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नवम स्कन्ध · अध्याय 2

पञ्च प्रकृति एवं उनके भर्तृगण की उत्पत्ति

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (devibhagavatam.9.2.1)

नारद उवाच । समासेन श्रुतं सर्वं देवीनां चरितं प्रभो । विबोधनाय बोधस्य व्यासेन वक्तुमर्हसि

nārada uvāca | samāsena śrutaṁ sarvaṁ devīnāṁ caritaṁ prabho | vibodhanāya bodhasya vyāsena vaktumarhasi

नारद ने कहा — हे प्रभो! देवियों का सम्पूर्ण चरित्र संक्षेप में सुन लिया; अब बोध की वृद्धि के लिए आप उसे विस्तार से कहने की कृपा करें।

श्लोक 2 (devibhagavatam.9.2.2)

सृष्टेराद्या सृष्टिविधौ कथमाविर्बभूव ह । कथं वा पञ्चधा भूता वद वेदविदांवर

sṛṣṭerādyā sṛṣṭividhau kathamāvirbabhūva ha | kathaṁ vā pañcadhā bhūtā vada vedavidāṁvara

सृष्टि के आरम्भ में सृष्टि-विधान में वे कैसे प्रकट हुईं और किस प्रकार पाँच रूपों में हुईं — हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ! यह बताइए।

श्लोक 3 (devibhagavatam.9.2.3)

भूता ययांशकलया तया त्रिगुणया भवे । व्यासेन तासां चरितं श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम्

bhūtā yayāṁśakalayā tayā triguṇayā bhave | vyāsena tāsāṁ caritaṁ śrotumicchāmi sāmpratam

वे त्रिगुणमयी जिस अंश और कला से इस संसार में प्रकट हुईं, अब मैं उनका चरित्र विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 4 (devibhagavatam.9.2.4)

तासां जन्मानुकथनं पूजाध्यानविधिं बुध । स्तोत्रं कवचमैश्वर्यं शौर्यं वर्णय मङ्गलम्

tāsāṁ janmānukathanaṁ pūjādhyānavidhiṁ budha | stotraṁ kavacamaiśvaryaṁ śauryaṁ varṇaya maṅgalam

हे बुध! उनके जन्म का वृत्तान्त, पूजा-ध्यान की विधि, स्तोत्र, कवच, ऐश्वर्य तथा शौर्य — यह सब मंगलमय वर्णन कीजिए।

श्लोक 5 (devibhagavatam.9.2.5)

श्रीनारायण उवाच । नित्य आत्मा नभो नित्यं कालो नित्यो दिशो यथा । विश्वानां गोलकं नित्यं नित्यो गोलोक एव च

śrīnārāyaṇa uvāca | nitya ātmā nabho nityaṁ kālo nityo diśo yathā | viśvānāṁ golakaṁ nityaṁ nityo goloka eva ca

श्री नारायण ने कहा — जैसे आत्मा नित्य है, आकाश नित्य है, काल नित्य है, दिशाएँ नित्य हैं, वैसे ही समस्त विश्वों का गोलक नित्य है और गोलोक भी नित्य है।

श्लोक 6 (devibhagavatam.9.2.6)

तदेकदेशो वैकुण्ठो नम्रभागानुसारकः । तथैव प्रकृतिर्नित्या ब्रह्मलीला सनातनी

tadekadeśo vaikuṇṭho namrabhāgānusārakaḥ | tathaiva prakṛtirnityā brahmalīlā sanātanī

वैकुण्ठ उसी का एक अंश है, जो निम्न भागों के अनुसार व्यवस्थित है; उसी प्रकार प्रकृति भी नित्य है, वह ब्रह्म की सनातन लीला है।

श्लोक 7 (devibhagavatam.9.2.7)

यथाग्नौ दाहिका चन्द्रे पद्मे शोभा प्रभा रवौ । शश्वद्युक्ता न भिन्ना सा तथा प्रकृतिरात्मनि

yathāgnau dāhikā candre padme śobhā prabhā ravau | śaśvadyuktā na bhinnā sā tathā prakṛtirātmani

जैसे अग्नि में दाहिका-शक्ति, चन्द्रमा में शोभा, कमल में प्रभा और सूर्य में तेज सदा युक्त रहते हैं और भिन्न नहीं होते, वैसे ही प्रकृति आत्मा से अभिन्न रूप से युक्त रहती है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.9.2.8)

विना स्वर्णं स्वर्णकारः कुण्डलं कर्तुमक्षमः । विना मृदा घटं कर्तुं कुलालो हि नहीश्वरः

vinā svarṇaṁ svarṇakāraḥ kuṇḍalaṁ kartumakṣamaḥ | vinā mṛdā ghaṭaṁ kartuṁ kulālo hi nahīśvaraḥ

जैसे स्वर्ण के बिना सुनार कुण्डल बनाने में असमर्थ है, जैसे मिट्टी के बिना कुम्हार घड़ा बनाने में समर्थ नहीं है —

श्लोक 9 (devibhagavatam.9.2.9)

न हि क्षमस्तथात्मा च सृष्टिं स्रष्टुं तया विना । सर्वशक्तिस्वरूपा सा यया च शक्तिमान्सदा

na hi kṣamastathātmā ca sṛṣṭiṁ sraṣṭuṁ tayā vinā | sarvaśaktisvarūpā sā yayā ca śaktimānsadā

उसी प्रकार आत्मा भी उसके बिना सृष्टि रचने में समर्थ नहीं है; वे सर्वशक्तिस्वरूपा हैं, जिनके द्वारा वह सदा शक्तिमान बना रहता है।

श्लोक 10 (devibhagavatam.9.2.10)

ऐश्वर्यवचनः शश्च क्तिः पराक्रम एव च । तत्स्वरूपा तयोर्दात्री सा शक्तिः परिकीर्तिता

aiśvaryavacanaḥ śaśca ktiḥ parākrama eva ca | tatsvarūpā tayordātrī sā śaktiḥ parikīrtitā

"ऐश्वर्य" शब्द ऐश्वर्य का वाचक है और "क्ति" पराक्रम का वाचक है; इन दोनों की स्वरूपा तथा दात्री होने से वे शक्ति कही गई हैं।

श्लोक 11 (devibhagavatam.9.2.11)

ज्ञानं समृद्धिः सम्पत्तिर्यशश्चैव बलं भगः । तेन शक्तिर्भगवती भगरूपा च सा सदा

jñānaṁ samṛddhiḥ sampattiryaśaścaiva balaṁ bhagaḥ | tena śaktirbhagavatī bhagarūpā ca sā sadā

