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नवम स्कन्ध · अध्याय 19

शंखचूड के साथ तुलसी-संगम (आगे)

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

श्लोक 1 (devibhagavatam.9.19.1)

नारद उवाच । विचित्रमिदमाख्यानं भवता समुदाहृतम् । श्रुतेन येन मे तृप्तिर्न कदापि हि जायते

nārada uvāca | vicitramidamākhyānaṁ bhavatā samudāhṛtam | śrutena yena me tṛptirna kadāpi hi jāyate

नारद ने कहा — आपने यह अद्भुत आख्यान कहा; इसे सुनकर मुझे कभी तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 2 (devibhagavatam.9.19.2)

ततः परं तु यज्जातं तत्त्वं वद महामते । श्रीनारायण उवाच । इत्येवमाशिषं दत्त्वा स्वालयं च ययौ विधिः

tataḥ paraṁ tu yajjātaṁ tattvaṁ vada mahāmate | śrīnārāyaṇa uvāca | ityevamāśiṣaṁ dattvā svālayaṁ ca yayau vidhiḥ

उसके बाद जो हुआ, वह सत्य मुझे बताइए, हे महामते! श्री नारायण ने कहा — इस प्रकार आशीर्वाद देकर विधाता अपने धाम को चले गए।

श्लोक 3 (devibhagavatam.9.19.3)

गान्धर्वेण विवाहेन जगृहे तां च दानवः । स्वर्गे दुन्दुभिवाद्यं च पुष्पवृष्टिर्बभूव ह

gāndharveṇa vivāhena jagṛhe tāṁ ca dānavaḥ | svarge dundubhivādyaṁ ca puṣpavṛṣṭirbabhūva ha

गान्धर्व विवाह-विधि से दानव ने उसे ग्रहण किया; स्वर्ग में दुन्दुभि बजने लगीं और पुष्पवर्षा हुई।

श्लोक 4 (devibhagavatam.9.19.4)

स रेमे रामया सार्धं वासगेहे मनोरमे । मूर्च्छां सा प्राप तुलसी नवसङ्गमसङ्गता

sa reme rāmayā sārdhaṁ vāsagehe manorame | mūrcchāṁ sā prāpa tulasī navasaṅgamasaṅgatā

वह अपनी प्रिया के साथ मनोरम शयनकक्ष में रमण करने लगा; नए संगम में लीन तुलसी मूर्च्छित हो गईं।

श्लोक 5 (devibhagavatam.9.19.5)

निमग्ना निर्जले साध्वी सम्भोगसुखसागरे । चतुःषष्टिकलामानं चतुःषष्टिविधं सुखम्

nimagnā nirjale sādhvī sambhogasukhasāgare | catuḥṣaṣṭikalāmānaṁ catuḥṣaṣṭividhaṁ sukham

वह साध्वी मानो जलरहित भोग-सुख के सागर में डूब गईं; चौंसठ कलाओं तथा चौंसठ प्रकार के सुखों में से —

श्लोक 6 (devibhagavatam.9.19.6)

कामशास्त्रे यन्निरुक्तं रसिकानां यथेप्सितम् । अङ्गप्रत्यङ्गसंश्लेषपूर्वकं स्त्रीमनोहरम्

kāmaśāstre yanniruktaṁ rasikānāṁ yathepsitam | aṅgapratyaṅgasaṁśleṣapūrvakaṁ strīmanoharam

— जो कामशास्त्र में वर्णित हैं, जो रसिकजनों को अभीष्ट हैं, अंग-प्रत्यंग के आलिंगनपूर्वक स्त्रियों को मनोहर लगने वाले —

श्लोक 7 (devibhagavatam.9.19.7)

तत्सर्वं रसशृङ्गारं चकार रसिकेश्वरः । अतीव रम्यदेशे च सर्वजन्तुविवर्जिते

tatsarvaṁ rasaśṛṅgāraṁ cakāra rasikeśvaraḥ | atīva ramyadeśe ca sarvajantuvivarjite

— वह सारा रसमय शृंगार उस रसिकेश्वर ने किया, अत्यंत रमणीय, समस्त जीवों से रहित स्थान में —

श्लोक 8 (devibhagavatam.9.19.8)

पुष्पचन्दनतल्पे च पुष्पचन्दनवायुना । पुष्पोद्याने नदीतीरे पुष्पचन्दनचर्चिते

puṣpacandanatalpe ca puṣpacandanavāyunā | puṣpodyāne nadītīre puṣpacandanacarcite

— पुष्प-चन्दन की शय्या पर, पुष्प-चन्दन की सुगन्धित वायु में, नदी के तट पर पुष्पवाटिका में, पुष्प-चन्दन से अनुलिप्त होकर —

श्लोक 9 (devibhagavatam.9.19.9)

गहीत्वा रसिको रासे पुष्पचन्दनचर्चिताम् । भूषितो भूषणेनैव रत्नभूषणभूषिताम्

gahītvā rasiko rāse puṣpacandanacarcitām | bhūṣito bhūṣaṇenaiva ratnabhūṣaṇabhūṣitām

— वह रसिक अपनी पुष्प-चन्दन से अनुलिप्त प्रिया को रासक्रीड़ा में ग्रहण कर, स्वयं आभूषणों से तथा उसे रत्नाभूषणों से सुसज्जित कर —

श्लोक 10 (devibhagavatam.9.19.10)

सुरते विरतिर्नास्ति तयोः सुरतिविज्ञयोः । जहार मानसं भर्तुर्लोलया लीलया सती

surate viratirnāsti tayoḥ surativijñayoḥ | jahāra mānasaṁ bharturlolayā līlayā satī

— प्रेम-कला में निपुण उन दोनों की रतिक्रीड़ा का कोई विराम न हुआ; उस सती ने अपनी चंचल लीला से अपने पति का मन हर लिया।

श्लोक 11 (devibhagavatam.9.19.11)

चेतनां रसिकायाश्च जहार रसभाववित् । वक्षसश्चन्दनं राज्ञस्तिलकं विजहार सा

cetanāṁ rasikāyāśca jahāra rasabhāvavit | vakṣasaścandanaṁ rājñastilakaṁ vijahāra sā

रसभाव के ज्ञाता उसने भी अपनी रसिका की चेतना हर ली; उसने राजा के वक्षस्थल का चन्दन और उसका तिलक भी ले लिया।

श्लोक 12 (devibhagavatam.9.19.12)

स च जहार तस्याश्च सिन्दूरं बिन्दुपत्रकम् । तद्वक्षस्युरोजे च नखरेखां ददौ मुदा

sa ca jahāra tasyāśca sindūraṁ bindupatrakam | tadvakṣasyuroje ca nakharekhāṁ dadau mudā

