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नवम स्कन्ध · अध्याय 26

सावित्री पूजा-विधि का कथन

अध्याय 25अध्याय-सूचीअध्याय 27

श्लोक 1 (devibhagavatam.9.26.1)

नारद उवाच । तुलस्युपाख्यानमिदं श्रुतं चातिसुधोपमम् । ततः सावित्र्युपाख्यानं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि

nārada uvāca | tulasyupākhyānamidaṁ śrutaṁ cātisudhopamam | tataḥ sāvitryupākhyānaṁ tanme vyākhyātumarhasi

नारद ने कहा — तुलसी की यह कथा जो मैंने सुनी, वह अमृत के समान अत्यंत मधुर है। अब आप मुझे सावित्री की कथा भी सुनाने की कृपा करें।

श्लोक 2 (devibhagavatam.9.26.2)

पुरा केन समुद्भूता सा श्रुता च श्रुतेः प्रसूः । केन वा पूजिता लोके प्रथमे कैश्च वा परे

purā kena samudbhūtā sā śrutā ca śruteḥ prasūḥ | kena vā pūjitā loke prathame kaiśca vā pare

पूर्वकाल में वेदों की माता कहलाने वाली वह सावित्री किससे उत्पन्न हुईं, ऐसा मैंने सुना है? संसार में सबसे पहले किसने उनकी पूजा की, और उसके पश्चात् अन्य किन-किन ने?

श्लोक 3 (devibhagavatam.9.26.3)

श्रीनारायण उवाच । ब्रह्मणा वेदजननी प्रथमे पूजिता मुने । द्वितीये च वेदगणैस्तत्पश्चाद्विदुषां गणैः

śrīnārāyaṇa uvāca | brahmaṇā vedajananī prathame pūjitā mune | dvitīye ca vedagaṇaistatpaścādviduṣāṁ gaṇaiḥ

श्री नारायण ने कहा — हे मुने! वेदों की माता को सर्वप्रथम ब्रह्मा जी ने पूजा; द्वितीय काल में वेद-समूहों ने, और उसके पश्चात् विद्वानों के समूहों ने।

श्लोक 4 (devibhagavatam.9.26.4)

तदा चाश्वपतिर्भूपः पूजयामास भारते । तत्पश्चात्पूजयामासुर्वर्णाश्चत्वार एव च

tadā cāśvapatirbhūpaḥ pūjayāmāsa bhārate | tatpaścātpūjayāmāsurvarṇāścatvāra eva ca

तदनन्तर भारतवर्ष में राजा अश्वपति ने उनकी पूजा की; और उसके बाद चारों वर्णों ने भी उनकी पूजा की।

श्लोक 5 (devibhagavatam.9.26.5)

नारद उवाच । को वा सोऽश्वपतिर्ब्रह्मन् केन वा तेन पूजिता । सर्वपूज्या च सा देवी प्रथमे कैश्च वा परे

nārada uvāca | ko vā so'śvapatirbrahman kena vā tena pūjitā | sarvapūjyā ca sā devī prathame kaiśca vā pare

नारद ने कहा — हे ब्रह्मन्! वह अश्वपति कौन थे, और उन्होंने किस विधि से उनकी पूजा की? वह सर्वपूज्य देवी सबसे पहले किनके द्वारा और फिर किनके द्वारा पूजी गईं?

श्लोक 6 (devibhagavatam.9.26.6)

श्रीनारायण उवाच । मद्रदेशे महाराजो बभूवाश्वपतिर्मुने । वैरिणां बलहर्ता च मित्राणां दुःखनाशनः

śrīnārāyaṇa uvāca | madradeśe mahārājo babhūvāśvapatirmune | vairiṇāṁ balahartā ca mitrāṇāṁ duḥkhanāśanaḥ

श्री नारायण ने कहा — हे मुने! मद्र देश में अश्वपति नामक एक महाराज थे, जो शत्रुओं के बल का हरण करने वाले और मित्रों के दुःख का नाश करने वाले थे।

श्लोक 7 (devibhagavatam.9.26.7)

आसीत्तस्य महाराज्ञी महिषी धर्मचारिणी । मालतीति समाख्याता यथा लक्ष्मीर्गदाभृतः

āsīttasya mahārājñī mahiṣī dharmacāriṇī | mālatīti samākhyātā yathā lakṣmīrgadābhṛtaḥ

उनकी एक महारानी थीं, धर्मपरायणा पटरानी, जिनका नाम मालती था — जैसे गदाधारी विष्णु की लक्ष्मी।

श्लोक 8 (devibhagavatam.9.26.8)

सा च राज्ञी च वन्ध्या च वसिष्ठस्योपदेशतः । चकाराराधनं भक्त्या सावित्र्याश्चैव नारद

sā ca rājñī ca vandhyā ca vasiṣṭhasyopadeśataḥ | cakārārādhanaṁ bhaktyā sāvitryāścaiva nārada

वह रानी संतानहीन थीं, और हे नारद! वसिष्ठ जी के उपदेश से उन्होंने भक्तिपूर्वक सावित्री देवी की आराधना की।

श्लोक 9 (devibhagavatam.9.26.9)

प्रत्यादेशं न सा प्राप्ता महिषी न ददर्श ताम् । गृहं जगाम दुःखार्ता हृदयेन विदूयता

pratyādeśaṁ na sā prāptā mahiṣī na dadarśa tām | gṛhaṁ jagāma duḥkhārtā hṛdayena vidūyatā

उस रानी को न तो कोई उत्तर मिला और न ही उन्होंने देवी के दर्शन पाए। दुःख से पीड़ित और हृदय में जलती हुई वह घर लौट गईं।

श्लोक 10 (devibhagavatam.9.26.10)

राजा तां दुःखितां दृष्ट्वा बोधयित्वा नयेन वै । सावित्र्यास्तपसे भक्त्या जगाम पुष्करं तदा

rājā tāṁ duḥkhitāṁ dṛṣṭvā bodhayitvā nayena vai | sāvitryāstapase bhaktyā jagāma puṣkaraṁ tadā

राजा उन्हें दुःखी देखकर, नीतिपूर्वक समझा-बुझाकर, स्वयं भक्तिभाव से सावित्री देवी की तपस्या हेतु पुष्कर तीर्थ को गए।

श्लोक 11 (devibhagavatam.9.26.11)

तपश्चकार तत्रैव संयतः शतवत्सरम् । न ददर्श च सावित्र्या प्रत्यादेशो बभूव च

tapaścakāra tatraiva saṁyataḥ śatavatsaram | na dadarśa ca sāvitryā pratyādeśo babhūva ca

