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नवम स्कन्ध · अध्याय 6

लक्ष्मी-गंगा-सरस्वती का भूलोक में अवतरण

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (devibhagavatam.9.6.1)

श्रीनारायण उवाच । सरस्वती तु वैकुण्ठे स्वयं नारायणान्तिके । गङ्गाशापेन कलहात्कलया भारते सरित्

śrīnārāyaṇa uvāca | sarasvatī tu vaikuṇṭhe svayaṁ nārāyaṇāntike | gaṅgāśāpena kalahātkalayā bhārate sarit

श्री नारायण ने कहा — सरस्वती स्वयं वैकुण्ठ में नारायण के समीप रहती हैं; गंगा के शाप से, कलह के कारण, वे अपनी कला से भारतवर्ष में नदी रूप में हैं।

श्लोक 2 (devibhagavatam.9.6.2)

पुण्यदा पुण्यरूपा च पुण्यतीर्थस्वरूपिणी । पुण्यवद्भिर्निषेव्या च स्थितिः पुण्यवतां मुने

puṇyadā puṇyarūpā ca puṇyatīrthasvarūpiṇī | puṇyavadbhirniṣevyā ca sthitiḥ puṇyavatāṁ mune

वे पुण्य देने वाली, पुण्यरूपा तथा पुण्य तीर्थ की स्वरूपा हैं; हे मुने! पुण्यवानों द्वारा सेवनीय, वे पुण्यवानों का ही निवासस्थान हैं।

श्लोक 3 (devibhagavatam.9.6.3)

तपस्विनां तपोरूपा तपसः फलरूपिणी । कृतपापेध्मदाहाय ज्वलदग्निस्वरूपिणी

tapasvināṁ taporūpā tapasaḥ phalarūpiṇī | kṛtapāpedhmadāhāya jvaladagnisvarūpiṇī

वे तपस्वियों के लिए तपस्वरूपा तथा तप के फल की स्वरूपा हैं; किए हुए पाप के ईंधन को जलाने के लिए वे प्रज्वलित अग्निस्वरूपा हैं।

श्लोक 4 (devibhagavatam.9.6.4)

ज्ञानात्सरस्वतीतोये मृता ये मानवा भुवि । तेषां स्थितिश्च वैकुण्ठे सुचिरं हरिसंसदि

jñānātsarasvatītoye mṛtā ye mānavā bhuvi | teṣāṁ sthitiśca vaikuṇṭhe suciraṁ harisaṁsadi

पृथ्वी पर जो मनुष्य ज्ञानपूर्वक सरस्वती के जल में मरते हैं, उनका निवास वैकुण्ठ में हरि की सभा में दीर्घकाल तक होता है।

श्लोक 5 (devibhagavatam.9.6.5)

भारते कृतपापश्च स्नात्वा तत्र च लीलया । मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके वसेच्चिरम्

bhārate kṛtapāpaśca snātvā tatra ca līlayā | mucyate sarvapāpebhyo viṣṇuloke vasecciram

भारतवर्ष में पाप करने वाला भी वहाँ लीलामात्र से स्नान करके सभी पापों से मुक्त हो जाता है और विष्णुलोक में दीर्घकाल तक निवास करता है।

श्लोक 6 (devibhagavatam.9.6.6)

चातुर्मास्यां पौर्णमास्यामक्षयायां दिनक्षये । व्यतीपाते च ग्रहणेऽन्यस्मिन्पुण्यदिनेऽपि च

cāturmāsyāṁ paurṇamāsyāmakṣayāyāṁ dinakṣaye | vyatīpāte ca grahaṇe'nyasminpuṇyadine'pi ca

चातुर्मास्य में, पूर्णिमा को, अक्षय तृतीया को, अमावस्या को, व्यतीपात योग में, ग्रहण में तथा किसी अन्य पुण्य दिन में भी —

श्लोक 7 (devibhagavatam.9.6.7)