और उसने उसके सिन्दूर तथा बिन्दी-पत्रक को ले लिया; और आनन्दपूर्वक उसके वक्षस्थल पर नख की रेखाएँ अंकित कर दीं।

श्लोक 13 (devibhagavatam.9.19.13)

सा ददौ तद्वामपार्श्वे करभूषणलक्षणम् । राजा तदोष्ठपुटके ददौ रदनदंशनम्

sā dadau tadvāmapārśve karabhūṣaṇalakṣaṇam | rājā tadoṣṭhapuṭake dadau radanadaṁśanam

उसने उसके बाएँ पार्श्व में अपने हस्त-आभूषण का चिह्न अंकित किया; राजा ने उसके अधरोष्ठ पर दन्त-दंश का चिह्न छोड़ा।

श्लोक 14 (devibhagavatam.9.19.14)

तद्गण्डयुगले सा च प्रददौ तच्चतुर्गुणम् । आलिङ्गनं चुम्बनं च जङ्घादिमर्दनं तथा

tadgaṇḍayugale sā ca pradadau taccaturguṇam | āliṅganaṁ cumbanaṁ ca jaṅghādimardanaṁ tathā

उसके दोनों गालों पर उसने वह चिह्न चौगुना कर दिया; इस प्रकार आलिंगन, चुम्बन तथा जंघादि-मर्दन होता रहा।

श्लोक 15 (devibhagavatam.9.19.15)

एवं परस्परं क्रीडां चक्रतुस्तौ विजानतौ । सुरते विरते तौ च समुत्थाय परस्परम्

evaṁ parasparaṁ krīḍāṁ cakratustau vijānatau | surate virate tau ca samutthāya parasparam

इस प्रकार वे दोनों निपुण होकर परस्पर क्रीड़ा करते रहे; रति समाप्त होने पर वे दोनों साथ उठकर —

श्लोक 16 (devibhagavatam.9.19.16)

सुवेषं चक्रतुस्तत्र यद्यन्मनसि वाञ्छितम् । चन्दनैः कुङ्कुमारक्तैः सा तस्य तिलकं ददौ

suveṣaṁ cakratustatra yadyanmanasi vāñchitam | candanaiḥ kuṅkumāraktaiḥ sā tasya tilakaṁ dadau

— वहाँ अपनी-अपनी इच्छानुसार शृंगार करने लगे; कुंकुम-मिश्रित चन्दन से उसने उसके ललाट पर तिलक लगाया —

श्लोक 17 (devibhagavatam.9.19.17)

सर्वाङ्गे सुन्दरे रम्ये चकार चानुलेपनम् । सुवासं चैव ताम्बूलं वह्निशुद्धे च वाससी

sarvāṅge sundare ramye cakāra cānulepanam | suvāsaṁ caiva tāmbūlaṁ vahniśuddhe ca vāsasī

— और उसके सुन्दर, रम्य सम्पूर्ण अंग पर लेपन किया; और सुगन्धित द्रव्य, ताम्बूल तथा अग्नि से शुद्ध किए गए दो वस्त्र भी दिए —

श्लोक 18 (devibhagavatam.9.19.18)

पारिजातस्य कुसुमं जरारोगहरं परम् । अमूल्यरत्ननिर्माणमङ्गुलीयकमुत्तमम्

pārijātasya kusumaṁ jarārogaharaṁ param | amūlyaratnanirmāṇamaṅgulīyakamuttamam

— पारिजात का पुष्प, जो जरा और रोग को दूर करने वाला परम है; तथा अमूल्य रत्नों से निर्मित एक उत्तम अँगूठी —

श्लोक 19 (devibhagavatam.9.19.19)

सुन्दरं च मणिवरं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् । दासी तवाहमित्येवं समुच्चार्य पुनः पुनः

sundaraṁ ca maṇivaraṁ triṣu lokeṣu durlabham | dāsī tavāhamityevaṁ samuccārya punaḥ punaḥ

— एक सुन्दर श्रेष्ठ मणि, जो तीनों लोकों में दुर्लभ है; और बार-बार यह कहते हुए कि "मैं तुम्हारी दासी हूँ" —

श्लोक 20 (devibhagavatam.9.19.20)

ननाम परया भक्त्या स्वामिनं गुणशालिनम् । सस्मिता तन्मुखाम्भोजं लोचनाभ्यां पुनः पुनः

nanāma parayā bhaktyā svāminaṁ guṇaśālinam | sasmitā tanmukhāmbhojaṁ locanābhyāṁ punaḥ punaḥ

— उसने परम भक्ति से अपने गुणवान् स्वामी को प्रणाम किया; मुस्कुराती हुई वह बार-बार अपने नेत्रों से उसके मुखकमल को निहारती रहीं —

श्लोक 21 (devibhagavatam.9.19.21)

निमेषरहिताभ्यां चाप्यपश्यत्कामसुन्दरम् । स च तां च समाकृष्य चकार वक्षसि प्रियाम्

nimeṣarahitābhyāṁ cāpyapaśyatkāmasundaram | sa ca tāṁ ca samākṛṣya cakāra vakṣasi priyām

— पलक झपकाए बिना उस काम-सदृश सुन्दर पति को देखती रहीं; और उसने भी उसे अपने निकट खींचकर वक्षस्थल से लगा लिया।

श्लोक 22 (devibhagavatam.9.19.22)

सस्मितं वाससाच्छन्नं ददर्श मुखपङ्कजम् । चुचुम्ब कठिने गण्डे बिम्बोष्ठौ पुनरेव च

sasmitaṁ vāsasācchannaṁ dadarśa mukhapaṅkajam | cucumba kaṭhine gaṇḍe bimboṣṭhau punareva ca

उसने उसके वस्त्र से आधे ढके, मुस्कुराते हुए मुखकमल को देखा; और उसके कठोर गालों तथा बिम्बफल-सदृश अधरों को पुनः चूमा।

श्लोक 23 (devibhagavatam.9.19.23)

ददौ तस्यै वस्त्रयुग्मं वरुणादाहृतं च यत् । तदाहृतां रत्नमालां त्रिषु लोकेषु दुर्लभाम्

dadau tasyai vastrayugmaṁ varuṇādāhṛtaṁ ca yat | tadāhṛtāṁ ratnamālāṁ triṣu lokeṣu durlabhām

उसने उसे वरुण से लाए गए दो वस्त्र प्रदान किए, तथा वहीं से लाई गई एक रत्नमाला, जो तीनों लोकों में दुर्लभ थी —

श्लोक 24 (devibhagavatam.9.19.24)

ददौ मञ्जीरयुग्मं च स्वाहाया आहृतं च यत् । केयूरयुग्मं छायाया रोहिण्याश्चैव कुण्डलम्

dadau mañjīrayugmaṁ ca svāhāyā āhṛtaṁ ca yat | keyūrayugmaṁ chāyāyā rohiṇyāścaiva kuṇḍalam