ज्ञान, समृद्धि, सम्पत्ति, यश तथा बल — यही "भग" कहलाता है; इसीलिए शक्ति भगवती तथा सदा भगरूपा हैं।

श्लोक 12 (devibhagavatam.9.2.12)

तया युक्तः सदात्मा च भगवांस्तेन कथ्यते । स च स्वेच्छामयो देवः साकारश्च निराकृतिः

tayā yuktaḥ sadātmā ca bhagavāṁstena kathyate | sa ca svecchāmayo devaḥ sākāraśca nirākṛtiḥ

उस शक्ति से युक्त होने के कारण ही आत्मा सदा भगवान कहलाता है; वह देव स्वेच्छामय, साकार भी है और निराकार भी।

श्लोक 13 (devibhagavatam.9.2.13)

तेजोरूपं निराकारं ध्यायन्ते योगिनः सदा । वदन्ति च परं ब्रह्म परमानन्दमीश्वरम्

tejorūpaṁ nirākāraṁ dhyāyante yoginaḥ sadā | vadanti ca paraṁ brahma paramānandamīśvaram

योगीजन सदा उन्हें तेजोरूप, निराकार मानकर ध्यान करते हैं तथा उन्हें परब्रह्म, परमानन्दस्वरूप ईश्वर कहते हैं।

श्लोक 14 (devibhagavatam.9.2.14)

अदृश्यं सर्वद्रष्टारं सर्वज्ञं सर्वकारणम् । सर्वदं सर्वरूपं तं वैष्णवास्तन्न मन्वते

adṛśyaṁ sarvadraṣṭāraṁ sarvajñaṁ sarvakāraṇam | sarvadaṁ sarvarūpaṁ taṁ vaiṣṇavāstanna manvate

अदृश्य, सबके साक्षी, सर्वज्ञ, सबके कारण, सबकुछ देने वाले तथा सर्वरूप — वैष्णवजन उन्हें केवल इसी निराकार रूप में नहीं मानते।

श्लोक 15 (devibhagavatam.9.2.15)

वदन्ति चैव ते कस्य तेजस्तेजस्विना विना । तेजोमण्डलमध्यस्थं ब्रह्म तेजस्विनं परम्

vadanti caiva te kasya tejastejasvinā vinā | tejomaṇḍalamadhyasthaṁ brahma tejasvinaṁ param

वे कहते हैं — तेजस्वी के बिना यह तेज किसका है? तेजोमण्डल के मध्य में स्थित वह ब्रह्म स्वयं परम तेजस्वी है।

श्लोक 16 (devibhagavatam.9.2.16)

स्वेच्छामयं सर्वरूपं सर्वकारणकारणम् । अतीव सुन्दरं रूपं बिभ्रतं सुमनोहरम्

svecchāmayaṁ sarvarūpaṁ sarvakāraṇakāraṇam | atīva sundaraṁ rūpaṁ bibhrataṁ sumanoharam

वे स्वेच्छामय, सर्वरूप तथा सभी कारणों के भी कारण हैं; वे अत्यन्त सुन्दर और मनोहर रूप धारण करने वाले हैं।

श्लोक 17 (devibhagavatam.9.2.17)

किशोरवयसं शान्तं सर्वकान्तं परात्परम् । नवीननीरदाभासधामैकं श्यामविग्रहम्

kiśoravayasaṁ śāntaṁ sarvakāntaṁ parātparam | navīnanīradābhāsadhāmaikaṁ śyāmavigraham

वे किशोर अवस्था वाले, शान्त, सर्वमनोहर तथा परात्पर हैं; वे नवीन मेघ के समान श्याम शरीर के एकमात्र धाम हैं।

श्लोक 18 (devibhagavatam.9.2.18)

शरन्मध्याह्नपद्मौघशोभामोचनलोचनम् । मुक्ताच्छविविनिन्द्यैकदन्तपङ्क्तिमनोरमम्

śaranmadhyāhnapadmaughaśobhāmocanalocanam | muktācchavivinindyaikadantapaṅktimanoramam

शरद ऋतु के मध्याह्न में खिले कमल-समूह की शोभा को भी लजाने वाले नेत्रों वाले, मोतियों की कान्ति को भी तिरस्कृत करने वाली मनोहर दन्तपंक्ति वाले —

श्लोक 19 (devibhagavatam.9.2.19)

मयूरपिच्छचूडं च मालतीमाल्यमण्डितम् । सुनसं सस्मितं कान्तं भक्तानुग्रहकारणम्

mayūrapicchacūḍaṁ ca mālatīmālyamaṇḍitam | sunasaṁ sasmitaṁ kāntaṁ bhaktānugrahakāraṇam

मयूरपंख से सुशोभित शिखा वाले, मालती की माला से मण्डित, सुन्दर नाक वाले, मुस्कुराते हुए तथा भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए कारणस्वरूप —

श्लोक 20 (devibhagavatam.9.2.20)

ज्वलदग्निविशुद्धैकपीतांशुकसुशोभितम् । द्विभुजं मुरलीहस्तं रत्नभूषणभूषितम्

jvaladagniviśuddhaikapītāṁśukasuśobhitam | dvibhujaṁ muralīhastaṁ ratnabhūṣaṇabhūṣitam

प्रज्वलित अग्नि के समान शुद्ध पीताम्बर से सुशोभित, दो भुजाओं वाले, हाथ में मुरली धारण करने वाले तथा रत्नाभूषणों से भूषित —

श्लोक 21 (devibhagavatam.9.2.21)

सर्वाधारं च सर्वेशं सर्वशक्तियुतं विभुम् । सर्वैश्वर्यप्रदं सर्वस्वतन्त्रं सर्वमङ्गलम्

sarvādhāraṁ ca sarveśaṁ sarvaśaktiyutaṁ vibhum | sarvaiśvaryapradaṁ sarvasvatantraṁ sarvamaṅgalam

वे सबके आधार, सबके स्वामी, सभी शक्तियों से युक्त, सर्वव्यापी, सभी ऐश्वर्य देने वाले, सर्वथा स्वतन्त्र तथा सर्वमंगलस्वरूप हैं।

श्लोक 22 (devibhagavatam.9.2.22)

परिपूर्णतमं सिद्धं सिद्धेशं सिद्धिकारकम् । ध्यायन्ते वैष्णवाः शश्वद्देवदेवं सनातनम्

paripūrṇatamaṁ siddhaṁ siddheśaṁ siddhikārakam | dhyāyante vaiṣṇavāḥ śaśvaddevadevaṁ sanātanam

