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नवम स्कन्ध · अध्याय 33

नाना कर्मों के विपाक-फल का कथन

अध्याय 32अध्याय-सूचीअध्याय 34

श्लोक 1 (devibhagavatam.9.33.1)

धर्मराज उवाच । हरिसेवारतः शुद्धो योगसिद्धो व्रती सति । तपस्वी ब्रह्मचारी च न याति नरकं ध्रुवम्

dharmarāja uvāca | harisevārataḥ śuddho yogasiddho vratī sati | tapasvī brahmacārī ca na yāti narakaṁ dhruvam

धर्मराज ने कहा — हे सती! जो हरि की सेवा में रत, शुद्ध, योगसिद्ध, व्रती, तपस्वी और ब्रह्मचारी है, वह निश्चय ही नरक को नहीं जाता।

श्लोक 2 (devibhagavatam.9.33.2)

कटुवाचा बान्धवांश्च बललेपेन यो नरः । दग्धान्करोति बलवान् वह्निकुण्डं प्रयाति सः

kaṭuvācā bāndhavāṁśca balalepena yo naraḥ | dagdhānkaroti balavān vahnikuṇḍaṁ prayāti saḥ

जो बलवान मनुष्य कटु वाणी से और बल के अहंकार से अपने बंधु-बांधवों को जलाता है, वह अग्निकुण्ड को जाता है।

श्लोक 3 (devibhagavatam.9.33.3)

स्वगात्रलोममानाब्दं तत्र स्थित्वा हुताशने । पशुयोनिमवाप्नोति रौद्रदग्धां त्रिजन्मनि

svagātralomamānābdaṁ tatra sthitvā hutāśane | paśuyonimavāpnoti raudradagdhāṁ trijanmani

वहाँ उस अग्नि में अपने शरीर के रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक रहकर, वह तीन जन्मों तक भीषण रूप से दग्ध होने वाली पशु-योनि को प्राप्त करता है।

श्लोक 4 (devibhagavatam.9.33.4)

ब्राह्मणं तृषितं तप्तं क्षुधितं गृहमागतम् । न भोजयति यो मूढस्तप्तकुण्डं प्रयाति सः

brāhmaṇaṁ tṛṣitaṁ taptaṁ kṣudhitaṁ gṛhamāgatam | na bhojayati yo mūḍhastaptakuṇḍaṁ prayāti saḥ

जो मूर्ख अपने घर आए हुए प्यासे, तपे हुए और भूखे ब्राह्मण को भोजन नहीं कराता, वह तप्तकुण्ड को जाता है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.9.33.5)

तत्र तल्लोममानं च वर्षं स्थित्वा च दुःखदे । तप्तस्थले वह्नितल्पे पक्षी च सप्तजन्मसु

tatra tallomamānaṁ ca varṣaṁ sthitvā ca duḥkhade | taptasthale vahnitalpe pakṣī ca saptajanmasu

उस दुःखदायक स्थान में अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक तप्त भूमि पर, अग्निशय्या पर रहकर, वह सात जन्मों तक पक्षी बनता है।

श्लोक 6 (devibhagavatam.9.33.6)

रविवारे च सङ्क्रान्त्याममायां श्राद्धवासरे । वस्त्राणां क्षारसंयोगं करोति केवलं नरः

ravivāre ca saṅkrāntyāmamāyāṁ śrāddhavāsare | vastrāṇāṁ kṣārasaṁyogaṁ karoti kevalaṁ naraḥ

जो मनुष्य रविवार को, संक्रांति में, अमावस्या को अथवा श्राद्ध के दिन केवल वस्त्रों में क्षार का संयोग करता है —

श्लोक 7 (devibhagavatam.9.33.7)

स याति क्षारकुण्डं च सूत्रमानाब्दमेव च । स व्रजेद्रजकीं योनिं सप्तजन्मसु भारते

sa yāti kṣārakuṇḍaṁ ca sūtramānābdameva ca | sa vrajedrajakīṁ yoniṁ saptajanmasu bhārate

— वह सूत्र की संख्या के बराबर वर्षों तक क्षारकुण्ड को जाता है। वह भारतवर्ष में सात जन्मों तक धोबी की योनि को प्राप्त होता है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.9.33.8)

मूलप्रकृतिनिन्दां यः कुरुते मानवाधमः । वेदनिन्दां शास्त्रनिन्दां पुराणानां तथैव च

mūlaprakṛtinindāṁ yaḥ kurute mānavādhamaḥ | vedanindāṁ śāstranindāṁ purāṇānāṁ tathaiva ca

जो नीच मनुष्य मूल प्रकृति की निंदा करता है, वेदों की निंदा करता है, शास्त्रों और पुराणों की भी निंदा करता है;

श्लोक 9 (devibhagavatam.9.33.9)

ब्रह्मविष्णुशिवादीनां तथा निन्दापरो जनः । गौरीवाण्यादिदेवीनां तथा निन्दापरो जनः

brahmaviṣṇuśivādīnāṁ tathā nindāparo janaḥ | gaurīvāṇyādidevīnāṁ tathā nindāparo janaḥ

— जो व्यक्ति ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि की निंदा में लगा रहता है, और जो गौरी, वाणी आदि देवियों की निंदा में लगा रहता है —

श्लोक 10 (devibhagavatam.9.33.10)

ते सर्वे निरये यान्ति तस्मिन्कुण्डे भयानके । नातः परतरं कुण्डं दुःखदं तु भविष्यति

te sarve niraye yānti tasminkuṇḍe bhayānake | nātaḥ parataraṁ kuṇḍaṁ duḥkhadaṁ tu bhaviṣyati

— वे सभी नरक में, उस भयानक कुण्ड में जाते हैं; इससे बढ़कर दुःखदायी कोई कुण्ड नहीं होगा।

श्लोक 11 (devibhagavatam.9.33.11)

तत्र स्थित्वानेककल्पं सर्पयोनिं व्रजेत्पुनः । देवीनिन्दापराधस्य प्रायश्चित्तं न विद्यते

tatra sthitvānekakalpaṁ sarpayoniṁ vrajetpunaḥ | devīnindāparādhasya prāyaścittaṁ na vidyate

वहाँ अनेक कल्पों तक रहकर वह पुनः सर्प-योनि को प्राप्त होता है। देवी-निंदा के अपराध का कोई प्रायश्चित्त नहीं है।

श्लोक 12 (devibhagavatam.9.33.12)

स्वदत्तां परदत्तां वा वृत्तिं च सुरविप्रयोः । षष्टिवर्षसहस्राणि विट्कुण्डं च प्रयाति सः

svadattāṁ paradattāṁ vā vṛttiṁ ca suraviprayoḥ | ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi viṭkuṇḍaṁ ca prayāti saḥ

जो देवताओं और ब्राह्मणों की जीविका के लिए स्वयं अथवा दूसरों द्वारा दिए गए दान का हरण करता है, वह साठ हजार वर्षों तक विष्ठाकुण्ड को जाता है।

श्लोक 13 (devibhagavatam.9.33.13)

तावन्त्येव च वर्षाणि विड्भोजी तत्र तिष्ठति । षष्टिवर्षसहस्राणि विट्कृमिश्च पुनर्भुवि

tāvantyeva ca varṣāṇi viḍbhojī tatra tiṣṭhati | ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi viṭkṛmiśca punarbhuvi

उतने ही वर्षों तक वह वहाँ विष्ठा खाते हुए रहता है। तत्पश्चात् पुनः पृथ्वी पर साठ हजार वर्षों तक विष्ठा का कीड़ा बनता है।

श्लोक 14 (devibhagavatam.9.33.14)

परकीयतडागे च तडागं यः करोति च । उत्सजेद्दैवदोषेण मूत्रकुण्डं प्रयाति सः

parakīyataḍāge ca taḍāgaṁ yaḥ karoti ca | utsajeddaivadoṣeṇa mūtrakuṇḍaṁ prayāti saḥ

जो किसी और के तालाब में उसे हड़पकर अपना तालाब बना लेता है, अथवा जो दैव-दोष से उसे नष्ट करवा देता है, वह मूत्रकुण्ड को जाता है।

श्लोक 15 (devibhagavatam.9.33.15)

तद्रेणुमानवर्षं च तद्भोजी तत्र तिष्ठति । पुनः पूर्णशताब्दं च स वृषो भारते भवेत्

tadreṇumānavarṣaṁ ca tadbhojī tatra tiṣṭhati | punaḥ pūrṇaśatābdaṁ ca sa vṛṣo bhārate bhavet

उस तालाब की मिट्टी के कणों की संख्या के बराबर वर्षों तक वह वहाँ उसे खाते हुए रहता है। तत्पश्चात् पूर्ण सौ वर्षों तक वह भारतवर्ष में बैल बनता है।

श्लोक 16 (devibhagavatam.9.33.16)

एकाकी मिष्टमश्नाति श्लेष्मकुण्डं प्रयाति च । पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति

ekākī miṣṭamaśnāti śleṣmakuṇḍaṁ prayāti ca | pūrṇamabdaśataṁ caiva tadbhojī tatra tiṣṭhati