— उसने स्वाहा से लाई गई नूपुरों की जोड़ी, छाया से लाई गई केयूर की जोड़ी, तथा रोहिणी के कुण्डल भी प्रदान किए —

श्लोक 25 (devibhagavatam.9.19.25)

अङ्गुलीयकरत्नानि रत्याश्च करभूषणम् । शङ्खं च रुचिरं चित्रं यद्दत्तं विश्वकर्मणा

aṅgulīyakaratnāni ratyāśca karabhūṣaṇam | śaṅkhaṁ ca ruciraṁ citraṁ yaddattaṁ viśvakarmaṇā

— रत्नजड़ित अँगूठियाँ, रति का हस्त-आभूषण, तथा विश्वकर्मा द्वारा दिया गया एक सुन्दर, विचित्र शंख —

श्लोक 26 (devibhagavatam.9.19.26)

विचित्रपद्मकश्रेणीं शय्यां चापि सुदुर्लभाम् । भूषणानि च दत्त्वा स भूपो हासं चकार ह

vicitrapadmakaśreṇīṁ śayyāṁ cāpi sudurlabhām | bhūṣaṇāni ca dattvā sa bhūpo hāsaṁ cakāra ha

— कमलों की विचित्र पंक्ति, तथा एक अत्यंत दुर्लभ शय्या भी; ये सब आभूषण देकर वह राजा हर्षपूर्वक हँस पड़ा।

श्लोक 27 (devibhagavatam.9.19.27)

निर्ममे कबरीभारे तस्या माङ्गल्यभूषणम् । सुचित्रं पत्रकं गण्डमण्डलेऽस्याः समं तथा

nirmame kabarībhāre tasyā māṅgalyabhūṣaṇam | sucitraṁ patrakaṁ gaṇḍamaṇḍale'syāḥ samaṁ tathā

उसने उसकी वेणी में एक मंगल-आभूषण सजाया, और उसके गालों पर भी वैसा ही एक सुन्दर पत्र-चित्रण किया —

श्लोक 28 (devibhagavatam.9.19.28)

चन्द्रलेखात्रिभिर्युक्तं चन्दनेन सुगन्धिना । परीतं परितश्चित्रैः सार्धं कुङ्कुमबिन्दुभिः

candralekhātribhiryuktaṁ candanena sugandhinā | parītaṁ paritaścitraiḥ sārdhaṁ kuṅkumabindubhiḥ

— सुगन्धित चन्दन से बने तीन चन्द्ररेखाओं से युक्त, चारों ओर कुंकुम की चित्ताकर्षक बिंदियों से घिरा —

श्लोक 29 (devibhagavatam.9.19.29)

ज्वलत्प्रदीपाकारं च सिन्दूरतिलकं ददौ । तत्पादपद्मयुगले स्थलपद्मविनिन्दिते

jvalatpradīpākāraṁ ca sindūratilakaṁ dadau | tatpādapadmayugale sthalapadmavinindite

— उसने उसे प्रज्वलित दीपक के आकार का सिन्दूर-तिलक भी लगाया; और उसके चरणकमलों पर, जो स्थल-कमल को भी लज्जित करते थे —

श्लोक 30 (devibhagavatam.9.19.30)

चित्रालक्तकरागं च नखरेषु ददौ मुदा । स्ववक्षसि मुहुर्न्यस्य सरागं चरणाम्बुजम्

citrālaktakarāgaṁ ca nakhareṣu dadau mudā | svavakṣasi muhurnyasya sarāgaṁ caraṇāmbujam

— उसने आनन्दपूर्वक उसके नखों पर सुन्दर आलता लगाया; और उसके रंजित चरणकमलों को बार-बार अपने वक्षस्थल पर रखकर —

श्लोक 31 (devibhagavatam.9.19.31)

हे देवि तव दासोऽहमित्युच्चार्य पुनः पुनः । रत्नभूषितहस्तेन तां च कृत्वा स्ववक्षसि

he devi tava dāso'hamityuccārya punaḥ punaḥ | ratnabhūṣitahastena tāṁ ca kṛtvā svavakṣasi

— बार-बार यह कहते हुए "हे देवि! मैं तुम्हारा दास हूँ", और अपने रत्नभूषित हाथ से उसे अपने वक्षस्थल पर लेकर —

श्लोक 32 (devibhagavatam.9.19.32)

तपोवनं परित्यज्य राजा स्थानान्तरं ययौ । मलये देवनिलये शैले शैले तपोवने

tapovanaṁ parityajya rājā sthānāntaraṁ yayau | malaye devanilaye śaile śaile tapovane

— उस राजा ने तपोवन को छोड़कर अन्य स्थानों की ओर प्रयाण किया — मलय पर्वत को, देवालय को, पर्वत-पर्वत और तपोवन-तपोवन को —

श्लोक 33 (devibhagavatam.9.19.33)

स्थाने स्थानेऽतिरम्ये च पुष्पोद्याने च निर्जने । कन्दरे कन्दरे सिन्धुतीरे चैवातिसुन्दरे

sthāne sthāne'tiramye ca puṣpodyāne ca nirjane | kandare kandare sindhutīre caivātisundare

— स्थान-स्थान के अत्यंत रम्य, निर्जन पुष्पवाटिकाओं में, गुफा-गुफा में, तथा अत्यंत सुन्दर समुद्र-तट पर —

श्लोक 34 (devibhagavatam.9.19.34)

पुष्पभद्रानदीतीरे नीरवातमनोहरे । पुलिने पुलिने दिव्ये नद्यां नद्यां नदे नदे

puṣpabhadrānadītīre nīravātamanohare | puline puline divye nadyāṁ nadyāṁ nade nade

— पुष्पभद्रा नदी के तट पर, जल की मनोहर वायु से युक्त, दिव्य बालुका-तट पर, नदी-नदी और स्रोत-स्रोत में —

श्लोक 35 (devibhagavatam.9.19.35)

मधौ मधुकराणां च मधुरध्वनिनादिते । विस्पन्दने सुरसने नन्दने गन्धमादने

madhau madhukarāṇāṁ ca madhuradhvaninādite | vispandane surasane nandane gandhamādane

— वसंत ऋतु में, भ्रमरों की मधुर ध्वनि से गुंजित, विस्पन्दन, सुरसन, नन्दन और गन्धमादन में —

श्लोक 36 (devibhagavatam.9.19.36)

देवोद्याने नन्दने च चित्रचन्दनकानने । चम्पकानां केतकीनां माधवीनां च माधवे

devodyāne nandane ca citracandanakānane | campakānāṁ ketakīnāṁ mādhavīnāṁ ca mādhave

— देवताओं की वाटिका में, नन्दन में, विचित्र चन्दन-वन में, वसंत में चम्पा, केतकी और माधवी के पुष्पों के बीच —