वैष्णवजन उन्हीं सम्पूर्णतम, सिद्ध, सिद्धेश, सिद्धिदाता, सनातन देवाधिदेव का सदा ध्यान करते हैं।

श्लोक 23 (devibhagavatam.9.2.23)

जन्ममृत्युजराव्याधिशोकभीतिहरं परम् । ब्रह्मणो वयसा यस्य निमेष उपचर्यते

janmamṛtyujarāvyādhiśokabhītiharaṁ param | brahmaṇo vayasā yasya nimeṣa upacaryate

वे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक तथा भय को हरने वाले परम हैं; ब्रह्मा की आयु भी जिनके एक निमेष के तुल्य मानी जाती है।

श्लोक 24 (devibhagavatam.9.2.24)

स चात्मा स परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते । कृषिस्तद्भक्तिवचनो नश्च तद्दास्यवाचकः

sa cātmā sa paraṁ brahma kṛṣṇa ityabhidhīyate | kṛṣistadbhaktivacano naśca taddāsyavācakaḥ

वही आत्मा, वही परब्रह्म "कृष्ण" कहलाता है; "कृषि" शब्द उनकी भक्ति का वाचक है और "न" शब्द उनकी दासता का वाचक है।

श्लोक 25 (devibhagavatam.9.2.25)

भक्तिदास्यप्रदाता यः स च कृष्णः प्रकीर्तितः । कृषिश्च सर्ववचनो नकारो बीजमेव च

bhaktidāsyapradātā yaḥ sa ca kṛṣṇaḥ prakīrtitaḥ | kṛṣiśca sarvavacano nakāro bījameva ca

जो भक्ति और दास्य प्रदान करने वाले हैं, वे ही कृष्ण कहे गए हैं; "कृषि" शब्द सर्वस्व का वाचक है और "न" अक्षर बीज ही है।

श्लोक 26 (devibhagavatam.9.2.26)

स कृष्णः सर्वस्रष्टाऽऽदौ सिसृक्षन्नेक एव च । सृष्ट्युन्मुखस्तदंशेन कालेन प्रेरितः प्रभुः

sa kṛṣṇaḥ sarvasraṣṭā''dau sisṛkṣanneka eva ca | sṛṣṭyunmukhastadaṁśena kālena preritaḥ prabhuḥ

वे कृष्ण सृष्टि के आरम्भ में सर्वस्रष्टा, अकेले ही सृष्टि करने की इच्छा रखने वाले थे; अपने अंशरूप काल से प्रेरित होकर वे प्रभु सृष्टि की ओर उन्मुख हुए।

श्लोक 27 (devibhagavatam.9.2.27)

स्वेच्छामयः स्वेच्छया च द्विधारूपो बभूव ह । स्त्रीरूपो वामभागांशो दक्षिणांशः पुमान्स्मृतः

svecchāmayaḥ svecchayā ca dvidhārūpo babhūva ha | strīrūpo vāmabhāgāṁśo dakṣiṇāṁśaḥ pumānsmṛtaḥ

स्वेच्छामय होकर अपनी ही इच्छा से वे दो रूपों में हो गए — बायाँ अंश स्त्रीरूप तथा दाहिना अंश पुरुष कहा गया।

श्लोक 28 (devibhagavatam.9.2.28)

तां ददर्श महाकामी कामाधारां सनातनः । अतीव कमनीया च चारुपङ्कजसन्निभाम्

tāṁ dadarśa mahākāmī kāmādhārāṁ sanātanaḥ | atīva kamanīyā ca cārupaṅkajasannibhām

उस महाकामी सनातन ने काम की आधारभूता उस अत्यन्त कमनीया तथा सुन्दर कमल के समान सुन्दरी को देखा —

श्लोक 29 (devibhagavatam.9.2.29)

चन्द्रबिम्बविनिन्द्यैकनितम्बयुगलां पराम् । सुचारुकदलीस्तम्भनिन्दितश्रोणिसुन्दरीम्

candrabimbavinindyaikanitambayugalāṁ parām | sucārukadalīstambhaninditaśroṇisundarīm

चन्द्रमण्डल की भी शोभा को लजाने वाले नितम्बों वाली, केले के सुन्दर स्तम्भ को भी लजाने वाली कमर वाली उस सुन्दरी को —

श्लोक 30 (devibhagavatam.9.2.30)

श्रीयुक्तश्रीफलाकारस्तनयुग्ममनोरमाम् । पुष्पजुष्टां सुवलितां मध्यक्षीणां मनोहराम्

śrīyuktaśrīphalākārastanayugmamanoramām | puṣpajuṣṭāṁ suvalitāṁ madhyakṣīṇāṁ manoharām

श्रीफल के समान सुन्दर स्तनयुगल वाली, पुष्पों से सुशोभित, सुन्दर घुँघराले केशों वाली तथा क्षीण कटि वाली मनोहर सुन्दरी को —

श्लोक 31 (devibhagavatam.9.2.31)

अतीव सुन्दरीं शान्तां सस्मितां वक्रलोचनाम् । वह्निशुद्धांशुकाधारां रत्नभूषणभूषिताम्

atīva sundarīṁ śāntāṁ sasmitāṁ vakralocanām | vahniśuddhāṁśukādhārāṁ ratnabhūṣaṇabhūṣitām

अत्यन्त सुन्दर, शान्त, मुस्कुराती हुई, कटाक्षपूर्ण नेत्रों वाली, अग्नि के समान शुद्ध वस्त्र धारण करने वाली तथा रत्नाभूषणों से भूषित उस सुन्दरी को —

श्लोक 32 (devibhagavatam.9.2.32)

शश्वच्चक्षुश्चकोराभ्यां पिबन्तीं सततं मुदा । कृष्णस्य मुखचन्द्रं च चन्द्रकोटिविनिन्दितम्

śaśvaccakṣuścakorābhyāṁ pibantīṁ satataṁ mudā | kṛṣṇasya mukhacandraṁ ca candrakoṭivininditam

वह चकोर के समान अपने दोनों नेत्रों से निरन्तर हर्षपूर्वक कृष्ण के उस मुखचन्द्र का पान करती रहती थी, जो करोड़ों चन्द्रमाओं की शोभा को भी लजाने वाला था।

श्लोक 33 (devibhagavatam.9.2.33)