जो अकेला ही मिष्टान्न खाता है, वह श्लेष्मकुण्ड को जाता है; पूर्ण सौ वर्षों तक वह वहाँ उसे खाते हुए रहता है।

श्लोक 17 (devibhagavatam.9.33.17)

ततः पूर्णशताब्दं च स प्रेतो भारते भवेत् । श्लेष्ममूत्रपरं चैव पूयं भुङ्क्ते ततः शुचिः

tataḥ pūrṇaśatābdaṁ ca sa preto bhārate bhavet | śleṣmamūtraparaṁ caiva pūyaṁ bhuṅkte tataḥ śuciḥ

तत्पश्चात् पूर्ण सौ वर्षों तक वह भारतवर्ष में प्रेत बनता है, कफ, मूत्र और पूय खाता हुआ। इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 18 (devibhagavatam.9.33.18)

पितरं मातरं चैव गुरुं भार्यां सुतं सुताम् । यो न पुष्णात्यनाथं च गरकुण्डं प्रयाति सः

pitaraṁ mātaraṁ caiva guruṁ bhāryāṁ sutaṁ sutām | yo na puṣṇātyanāthaṁ ca garakuṇḍaṁ prayāti saḥ

जो पिता, माता, गुरु, पत्नी, पुत्र, पुत्री और अनाथ का भरण-पोषण नहीं करता, वह गरकुण्ड को जाता है।

श्लोक 19 (devibhagavatam.9.33.19)

पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति । ततो व्रजेद्भूतयोनिं शतवर्षं ततः शुचिः

pūrṇamabdaśataṁ caiva tadbhojī tatra tiṣṭhati | tato vrajedbhūtayoniṁ śatavarṣaṁ tataḥ śuciḥ

पूर्ण सौ वर्षों तक वह वहाँ उसे खाते हुए रहता है। तत्पश्चात् वह सौ वर्षों तक भूत-योनि को प्राप्त होता है। इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 20 (devibhagavatam.9.33.20)

दृष्ट्वातिथिं वक्रचक्षुः करोति यो हि मानवः । पितृदेवास्तस्य जलं न गृह्णन्ति च पापिनः

dṛṣṭvātithiṁ vakracakṣuḥ karoti yo hi mānavaḥ | pitṛdevāstasya jalaṁ na gṛhṇanti ca pāpinaḥ

जो मनुष्य अतिथि को देखकर तिरछी दृष्टि से देखता है, उस पापी का जलदान पितर और देवता ग्रहण नहीं करते।

श्लोक 21 (devibhagavatam.9.33.21)

यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च । इहैव लभते चान्ते दूषिकाकुण्डमाव्रजेत्

yāni kāni ca pāpāni brahmahatyādikāni ca | ihaiva labhate cānte dūṣikākuṇḍamāvrajet

ब्रह्महत्या आदि जो भी पाप हैं, वे उसे यहीं प्राप्त होते हैं, और अंत में वह दूषिकाकुण्ड को जाता है।

श्लोक 22 (devibhagavatam.9.33.22)

पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति । ततो व्रजेद्भूतयोनिं शतवर्षं ततः शुचिः

pūrṇamabdaśataṁ caiva tadbhojī tatra tiṣṭhati | tato vrajedbhūtayoniṁ śatavarṣaṁ tataḥ śuciḥ

पूर्ण सौ वर्षों तक वह वहाँ उसे खाते हुए रहता है। तत्पश्चात् वह सौ वर्षों तक भूत-योनि को प्राप्त होता है। इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 23 (devibhagavatam.9.33.23)

दत्त्वा द्रव्यं च विप्राय चान्यस्मै दीयते यदि । स तिष्ठति वसाकुण्डे तद्भोजी शतवत्सरम्

dattvā dravyaṁ ca viprāya cānyasmai dīyate yadi | sa tiṣṭhati vasākuṇḍe tadbhojī śatavatsaram

यदि किसी वस्तु को ब्राह्मण को देकर, वह पुनः किसी अन्य को दे दी जाए, तो वह सौ वर्षों तक वसाकुण्ड में उसे खाते हुए रहता है।

श्लोक 24 (devibhagavatam.9.33.24)

कृकलासो भवेत्सोऽपि भारते सप्तजन्मसु । ततो भवेन्महारौद्रो दरिद्रोऽल्पायुरेव च

kṛkalāso bhavetso'pi bhārate saptajanmasu | tato bhavenmahāraudro daridro'lpāyureva ca

तत्पश्चात् वह भारतवर्ष में सात जन्मों तक गिरगिट बनता है। इसके बाद वह अत्यंत क्रूर, दरिद्र और अल्पायु होता है।

श्लोक 25 (devibhagavatam.9.33.25)

पुमांसं कामिनी वापि कामिनीं वा पुमानथ । यः शुक्रं पाययत्येव शुक्रकुण्डं प्रयाति सः

pumāṁsaṁ kāminī vāpi kāminīṁ vā pumānatha | yaḥ śukraṁ pāyayatyeva śukrakuṇḍaṁ prayāti saḥ

चाहे स्त्री पुरुष को, अथवा पुरुष स्त्री को, जो कोई भी वीर्य पिलाता है, वह शुक्रकुण्ड को जाता है।

श्लोक 26 (devibhagavatam.9.33.26)

पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति । कृमियोनिं शताब्दं च व्रजेद्भूत्वा ततः शुचिः

pūrṇamabdaśataṁ caiva tadbhojī tatra tiṣṭhati | kṛmiyoniṁ śatābdaṁ ca vrajedbhūtvā tataḥ śuciḥ

पूर्ण सौ वर्षों तक वह वहाँ उसे खाते हुए रहता है। तत्पश्चात् वह सौ वर्षों तक कृमि-योनि को प्राप्त होता है, और उसके बाद शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 27 (devibhagavatam.9.33.27)

सन्ताड्य च गुरुं विप्रं रक्तपातं च कारयेत् । स च तिष्ठत्यसृक्कुण्डे तद्भोजी शतवत्सरम्

santāḍya ca guruṁ vipraṁ raktapātaṁ ca kārayet | sa ca tiṣṭhatyasṛkkuṇḍe tadbhojī śatavatsaram

जो अपने गुरु अथवा ब्राह्मण को पीटकर रक्तपात कराता है, वह सौ वर्षों तक रक्तकुण्ड में उसे पीते हुए रहता है।

श्लोक 28 (devibhagavatam.9.33.28)

ततो लभेद्व्याघ्रजन्म सप्तजन्मसु भारते । ततः शुद्धिमवाप्नोति मानवश्च क्रमेण ह

tato labhedvyāghrajanma saptajanmasu bhārate | tataḥ śuddhimavāpnoti mānavaśca krameṇa ha

तत्पश्चात् वह भारतवर्ष में सात जन्मों तक व्याघ्र-जन्म प्राप्त करता है। इसके बाद क्रमशः वह मनुष्य बनकर शुद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 29 (devibhagavatam.9.33.29)

योऽश्रु तत्याज गायन्तं भक्तं दृष्ट्वा सगद्गदम् । श्रीकृष्णगुणसङ्गीते हसत्येव हि यो नरः

yo'śru tatyāja gāyantaṁ bhaktaṁ dṛṣṭvā sagadgadam | śrīkṛṣṇaguṇasaṅgīte hasatyeva hi yo naraḥ

जो व्यक्ति गद्गद होकर गाते हुए किसी भक्त को देखकर आँसू नहीं बहाता, और जो श्रीकृष्ण के गुणों के संगीत पर हँसता है —

श्लोक 30 (devibhagavatam.9.33.30)

स वसेदश्रुकुण्डे च तद्भोजी शतवर्षकम् । ततो भवेच्च चाण्डालस्त्रिजन्मनि ततः शुचिः

sa vasedaśrukuṇḍe ca tadbhojī śatavarṣakam | tato bhavecca cāṇḍālastrijanmani tataḥ śuciḥ

— वह सौ वर्षों तक अश्रुकुण्ड में उसे पीते हुए रहता है। तत्पश्चात् वह तीन जन्मों तक चाण्डाल बनता है, इसके बाद शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 31 (devibhagavatam.9.33.31)

करोति शठता तद्वन्नित्यं सुहृदि यो नरः । कुण्डं गात्रमलानां च स प्रयाति शताब्दकम्

karoti śaṭhatā tadvannityaṁ suhṛdi yo naraḥ | kuṇḍaṁ gātramalānāṁ ca sa prayāti śatābdakam

जो मनुष्य अपने मित्र के प्रति सदा छल-कपट करता है, वह सौ वर्षों तक शरीर-मल के कुण्ड को जाता है।

श्लोक 32 (devibhagavatam.9.33.32)

ततः स गार्दभीं योनिमवाप्नोति त्रिजन्मनि । त्रिजन्मनि च शार्गालीं ततः शुद्धो भवेद् ध्रुवम्

tataḥ sa gārdabhīṁ yonimavāpnoti trijanmani | trijanmani ca śārgālīṁ tataḥ śuddho bhaved dhruvam

