 13 (devibhagavatam.8.14.13)

निजायुधैः परिवृतो भुजदण्डैः समन्ततः । आस्ते सकललोकस्य स्वस्तये परमेश्वरः

nijāyudhaiḥ parivṛto bhujadaṇḍaiḥ samantataḥ | āste sakalalokasya svastaye parameśvaraḥ

अपने आयुधों से युक्त भुजदण्डों द्वारा चारों ओर से घिरे हुए, वह परमेश्वर समस्त लोक के कल्याण के लिए वहाँ विराजमान हैं।

श्लोक 14 (devibhagavatam.8.14.14)

आकल्पमेवं वेषं स गतो विष्णुः सनातनः । स्वमायारचितस्यास्य गोपीथायात्मसाधनः

ākalpamevaṁ veṣaṁ sa gato viṣṇuḥ sanātanaḥ | svamāyāracitasyāsya gopīthāyātmasādhanaḥ

इस प्रकार इस वेष में सनातन विष्णु कल्प के अन्त तक स्थित रहते हैं, अपनी माया से रचे गये इस जगत् की रक्षा के साधनस्वरूप।

श्लोक 15 (devibhagavatam.8.14.15)

योऽन्तर्विस्तार एतेन ह्यलोकपरिमाणकम् । व्याख्यातं यद्बहिर्लोकालोकाचल इतीरणात्

yo'ntarvistāra etena hyalokaparimāṇakam | vyākhyātaṁ yadbahirlokālokācala itīraṇāt

इस प्रकार आन्तरिक विस्तार का वर्णन किया गया, तथा जो इसके बाहर 'अलोक' है, इसी कारण इसे लोकालोकाचल कहा गया है।

श्लोक 16 (devibhagavatam.8.14.16)

ततः परस्ताद्योगेशगतिं शुद्धा वदन्ति हि । अण्डमध्यगतः सूर्यो द्यावाभूम्योर्यदन्तरम्

tataḥ parastādyogeśagatiṁ śuddhā vadanti hi | aṇḍamadhyagataḥ sūryo dyāvābhūmyoryadantaram

उससे परे शुद्ध ज्ञानी पुरुष योगेश्वर की गति का वर्णन करते हैं। ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित सूर्य द्युलोक और पृथ्वी के मध्य जो अन्तर है,

श्लोक 17 (devibhagavatam.8.14.17)

सूर्याण्डगोलयोर्मध्ये कोट्यः स्युः पञ्चविंशतिः । मृतेऽण्ड एष एतस्मिञ्जातो मार्तण्डशब्दभाक्

sūryāṇḍagolayormadhye koṭyaḥ syuḥ pañcaviṁśatiḥ | mṛte'ṇḍa eṣa etasmiñjāto mārtaṇḍaśabdabhāk

सूर्य और ब्रह्माण्ड-गोल के मध्य पच्चीस करोड़ योजन हैं। चूँकि यह मृत अण्ड से उत्पन्न हुआ, इसलिए यह 'मार्तण्ड' नाम धारण करता है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.8.14.18)

हिरण्यगर्भ इति यद्धिरण्याण्डसमुद्भवः । सूर्येण हि विभज्यन्ते दिशः खं द्यौर्महीभिदा

hiraṇyagarbha iti yaddhiraṇyāṇḍasamudbhavaḥ | sūryeṇa hi vibhajyante diśaḥ khaṁ dyaurmahībhidā

वह 'हिरण्यगर्भ' भी कहलाता है क्योंकि यह हिरण्मय अण्ड से उत्पन्न हुआ। सूर्य के द्वारा ही दिशाएँ, आकाश, द्युलोक और पृथ्वी-विभाग —

श्लोक 19 (devibhagavatam.8.14.19)

स्वर्गापवर्गौ नरका रसौकांसि च सर्वशः । देवतिर्यङ्मनुष्याणां सरीसृपसवीरुधाम्

svargāpavargau narakā rasaukāṁsi ca sarvaśaḥ | devatiryaṅmanuṣyāṇāṁ sarīsṛpasavīrudhām

— स्वर्ग, अपवर्ग (मोक्ष), नरक तथा रसातल-निवास — सभी विभाजित होते हैं। देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य, सरीसृप और वनस्पतियों के —

श्लोक 20 (devibhagavatam.8.14.20)

सर्वजीवनिकायानां सूर्य आत्मा दृगीश्वरः । एतावान्भूमण्डलस्य सन्निवेश उदाहृतः

sarvajīvanikāyānāṁ sūrya ātmā dṛgīśvaraḥ | etāvānbhūmaṇḍalasya sanniveśa udāhṛtaḥ

— तथा समस्त प्राणि-समूहों की आत्मा और दृष्टि के अधीश्वर सूर्य ही हैं। इतना ही भूमण्डल की संरचना का वर्णन कहा गया है।