कस्तूरीबिन्दुना सार्धमधश्चन्दनबिन्दुना । समं सिन्दूरबिन्दुं च भालमध्ये च बिभ्रतीम्

kastūrībindunā sārdhamadhaścandanabindunā | samaṁ sindūrabinduṁ ca bhālamadhye ca bibhratīm

वह अपने ललाट के मध्य में कस्तूरी की बिंदी के साथ नीचे चन्दन की बिंदी तथा उसके साथ ही सिन्दूर की बिंदी भी धारण करती थी —

श्लोक 34 (devibhagavatam.9.2.34)

वक्रिमं कबरीभारं मालतीमाल्यभूषितम् । रत्नेन्द्रसारहारं च दधतीं कान्तकामुकीम्

vakrimaṁ kabarībhāraṁ mālatīmālyabhūṣitam | ratnendrasārahāraṁ ca dadhatīṁ kāntakāmukīm

घुँघराले, भारी केशों वाली, मालती की माला से भूषित, श्रेष्ठ रत्नों के हार को धारण करने वाली उस प्रिय कामिनी को —

श्लोक 35 (devibhagavatam.9.2.35)

कोटिचन्द्रप्रभामृष्टपुष्टशोभासमन्विताम् । गमनेन राजहंसगजगर्वविनाशिनीम्

koṭicandraprabhāmṛṣṭapuṣṭaśobhāsamanvitām | gamanena rājahaṁsagajagarvavināśinīm

करोड़ों चन्द्रमाओं की प्रभा से चमकती, परिपूर्ण शोभा से युक्त तथा अपनी चाल से राजहंस और गज के गर्व को भी नष्ट करने वाली उस सुन्दरी को —

श्लोक 36 (devibhagavatam.9.2.36)

दृष्ट्वा तां तु तया सार्धं रासेशो रासमण्डले । रासोल्लासे सुरसिको रासक्रीडाञ्चकार ह

dṛṣṭvā tāṁ tu tayā sārdhaṁ rāseśo rāsamaṇḍale | rāsollāse surasiko rāsakrīḍāñcakāra ha

उसे देखकर रासेश्वर ने उसके साथ रासमण्डल में, रस से भरे उल्लास में सुरसिक होकर रासक्रीड़ा की।

श्लोक 37 (devibhagavatam.9.2.37)

नानाप्रकारशृङ्गारं शृङ्गारो मूर्तिमानिव । चकार सुखसम्भोगं यावद्वै ब्रह्मणो दिनम्

nānāprakāraśṛṅgāraṁ śṛṅgāro mūrtimāniva | cakāra sukhasambhogaṁ yāvadvai brahmaṇo dinam

उन्होंने अनेक प्रकार के शृंगार किए, मानो शृंगार-रस स्वयं मूर्तिमान हो गया हो, और ब्रह्मा के एक दिन के बराबर समय तक सुखपूर्वक सम्भोग किया।

श्लोक 38 (devibhagavatam.9.2.38)

ततः स च परिश्रान्तस्तस्या योनौ जगत्पिता । चकार वीर्याधानं च नित्यानन्दे शुभक्षणे

tataḥ sa ca pariśrāntastasyā yonau jagatpitā | cakāra vīryādhānaṁ ca nityānande śubhakṣaṇe

तत्पश्चात् थके हुए उस जगत्पिता ने उस नित्य आनन्दमय शुभ क्षण में उसकी योनि में वीर्य का स्थापन किया।

श्लोक 39 (devibhagavatam.9.2.39)

गात्रतो योषितस्तस्याः सुरतान्ते च सुव्रत । निःससार श्रमजलं श्रान्तायास्तेजसा हरेः

gātrato yoṣitastasyāḥ suratānte ca suvrata | niḥsasāra śramajalaṁ śrāntāyāstejasā hareḥ

हे सुव्रत! रति के अन्त में हरि के तेज से थकी हुई उस स्त्री के शरीर से पसीना बह निकला।

श्लोक 40 (devibhagavatam.9.2.40)

महाक्रमणक्लिष्टाया निःश्वासश्च बभूव ह । तदा वव्रे श्रमजलं तत्सर्वं विश्वगोलकम्

mahākramaṇakliṣṭāyā niḥśvāsaśca babhūva ha | tadā vavre śramajalaṁ tatsarvaṁ viśvagolakam

उस महान श्रम से थकी हुई का श्वास भी तीव्र हो गया; तब उसका वह सारा स्वेद-जल समस्त विश्व-गोलक को घेरकर व्याप्त हो गया।

श्लोक 41 (devibhagavatam.9.2.41)

स च निःश्वासवायुश्च सर्वाधारो बभूव ह । निःश्वासवायुः सर्वेषां जीविनां च भवेषु च

sa ca niḥśvāsavāyuśca sarvādhāro babhūva ha | niḥśvāsavāyuḥ sarveṣāṁ jīvināṁ ca bhaveṣu ca

वही निःश्वास-वायु सबका आधार हो गया; वह निःश्वास-वायु सभी लोकों में समस्त प्राणियों के जीवन का भी आधार है।

श्लोक 42 (devibhagavatam.9.2.42)

बभूव मूर्तिमद्वायोर्वामाङ्गात्प्राणवल्लभा । तत्पत्नी सा च तत्पुत्राः प्राणाः पञ्च च जीविनाम्

babhūva mūrtimadvāyorvāmāṅgātprāṇavallabhā | tatpatnī sā ca tatputrāḥ prāṇāḥ pañca ca jīvinām

उस वायु के बाएँ अंग से प्राणों की प्रिया मूर्तिमती हुई, वही उसकी पत्नी बनी, और उनके पुत्र ही समस्त प्राणियों के पाँचों प्राण हुए।

श्लोक 43 (devibhagavatam.9.2.43)

प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ च वायवः । बभूवुरेव तत्पुत्रा अधः प्राणाश्च पञ्च च

prāṇo'pānaḥ samānaścodānavyānau ca vāyavaḥ | babhūvureva tatputrā adhaḥ prāṇāśca pañca ca

प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान — ये पाँचों वायु उनके पुत्र हुए, तथा नीचे शरीर में पाँच उपप्राण भी हुए।

श्लोक 44 (devibhagavatam.9.2.44)

घर्मतोयाधिदेवश्च बभूव वरुणो महान् । तद्वामाङ्गाच्च तत्पत्नी वरुणानी बभूव सा

gharmatoyādhidevaśca babhūva varuṇo mahān | tadvāmāṅgācca tatpatnī varuṇānī babhūva sā