तत्पश्चात् वह तीन जन्मों तक गधे की योनि प्राप्त करता है, और तीन जन्मों तक सियार की योनि; इसके बाद वह निश्चय ही शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 33 (devibhagavatam.9.33.33)

बधिरं यो हसत्येव निन्दत्येवाभिमानतः । स वसेत्कर्णविट्कुण्डे तद्भोजी शतवत्सरम्

badhiraṁ yo hasatyeva nindatyevābhimānataḥ | sa vasetkarṇaviṭkuṇḍe tadbhojī śatavatsaram

जो किसी बहरे व्यक्ति पर हँसता है अथवा अभिमानवश उसकी निंदा करता है, वह सौ वर्षों तक कर्णमल-कुण्ड में उसे खाते हुए रहता है।

श्लोक 34 (devibhagavatam.9.33.34)

ततो भवेत्स बधिरो दरिद्रः सप्तजन्मसु । सप्तजन्मन्यङ्गहीनस्ततः शुद्धिं लभेद् ध्रुवम्

tato bhavetsa badhiro daridraḥ saptajanmasu | saptajanmanyaṅgahīnastataḥ śuddhiṁ labhed dhruvam

तत्पश्चात् वह स्वयं सात जन्मों तक बहरा और दरिद्र बनता है; और सात जन्मों तक अंगहीन। इसके बाद वह निश्चय ही शुद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 35 (devibhagavatam.9.33.35)

लोभात्स्वभरणार्थाय जीविनं हन्ति यो नरः । मज्जाकुण्डे वसेत्सोऽपि तद्भोजी लक्षवत्सरम्

lobhātsvabharaṇārthāya jīvinaṁ hanti yo naraḥ | majjākuṇḍe vasetso'pi tadbhojī lakṣavatsaram

जो मनुष्य लोभवश अपने भरण-पोषण के लिए किसी जीव की हत्या करता है, वह लाख वर्षों तक मज्जाकुण्ड में उसे खाते हुए रहता है।

श्लोक 36 (devibhagavatam.9.33.36)

ततो भवेच्च शशको मीनश्च सप्तजन्मसु । त्रिजन्मनि वराहश्च कुक्कुटः सप्तजन्मसु

tato bhavecca śaśako mīnaśca saptajanmasu | trijanmani varāhaśca kukkuṭaḥ saptajanmasu

तत्पश्चात् वह खरगोश और सात जन्मों तक मछली बनता है; तीन जन्मों तक सूअर और सात जन्मों तक मुर्गा बनता है।

श्लोक 37 (devibhagavatam.9.33.37)

एणादयश्च कर्मभ्यस्ततः शुद्धिं लभेद् ध्रुवम् । स्वकन्यापालनं कृत्वा विक्रीणाति च यो नरः

eṇādayaśca karmabhyastataḥ śuddhiṁ labhed dhruvam | svakanyāpālanaṁ kṛtvā vikrīṇāti ca yo naraḥ

वह कर्मानुसार मृग आदि योनियाँ भी प्राप्त करता है; इसके बाद वह निश्चय ही शुद्धि प्राप्त करता है। जो मनुष्य अपनी कन्या का पालन करके भी उसे बेच देता है —

श्लोक 38 (devibhagavatam.9.33.38)

अर्थलोभान्महामूढो मांसकुण्डं प्रयाति सः । कन्यालोमप्रमाणाब्दं तद्भोजी तत्र तिष्ठति

arthalobhānmahāmūḍho māṁsakuṇḍaṁ prayāti saḥ | kanyālomapramāṇābdaṁ tadbhojī tatra tiṣṭhati

— वह महामूर्ख, धन के लोभ में, मांसकुण्ड को जाता है; अपनी कन्या के रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक वह वहाँ उसे खाते हुए रहता है।

श्लोक 39 (devibhagavatam.9.33.39)

तस्य दण्डप्रहारं च कुर्वन्ति यमकिङ्कराः । मांसभारं मूर्ध्नि कृत्वा रक्तभारं लिहेत्क्षुधा

tasya daṇḍaprahāraṁ ca kurvanti yamakiṅkarāḥ | māṁsabhāraṁ mūrdhni kṛtvā raktabhāraṁ lihetkṣudhā

यमराज के दूत उसे दण्ड से पीटते हैं; उसके सिर पर मांस का भार रखकर, भूख से वह रक्त की राशि को चाटता है।

श्लोक 40 (devibhagavatam.9.33.40)

ततो हि भारते पापी कन्याविट्कृमिगो भवेत् । षष्टिवर्षसहस्राणि व्याधश्च सप्तजन्मसु

tato hi bhārate pāpī kanyāviṭkṛmigo bhavet | ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi vyādhaśca saptajanmasu

तत्पश्चात् वह पापी भारतवर्ष में अपनी कन्या के मल का कीड़ा साठ हजार वर्षों तक बनता है, और सात जन्मों तक व्याध बनता है।

श्लोक 41 (devibhagavatam.9.33.41)

त्रिजन्मनि वराहश्च कुक्कुटः सप्तजन्मसु । मण्डूको हि जलौकाश्च सप्तजन्मसु भारते

trijanmani varāhaśca kukkuṭaḥ saptajanmasu | maṇḍūko hi jalaukāśca saptajanmasu bhārate

वह तीन जन्मों तक सूअर, सात जन्मों तक मुर्गा; मेंढक और सात जन्मों तक जोंक भी भारतवर्ष में बनता है।

श्लोक 42 (devibhagavatam.9.33.42)

सप्तजन्मसु काकश्च ततः शुद्धिं लभेद् ध्रुवम् । व्रतानामुपवासानां श्राद्धादीनां च सङ्गमे

saptajanmasu kākaśca tataḥ śuddhiṁ labhed dhruvam | vratānāmupavāsānāṁ śrāddhādīnāṁ ca saṅgame

सात जन्मों तक कौआ बनता है; इसके बाद वह निश्चय ही शुद्धि प्राप्त करता है। व्रतों, उपवासों और श्राद्ध आदि के अवसर पर —

श्लोक 43 (devibhagavatam.9.33.43)

करोति यः क्षौरकर्म सोऽशुचिः सर्वकर्मसु । स च तिष्ठति कुण्डे च नखादीनाञ्च सुन्दरि

karoti yaḥ kṣaurakarma so'śuciḥ sarvakarmasu | sa ca tiṣṭhati kuṇḍe ca nakhādīnāñca sundari

— जो क्षौर कर्म कराता है, वह सभी कर्मों में अशुद्ध होता है। हे सुंदरी! वह नाखूनों आदि के कुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 44 (devibhagavatam.9.33.44)

तद्दैवदिनमानाब्दं तद्भोजी दण्डताडितः । सकेशं पार्थिवं लिङ्गं यो वार्चयति भारते

taddaivadinamānābdaṁ tadbhojī daṇḍatāḍitaḥ | sakeśaṁ pārthivaṁ liṅgaṁ yo vārcayati bhārate

उतने दैवीय दिनों की संख्या के बराबर वर्षों तक वह वहाँ दण्ड से पीटा जाकर उसे खाते हुए रहता है। जो भारतवर्ष में केश-सहित मिट्टी के लिंग की पूजा करता है —

श्लोक 45 (devibhagavatam.9.33.45)

स तिष्ठति केशकुण्डे मृद्रेणुमानवर्षकम् । तदन्ते यावनीं योनिं प्रयाति हरकोपतः

sa tiṣṭhati keśakuṇḍe mṛdreṇumānavarṣakam | tadante yāvanīṁ yoniṁ prayāti harakopataḥ

— वह मिट्टी के कणों की संख्या के बराबर वर्षों तक केशकुण्ड में निवास करता है। उसके अंत में हर के कोप से वह यवन-योनि को प्राप्त होता है।

श्लोक 46 (devibhagavatam.9.33.46)

शताब्दाच्छुद्धिमाप्नोति राक्षसः स भवेद् ध्रुवम् । पितॄणां यो विष्णुपदे पिण्डं नैव ददाति च

śatābdācchuddhimāpnoti rākṣasaḥ sa bhaved dhruvam | pitṝṇāṁ yo viṣṇupade piṇḍaṁ naiva dadāti ca

सौ वर्षों के बाद वह शुद्धि प्राप्त करता है, यद्यपि वह निश्चय ही पहले राक्षस भी बनता है। जो विष्णुपद में पितरों को पिंड नहीं देता —

श्लोक 47 (devibhagavatam.9.33.47)

स च तिष्ठत्यस्थिकुण्डे स्वलोमाब्दं महोल्बणे । ततः सुयोनिं सम्प्राप्य कुखञ्जः सप्तजन्मसु

sa ca tiṣṭhatyasthikuṇḍe svalomābdaṁ maholbaṇe | tataḥ suyoniṁ samprāpya kukhañjaḥ saptajanmasu

— वह अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक भीषण अस्थिकुण्ड में निवास करता है। तत्पश्चात् उत्तम योनि प्राप्त करके वह सात जन्मों तक लंगड़ा बनता है।

श्लोक 48 (devibhagavatam.9.33.48)

