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नवम स्कन्ध · अध्याय 13

गंगा उपाख्यान वर्णन (तृतीय)

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (devibhagavatam.9.13.1)

नारद उवाच । कलेः पञ्चसहस्राब्दे समतीते सुरेश्वर । क्व गता सा महाभाग तन्मे व्याख्यातुमर्हसि

nārada uvāca | kaleḥ pañcasahasrābde samatīte sureśvara | kva gatā sā mahābhāga tanme vyākhyātumarhasi

नारद ने कहा — हे सुरेश्वर! कलियुग के पाँच हजार वर्ष बीत जाने पर वह महाभागा गंगा कहाँ गईं — यह मुझे बताने की कृपा करें।

श्लोक 2 (devibhagavatam.9.13.2)

श्रीनारायण उवाच । भारतं भारतीशापात्समागत्येश्वरेच्छया । जगाम तत्र वैकुण्ठे शापान्ते पुनरेव सा

śrīnārāyaṇa uvāca | bhārataṁ bhāratīśāpātsamāgatyeśvarecchayā | jagāma tatra vaikuṇṭhe śāpānte punareva sā

श्री नारायण ने कहा — भारती के शाप से ईश्वर की इच्छा से भारतवर्ष में आकर, शाप की समाप्ति पर वह पुनः वैकुण्ठ चली गईं।

श्लोक 3 (devibhagavatam.9.13.3)

भारती भारतं त्यक्त्वा तज्जगाम हरेः पदम् । पद्मावती च शापान्ते गङ्गा सा चैव नारद

bhāratī bhārataṁ tyaktvā tajjagāma hareḥ padam | padmāvatī ca śāpānte gaṅgā sā caiva nārada

भारती भारतवर्ष को त्यागकर उसी हरि-धाम को गईं; पद्मावती भी शाप की समाप्ति पर, और हे नारद! गंगा भी उसी प्रकार गईं।

श्लोक 4 (devibhagavatam.9.13.4)

गङ्गा सरस्वती लक्ष्यीश्चैतास्तिस्रः प्रिया हरेः । तुलसीसहिता ब्रह्मंश्चतस्रः कीर्तिताः श्रुतौ

gaṅgā sarasvatī lakṣyīścaitāstisraḥ priyā hareḥ | tulasīsahitā brahmaṁścatasraḥ kīrtitāḥ śrutau

हे ब्रह्मन्! गंगा, सरस्वती तथा लक्ष्मी — ये तीन हरि की प्रिया हैं, तुलसी सहित चार श्रुति में कीर्तित हैं।

श्लोक 5 (devibhagavatam.9.13.5)

नारद उवाच । केनोपायेन सा देवी विष्णुपादाब्जसम्भवा । ब्रह्मकमण्डलुस्था च श्रुता शिवप्रिया च सा

nārada uvāca | kenopāyena sā devī viṣṇupādābjasambhavā | brahmakamaṇḍalusthā ca śrutā śivapriyā ca sā

नारद ने कहा — विष्णु के चरणकमल से उत्पन्न वह देवी, जो ब्रह्मा के कमण्डलु में रहती हैं तथा शिव की प्रिया के रूप में सुनी जाती हैं —

श्लोक 6 (devibhagavatam.9.13.6)

बभूव सा मुनिश्रेष्ठ गङ्गा नारायणप्रिया । अहो केन प्रकारेण तन्मे व्याख्यातुमर्हसि

babhūva sā muniśreṣṭha gaṅgā nārāyaṇapriyā | aho kena prakāreṇa tanme vyākhyātumarhasi

हे मुनिश्रेष्ठ! वह गंगा नारायण की भी प्रिया कैसे हुईं? अहो! किस प्रकार से — यह मुझे बताने की कृपा करें।

श्लोक 7 (devibhagavatam.9.13.7)

श्रीनारायण उवाच । पुरा बभूव गोलोके सा गङ्गा द्रवरूपिणी । राधाकृष्णाङ्गसम्भूता तदंशा तत्स्वरूपिणी

śrīnārāyaṇa uvāca | purā babhūva goloke sā gaṅgā dravarūpiṇī | rādhākṛṣṇāṅgasambhūtā tadaṁśā tatsvarūpiṇī

श्री नारायण ने कहा — पूर्वकाल में गोलोक में वह गंगा द्रवरूपा हुईं, जो राधा-कृष्ण के अंग से उत्पन्न, उन्हीं का अंश तथा उन्हीं की स्वरूपा हैं।

श्लोक 8 (devibhagavatam.9.13.8)

द्रवाधिष्ठातृदेवी या रूपेणाप्रतिमा भुवि । नवयौवनसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता

dravādhiṣṭhātṛdevī yā rūpeṇāpratimā bhuvi | navayauvanasampannā sarvābharaṇabhūṣitā

वे द्रव की अधिष्ठात्री देवी, रूप में पृथ्वी पर अनुपम, नवयौवन से सम्पन्न तथा सभी आभूषणों से भूषित हैं।

श्लोक 9 (devibhagavatam.9.13.9)

शरन्मध्याह्नपद्मास्या सस्मिता सुमनोहरा । तप्तकाञ्चनवर्णाभा शरच्चन्द्रसमप्रभा

śaranmadhyāhnapadmāsyā sasmitā sumanoharā | taptakāñcanavarṇābhā śaraccandrasamaprabhā

शरत् के मध्याह्न कमल जैसे मुख वाली, मुस्कुराती हुई, अत्यन्त मनोहर, तपाए हुए स्वर्ण के समान वर्ण वाली तथा शरत्कालीन चन्द्रमा के समान प्रभा वाली —

श्लोक 10 (devibhagavatam.9.13.10)

स्निग्धप्रभातिसुस्निग्धा शुद्धसत्त्वस्वरूपिणी । सुपीनकठिनश्रोणिः सुनितम्बयुगन्धरा

snigdhaprabhātisusnigdhā śuddhasattvasvarūpiṇī | supīnakaṭhinaśroṇiḥ sunitambayugandharā

स्निग्ध प्रभा से अत्यन्त स्निग्ध, शुद्ध सत्त्वस्वरूपा, सुदृढ़ नितम्बों वाली तथा सुन्दर कटि-युगल को धारण करने वाली —

श्लोक 11 (devibhagavatam.9.13.11)

पीनोन्नतं सुकठिनं स्तनयुग्मं सुवर्तुलम् । सुचारुनेत्रयुगलं सुकटाक्षं सुवङ्क्रिमम्

pīnonnataṁ sukaṭhinaṁ stanayugmaṁ suvartulam | sucārunetrayugalaṁ sukaṭākṣaṁ suvaṅkrimam

उभरे हुए, दृढ़, गोलाकार स्तनयुगल वाली, सुन्दर नेत्रयुगल वाली, मनोहर कटाक्ष वाली तथा सुन्दर घुमावदार अंग वाली —

श्लोक 12 (devibhagavatam.9.13.12)

वङ्क्रिमं कबरीभारं मालतीमाल्यसंयुतम् । सिन्दूरबिन्दुललितं सार्धं चन्दनबिन्दुभिः

vaṅkrimaṁ kabarībhāraṁ mālatīmālyasaṁyutam | sindūrabindulalitaṁ sārdhaṁ candanabindubhiḥ

घुँघराले, भारी केशों वाली, मालती की माला से युक्त, सिन्दूर की बिंदी को चन्दन की बिंदियों के साथ सुशोभित करने वाली —

श्लोक 13 (devibhagavatam.9.13.13)

कस्तूरीपत्रिकायुक्तं गण्डयुग्मं मनोरमम् । बन्धूककुसुमाकारमधरोष्ठं च सुन्दरम्

kastūrīpatrikāyuktaṁ gaṇḍayugmaṁ manoramam | bandhūkakusumākāramadharoṣṭhaṁ ca sundaram

कस्तूरी के चित्रों से युक्त मनोहर गाल-युगल वाली, तथा बन्धूक पुष्प के समान सुन्दर निचले ओष्ठ वाली —

श्लोक 14 (devibhagavatam.9.13.14)

पक्वदाडिमबीजाभदन्तपङ्क्तिसमुज्ज्वलम् । वाससी वह्निशुद्धे च नीवीयुक्ते च बिभ्रती

pakvadāḍimabījābhadantapaṅktisamujjvalam | vāsasī vahniśuddhe ca nīvīyukte ca bibhratī

पके अनार के बीजों के समान उज्ज्वल दन्तपंक्ति वाली, अग्नि के समान शुद्ध दो वस्त्रों को नीवी-बद्ध धारण करने वाली —

श्लोक 15 (devibhagavatam.9.13.15)

सा सकामा कृष्णपार्श्वे समुवास सुलज्जिता । वाससा मुखमाच्छाद्य लोचनाभ्यां विभोर्मुखम्

sā sakāmā kṛṣṇapārśve samuvāsa sulajjitā | vāsasā mukhamācchādya locanābhyāṁ vibhormukham

वह कामनायुक्त होकर, अत्यन्त लज्जित होकर कृष्ण के पार्श्व में विराजमान हुई; अपने वस्त्र से अपना मुख ढककर, अपने नेत्रों से विभु के मुख को —

श्लोक 16 (devibhagavatam.9.13.16)

निमेषरहिताभ्यां च पिबन्ती सततं मुदा । प्रफुल्लवदना हर्षान्नवसङ्गमलालसा

nimeṣarahitābhyāṁ ca pibantī satataṁ mudā | praphullavadanā harṣānnavasaṅgamalālasā

निमेष-रहित नेत्रों से निरन्तर हर्षपूर्वक उसे पीती हुई; प्रफुल्ल मुख वाली, हर्ष से नए संगम की उत्कण्ठा से युक्त —

श्लोक 17 (devibhagavatam.9.13.17)

मूर्च्छिता प्रभुरूपेण पुलकाङ्कितविग्रहा । एतस्मिन्नन्तरे तत्र विद्यमाना च राधिका

mūrcchitā prabhurūpeṇa pulakāṅkitavigrahā | etasminnantare tatra vidyamānā ca rādhikā