श्लोक 37 (devibhagavatam.9.19.37)

कुन्दानां मालतीनां च कुमुदाम्भोजकानने । कल्पवृक्षे कल्पवृक्षे पारिजातवने वने

kundānāṁ mālatīnāṁ ca kumudāmbhojakānane | kalpavṛkṣe kalpavṛkṣe pārijātavane vane

— कुन्द और मालती के बीच, कुमुद-कमल के वन में, कल्पवृक्ष-कल्पवृक्ष के नीचे, पारिजात के वन-वन में —

श्लोक 38 (devibhagavatam.9.19.38)

निर्जने काञ्चने स्थाने धन्ये काञ्चनपर्वते । काञ्चीवने किञ्जलके कञ्चुके काञ्चनाकरे

nirjane kāñcane sthāne dhanye kāñcanaparvate | kāñcīvane kiñjalake kañcuke kāñcanākare

— निर्जन स्वर्णमय स्थानों में, धन्य स्वर्णपर्वत पर, काञ्चीवन में, पुष्प-पराग के बीच, स्वर्णाकर में —

श्लोक 39 (devibhagavatam.9.19.39)

पुष्पचन्दनतल्पेषु पुंस्कोकिलरुतश्रुते । पुष्पचन्दनसंयुक्तः पुष्पचन्दनवायुना

puṣpacandanatalpeṣu puṁskokilarutaśrute | puṣpacandanasaṁyuktaḥ puṣpacandanavāyunā

— पुष्प-चन्दन की शय्याओं पर, नर कोकिल की कूक से गुंजित — स्वयं पुष्प-चन्दन से युक्त, पुष्प-चन्दन की वायु में —

श्लोक 40 (devibhagavatam.9.19.40)

कामुक्या कामुकः कामात्स रेमे रामया सह । न हि तृप्तो दानवेन्द्रस्तृप्तिं नैव जगाम सा

kāmukyā kāmukaḥ kāmātsa reme rāmayā saha | na hi tṛpto dānavendrastṛptiṁ naiva jagāma sā

— वह कामुक दानवेन्द्र अपनी कामुकी प्रिया के साथ काम से रमण करता रहा; परन्तु न वह कभी तृप्त हुआ, न वह।

श्लोक 41 (devibhagavatam.9.19.41)

हविषा कृष्णवर्त्मेव ववृधे मदनस्तयोः । तया सह समागत्य स्वाश्रमं दानवस्ततः

haviṣā kṛṣṇavartmeva vavṛdhe madanastayoḥ | tayā saha samāgatya svāśramaṁ dānavastataḥ

जैसे आहुति से अग्नि बढ़ती है, वैसे ही उन दोनों की कामाग्नि बढ़ती गई; तत्पश्चात् वह दानव उसे लेकर अपने आश्रम को आया —

श्लोक 42 (devibhagavatam.9.19.42)

रम्यं क्रीडालयं गत्वा विजहार पुनः पुनः । एवं स बुभुजे राज्यं शङ्खचूडः प्रतापवान्

ramyaṁ krīḍālayaṁ gatvā vijahāra punaḥ punaḥ | evaṁ sa bubhuje rājyaṁ śaṅkhacūḍaḥ pratāpavān

— और अपने रमणीय क्रीड़ागार में जाकर बार-बार विहार करता रहा। इस प्रकार प्रतापी शंखचूड ने अपने राज्य का उपभोग किया।

श्लोक 43 (devibhagavatam.9.19.43)

एकमन्वन्तरं पूर्णं राजराजेश्वरो महान् । देवानामसुराणां च दानवानां च सन्ततम्

ekamanvantaraṁ pūrṇaṁ rājarājeśvaro mahān | devānāmasurāṇāṁ ca dānavānāṁ ca santatam

वह महान् राजराजेश्वर पूर्ण एक मन्वन्तर तक देवों, असुरों और दानवों पर निरन्तर शासन करता रहा —

श्लोक 44 (devibhagavatam.9.19.44)

गन्धर्वाणां किन्नराणां राक्षसानां च शान्तिदः । हृताधिकारा देवाश्च चरन्ति भिक्षुका यथा

gandharvāṇāṁ kinnarāṇāṁ rākṣasānāṁ ca śāntidaḥ | hṛtādhikārā devāśca caranti bhikṣukā yathā

— गन्धर्वों, किन्नरों और राक्षसों पर भी, उन्हें शान्त (वश में) करते हुए; और देवगण अपने अधिकार से वंचित होकर भिखारियों के समान भटकने लगे।

श्लोक 45 (devibhagavatam.9.19.45)

ते सर्वेऽतिविषण्णाश्च प्रजग्मुर्ब्रह्मणः सभाम् । वृत्तान्तं कथयामासू रुरुदुश्च भृशं मुहुः

te sarve'tiviṣaṇṇāśca prajagmurbrahmaṇaḥ sabhām | vṛttāntaṁ kathayāmāsū ruruduśca bhṛśaṁ muhuḥ

वे सब अत्यंत विषादग्रस्त होकर ब्रह्मा की सभा में गए; उन्होंने सारा वृत्तान्त कह सुनाया और बार-बार फूट-फूटकर रोने लगे।

श्लोक 46 (devibhagavatam.9.19.46)

तदा ब्रह्मा सुरैः सार्धं जगाम शङ्करालयम् । सर्वेशं कथयामास विधाता चन्द्रशेखरम्

tadā brahmā suraiḥ sārdhaṁ jagāma śaṅkarālayam | sarveśaṁ kathayāmāsa vidhātā candraśekharam

तब ब्रह्मा देवताओं सहित शंकर के धाम को गए; विधाता ने सर्वेश्वर चन्द्रशेखर को सारा वृत्तान्त सुनाया।

श्लोक 47 (devibhagavatam.9.19.47)

ब्रह्मा शिवश्च तैः सार्धं वैकुण्ठं च जगाम ह । दुर्लभं परमं धाम जरामृत्युहरं परम्

brahmā śivaśca taiḥ sārdhaṁ vaikuṇṭhaṁ ca jagāma ha | durlabhaṁ paramaṁ dhāma jarāmṛtyuharaṁ param

ब्रह्मा और शिव उन सबके साथ वैकुण्ठ को गए, उस दुर्लभ परम धाम को, जो जरा-मृत्यु का हरण करने वाला है।

श्लोक 48 (devibhagavatam.9.19.48)

सम्प्राप च वरं द्वारमाश्रमाणां हरेरहो । ददर्श द्वारपालांश्च रत्नसिंहासनस्थितान्

samprāpa ca varaṁ dvāramāśramāṇāṁ hareraho | dadarśa dvārapālāṁśca ratnasiṁhāsanasthitān

वे हरि के धाम के महाद्वार पर पहुँचे; वहाँ उन्होंने रत्नसिंहासनों पर विराजमान द्वारपालों को देखा —