महान वरुण उष्ण जल के अधिष्ठाता देव हुए; उन्हीं के बाएँ अंग से उनकी पत्नी वरुणानी उत्पन्न हुईं।

श्लोक 45 (devibhagavatam.9.2.45)

अथ सा कृष्णचिच्छक्तिः कृष्णगर्भं दधार ह । शतमन्वन्तरं यावज्ज्वलन्ती ब्रह्मतेजसा

atha sā kṛṣṇacicchaktiḥ kṛṣṇagarbhaṁ dadhāra ha | śatamanvantaraṁ yāvajjvalantī brahmatejasā

तब उस कृष्ण की चित्शक्ति ने ब्रह्मतेज से प्रज्वलित होते हुए सौ मन्वन्तरों तक कृष्ण के गर्भ को धारण किया।

श्लोक 46 (devibhagavatam.9.2.46)

कृष्णप्राणाधिदेवी सा कृष्णप्राणाधिकप्रिया । कृष्णस्य सङ्गिनी शश्वत्कृष्णवक्षःस्थलस्थिता

kṛṣṇaprāṇādhidevī sā kṛṣṇaprāṇādhikapriyā | kṛṣṇasya saṅginī śaśvatkṛṣṇavakṣaḥsthalasthitā

वे कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी तथा कृष्ण के प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं; वे सदा कृष्ण की संगिनी तथा उनके वक्षःस्थल पर स्थित रहती हैं।

श्लोक 47 (devibhagavatam.9.2.47)

शतमन्वन्तरान्ते च कालेऽतीते तु सुन्दरी । सुषाव डिम्भं स्वर्णाभं विश्वाधारालयं परम्

śatamanvantarānte ca kāle'tīte tu sundarī | suṣāva ḍimbhaṁ svarṇābhaṁ viśvādhārālayaṁ param

सौ मन्वन्तर बीत जाने पर उस सुन्दरी ने स्वर्ण के समान कान्तिमान, समस्त विश्व के आधार-गृहस्वरूप एक शिशु को जन्म दिया।

श्लोक 48 (devibhagavatam.9.2.48)

दृष्ट्वा डिम्भं च सा देवी हृदयेन व्यदूयत । उत्ससर्ज च कोपेन ब्रह्माण्डगोलके जले

dṛṣṭvā ḍimbhaṁ ca sā devī hṛdayena vyadūyata | utsasarja ca kopena brahmāṇḍagolake jale

उस शिशु को देखकर वह देवी हृदय में दुःखित हुई तथा क्रोध में आकर उसे ब्रह्माण्ड-गोलक के जल में डाल दिया।

श्लोक 49 (devibhagavatam.9.2.49)

दृष्ट्वा कृष्णश्च तत्त्यागं हाहाकारं चकार ह । शशाप देवीं देवेशस्तत्क्षणं च यथोचितम्

dṛṣṭvā kṛṣṇaśca tattyāgaṁ hāhākāraṁ cakāra ha | śaśāpa devīṁ deveśastatkṣaṇaṁ ca yathocitam

उसका यह त्याग देखकर कृष्ण हाहाकार कर उठे तथा देवेश ने उसी क्षण उस देवी को उचित शाप दे दिया।

श्लोक 50 (devibhagavatam.9.2.50)

यतोऽपत्यं त्वया त्यक्तं कोपशीले च निष्ठुरे । भव त्वमनपत्यापि चाद्यप्रभृति निश्चितम्

yato'patyaṁ tvayā tyaktaṁ kopaśīle ca niṣṭhure | bhava tvamanapatyāpi cādyaprabhṛti niścitam

उन्होंने कहा — हे क्रोधशीला और निष्ठुरा! चूँकि तुमने अपनी सन्तान को त्याग दिया है, इसलिए आज से निश्चित रूप से तुम भी सन्तानहीन हो जाओ।

श्लोक 51 (devibhagavatam.9.2.51)

या यास्त्वदंशरूपाश्च भविष्यन्ति सुरस्त्रियः । अनपत्याश्च ताः सर्वास्त्वत्समा नित्ययौवनाः

yā yāstvadaṁśarūpāśca bhaviṣyanti surastriyaḥ | anapatyāśca tāḥ sarvāstvatsamā nityayauvanāḥ

जो-जो देवियाँ तुम्हारे अंशरूप में होंगी, वे सब भी तुम्हारे समान सन्तानहीन तथा नित्य युवा रहेंगी।

श्लोक 52 (devibhagavatam.9.2.52)

एतस्मिन्नन्तरे देवी जिह्वाग्रात्सहसा ततः । आविर्बभूव कन्यैका शुक्लवर्णा मनोहरा

etasminnantare devī jihvāgrātsahasā tataḥ | āvirbabhūva kanyaikā śuklavarṇā manoharā

इसी बीच उस देवी की जिह्वा के अग्रभाग से सहसा एक शुभ्रवर्णा, मनोहर कन्या प्रकट हुई।

श्लोक 53 (devibhagavatam.9.2.53)

श्वेतवस्त्रपरीधाना वीणापुस्तकधारिणी । रत्नभूषणभूषाढ्या सर्वशास्त्राधिदेवता

śvetavastraparīdhānā vīṇāpustakadhāriṇī | ratnabhūṣaṇabhūṣāḍhyā sarvaśāstrādhidevatā

वह श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, वीणा तथा पुस्तक हाथ में लिए, रत्नाभूषणों से समृद्ध तथा समस्त शास्त्रों की अधिष्ठात्री देवी थीं।

श्लोक 54 (devibhagavatam.9.2.54)

अथ कालान्तरे सा च द्विधारूपो बभूव ह । वामार्धाङ्गाच्च कमला दक्षिणार्धाच्च राधिका

atha kālāntare sā ca dvidhārūpo babhūva ha | vāmārdhāṅgācca kamalā dakṣiṇārdhācca rādhikā

तत्पश्चात् कालान्तर में वह देवी दो रूपों में हो गईं — बाएँ आधे अंग से कमला तथा दाहिने आधे अंग से राधिका प्रकट हुईं।

श्लोक 55 (devibhagavatam.9.2.55)

एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो द्विधारूपो बभूव सः । दक्षिणार्धश्च द्विभुजो वामार्धश्च चतुर्भुजः

etasminnantare kṛṣṇo dvidhārūpo babhūva saḥ | dakṣiṇārdhaśca dvibhujo vāmārdhaśca caturbhujaḥ

इसी बीच कृष्ण भी दो रूपों में हो गए — दाहिना आधा अंग द्विभुज तथा बायाँ आधा अंग चतुर्भुज हुआ।