प्रभु के रूप से मूर्च्छित हुई, उसका शरीर रोमांचित हो उठा। इसी बीच वहाँ उपस्थित राधिका ने —

श्लोक 18 (devibhagavatam.9.13.18)

गोपीत्रिंशत्कोटियुक्ता चन्द्रकोटिसमप्रभा । कोपेनारक्तपद्मास्या रक्तपङ्कजलोचना

gopītriṁśatkoṭiyuktā candrakoṭisamaprabhā | kopenāraktapadmāsyā raktapaṅkajalocanā

तीस करोड़ गोपियों से युक्त, करोड़ों चन्द्रमाओं के समान प्रभा वाली, क्रोध से लाल कमल के समान मुख वाली तथा लाल कमल के समान नेत्रों वाली —

श्लोक 19 (devibhagavatam.9.13.19)

पीतचम्पकवर्णाभा गजेन्द्रमन्दगामिनी । अमूल्यरत्ननिर्माणनानाभूषणभूषिता

pītacampakavarṇābhā gajendramandagāminī | amūlyaratnanirmāṇanānābhūṣaṇabhūṣitā

पीत चम्पक पुष्प के समान वर्ण वाली, गजराज के समान मन्थर गति वाली, अमूल्य रत्नों से बने विविध आभूषणों से भूषित —

श्लोक 20 (devibhagavatam.9.13.20)

अमूल्यरत्नखचितममूल्यं वह्निशौचकम् । पीतवस्त्रस्य युगलं नीवीयुक्तं च बिभ्रती

amūlyaratnakhacitamamūlyaṁ vahniśaucakam | pītavastrasya yugalaṁ nīvīyuktaṁ ca bibhratī

अमूल्य रत्नों से जड़ित, अमूल्य, अग्नि के समान शुद्ध पीत वस्त्रों की जोड़ी को नीवी-बद्ध धारण करने वाली —

श्लोक 21 (devibhagavatam.9.13.21)

स्थलपद्मप्रभामुष्टं कोमलं च सुरञ्जितम् । कृष्णदत्तार्घ्यसंयुक्तं विन्यसन्ती पदाम्बुजम्

sthalapadmaprabhāmuṣṭaṁ komalaṁ ca surañjitam | kṛṣṇadattārghyasaṁyuktaṁ vinyasantī padāmbujam

स्थल-कमल की प्रभा को भी हरने वाले, कोमल तथा सुरंजित चरण, कृष्ण द्वारा दिए गए अर्घ्य से युक्त — अपने चरणकमल को रखते हुए —

श्लोक 22 (devibhagavatam.9.13.22)

रत्नेन्द्रसारनिर्माणविमानादवरुह्य सा । सेव्यमाना च ऋषिभिः श्वेतचामरवायुना

ratnendrasāranirmāṇavimānādavaruhya sā | sevyamānā ca ṛṣibhiḥ śvetacāmaravāyunā

वह श्रेष्ठ रत्नों से निर्मित विमान से उतरकर, ऋषियों द्वारा श्वेत चामर के वायु से सेविता होकर —

श्लोक 23 (devibhagavatam.9.13.23)

कस्तूरीबिन्दुभिर्युक्तं चन्दनेन समन्वितम् । दीप्तदीपप्रभाकारं सिन्दूरं बिन्दुशोभितम्

kastūrībindubhiryuktaṁ candanena samanvitam | dīptadīpaprabhākāraṁ sindūraṁ binduśobhitam

कस्तूरी की बिंदियों से युक्त, चन्दन से समन्वित, जलते दीपक की प्रभा के समान सिन्दूर की बिंदी से सुशोभित —

श्लोक 24 (devibhagavatam.9.13.24)

दधती भालमध्ये च सीमन्ताधःस्थलोज्ज्वले । पारिजातप्रसूनानां मालायुक्तं सुवङ्क्रिमम्

dadhatī bhālamadhye ca sīmantādhaḥsthalojjvale | pārijātaprasūnānāṁ mālāyuktaṁ suvaṅkrimam

उसे अपने ललाट के मध्य में तथा माँग के नीचे उज्ज्वल स्थान में धारण करती हुई; पारिजात पुष्पों की माला से युक्त, सुन्दर घुमावदार —

श्लोक 25 (devibhagavatam.9.13.25)

सुचारुकबरीभारं कम्पयन्ती सुकम्पिता । सुचारुरागसंयुक्तमोष्ठं कम्पयती रुषा

sucārukabarībhāraṁ kampayantī sukampitā | sucārurāgasaṁyuktamoṣṭhaṁ kampayatī ruṣā

अपने सुन्दर, भारी केशों को हिलाती हुई, स्वयं कम्पित; क्रोध से अपने सुरंजित ओष्ठ को कँपाती हुई —

श्लोक 26 (devibhagavatam.9.13.26)

गत्वोवास कृष्णपार्श्वे रत्नसिंहासने शुभे । सखीनां च समूहैश्च परिपूर्णा विभोः प्रिया

gatvovāsa kṛṣṇapārśve ratnasiṁhāsane śubhe | sakhīnāṁ ca samūhaiśca paripūrṇā vibhoḥ priyā

वह जाकर कृष्ण के पार्श्व में शुभ रत्नसिंहासन पर विराजमान हुई; विभु की वह प्रिया अपनी सखियों के समूह से घिरी हुई थी।

श्लोक 27 (devibhagavatam.9.13.27)

तां दृष्ट्वा च समुत्तस्थौ कृष्णः सादरपूर्वकम् । सम्भाष्य मधुरालापैः सस्मितश्च ससम्भ्रमः

tāṁ dṛṣṭvā ca samuttasthau kṛṣṇaḥ sādarapūrvakam | sambhāṣya madhurālāpaiḥ sasmitaśca sasambhramaḥ

उसे देखकर कृष्ण आदरपूर्वक उठ खड़े हुए; मुस्कुराते हुए तथा किंचित् घबराते हुए, मधुर वार्तालाप से उससे बातचीत करके —

श्लोक 28 (devibhagavatam.9.13.28)

प्रणेमुरतिसन्त्रस्ता गोपा नम्रात्मकन्धराः । तुष्टुवुस्ते च भक्त्या च तुष्टाव परमेश्वरः

praṇemuratisantrastā gopā namrātmakandharāḥ | tuṣṭuvuste ca bhaktyā ca tuṣṭāva parameśvaraḥ

अत्यन्त भयभीत गोप विनम्र सिर झुकाकर प्रणाम करने लगे; उन्होंने भक्तिपूर्वक स्तुति की, तथा परमेश्वर ने भी उसकी स्तुति की।

श्लोक 29 (devibhagavatam.9.13.29)

उत्थाय गङ्गा सहसा स्तुतिं बहु चकार सा । कुशलं परिपप्रच्छ भीतातिविनयेन च

utthāya gaṅgā sahasā stutiṁ bahu cakāra sā | kuśalaṁ paripapraccha bhītātivinayena ca

गंगा भी सहसा उठकर अनेक प्रकार से स्तुति करने लगीं; अत्यन्त भयभीत होकर विनयपूर्वक उसका कुशल पूछा।

श्लोक 30 (devibhagavatam.9.13.30)

नम्रभागस्थिता त्रस्ता शुष्ककण्ठोष्ठतालुका । ध्यानेन शरणायत्ता श्रीकृष्णचरणाम्बुजे

namrabhāgasthitā trastā śuṣkakaṇṭhoṣṭhatālukā | dhyānena śaraṇāyattā śrīkṛṣṇacaraṇāmbuje

सिर झुकाए, भयभीत, सूखे कण्ठ-ओष्ठ-तालु वाली, ध्यान के द्वारा वह श्रीकृष्ण के चरणकमल की शरण में चली गई।

श्लोक 31 (devibhagavatam.9.13.31)

तां हृत्पद्मस्थितां कृष्णो भीतायै चाभयं ददौ । बभूव स्थिरचित्ता सा सर्वेश्वरवरेण च

tāṁ hṛtpadmasthitāṁ kṛṣṇo bhītāyai cābhayaṁ dadau | babhūva sthiracittā sā sarveśvaravareṇa ca

कृष्ण ने अपने हृदय-कमल में स्थित उस भयभीत गंगा को अभय दिया; सर्वेश्वर के इस वर से वह स्थिरचित्त हो गई।

श्लोक 32 (devibhagavatam.9.13.32)

ऊर्ध्वसिंहासनस्थां च राधां गङ्गा ददर्श सा । सुस्निग्धां सुखदृश्यां च ज्वलन्तीं ब्रह्मतेजसा

ūrdhvasiṁhāsanasthāṁ ca rādhāṁ gaṅgā dadarśa sā | susnigdhāṁ sukhadṛśyāṁ ca jvalantīṁ brahmatejasā

उस गंगा ने ऊँचे सिंहासन पर विराजमान राधा को देखा, जो अत्यन्त स्निग्ध, सुख-दर्शनीय तथा ब्रह्मतेज से प्रज्वलित थीं।

श्लोक 33 (devibhagavatam.9.13.33)

असङ्ख्यब्रह्मणः कर्त्रीमादिसृष्टेः सनातनीम् । सदा द्वादशवर्षीयां कन्याभिनवयौवनाम्

asaṅkhyabrahmaṇaḥ kartrīmādisṛṣṭeḥ sanātanīm | sadā dvādaśavarṣīyāṁ kanyābhinavayauvanām

असंख्य ब्रह्माओं की रचयित्री, आदिसृष्टि की सनातनी, सदा बारह वर्ष की कन्या के समान नवयौवना —

श्लोक 34 (devibhagavatam.9.13.34)

विश्ववृन्दे निरुपमां रूपेण च गुणेन च । शान्तां कान्तामनन्तां तामाद्यन्तरहितां सतीम्

viśvavṛnde nirupamāṁ rūpeṇa ca guṇena ca | śāntāṁ kāntāmanantāṁ tāmādyantarahitāṁ satīm