अनुषङ्गेण यः स्नातो हेतुना श्रद्धयापि वा । सारूप्यं लभते नूनं वैकुण्ठे स हरेरपि

anuṣaṅgeṇa yaḥ snāto hetunā śraddhayāpi vā | sārūpyaṁ labhate nūnaṁ vaikuṇṭhe sa harerapi

जो भी उसमें स्नान करता है, चाहे संयोगवश, किसी हेतु से या श्रद्धा से भी, वह निश्चय ही वैकुण्ठ में हरि के समान रूप प्राप्त करता है।

श्लोक 8 (devibhagavatam.9.6.8)

सरस्वतीमनुं तत्र मासमेकं च यो जपेत् । महामूर्खः कवीन्द्रश्च स भवेन्नात्र संशयः

sarasvatīmanuṁ tatra māsamekaṁ ca yo japet | mahāmūrkhaḥ kavīndraśca sa bhavennātra saṁśayaḥ

जो वहाँ सरस्वती के मन्त्र का एक मास तक जप करता है, वह चाहे महामूर्ख ही क्यों न हो, निश्चय ही श्रेष्ठ कवि बन जाता है।

श्लोक 9 (devibhagavatam.9.6.9)

नित्यं सरस्वतीतोये यः स्नायान्मुण्डयन्नरः । न गर्भवासं कुरुते पुनरेव स मानवः

nityaṁ sarasvatītoye yaḥ snāyānmuṇḍayannaraḥ | na garbhavāsaṁ kurute punareva sa mānavaḥ

जो मनुष्य मुण्डन कराकर नित्य सरस्वती के जल में स्नान करता है, वह मनुष्य फिर कभी गर्भवास नहीं करता।

श्लोक 10 (devibhagavatam.9.6.10)

इत्येवं कथितं किञ्चिद्भारतीगुणकीर्तनम् । सुखदं कामदं सारं भूयः किं श्रोतुमिच्छसि

ityevaṁ kathitaṁ kiñcidbhāratīguṇakīrtanam | sukhadaṁ kāmadaṁ sāraṁ bhūyaḥ kiṁ śrotumicchasi

इस प्रकार भारती के गुणों का कुछ कीर्तन कहा गया, जो सुखदायक, कामनापूर्ति करने वाला तथा सारभूत है; अब और क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 11 (devibhagavatam.9.6.11)

सूत उवाच । नारायणवचः श्रुत्वा नारदो मुनिसत्तमः । पुनः पप्रच्छ सन्देहमिमं शौनक सत्वरम्

sūta uvāca | nārāyaṇavacaḥ śrutvā nārado munisattamaḥ | punaḥ papraccha sandehamimaṁ śaunaka satvaram

सूत जी ने कहा — हे शौनक! नारायण के वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद ने पुनः शीघ्रता से यह संदेह पूछा।

श्लोक 12 (devibhagavatam.9.6.12)

नारद उवाच । कथं सरस्वती देवी गङ्गाशापेन भारते । कलया कलहेनैव बभूव पुण्यदा सरित्

nārada uvāca | kathaṁ sarasvatī devī gaṅgāśāpena bhārate | kalayā kalahenaiva babhūva puṇyadā sarit

नारद ने कहा — देवी सरस्वती गंगा के शाप से, कलह के कारण, अपनी कला से भारतवर्ष में पुण्यदायिनी नदी कैसे बनीं?

श्लोक 13 (devibhagavatam.9.6.13)

श्रवणे श्रुतिसाराणां वर्धते कौतुकं मम । कथामृतेन मे तृप्तिः केन श्रेयसि तृप्यते

śravaṇe śrutisārāṇāṁ vardhate kautukaṁ mama | kathāmṛtena me tṛptiḥ kena śreyasi tṛpyate

श्रुतियों के सार को सुनने में मेरा कौतूहल बढ़ता जाता है; कथारूपी अमृत से मेरी तृप्ति होती है, फिर श्रेय में कौन तृप्त नहीं होगा?