श्लोक 56 (devibhagavatam.9.2.56)

उवाच वाणीं कृष्णस्तां त्वमस्य कामिनी भव । अत्रैव मानिनी राधा तव भद्रं भविष्यति

uvāca vāṇīṁ kṛṣṇastāṁ tvamasya kāminī bhava | atraiva māninī rādhā tava bhadraṁ bhaviṣyati

कृष्ण ने उस वाणी से कहा — तुम इस चतुर्भुज रूप की कामिनी बनो; यहीं मानिनी राधा रहेंगी, तुम्हारा कल्याण होगा।

श्लोक 57 (devibhagavatam.9.2.57)

एवं लक्ष्मीं च प्रददौ तुष्टो नारायणाय च । स जगाम च वैकुण्ठं ताभ्यां सार्धं जगत्पतिः

evaṁ lakṣmīṁ ca pradadau tuṣṭo nārāyaṇāya ca | sa jagāma ca vaikuṇṭhaṁ tābhyāṁ sārdhaṁ jagatpatiḥ

इस प्रकार प्रसन्न होकर उन्होंने लक्ष्मी को नारायण को सौंप दिया; और वह जगत्पति उन दोनों के साथ वैकुण्ठ चले गए।

श्लोक 58 (devibhagavatam.9.2.58)

अनपत्ये च ते द्वे च जाते राधांशसम्भवे । भूता नारायणाङ्गाच्च पार्षदाश्च चतुर्भुजाः

anapatye ca te dve ca jāte rādhāṁśasambhave | bhūtā nārāyaṇāṅgācca pārṣadāśca caturbhujāḥ

राधा के अंश से उत्पन्न वे दोनों सन्तानहीन हुईं; नारायण के अंग से चतुर्भुज पार्षद उत्पन्न हुए।

श्लोक 59 (devibhagavatam.9.2.59)

तेजसा वयसा रूपगुणाभ्यां च समा हरेः । बभूवुः कमलाङ्गाच्च दासीकोट्यश्च तत्समाः

tejasā vayasā rūpaguṇābhyāṁ ca samā hareḥ | babhūvuḥ kamalāṅgācca dāsīkoṭyaśca tatsamāḥ

वे तेज, वय, रूप तथा गुणों में हरि के समान थे; कमला के अंग से भी करोड़ों दासियाँ, उन्हीं के समान, उत्पन्न हुईं।

श्लोक 60 (devibhagavatam.9.2.60)

अथ गोलोकनाथस्य लोम्नां विवरतो मुने । भूताश्चासङ्ख्यगोपाश्च वयसा तेजसा समाः

atha golokanāthasya lomnāṁ vivarato mune | bhūtāścāsaṅkhyagopāśca vayasā tejasā samāḥ

हे मुनि! तत्पश्चात् गोलोकनाथ के रोम-छिद्रों से असंख्य गोप उत्पन्न हुए, जो वय और तेज में उनके समान थे।

श्लोक 61 (devibhagavatam.9.2.61)

रूपेण च गुणेनैव बलेन विक्रमेण च । प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे बभूवुः पार्षदा विभोः

rūpeṇa ca guṇenaiva balena vikrameṇa ca | prāṇatulyapriyāḥ sarve babhūvuḥ pārṣadā vibhoḥ

रूप, गुण, बल तथा पराक्रम में भी वे उन्हीं के समान थे; वे सभी उस विभु के प्राणतुल्य प्रिय पार्षद हुए।

श्लोक 62 (devibhagavatam.9.2.62)

राधाङ्गलोमकूपेभ्यो बभूवुर्गोपकन्यकाः । राधातुल्याश्च ताः सर्वा राधादास्यः प्रियंवदाः

rādhāṅgalomakūpebhyo babhūvurgopakanyakāḥ | rādhātulyāśca tāḥ sarvā rādhādāsyaḥ priyaṁvadāḥ

राधा के अंग के रोम-छिद्रों से गोपकन्याएँ उत्पन्न हुईं; वे सब राधा के समान तथा उनकी प्रियवचन बोलने वाली दासियाँ हुईं।

श्लोक 63 (devibhagavatam.9.2.63)

रत्नभूषणभूषाढ्याः शश्वत्सुस्थिरयौवनाः । अनपत्याश्च ताः सर्वाः पुंसः शापेन सन्ततम्

ratnabhūṣaṇabhūṣāḍhyāḥ śaśvatsusthirayauvanāḥ | anapatyāśca tāḥ sarvāḥ puṁsaḥ śāpena santatam

वे रत्नाभूषणों से समृद्ध तथा सदा स्थिर यौवन वाली थीं; पुरुष के शाप के कारण वे सभी सदा के लिए सन्तानहीन रहीं।

श्लोक 64 (devibhagavatam.9.2.64)

एतस्मिन्नन्तरे विप्र सहसा कृष्णदेवता । आविर्बभूव दुर्गा सा विष्णुमाया सनातनी

etasminnantare vipra sahasā kṛṣṇadevatā | āvirbabhūva durgā sā viṣṇumāyā sanātanī

हे विप्र! इसी बीच कृष्ण की देवता से सहसा वह सनातन विष्णुमाया दुर्गा प्रकट हुईं।

श्लोक 65 (devibhagavatam.9.2.65)

देवी नारायणीशाना सर्वशक्तिस्वरूपिणी । बुद्ध्यधिष्ठात्री देवी सा कृष्णस्य परमात्मनः

devī nārāyaṇīśānā sarvaśaktisvarūpiṇī | buddhyadhiṣṭhātrī devī sā kṛṣṇasya paramātmanaḥ

वे देवी नारायणी, ईशाना तथा सर्वशक्तिस्वरूपा हैं; वे परमात्मा कृष्ण की बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं।

श्लोक 66 (devibhagavatam.9.2.66)

देवीनां बीजरूपा च मूलप्रकृतिरीश्वरी । परिपूर्णतमा तेजःस्वरूपा त्रिगुणात्मिका

devīnāṁ bījarūpā ca mūlaprakṛtirīśvarī | paripūrṇatamā tejaḥsvarūpā triguṇātmikā

वे सभी देवियों की बीजरूपा, ईश्वरी मूलप्रकृति, परिपूर्णतम, तेजःस्वरूपा तथा त्रिगुणात्मिका हैं।

श्लोक 67 (devibhagavatam.9.2.67)