वहाँ उन्होंने संयमपूर्वक सौ वर्ष तक तपस्या की, फिर भी न तो उन्हें दर्शन हुए और न ही सावित्री की ओर से कोई उत्तर आया।

श्लोक 12 (devibhagavatam.9.26.12)

शुश्रावाकाशवाणीं च नृपेन्द्रश्चाशरीरिणीम् । गायत्र्या दशलक्षं च जपं त्वं कुरु नारद

śuśrāvākāśavāṇīṁ ca nṛpendraścāśarīriṇīm | gāyatryā daśalakṣaṁ ca japaṁ tvaṁ kuru nārada

तब उस श्रेष्ठ राजा ने आकाश से एक अशरीरी वाणी सुनी — "हे नारद! तुम गायत्री का दस लाख जप करो।"

श्लोक 13 (devibhagavatam.9.26.13)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र आजगाम पराशरः । प्रणनाम ततस्तं च मुनिर्नृपमुवाच च

etasminnantare tatra ājagāma parāśaraḥ | praṇanāma tatastaṁ ca munirnṛpamuvāca ca

इसी बीच वहाँ मुनि पराशर आ पहुँचे। उन्होंने राजा को प्रणाम किया और फिर मुनि ने राजा से यह कहा।

श्लोक 14 (devibhagavatam.9.26.14)

मुनिरुवाच । सकृज्जपश्च गायत्र्याः पापं दिनभवं हरेत् । दशवारं जपेनैव नश्येत्पापं दिवानिशम्

muniruvāca | sakṛjjapaśca gāyatryāḥ pāpaṁ dinabhavaṁ haret | daśavāraṁ japenaiva naśyetpāpaṁ divāniśam

मुनि ने कहा — गायत्री का एक बार जप करने से दिनभर के पाप का नाश होता है। दस बार जप करने से दिन-रात के पाप का नाश होता है।

श्लोक 15 (devibhagavatam.9.26.15)

शतवारं जपश्चैव पापं मासार्जितं हरेत् । सहस्रधा जपश्चैव कल्मषं वत्सरार्जितम्

śatavāraṁ japaścaiva pāpaṁ māsārjitaṁ haret | sahasradhā japaścaiva kalmaṣaṁ vatsarārjitam

सौ बार जप करने से एक मास में अर्जित पाप का नाश होता है, और सहस्र बार जप करने से एक वर्ष में अर्जित पाप का नाश होता है।

श्लोक 16 (devibhagavatam.9.26.16)

लक्षो जन्मकृतं पापं दशलक्षोऽन्यजन्मजम् । सर्वजन्मकृतं पापं शतलक्षाद्विनश्यति

lakṣo janmakṛtaṁ pāpaṁ daśalakṣo'nyajanmajam | sarvajanmakṛtaṁ pāpaṁ śatalakṣādvinaśyati

एक लाख जप से एक जन्म का पाप, दस लाख जप से अन्य जन्म का पाप नष्ट होता है, और एक करोड़ जप से समस्त जन्मों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 17 (devibhagavatam.9.26.17)

करोति मुक्तिं विप्राणां जपो दशगुणस्ततः । करं सर्पफणाकारं कृत्वा तद्रन्धमुद्रितम्

karoti muktiṁ viprāṇāṁ japo daśaguṇastataḥ | karaṁ sarpaphaṇākāraṁ kṛtvā tadrandhamudritam

उससे भी अधिक, दस गुना जप ब्राह्मणों को मुक्ति प्रदान करता है। हाथ को सर्प के फण के समान बनाकर, उंगलियों के बीच के अंतराल को बंद करके —

श्लोक 18 (devibhagavatam.9.26.18)

आनम्रमूर्धमचलं प्रजपेत्प्राङ्मुखो द्विजः । अनामिकामध्यदेशादधोऽवामक्रमेण च

ānamramūrdhamacalaṁ prajapetprāṅmukho dvijaḥ | anāmikāmadhyadeśādadho'vāmakrameṇa ca

द्विज पूर्वाभिमुख होकर, सिर झुकाकर, स्थिर होकर जप करे — अनामिका अंगुली के मध्य भाग से नीचे की ओर, उलटे क्रम में,

श्लोक 19 (devibhagavatam.9.26.19)

तर्जनीमूलपर्यन्तं जपस्यैवं क्रमः करे । श्वेतपङ्कजबीजानां स्फटिकानां च संस्कृताम्

tarjanīmūlaparyantaṁ japasyaivaṁ kramaḥ kare | śvetapaṅkajabījānāṁ sphaṭikānāṁ ca saṁskṛtām

तर्जनी अंगुली के मूल तक — इस प्रकार हाथ पर जप का क्रम है। श्वेत कमल के बीजों अथवा स्फटिक की, भलीभाँति संस्कारित माला से —

श्लोक 20 (devibhagavatam.9.26.20)

कृत्वा वै मालिकां राजन् जपेत्तीर्थे सुरालये । संस्थाप्य मालामश्वत्थपत्रे पद्मे च संयतः

kṛtvā vai mālikāṁ rājan japettīrthe surālaye | saṁsthāpya mālāmaśvatthapatre padme ca saṁyataḥ

हे राजन्! ऐसी माला बनाकर तीर्थ में या देवालय में जप करे। संयमी होकर माला को पीपल के पत्ते या कमल पर स्थापित करके —

श्लोक 21 (devibhagavatam.9.26.21)

कृत्वा गोरोचनाक्तां च गायत्र्या स्नापयेत्सुधीः । गायत्रीशतकं तस्यां जपेच्च विधिपूर्वकम्

kṛtvā gorocanāktāṁ ca gāyatryā snāpayetsudhīḥ | gāyatrīśatakaṁ tasyāṁ japecca vidhipūrvakam

गोरोचन से लेपित करके, बुद्धिमान साधक गायत्री मंत्र से उसे स्नान कराए और विधिपूर्वक उस पर सौ बार गायत्री का जप करे।

श्लोक 22 (devibhagavatam.9.26.22)

अथवा पञ्चगव्येन स्नात्वा मालां सुसंस्कृताम् । अथ गङ्गोदकेनैव स्नात्वा वातिसुसंस्कृताम्

athavā pañcagavyena snātvā mālāṁ susaṁskṛtām | atha gaṅgodakenaiva snātvā vātisusaṁskṛtām

अथवा पंचगव्य से स्नान कराकर माला को भलीभाँति संस्कारित करे, अथवा गंगाजल से स्नान कराकर वह अत्यंत सुसंस्कृत हो जाती है।

श्लोक 23 (devibhagavatam.9.26.23)