श्लोक 49 (devibhagavatam.9.19.49)

शोभितान्पीतवस्त्रैश्च रत्नभूषणभूषितान् । वनमालान्वितान्सर्वान् श्यामसुन्दरविग्रहान्

śobhitānpītavastraiśca ratnabhūṣaṇabhūṣitān | vanamālānvitānsarvān śyāmasundaravigrahān

— पीतवस्त्रों से सुशोभित, रत्नाभूषणों से अलंकृत, सभी वनमाला धारण किए, श्यामसुन्दर विग्रहवाले —

श्लोक 50 (devibhagavatam.9.19.50)

शङ्खचक्रगदापद्मधरांश्चैव चतुर्भुजान् । सस्मितान्स्मेरवक्त्रास्यान्पद्मनेत्रान्मनोहरान्

śaṅkhacakragadāpadmadharāṁścaiva caturbhujān | sasmitānsmeravaktrāsyānpadmanetrānmanoharān

— शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए, चतुर्भुज, मुस्कुराते हुए, प्रफुल्ल मुखवाले, कमलनेत्र, मनोहर।

श्लोक 51 (devibhagavatam.9.19.51)

ब्रह्मा तान्कथयामास वृत्तान्तं गमनार्थकम् । तेऽनुज्ञां च ददुस्तस्मै प्रविवेश तदाज्ञया

brahmā tānkathayāmāsa vṛttāntaṁ gamanārthakam | te'nujñāṁ ca dadustasmai praviveśa tadājñayā

ब्रह्मा ने उन्हें आगमन का प्रयोजन बताया; उन्होंने उन्हें अनुमति दी, और उसी आज्ञा से वे भीतर प्रविष्ट हुए।

श्लोक 52 (devibhagavatam.9.19.52)

एवं षोडश द्वाराणि निरीक्ष्य कमलोद्भवः । देवैः सार्धं तानतीत्य प्रविवेश हरेः सभाम्

evaṁ ṣoḍaśa dvārāṇi nirīkṣya kamalodbhavaḥ | devaiḥ sārdhaṁ tānatītya praviveśa hareḥ sabhām

इस प्रकार सोलह द्वारों को पार कर, कमलजन्मा ब्रह्मा देवताओं सहित उन्हें लांघकर हरि की सभा में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 53 (devibhagavatam.9.19.53)

देवर्षिभिः परिवृतां पार्षदैश्च चतुर्भुजैः । नारायणस्वरूपैश्च सर्वैः कौस्तुभभूषितैः

devarṣibhiḥ parivṛtāṁ pārṣadaiśca caturbhujaiḥ | nārāyaṇasvarūpaiśca sarvaiḥ kaustubhabhūṣitaiḥ

वह सभा देवर्षियों से घिरी हुई थी और चतुर्भुज पार्षदों से, जो सब नारायण के ही स्वरूप और कौस्तुभमणि से विभूषित थे —

श्लोक 54 (devibhagavatam.9.19.54)

नवेन्दुमण्डलाकारां चतुरस्रां मनोहराम् । मणीन्द्रहारनिर्माणां हीरासारसुशोभिताम्

navendumaṇḍalākārāṁ caturasrāṁ manoharām | maṇīndrahāranirmāṇāṁ hīrāsārasuśobhitām

— वह सभा नवचन्द्र-मण्डल के आकार की, चतुष्कोण, मनोहर थी; श्रेष्ठ मणियों के हारों से निर्मित, हीरों के सार से सुशोभित —

श्लोक 55 (devibhagavatam.9.19.55)

अमूल्यरत्नखचितां रचितां स्वेच्छया हरेः । माणिक्यमालाजालाभां मुक्तापङ्क्तिविभूषिताम्

amūlyaratnakhacitāṁ racitāṁ svecchayā hareḥ | māṇikyamālājālābhāṁ muktāpaṅktivibhūṣitām

— अमूल्य रत्नों से जड़ी, हरि की स्वेच्छा से रची गई, माणिक्य-मालाओं के जाल-सी, मोतियों की पंक्तियों से सुशोभित —

श्लोक 56 (devibhagavatam.9.19.56)

मण्डितां मण्डलाकारै रत्नदर्पणकोटिभिः । विचित्रैश्चित्ररेखाभिर्नानाचित्रविचित्रिताम्

maṇḍitāṁ maṇḍalākārai ratnadarpaṇakoṭibhiḥ | vicitraiścitrarekhābhirnānācitravicitritām

— करोड़ों गोल रत्नदर्पणों से सुसज्जित, विचित्र चित्ररेखाओं से तथा नाना प्रकार के चित्रों से चित्रित —

श्लोक 57 (devibhagavatam.9.19.57)

पद्मरागेन्द्ररचितां रुचिरां मणिपङ्कजैः । सोपानशतकैर्युक्तां स्यमन्तकविनिर्मितैः

padmarāgendraracitāṁ rucirāṁ maṇipaṅkajaiḥ | sopānaśatakairyuktāṁ syamantakavinirmitaiḥ

— श्रेष्ठ पद्मराग मणियों से रची, मणि-कमलों से सुरम्य, स्यमन्तक मणियों से बनी सैकड़ों सीढ़ियों से युक्त —

श्लोक 58 (devibhagavatam.9.19.58)

पट्टसूत्रग्रन्थियुक्तैश्चारुचन्दनपल्लवैः । इन्द्रनीलस्तम्भवर्यैर्वेष्टितां सुमनोहराम्

paṭṭasūtragranthiyuktaiścārucandanapallavaiḥ | indranīlastambhavaryairveṣṭitāṁ sumanoharām

— रेशमी डोरियों से बँधी सुन्दर चन्दन की डालियों से युक्त, श्रेष्ठ इन्द्रनील मणियों के स्तम्भों से घिरी, अत्यंत मनोहर —

श्लोक 59 (devibhagavatam.9.19.59)

सद्रत्नपूर्णकुम्भानां समूहैश्च समन्विताम् । पारिजातप्रसूनानां मालाजालैर्विराजिताम्

sadratnapūrṇakumbhānāṁ samūhaiśca samanvitām | pārijātaprasūnānāṁ mālājālairvirājitām

— उत्तम रत्नों से भरे कलशों के समूहों से युक्त, पारिजात के पुष्पों की माला-जालों से सुशोभित —

श्लोक 60 (devibhagavatam.9.19.60)

कस्तूरीकुङ्कुमारक्तैः सुगन्धिचन्दनद्रुमैः । सुसंस्कृतां तु सर्वत्र वासितां गन्धवायुना

kastūrīkuṅkumāraktaiḥ sugandhicandanadrumaiḥ | susaṁskṛtāṁ tu sarvatra vāsitāṁ gandhavāyunā