तप्तकाञ्चनवर्णाभा कोटिसूर्यसमप्रभा । ईषद्धास्यप्रसन्नास्या सहस्रभुजसंयुता

taptakāñcanavarṇābhā koṭisūryasamaprabhā | īṣaddhāsyaprasannāsyā sahasrabhujasaṁyutā

वे तपाए हुए स्वर्ण के समान वर्ण वाली, करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाली, हल्की मुस्कान से प्रसन्न मुख वाली तथा सहस्र भुजाओं से युक्त हैं।

श्लोक 68 (devibhagavatam.9.2.68)

नानाशस्त्रास्त्रनिकरं बिभ्रती सा त्रिलोचना । वह्निशुद्धांशुकाधाना रत्नभूषणभूषिता

nānāśastrāstranikaraṁ bibhratī sā trilocanā | vahniśuddhāṁśukādhānā ratnabhūṣaṇabhūṣitā

वे त्रिनेत्री विविध शस्त्रास्त्रों के समूह को धारण करती हैं; वे अग्नि के समान शुद्ध वस्त्र पहने तथा रत्नाभूषणों से भूषित हैं।

श्लोक 69 (devibhagavatam.9.2.69)

यस्याश्चांशांशकलया बभूवुः सर्वयोषितः । सर्वे विश्वस्थिता लोका मोहिताः स्युश्च मायया

yasyāścāṁśāṁśakalayā babhūvuḥ sarvayoṣitaḥ | sarve viśvasthitā lokā mohitāḥ syuśca māyayā

जिनके अंश के अंश की कला से सभी स्त्रियाँ उत्पन्न हुईं; विश्व में स्थित सभी लोक उनकी माया से मोहित होते हैं।

श्लोक 70 (devibhagavatam.9.2.70)

सर्वैश्वर्यप्रदात्री च कामिनां गृहवासिनाम् । कृष्णभक्तिप्रदा या च वैष्णवानां च वैष्णवी

sarvaiśvaryapradātrī ca kāmināṁ gṛhavāsinām | kṛṣṇabhaktipradā yā ca vaiṣṇavānāṁ ca vaiṣṇavī

वे सांसारिक कामनाओं वाले गृहस्थों को सभी ऐश्वर्य देने वाली हैं; वैष्णवों को कृष्णभक्ति देने वाली वैष्णवी भी वे ही हैं।

श्लोक 71 (devibhagavatam.9.2.71)

मुमुक्षूणां मोक्षदात्री सुखिनां सुखदायिनी । स्वर्गेषु स्वर्गलक्ष्मीश्च गृहलक्ष्यीर्गृहेषु च

mumukṣūṇāṁ mokṣadātrī sukhināṁ sukhadāyinī | svargeṣu svargalakṣmīśca gṛhalakṣyīrgṛheṣu ca

वे मुमुक्षुओं को मोक्ष देने वाली तथा सुखी जनों को सुख देने वाली हैं; स्वर्ग में स्वर्गलक्ष्मी तथा घरों में गृहलक्ष्मी भी वे ही हैं।

श्लोक 72 (devibhagavatam.9.2.72)

तपस्विषु तपस्या च श्रीरूपा तु नृपेषु च । या वह्नौ दाहिकारूपा प्रभारूपा च भास्करे

tapasviṣu tapasyā ca śrīrūpā tu nṛpeṣu ca | yā vahnau dāhikārūpā prabhārūpā ca bhāskare

तपस्वियों में तप के रूप में तथा राजाओं में श्रीरूप में हैं; वे अग्नि में दाहिका-रूप तथा सूर्य में प्रभा-रूप हैं।

श्लोक 73 (devibhagavatam.9.2.73)

शोभारूपा च चन्द्रे च सा पद्मेषु च शोभना । सर्वशक्तिस्वरूपा या श्रीकृष्णे परमात्मनि

śobhārūpā ca candre ca sā padmeṣu ca śobhanā | sarvaśaktisvarūpā yā śrīkṛṣṇe paramātmani

चन्द्रमा में वे शोभा-रूप तथा कमलों में सौन्दर्य-रूप हैं; वे परमात्मा श्रीकृष्ण की सर्वशक्तिस्वरूपा हैं।

श्लोक 74 (devibhagavatam.9.2.74)

यया च शक्तिमानात्मा यया च शक्तिमज्जगत् । यया विना जगत्सर्वं जीवन्मृतमिव स्थितम्

yayā ca śaktimānātmā yayā ca śaktimajjagat | yayā vinā jagatsarvaṁ jīvanmṛtamiva sthitam

जिनके द्वारा आत्मा शक्तिमान है और जिनके द्वारा जगत शक्तिमान है; उनके बिना सारा जगत जीवित रहते हुए भी मृतक के समान रहता है।

श्लोक 75 (devibhagavatam.9.2.75)

या च संसारवृक्षस्य बीजरूपा सनातनी । स्थितिरूपा वृद्धिरूपा फलरूपा च नारद

yā ca saṁsāravṛkṣasya bījarūpā sanātanī | sthitirūpā vṛddhirūpā phalarūpā ca nārada

हे नारद! जो इस संसार-वृक्ष की सनातन बीजरूपा हैं, वे ही स्थिति-रूपा, वृद्धि-रूपा तथा फल-रूपा भी हैं।

श्लोक 76 (devibhagavatam.9.2.76)

क्षुत्पिपासादयारूपा निद्रा तन्द्रा क्षमा मतिः । शान्तिलज्जातुष्टिपुष्टिभ्रान्तिकान्त्यादिरूपिणी

kṣutpipāsādayārūpā nidrā tandrā kṣamā matiḥ | śāntilajjātuṣṭipuṣṭibhrāntikāntyādirūpiṇī

वे भूख, प्यास, दया, निद्रा, तन्द्रा, क्षमा तथा बुद्धि के रूप में हैं; वे शान्ति, लज्जा, तुष्टि, पुष्टि, भ्रान्ति, कान्ति आदि की भी स्वरूपा हैं।

श्लोक 77 (devibhagavatam.9.2.77)

सा च संस्तूय सर्वेशं तत्पुरः समुवास ह । रत्नसिंहासनं तस्यै प्रददौ राधिकेश्वरः

sā ca saṁstūya sarveśaṁ tatpuraḥ samuvāsa ha | ratnasiṁhāsanaṁ tasyai pradadau rādhikeśvaraḥ

उन्होंने सर्वेश्वर की स्तुति करके उनके सामने आसन ग्रहण किया; राधिकेश्वर ने उन्हें रत्नजड़ित सिंहासन प्रदान किया।