एवं क्रमेण राजर्षे दशलक्षं जपं कुरु । साक्षाद्द्रक्ष्यसि सावित्रीं त्रिजन्मपातकक्षयात्

evaṁ krameṇa rājarṣe daśalakṣaṁ japaṁ kuru | sākṣāddrakṣyasi sāvitrīṁ trijanmapātakakṣayāt

हे राजर्षे! इसी क्रम से दस लाख जप करो। तीन जन्मों के पापों के नष्ट होने पर तुम साक्षात् सावित्री देवी के दर्शन करोगे।

श्लोक 24 (devibhagavatam.9.26.24)

नित्यं सन्ध्यां च हे राजन् करिष्यसि दिने दिने । मध्याह्ने चापि सायाह्ने प्रातरेव शुचिः सदा

nityaṁ sandhyāṁ ca he rājan kariṣyasi dine dine | madhyāhne cāpi sāyāhne prātareva śuciḥ sadā

हे राजन्! प्रतिदिन तुम नित्य संध्या करना — मध्याह्न में, सायंकाल में और प्रातःकाल में भी, सदा शुद्ध रहकर।

श्लोक 25 (devibhagavatam.9.26.25)

सन्ध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु । यदह्ना कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत्

sandhyāhīno'śucirnityamanarhaḥ sarvakarmasu | yadahnā kurute karma na tasya phalabhāgbhavet

संध्या रहित व्यक्ति सदा अशुद्ध रहता है और समस्त कर्मों के लिए अयोग्य होता है। वह दिन में जो भी कर्म करता है, उसका फल उसे प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 26 (devibhagavatam.9.26.26)

नोपतिष्ठति यः पूर्वां नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम् । स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः

nopatiṣṭhati yaḥ pūrvāṁ nopāste yastu paścimām | sa śūdravadbahiṣkāryaḥ sarvasmād dvijakarmaṇaḥ

जो प्रातःकालीन संध्या में उपस्थित नहीं होता और सायंकालीन संध्या की उपासना नहीं करता, वह शूद्र के समान समस्त द्विज-कर्मों से बहिष्कृत करने योग्य है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.9.26.27)

यावज्जीवनपर्यन्तं त्रिःसन्ध्यां यः करोति च । स च सूर्यसमो विप्रस्तेजसा तपसा सदा

yāvajjīvanaparyantaṁ triḥsandhyāṁ yaḥ karoti ca | sa ca sūryasamo viprastejasā tapasā sadā

जो व्यक्ति जीवनपर्यंत त्रिकाल संध्या करता है, वह ब्राह्मण तेज और तप में सदा सूर्य के समान होता है।

श्लोक 28 (devibhagavatam.9.26.28)

तत्पादपद्मरजसा सद्यःपूता वसुन्धरा । जीवन्मुक्तः स तेजस्वी सन्ध्यापूतो हि यो द्विजः

tatpādapadmarajasā sadyaḥpūtā vasundharā | jīvanmuktaḥ sa tejasvī sandhyāpūto hi yo dvijaḥ

उनके चरण-कमलों की धूलि से पृथ्वी तत्क्षण पवित्र हो जाती है। वह तेजस्वी द्विज, जो संध्या से पवित्र है, जीवन्मुक्त ही है।

श्लोक 29 (devibhagavatam.9.26.29)

तीर्थानि च पवित्राणि तस्य संस्पर्शमात्रतः । ततः पापानि यान्त्येव वैनतेयादिवोरगाः

tīrthāni ca pavitrāṇi tasya saṁsparśamātrataḥ | tataḥ pāpāni yāntyeva vainateyādivoragāḥ

उसके मात्र स्पर्श से तीर्थ भी पवित्र हो जाते हैं; पाप उससे ऐसे भाग जाते हैं जैसे सर्प वैनतेय (गरुड़) के समक्ष से भाग जाते हैं।

श्लोक 30 (devibhagavatam.9.26.30)

न गृह्णन्ति सुराः पूजां पितरः पिण्डतर्पणम् । स्वेच्छया च द्विजातेश्च त्रिसन्ध्यारहितस्य च

na gṛhṇanti surāḥ pūjāṁ pitaraḥ piṇḍatarpaṇam | svecchayā ca dvijāteśca trisandhyārahitasya ca

जो द्विज त्रिकाल-संध्या से रहित है, देवता उसकी पूजा को और पितर उसके पिंड-तर्पण को स्वेच्छा से स्वीकार नहीं करते।

श्लोक 31 (devibhagavatam.9.26.31)

मूलप्रकृत्यभक्तो यस्तन्मन्त्रस्याप्यनर्चकः । तदुत्सवविहीनश्च विषहीनो यथोरगः

mūlaprakṛtyabhakto yastanmantrasyāpyanarcakaḥ | tadutsavavihīnaśca viṣahīno yathoragaḥ

जो मूल प्रकृति (आदि देवी) का भक्त नहीं है, जो उनके मंत्र की उपासना नहीं करता, और जो उनके उत्सवों से रहित है — वह विषरहित सर्प के समान है।

श्लोक 32 (devibhagavatam.9.26.32)

विष्णुमन्त्रविहीनश्च त्रिसन्ध्यारहितो द्विजः । एकादशीविहीनश्च विषहीनो यथोरगः

viṣṇumantravihīnaśca trisandhyārahito dvijaḥ | ekādaśīvihīnaśca viṣahīno yathoragaḥ

विष्णु-मंत्र से रहित, त्रिकाल-संध्या से रहित और एकादशी-व्रत से रहित द्विज — वह विषरहित सर्प के समान है।

श्लोक 33 (devibhagavatam.9.26.33)

हरेरनैवेद्यभोजी धावको वृषवाहकः । शूद्रान्नभोजी यो विप्रो विषहीनो यथोरगः

hareranaivedyabhojī dhāvako vṛṣavāhakaḥ | śūdrānnabhojī yo vipro viṣahīno yathoragaḥ

जो हरि को अर्पित किए बिना भोजन करता है, जो वेतन पर दौड़ने वाला हरकारा है, जो बैलों को हाँकने वाला है, अथवा जो ब्राह्मण शूद्र का अन्न खाता है — वह विषरहित सर्प के समान है।

श्लोक 34 (devibhagavatam.9.26.34)

शूद्राणां शवदाही यः स विप्रो वृषलीपतिः । शूद्राणां सूपकारश्च विषहीनो यथोरगः

śūdrāṇāṁ śavadāhī yaḥ sa vipro vṛṣalīpatiḥ | śūdrāṇāṁ sūpakāraśca viṣahīno yathoragaḥ