सभी विश्वों में रूप और गुण में अनुपम, शान्त, सुन्दर, अनन्त, आदि-अन्त से रहित उस सती को —

श्लोक 35 (devibhagavatam.9.13.35)

शुभां सुभद्रां सुभगां स्वामिसौभाग्यसंयुताम् । सौन्दर्यसुन्दरीं श्रेष्ठां सर्वासु सुन्दरीषु च

śubhāṁ subhadrāṁ subhagāṁ svāmisaubhāgyasaṁyutām | saundaryasundarīṁ śreṣṭhāṁ sarvāsu sundarīṣu ca

शुभा, सुभद्रा, सुभगा, अपने स्वामी के सौभाग्य से युक्त, सौन्दर्य में भी सुन्दरी, सभी सुन्दरियों में श्रेष्ठ —

श्लोक 36 (devibhagavatam.9.13.36)

कृष्णार्धाङ्गां कृष्णसमां तेजसा वयसा त्विषा । पूजितां च महालक्ष्मीं लक्ष्म्या लक्ष्मीश्वरेण च

kṛṣṇārdhāṅgāṁ kṛṣṇasamāṁ tejasā vayasā tviṣā | pūjitāṁ ca mahālakṣmīṁ lakṣmyā lakṣmīśvareṇa ca

कृष्ण की अर्धांगिनी, कृष्ण के समान तेज, वय तथा कान्ति वाली, तथा महालक्ष्मी, स्वयं लक्ष्मी और लक्ष्मीश्वर द्वारा पूजित —

श्लोक 37 (devibhagavatam.9.13.37)

प्रच्छाद्यमानां प्रभया सभामीशस्य सुप्रभाम् । सखीदत्तं च ताम्बूलं भुक्तवन्तीं च दुर्लभम्

pracchādyamānāṁ prabhayā sabhāmīśasya suprabhām | sakhīdattaṁ ca tāmbūlaṁ bhuktavantīṁ ca durlabham

अपनी प्रभा से ईश्वर की सभा को भी ढक देने वाली उज्ज्वल, अपनी सखी द्वारा दिए गए दुर्लभ ताम्बूल को खाती हुई —

श्लोक 38 (devibhagavatam.9.13.38)

अजन्यां सर्वजननीं धन्यां मान्यां च मानिनीम् । कृष्णप्राणाधिदेवीं च प्राणप्रियतमां रमाम्

ajanyāṁ sarvajananīṁ dhanyāṁ mānyāṁ ca māninīm | kṛṣṇaprāṇādhidevīṁ ca prāṇapriyatamāṁ ramām

अजन्मा, सबकी जननी, धन्या, माननीया तथा माननीय अभिमान वाली, कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी तथा प्राणों से भी प्रिय रमा —

श्लोक 39 (devibhagavatam.9.13.39)

दृष्ट्वा रासेश्वरीं तृप्तिं न जगाम सुरेश्वरी । निमेषरहिताभ्यां च लोचनाभ्यां पपौ च ताम्

dṛṣṭvā rāseśvarīṁ tṛptiṁ na jagāma sureśvarī | nimeṣarahitābhyāṁ ca locanābhyāṁ papau ca tām

उस रासेश्वरी को देखकर वह सुरेश्वरी तृप्त नहीं हुई; निमेष-रहित नेत्रों से उसे निरन्तर देखती रही।

श्लोक 40 (devibhagavatam.9.13.40)

एतस्मिन्नन्तरे राधा जगदीशमुवाच सा । वाचा मधुरया शान्ता विनीता सस्मिता मुने

etasminnantare rādhā jagadīśamuvāca sā | vācā madhurayā śāntā vinītā sasmitā mune

हे मुने! इसी बीच राधा ने शान्त, विनीत तथा मुस्कुराती हुई मधुर वाणी में जगदीश से कहा —

श्लोक 41 (devibhagavatam.9.13.41)

राधोवाच । केयं प्राणेश कल्याणी सस्मिता त्वन्मुखाम्बुजम् । पश्यन्ती सस्मितं पार्श्वे सकामा वक्रलोचना

rādhovāca | keyaṁ prāṇeśa kalyāṇī sasmitā tvanmukhāmbujam | paśyantī sasmitaṁ pārśve sakāmā vakralocanā

राधा ने कहा — हे प्राणेश! यह कल्याणी कौन है, जो मुस्कुराते हुए, पार्श्व में मुस्कुराती हुई, कामनायुक्त तथा तिरछी दृष्टि से आपके मुखकमल को देख रही है?

श्लोक 42 (devibhagavatam.9.13.42)

मूर्च्छां प्राप्नोति रूपेण पुलकाङ्कितविग्रहा । वस्त्रेण मुखमाच्छाद्य निरीक्षन्ती पुनः पुनः

mūrcchāṁ prāpnoti rūpeṇa pulakāṅkitavigrahā | vastreṇa mukhamācchādya nirīkṣantī punaḥ punaḥ

वह आपके रूप से मूर्च्छित हो रही है, उसका शरीर रोमांचित है; अपने वस्त्र से मुख ढककर बार-बार देख रही है।

श्लोक 43 (devibhagavatam.9.13.43)

त्वं चापि तां सन्निरीक्ष्य सकामः सस्मितः सदा । मयि जीवति गोलोके भूता दुर्वृत्तिरीदृशी

tvaṁ cāpi tāṁ sannirīkṣya sakāmaḥ sasmitaḥ sadā | mayi jīvati goloke bhūtā durvṛttirīdṛśī

और आप भी उसे देखकर सदा कामनायुक्त तथा मुस्कुराते हुए हैं — मेरे गोलोक में जीवित रहते हुए ऐसा दुराचरण होना —

श्लोक 44 (devibhagavatam.9.13.44)

त्वमेव चैव दुर्वृत्तं वारं वारं करोषि च । क्षमां करोमि प्रेम्णा च स्त्रीजातिः स्निग्धमानसा

tvameva caiva durvṛttaṁ vāraṁ vāraṁ karoṣi ca | kṣamāṁ karomi premṇā ca strījātiḥ snigdhamānasā

आप ही बार-बार ऐसा दुराचरण करते रहते हैं; स्त्री-जाति स्निग्ध-हृदया होने के कारण मैं प्रेमवश क्षमा करती हूँ।

श्लोक 45 (devibhagavatam.9.13.45)

सङ्गृह्येमां प्रियामिष्टां गोलोकाद् गच्छ लम्पट । अन्यथा न हि ते भद्रं भविष्यति व्रजेश्वर

saṅgṛhyemāṁ priyāmiṣṭāṁ golokād gaccha lampaṭa | anyathā na hi te bhadraṁ bhaviṣyati vrajeśvara

हे लम्पट! इस अपनी इष्ट प्रिया को लेकर गोलोक से चले जाओ; हे व्रजेश्वर! अन्यथा तुम्हारा कल्याण नहीं होगा।

श्लोक 46 (devibhagavatam.9.13.46)

दृष्टस्त्वं विरजायुक्तो मया चन्दनकानने । क्षमा कृता मया पूर्वं सखीनां वचनादहो

dṛṣṭastvaṁ virajāyukto mayā candanakānane | kṣamā kṛtā mayā pūrvaṁ sakhīnāṁ vacanādaho

मैंने पहले भी चन्दन-वन में आपको विरजा के साथ देखा था; अहो! तब भी मैंने सखियों के कहने से क्षमा कर दिया था।

श्लोक 47 (devibhagavatam.9.13.47)

त्वया मच्छब्दमात्रेण तिरोधानं कृतं पुरा । देहं तत्याज विरजा नदीरूपा बभूव सा

tvayā macchabdamātreṇa tirodhānaṁ kṛtaṁ purā | dehaṁ tatyāja virajā nadīrūpā babhūva sā

पूर्वकाल में मेरा नाम सुनते ही आप वहाँ से अन्तर्धान हो गए थे; विरजा ने भी देह त्याग दी और वह नदी-रूपा हो गईं।

श्लोक 48 (devibhagavatam.9.13.48)

कोटियोजनविस्तीर्णा ततो दैर्घ्ये चतुर्गुणा । अद्यापि विद्यमाना सा तव सत्कीर्तिरूपिणी

koṭiyojanavistīrṇā tato dairghye caturguṇā | adyāpi vidyamānā sā tava satkīrtirūpiṇī

वे करोड़ों योजन विस्तृत तथा उससे चार गुनी लम्बाई से युक्त हैं; आज भी विद्यमान, वे आपकी सत्कीर्ति का रूप हैं।

श्लोक 49 (devibhagavatam.9.13.49)

गृहं मयि गतायां च पुनर्गत्वा तदन्तिके । उच्चै रुरोद विरजे विरजे चेति संस्मरन्

gṛhaṁ mayi gatāyāṁ ca punargatvā tadantike | uccai ruroda viraje viraje ceti saṁsmaran

मेरे घर चले जाने पर आप फिर उसके पास गए, और "विरजे, विरजे" — यह स्मरण करते हुए जोर से रोने लगे।

श्लोक 50 (devibhagavatam.9.13.50)

तदा तोयात्समुत्थाय सा योगात्सिद्धयोगिनी । सालङ्कारा मूर्तिमती ददौ तुभ्यं च दर्शनम्

tadā toyātsamutthāya sā yogātsiddhayoginī | sālaṅkārā mūrtimatī dadau tubhyaṁ ca darśanam

तब उस सिद्धयोगिनी ने योग द्वारा जल से उठकर, आभूषणों सहित मूर्तिमती होकर आपको दर्शन दिया।

श्लोक 51 (devibhagavatam.9.13.51)

ततस्तां च समाक्षिप्य वीर्याधानं कृतं त्वया । ततो बभूवुस्तस्यां च समुद्राः सप्त एव च

tatastāṁ ca samākṣipya vīryādhānaṁ kṛtaṁ tvayā | tato babhūvustasyāṁ ca samudrāḥ sapta eva ca

फिर आपने उसे अपनी ओर आकृष्ट करके उसमें वीर्य का स्थापन किया; उससे ही सातों समुद्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 52 (devibhagavatam.9.13.52)