श्लोक 14 (devibhagavatam.9.6.14)

कथं शशाप सा गङ्गा पूजितां तां सरस्वतीम् । सा तु सत्त्वस्वरूपा या पुण्यदा शुभदा सदा

kathaṁ śaśāpa sā gaṅgā pūjitāṁ tāṁ sarasvatīm | sā tu sattvasvarūpā yā puṇyadā śubhadā sadā

गंगा ने उस पूजित सरस्वती को कैसे शाप दिया, जो सत्त्वस्वरूपा तथा सदा पुण्य और मंगल देने वाली हैं?

श्लोक 15 (devibhagavatam.9.6.15)

तेजस्विनोर्द्वयोर्वादकारणं श्रुतिसुन्दरम् । सुदुर्लभं पुराणेषु तन्मे व्याख्यातुमर्हसि

tejasvinordvayorvādakāraṇaṁ śrutisundaram | sudurlabhaṁ purāṇeṣu tanme vyākhyātumarhasi

उन दोनों तेजस्विनियों के विवाद का सुनने में सुन्दर कारण, जो पुराणों में भी दुर्लभ है, आप मुझे बताने की कृपा करें।

श्लोक 16 (devibhagavatam.9.6.16)

श्रीनारायण उवाच । शृणु नारद वक्ष्यामि कथामेतां पुरातनीम् । यस्याः श्रवणमात्रेण सर्वपापात्प्रमुच्यते

śrīnārāyaṇa uvāca | śṛṇu nārada vakṣyāmi kathāmetāṁ purātanīm | yasyāḥ śravaṇamātreṇa sarvapāpātpramucyate

श्री नारायण ने कहा — हे नारद! सुनो, मैं यह प्राचीन कथा कहता हूँ, जिसके सुनने मात्र से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 17 (devibhagavatam.9.6.17)

लक्ष्मीः सरस्वती गङ्गा तिस्रो भार्या हरेरपि । प्रेम्णा समास्तास्तिष्ठन्ति सततं हरिसन्निधौ

lakṣmīḥ sarasvatī gaṅgā tisro bhāryā harerapi | premṇā samāstāstiṣṭhanti satataṁ harisannidhau

लक्ष्मी, सरस्वती तथा गंगा — ये हरि की तीन पत्नियाँ हैं; वे तीनों प्रेमपूर्वक समान रूप से हरि के समीप सदा रहती हैं।

श्लोक 18 (devibhagavatam.9.6.18)

चकार सैकदा गङ्गा विष्णोर्मुखनिरीक्षणम् । सस्मिता च सकामा च सकटाक्षं पुनः पुनः

cakāra saikadā gaṅgā viṣṇormukhanirīkṣaṇam | sasmitā ca sakāmā ca sakaṭākṣaṁ punaḥ punaḥ

एक बार गंगा ने विष्णु के मुख की ओर मुस्कुराते हुए, कामना से युक्त होकर, बार-बार कटाक्षपूर्ण दृष्टि से देखा।

श्लोक 19 (devibhagavatam.9.6.19)

विभुर्जहास तद्वक्त्रं निरीक्ष्य च क्षणं तदा । क्षमां चकार तद् दृष्ट्वा लक्ष्मीर्नैव सरस्वती

vibhurjahāsa tadvaktraṁ nirīkṣya ca kṣaṇaṁ tadā | kṣamāṁ cakāra tad dṛṣṭvā lakṣmīrnaiva sarasvatī

विभु ने भी उसके मुख को क्षणभर देखकर मुस्कुरा दिया; यह देखकर लक्ष्मी ने तो सहन कर लिया, किन्तु सरस्वती ने नहीं।

श्लोक 20 (devibhagavatam.9.6.20)

बोधयामास पद्मा तां सत्त्वरूपा च सस्मिता । क्रोधाविष्टा च सा वाणी न च शान्ता बभूव ह

bodhayāmāsa padmā tāṁ sattvarūpā ca sasmitā | krodhāviṣṭā ca sā vāṇī na ca śāntā babhūva ha