— कस्तूरी-कुंकुम से रंजित, सुगन्धित चन्दन के वृक्षों से युक्त, सर्वत्र सुसज्जित, सुगन्धित वायु से सुवासित —

श्लोक 61 (devibhagavatam.9.19.61)

विद्याधरीसमूहानां नृत्यजालैर्विराजिताम् । सहस्रयोजनायामां परिपूर्णां च किङ्करैः

vidyādharīsamūhānāṁ nṛtyajālairvirājitām | sahasrayojanāyāmāṁ paripūrṇāṁ ca kiṅkaraiḥ

— विद्याधरियों के समूहों के नृत्य-जालों से सुशोभित, एक सहस्र योजन विस्तृत, तथा सेवकों से परिपूर्ण थी।

श्लोक 62 (devibhagavatam.9.19.62)

ददर्श श्रीहरिं ब्रह्मा शङ्करश्च सुरैः सह । वसन्तं तन्मध्यदेशे यथेन्दुं तारकावृतम्

dadarśa śrīhariṁ brahmā śaṅkaraśca suraiḥ saha | vasantaṁ tanmadhyadeśe yathenduṁ tārakāvṛtam

वहाँ ब्रह्मा और शंकर ने देवताओं सहित श्रीहरि को उस सभा के मध्य में विराजमान देखा, मानो चन्द्रमा तारों से घिरा हो।

श्लोक 63 (devibhagavatam.9.19.63)

अमूल्यरत्ननिर्माणचित्रसिंहासने स्थितम् । किरीटिनं कुण्डलिनं वनमालाविभूषितम्

amūlyaratnanirmāṇacitrasiṁhāsane sthitam | kirīṭinaṁ kuṇḍalinaṁ vanamālāvibhūṣitam

— अमूल्य रत्नों से निर्मित विचित्र सिंहासन पर विराजमान, मुकुटधारी, कुण्डलधारी, वनमाला से विभूषित —

श्लोक 64 (devibhagavatam.9.19.64)

चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं बिभ्रतं केलिपङ्कजम् । पुरतो नृत्यगीतं च पश्यन्तं सस्मितं मुदा

candanokṣitasarvāṅgaṁ bibhrataṁ kelipaṅkajam | purato nṛtyagītaṁ ca paśyantaṁ sasmitaṁ mudā

— सम्पूर्ण अंग चन्दन से अनुलिप्त, हाथ में क्रीड़ा-कमल लिए, अपने सामने हो रहे नृत्य-गीत को हर्षपूर्वक मुस्कुराते हुए देखते हुए —

श्लोक 65 (devibhagavatam.9.19.65)

शान्तं सरस्वतीकान्तं लक्ष्मीधृतपदाम्बुजम् । लक्ष्म्या प्रदत्तं ताम्बूलं भुक्तवन्तं सुवासितम्

śāntaṁ sarasvatīkāntaṁ lakṣmīdhṛtapadāmbujam | lakṣmyā pradattaṁ tāmbūlaṁ bhuktavantaṁ suvāsitam

— शान्त, सरस्वती के प्रिय, जिनके चरणकमल को लक्ष्मी पकड़े हुए थीं, तथा लक्ष्मी द्वारा दिया गया सुवासित ताम्बूल ग्रहण करते हुए —

श्लोक 66 (devibhagavatam.9.19.66)

गङ्गया परया भक्त्या सेवितं श्वेतचामरैः । सर्वैश्च स्तूयमानं च भक्तिनम्रात्मकन्धरैः

gaṅgayā parayā bhaktyā sevitaṁ śvetacāmaraiḥ | sarvaiśca stūyamānaṁ ca bhaktinamrātmakandharaiḥ

— गंगा द्वारा परम भक्ति से श्वेत चँवर से सेवित, तथा सबके द्वारा भक्तिपूर्वक नत मस्तक होकर स्तुति किए जाते हुए।

श्लोक 67 (devibhagavatam.9.19.67)

एवं विशिष्टं तं दृष्ट्वा परिपूर्णतमं प्रभुम् । ब्रह्मादयः सुराः सर्वे प्रणम्य तुष्टुवुस्तदा

evaṁ viśiṣṭaṁ taṁ dṛṣṭvā paripūrṇatamaṁ prabhum | brahmādayaḥ surāḥ sarve praṇamya tuṣṭuvustadā

इस प्रकार उस विशिष्ट, परिपूर्णतम प्रभु को देखकर, ब्रह्मादि समस्त देवगण प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 68 (devibhagavatam.9.19.68)

पुलकाञ्चितसर्वाङ्गाः साश्रुनेत्राश्च गद्गदाः । भक्ताश्च परया भक्त्या भीता नम्रात्मकन्धराः

pulakāñcitasarvāṅgāḥ sāśrunetrāśca gadgadāḥ | bhaktāśca parayā bhaktyā bhītā namrātmakandharāḥ

उनका सम्पूर्ण अंग रोमांचित हो उठा, नेत्रों में अश्रु भर आए, वाणी गद्गद हो गई; परम भक्तिपूर्वक, भयभीत होकर, नत मस्तक होकर —

श्लोक 69 (devibhagavatam.9.19.69)

कृताञ्जलिपुटो भूत्वा विधाता जगतामपि । वृत्तान्तं कथयामास विनयेन हरेः पुरः

kṛtāñjalipuṭo bhūtvā vidhātā jagatāmapi | vṛttāntaṁ kathayāmāsa vinayena hareḥ puraḥ

— हाथ जोड़कर, जगत् के विधाता ब्रह्मा ने विनयपूर्वक हरि के समक्ष सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

श्लोक 70 (devibhagavatam.9.19.70)

हरिस्तद्वचनं श्रुत्वा सर्वज्ञः सर्वभाववित् । प्रहस्योवाच ब्रह्माणं रहस्यं च मनोहरम्

haristadvacanaṁ śrutvā sarvajñaḥ sarvabhāvavit | prahasyovāca brahmāṇaṁ rahasyaṁ ca manoharam

हरि ने वह वचन सुनकर, सर्वज्ञ और सबके भावों को जानने वाले होने के कारण, हँसते हुए ब्रह्मा से एक मनोहर रहस्य कहा।

श्लोक 71 (devibhagavatam.9.19.71)

श्रीभगवानुवाच । शङ्खचूडस्य वृत्तान्तं सर्वं जानामि पद्मज । मद्भक्तस्य च गोपस्य महातेजस्विनः पुरा

śrībhagavānuvāca | śaṅkhacūḍasya vṛttāntaṁ sarvaṁ jānāmi padmaja | madbhaktasya ca gopasya mahātejasvinaḥ purā

श्रीभगवान् ने कहा — "हे पद्मज! मैं शंखचूड का सम्पूर्ण वृत्तान्त जानता हूँ, जो पूर्वकाल में मेरा ही भक्त, महातेजस्वी गोप था।