जो ब्राह्मण शूद्रों के शवों का दाह-संस्कार करता है, जो शूद्र स्त्री का पति है, अथवा जो शूद्रों का रसोइया है — वह विषरहित सर्प के समान है।

श्लोक 35 (devibhagavatam.9.26.35)

शूद्राणां च प्रतिग्राही शूद्रयाजी च यो द्विजः । मसिजीवी असिजीवी विषहीनो यथोरगः

śūdrāṇāṁ ca pratigrāhī śūdrayājī ca yo dvijaḥ | masijīvī asijīvī viṣahīno yathoragaḥ

जो द्विज शूद्रों से दान ग्रहण करता है, जो शूद्रों का याजक बनता है, जो स्याही से या तलवार से जीविका चलाता है — वह विषरहित सर्प के समान है।

श्लोक 36 (devibhagavatam.9.26.36)

यः कन्याविक्रयी विप्रो यो हरेर्नामविक्रयी । यो विप्रोऽवीरान्नभोजी ऋतुस्नातान्नभोजकः

yaḥ kanyāvikrayī vipro yo harernāmavikrayī | yo vipro'vīrānnabhojī ṛtusnātānnabhojakaḥ

जो ब्राह्मण कन्या को बेचता है, जो हरि के नाम को बेचता है, जो वीरहीन (पुरुषरहित) घर का अन्न खाता है, अथवा ऋतुस्नाता स्त्री का अन्न खाता है —

श्लोक 37 (devibhagavatam.9.26.37)

भगजीवी बार्धुषिको विषहीनो यथोरगः । यो विद्याविकयी विप्रो विषहीनो यथोरगः

bhagajīvī bārdhuṣiko viṣahīno yathoragaḥ | yo vidyāvikayī vipro viṣahīno yathoragaḥ

जो वेश्यावृत्ति की कमाई पर जीता है, जो सूदखोर है — वह विषरहित सर्प के समान है। जो ब्राह्मण विद्या को बेचता है, वह भी विषरहित सर्प के समान है।

श्लोक 38 (devibhagavatam.9.26.38)

सूर्योदये स्वपेद्यो हि मत्स्यभोजी च यो द्विजः । शिवापूजादिरहितो विषहीनो यथोरगः

sūryodaye svapedyo hi matsyabhojī ca yo dvijaḥ | śivāpūjādirahito viṣahīno yathoragaḥ

जो सूर्योदय के समय सोता रहता है, जो द्विज मछली खाता है, और जो देवी की पूजा आदि से रहित है — वह विषरहित सर्प के समान है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.9.26.39)

इत्युक्त्वा च मुनिश्रेष्ठः सर्वपूजाविधिक्रमम् । तमुवाच च सावित्र्या ध्यानादिकमभीप्सितम्

ityuktvā ca muniśreṣṭhaḥ sarvapūjāvidhikramam | tamuvāca ca sāvitryā dhyānādikamabhīpsitam

इस प्रकार समस्त पूजा-विधि का क्रम बताकर, उस श्रेष्ठ मुनि ने राजा की इच्छानुसार सावित्री के ध्यान आदि का भी वर्णन किया।

श्लोक 40 (devibhagavatam.9.26.40)

दत्त्वा सर्वं नृपेन्द्राय ययौ च स्वाश्रमे मुने । राजा सम्पूज्य सावित्रीं ददर्श वरमाप च

dattvā sarvaṁ nṛpendrāya yayau ca svāśrame mune | rājā sampūjya sāvitrīṁ dadarśa varamāpa ca

यह सब राजा को देकर मुनि अपने आश्रम को लौट गए। राजा ने सावित्री की पूजा करके उनके दर्शन प्राप्त किए और वरदान भी पाया।

श्लोक 41 (devibhagavatam.9.26.41)

नारद उवाच । किं वा ध्यानं च सावित्र्याः किं वा पूजाविधानकम् । स्तोत्रं मन्त्रं च किं दत्त्वा प्रययौ स पराशरः

nārada uvāca | kiṁ vā dhyānaṁ ca sāvitryāḥ kiṁ vā pūjāvidhānakam | stotraṁ mantraṁ ca kiṁ dattvā prayayau sa parāśaraḥ

नारद ने कहा — सावित्री का ध्यान क्या था, और उनकी पूजा-विधि क्या थी? पराशर जी कौन-सा स्तोत्र और मंत्र देकर गए?

श्लोक 42 (devibhagavatam.9.26.42)

नृपः केन विधानेन सम्पूज्य श्रुतिमातरम् । वरं च कं वा सम्प्राप सम्पूज्य तु विधानतः

nṛpaḥ kena vidhānena sampūjya śrutimātaram | varaṁ ca kaṁ vā samprāpa sampūjya tu vidhānataḥ

राजा ने किस विधि से श्रुति-माता (वेदमाता) की पूजा करके, और विधिपूर्वक पूजा करके कौन-सा वरदान प्राप्त किया?

श्लोक 43 (devibhagavatam.9.26.43)

तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि सावित्र्याः परमं महत् । रहस्यातिरहस्यं च श्रुतिसिद्धं समासतः

tatsarvaṁ śrotumicchāmi sāvitryāḥ paramaṁ mahat | rahasyātirahasyaṁ ca śrutisiddhaṁ samāsataḥ

मैं वह सब सुनना चाहता हूँ — सावित्री की परम महिमा, उनका अत्यंत गोपनीय रहस्य, जो श्रुति में सिद्ध है — संक्षेप में।

श्लोक 44 (devibhagavatam.9.26.44)

श्रीनारायण उवाच । ज्येष्ठकृष्णत्रयोदश्यां शुद्धकाले च यत्नतः । व्रतमेव चतुर्दश्यां व्रती भक्त्या समाचरेत्

śrīnārāyaṇa uvāca | jyeṣṭhakṛṣṇatrayodaśyāṁ śuddhakāle ca yatnataḥ | vratameva caturdaśyāṁ vratī bhaktyā samācaret

श्री नारायण ने कहा — ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को शुद्ध काल में प्रयत्नपूर्वक, और चतुर्दशी को व्रती भक्तिपूर्वक व्रत का आचरण करे।

श्लोक 45 (devibhagavatam.9.26.45)

व्रतं चतुर्दशाब्दं च द्विसप्तफलसंयुतम् । दत्त्वा द्विसप्तनैवेद्यं पुष्पधूपादिकं चरेत्

vrataṁ caturdaśābdaṁ ca dvisaptaphalasaṁyutam | dattvā dvisaptanaivedyaṁ puṣpadhūpādikaṁ caret