दृष्टस्त्वं शोभया गोप्या युक्तश्चम्पककानने । सद्यो मच्छब्दमात्रेण तिरोधानं कृतं त्वया

dṛṣṭastvaṁ śobhayā gopyā yuktaścampakakānane | sadyo macchabdamātreṇa tirodhānaṁ kṛtaṁ tvayā

चम्पक-वन में शोभा नामक गोपी के साथ भी मैंने आपको देखा था; तब भी मेरा नाम सुनते ही आप तुरन्त अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 53 (devibhagavatam.9.13.53)

शोभा देहं परित्यज्य जगाम चन्द्रमण्डले । ततस्तस्याः शरीरं च स्निग्धं तेजो बभूव ह

śobhā dehaṁ parityajya jagāma candramaṇḍale | tatastasyāḥ śarīraṁ ca snigdhaṁ tejo babhūva ha

शोभा ने देह त्यागकर चन्द्रमण्डल में प्रवेश किया; तब उसके शरीर से वह स्निग्ध तेज उत्पन्न हुआ।

श्लोक 54 (devibhagavatam.9.13.54)

संविभज्य त्वया दत्तं हृदयेन विदूयता । रत्नाय किञ्चित्स्वर्णाय किञ्चिन्मणिवराय च

saṁvibhajya tvayā dattaṁ hṛdayena vidūyatā | ratnāya kiñcitsvarṇāya kiñcinmaṇivarāya ca

व्यथित हृदय से आपने उसे विभाजित करके दिया — कुछ रत्न को, कुछ स्वर्ण को, कुछ श्रेष्ठ मणियों को —

श्लोक 55 (devibhagavatam.9.13.55)

किञ्चित्स्त्रीणां मुखाब्जेभ्यः किञ्चिद्राज्ञे च किञ्चन । किञ्चित्किसलयेभ्यश्च पुष्पेभ्यश्चापि किञ्चन

kiñcitstrīṇāṁ mukhābjebhyaḥ kiñcidrājñe ca kiñcana | kiñcitkisalayebhyaśca puṣpebhyaścāpi kiñcana

कुछ स्त्रियों के मुखकमलों को, कुछ राजा को, कुछ नई कोंपलों को तथा कुछ पुष्पों को भी।

श्लोक 56 (devibhagavatam.9.13.56)

किञ्चित्कलेभ्यः पक्वेभ्यः सस्येभ्यश्चापि किञ्चन । नृपदेवगृहेभ्यश्च संस्कृतेभ्यश्च किञ्चन

kiñcitkalebhyaḥ pakvebhyaḥ sasyebhyaścāpi kiñcana | nṛpadevagṛhebhyaśca saṁskṛtebhyaśca kiñcana

कुछ पके फलों को, कुछ अन्न-धान्य को भी, तथा कुछ राजाओं और देवताओं के मन्दिरों को, जो सुसंस्कृत हैं।

श्लोक 57 (devibhagavatam.9.13.57)

किञ्चिन्नूतनपत्रेभ्यो दुग्धेभ्यश्चापि किञ्चन । दृष्टस्त्वं प्रभया गोप्या युक्तो वृन्दावने वने

kiñcinnūtanapatrebhyo dugdhebhyaścāpi kiñcana | dṛṣṭastvaṁ prabhayā gopyā yukto vṛndāvane vane

कुछ नई पत्तियों को तथा कुछ दूध को भी। वृन्दावन वन में भी मैंने आपको प्रभा नामक गोपी के साथ देखा था।

श्लोक 58 (devibhagavatam.9.13.58)

सद्यो मच्छब्दमात्रेण तिरोधानं कृतं त्वया । प्रभा देहं परित्यज्य जगाम सूर्यमण्डले

sadyo macchabdamātreṇa tirodhānaṁ kṛtaṁ tvayā | prabhā dehaṁ parityajya jagāma sūryamaṇḍale

तब भी मेरा नाम सुनते ही आप तुरन्त अन्तर्धान हो गए; प्रभा ने देह त्यागकर सूर्यमण्डल में प्रवेश किया।

श्लोक 59 (devibhagavatam.9.13.59)

ततस्तस्याः शरीरं च तीव्रं तेजो बभूव ह । संविभज्य त्वया दत्तं प्रेम्णा प्ररुदता पुरा

tatastasyāḥ śarīraṁ ca tīvraṁ tejo babhūva ha | saṁvibhajya tvayā dattaṁ premṇā prarudatā purā

तब उसके शरीर से वह तीव्र तेज उत्पन्न हुआ; उसे भी प्रेम से रोते हुए आपने विभाजित करके दिया।

श्लोक 60 (devibhagavatam.9.13.60)

विसृष्टं चक्षुषोः कृष्ण लज्जया मद्भयेन च । हुताशनाय किञ्चिच्च यक्षेभ्यश्चापि किञ्चन

visṛṣṭaṁ cakṣuṣoḥ kṛṣṇa lajjayā madbhayena ca | hutāśanāya kiñcicca yakṣebhyaścāpi kiñcana

हे कृष्ण! लज्जा से तथा मेरे भय से आपकी आँखों से बहा हुआ वह तेज — कुछ अग्नि को, कुछ यक्षों को भी —

श्लोक 61 (devibhagavatam.9.13.61)

किञ्चित्पुरुषसिंहेभ्यो देवेभ्यश्चापि किञ्चन । किञ्चिद्विष्णुजनेभ्यश्च नागेभ्योऽपि च किञ्चन

kiñcitpuruṣasiṁhebhyo devebhyaścāpi kiñcana | kiñcidviṣṇujanebhyaśca nāgebhyo'pi ca kiñcana

कुछ पुरुषों में सिंह समान श्रेष्ठों को, कुछ देवताओं को भी, कुछ विष्णुजनों को तथा कुछ नागों को भी।

श्लोक 62 (devibhagavatam.9.13.62)

ब्राह्मणेभ्यो मुनिभ्यश्च तपस्विभ्यश्च किञ्चन । स्त्रीभ्यः सौभाग्ययुक्ताभ्यो यशस्विभ्यश्च किञ्चन

brāhmaṇebhyo munibhyaśca tapasvibhyaśca kiñcana | strībhyaḥ saubhāgyayuktābhyo yaśasvibhyaśca kiñcana

कुछ ब्राह्मणों को, कुछ मुनियों को, कुछ तपस्वियों को, तथा कुछ सौभाग्यशाली और यशस्विनी स्त्रियों को।

श्लोक 63 (devibhagavatam.9.13.63)

तत्तु दत्त्वा च सर्वेभ्यः पूर्वं प्ररुदितं त्वया । शान्तिगोप्या युतस्त्वं च दृष्टोऽसि रासमण्डले

tattu dattvā ca sarvebhyaḥ pūrvaṁ praruditaṁ tvayā | śāntigopyā yutastvaṁ ca dṛṣṭo'si rāsamaṇḍale

यह सब पहले रोते हुए आपने सबको बाँट दिया। रासमण्डल में भी मैंने आपको शान्ति नामक गोपी के साथ देखा था।

श्लोक 64 (devibhagavatam.9.13.64)

वसन्ते पुष्पशय्यायां माल्यवांश्चन्दनोक्षितः । रत्नप्रदीपैर्युक्ते च रत्ननिर्माणमन्दिरे

vasante puṣpaśayyāyāṁ mālyavāṁścandanokṣitaḥ | ratnapradīpairyukte ca ratnanirmāṇamandire

वसन्त ऋतु में, पुष्प-शय्या पर, माला पहने, चन्दन से लेपित, रत्नमय दीपों से युक्त रत्न-निर्मित मन्दिर में —

श्लोक 65 (devibhagavatam.9.13.65)

रत्नभूषणभूषाढ्यो रत्नभूषितया सह । तया दत्तं च ताम्बूलं भुक्तवांश्च पुरा विभो

ratnabhūṣaṇabhūṣāḍhyo ratnabhūṣitayā saha | tayā dattaṁ ca tāmbūlaṁ bhuktavāṁśca purā vibho

रत्नाभूषणों से समृद्ध होकर, रत्नाभूषित उस गोपी के साथ; हे विभो! पूर्वकाल में उसके द्वारा दिए गए ताम्बूल को भी आपने खाया था।

श्लोक 66 (devibhagavatam.9.13.66)

सद्यो मच्छब्दमात्रेण तिरोधानं कृतं त्वया । शान्तिर्देहं परित्यज्य भिया लीना त्वयि प्रभो

sadyo macchabdamātreṇa tirodhānaṁ kṛtaṁ tvayā | śāntirdehaṁ parityajya bhiyā līnā tvayi prabho

तब भी मेरा नाम सुनते ही आप तुरन्त अन्तर्धान हो गए; हे प्रभो! शान्ति ने देह त्यागकर भय से आप में ही लीन हो गई।

श्लोक 67 (devibhagavatam.9.13.67)

ततस्तस्याः शरीरं च गुणश्रेष्ठं बभूव ह । संविभज्य त्वया दत्तं प्रेम्णा प्ररुदता पुरा

tatastasyāḥ śarīraṁ ca guṇaśreṣṭhaṁ babhūva ha | saṁvibhajya tvayā dattaṁ premṇā prarudatā purā

तब उसके शरीर से वह श्रेष्ठ गुण उत्पन्न हुआ; उसे भी प्रेम से रोते हुए आपने पुनः विभाजित करके दिया।

श्लोक 68 (devibhagavatam.9.13.68)

विश्वे तु विपिने किञ्चिद्ब्रह्मणे च मयि प्रभो । शुद्धसत्त्वस्वरूपायै किञ्चिल्लक्ष्म्यै पुरा विभो

viśve tu vipine kiñcidbrahmaṇe ca mayi prabho | śuddhasattvasvarūpāyai kiñcillakṣmyai purā vibho

हे प्रभो! उसमें से कुछ विश्व को, कुछ वन को, कुछ ब्रह्मा को तथा कुछ मुझको भी; हे विभो! कुछ शुद्ध सत्त्वस्वरूपा लक्ष्मी को भी पहले दिया गया।

