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अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23

शेष नरक

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (devibhagavatam.8.23.1)

श्रीनारायण उवाच । ये नराः सर्वदा साक्ष्ये अनृतं भाषयन्ति च । दाने विनिमयेऽर्थस्य देवर्षे पापबुद्धयः

śrīnārāyaṇa uvāca | ye narāḥ sarvadā sākṣye anṛtaṁ bhāṣayanti ca | dāne vinimaye'rthasya devarṣe pāpabuddhayaḥ

श्रीनारायण ने कहा — हे देवर्षे! जो मनुष्य साक्ष्य में, दान में, तथा धन के लेन-देन में सदैव असत्य भाषण करते हैं, ऐसी पापबुद्धि वाले,

श्लोक 2 (devibhagavatam.8.23.2)

ते प्रेत्यामुत्र नरके अवीच्याख्येऽतिदारुणे । योजनानां शतोच्छ्रायाद्गिरिमूर्ध्नः पतन्ति हि

te pretyāmutra narake avīcyākhye'tidāruṇe | yojanānāṁ śatocchrāyādgirimūrdhnaḥ patanti hi

— वे मृत्यु के बाद परलोक में अवीचि नामक अत्यन्त भयंकर नरक में, सौ योजन ऊँचे पर्वत के शिखर से गिरते हैं,

श्लोक 3 (devibhagavatam.8.23.3)

अनाकाशेऽधःशिरसस्तदवीचीतिनामके । यत्र स्थलं दृश्यते च जलवद्वीचिसंयुतम्

anākāśe'dhaḥśirasastadavīcītināmake | yatra sthalaṁ dṛśyate ca jalavadvīcisaṁyutam

— उस अवीचि नामक स्थान में, जो आकाशरहित है, सिर के बल गिरते हैं, जहाँ स्थल भी जल के समान लहरों से युक्त दिखायी देता है,

श्लोक 4 (devibhagavatam.8.23.4)

अवीचिमत्ततस्तत्र तिलशश्छिन्नविग्रहः । म्रियते नैव देवर्षे पुनरेवाऽवरोप्यते

avīcimattatastatra tilaśaśchinnavigrahaḥ | mriyate naiva devarṣe punarevā'varopyate

— इसीलिए यह अवीचि कहलाता है; वहाँ उसका शरीर तिल-तिल कर छिन्न-भिन्न हो जाता है, फिर भी, हे देवर्षे! वह मरता नहीं, बल्कि बार-बार वहीं गिराया जाता है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.8.23.5)

यो वा द्विजो वा राजन्यो वैश्यो वा ब्रह्मसम्भव । सोमपीथस्तत्कलत्रं सुरां वा पिबतीव हि

yo vā dvijo vā rājanyo vaiśyo vā brahmasambhava | somapīthastatkalatraṁ surāṁ vā pibatīva hi

हे ब्रह्मसम्भव! चाहे द्विज हो, चाहे क्षत्रिय, चाहे वैश्य — जो सोमपान का अधिकारी होकर, या उसकी पत्नी, यदि सुरापान करता है,

श्लोक 6 (devibhagavatam.8.23.6)

प्रमादतस्तु तेषां वै निरये परिपातनम् । कुर्वन्ति यमदूतास्ते पानं कार्ष्णायसो मुने

pramādatastu teṣāṁ vai niraye paripātanam | kurvanti yamadūtāste pānaṁ kārṣṇāyaso mune

— तो प्रमादवश उन्हें यमदूत नरक में गिरा देते हैं, हे मुने! जहाँ वे तपाये हुए लौह का पान कराये जाते हैं,

श्लोक 7 (devibhagavatam.8.23.7)

वह्निना द्रवमाणस्य नितरां ब्रह्मसम्भव । सम्भावनेन स्वस्यैव योऽधमोऽपि नराधमः

vahninā dravamāṇasya nitarāṁ brahmasambhava | sambhāvanena svasyaiva yo'dhamo'pi narādhamaḥ

— जो अग्नि से अत्यन्त पिघलाया गया है, हे ब्रह्मसम्भव! जो स्वयं अधम होते हुए भी, अपने ही अभिमान के कारण,

श्लोक 8 (devibhagavatam.8.23.8)

विद्याजन्मतपोवर्णाश्रमाचारवतो नरान् । वरीयसोऽपि न बहु मन्यते पुरुषाधमः

vidyājanmatapovarṇāśramācāravato narān | varīyaso'pi na bahu manyate puruṣādhamaḥ