यह व्रत चौदह वर्षों तक चलता है, जिसमें चौदह फल अर्पित किए जाते हैं। चौदह नैवेद्य अर्पित करके पुष्प, धूप आदि से इसका आचरण करे।

श्लोक 46 (devibhagavatam.9.26.46)

वस्त्रं यज्ञोपवीतं च भोजनं विधिपूर्वकम् । संस्थाप्य मङ्गलघटं फलशाखासमन्वितम्

vastraṁ yajñopavītaṁ ca bhojanaṁ vidhipūrvakam | saṁsthāpya maṅgalaghaṭaṁ phalaśākhāsamanvitam

वस्त्र, यज्ञोपवीत और भोजन विधिपूर्वक अर्पित करे। फल और शाखाओं सहित मंगल-कलश की स्थापना करके —

श्लोक 47 (devibhagavatam.9.26.47)

गणेशं च दिनेशं च वह्निं विष्णुं शिवं शिवाम् । सम्पूज्य पूजयेदिष्टं घटे आवाहिते द्विजः

gaṇeśaṁ ca dineśaṁ ca vahniṁ viṣṇuṁ śivaṁ śivām | sampūjya pūjayediṣṭaṁ ghaṭe āvāhite dvijaḥ

द्विज गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और शिवा (पार्वती) का पूजन करके, कलश में आवाहन करके इष्ट देवी की पूजा करे।

श्लोक 48 (devibhagavatam.9.26.48)

शृणु ध्यानं च सावित्र्याश्चोक्तं माध्यन्दिने च यत् । स्तोत्रं पूजाविधानं च मन्त्रं च सर्वकामदम्

śṛṇu dhyānaṁ ca sāvitryāścoktaṁ mādhyandine ca yat | stotraṁ pūjāvidhānaṁ ca mantraṁ ca sarvakāmadam

अब सावित्री का वह ध्यान सुनो जो माध्यंदिन शाखा में कहा गया है, और वह स्तोत्र, पूजा-विधान तथा सर्वकामप्रद मंत्र भी सुनो।

श्लोक 49 (devibhagavatam.9.26.49)

तप्तकाञ्चनवर्णाभां ज्वलन्तीं ब्रह्मतेजसा । ग्रीष्ममध्याह्नमार्तण्डसहस्रसम्मितप्रभाम्

taptakāñcanavarṇābhāṁ jvalantīṁ brahmatejasā | grīṣmamadhyāhnamārtaṇḍasahasrasammitaprabhām

मैं ध्यान करता हूँ उन देवी का, जिनकी आभा तपाए हुए स्वर्ण के समान है, जो ब्रह्मतेज से दीप्तिमान हैं, जिनकी प्रभा ग्रीष्म ऋतु के मध्याह्न-सूर्य के सहस्र समान है।

श्लोक 50 (devibhagavatam.9.26.50)

ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां रत्नभूषणभूषिताम् । वह्निशुद्धांशुकाधानां भक्तानुग्रहविग्रहाम्

īṣaddhāsyaprasannāsyāṁ ratnabhūṣaṇabhūṣitām | vahniśuddhāṁśukādhānāṁ bhaktānugrahavigrahām

जिनका मुख हल्की मुस्कान से प्रसन्न है, जो रत्नाभूषणों से विभूषित हैं, जो अग्नि के समान शुद्ध वस्त्र धारण करती हैं, जिनका स्वरूप ही भक्तों पर अनुग्रह करने वाला है।

श्लोक 51 (devibhagavatam.9.26.51)

सुखदां मुक्तिदां शान्तां कान्तां च जगतां विधेः । सर्वसम्पत्स्वरूपां च प्रदात्रीं सर्वसम्पदाम्

sukhadāṁ muktidāṁ śāntāṁ kāntāṁ ca jagatāṁ vidheḥ | sarvasampatsvarūpāṁ ca pradātrīṁ sarvasampadām

जो सुख देने वाली, मुक्ति देने वाली, शांत हैं, और जगत् के विधाता ब्रह्मा की प्रिया हैं; जो स्वयं समस्त संपदाओं का स्वरूप हैं और समस्त संपदाओं की दात्री हैं।

श्लोक 52 (devibhagavatam.9.26.52)

वेदाधिष्ठातृदेवीं च वेदशास्त्रस्वरूपिणीम् । वेदबीजस्वरूपां च भजे तां वेदमातरम्

vedādhiṣṭhātṛdevīṁ ca vedaśāstrasvarūpiṇīm | vedabījasvarūpāṁ ca bhaje tāṁ vedamātaram

जो वेदों की अधिष्ठातृ देवी हैं, जिनका स्वरूप वेद-शास्त्र ही है, जिनका स्वरूप वेद-बीज है — उन वेदमाता का मैं भजन करता हूँ।

श्लोक 53 (devibhagavatam.9.26.53)

ध्यात्वा ध्यानेन नैवेद्यं दत्त्वा पाणिं स्वमूर्धनि । पुनर्ध्यात्वा घटे भक्त्या देवीमावाहयेद् व्रती

dhyātvā dhyānena naivedyaṁ dattvā pāṇiṁ svamūrdhani | punardhyātvā ghaṭe bhaktyā devīmāvāhayed vratī

इस ध्यान से ध्यान करके, नैवेद्य अर्पित करके, अपने सिर पर हाथ रखकर, और पुनः ध्यान करके, व्रती भक्तिपूर्वक देवी का कलश में आवाहन करे।

श्लोक 54 (devibhagavatam.9.26.54)

दत्त्वा षोडशोपचारं वेदोक्तं मन्त्रपूर्वकम् । सम्पूज्य स्तुत्वा प्रणमेद्देवदेवीं विधानतः

dattvā ṣoḍaśopacāraṁ vedoktaṁ mantrapūrvakam | sampūjya stutvā praṇameddevadevīṁ vidhānataḥ

वेदोक्त मंत्रपूर्वक सोलह उपचार अर्पित करके, पूजा और स्तुति करके, विधिपूर्वक देवदेवी को प्रणाम करे।

श्लोक 55 (devibhagavatam.9.26.55)

आसनं पाद्यमर्घ्यं च स्नानीयं चानुलेपनम् । धूपं दीपं च नैवेद्यं ताम्बूलं शीतलं जलम्

āsanaṁ pādyamarghyaṁ ca snānīyaṁ cānulepanam | dhūpaṁ dīpaṁ ca naivedyaṁ tāmbūlaṁ śītalaṁ jalam

आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान का जल, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल और शीतल जल —

श्लोक 56 (devibhagavatam.9.26.56)