श्लोक 69 (devibhagavatam.9.13.69)

त्वन्मन्त्रोपासकेभ्यश्च शाक्तेभ्यश्चापि किञ्चन । तपस्विभ्यश्च धर्माय धर्मिष्ठेभ्यश्च किञ्चन

tvanmantropāsakebhyaśca śāktebhyaścāpi kiñcana | tapasvibhyaśca dharmāya dharmiṣṭhebhyaśca kiñcana

कुछ आपके मन्त्र के उपासकों को, कुछ शाक्तों को भी, कुछ तपस्वियों को धर्म के लिए तथा कुछ धर्मपरायणों को भी।

श्लोक 70 (devibhagavatam.9.13.70)

मया पूर्वं च त्वं दृष्टो गोप्या च क्षमया सह । सुवेषयुक्तो मालावान् गन्धचन्दनचर्चितः

mayā pūrvaṁ ca tvaṁ dṛṣṭo gopyā ca kṣamayā saha | suveṣayukto mālāvān gandhacandanacarcitaḥ

मैंने पहले भी आपको क्षमा नामक गोपी के साथ देखा था, सुन्दर वेष धारण किए, माला पहने, गन्ध-चन्दन से लिप्त —

श्लोक 71 (devibhagavatam.9.13.71)

रत्नभूषितया गन्धचन्दनोक्षितया सह । सुखेन मूर्च्छितस्तल्पे पुष्पचन्दनचर्चिते

ratnabhūṣitayā gandhacandanokṣitayā saha | sukhena mūrcchitastalpe puṣpacandanacarcite

रत्नाभूषित तथा गन्ध-चन्दन से लिप्त उस गोपी के साथ, पुष्प और चन्दन से लेपित शय्या पर सुखपूर्वक मूर्च्छित होकर —

श्लोक 72 (devibhagavatam.9.13.72)

श्लिष्टो निद्रितया सद्यः सुखेन नवसङ्गमात् । मया प्रबोधिता सा च भवांश्च स्मरणं कुरु

śliṣṭo nidritayā sadyaḥ sukhena navasaṅgamāt | mayā prabodhitā sā ca bhavāṁśca smaraṇaṁ kuru

नई संगति के सुख से तत्काल निद्रा में आलिंगनबद्ध — मेरे द्वारा जगाई जाने पर उसे तथा आपको स्मरण कीजिए।

श्लोक 73 (devibhagavatam.9.13.73)

गृहीतं पीतवस्त्रं च मुरली च मनोहरा । वनमालाकौस्तुभश्चाप्यमूल्यं रत्नकुण्डलम्

gṛhītaṁ pītavastraṁ ca muralī ca manoharā | vanamālākaustubhaścāpyamūlyaṁ ratnakuṇḍalam

पीत वस्त्र, मनोहर मुरली, वनमाला, कौस्तुभ मणि तथा अमूल्य रत्नकुण्डल भी लिया गया था —

श्लोक 74 (devibhagavatam.9.13.74)

पश्चात्प्रदत्तं प्रेम्णा च सखीनां वचनादहो । लज्जया कृष्णवर्णोऽभूद्भवान् पापेन यः प्रभो

paścātpradattaṁ premṇā ca sakhīnāṁ vacanādaho | lajjayā kṛṣṇavarṇo'bhūdbhavān pāpena yaḥ prabho

अहो! फिर सखियों के कहने पर प्रेमवश वह लौटा दिया गया; हे प्रभो! उस पाप के कारण लज्जा से ही आप कृष्णवर्ण के हुए हैं, ऐसा कहा जाता है।

श्लोक 75 (devibhagavatam.9.13.75)

क्षमा देहं परित्यज्य लज्जया पृथिवीं गता । ततस्तस्याः शरीरं च गुणश्रेष्ठं बभूव ह

kṣamā dehaṁ parityajya lajjayā pṛthivīṁ gatā | tatastasyāḥ śarīraṁ ca guṇaśreṣṭhaṁ babhūva ha

क्षमा ने भी देह त्यागकर लज्जा से पृथ्वी में प्रवेश किया; तब उसके शरीर से वह श्रेष्ठ गुण उत्पन्न हुआ।

श्लोक 76 (devibhagavatam.9.13.76)

संविभज्य त्वया दत्तं प्रेम्णा प्ररुदता पुनः । किञ्चिद्दत्तं विष्णवे च वैष्णवेभ्यश्च किञ्चन

saṁvibhajya tvayā dattaṁ premṇā prarudatā punaḥ | kiñciddattaṁ viṣṇave ca vaiṣṇavebhyaśca kiñcana

उसे भी प्रेम से पुनः रोते हुए आपने विभाजित करके दिया — कुछ विष्णु को, कुछ वैष्णवों को —

श्लोक 77 (devibhagavatam.9.13.77)

धार्मिकेभ्यश्च धर्माय दुर्बलेभ्यश्च किञ्चन । तपस्विभ्योऽपि देवेभ्यः पण्डितेभ्यश्च किञ्चन

dhārmikebhyaśca dharmāya durbalebhyaśca kiñcana | tapasvibhyo'pi devebhyaḥ paṇḍitebhyaśca kiñcana

कुछ धार्मिकों को धर्म के लिए, कुछ दुर्बलों को, कुछ तपस्वियों को, कुछ देवताओं को तथा कुछ पण्डितों को भी।

श्लोक 78 (devibhagavatam.9.13.78)

एतत्ते कथितं सर्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि । त्वद्गुणं चैव बहुशो न जानामि परं प्रभो

etatte kathitaṁ sarvaṁ kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi | tvadguṇaṁ caiva bahuśo na jānāmi paraṁ prabho

यह सब आपको बता दिया गया — अब और क्या सुनना चाहते हैं? हे परम प्रभो! मैं आपके गुणों को अनेक बार भी पूरी तरह नहीं जान पाती।

श्लोक 79 (devibhagavatam.9.13.79)

इत्येवमुक्त्वा सा राधा रक्तपङ्कजलोचना । गङ्गां वक्तुं समारेभे नम्रास्यां लज्जितां सतीम्

ityevamuktvā sā rādhā raktapaṅkajalocanā | gaṅgāṁ vaktuṁ samārebhe namrāsyāṁ lajjitāṁ satīm

ऐसा कहकर लाल कमल के समान नेत्रों वाली उस राधा ने, विनम्र मुख वाली तथा लज्जित सती गंगा से कहना आरम्भ किया —

श्लोक 80 (devibhagavatam.9.13.80)

गङ्गा रहस्यं विज्ञाय योगेन सिद्धयोगिनी । तिरोभूय सभामध्ये स्वजलं प्रविवेश सा

gaṅgā rahasyaṁ vijñāya yogena siddhayoginī | tirobhūya sabhāmadhye svajalaṁ praviveśa sā

उस रहस्य को जानकर, सिद्धयोगिनी गंगा ने योग के द्वारा सभा के बीच से ही अन्तर्धान होकर अपने ही जल में प्रवेश किया।

श्लोक 81 (devibhagavatam.9.13.81)

राधा योगेन विज्ञाय सर्वत्रावस्थितां च ताम् । पानं कर्तुं समारेभे गण्डूषात्सिद्धयोगिनी

rādhā yogena vijñāya sarvatrāvasthitāṁ ca tām | pānaṁ kartuṁ samārebhe gaṇḍūṣātsiddhayoginī

राधा ने भी योग से जानकर कि वह सर्वत्र व्याप्त है, उस सिद्धयोगिनी गंगा को एक कुल्ले में पी लेने का उपक्रम किया।

श्लोक 82 (devibhagavatam.9.13.82)

गङ्गा रहस्यं विज्ञाय योगेन सिद्धयोगिनी । श्रीकृष्णचरणाम्भोजे विवेश शरणं ययौ

gaṅgā rahasyaṁ vijñāya yogena siddhayoginī | śrīkṛṣṇacaraṇāmbhoje viveśa śaraṇaṁ yayau

उस रहस्य को जानकर सिद्धयोगिनी गंगा ने श्रीकृष्ण के चरणकमल में प्रवेश किया और उन्हीं की शरण में चली गई।

श्लोक 83 (devibhagavatam.9.13.83)

गोलोके सा च वैकुण्ठे ब्रह्मलोकादिके तथा । ददर्श राधा सर्वत्र नैव गङ्गां ददर्श सा

goloke sā ca vaikuṇṭhe brahmalokādike tathā | dadarśa rādhā sarvatra naiva gaṅgāṁ dadarśa sā

राधा ने गोलोक में, वैकुण्ठ में, ब्रह्मलोक आदि में — सर्वत्र देखा, किन्तु उन्हें गंगा कहीं नहीं दिखीं।

श्लोक 84 (devibhagavatam.9.13.84)

सर्वत्र जलशून्यं च शुष्कपङ्कं च गोलकम् । जलजन्तुसमूहैश्च मृतदेहैः समन्वितम्

sarvatra jalaśūnyaṁ ca śuṣkapaṅkaṁ ca golakam | jalajantusamūhaiśca mṛtadehaiḥ samanvitam

सर्वत्र जल-शून्य, सूखे कीचड़ वाला वह गोलक जल-जन्तुओं के समूहों तथा मृत शरीरों से भरा हुआ था।

श्लोक 85 (devibhagavatam.9.13.85)

ब्रह्मविष्णुशिवानन्तधर्मेन्द्रेन्दुदिवाकराः । मनवो मुनयः सर्वे देवसिद्धतपस्विनः

brahmaviṣṇuśivānantadharmendrendudivākarāḥ | manavo munayaḥ sarve devasiddhatapasvinaḥ

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अनन्त, धर्म, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, सभी मनु, मुनि, देवता, सिद्ध तथा तपस्वी —

श्लोक 86 (devibhagavatam.9.13.86)