भवेन्महादरिद्रश्च ततः शुद्धो हि देहतः । यः सेवते महामूढो गुर्विणीं च स्वकामिनीम्

bhavenmahādaridraśca tataḥ śuddho hi dehataḥ | yaḥ sevate mahāmūḍho gurviṇīṁ ca svakāminīm

वह अत्यंत दरिद्र होता है; इसके बाद वह शरीर से शुद्ध हो जाता है। जो महामूर्ख अपनी गर्भवती पत्नी के साथ रति करता है —

श्लोक 49 (devibhagavatam.9.33.49)

प्रतप्ते ताम्रकुण्डे च शतवर्षं स तिष्ठति । अवीरान्नं च यो भुङ्क्ते ऋतुस्नातान्नमेव च

pratapte tāmrakuṇḍe ca śatavarṣaṁ sa tiṣṭhati | avīrānnaṁ ca yo bhuṅkte ṛtusnātānnameva ca

— वह सौ वर्षों तक तप्त ताम्रकुण्ड में निवास करता है। जो वीरहीन घर का अन्न खाता है, अथवा ऋतुस्नाता स्त्री का अन्न खाता है —

श्लोक 50 (devibhagavatam.9.33.50)

लोहकुण्डे शताब्दं च स च तिष्ठति तप्तके । स व्रजेद्रजकीं योनिं काकानां सप्तजन्मसु

lohakuṇḍe śatābdaṁ ca sa ca tiṣṭhati taptake | sa vrajedrajakīṁ yoniṁ kākānāṁ saptajanmasu

— वह सौ वर्षों तक तप्त लोहकुण्ड में निवास करता है। वह सात जन्मों तक धोबी की योनि और कौओं की योनि को प्राप्त होता है।

श्लोक 51 (devibhagavatam.9.33.51)

महाव्रणी दरिद्रश्च ततः शुद्धी भवेन्नरः । यो हि चर्माक्तहस्तेन देवद्रव्यमुपस्मृशेत्

mahāvraṇī daridraśca tataḥ śuddhī bhavennaraḥ | yo hi carmāktahastena devadravyamupasmṛśet

वह भयंकर घावों से पीड़ित और दरिद्र होता है; इसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है। जो चमड़े से सने हुए हाथ से देव-द्रव्य को छूता है —

श्लोक 52 (devibhagavatam.9.33.52)

शतवर्षप्रमाणं च चर्मकुण्डे स तिष्ठति । यः शूद्रेणाभ्यनुज्ञातो भुङ्क्ते शूद्रान्नमेव च

śatavarṣapramāṇaṁ ca carmakuṇḍe sa tiṣṭhati | yaḥ śūdreṇābhyanujñāto bhuṅkte śūdrānnameva ca

— वह सौ वर्षों की अवधि तक चर्मकुण्ड में निवास करता है। जो शूद्र द्वारा आमंत्रित होकर शूद्र का अन्न खाता है —

श्लोक 53 (devibhagavatam.9.33.53)

स च तप्तसुराकुण्डे शताब्दं तिष्ठति द्विजः । ततो भवेच्छूद्रयाजी ब्राह्मणः सप्तजन्मसु

sa ca taptasurākuṇḍe śatābdaṁ tiṣṭhati dvijaḥ | tato bhavecchūdrayājī brāhmaṇaḥ saptajanmasu

— वह द्विज सौ वर्षों तक तप्त सुरा के कुण्ड में निवास करता है। तत्पश्चात् वह सात जन्मों तक शूद्रों का याजक ब्राह्मण बनता है।

श्लोक 54 (devibhagavatam.9.33.54)

शूद्रश्राद्धान्नभोजी च ततः शुद्धो भवेद्ध रुवम् । वाग्दुष्टः कटुको वाचा ताडयेत्स्वामिनं सदा

śūdraśrāddhānnabhojī ca tataḥ śuddho bhaveddha ruvam | vāgduṣṭaḥ kaṭuko vācā tāḍayetsvāminaṁ sadā

वह शूद्रों के श्राद्ध का अन्न खाने वाला बनता है; इसके बाद वह निश्चय ही शुद्ध हो जाता है। जो वाणी से दुष्ट, कटुभाषी, सदा अपने स्वामी को पीड़ित करता है —

श्लोक 55 (devibhagavatam.9.33.55)

तीक्ष्णकण्टककुण्डे स तद्भोजी तत्र तिष्ठति । ताडितो यमदूतेन दण्डेन च चतुर्गुणम्

tīkṣṇakaṇṭakakuṇḍe sa tadbhojī tatra tiṣṭhati | tāḍito yamadūtena daṇḍena ca caturguṇam

— वह वहाँ तीक्ष्ण कंटकों के कुण्ड में उसे भोगते हुए निवास करता है, यमदूत द्वारा दण्ड से चौगुना पीटा जाकर।

श्लोक 56 (devibhagavatam.9.33.56)

ततः उच्चैःश्रवाः सप्तजन्मस्वेव ततः शुचि । विषेण जीवनं हन्ति निर्दयो यो हि मानवः

tataḥ uccaiḥśravāḥ saptajanmasveva tataḥ śuci | viṣeṇa jīvanaṁ hanti nirdayo yo hi mānavaḥ

तत्पश्चात् वह सात जन्मों तक उच्चैःश्रवा बनता है; इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है। जो निर्दय मनुष्य विष से किसी के प्राण हरता है —

श्लोक 57 (devibhagavatam.9.33.57)

विषकुण्डे च तद्भोजी सहस्राब्दं च तिष्ठति । ततो भवेन्नृघाती च व्रणी च शतजन्मसु

viṣakuṇḍe ca tadbhojī sahasrābdaṁ ca tiṣṭhati | tato bhavennṛghātī ca vraṇī ca śatajanmasu

— वह सहस्र वर्षों तक विषकुण्ड में उसे पीते हुए निवास करता है। तत्पश्चात् वह सौ जन्मों तक हत्यारा और घावों से पीड़ित बनता है।

श्लोक 58 (devibhagavatam.9.33.58)

सप्तजन्मसु कुष्ठी च ततः शुद्धो भवेद् धुवम् । दण्डेन ताडयेद् गां हि वृषञ्च वृषवाहकः

saptajanmasu kuṣṭhī ca tataḥ śuddho bhaved dhuvam | daṇḍena tāḍayed gāṁ hi vṛṣañca vṛṣavāhakaḥ

वह सात जन्मों तक कोढ़ी बनता है; इसके बाद वह निश्चय ही शुद्ध हो जाता है। जो बैलगाड़ी हाँकने वाला दण्ड से गाय या बैल को पीटता है —

श्लोक 59 (devibhagavatam.9.33.59)

भृत्यद्वारा स्वतन्त्रो वा पुण्यक्षेत्रे च भारते । प्रतप्ते तैलकुण्डेऽग्नौ तिष्ठति स्म चतुर्युगम्

bhṛtyadvārā svatantro vā puṇyakṣetre ca bhārate | pratapte tailakuṇḍe'gnau tiṣṭhati sma caturyugam

— चाहे वह सेवक द्वारा करवाए या स्वयं करे, भारतवर्ष के पुण्यक्षेत्र में — वह चार युगों तक जलते हुए तैलकुण्ड की अग्नि में निवास करता है।

श्लोक 60 (devibhagavatam.9.33.60)

गवां लोमप्रमाणाब्दं वृषो भवति तत्परम् । कुन्तेन हन्ति यो जीवं वह्निलोहेन हेलया

gavāṁ lomapramāṇābdaṁ vṛṣo bhavati tatparam | kuntena hanti yo jīvaṁ vahnilohena helayā

तत्पश्चात् गौओं के रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक वह बैल बनता है। जो असावधानी से भाले द्वारा अथवा तपे हुए लोहे से किसी जीव को मार डालता है —

श्लोक 61 (devibhagavatam.9.33.61)

कुन्तकुण्डे वसेत्सोऽपि वर्षाणामयुतं सति । ततः सुयोनिं सम्प्राप्य चोदरे व्याधिसंयुतः

kuntakuṇḍe vasetso'pi varṣāṇāmayutaṁ sati | tataḥ suyoniṁ samprāpya codare vyādhisaṁyutaḥ

— वह दस हजार वर्षों तक कुन्तकुण्ड में निवास करता है। तत्पश्चात् उत्तम योनि प्राप्त करके वह उदर-रोग से युक्त होता है —

श्लोक 62 (devibhagavatam.9.33.62)

जन्मनैकेन क्लेशेन ततः शुद्धो भवेन्नरः । यो भुङ्क्ते च वृथा मांसं मांसलोभी द्विजाधमः

janmanaikena kleśena tataḥ śuddho bhavennaraḥ | yo bhuṅkte ca vṛthā māṁsaṁ māṁsalobhī dvijādhamaḥ

— एक जन्म तक इस पीड़ा से; इसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है। जो द्विजाधम मांस के लोभ से व्यर्थ ही मांस खाता है —

श्लोक 63 (devibhagavatam.9.33.63)

हरेरनैवेद्यभोजी कृमिकुण्डं प्रयाति सः । स्वलोममानवर्षं च तद्भोजी तत्र तिष्ठति

hareranaivedyabhojī kṛmikuṇḍaṁ prayāti saḥ | svalomamānavarṣaṁ ca tadbhojī tatra tiṣṭhati