सत्त्वस्वरूपा तथा मुस्कुराती हुई पद्मा ने उसे समझाने का प्रयास किया, किन्तु क्रोध से आविष्ट वह वाणी शान्त नहीं हुई।

श्लोक 21 (devibhagavatam.9.6.21)

उवाच वाणी भर्तारं रक्तास्या रक्तलोचना । कुपिता कामवेगेन शश्वत्प्रस्फुरिताधरा

uvāca vāṇī bhartāraṁ raktāsyā raktalocanā | kupitā kāmavegena śaśvatprasphuritādharā

लाल मुख तथा लाल नेत्रों वाली, काम के वेग से क्रुद्ध, सदा काँपते हुए होठों वाली उस वाणी ने अपने पति से कहा —

श्लोक 22 (devibhagavatam.9.6.22)

सरस्वत्युवाच । सर्वत्र समताबुद्धिः सद्भर्तुः कामिनीं प्रति । धर्मिष्ठस्य वरिष्ठस्य विपरीता खलस्य च

sarasvatyuvāca | sarvatra samatābuddhiḥ sadbhartuḥ kāminīṁ prati | dharmiṣṭhasya variṣṭhasya viparītā khalasya ca

सरस्वती ने कहा — एक सच्चे पति की समस्त अपनी पत्नियों के प्रति सर्वत्र समान बुद्धि होती है — यह धार्मिक और श्रेष्ठ पति का लक्षण है, इसके विपरीत खल का लक्षण है।

श्लोक 23 (devibhagavatam.9.6.23)

ज्ञातं सौभाग्यमधिकं गङ्गायां ते गदाधर । कमलायां च तत्तुल्यं न च किञ्चिन्मयि प्रभो

jñātaṁ saubhāgyamadhikaṁ gaṅgāyāṁ te gadādhara | kamalāyāṁ ca tattulyaṁ na ca kiñcinmayi prabho

हे गदाधर! मुझे ज्ञात हो गया है कि आपका सौभाग्य गंगा के प्रति अधिक है, कमला के प्रति भी उतना ही है, किन्तु हे प्रभो! मेरे प्रति कुछ भी नहीं है।

श्लोक 24 (devibhagavatam.9.6.24)

गङ्गायाः पद्मया सार्धं प्रीतिश्चास्ति सुसम्मता । क्षमां चकार तेनेदं विपरीतं हरिप्रिया

gaṅgāyāḥ padmayā sārdhaṁ prītiścāsti susammatā | kṣamāṁ cakāra tenedaṁ viparītaṁ haripriyā

गंगा और पद्मा के साथ आपकी प्रीति भलीभाँति सम्मत है, इसीलिए हरि की प्रिया लक्ष्मी ने इस विपरीत व्यवहार को सहन कर लिया।

श्लोक 25 (devibhagavatam.9.6.25)

किं जीवनेन मेऽत्रैव दुर्भगायाश्च साम्प्रतम् । निष्कलं जीवनं तस्या या पत्युः प्रेमवञ्चिता

kiṁ jīvanena me'traiva durbhagāyāśca sāmpratam | niṣkalaṁ jīvanaṁ tasyā yā patyuḥ premavañcitā

यहाँ अभागिनी बनकर अब मेरे जीवित रहने से क्या लाभ? जिसे पति के प्रेम से वंचित रखा जाए, उसका जीवन व्यर्थ है।

श्लोक 26 (devibhagavatam.9.6.26)

त्वां सर्वे सत्त्वरूपं च ये वदन्ति मनीषिणः । ते च मूर्खा न वेदज्ञा न जानन्ति मतिं तव

tvāṁ sarve sattvarūpaṁ ca ye vadanti manīṣiṇaḥ | te ca mūrkhā na vedajñā na jānanti matiṁ tava

जो विद्वान आपको सत्त्वस्वरूप कहते हैं, वे सब मूर्ख हैं, वे वेदज्ञ नहीं हैं, वे आपके मन को नहीं जानते।