— विद्या, जन्म, तप, वर्ण, आश्रम तथा आचार से श्रेष्ठ पुरुषों को भी अधिक महत्त्व नहीं देता, वह नराधम,

श्लोक 9 (devibhagavatam.8.23.9)

स नीयते यमभटैः क्षारकर्दमनामके । निरयेऽर्वाक्शिरा घोरा दुरन्तयातनाश्नुते

sa nīyate yamabhaṭaiḥ kṣārakardamanāmake | niraye'rvākśirā ghorā durantayātanāśnute

— उसे यमभट सिर के बल क्षारकर्दम नामक नरक में ले जाते हैं, और वहाँ वह घोर, अन्तहीन यातना भोगता है।

श्लोक 10 (devibhagavatam.8.23.10)

ये वै नरा यजन्त्यन्यं नरमेधेन मोहिताः । स्त्रियोऽपि वा नरपशुं खादन्त्यत्र महामुने

ye vai narā yajantyanyaṁ naramedhena mohitāḥ | striyo'pi vā narapaśuṁ khādantyatra mahāmune

हे महामुने! जो मनुष्य मोहवश नरमेध द्वारा किसी अन्य का यज्ञ करते हैं, अथवा स्त्रियाँ भी यहाँ मनुष्य को पशु मानकर उसका मांस खाती हैं,

श्लोक 11 (devibhagavatam.8.23.11)

पशवो निहितास्ते तु यमसद्यनि सङ्गताः । सौनिका इव ते सर्वे विदार्य शितधारया

paśavo nihitāste tu yamasadyani saṅgatāḥ | saunikā iva te sarve vidārya śitadhārayā

— वे स्वयं पशु बनकर, यमराज के वधशाला में एकत्रित किये जाते हैं। कसाइयों के समान वे सभी यमदूत तीक्ष्ण धार से चीरकर,

श्लोक 12 (devibhagavatam.8.23.12)

असृक्पिबन्ति नृत्यन्ति गायन्ति बहुधा मुने । यथेह मांसभोक्तारः पुरुषादा दुरासदाः

asṛkpibanti nṛtyanti gāyanti bahudhā mune | yatheha māṁsabhoktāraḥ puruṣādā durāsadāḥ

— रक्त पीते हैं, नाचते हैं, तथा विविध प्रकार से गाते हैं, हे मुने! जैसे यहाँ भयंकर नरभक्षी मांसभोजी करते थे।

श्लोक 13 (devibhagavatam.8.23.13)

अनागसोऽपि येऽरण्ये ग्रामे वा ब्रह्मपुत्रक । वैश्रम्भकैरुपसृतान्विश्रम्भय्यजिजीविषून्

anāgaso'pi ye'raṇye grāme vā brahmaputraka | vaiśrambhakairupasṛtānviśrambhayyajijīviṣūn

हे ब्रह्मपुत्र! जो लोग वन में या ग्राम में, निर्दोष प्राणियों को, आश्वासनपूर्ण वचनों से पास बुलाकर, उन्हें निर्भय करके, जो जीवित रहना चाहते हैं,

श्लोक 14 (devibhagavatam.8.23.14)

शूलसूत्रादिषु प्रोतान्क्रीडनोत्कारकानिव । पातयन्ति च ते प्रेत्य शूलपाते पतन्ति ह

śūlasūtrādiṣu protānkrīḍanotkārakāniva | pātayanti ca te pretya śūlapāte patanti ha

— उन्हें शूल, फन्दे आदि से बींधकर, मानो क्रीड़ा में, गिरा देते हैं — वे मनुष्य मृत्यु के बाद शूलपात नामक नरक में गिरते हैं।

श्लोक 15 (devibhagavatam.8.23.15)

शूलादिषु प्रोतदेहाः क्षुत्तृड्भ्यां चातिपीडिताः । तिग्मतुण्डैः कङ्कबकैरितश्चेतश्च ताडिताः

śūlādiṣu protadehāḥ kṣuttṛḍbhyāṁ cātipīḍitāḥ | tigmatuṇḍaiḥ kaṅkabakairitaścetaśca tāḍitāḥ

शूल आदि पर बिंधे हुए शरीर वाले, भूख-प्यास से अत्यन्त पीड़ित, तीक्ष्ण चोंच वाले बगुलों और बकों द्वारा इधर-उधर ताड़ित होते हुए,

श्लोक 16 (devibhagavatam.8.23.16)

पीडिता आत्मशमलं बहुधा संस्मरन्ति हि । ये भूतानुद्वेजयन्ति नरा उल्बणवृत्तयः

pīḍitā ātmaśamalaṁ bahudhā saṁsmaranti hi | ye bhūtānudvejayanti narā ulbaṇavṛttayaḥ