श्लोक 72 (devibhagavatam.9.19.72)

शृणु तत्सर्ववृत्तान्तमितिहासं पुरातनम् । गोलोकस्यैव चरितं पापघ्नं पुण्यकारकम्

śṛṇu tatsarvavṛttāntamitihāsaṁ purātanam | golokasyaiva caritaṁ pāpaghnaṁ puṇyakārakam

उस सम्पूर्ण वृत्तान्त को, इस पुरातन इतिहास को सुनो, जो गोलोक का ही चरित्र है, पापनाशक और पुण्यकारक है।

श्लोक 73 (devibhagavatam.9.19.73)

सुदामा नाम गोपश्च पार्षदप्रवरो मम । स प्राप दानवीं योनिं राधाशापात्सुदारुणात्

sudāmā nāma gopaśca pārṣadapravaro mama | sa prāpa dānavīṁ yoniṁ rādhāśāpātsudāruṇāt

सुदामा नामक एक गोप था, जो मेरे पार्षदों में श्रेष्ठ था; उसने राधा के अत्यंत भीषण शाप से दानव-योनि प्राप्त की।

श्लोक 74 (devibhagavatam.9.19.74)

तत्रैकदाहमगमं स्वालयाद्रासमण्डलम् । विरजामपि नीत्वा च मम प्राणाधिका परा

tatraikadāhamagamaṁ svālayādrāsamaṇḍalam | virajāmapi nītvā ca mama prāṇādhikā parā

एक बार मैं अपने धाम से रासमण्डल में गया, अपने साथ विरजा को भी ले गया, जो मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है —

श्लोक 75 (devibhagavatam.9.19.75)

सा मां विरजया सार्धं विज्ञाय किङ्करीमुखात् । पश्चात्क्रुद्धा साजगाम न ददर्श च तत्र माम्

sā māṁ virajayā sārdhaṁ vijñāya kiṅkarīmukhāt | paścātkruddhā sājagāma na dadarśa ca tatra mām

— उसने (राधा ने) किसी दासी के मुख से मुझे विरजा के साथ जानकर, क्रुद्ध होकर वहाँ आईं, किन्तु मुझे वहाँ नहीं देख सकीं —

श्लोक 76 (devibhagavatam.9.19.76)

विरजां च नदीरूपां मां ज्ञात्वा च तिरोहितम् । पुनर्जगाम सा दृष्ट्वा स्वालयं सखिभिः सह

virajāṁ ca nadīrūpāṁ māṁ jñātvā ca tirohitam | punarjagāma sā dṛṣṭvā svālayaṁ sakhibhiḥ saha

— क्योंकि विरजा नदी-रूप में बदल गई थीं और मैं अदृश्य हो गया था; यह देखकर वह अपनी सखियों सहित पुनः अपने धाम को लौट गईं।

श्लोक 77 (devibhagavatam.9.19.77)

मां दृष्ट्वा मन्दिरे देवी सुदाम्ना सहितं पुरा । भृशं सा भर्त्सयामास मौनीभूतं च सुस्थिरम्

māṁ dṛṣṭvā mandire devī sudāmnā sahitaṁ purā | bhṛśaṁ sā bhartsayāmāsa maunībhūtaṁ ca susthiram

उस देवी ने पहले मुझे अपने मन्दिर में सुदामा के साथ देखा था, और वह मुझे अत्यंत भला-बुरा कहने लगीं, जबकि मैं मौन और स्थिर बना रहा।

श्लोक 78 (devibhagavatam.9.19.78)

तच्छ्रुत्वासहमानश्च सुदामा तां चुकोप ह । स च तां भर्त्सयामास कोपेन मम सनिधौ

tacchrutvāsahamānaśca sudāmā tāṁ cukopa ha | sa ca tāṁ bhartsayāmāsa kopena mama sanidhau

यह सुनकर सुदामा असहनशील होकर क्रुद्ध हो गया; और उसने भी क्रोधपूर्वक मेरे समक्ष उन्हें भला-बुरा कहा।

श्लोक 79 (devibhagavatam.9.19.79)

तच्छ्रुत्वा कोपयुक्ता सा रक्तपङ्कजलोचना । बहिष्कर्तुं चकाराज्ञां सन्त्रस्तं मम संसदि

tacchrutvā kopayuktā sā raktapaṅkajalocanā | bahiṣkartuṁ cakārājñāṁ santrastaṁ mama saṁsadi

यह सुनकर, क्रोध से रक्तकमल-सदृश नेत्रोंवाली वह देवी ने मेरी सभा से उस भयभीत सुदामा को बाहर निकालने की आज्ञा दे दी।

श्लोक 80 (devibhagavatam.9.19.80)

सखीलक्षं समुत्तस्थौ दुर्वारं तेजसोल्बणम् । बहिश्चकार तं तूर्णं जल्पन्तं च पुनः पुनः

sakhīlakṣaṁ samuttasthau durvāraṁ tejasolbaṇam | bahiścakāra taṁ tūrṇaṁ jalpantaṁ ca punaḥ punaḥ

उनकी लाख सखियाँ तत्काल उठ खड़ी हुईं, दुर्निवार और तेज से उद्दीप्त; उन्होंने बार-बार गिड़गिड़ाते हुए सुदामा को शीघ्र ही बाहर निकाल दिया।

श्लोक 81 (devibhagavatam.9.19.81)

सा च तत्ताडनं तासां श्रुत्वा रुष्टा शशाप ह । याहि रे दानवीं योनिमित्येवं दारुणं वचः

sā ca tattāḍanaṁ tāsāṁ śrutvā ruṣṭā śaśāpa ha | yāhi re dānavīṁ yonimityevaṁ dāruṇaṁ vacaḥ

उन सखियों द्वारा उसकी मारपीट सुनकर, वह देवी क्रुद्ध हुईं और उसे शाप दे दिया — "जा, तू दानव-योनि में जन्म ले!" — ऐसा भीषण वचन कहा।

श्लोक 82 (devibhagavatam.9.19.82)

तं गच्छन्तं शपन्तं च रुदन्तं मां प्रणम्य च । वारयामास तुष्टा सा रुदती कृपया पुनः

taṁ gacchantaṁ śapantaṁ ca rudantaṁ māṁ praṇamya ca | vārayāmāsa tuṣṭā sā rudatī kṛpayā punaḥ

शापग्रस्त, रोते हुए जाते हुए उसने मुझे प्रणाम किया; तब वह देवी भी द्रवित होकर, स्वयं रोते हुए, करुणावश उसे पुनः रोकने लगीं।

श्लोक 83 (devibhagavatam.9.19.83)

हे वत्स तिष्ठ मा गच्छ क्व यासीति पुनः पुनः । समुच्चार्य च तत्पश्चाज्जगाम सा च विक्लवम्

he vatsa tiṣṭha mā gaccha kva yāsīti punaḥ punaḥ | samuccārya ca tatpaścājjagāma sā ca viklavam