वसनं भूषणं माल्यं गन्धमाचमनीयकम् । मनोहरं सुतल्पं च देयान्येतानि षोडश

vasanaṁ bhūṣaṇaṁ mālyaṁ gandhamācamanīyakam | manoharaṁ sutalpaṁ ca deyānyetāni ṣoḍaśa

वस्त्र, आभूषण, माला, सुगंध, आचमन का जल, और मनोहर सुंदर शय्या — ये सोलह वस्तुएँ अर्पित करने योग्य हैं।

श्लोक 57 (devibhagavatam.9.26.57)

दारुसारविकारं च हेमादिनिर्मितं च वा । देवाधारं पुण्यदं च मया तुभ्यं निवेदितम्

dārusāravikāraṁ ca hemādinirmitaṁ ca vā | devādhāraṁ puṇyadaṁ ca mayā tubhyaṁ niveditam

(आसन अर्पण मंत्र) चाहे वह उत्तम काष्ठ से बना हो या स्वर्ण आदि से निर्मित हो, देवी का आधार, पुण्यदायक — यह मैंने आपको अर्पित किया है।

श्लोक 58 (devibhagavatam.9.26.58)

तीर्थोदकं च पाद्यं च पुण्यदं प्रीतिदं महत् । पूजाङ्गभूतं शुद्धं च मया तुभ्यं निवेदितम्

tīrthodakaṁ ca pādyaṁ ca puṇyadaṁ prītidaṁ mahat | pūjāṅgabhūtaṁ śuddhaṁ ca mayā tubhyaṁ niveditam

(पाद्य अर्पण) यह तीर्थ जल, महान पुण्यदायक और प्रीतिदायक, पूजा का अंगभूत, शुद्ध — यह मैंने आपको अर्पित किया है।

श्लोक 59 (devibhagavatam.9.26.59)

पवित्ररूपमर्घ्यं च दूर्वापुष्पदलान्वितम् । पुण्यदं शङ्खतोयाक्तं मया तुभ्यं निवेदितम्

pavitrarūpamarghyaṁ ca dūrvāpuṣpadalānvitam | puṇyadaṁ śaṅkhatoyāktaṁ mayā tubhyaṁ niveditam

(अर्घ्य अर्पण) यह पवित्र अर्घ्य, दूर्वा, पुष्प और पत्तों से युक्त, पुण्यदायक, शंख के जल से मिश्रित — यह मैंने आपको अर्पित किया है।

श्लोक 60 (devibhagavatam.9.26.60)

सुगन्धं गन्धतोयं च स्नेहं सौगन्धकारकम् । मया निवेदितं भक्त्या स्नानीयं प्रतिगृह्यताम्

sugandhaṁ gandhatoyaṁ ca snehaṁ saugandhakārakam | mayā niveditaṁ bhaktyā snānīyaṁ pratigṛhyatām

(स्नानीय अर्पण) यह सुगंधित गंधयुक्त जल, और यह सुगंध देने वाला स्नेह (तेल) — भक्तिपूर्वक अर्पित यह स्नान-जल स्वीकार किया जाए।

श्लोक 61 (devibhagavatam.9.26.61)

गन्धद्रव्योद्भवं पुण्यं प्रीतिदं दिव्यगन्धदम् । मया निवेदितं भक्त्या गन्धतोयं तवाम्बिके

gandhadravyodbhavaṁ puṇyaṁ prītidaṁ divyagandhadam | mayā niveditaṁ bhaktyā gandhatoyaṁ tavāmbike

(गंध अर्पण) हे अम्बिके! सुगंधित द्रव्यों से उत्पन्न, पुण्यदायक, प्रीतिदायक, दिव्य सुगंधयुक्त यह गंधजल मैंने आपको भक्तिपूर्वक अर्पित किया है।

श्लोक 62 (devibhagavatam.9.26.62)

सर्वमङ्गलरूपं च सर्वं च मङ्गलप्रदम् । पुण्यदं च सुधूपं तं गृहाण परमेश्वरि

sarvamaṅgalarūpaṁ ca sarvaṁ ca maṅgalapradam | puṇyadaṁ ca sudhūpaṁ taṁ gṛhāṇa parameśvari

(धूप अर्पण) हे परमेश्वरि! यह उत्तम धूप, जो स्वयं सर्वमंगल का स्वरूप है, जो सब मंगल देने वाला और पुण्यदायक है, उसे ग्रहण कीजिए।

श्लोक 63 (devibhagavatam.9.26.63)

सुगन्धयुक्तं सुखदं मया तुभ्यं निवेदितम् । जगतां दर्शनार्थाय प्रदीपं दीप्तिकारकम्

sugandhayuktaṁ sukhadaṁ mayā tubhyaṁ niveditam | jagatāṁ darśanārthāya pradīpaṁ dīptikārakam

(दीप अर्पण) सुगंधयुक्त, सुखदायक, यह मैंने आपको अर्पित किया है — संसार के दर्शन हेतु यह दीप्तिमान प्रदीप —

श्लोक 64 (devibhagavatam.9.26.64)

अन्धकारध्वंसबीजं मया तुभ्यं निवेदितम् । तुष्टिदं पुष्टिदं चैव प्रीतिदं क्षुद्विनाशनम्

andhakāradhvaṁsabījaṁ mayā tubhyaṁ niveditam | tuṣṭidaṁ puṣṭidaṁ caiva prītidaṁ kṣudvināśanam

— यह अंधकार के नाश का बीज है, मैंने आपको अर्पित किया है। (नैवेद्य अर्पण) यह संतोष देने वाला, पुष्टि देने वाला, प्रीति देने वाला, भूख का नाश करने वाला —

श्लोक 65 (devibhagavatam.9.26.65)

पुण्यदं स्वादुरूपं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् । ताम्बूलप्रवरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्

puṇyadaṁ svādurūpaṁ ca naivedyaṁ pratigṛhyatām | tāmbūlapravaraṁ ramyaṁ karpūrādisuvāsitam

— पुण्यदायक और स्वादिष्ट यह नैवेद्य स्वीकार किया जाए। (ताम्बूल अर्पण) यह उत्तम, मनोहर, कर्पूर आदि से सुवासित ताम्बूल —

श्लोक 66 (devibhagavatam.9.26.66)

तुष्टिदं पुष्टिदं चैव मया तुभ्यं निवेदितम् । सुशीतलं वारि शीतं पिपासानाशकारणम्

tuṣṭidaṁ puṣṭidaṁ caiva mayā tubhyaṁ niveditam | suśītalaṁ vāri śītaṁ pipāsānāśakāraṇam

— संतोष और पुष्टि देने वाला यह मैंने आपको अर्पित किया है। (जल अर्पण) यह अत्यंत शीतल जल, जो प्यास का नाश करने वाला है —