श्लोक 27 (devibhagavatam.9.6.27)

सरस्वतीवचः श्रुत्वा दृष्ट्वा तां कोपसंयुताम् । मनसा च समालोच्य स जगाम बहिः सभाम्

sarasvatīvacaḥ śrutvā dṛṣṭvā tāṁ kopasaṁyutām | manasā ca samālocya sa jagāma bahiḥ sabhām

सरस्वती के वचन सुनकर तथा उसे क्रोध से युक्त देखकर, मन में विचार करके वे सभा से बाहर चले गए।

श्लोक 28 (devibhagavatam.9.6.28)

गते नारायणे गङ्गामुवाच निर्भयं रुषा । वागधिष्ठातृदेवी सा वाक्यं श्रवणदुष्करम्

gate nārāyaṇe gaṅgāmuvāca nirbhayaṁ ruṣā | vāgadhiṣṭhātṛdevī sā vākyaṁ śravaṇaduṣkaram

नारायण के चले जाने पर वागधिष्ठात्री देवी सरस्वती ने निर्भय होकर क्रोधवश गंगा से ऐसा वचन कहा, जो सुनने में कठोर था।

श्लोक 29 (devibhagavatam.9.6.29)

हे निर्लज्जे हे सकामे स्वामिगर्वं करोषि किम् । अधिकं स्वामिसौभाग्यं विज्ञापयितुमिच्छसि

he nirlajje he sakāme svāmigarvaṁ karoṣi kim | adhikaṁ svāmisaubhāgyaṁ vijñāpayitumicchasi

हे निर्लज्जे! हे कामातुरे! तू अपने स्वामी का गर्व क्यों करती है? क्या तू स्वामी का अधिक सौभाग्य प्रकट करना चाहती है?

श्लोक 30 (devibhagavatam.9.6.30)

मानचूर्णं करिष्यामि तवाद्य हरिसन्निधौ । किं करिष्यति ते कान्तो ममैवं कान्तवल्लभे

mānacūrṇaṁ kariṣyāmi tavādya harisannidhau | kiṁ kariṣyati te kānto mamaivaṁ kāntavallabhe

आज मैं हरि की सन्निधि में ही तेरे मान को चूर्ण कर दूँगी; हे प्रियतम-प्रिये! तेरा प्रियतम मेरा क्या कर लेगा?

श्लोक 31 (devibhagavatam.9.6.31)

इत्येवमुक्त्वा गङ्गायाः केशं ग्रहीतुमुद्यता । वारयामास तां पद्मा मध्यदेशं समाश्रिता

ityevamuktvā gaṅgāyāḥ keśaṁ grahītumudyatā | vārayāmāsa tāṁ padmā madhyadeśaṁ samāśritā

ऐसा कहकर वह गंगा के केश पकड़ने के लिए उद्यत हुई; तब पद्मा ने बीच में आकर उसे रोका।

श्लोक 32 (devibhagavatam.9.6.32)

शशाप वाणी तां पद्मां महाबलवती सती । वृक्षरूपा सरिद्रूपा भविष्यसि न संशयः

śaśāpa vāṇī tāṁ padmāṁ mahābalavatī satī | vṛkṣarūpā saridrūpā bhaviṣyasi na saṁśayaḥ

उस अत्यन्त बलवती सती वाणी ने पद्मा को शाप दिया — निश्चय ही तू वृक्षरूप और नदीरूप बनेगी।

श्लोक 33 (devibhagavatam.9.6.33)

विपरीतं ततो दृष्ट्वा किञ्चिन्नो वक्तुमर्हसि । सन्तिष्ठति सभामध्ये यथा वृक्षो यथा सरित्

viparītaṁ tato dṛṣṭvā kiñcinno vaktumarhasi | santiṣṭhati sabhāmadhye yathā vṛkṣo yathā sarit

यह विपरीत व्यवहार देखने के बाद तुझे कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं है; तू सभा के बीच वृक्ष और नदी की भाँति ही खड़ी रह।