गोलोकं च समाजग्मुः शुष्ककण्ठोष्ठतालुकाः । सर्वे प्रणेमुर्गोविन्दं सर्वेशं प्रकृतेः परम्

golokaṁ ca samājagmuḥ śuṣkakaṇṭhoṣṭhatālukāḥ | sarve praṇemurgovindaṁ sarveśaṁ prakṛteḥ param

सूखे कण्ठ-ओष्ठ-तालु वाले होकर सब गोलोक में एकत्र हुए; उन सबने प्रकृति से परे सर्वेश्वर गोविन्द को प्रणाम किया।

श्लोक 87 (devibhagavatam.9.13.87)

वरं वरेण्यं वरदं वरिष्ठं वरकारणम् । गोपिकागोपवृन्दानां सर्वेषां प्रवरं प्रभुम्

varaṁ vareṇyaṁ varadaṁ variṣṭhaṁ varakāraṇam | gopikāgopavṛndānāṁ sarveṣāṁ pravaraṁ prabhum

वर, वरणीय, वरदाता, सबसे श्रेष्ठ, वर के कारणस्वरूप, गोपिकाओं और गोपों के समूहों में सबसे श्रेष्ठ प्रभु —

श्लोक 88 (devibhagavatam.9.13.88)

निरीहं च निराकारं निर्लिप्तं च निराश्रयम् । निर्गुणं च निरुत्साहं निर्विकारं निरञ्जनम्

nirīhaṁ ca nirākāraṁ nirliptaṁ ca nirāśrayam | nirguṇaṁ ca nirutsāhaṁ nirvikāraṁ nirañjanam

निष्काम, निराकार, निर्लिप्त, निराश्रय, निर्गुण, निरुत्साह, निर्विकार तथा निरंजन —

श्लोक 89 (devibhagavatam.9.13.89)

स्वेच्छामयं च साकारं भक्तानुग्रहकारकम् । सत्त्वस्वरूपं सत्येशं साक्षिरूपं सनातनम्

svecchāmayaṁ ca sākāraṁ bhaktānugrahakārakam | sattvasvarūpaṁ satyeśaṁ sākṣirūpaṁ sanātanam

स्वेच्छामय भी, साकार भी, भक्तों पर अनुग्रह करने वाला, सत्त्वस्वरूप, सत्य के स्वामी, साक्षीरूप तथा सनातन —

श्लोक 90 (devibhagavatam.9.13.90)

परं परेशं परमं परमात्मानमीश्वरम् । प्रणम्य तुष्टुवुः सर्वे भक्तिनम्रात्मकन्धराः

paraṁ pareśaṁ paramaṁ paramātmānamīśvaram | praṇamya tuṣṭuvuḥ sarve bhaktinamrātmakandharāḥ

परम, परमेश्वर, सर्वोच्च परमात्मा ईश्वर को प्रणाम करके, भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर सबने स्तुति की।

श्लोक 91 (devibhagavatam.9.13.91)

सगद्गदाः साश्रुनेत्राः पुलकाङ्कितविग्रहाः । सर्वे संस्तूय सर्वेशं भगवन्तं परात्परम्

sagadgadāḥ sāśrunetrāḥ pulakāṅkitavigrahāḥ | sarve saṁstūya sarveśaṁ bhagavantaṁ parātparam

गद्गद कण्ठ, अश्रुपूर्ण नेत्र तथा रोमांचित शरीर वाले सभी ने सर्वेश्वर भगवान परात्पर की स्तुति की —

श्लोक 92 (devibhagavatam.9.13.92)

ज्योतिर्मयं परं ब्रह्म सर्वकारणकारणम् । अमूल्यरत्ननिर्माणचित्रसिंहासनस्थितम्

jyotirmayaṁ paraṁ brahma sarvakāraṇakāraṇam | amūlyaratnanirmāṇacitrasiṁhāsanasthitam

ज्योतिर्मय परब्रह्म, सभी कारणों के भी कारण, अमूल्य रत्नों से बने विचित्र सिंहासन पर विराजमान —

श्लोक 93 (devibhagavatam.9.13.93)

सेव्यमानं च गोपालैः श्वेतचामरवायुना । गोपालिकानृत्यगीतं पश्यन्तं सस्मितं मुदा

sevyamānaṁ ca gopālaiḥ śvetacāmaravāyunā | gopālikānṛtyagītaṁ paśyantaṁ sasmitaṁ mudā

गोपालों द्वारा श्वेत चामर के वायु से सेवित, गोपिकाओं के नृत्य-गान को हर्षपूर्वक मुस्कुराते हुए देखते हुए —

श्लोक 94 (devibhagavatam.9.13.94)

प्राणाधिकप्रियतमं राधावक्षःस्थलस्थितम् । तया प्रदत्तं ताम्बूलं भुक्तवन्तं सुवासितम्

prāṇādhikapriyatamaṁ rādhāvakṣaḥsthalasthitam | tayā pradattaṁ tāmbūlaṁ bhuktavantaṁ suvāsitam

प्राणों से भी अधिक प्रिय, राधा के वक्षःस्थल पर स्थित, उनके द्वारा दिए गए सुवासित ताम्बूल को खाते हुए —

श्लोक 95 (devibhagavatam.9.13.95)

परिपूर्णतमं रासे ददृशुश्च सुरेश्वरम् । मुनयो मनवः सिद्धास्तापसाश्च तपस्विनः

paripūrṇatamaṁ rāse dadṛśuśca sureśvaram | munayo manavaḥ siddhāstāpasāśca tapasvinaḥ

उस परिपूर्णतम सुरेश्वर को रास में देखा; मुनि, मनु, सिद्ध तथा तपस्वी सभी ने —

श्लोक 96 (devibhagavatam.9.13.96)

प्रहृष्टमनसः सर्वे जग्मुः परमविस्मयम् । परस्परं समालोक्य प्रोचुस्ते च चतुर्मुखम्

prahṛṣṭamanasaḥ sarve jagmuḥ paramavismayam | parasparaṁ samālokya procuste ca caturmukham

सभी हर्षित मन से परम विस्मय को प्राप्त हुए; परस्पर देखकर उन्होंने चतुर्मुख ब्रह्मा से कहा —

श्लोक 97 (devibhagavatam.9.13.97)

निवेदितं जगन्नाथं स्वाभिप्रायमभीप्सितम् । ब्रह्मा तद्वचनं श्रुत्वा विष्णुं कृत्वा स्वदक्षिणे

niveditaṁ jagannāthaṁ svābhiprāyamabhīpsitam | brahmā tadvacanaṁ śrutvā viṣṇuṁ kṛtvā svadakṣiṇe

कि जगन्नाथ को हमारा अभिप्राय और अभीष्ट कामना निवेदित की जाए; ब्रह्मा ने उनका वचन सुनकर, विष्णु को अपने दाहिने भाग में करके —

श्लोक 98 (devibhagavatam.9.13.98)

वामतो वामदेवं च जगाम कृष्णसन्निधिम् । परमानन्दयुक्तं च परमानन्दरूपिणीम्

vāmato vāmadevaṁ ca jagāma kṛṣṇasannidhim | paramānandayuktaṁ ca paramānandarūpiṇīm

तथा वामदेव को अपने बाएँ भाग में करके, कृष्ण के समीप गए, जो परमानन्द से युक्त थे तथा परमानन्दस्वरूपा राधा के साथ थे।

श्लोक 99 (devibhagavatam.9.13.99)

सर्वं कृष्णमयं धाता ददर्श रासमण्डले । सर्वं समानवेषं च समानासनसंस्थितम्

sarvaṁ kṛṣṇamayaṁ dhātā dadarśa rāsamaṇḍale | sarvaṁ samānaveṣaṁ ca samānāsanasaṁsthitam

विधाता ब्रह्मा ने रासमण्डल में सब कुछ कृष्णमय देखा — सब समान वेष वाला तथा समान आसन पर स्थित —

श्लोक 100 (devibhagavatam.9.13.100)

द्विभुजं मुरलीहस्तं वनमालाविभूषितम् । मयूरपिच्छचूडं च कौस्तुभेन विराजितम्

dvibhujaṁ muralīhastaṁ vanamālāvibhūṣitam | mayūrapicchacūḍaṁ ca kaustubhena virājitam

द्विभुज, हाथ में मुरली, वनमाला से विभूषित, मयूरपंख से सुशोभित शिखा वाला तथा कौस्तुभ मणि से सुशोभित —

श्लोक 101 (devibhagavatam.9.13.101)

अतीव कमनीयं च सुन्दरं शान्तविग्रहम् । गुणभूषणरूपेण तेजसा वयसा त्विषा

atīva kamanīyaṁ ca sundaraṁ śāntavigraham | guṇabhūṣaṇarūpeṇa tejasā vayasā tviṣā

अत्यन्त कमनीय, सुन्दर, शान्त शरीर वाला, गुणों के आभूषणरूप, तेज, वय तथा कान्ति में —

श्लोक 102 (devibhagavatam.9.13.102)

परिपूर्णतमं सर्वं सर्वैश्वर्यसमन्वितम् । किं सेव्यं सेवकं किं वा दृष्ट्वा निर्वक्तुमक्षमः

paripūrṇatamaṁ sarvaṁ sarvaiśvaryasamanvitam | kiṁ sevyaṁ sevakaṁ kiṁ vā dṛṣṭvā nirvaktumakṣamaḥ

सर्वत्र परिपूर्णतम तथा सभी ऐश्वर्यों से युक्त — यह देखकर वे यह भी नहीं कह सके कि कौन सेव्य है और कौन सेवक।

श्लोक 103 (devibhagavatam.9.13.103)

क्षणं तेजः स्वरूपं च रूपं तत्र स्थितं क्षणम् । निराकारं च साकारं ददर्श द्विविधं क्षणम्

kṣaṇaṁ tejaḥ svarūpaṁ ca rūpaṁ tatra sthitaṁ kṣaṇam | nirākāraṁ ca sākāraṁ dadarśa dvividhaṁ kṣaṇam

एक क्षण उसने तेजस्वरूप को देखा, एक क्षण उसी में स्थित रूप को; एक क्षण निराकार को तथा एक क्षण साकार को — इस प्रकार दोनों रूपों को देखा।