— जो हरि को अर्पित किए बिना ही भोजन करता है, वह कृमिकुण्ड को जाता है; अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक वह वहाँ उसे खाते हुए रहता है।

श्लोक 64 (devibhagavatam.9.33.64)

ततो भवेन्म्लेच्छजातिस्त्रिजन्मनि ततो द्विजः । ब्राह्मणः शूद्रयाजी च शूद्रश्राद्धान्नभोजकः

tato bhavenmlecchajātistrijanmani tato dvijaḥ | brāhmaṇaḥ śūdrayājī ca śūdraśrāddhānnabhojakaḥ

तत्पश्चात् वह तीन जन्मों तक म्लेच्छ जाति बनता है, फिर द्विज बनता है; ब्राह्मण होकर शूद्रों का याजक बनता है और शूद्रों के श्राद्ध का अन्न खाता है —

श्लोक 65 (devibhagavatam.9.33.65)

शूद्राणां शवदाही च पूयकुण्डे वसेद् ध्रुवम् । यावल्लोमप्रमाणाब्दं यमदण्डेन सुव्रते

śūdrāṇāṁ śavadāhī ca pūyakuṇḍe vased dhruvam | yāvallomapramāṇābdaṁ yamadaṇḍena suvrate

— और शूद्रों के शवों का दाह-संस्कार करता है — हे सुव्रते! वह अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक यमदण्ड सहते हुए निश्चय ही पूयकुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 66 (devibhagavatam.9.33.66)

ताडितो यमदूतेन तद्भोजी तत्र तिष्ठति । ततो भारतमागत्य स शूद्रः सप्तजन्मसु

tāḍito yamadūtena tadbhojī tatra tiṣṭhati | tato bhāratamāgatya sa śūdraḥ saptajanmasu

यमदूत द्वारा पीटा जाकर वह वहाँ उसे खाते हुए रहता है। तत्पश्चात् भारतवर्ष में आकर वह सात जन्मों तक शूद्र बनता है —

श्लोक 67 (devibhagavatam.9.33.67)

महारोगी दरिद्रश्च बधिरो मूक एव च । कृष्णं पद्मं च के यस्य तं सर्पं हन्ति यो नरः

mahārogī daridraśca badhiro mūka eva ca | kṛṣṇaṁ padmaṁ ca ke yasya taṁ sarpaṁ hanti yo naraḥ

— भयंकर रोगी, दरिद्र, बहरा और गूँगा होता है। जो मनुष्य सिर पर काले कमल के चिह्न वाले सर्प को मार डालता है —

श्लोक 68 (devibhagavatam.9.33.68)

स्वलोममानवर्षं च सर्पकुण्डं प्रयाति सः । सर्पेण भक्षितः सोऽथ यमदूतेन ताडितः

svalomamānavarṣaṁ ca sarpakuṇḍaṁ prayāti saḥ | sarpeṇa bhakṣitaḥ so'tha yamadūtena tāḍitaḥ

— वह अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक सर्पकुण्ड को जाता है, वहाँ सर्पों द्वारा खाया जाकर और यमदूत द्वारा पीटा जाकर।

श्लोक 69 (devibhagavatam.9.33.69)

वसेच्च सर्पविड्भोजी ततः सर्पो भवेद् ध्रुवम् । ततो भवेन्मानवश्च स्वल्पायुर्दद्रुसंयुतः

vasecca sarpaviḍbhojī tataḥ sarpo bhaved dhruvam | tato bhavenmānavaśca svalpāyurdadrusaṁyutaḥ

वह वहाँ सर्पों का मल खाते हुए निवास करता है; तत्पश्चात् वह निश्चय ही स्वयं सर्प बनता है। फिर वह मनुष्य बनता है, अल्पायु और चर्मरोग से युक्त।

श्लोक 70 (devibhagavatam.9.33.70)

महाक्लेशेन तन्मृत्युः सर्पेण भक्षिताद् ध्रुवम् । विधिप्रदत्तजीव्यांश्च क्षुद्रजन्तूंश्च हन्ति यः

mahākleśena tanmṛtyuḥ sarpeṇa bhakṣitād dhruvam | vidhipradattajīvyāṁśca kṣudrajantūṁśca hanti yaḥ

उसकी मृत्यु महान क्लेश के साथ, निश्चय ही सर्प द्वारा खाए जाकर होती है। जो विधाता द्वारा जीवनदान प्राप्त क्षुद्र जंतुओं को मार डालता है —

श्लोक 71 (devibhagavatam.9.33.71)

स दंशमशयोः कुण्डे जन्तुमानाब्दमेव च । दिवानिशं भक्षितस्तैरनाहारश्च शब्दवान्

sa daṁśamaśayoḥ kuṇḍe jantumānābdameva ca | divāniśaṁ bhakṣitastairanāhāraśca śabdavān

— वह उन जीवों की संख्या के बराबर वर्षों तक दंश और मशकों के कुण्ड में, दिन-रात उनके द्वारा खाया जाता हुआ, बिना भोजन के, चीत्कार करता हुआ रहता है।

श्लोक 72 (devibhagavatam.9.33.72)

हस्तपादादिबद्धश्च यमदूतेन ताडितः । ततो भवेत्क्षुद्रजन्तुर्जातिश्च यावनी भवेत्

hastapādādibaddhaśca yamadūtena tāḍitaḥ | tato bhavetkṣudrajanturjātiśca yāvanī bhavet

हाथ-पैर बंधे हुए, यमदूत द्वारा पीटा जाकर — तत्पश्चात् वह क्षुद्र जीव बनता है, और फिर यवन जाति में जन्म लेता है।

श्लोक 73 (devibhagavatam.9.33.73)

ततो भवेन्मानवश्च सोऽङ्गहीनस्ततः शुचिः । यो मूढो मधुमश्नाति हत्वा च मधुमक्षिकाः

tato bhavenmānavaśca so'ṅgahīnastataḥ śuciḥ | yo mūḍho madhumaśnāti hatvā ca madhumakṣikāḥ

तत्पश्चात् वह मनुष्य बनता है, अंगहीन; इसके बाद वह शुद्ध होता है। जो मूर्ख मधुमक्खियों को मारकर शहद खाता है —

श्लोक 74 (devibhagavatam.9.33.74)

स एव गारले कुण्डे जीवमानाब्दकं वसेत् । भक्षितो गरलैर्दग्धो यमदूतेन ताडितः

sa eva gārale kuṇḍe jīvamānābdakaṁ vaset | bhakṣito garalairdagdho yamadūtena tāḍitaḥ

— वह उन जीवों की संख्या के बराबर वर्षों तक विषकुण्ड में निवास करता है, विषैले जीवों द्वारा खाया जाकर, जलाया जाकर, और यमदूत द्वारा पीटा जाकर।

श्लोक 75 (devibhagavatam.9.33.75)

ततो हि मक्षिकाजातिस्ततः शुद्धो भवेन्नरः । दण्डं करोत्यदण्ड्ये च विप्रे दण्डं करोति च

tato hi makṣikājātistataḥ śuddho bhavennaraḥ | daṇḍaṁ karotyadaṇḍye ca vipre daṇḍaṁ karoti ca

तत्पश्चात् वह मक्षिका-जाति में जन्म लेता है; इसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है। जो अदण्ड्य को दण्ड देता है, और जो ब्राह्मण को दण्ड देता है —

श्लोक 76 (devibhagavatam.9.33.76)

स कुण्डं वज्रदंष्ट्राणां कीटानां याति सत्वरम् । स तल्लोमप्रमाणाब्दं तत्र तिष्ठत्यहर्निशम्

sa kuṇḍaṁ vajradaṁṣṭrāṇāṁ kīṭānāṁ yāti satvaram | sa tallomapramāṇābdaṁ tatra tiṣṭhatyaharniśam

— वह शीघ्र ही वज्रदंष्ट्र कीटों के कुण्ड को जाता है; अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक वह वहाँ दिन-रात निवास करता है।

श्लोक 77 (devibhagavatam.9.33.77)

शब्दकृद्भक्षितस्तैस्तु यमदूतेन ताडितः । करोति रोदनं भद्रे हाहाकारं क्षणे क्षणे

śabdakṛdbhakṣitastaistu yamadūtena tāḍitaḥ | karoti rodanaṁ bhadre hāhākāraṁ kṣaṇe kṣaṇe

हे भद्रे! उनके द्वारा खाया जाकर, चीत्कार करता हुआ, और यमदूत द्वारा पीटा जाकर, वह क्षण-क्षण रोता और हाहाकार करता है।

श्लोक 78 (devibhagavatam.9.33.78)

पुनः सूकरयोनौ च जायते सप्तजन्मसु । त्रिजन्मनि काकयोनौ ततः शुद्धो भवेन्नरः

punaḥ sūkarayonau ca jāyate saptajanmasu | trijanmani kākayonau tataḥ śuddho bhavennaraḥ

तत्पश्चात् वह सात जन्मों तक सूअर-योनि में जन्म लेता है, और तीन जन्मों तक कौआ-योनि में; इसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 79 (devibhagavatam.9.33.79)