श्लोक 34 (devibhagavatam.9.6.34)

शापं श्रुत्वा तु सा देवी न शशाप चुकोप ह । तत्रैव दुःखिता तस्थौ वाणीं धृत्वा करेण च

śāpaṁ śrutvā tu sā devī na śaśāpa cukopa ha | tatraiva duḥkhitā tasthau vāṇīṁ dhṛtvā kareṇa ca

उस शाप को सुनकर वह देवी कुपित तो हुई पर उसने प्रतिशाप नहीं दिया; वह दुःखी होकर वहीं खड़ी रही, हाथ से वाणी को पकड़े हुए।

श्लोक 35 (devibhagavatam.9.6.35)

असन्तुष्टां तु तां दृष्ट्वा कोपप्रस्फुरिताधराम् । उवाच गङ्गा तां देवीं पद्मां चारक्तलोचनाम्

asantuṣṭāṁ tu tāṁ dṛṣṭvā kopaprasphuritādharām | uvāca gaṅgā tāṁ devīṁ padmāṁ cāraktalocanām

उसे असन्तुष्ट तथा क्रोध से काँपते होठों वाली देखकर, गंगा ने लाल नेत्रों वाली उस देवी पद्मा से कहा —

श्लोक 36 (devibhagavatam.9.6.36)

गङ्गोवाच । त्वमुत्सृज महोग्रां च पद्मे किं मे करिष्यति । दुःशीला मुखरा नष्टा नित्यं वाचालरूपिणी

gaṅgovāca | tvamutsṛja mahogrāṁ ca padme kiṁ me kariṣyati | duḥśīlā mukharā naṣṭā nityaṁ vācālarūpiṇī

गंगा ने कहा — हे पद्मे! इस अत्यन्त उग्र को छोड़ दो, यह मेरा क्या कर लेगी? यह दुःशीला, वाचाल, भ्रष्ट तथा सदा बकवादी है।

श्लोक 37 (devibhagavatam.9.6.37)

वागधिष्ठात्री देवीयं सततं कलहप्रिया । यावती योग्यता चास्या यावती शक्तिरेव च

vāgadhiṣṭhātrī devīyaṁ satataṁ kalahapriyā | yāvatī yogyatā cāsyā yāvatī śaktireva ca

यह वाग्देवी सदा कलहप्रिय है; इसकी जितनी योग्यता है और जितनी शक्ति है —

श्लोक 38 (devibhagavatam.9.6.38)

तथा करोतु वादं च मया सार्धं च दुर्मुखी । स्वबलं यन्मम बलं विज्ञापयितुमिच्छति

tathā karotu vādaṁ ca mayā sārdhaṁ ca durmukhī | svabalaṁ yanmama balaṁ vijñāpayitumicchati

उसी के अनुसार यह दुर्मुखी मुझसे विवाद करे; अपने बल की, मेरे बल की तुलना जो प्रकट करना चाहती है —

श्लोक 39 (devibhagavatam.9.6.39)

जानन्तु सर्वे ह्युभयोः प्रभावं विक्रमं सति । इत्येवमुक्त्वा सा देवी वाण्यै शापं ददाविति

jānantu sarve hyubhayoḥ prabhāvaṁ vikramaṁ sati | ityevamuktvā sā devī vāṇyai śāpaṁ dadāviti

हे सती! सब जान लें हम दोनों का प्रभाव और पराक्रम — ऐसा कहकर उस देवी ने वाणी को यह शाप दिया —

श्लोक 40 (devibhagavatam.9.6.40)

सरिक्त्यरूपा भवतु सा या त्वां च शशाप ह । अधोमर्त्यं सा प्रयातु सन्ति यत्रैव पापिनः

sariktyarūpā bhavatu sā yā tvāṁ ca śaśāpa ha | adhomartyaṁ sā prayātu santi yatraiva pāpinaḥ

जिसने तुझे शाप दिया है, वह भी नदी-रूप बने; वह नीचे मृत्युलोक में जाए, जहाँ पापी लोग निवास करते हैं।