श्लोक 21 (devibhagavatam.8.14.21)

एतेन हि दिवो मानं वर्णयन्ति च तद्विदः । द्विदलानां च निष्पावादीनां च दलयोर्यथा

etena hi divo mānaṁ varṇayanti ca tadvidaḥ | dvidalānāṁ ca niṣpāvādīnāṁ ca dalayoryathā

इसी से इसके ज्ञाता द्युलोक का मान वर्णन करते हैं — जैसे निष्पाव आदि द्विदल फली के दोनों दलों के मध्य —

श्लोक 22 (devibhagavatam.8.14.22)

अन्तरेण तयोरन्तरिक्षं तदुभयसन्धितम् । यन्मध्यगश्च भगवान् भानुर्वै तपतां वरः

antareṇa tayorantarikṣaṁ tadubhayasandhitam | yanmadhyagaśca bhagavān bhānurvai tapatāṁ varaḥ

— एक अन्तर होता है, वैसे ही उन दोनों (द्यावापृथ्वी) के बीच सन्धिस्थल अन्तरिक्ष है, जिसके मध्य में तपने वालों में श्रेष्ठ भगवान् सूर्य स्थित हैं,

श्लोक 23 (devibhagavatam.8.14.23)

आतपेन त्रिलोकं च प्रतपत्येव भासयन् । उत्तरायणमासाद्य गतिमान्द्यं वितन्वते

ātapena trilokaṁ ca pratapatyeva bhāsayan | uttarāyaṇamāsādya gatimāndyaṁ vitanvate

— जो अपने आतप से तीनों लोकों को तपाते और प्रकाशित करते हैं। उत्तरायण को प्राप्त होकर वे गति में मन्दता धारण करते हैं,

श्लोक 24 (devibhagavatam.8.14.24)

आरोहणस्थानमसौ गत्वाहो दैर्ध्यमाचरेत् । दक्षिणायनमासाद्य गतिशैघ्र्यं वितन्वते

ārohaṇasthānamasau gatvāho dairdhyamācaret | dakṣiṇāyanamāsādya gatiśaighryaṁ vitanvate

— तथा आरोहण-स्थान को प्राप्त होकर दिन की दीर्घता करते हैं। दक्षिणायन को प्राप्त होकर वे गति में शीघ्रता धारण करते हैं,

श्लोक 25 (devibhagavatam.8.14.25)

अवरोहस्थानमसौ गच्छन्ह्रस्वं दिनं चरेत् । विषुवत्संज्ञमासाद्य गतिसाम्यं वितन्वते

avarohasthānamasau gacchanhrasvaṁ dinaṁ caret | viṣuvatsaṁjñamāsādya gatisāmyaṁ vitanvate

— तथा अवरोहण-स्थान को जाते हुए दिन को ह्रस्व करते हैं। विषुवत् नामक स्थान को प्राप्त होकर वे गति में समता धारण करते हैं,

श्लोक 26 (devibhagavatam.8.14.26)

समस्थानमथासाद्य दिनसाम्यं करोति च । यदा च मेषतुलयोः सञ्चरेद्धि दिवाकरः

samasthānamathāsādya dinasāmyaṁ karoti ca | yadā ca meṣatulayoḥ sañcareddhi divākaraḥ

— तथा समस्थान को प्राप्त होकर दिन-रात्रि की समानता करते हैं। और जब दिवाकर मेष और तुला राशियों में संचरण करते हैं,

श्लोक 27 (devibhagavatam.8.14.27)

समानानि त्वहोरात्राण्यातनोति त्रयीमयः । वृषादिपञ्चसु यदा राशिष्वर्को विरोचते

samānāni tvahorātrāṇyātanoti trayīmayaḥ | vṛṣādipañcasu yadā rāśiṣvarko virocate

— तब वेदत्रयीमय सूर्य समान दिन-रात्रि का विस्तार करते हैं। जब सूर्य वृषभ आदि पाँच राशियों में विराजमान होते हैं,

श्लोक 28 (devibhagavatam.8.14.28)

तदाहानि च वर्धन्ते रात्रयोऽपि ह्रसन्ति च । वृश्चिकादिषु सूर्यो हि यदा सञ्चरते रविः

tadāhāni ca vardhante rātrayo'pi hrasanti ca | vṛścikādiṣu sūryo hi yadā sañcarate raviḥ

— तब दिन बढ़ते हैं और रात्रियाँ भी घटती हैं। और जब सूर्य वृश्चिक आदि राशियों में संचरण करते हैं,

श्लोक 29 (devibhagavatam.8.14.29)

तदापीमान्यहोरात्राणि भवन्ति विपर्ययात्

tadāpīmānyahorātrāṇi bhavanti viparyayāt

— तब ये दिन-रात्रियाँ विपरीत क्रम से होने लगती हैं, अर्थात् रातें बढ़ने लगती हैं और दिन घटने लगते हैं।

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