श्लोक 67 (devibhagavatam.9.26.67)

जगतां जीवनरूपं च जीवनं प्रतिगृह्यताम् । देहशोभास्वरूपं च सभाशोभाविवर्धनम्

jagatāṁ jīvanarūpaṁ ca jīvanaṁ pratigṛhyatām | dehaśobhāsvarūpaṁ ca sabhāśobhāvivardhanam

— जो संसार का जीवन-स्वरूप है, यह जीवनदायी जल स्वीकार किया जाए। (वस्त्र अर्पण) यह देह की शोभा का स्वरूप है, जो सभा की शोभा बढ़ाने वाला है —

श्लोक 68 (devibhagavatam.9.26.68)

कार्पासजं च कृमिजं वसनं प्रतिगृह्यताम् । काञ्चनादिविनिर्माणं श्रीकरं श्रीयुतं सदा

kārpāsajaṁ ca kṛmijaṁ vasanaṁ pratigṛhyatām | kāñcanādivinirmāṇaṁ śrīkaraṁ śrīyutaṁ sadā

— चाहे कपास से बना हो या रेशम से, यह वस्त्र स्वीकार किया जाए। (आभूषण अर्पण) स्वर्ण आदि से निर्मित, श्रीकर, सदा श्रीयुक्त —

श्लोक 69 (devibhagavatam.9.26.69)

सुखदं पुण्यदं रत्नभूषणं प्रतिगृह्यताम् । नानावृक्षसमुद्भूतं नानारूपसमन्वितम्

sukhadaṁ puṇyadaṁ ratnabhūṣaṇaṁ pratigṛhyatām | nānāvṛkṣasamudbhūtaṁ nānārūpasamanvitam

— सुखदायक और पुण्यदायक यह रत्नभूषण स्वीकार किया जाए। (माला अर्पण) विभिन्न वृक्षों से उत्पन्न, नाना रूपों से युक्त —

श्लोक 70 (devibhagavatam.9.26.70)

फलस्वरूपं फलदं फलं च प्रतिगृह्यताम् । सर्वमङ्गलरूपं च सर्वमङ्गलमङ्गलम्

phalasvarūpaṁ phaladaṁ phalaṁ ca pratigṛhyatām | sarvamaṅgalarūpaṁ ca sarvamaṅgalamaṅgalam

— फल का स्वरूप, फलदायक, यह फल स्वीकार किया जाए, जो सर्वमंगल का स्वरूप है, सब मंगलों में परम मंगल है।

श्लोक 71 (devibhagavatam.9.26.71)

नानापुष्पविनिर्माणं बहुशोभासमन्वितम् । प्रीतिदं पुण्यदं चैव माल्यं च प्रतिगृह्यताम्

nānāpuṣpavinirmāṇaṁ bahuśobhāsamanvitam | prītidaṁ puṇyadaṁ caiva mālyaṁ ca pratigṛhyatām

नाना पुष्पों से निर्मित, अत्यंत शोभायुक्त, प्रीतिदायक और पुण्यदायक यह माला स्वीकार की जाए।

श्लोक 72 (devibhagavatam.9.26.72)

पुण्यदं च सुगन्धाढ्यं गन्धं च देवि गृह्यताम् । सिन्दूरं च वरं रम्यं भालशोभाविवर्धनम्

puṇyadaṁ ca sugandhāḍhyaṁ gandhaṁ ca devi gṛhyatām | sindūraṁ ca varaṁ ramyaṁ bhālaśobhāvivardhanam

हे देवी! यह पुण्यदायक और सुगंध से युक्त गंध स्वीकार किया जाए। (सिंदूर अर्पण) यह उत्तम, मनोहर सिंदूर, जो भाल की शोभा बढ़ाने वाला है —

श्लोक 73 (devibhagavatam.9.26.73)

भूषणानां च प्रवरं सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् । विशुद्धं ग्रन्थिसंयुक्तं पुण्यसूत्रविनिर्मितम्

bhūṣaṇānāṁ ca pravaraṁ sindūraṁ pratigṛhyatām | viśuddhaṁ granthisaṁyuktaṁ puṇyasūtravinirmitam

— आभूषणों में श्रेष्ठ यह सिंदूर स्वीकार किया जाए। (यज्ञोपवीत अर्पण) यह अत्यंत शुद्ध, गांठ से युक्त, पुण्यसूत्र से निर्मित —

श्लोक 74 (devibhagavatam.9.26.74)

पवित्रं वेदमन्त्रेण यज्ञसूत्रं च गृह्यताम् । द्रव्याण्येतानि मूलेन दत्त्वा स्तोत्रं पठेत्सुधीः

pavitraṁ vedamantreṇa yajñasūtraṁ ca gṛhyatām | dravyāṇyetāni mūlena dattvā stotraṁ paṭhetsudhīḥ

— वेदमंत्र से पवित्र किया गया यह यज्ञोपवीत स्वीकार किया जाए। इन सभी वस्तुओं को मूलमंत्र से अर्पित करके बुद्धिमान साधक स्तोत्र का पाठ करे।

श्लोक 75 (devibhagavatam.9.26.75)

ततो विप्राय भक्त्या च व्रती दद्याच्च दक्षिणाम् । सावित्रीति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च

tato viprāya bhaktyā ca vratī dadyācca dakṣiṇām | sāvitrīti caturthyantaṁ vahnijāyāntameva ca

तत्पश्चात् व्रती भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को दक्षिणा दे। मंत्र में "सावित्र्यै" (चतुर्थी विभक्ति) के साथ "वह्निजाया" (अग्नि की पत्नी, अर्थात् स्वाहा) को अंत में जोड़ा जाता है —

श्लोक 76 (devibhagavatam.9.26.76)

लक्ष्मीमायाकामपूर्वं मन्त्रमष्टाक्षरं विदुः । माध्यन्दिनोक्तं स्तोत्रं च सर्वकामफलप्रदम्

lakṣmīmāyākāmapūrvaṁ mantramaṣṭākṣaraṁ viduḥ | mādhyandinoktaṁ stotraṁ ca sarvakāmaphalapradam

लक्ष्मी, माया और काम के बीजों से युक्त यह आठ अक्षरों वाला मंत्र जाना जाता है। माध्यंदिन शाखा में कहा गया यह स्तोत्र समस्त कामनाओं का फल देने वाला है।

श्लोक 77 (devibhagavatam.9.26.77)

विप्रजीवनरूपं च निबोध कथयामि ते । कृष्णेन दत्तां सावित्रीं गोलोके ब्रह्मणे पुरा

viprajīvanarūpaṁ ca nibodha kathayāmi te | kṛṣṇena dattāṁ sāvitrīṁ goloke brahmaṇe purā