श्लोक 41 (devibhagavatam.9.6.41)

कलौ तेषां च पापानि ग्रहीष्यति न संशयः । इत्येवं वचनं श्रुत्वा तां शशाप सरस्वती

kalau teṣāṁ ca pāpāni grahīṣyati na saṁśayaḥ | ityevaṁ vacanaṁ śrutvā tāṁ śaśāpa sarasvatī

कलियुग में वह निश्चय ही उन पापियों के पाप ग्रहण करे — ऐसा वचन सुनकर सरस्वती ने भी उसे शाप दिया।

श्लोक 42 (devibhagavatam.9.6.42)

त्वमेव यास्यसि महीं पापिपापं लभिष्यसि । एतस्मिन्नन्तरे तत्र भगवानाजगाम ह

tvameva yāsyasi mahīṁ pāpipāpaṁ labhiṣyasi | etasminnantare tatra bhagavānājagāma ha

तू ही पृथ्वी पर जाएगी और पापियों का पाप प्राप्त करेगी — इसी बीच वहाँ भगवान आ पहुँचे।

श्लोक 43 (devibhagavatam.9.6.43)

चतुर्भुजश्चतुर्भिश्च पार्षदैश्च चतुर्भुजैः । सरस्वतीं करे धृत्वा वासयामास वक्षसि

caturbhujaścaturbhiśca pārṣadaiśca caturbhujaiḥ | sarasvatīṁ kare dhṛtvā vāsayāmāsa vakṣasi

चतुर्भुज भगवान चार चतुर्भुज पार्षदों के साथ आए; उन्होंने सरस्वती को हाथ में लेकर अपने वक्षःस्थल पर बिठा लिया।

श्लोक 44 (devibhagavatam.9.6.44)

बोधयामास सर्वज्ञः सर्वज्ञानं पुरातनम् । श्रुत्वा रहस्यं तासां च शापस्य कलहस्य च

bodhayāmāsa sarvajñaḥ sarvajñānaṁ purātanam | śrutvā rahasyaṁ tāsāṁ ca śāpasya kalahasya ca

सर्वज्ञ ने उसे प्राचीन सर्वज्ञान से समझाया; उनके शाप तथा कलह का रहस्य सुनकर —

श्लोक 45 (devibhagavatam.9.6.45)

उवाच दुःखितास्ताश्च वाचं सामयिकीं विभुः । श्रीभगवानुवाच । लक्ष्मि त्वं कलया गच्छ धर्मध्वजगृहं शुभे

uvāca duḥkhitāstāśca vācaṁ sāmayikīṁ vibhuḥ | śrībhagavānuvāca | lakṣmi tvaṁ kalayā gaccha dharmadhvajagṛhaṁ śubhe

वह विभु उन दुःखी देवियों से समय के अनुकूल वचन कहने लगे — श्रीभगवान ने कहा — हे शुभे लक्ष्मी! तुम अपनी कला से धर्मध्वज के घर जाओ।

श्लोक 46 (devibhagavatam.9.6.46)

अयोनिसम्भवा भूमौ तस्य कन्या भविष्यसि । तत्रैव दैवदोषेण वृक्षत्वं च लभिष्यसि

ayonisambhavā bhūmau tasya kanyā bhaviṣyasi | tatraiva daivadoṣeṇa vṛkṣatvaṁ ca labhiṣyasi

पृथ्वी पर तुम अयोनिज रूप से उसकी कन्या बनोगी; वहीं दैव-दोष के कारण तुम वृक्षत्व भी प्राप्त करोगी।

श्लोक 47 (devibhagavatam.9.6.47)

मदंशस्यासुरस्यैव शङ्खचूडस्य कामिनी । भूत्वा पश्चाच्च मत्पत्नी भविष्यसि न संशयः

madaṁśasyāsurasyaiva śaṅkhacūḍasya kāminī | bhūtvā paścācca matpatnī bhaviṣyasi na saṁśayaḥ