श्लोक 78 (devibhagavatam.9.2.78)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र सस्त्रीकश्च चतुर्मुखः । पद्मनाभेर्नाभिपद्मान्निःससार महामुने

etasminnantare tatra sastrīkaśca caturmukhaḥ | padmanābhernābhipadmānniḥsasāra mahāmune

हे महामुने! इसी बीच वहाँ पद्मनाभ के नाभिकमल से अपनी पत्नी सहित चतुर्मुख ब्रह्मा प्रकट हुए।

श्लोक 79 (devibhagavatam.9.2.79)

कमण्डलुधरः श्रीमांस्तपस्वी ज्ञानिनां वरः । चतुर्मुखैस्तं तुष्टाव प्रज्वलन्ब्रह्मतेजसा

kamaṇḍaludharaḥ śrīmāṁstapasvī jñānināṁ varaḥ | caturmukhaistaṁ tuṣṭāva prajvalanbrahmatejasā

कमण्डलु धारण किए, श्रीसम्पन्न, तपस्वी तथा ज्ञानियों में श्रेष्ठ उन्होंने ब्रह्मतेज से प्रज्वलित होते हुए अपने चारों मुखों से उनकी स्तुति की।

श्लोक 80 (devibhagavatam.9.2.80)

सा तदा सुन्दरी सृष्टा शतचन्द्रसमप्रभा । वह्निशुद्धांशुकाधाना रत्नभूषणभूषणा

sā tadā sundarī sṛṣṭā śatacandrasamaprabhā | vahniśuddhāṁśukādhānā ratnabhūṣaṇabhūṣaṇā

तब वह सुन्दरी सृष्टि हुई, जो सौ चन्द्रमाओं के समान प्रभा वाली, अग्नि के समान शुद्ध वस्त्र पहने तथा रत्नाभूषणों से भूषित थी।

श्लोक 81 (devibhagavatam.9.2.81)

रत्नसिंहासने रम्ये संस्तूय सर्वकारणम् । उवास स्वामिना सार्धं कृष्णस्य पुरतो मुदा

ratnasiṁhāsane ramye saṁstūya sarvakāraṇam | uvāsa svāminā sārdhaṁ kṛṣṇasya purato mudā

उन्होंने सर्वकारण की स्तुति करके अपने स्वामी के साथ सुन्दर रत्नसिंहासन पर कृष्ण के सामने प्रसन्नतापूर्वक निवास किया।

श्लोक 82 (devibhagavatam.9.2.82)

एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो द्विधारूपो बभूव सः । वामार्धाङ्गो महादेवो दक्षिणे गोपिकापतिः

etasminnantare kṛṣṇo dvidhārūpo babhūva saḥ | vāmārdhāṅgo mahādevo dakṣiṇe gopikāpatiḥ

इसी बीच कृष्ण भी दो रूपों में हो गए — बाएँ आधे अंग से महादेव तथा दाहिने अंग में गोपिकापति रहे।

श्लोक 83 (devibhagavatam.9.2.83)

शुद्धस्फटिकसङ्काशः शतकोटिरविप्रभः । त्रिशूलपट्टिशधरो व्याघ्रचर्माम्बरो हरः

śuddhasphaṭikasaṅkāśaḥ śatakoṭiraviprabhaḥ | triśūlapaṭṭiśadharo vyāghracarmāmbaro haraḥ

शुद्ध स्फटिक के समान वर्ण वाले, अरबों सूर्यों के समान प्रभा वाले, त्रिशूल और पट्टिश धारण करने वाले तथा व्याघ्रचर्म वस्त्रधारी हर —

श्लोक 84 (devibhagavatam.9.2.84)

तप्तकाञ्चनवर्णाभो जटाभारधरः परः । भस्मभूषितगात्रश्च सस्मितश्चन्द्रशेखरः

taptakāñcanavarṇābho jaṭābhāradharaḥ paraḥ | bhasmabhūṣitagātraśca sasmitaścandraśekharaḥ

तपाए हुए स्वर्ण के समान वर्ण वाले, भारी जटाओं को धारण करने वाले, भस्म से विभूषित शरीर वाले, मुस्कुराते हुए तथा चन्द्रशेखर —

श्लोक 85 (devibhagavatam.9.2.85)

दिगम्बरो नीलकण्ठः सर्पभूषणभूषितः । बिभ्रद्दक्षिणहस्तेन रत्नमालां सुसंस्कृताम्

digambaro nīlakaṇṭhaḥ sarpabhūṣaṇabhūṣitaḥ | bibhraddakṣiṇahastena ratnamālāṁ susaṁskṛtām

दिगम्बर, नीलकण्ठ, सर्पों के आभूषणों से भूषित तथा दाहिने हाथ में सुसंस्कृत रत्नमाला धारण किए हुए —

श्लोक 86 (devibhagavatam.9.2.86)

प्रजपन्पञ्चवक्त्रेण ब्रह्मज्योतिः सनातनम् । सत्यस्वरूपं श्रीकृष्णं परमात्मानमीश्वरम्

prajapanpañcavaktreṇa brahmajyotiḥ sanātanam | satyasvarūpaṁ śrīkṛṣṇaṁ paramātmānamīśvaram

वे अपने पाँचों मुखों से सनातन ब्रह्मज्योति, सत्यस्वरूप, परमात्मा ईश्वर श्रीकृष्ण का जप करते हुए —

श्लोक 87 (devibhagavatam.9.2.87)

कारणं कारणानां च सर्वमङ्गलमङ्गलम् । जन्ममृत्युजराव्याधिशोकभीतिहरं परम्

kāraṇaṁ kāraṇānāṁ ca sarvamaṅgalamaṅgalam | janmamṛtyujarāvyādhiśokabhītiharaṁ param

कारणों के भी कारण, सभी मंगलों के भी मंगल, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-शोक-भय को हरने वाले परम —

श्लोक 88 (devibhagavatam.9.2.88)

संस्तूय मृत्योर्मृत्युं तं यतो मृत्युञ्जयाभिधः । रत्नसिंहासने रम्ये समुवास हरेः पुरः

saṁstūya mṛtyormṛtyuṁ taṁ yato mṛtyuñjayābhidhaḥ | ratnasiṁhāsane ramye samuvāsa hareḥ puraḥ

उस मृत्यु के भी मृत्यु-स्वरूप की स्तुति करके, जिस कारण वे मृत्युंजय कहलाए, वे हरि के सामने सुन्दर रत्नसिंहासन पर विराजमान हुए।

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