श्लोक 104 (devibhagavatam.9.13.104)

एकमेव क्षणं कृष्णं राधया रहितं परम् । प्रत्येकासनसंस्थं च तया सार्धं च तत्क्षणम्

ekameva kṣaṇaṁ kṛṣṇaṁ rādhayā rahitaṁ param | pratyekāsanasaṁsthaṁ ca tayā sārdhaṁ ca tatkṣaṇam

एक ही क्षण उसने कृष्ण को राधा से रहित परम रूप में देखा, प्रत्येक आसन पर पृथक् स्थित; तथा उसी क्षण उन्हें राधा के साथ भी देखा।

श्लोक 105 (devibhagavatam.9.13.105)

राधारूपधरं कृष्णं कृष्णरूपं कलत्रकम् । किं स्त्रीरूपं च पुरुषं विधाता ध्यातुमक्षमः

rādhārūpadharaṁ kṛṣṇaṁ kṛṣṇarūpaṁ kalatrakam | kiṁ strīrūpaṁ ca puruṣaṁ vidhātā dhyātumakṣamaḥ

कृष्ण को राधा का रूप धारण किए हुए, तथा उसकी पत्नी को कृष्ण के रूप में भी देखा; विधाता यह ध्यान करने में भी असमर्थ हो गए कि कौन स्त्रीरूप है और कौन पुरुष।

श्लोक 106 (devibhagavatam.9.13.106)

हृत्पद्मस्थं च श्रीकृष्णं ध्यात्वा ध्यानेन चक्षुषा । चकार स्तवनं भक्त्या परिहारमनेकधा

hṛtpadmasthaṁ ca śrīkṛṣṇaṁ dhyātvā dhyānena cakṣuṣā | cakāra stavanaṁ bhaktyā parihāramanekadhā

अपने हृदय-कमल में स्थित श्रीकृष्ण का ध्यान करके, ध्यान-रूपी नेत्र से उन्हें देखकर भक्तिपूर्वक अनेक प्रकार से स्तुति और प्रायश्चित किया।

श्लोक 107 (devibhagavatam.9.13.107)

ततः स्वचक्षुरुन्मील्य पुनश्च तदनुज्ञया । ददर्श कृष्णमेकं च राधावक्षःस्थलस्थितम्

tataḥ svacakṣurunmīlya punaśca tadanujñayā | dadarśa kṛṣṇamekaṁ ca rādhāvakṣaḥsthalasthitam

फिर अपने नेत्र खोलकर, उनकी आज्ञा से पुनः उसने एक ही कृष्ण को देखा, जो राधा के वक्षःस्थल पर स्थित थे।

श्लोक 108 (devibhagavatam.9.13.108)

स्वपार्षदैः परिवृतं गोपीमण्डलमण्डितम् । पुनः प्रणेमुस्तं दृष्ट्वा तुष्टुवुः परमेश्वरम्

svapārṣadaiḥ parivṛtaṁ gopīmaṇḍalamaṇḍitam | punaḥ praṇemustaṁ dṛṣṭvā tuṣṭuvuḥ parameśvaram

अपने पार्षदों से घिरे तथा गोपी-मण्डल से सुशोभित, उन्हें देखकर सबने पुनः प्रणाम किया तथा परमेश्वर की स्तुति की।

श्लोक 109 (devibhagavatam.9.13.109)

तदभिप्रायमाज्ञाय तानुवाच रमेश्वरः । सर्वात्मा स च सर्वज्ञः सर्वेशः सर्वभावनः

tadabhiprāyamājñāya tānuvāca rameśvaraḥ | sarvātmā sa ca sarvajñaḥ sarveśaḥ sarvabhāvanaḥ

उनका अभिप्राय जानकर, सर्वात्मा, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर तथा सबकी भावना को जानने वाले रमेश्वर ने उनसे कहा —

श्लोक 110 (devibhagavatam.9.13.110)

श्रीभगवानुवाच । आगच्छ कुशलं ब्रह्मन्नागच्छ कमलापते । इहागच्छ महादेव शश्वत्कुशलमस्तु वः

śrībhagavānuvāca | āgaccha kuśalaṁ brahmannāgaccha kamalāpate | ihāgaccha mahādeva śaśvatkuśalamastu vaḥ

श्रीभगवान ने कहा — हे ब्रह्मन्! आओ, कुशल हो; हे कमलापते! आओ; हे महादेव! यहाँ आओ; तुम सबका सदा कल्याण हो।

श्लोक 111 (devibhagavatam.9.13.111)

आगता हि महाभागा गङ्गानयनकारणात् । गङ्गा च चरणाम्भोजे भयेन शरणं गता

āgatā hi mahābhāgā gaṅgānayanakāraṇāt | gaṅgā ca caraṇāmbhoje bhayena śaraṇaṁ gatā

तुम सब इसलिए आए हो कि गंगा को यहाँ से ले जाना है; गंगा भय के कारण मेरे चरणकमल की शरण में आ गई है।

श्लोक 112 (devibhagavatam.9.13.112)

राधेमां पातुमिच्छन्ती दृष्ट्वा मत्सन्निधानतः । दास्यामीमां च भवतां यूयं कुरुत निर्भयाम्

rādhemāṁ pātumicchantī dṛṣṭvā matsannidhānataḥ | dāsyāmīmāṁ ca bhavatāṁ yūyaṁ kuruta nirbhayām

राधा उसे पी लेना चाहती थी, यह देखकर मैंने उसे अपने पास ले लिया; अब मैं इसे तुम्हें दे देता हूँ, तुम सब इसे निर्भय कर दो।

श्लोक 113 (devibhagavatam.9.13.113)

श्रीकृष्णस्य वचः श्रुत्वा सस्मितः कमलोद्भवः । तुष्टाव राधामाराध्यां श्रीकृष्णपरिपूजिताम्

śrīkṛṣṇasya vacaḥ śrutvā sasmitaḥ kamalodbhavaḥ | tuṣṭāva rādhāmārādhyāṁ śrīkṛṣṇaparipūjitām

श्रीकृष्ण के वचन सुनकर मुस्कुराते हुए कमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने आराध्य तथा श्रीकृष्ण द्वारा भी पूजित राधा की स्तुति की।

श्लोक 114 (devibhagavatam.9.13.114)

वक्त्रैश्चतुर्भिः संस्तूय भक्तिनम्रात्मकन्धरः । धाता चतुर्णां वेदानामुवाच चतुराननः

vaktraiścaturbhiḥ saṁstūya bhaktinamrātmakandharaḥ | dhātā caturṇāṁ vedānāmuvāca caturānanaḥ

भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर, अपने चारों मुखों से स्तुति करके, चारों वेदों के विधाता चतुर्मुख ब्रह्मा ने कहा —

श्लोक 115 (devibhagavatam.9.13.115)

चतुरानन उवाच । गङ्गा त्वदङ्गसम्भूता प्रभोश्च रासमण्डले । युवयोर्द्रवरूपा सा मुग्धयोः शङ्करस्वनात्

caturānana uvāca | gaṅgā tvadaṅgasambhūtā prabhośca rāsamaṇḍale | yuvayordravarūpā sā mugdhayoḥ śaṅkarasvanāt

चतुरानन ने कहा — गंगा आपके अंग तथा प्रभु के अंग से रासमण्डल में उत्पन्न हुई हैं; तुम दोनों की, मुग्ध होते समय शंकर के संगीत से उत्पन्न, वे द्रवरूपा हैं।

श्लोक 116 (devibhagavatam.9.13.116)

कृष्णांशा च त्वदंशा च त्वत्कन्यासदृशी प्रिया । त्वन्मन्त्रग्रहणं कृत्वा करोतु तव पूजनम्

kṛṣṇāṁśā ca tvadaṁśā ca tvatkanyāsadṛśī priyā | tvanmantragrahaṇaṁ kṛtvā karotu tava pūjanam

वे कृष्ण की भी अंश हैं और आपकी भी अंश हैं, आपकी पुत्री के समान प्रिय हैं; वे आपका मन्त्र ग्रहण करके आपकी पूजा करें।

श्लोक 117 (devibhagavatam.9.13.117)

भविष्यति पतिस्तस्या वैकुण्ठेशश्चतुर्भुजः । भूस्थायाः कलया तस्याः पतिर्लवणवारिधिः

bhaviṣyati patistasyā vaikuṇṭheśaścaturbhujaḥ | bhūsthāyāḥ kalayā tasyāḥ patirlavaṇavāridhiḥ

उनका पति वैकुण्ठेश चतुर्भुज नारायण होंगे; पृथ्वी पर स्थित उनकी कला का पति खारा समुद्र होगा।

श्लोक 118 (devibhagavatam.9.13.118)

गोलोकस्था च या गङ्गा सर्वत्रस्था तथाम्बिके । तदम्बिका त्वं देवेशी सर्वदा सा त्वदात्मजा

golokasthā ca yā gaṅgā sarvatrasthā tathāmbike | tadambikā tvaṁ deveśī sarvadā sā tvadātmajā

हे अम्बिके! गोलोक में स्थित तथा सर्वत्र व्याप्त वह गंगा — हे देवेशी! आप ही उनकी माता हैं, वे सदा आपकी ही पुत्री हैं।

श्लोक 119 (devibhagavatam.9.13.119)

ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा स्वीचकार च सस्मिता । वहिर्बभूव सा कृष्णपादाङ्गुष्ठनखाग्रतः

brahmaṇo vacanaṁ śrutvā svīcakāra ca sasmitā | vahirbabhūva sā kṛṣṇapādāṅguṣṭhanakhāgrataḥ

ब्रह्मा के वचन सुनकर, मुस्कुराते हुए राधा ने उसे स्वीकार कर लिया; वह गंगा कृष्ण के चरण-अंगूठे के नखाग्र से बाहर प्रकट हुईं।

श्लोक 120 (devibhagavatam.9.13.120)