अब उस वृत्तांत को सुनो जो ब्राह्मणों के जीवन का सार है; मैं तुम्हें बताता हूँ कि पूर्वकाल में गोलोक में कृष्ण ने सावित्री को ब्रह्मा को किस प्रकार दिया।

श्लोक 78 (devibhagavatam.9.26.78)

नायाति सा तेन सार्धं ब्रह्मलोके च नारद । ब्रह्मा कृष्णाज्ञया भक्त्या तुष्टाव वेदमातरम्

nāyāti sā tena sārdhaṁ brahmaloke ca nārada | brahmā kṛṣṇājñayā bhaktyā tuṣṭāva vedamātaram

हे नारद! वह उनके साथ ब्रह्मलोक को नहीं गईं। कृष्ण की आज्ञा से ब्रह्मा जी ने भक्तिपूर्वक वेदमाता को प्रसन्न किया।

श्लोक 79 (devibhagavatam.9.26.79)

तदा सा परितुष्टा च ब्रह्माणं चकमे पतिम् । ब्रह्मोवाव सच्चिदानन्दरूपे त्वं मूलप्रकृतिरूपिणि

tadā sā parituṣṭā ca brahmāṇaṁ cakame patim | brahmovāva saccidānandarūpe tvaṁ mūlaprakṛtirūpiṇi

तब वे अत्यंत प्रसन्न होकर ब्रह्मा को पति रूप में वरण करने की इच्छुक हुईं। ब्रह्मा ने कहा — "आप सच्चिदानंद-स्वरूपा हैं, मूल प्रकृति के रूप में विद्यमान हैं,"

श्लोक 80 (devibhagavatam.9.26.80)

हिरण्यगर्भरूपे त्वं प्रसन्ना भव सुन्दरि । तेजःस्वरूपे परमे परमानन्दरूपिणि

hiraṇyagarbharūpe tvaṁ prasannā bhava sundari | tejaḥsvarūpe parame paramānandarūpiṇi

"आप हिरण्यगर्भ-स्वरूपा हैं; हे सुंदरी! प्रसन्न होइए। हे परम तेजस्वरूपा, परमानंद-स्वरूपिणी!"

श्लोक 81 (devibhagavatam.9.26.81)

द्विजातीनां जातिरूपे प्रसन्ना भव सुन्दरि । नित्ये नित्यप्रिये देवि नित्यानन्दस्वरूपिणि

dvijātīnāṁ jātirūpe prasannā bhava sundari | nitye nityapriye devi nityānandasvarūpiṇi

"हे द्विजातियों के जन्म-स्वरूपा! हे सुंदरी! प्रसन्न होइए। हे नित्या, नित्यप्रिया देवी, नित्यानंद-स्वरूपिणी!"

श्लोक 82 (devibhagavatam.9.26.82)

सर्वमङ्गलरूपे च प्रसन्ना भव सुन्दरि । सर्वस्वरूपे विप्राणां मन्त्रसारे परात्परे

sarvamaṅgalarūpe ca prasannā bhava sundari | sarvasvarūpe viprāṇāṁ mantrasāre parātpare

"हे सर्वमंगल-स्वरूपा! हे सुंदरी! प्रसन्न होइए। हे ब्राह्मणों की सर्वस्वरूपा, मंत्रों के सार, परात्परे!"

श्लोक 83 (devibhagavatam.9.26.83)

सुखदे मोक्षदे देवि प्रसन्ना भव सुन्दरि । विप्रपापेध्मदाहाय ज्वलदग्निशिखोपमे

sukhade mokṣade devi prasannā bhava sundari | viprapāpedhmadāhāya jvaladagniśikhopame

"हे सुखदायिनी, मोक्षदायिनी देवी! हे सुंदरी! प्रसन्न होइए। हे ब्राह्मणों के पापरूपी ईंधन को जलाने वाली प्रज्वलित अग्निशिखा के समान!"

श्लोक 84 (devibhagavatam.9.26.84)

बह्मतेजःप्रदे देवि प्रसन्ना भव सुन्दरि । कायेन मनसा वाचा यत्पापं कुरुते नरः

bahmatejaḥprade devi prasannā bhava sundari | kāyena manasā vācā yatpāpaṁ kurute naraḥ

"हे ब्रह्मतेज देने वाली देवी! हे सुंदरी! प्रसन्न होइए। मनुष्य शरीर, मन और वाणी से जो भी पाप करता है —"

श्लोक 85 (devibhagavatam.9.26.85)

तत्त्वत्स्मरणमात्रेण भस्मीभूतं भविष्यति । इत्युक्त्वा जगतां धाता तस्थौ तत्रैव संसदि

tattvatsmaraṇamātreṇa bhasmībhūtaṁ bhaviṣyati | ityuktvā jagatāṁ dhātā tasthau tatraiva saṁsadi

"— वह मात्र आपके स्मरण से भस्म हो जाएगा।" ऐसा कहकर जगत् के विधाता ब्रह्मा उसी सभा में स्थित रहे।

श्लोक 86 (devibhagavatam.9.26.86)

सावित्री ब्रह्मणा सार्धं ब्रह्मलोकं जगाम सा । अनेन स्तवराजेन संस्तूयाश्वपतिर्नृपः

sāvitrī brahmaṇā sārdhaṁ brahmalokaṁ jagāma sā | anena stavarājena saṁstūyāśvapatirnṛpaḥ

तब सावित्री ब्रह्मा के साथ ब्रह्मलोक को चली गईं। इस स्तवराज (श्रेष्ठ स्तोत्र) से स्तुति करके राजा अश्वपति ने —

श्लोक 87 (devibhagavatam.9.26.87)

ददर्श तां च सावित्रीं वरं प्राप मनोगतम् । स्तवराजमिमं पुण्यं सन्ध्यां कृत्वा च यः पठेत् । पाठे चतुर्णां वेदानां यत्फलं लभते च तत्

dadarśa tāṁ ca sāvitrīṁ varaṁ prāpa manogatam | stavarājamimaṁ puṇyaṁ sandhyāṁ kṛtvā ca yaḥ paṭhet | pāṭhe caturṇāṁ vedānāṁ yatphalaṁ labhate ca tat

— सावित्री का दर्शन प्राप्त किया और अपनी मनोवांछित वर का लाभ पाया। जो कोई संध्या करके इस पुण्यमय स्तवराज का पाठ करता है, उसे चारों वेदों के पाठ का जो फल प्राप्त होता है, वही फल प्राप्त होता है।

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