अर्थलोभेन यो मूढः प्रजादण्डं करोति सः । वृश्चिकानां च कुण्डं च तल्लोमाब्दं वसेद् ध्रुवम्

arthalobhena yo mūḍhaḥ prajādaṇḍaṁ karoti saḥ | vṛścikānāṁ ca kuṇḍaṁ ca tallomābdaṁ vased dhruvam

जो मूर्ख धन के लोभ में प्रजा को अन्यायपूर्ण दण्ड देता है, वह निश्चय ही अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक बिच्छुओं के कुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 80 (devibhagavatam.9.33.80)

ततो वृश्चिकजातिश्च सप्तजन्मसु भारते । ततो नरश्चाङ्गहीनो व्याधिशुद्धो भवेद् ध्रुवम्

tato vṛścikajātiśca saptajanmasu bhārate | tato naraścāṅgahīno vyādhiśuddho bhaved dhruvam

तत्पश्चात् वह भारतवर्ष में सात जन्मों तक बिच्छू-जाति में जन्म लेता है; फिर वह अंगहीन मनुष्य बनता है, और रोग के द्वारा निश्चय ही शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 81 (devibhagavatam.9.33.81)

ब्राह्मणः शस्त्रधारी यो ह्यन्येषां धावको भवेत् । सन्ध्याहीनश्च यो विप्रो हरिभक्तिविहीनकः

brāhmaṇaḥ śastradhārī yo hyanyeṣāṁ dhāvako bhavet | sandhyāhīnaśca yo vipro haribhaktivihīnakaḥ

जो ब्राह्मण शस्त्रधारण करता है और दूसरों का हरकारा बनता है; जो द्विज संध्या से रहित है और हरि-भक्ति से रहित है —

श्लोक 82 (devibhagavatam.9.33.82)

स तिष्ठति स्वलोमाब्दं कुण्डेषु च शरादिषु । विद्धः शरादिभिः शश्वत्ततः शुद्धो भवेन्नरः

sa tiṣṭhati svalomābdaṁ kuṇḍeṣu ca śarādiṣu | viddhaḥ śarādibhiḥ śaśvattataḥ śuddho bhavennaraḥ

— वह अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक बाण आदि के कुण्डों में निवास करता है, निरंतर बाण आदि से बींधा जाता हुआ; इसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 83 (devibhagavatam.9.33.83)

कारागारे सान्धकारे प्रणिहन्ति प्रजाश्च यः । प्रमत्तः स्वस्य दोषेण गोलकुण्डं प्रयाति सः

kārāgāre sāndhakāre praṇihanti prajāśca yaḥ | pramattaḥ svasya doṣeṇa golakuṇḍaṁ prayāti saḥ

जो अपनी लापरवाही के दोष से अंधकारमय बंदीगृह में प्रजा को मरवा डालता है, वह गोलकुण्ड को जाता है।

श्लोक 84 (devibhagavatam.9.33.84)

स पङ्कतप्ततोयाक्तं सान्धकारं भयङ्करम् । तीक्ष्णदंष्ट्रैश्च कीटैश्च संयुक्तं गोलकुण्डकम्

sa paṅkataptatoyāktaṁ sāndhakāraṁ bhayaṅkaram | tīkṣṇadaṁṣṭraiśca kīṭaiśca saṁyuktaṁ golakuṇḍakam

वह गोलकुण्ड कीचड़ और उबलते जल से युक्त, अंधकारमय, भयंकर और तीक्ष्ण दाढ़ों वाले कीड़ों से भरा हुआ है।

श्लोक 85 (devibhagavatam.9.33.85)

कीटैर्विद्धो वसेत्तत्र प्रजालोमाब्दमेव च । ततो भवेत्प्रजाभृत्यस्ततः शुद्धो भवेत्क्रमात्

kīṭairviddho vasettatra prajālomābdameva ca | tato bhavetprajābhṛtyastataḥ śuddho bhavetkramāt

उन कीड़ों से बींधा जाकर वह उन प्रजाजनों के रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक वहाँ निवास करता है। तत्पश्चात् वह प्रजा का सेवक बनता है; फिर क्रमशः शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 86 (devibhagavatam.9.33.86)

सरोवरादुत्थितांश्च नक्रादीन्हन्ति यो नरः । नक्रकण्टकमानाब्दं नक्रकुण्डं प्रयाति सः

sarovarādutthitāṁśca nakrādīnhanti yo naraḥ | nakrakaṇṭakamānābdaṁ nakrakuṇḍaṁ prayāti saḥ

जो मनुष्य सरोवर से निकले हुए मगरमच्छों आदि को मार डालता है, वह मगरमच्छ के कंटकों की संख्या के बराबर वर्षों तक नक्रकुण्ड को जाता है।

श्लोक 87 (devibhagavatam.9.33.87)

ततो नक्रादिजातीयो भवेन्नक्रादिषु ध्रुवम् । ततः सद्यो विशुद्धो हि दण्डेनैव पुनः पुनः

tato nakrādijātīyo bhavennakrādiṣu dhruvam | tataḥ sadyo viśuddho hi daṇḍenaiva punaḥ punaḥ

तत्पश्चात् वह निश्चय ही मगरमच्छ आदि की जातियों में जन्म लेता है। इसके बाद बार-बार दण्ड भोगकर वह तत्काल पूर्णतः शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 88 (devibhagavatam.9.33.88)

वक्षः श्रोणीस्तनास्यञ्च यः पश्यति परस्त्रियाः । कामेन कामुको यो हि पुण्यक्षेत्रे च भारते

vakṣaḥ śroṇīstanāsyañca yaḥ paśyati parastriyāḥ | kāmena kāmuko yo hi puṇyakṣetre ca bhārate

जो कामवश दूसरे की पत्नी के वक्ष, नितम्ब और मुख को देखता है, वह कामी पुरुष, भारतवर्ष के पुण्यक्षेत्र में —

श्लोक 89 (devibhagavatam.9.33.89)

स वसेत्काककुण्डे च काकैः सञ्चूर्णलोचनः । ततः स्वलोममानाब्दं भवेद्दग्धस्त्रिजन्मनि

sa vasetkākakuṇḍe ca kākaiḥ sañcūrṇalocanaḥ | tataḥ svalomamānābdaṁ bhaveddagdhastrijanmani

— वह काककुण्ड में निवास करता है, कौओं द्वारा उसके नेत्र चूर-चूर किए जाकर। तत्पश्चात् अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक वह तीन जन्मों तक दग्ध होता है।

श्लोक 90 (devibhagavatam.9.33.90)

स्वर्णस्तेयी च यो मूढो भारते सुरविप्रयोः । स च मन्थानकुण्डे वै स्वलोमाब्दं वसेद् ध्रुवम्

svarṇasteyī ca yo mūḍho bhārate suraviprayoḥ | sa ca manthānakuṇḍe vai svalomābdaṁ vased dhruvam

जो मूर्ख भारतवर्ष में देवताओं और ब्राह्मणों का स्वर्ण चुराता है, वह निश्चय ही अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक मंथनकुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 91 (devibhagavatam.9.33.91)

ताडितो यमदूतेन मन्थानैश्छन्नलोचनः । तद्विड्भोजी च तत्रैव ततश्चान्धस्त्रिजन्मनि

tāḍito yamadūtena manthānaiśchannalocanaḥ | tadviḍbhojī ca tatraiva tataścāndhastrijanmani

यमदूत द्वारा पीटा जाकर, मंथन-दण्डों से नेत्र ढके जाकर; वहीं उसका मल खाकर, वह तत्पश्चात् तीन जन्मों तक अंधा बनता है।

श्लोक 92 (devibhagavatam.9.33.92)

सप्तजन्म दरिद्रश्च महाक्रूरश्च पातकी । भारते स्वर्णकारश्च स च स्वर्णवणिक् ततः

saptajanma daridraśca mahākrūraśca pātakī | bhārate svarṇakāraśca sa ca svarṇavaṇik tataḥ

सात जन्मों तक वह दरिद्र, अत्यंत क्रूर और पापी होता है। भारतवर्ष में वह सुनार बनता है, और फिर स्वर्ण-वणिक बनता है।

श्लोक 93 (devibhagavatam.9.33.93)

यो भारते ताम्रचौरो लोहचौरश्च सुन्दरि । स च स्वलोममानाब्दं बीजकुण्डं प्रयाति सः

yo bhārate tāmracauro lohacauraśca sundari | sa ca svalomamānābdaṁ bījakuṇḍaṁ prayāti saḥ

हे सुंदरी! जो भारतवर्ष में ताँबा अथवा लोहा चुराता है, वह अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक बीजकुण्ड को जाता है।

श्लोक 94 (devibhagavatam.9.33.94)

तत्रैव बीजविड्भोजी बीजैश्च छन्नलोचनः । ताडितो यमदूतेन ततः शुद्धो भवेन्नरः

tatraiva bījaviḍbhojī bījaiśca channalocanaḥ | tāḍito yamadūtena tataḥ śuddho bhavennaraḥ