"हे वत्स! ठहरो, मत जाओ, कहाँ जा रहे हो?" — ऐसा बार-बार कहकर, उसके पश्चात् वह देवी भी व्याकुल होकर चली गईं।

श्लोक 84 (devibhagavatam.9.19.84)

गोप्यश्च रुरुदुः सर्वा गोपाश्चापि सुदुःखिताः । ते सर्वे राधिका चापि तत्पश्चाद् बोधिता मया

gopyaśca ruruduḥ sarvā gopāścāpi suduḥkhitāḥ | te sarve rādhikā cāpi tatpaścād bodhitā mayā

सभी गोपियाँ रोने लगीं, और गोप भी अत्यंत दुःखी हुए; उन सबको तथा राधिका को भी मैंने उसके पश्चात् समझाया-बुझाया।

श्लोक 85 (devibhagavatam.9.19.85)

आयास्यति क्षणार्धेन कृत्वा शापस्य पालनम् । सुदामंस्त्वमिहागच्छेत्युक्त्वा सा च निवारिता

āyāsyati kṣaṇārdhena kṛtvā śāpasya pālanam | sudāmaṁstvamihāgacchetyuktvā sā ca nivāritā

[मैंने उन्हें कहा,] "शाप की अवधि पूर्ण होते ही वह आधे क्षण में लौट आएगा।" "हे सुदामा! तुम यहीं लौट आओगे" — ऐसा कहकर मैंने उन्हें समझाया।

श्लोक 86 (devibhagavatam.9.19.86)

गोलोकस्य क्षणार्धेन चैकं मन्वन्तरं भवेत् । पृथिव्यां जगतां धातरित्येव वचनं ध्रुवम्

golokasya kṣaṇārdhena caikaṁ manvantaraṁ bhavet | pṛthivyāṁ jagatāṁ dhātarityeva vacanaṁ dhruvam

गोलोक के आधे क्षण के बराबर पृथ्वी पर, हे जगत् के विधाता! एक सम्पूर्ण मन्वन्तर होता है — यह निश्चित नियम है।

श्लोक 87 (devibhagavatam.9.19.87)

इत्येवं शङ्खचूडश्च पुनस्तत्रैव यास्यति । महाबलिष्ठो योगेशः सर्वमायाविशारदः

ityevaṁ śaṅkhacūḍaśca punastatraiva yāsyati | mahābaliṣṭho yogeśaḥ sarvamāyāviśāradaḥ

इस प्रकार वह महाबलशाली योगेश्वर, समस्त माया में निपुण शंखचूड, समय आने पर पुनः वहीं लौट जाएगा।

श्लोक 88 (devibhagavatam.9.19.88)

मम शूलं गृहीत्वा च शीघ्रं गच्छत भारतम् । शिवः करोतु संहारं मम शूलेन रक्षसः

mama śūlaṁ gṛhītvā ca śīghraṁ gacchata bhāratam | śivaḥ karotu saṁhāraṁ mama śūlena rakṣasaḥ

मेरा त्रिशूल लेकर तुम शीघ्र भारतवर्ष को जाओ; शिव मेरे इसी त्रिशूल से उस राक्षस का संहार करें।

श्लोक 89 (devibhagavatam.9.19.89)

ममैव कवचं कण्ठे सर्वमङ्गलकारकम् । बिभर्ति दानवः शश्वत्संसारे विजयी ततः

mamaiva kavacaṁ kaṇṭhe sarvamaṅgalakārakam | bibharti dānavaḥ śaśvatsaṁsāre vijayī tataḥ

उस दानव ने अपने कंठ में मेरा ही सर्वमंगलकारी कवच धारण कर रखा है, इसीलिए वह संसार में सदा विजयी रहता है —

श्लोक 90 (devibhagavatam.9.19.90)

तस्मिन् ब्रह्मन् स्थिते चैव न कोऽपि हिंसितुं क्षमः । तद्याचनां करिष्यामि विप्ररूपोऽहमेव च

tasmin brahman sthite caiva na ko'pi hiṁsituṁ kṣamaḥ | tadyācanāṁ kariṣyāmi viprarūpo'hameva ca

— हे ब्रह्मन्! जब तक वह उसके पास रहेगा, तब तक कोई भी उसे मार नहीं सकता; अतः मैं स्वयं ब्राह्मण का रूप धारण कर उससे उसकी याचना करूँगा।

श्लोक 91 (devibhagavatam.9.19.91)

सतीत्वहानिस्तत्पत्न्या यत्र काले भविष्यति । तत्रैव काले तन्मृत्युरिति दत्तो वरस्त्वया

satītvahānistatpatnyā yatra kāle bhaviṣyati | tatraiva kāle tanmṛtyuriti datto varastvayā

जिस क्षण उसकी पत्नी का सतीत्व भंग होगा, उसी क्षण उसकी मृत्यु होगी — ऐसा वर तुमने ही उसे दिया था।

श्लोक 92 (devibhagavatam.9.19.92)

तत्पत्न्याश्चोदरे वीर्यमर्पयिष्यामि निश्चितम् । तत्क्षणे चैव तन्मृत्युर्भविष्यति न संशयः

tatpatnyāścodare vīryamarpayiṣyāmi niścitam | tatkṣaṇe caiva tanmṛtyurbhaviṣyati na saṁśayaḥ

मैं निश्चित रूप से उसकी पत्नी के गर्भ में अपना वीर्य स्थापित करूँगा; और उसी क्षण उसकी मृत्यु हो जाएगी, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 93 (devibhagavatam.9.19.93)

पश्चात्सा देहमुत्सज्य भविष्यति मम प्रिया । इत्युक्त्वा जगतां नाथो ददौ शूलं हराय च

paścātsā dehamutsajya bhaviṣyati mama priyā | ityuktvā jagatāṁ nātho dadau śūlaṁ harāya ca

"उसके पश्चात् वह उस शरीर को त्यागकर मेरी ही प्रिया बन जाएगी।" ऐसा कहकर जगत् के स्वामी ने हर (शिव) को त्रिशूल प्रदान किया।

श्लोक 94 (devibhagavatam.9.19.94)

शूलं दत्त्वा ययौ शीघ्रं हरिरभ्यन्तरे मुदा । भारतं च ययुर्देवा ब्रह्यरुद्रपुरोगमाः

śūlaṁ dattvā yayau śīghraṁ harirabhyantare mudā | bhārataṁ ca yayurdevā brahyarudrapurogamāḥ

त्रिशूल देकर हरि आनन्दपूर्वक शीघ्र ही अपने अन्तःपुर में चले गए; और ब्रह्मा-रुद्र के नेतृत्व में देवगण भारतवर्ष को चल दिए।

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