— इस प्रकार पीड़ित होकर वे बार-बार अपने ही पाप का स्मरण करते हैं। जो मनुष्य क्रूर स्वभाव वाले प्राणियों को उद्विग्न करते हैं,

श्लोक 17 (devibhagavatam.8.23.17)

यथा सर्पादिकास्तेऽपि नरके निपतन्ति हि । दन्दशूकाभिधाने च यत्रोत्तिष्ठन्ति सर्वतः

yathā sarpādikāste'pi narake nipatanti hi | dandaśūkābhidhāne ca yatrottiṣṭhanti sarvataḥ

— जैसे सर्प आदि करते हैं, वे भी दन्दशूक नामक नरक में गिरते हैं, जहाँ चारों ओर से सर्पादि जीव उठ खड़े होते हैं,

श्लोक 18 (devibhagavatam.8.23.18)

पञ्चाननः सप्तमुखा ग्रसन्ति नरकागतान् । यथा बिलेशया विप्र क्रूरबुद्धिसमन्विताः

pañcānanaḥ saptamukhā grasanti narakāgatān | yathā bileśayā vipra krūrabuddhisamanvitāḥ

— पाँच फणों वाले, सात मुख वाले सर्प, हे विप्र! क्रूरबुद्धि से युक्त होकर, नरक में आये हुए उन प्राणियों को उसी प्रकार निगल जाते हैं जैसे बिल में रहने वाले सर्प निगलते हैं।

श्लोक 19 (devibhagavatam.8.23.19)

येऽवटेषु कुसूलादिगुहादिषु निरुन्धते । तानमुत्रोद्यतकराः कीनाशपरिसेवकाः

ye'vaṭeṣu kusūlādiguhādiṣu nirundhate | tānamutrodyatakarāḥ kīnāśaparisevakāḥ

जो लोग गड्ढों, कोठियों, गुफाओं आदि में प्राणियों को बन्द कर देते हैं, उन्हें परलोक में यम के सेवक, हाथ उठाकर,

श्लोक 20 (devibhagavatam.8.23.20)

तेष्वेवोपविशित्वा च सगरेण च वह्निना । धूमेन च निरुन्धन्ति पापकर्मरतान्नरान्

teṣvevopaviśitvā ca sagareṇa ca vahninā | dhūmena ca nirundhanti pāpakarmaratānnarān

— उन्हीं गड्ढों आदि में बिठाकर, विष, अग्नि तथा धुएँ से, उन पाप-कर्मरत मनुष्यों को घेर देते हैं।

श्लोक 21 (devibhagavatam.8.23.21)

योऽतिथीन्समयप्राप्तान्दिधक्षुरिव चक्षुषा । पापेनेहालोकयेच्च स्वयं गृहपतिर्द्विजः

yo'tithīnsamayaprāptāndidhakṣuriva cakṣuṣā | pāpenehālokayecca svayaṁ gṛhapatirdvijaḥ

जो द्विज गृहस्थ, समय पर आये हुए अतिथियों को, मानो जलाने की इच्छा से, पापपूर्ण दृष्टि से देखता है,

श्लोक 22 (devibhagavatam.8.23.22)

तस्यापि पापदृष्टेर्हि निरये यमकिङ्कराः । अक्षिणी वज्रतुण्डा ये कङ्काः काकवटादयः

tasyāpi pāpadṛṣṭerhi niraye yamakiṅkarāḥ | akṣiṇī vajratuṇḍā ye kaṅkāḥ kākavaṭādayaḥ

— उस पापदृष्टि वाले व्यक्ति की भी आँखों को, नरक में, यमकिंकर, जो वज्र-तुण्ड वाले बगुले, कौए, गिद्ध आदि हैं,

श्लोक 23 (devibhagavatam.8.23.23)

गृध्राः क्रूरतराश्चापि प्रसह्योत्पाटयन्ति हि । य आढ्याभिमतिर्याति अहङ्कृत्यातिगर्वितः

gṛdhrāḥ krūratarāścāpi prasahyotpāṭayanti hi | ya āḍhyābhimatiryāti ahaṅkṛtyātigarvitaḥ

— तथा उससे भी अधिक क्रूर गिद्ध, बलपूर्वक उखाड़ लेते हैं। जो व्यक्ति धनाढ्य होने के अभिमान में, अहंकार से अत्यन्त गर्वित होकर चलता है,

श्लोक 24 (devibhagavatam.8.23.24)