वहाँ बीजों का मल खाते हुए, बीजों से नेत्र ढके जाकर, यमदूत द्वारा पीटा जाकर; इसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 95 (devibhagavatam.9.33.95)

भारते देवचौरश्च देवद्रव्यापहारकः । स दुस्तरे वज्रकुण्डे स्वलोमाब्दं वसेद् ध्रुवम्

bhārate devacauraśca devadravyāpahārakaḥ | sa dustare vajrakuṇḍe svalomābdaṁ vased dhruvam

जो भारतवर्ष में देवता का चोर है, देव-द्रव्य का अपहरण करता है, वह निश्चय ही अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक दुस्तर वज्रकुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 96 (devibhagavatam.9.33.96)

देहदग्धोऽपि तद्वज्रैरनाहारश्च शब्दकृत् । ताडितो यमदूतैश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः

dehadagdho'pi tadvajrairanāhāraśca śabdakṛt | tāḍito yamadūtaiśca tataḥ śuddho bhavennaraḥ

उन वज्रों से देह जलाई जाकर, बिना भोजन के, चीत्कार करता हुआ, यमदूतों द्वारा पीटा जाकर; इसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 97 (devibhagavatam.9.33.97)

रौप्यगव्यांशुकानां च यश्चौरः सुरविप्रयोः । तप्तपाषाणकुण्डेच स्वलोमाब्दं वसेद् ध्रुवम्

raupyagavyāṁśukānāṁ ca yaścauraḥ suraviprayoḥ | taptapāṣāṇakuṇḍeca svalomābdaṁ vased dhruvam

जो देवताओं और ब्राह्मणों की चाँदी, गौ अथवा वस्त्र चुराता है, वह निश्चय ही अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक तप्त पाषाणकुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 98 (devibhagavatam.9.33.98)

त्रिजन्मनि च कंसोऽपि श्वेतरूपस्त्रिजन्मनि । जन्मैकं श्वेतचिह्नश्च ततोऽन्ये श्वेतपक्षिणः

trijanmani ca kaṁso'pi śvetarūpastrijanmani | janmaikaṁ śvetacihnaśca tato'nye śvetapakṣiṇaḥ

तीन जन्मों तक वह कंस जैसा भी बनता है; तीन जन्मों तक वह श्वेत रूप धारण करता है; एक जन्म तक श्वेत चिह्न धारण करता है; तत्पश्चात् अन्य श्वेत-पंखी पक्षी बनता है।

श्लोक 99 (devibhagavatam.9.33.99)

ततो रक्तविकारी च शूली वै मानवो भवेत् । सप्तजन्मसु चाल्पायुस्ततः शुद्धो भवेन्नरः

tato raktavikārī ca śūlī vai mānavo bhavet | saptajanmasu cālpāyustataḥ śuddho bhavennaraḥ

तत्पश्चात् वह रक्तविकार और शूल रोग से युक्त मनुष्य बनता है, सात जन्मों तक अल्पायु रहता है; इसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 100 (devibhagavatam.9.33.100)

रैतं कांस्यमयं पात्रं यो हरेद्देवविप्रयोः । तीक्ष्णपाषाणकुण्डे च स्वलोमाब्दं वसेन्नरः

raitaṁ kāṁsyamayaṁ pātraṁ yo hareddevaviprayoḥ | tīkṣṇapāṣāṇakuṇḍe ca svalomābdaṁ vasennaraḥ

जो देवताओं और ब्राह्मणों के कांस्य पात्र को चुराता है, वह अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक तीक्ष्ण पाषाणकुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 101 (devibhagavatam.9.33.101)

स भवेदश्वजातिश्च भारते सप्तजन्मसु । ततोऽधिकाङ्गजातिश्च पादरोगी ततः शुचिः

sa bhavedaśvajātiśca bhārate saptajanmasu | tato'dhikāṅgajātiśca pādarogī tataḥ śuciḥ

वह भारतवर्ष में सात जन्मों तक अश्व-योनि में जन्म लेता है। तत्पश्चात् वह अधिकांग और पादरोगी बनता है; इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 102 (devibhagavatam.9.33.102)

पुंश्चल्यन्नं च यो भद्रे पुंश्चलीजीव्यजीविनः । स्वलोममानवर्षं च लालाकुण्डे वसेद् ध्रुवम्

puṁścalyannaṁ ca yo bhadre puṁścalījīvyajīvinaḥ | svalomamānavarṣaṁ ca lālākuṇḍe vased dhruvam

हे भद्रे! जो व्यभिचारिणी स्त्री का अन्न खाता है, अथवा उसकी कमाई पर जीता है, वह निश्चय ही अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक लारकुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 103 (devibhagavatam.9.33.103)

ताडितो यमदूतेन तद्भोजी तत्र दुःखितः । ततश्चक्षुःशूलरोगी ततः शुद्धः क्रमेण सः

tāḍito yamadūtena tadbhojī tatra duḥkhitaḥ | tataścakṣuḥśūlarogī tataḥ śuddhaḥ krameṇa saḥ

यमदूत द्वारा पीटा जाकर, वहाँ दुःखी होकर उसे खाते हुए; तत्पश्चात् वह नेत्र-शूल रोग से पीड़ित होता है; इसके बाद क्रमशः वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 104 (devibhagavatam.9.33.104)

म्लेच्छसेवी मसीजीवी यो विप्रो भारते भुवि । वसेत्स्वलोममानाब्दं मसीकुण्डे स दुःखभाक्

mlecchasevī masījīvī yo vipro bhārate bhuvi | vasetsvalomamānābdaṁ masīkuṇḍe sa duḥkhabhāk

भारतवर्ष में जो ब्राह्मण म्लेच्छों की सेवा करता है अथवा स्याही से जीविका चलाता है, वह अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक दुःखी होकर मषिकुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 105 (devibhagavatam.9.33.105)

ताडितो यमदूतेन तद्भोजी तत्र तिष्ठति । ततस्त्रिजन्मनि भवेत्कृष्णवर्णः पशुः सति

tāḍito yamadūtena tadbhojī tatra tiṣṭhati | tatastrijanmani bhavetkṛṣṇavarṇaḥ paśuḥ sati

यमदूत द्वारा पीटा जाकर वह वहाँ उसे खाते हुए रहता है। तत्पश्चात्, हे सती! वह तीन जन्मों तक काले रंग का पशु बनता है।

श्लोक 106 (devibhagavatam.9.33.106)

त्रिजन्मनि भवेच्छागः कृष्णवर्णस्त्रिजन्मनि । ततः स तालवृक्षश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः

trijanmani bhavecchāgaḥ kṛṣṇavarṇastrijanmani | tataḥ sa tālavṛkṣaśca tataḥ śuddho bhavennaraḥ

तीन जन्मों तक वह बकरा बनता है, तीन जन्मों तक काले रंग का; तत्पश्चात् वह तालवृक्ष बनता है; इसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 107 (devibhagavatam.9.33.107)

धान्यादिसस्यं ताम्बूलं यो हरेत्सुरविप्रयोः । आसनं च तथा तल्पं चूर्णकुण्डे प्रयाति सः

dhānyādisasyaṁ tāmbūlaṁ yo haretsuraviprayoḥ | āsanaṁ ca tathā talpaṁ cūrṇakuṇḍe prayāti saḥ

जो देवताओं और ब्राह्मणों के अन्न, फसल, ताम्बूल, आसन अथवा शय्या को चुराता है, वह चूर्णकुण्ड को जाता है।

श्लोक 108 (devibhagavatam.9.33.108)

शताब्दं तत्र निवसेद्यमदूतेन ताडितः । ततो भवेन्मेषजातिः कुक्कुटश्च त्रिजन्मनि

śatābdaṁ tatra nivasedyamadūtena tāḍitaḥ | tato bhavenmeṣajātiḥ kukkuṭaśca trijanmani

सौ वर्षों तक वह वहाँ यमदूत द्वारा पीटा जाकर निवास करता है। तत्पश्चात् वह तीन जन्मों तक भेड़ और मुर्गा बनता है।

श्लोक 109 (devibhagavatam.9.33.109)

ततो भवेद्वानरश्च कासव्याधियुतो भुवि । वंशहीनो दरिद्रश्च स्वल्पायुश्च ततः शुचिः

tato bhavedvānaraśca kāsavyādhiyuto bhuvi | vaṁśahīno daridraśca svalpāyuśca tataḥ śuciḥ

तत्पश्चात् वह पृथ्वी पर वानर बनता है, खाँसी के रोग से युक्त; वंशहीन, दरिद्र और अल्पायु; इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 110 (devibhagavatam.9.33.110)

करोति चक्रं विप्राणां हृत्वा द्रव्यं च यो जनः । स वसेच्चक्रकुण्डे च शताब्दं दण्डताडितः

karoti cakraṁ viprāṇāṁ hṛtvā dravyaṁ ca yo janaḥ | sa vaseccakrakuṇḍe ca śatābdaṁ daṇḍatāḍitaḥ

जो व्यक्ति ब्राह्मणों का धन हरण करके उन्हें चक्र में डालता है, वह सौ वर्षों तक दण्ड से पीटा जाकर चक्रकुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 111 (devibhagavatam.9.33.111)