तत्रैव सत्कृता शान्ता तस्थौ तेषां च मध्यतः । उवास तोयादुत्थाय तदधिष्ठातृदेवता

tatraiva satkṛtā śāntā tasthau teṣāṁ ca madhyataḥ | uvāsa toyādutthāya tadadhiṣṭhātṛdevatā

वहीं सम्मानित होकर, शान्त होकर वह उनके मध्य में खड़ी रहीं; जल से उठकर वह अधिष्ठात्री देवी उनके साथ विराजमान हुईं।

श्लोक 121 (devibhagavatam.9.13.121)

तत्तोयं ब्रह्मणा किञ्चित्स्थापितं च कमण्डलौ । किञ्चिद्दधार शिरसि चन्द्रार्धकृतशेखरः

tattoyaṁ brahmaṇā kiñcitsthāpitaṁ ca kamaṇḍalau | kiñciddadhāra śirasi candrārdhakṛtaśekharaḥ

उस जल को ब्रह्मा ने कुछ अपने कमण्डलु में स्थापित किया, तथा अर्धचन्द्र को शिखा बनाने वाले शिव ने कुछ अपने मस्तक पर धारण किया।

श्लोक 122 (devibhagavatam.9.13.122)

गङ्गायै राधिकामन्त्रं प्रददौ कमलोद्भवः । तत्स्तोत्रं कवचं पूजां विधानं ध्यानमेव च

gaṅgāyai rādhikāmantraṁ pradadau kamalodbhavaḥ | tatstotraṁ kavacaṁ pūjāṁ vidhānaṁ dhyānameva ca

कमलज ब्रह्मा ने गंगा को राधिका का मन्त्र प्रदान किया, तथा उसका स्तोत्र, कवच, पूजा-विधान तथा ध्यान भी दिया।

श्लोक 123 (devibhagavatam.9.13.123)

सर्वं तत्सामवेदोक्तं पुरश्चर्याक्रमं तथा । गङ्गा तामेव सम्पूज्य वैकुण्ठं प्रययौ सह

sarvaṁ tatsāmavedoktaṁ puraścaryākramaṁ tathā | gaṅgā tāmeva sampūjya vaikuṇṭhaṁ prayayau saha

यह सब सामवेद में कहा गया है, तथा पुरश्चरण का क्रम भी; गंगा उसी राधिका की पूजा करके साथ में वैकुण्ठ चली गईं।

श्लोक 124 (devibhagavatam.9.13.124)

लक्ष्मीः सरस्वती गङ्गा तुलसी विश्वपावनी । एता नारायणस्यैव चतस्रो योषितो मुने

lakṣmīḥ sarasvatī gaṅgā tulasī viśvapāvanī | etā nārāyaṇasyaiva catasro yoṣito mune

लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा तथा विश्व को पवित्र करने वाली तुलसी — हे मुने! ये चारों नारायण की ही पत्नियाँ हैं।

श्लोक 125 (devibhagavatam.9.13.125)

अथ तं सस्मितः कृष्णो ब्रह्माणं समुवाच सः । सर्वकालस्य वृत्तान्तं दुर्बोधमविपश्चितम्

atha taṁ sasmitaḥ kṛṣṇo brahmāṇaṁ samuvāca saḥ | sarvakālasya vṛttāntaṁ durbodhamavipaścitam

तब मुस्कुराते हुए कृष्ण ने उस ब्रह्मा से काल का वह वृत्तान्त कहा, जो अल्पज्ञों के लिए दुर्बोध है।

श्लोक 126 (devibhagavatam.9.13.126)

श्रीकृष्ण उवाच । गृहाण गङ्गां हे ब्रह्मन् हे विष्णो हे महेश्वर । शृणु कालस्य वृत्तान्तं मत्तो ब्रह्मन्निशामय

śrīkṛṣṇa uvāca | gṛhāṇa gaṅgāṁ he brahman he viṣṇo he maheśvara | śṛṇu kālasya vṛttāntaṁ matto brahmanniśāmaya

श्रीकृष्ण ने कहा — हे ब्रह्मन्! हे विष्णो! हे महेश्वर! गंगा को ग्रहण करो; हे ब्रह्मन्! मुझसे काल का वृत्तान्त सुनो, ध्यान से सुनो।

श्लोक 127 (devibhagavatam.9.13.127)

यूयं च येऽन्ये देवाश्च मुनयो मनवस्तथा । सिद्धा यशस्विनश्चैव ये येऽत्रैव समागताः

yūyaṁ ca ye'nye devāśca munayo manavastathā | siddhā yaśasvinaścaiva ye ye'traiva samāgatāḥ

तुम सब तथा जो अन्य देवता, मुनि, मनु, सिद्ध तथा यशस्वी जन यहाँ एकत्र हुए हैं —

श्लोक 128 (devibhagavatam.9.13.128)

एते जीवन्ति गोलोके कालचक्रविवर्जिते । जलाप्लुते सर्वविश्वं जातं कल्पक्षयोऽधुना

ete jīvanti goloke kālacakravivarjite | jalāplute sarvaviśvaṁ jātaṁ kalpakṣayo'dhunā

ये सब गोलोक में काल-चक्र से रहित होकर जीवित रहते हैं; अभी सम्पूर्ण विश्व जलमग्न हो गया है, यह कल्प का क्षय हुआ है।

श्लोक 129 (devibhagavatam.9.13.129)

ब्रह्माद्या येऽन्यविश्वस्थास्ते विलीनाधुना मयि । वैकुण्ठं च विना सर्वं जलमग्नं च पद्मज

brahmādyā ye'nyaviśvasthāste vilīnādhunā mayi | vaikuṇṭhaṁ ca vinā sarvaṁ jalamagnaṁ ca padmaja

ब्रह्मा आदि जो अन्य विश्वों में स्थित थे, वे अभी मुझमें लीन हो गए हैं; हे पद्मज! वैकुण्ठ को छोड़कर सब कुछ जलमग्न हो गया है।

श्लोक 130 (devibhagavatam.9.13.130)

गत्वा सृष्टिं कुरु पुनर्ब्रह्मलोकादिकं भवम् । स्वं ब्रह्माण्डं विरचय पश्चाद् गङ्गा प्रयास्यति

gatvā sṛṣṭiṁ kuru punarbrahmalokādikaṁ bhavam | svaṁ brahmāṇḍaṁ viracaya paścād gaṅgā prayāsyati

जाकर पुनः ब्रह्मलोक आदि की सृष्टि करो, अपने ब्रह्माण्ड की रचना करो; उसके बाद गंगा वहाँ जाएगी।

श्लोक 131 (devibhagavatam.9.13.131)

एवमन्येषु विश्वेषु सृष्टौ ब्रह्मादिकं पुनः । करोम्यहं पुनः सृष्टिं गच्छ शीघ्रं सुरैः सह

evamanyeṣu viśveṣu sṛṣṭau brahmādikaṁ punaḥ | karomyahaṁ punaḥ sṛṣṭiṁ gaccha śīghraṁ suraiḥ saha

इसी प्रकार अन्य विश्वों में भी मैं फिर से ब्रह्मा आदि की सृष्टि करूँगा और पुनः सृष्टि रचूँगा; तुम सब देवताओं के साथ शीघ्र जाओ।

श्लोक 132 (devibhagavatam.9.13.132)

गतो बहुतरः कालो युष्माकं च चतुर्मुखाः । गताः कतिविधास्ते च भविष्यन्ति च वेधसः

gato bahutaraḥ kālo yuṣmākaṁ ca caturmukhāḥ | gatāḥ katividhāste ca bhaviṣyanti ca vedhasaḥ

तुम्हारे लिए बहुत अधिक काल बीत गया है; कितने ही चतुर्मुख ब्रह्मा हो चुके हैं और कितने ही और होंगे।

श्लोक 133 (devibhagavatam.9.13.133)

इत्युक्त्वा राधिकानाथो जगामान्तःपुरे मुने । देवा गत्वा पुनः सृष्टिं चक्रुरेव प्रयत्नतः

ityuktvā rādhikānātho jagāmāntaḥpure mune | devā gatvā punaḥ sṛṣṭiṁ cakrureva prayatnataḥ

हे मुने! ऐसा कहकर राधिका के स्वामी अपने अन्तःपुर में चले गए; देवता जाकर पुनः प्रयत्नपूर्वक सृष्टि रचने लगे।

श्लोक 134 (devibhagavatam.9.13.134)

गोलोके च स्थिता गङ्गा वैकुण्ठे शिवलोकके । ब्रह्मलोके स्थितान्यत्र यत्र यत्र पुरः स्थिता

goloke ca sthitā gaṅgā vaikuṇṭhe śivalokake | brahmaloke sthitānyatra yatra yatra puraḥ sthitā

गंगा गोलोक में, वैकुण्ठ में, शिवलोक में तथा ब्रह्मलोक में — जहाँ-जहाँ पहले वे स्थित थीं —

श्लोक 135 (devibhagavatam.9.13.135)

तत्रैव सा गता गङ्गा चाज्ञया परमात्मनः । निर्गता विष्णुपादाब्जात्तेन विष्णुपदी स्मृता

tatraiva sā gatā gaṅgā cājñayā paramātmanaḥ | nirgatā viṣṇupādābjāttena viṣṇupadī smṛtā

परमात्मा की आज्ञा से वह गंगा उन्हीं स्थानों में गईं; विष्णु के चरणकमल से निकलने के कारण वे "विष्णुपदी" कही गईं।

श्लोक 136 (devibhagavatam.9.13.136)

इत्येवं कथितं ब्रह्मन् गङ्गोपाख्यानमुत्तमम् । सुखदं मोक्षदं सारं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि

ityevaṁ kathitaṁ brahman gaṅgopākhyānamuttamam | sukhadaṁ mokṣadaṁ sāraṁ kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi

हे ब्राह्मण! इस प्रकार यह उत्तम गंगा-उपाख्यान कहा गया, जो सुखदायक, मोक्षदायक तथा सारभूत है; अब और क्या सुनना चाहते हो?

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