तिर्यक्प्रेक्षण एवात्राभिविशङ्की नराधमः । चिन्तयार्थस्य सर्वत्रायतिव्ययस्वरूपया

tiryakprekṣaṇa evātrābhiviśaṅkī narādhamaḥ | cintayārthasya sarvatrāyativyayasvarūpayā

— तिरछी दृष्टि से देखने वाला, सर्वदा आशंकित रहने वाला वह नराधम, अपने धन की भविष्य में वृद्धि और व्यय की चिन्ता में सर्वत्र ग्रस्त रहता है,

श्लोक 25 (devibhagavatam.8.23.25)

शुष्यद्धृदयवक्त्रश्च निर्वृतिं नैव गच्छति । ग्रहवद्रक्षते चार्थं स प्रेतो यमकिङ्करैः

śuṣyaddhṛdayavaktraśca nirvṛtiṁ naiva gacchati | grahavadrakṣate cārthaṁ sa preto yamakiṅkaraiḥ

— उसका हृदय और मुख सूखता रहता है, वह कभी शान्ति नहीं पाता; ग्रह के समान अपने धन की रक्षा करता है — वह मृत्यु के बाद यमदूतों द्वारा,

श्लोक 26 (devibhagavatam.8.23.26)

सूचीमुखे च नरके पात्यते निजकर्मणा । वित्तग्रहं च पुरुषं वायका इव याम्यकाः

sūcīmukhe ca narake pātyate nijakarmaṇā | vittagrahaṁ ca puruṣaṁ vāyakā iva yāmyakāḥ

— अपने ही कर्मों से सूचीमुख नामक नरक में गिराया जाता है; तथा उस धन-ग्रस्त पुरुष को यमदूत, बुनकरों के समान,

श्लोक 27 (devibhagavatam.8.23.27)

किङ्कराः सर्वतोऽङ्गेषु सूत्रैः परिवयन्ति हि । एते बहुविधा विप्र नरकाः पापकर्मणाम्

kiṅkarāḥ sarvato'ṅgeṣu sūtraiḥ parivayanti hi | ete bahuvidhā vipra narakāḥ pāpakarmaṇām

— उसके अंगों को चारों ओर से सूत्रों से बुन देते हैं। हे विप्र! ये विविध प्रकार के नरक पाप-कर्म करने वालों के लिए हैं,

श्लोक 28 (devibhagavatam.8.23.28)

नराणां शतशः सन्ति यातनास्थानभूमयः । सहस्रशोऽपि देवर्षे उक्तानुक्तांस्तथापि हि

narāṇāṁ śataśaḥ santi yātanāsthānabhūmayaḥ | sahasraśo'pi devarṣe uktānuktāṁstathāpi hi

— मनुष्यों के लिए सैकड़ों की संख्या में यातना-स्थान की भूमियाँ हैं। हे देवर्षे! सहस्रों की संख्या में भी, कहे गये और न कहे गये,

श्लोक 29 (devibhagavatam.8.23.29)

विशन्ति नरकानेतान्यातनाबहुलान्मुने । तथा धर्मपराश्चापि लोकान्यान्ति सुखोद्गतान्

viśanti narakānetānyātanābahulānmune | tathā dharmaparāścāpi lokānyānti sukhodgatān

— इन बहुविध यातनाओं से युक्त नरकों में प्राणी प्रवेश करते हैं, हे मुने! तथा उसी प्रकार धर्मपरायण लोग सुखमय लोकों को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 30 (devibhagavatam.8.23.30)

स्वधर्मो बहुधा गीतो यथा तव महामुने । देवीपूजनरूपो हि देव्याराधनलक्षणः

svadharmo bahudhā gīto yathā tava mahāmune | devīpūjanarūpo hi devyārādhanalakṣaṇaḥ

हे महामुने! तुम्हारे लिए स्वधर्म का अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है — तथापि वह विशेष रूप, जो देवी-पूजा का स्वरूप है, देव्याराधना जिसका लक्षण है,

श्लोक 31 (devibhagavatam.8.23.31)

येनानुष्ठितमात्रेण नरो न नरकं व्रजेत् । सा देवी भवपाथोधेरुद्धर्त्री पूजिता नृणाम्

yenānuṣṭhitamātreṇa naro na narakaṁ vrajet | sā devī bhavapāthodheruddhartrī pūjitā nṛṇām

— जिसका मात्र अनुष्ठान करने से मनुष्य नरक को प्राप्त नहीं होता। वह देवी, मनुष्यों द्वारा पूजित होकर, संसार-सागर से उद्धार करने वाली हैं।

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