ततो भवेन्मानवश्च तैलकारस्त्रिजन्मनि । व्याधियुक्तो भवेद्रोगी वंशहीनस्ततः शुचिः

tato bhavenmānavaśca tailakārastrijanmani | vyādhiyukto bhavedrogī vaṁśahīnastataḥ śuciḥ

तत्पश्चात् वह तीन जन्मों तक तेली मनुष्य बनता है; व्याधियुक्त, रोगी और वंशहीन; इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 112 (devibhagavatam.9.33.112)

गोधनेषु च विप्रेषु करोति वक्रतां पुमान् । प्रयाति वक्रकुण्डं स तिष्ठेद्युगशतं सति

godhaneṣu ca vipreṣu karoti vakratāṁ pumān | prayāti vakrakuṇḍaṁ sa tiṣṭhedyugaśataṁ sati

जो पुरुष गोधन और ब्राह्मणों के विषय में कुटिलता करता है, वह वक्रकुण्ड को जाता है और सौ युगों तक वहाँ निवास करता है।

श्लोक 113 (devibhagavatam.9.33.113)

ततो भवेत्स वक्राङ्गो हीनाङ्गः सप्तजन्मनि । दरिद्रो वंशहीनश्च भार्याहीनस्ततः शुचिः

tato bhavetsa vakrāṅgo hīnāṅgaḥ saptajanmani | daridro vaṁśahīnaśca bhāryāhīnastataḥ śuciḥ

तत्पश्चात् वह सात जन्मों तक टेढ़े अंगों वाला और अंगहीन बनता है; दरिद्र, वंशहीन और पत्नीहीन; इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 114 (devibhagavatam.9.33.114)

ततो भवेद् गृध्रजन्मा त्रिजन्मनि च सूकरः । त्रिजन्मनि बिडालश्च मयूरश्च त्रिजन्मनि

tato bhaved gṛdhrajanmā trijanmani ca sūkaraḥ | trijanmani biḍālaśca mayūraśca trijanmani

तत्पश्चात् वह गिद्ध बनता है, और तीन जन्मों तक सूअर बनता है; तीन जन्मों तक बिल्ली और तीन जन्मों तक मोर बनता है।

श्लोक 115 (devibhagavatam.9.33.115)

निषिद्धं कूर्ममांसं च ब्राह्मणो यो हि भक्षति । कूर्मकुण्डे वसेत्सोऽपि शताब्दं कूर्मभक्षितः

niṣiddhaṁ kūrmamāṁsaṁ ca brāhmaṇo yo hi bhakṣati | kūrmakuṇḍe vasetso'pi śatābdaṁ kūrmabhakṣitaḥ

जो ब्राह्मण निषिद्ध कछुए का मांस खाता है, वह सौ वर्षों तक कछुओं द्वारा खाया जाकर कूर्मकुण्ड में निवास करता है।

श्लोक 116 (devibhagavatam.9.33.116)

ततो भवेत्कूर्मजन्मा त्रिजन्मनि च सूकरः । त्रिजन्मनि बिडालश्च मयूरश्च ततः शुचिः

tato bhavetkūrmajanmā trijanmani ca sūkaraḥ | trijanmani biḍālaśca mayūraśca tataḥ śuciḥ

तत्पश्चात् वह कछुआ बनता है, और तीन जन्मों तक सूअर; तीन जन्मों तक बिल्ली और मोर बनता है; इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 117 (devibhagavatam.9.33.117)

घृतं तैलादिकं चैव यो हरेत्सुरविप्रयोः । स याति ज्वालाकुण्डं च भस्मकुण्डं च पातकी

ghṛtaṁ tailādikaṁ caiva yo haretsuraviprayoḥ | sa yāti jvālākuṇḍaṁ ca bhasmakuṇḍaṁ ca pātakī

जो देवताओं और ब्राह्मणों का घृत, तेल आदि चुराता है, वह पापी ज्वालाकुण्ड और भस्मकुण्ड को जाता है।

श्लोक 118 (devibhagavatam.9.33.118)

तत्र स्थित्वा शताब्दं च स भवेत्तैलपाचितः । सप्तजन्मनि मत्स्यश्च मूषकश्च ततः शुचिः

tatra sthitvā śatābdaṁ ca sa bhavettailapācitaḥ | saptajanmani matsyaśca mūṣakaśca tataḥ śuciḥ

वहाँ सौ वर्षों तक रहकर वह तेल में पकाया जाता है। वह सात जन्मों तक मछली और चूहा बनता है; इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 119 (devibhagavatam.9.33.119)

सुगन्धितैलं धात्रीं वा गन्धद्रव्यान्यदेव वा । भारते पुण्यवर्षे च यो हरेत्सुरविप्रयोः

sugandhitailaṁ dhātrīṁ vā gandhadravyānyadeva vā | bhārate puṇyavarṣe ca yo haretsuraviprayoḥ

जो भारतवर्ष के पुण्य क्षेत्र में देवताओं और ब्राह्मणों की सुगंधित तेल, आँवला अथवा अन्य सुगंधित द्रव्यों को चुराता है —

श्लोक 120 (devibhagavatam.9.33.120)

स वसेद्दग्धकुण्डे च भवेद्दग्धो दिवानिशम् । स्वलोममानवर्षं च ततो दुर्गन्धिको भवेत्

sa vaseddagdhakuṇḍe ca bhaveddagdho divāniśam | svalomamānavarṣaṁ ca tato durgandhiko bhavet

— वह दग्धकुण्ड में निवास करता है, दिन-रात जलता हुआ, अपने रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक; तत्पश्चात् वह दुर्गंधयुक्त बनता है।

श्लोक 121 (devibhagavatam.9.33.121)

दुर्गन्धिकः सप्तजन्म मृगनाभिस्त्रिजन्मनि । सप्तजन्मसु मन्थानस्ततो हि मानवो भवेत्

durgandhikaḥ saptajanma mṛganābhistrijanmani | saptajanmasu manthānastato hi mānavo bhavet

सात जन्मों तक वह दुर्गंधयुक्त रहता है; तीन जन्मों तक कस्तूरी-मृग बनता है; और सात जन्मों तक तेल-घानी से संबंधित योनि; तत्पश्चात् वह मनुष्य बनता है।

श्लोक 122 (devibhagavatam.9.33.122)

बलेनैव छलेनैव हिंसारूपेण वा सति । बलिष्ठश्च हरेद्भूमिं भारते परपैतृकीम्

balenaiva chalenaiva hiṁsārūpeṇa vā sati | baliṣṭhaśca haredbhūmiṁ bhārate parapaitṛkīm

हे सती! जो बलवान मनुष्य बल से, छल से अथवा हिंसा द्वारा भारतवर्ष में किसी अन्य की पैतृक भूमि हड़प लेता है —

श्लोक 123 (devibhagavatam.9.33.123)

स वसेत्तप्तसूचिं च भवेत्तापी दिवानिशम् । तप्ततैले यथा जीवो दग्धो भवति सन्ततम्

sa vasettaptasūciṁ ca bhavettāpī divāniśam | taptataile yathā jīvo dagdho bhavati santatam

— वह तप्तसूची कुण्ड में निवास करता है, दिन-रात संतप्त रहता है; जैसे उबलते तेल में कोई जीव निरंतर जलता रहता है।

श्लोक 124 (devibhagavatam.9.33.124)

भस्मसान्न भवत्येव भोगे देही न नश्यति । सप्तमन्वन्तरं पापी सन्तप्तस्तत्र तिष्ठति

bhasmasānna bhavatyeva bhoge dehī na naśyati | saptamanvantaraṁ pāpī santaptastatra tiṣṭhati

वह भस्म नहीं होता; भोग के समय जीवात्मा नष्ट नहीं होती। वह पापी सात मन्वंतरों तक वहाँ संतप्त होकर निवास करता है।

श्लोक 125 (devibhagavatam.9.33.125)

शब्दं करोत्यनाहारो यमदूतेन ताडितः । षष्टिवर्षसहस्राणि विट्कृमिश्च भवेत्ततः

śabdaṁ karotyanāhāro yamadūtena tāḍitaḥ | ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi viṭkṛmiśca bhavettataḥ

वह बिना भोजन के चीत्कार करता है, यमदूत द्वारा पीटा जाकर। तत्पश्चात् वह साठ हजार वर्षों तक विष्ठा का कीड़ा बनता है।

श्लोक 126 (devibhagavatam.9.33.126)

ततो भवेद्भूमिहीनो दरिद्रश्च ततः शुचिः । ततः स्वयोनिं सम्प्राप्य शुभं कर्माचरेत्पुनः

tato bhavedbhūmihīno daridraśca tataḥ śuciḥ | tataḥ svayoniṁ samprāpya śubhaṁ karmācaretpunaḥ

तत्पश्चात् वह भूमिहीन और दरिद्र बनता है; इसके बाद वह शुद्ध हो जाता है। तत्पश्चात् अपनी योनि पुनः प्राप्त करके वह फिर से शुभ कर्म का आचरण कर सकता है।

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