मेरे ही अंशरूप असुर शंखचूड़ की प्रिया बनकर, तत्पश्चात् तुम निश्चय ही मेरी पत्नी बनोगी।

श्लोक 48 (devibhagavatam.9.6.48)

त्रैलोक्यपावनी नाम्ना तुलसीति च भारते । कलया च सरिद्भावं शीघ्रं गच्छ वरानने

trailokyapāvanī nāmnā tulasīti ca bhārate | kalayā ca saridbhāvaṁ śīghraṁ gaccha varānane

तीनों लोकों को पवित्र करने वाली "तुलसी" नाम से भारतवर्ष में प्रसिद्ध होगी; हे वरानने! अपनी कला से शीघ्र नदीरूप को प्राप्त हो।

श्लोक 49 (devibhagavatam.9.6.49)

भारतं भारतीशापान्नाम्ना पद्मावती भव । गङ्गे यास्यसि पश्चात्त्वमंशेन विश्वपावनी

bhārataṁ bhāratīśāpānnāmnā padmāvatī bhava | gaṅge yāsyasi paścāttvamaṁśena viśvapāvanī

भारती के शाप से भारतवर्ष में "पद्मावती" नाम से प्रसिद्ध होओ; हे गंगे! तत्पश्चात् तुम अपने अंश से सर्वव्यापी पवित्र नदी बनोगी।

श्लोक 50 (devibhagavatam.9.6.50)

भारतं भारतीशापात्पापदाहाय पापिनाम् । भगीरथस्य तपसा तेन नीता सुकल्पिते

bhārataṁ bhāratīśāpātpāpadāhāya pāpinām | bhagīrathasya tapasā tena nītā sukalpite

भारती के शाप से भारतवर्ष में पापियों के पाप जलाने के लिए जाओगी; भगीरथ के तप से, सुनियोजित विधि से लाई जाओगी —

श्लोक 51 (devibhagavatam.9.6.51)

नाम्ना भागीरथी पूता भविष्यसि महीतले । मदंशस्य समुद्रस्य जाया जायेर्ममाज्ञया

nāmnā bhāgīrathī pūtā bhaviṣyasi mahītale | madaṁśasya samudrasya jāyā jāyermamājñayā

"भागीरथी" नाम से पावन होकर पृथ्वीतल पर विख्यात होगी; मेरी आज्ञा से मेरे ही अंशस्वरूप समुद्र की पत्नी बनोगी।

श्लोक 52 (devibhagavatam.9.6.52)

मत्कलांशस्य भूपस्य शन्तनोश्च सुरेश्वरि । गङ्गाशापेन कलया भारतं गच्छ भारति

matkalāṁśasya bhūpasya śantanośca sureśvari | gaṅgāśāpena kalayā bhārataṁ gaccha bhārati

हे सुरेश्वरी! तथा मेरे ही कला-अंशरूप राजा शन्तनु की भी पत्नी बनोगी; हे भारती! गंगा के शाप से अपनी कला से भारतवर्ष जाओ।

श्लोक 53 (devibhagavatam.9.6.53)

कलहस्य फलं भुङ्क्ष्व सपत्नीभ्यां सहाच्युते । स्वयं च ब्रह्मसदने ब्रह्मणः कामिनी भव

kalahasya phalaṁ bhuṅkṣva sapatnībhyāṁ sahācyute | svayaṁ ca brahmasadane brahmaṇaḥ kāminī bhava

हे अच्युते! अपनी दोनों सपत्नियों के साथ इस कलह का फल भोगो; और स्वयं ब्रह्मलोक में ब्रह्मा की प्रिया बनो।

श्लोक 54 (devibhagavatam.9.6.54)

गङ्गा यातु शिवस्थानमत्र पद्मैव तिष्ठतु । शान्ता च क्रोधरहिता मद्भक्ता सत्त्वरूपिणी

gaṅgā yātu śivasthānamatra padmaiva tiṣṭhatu | śāntā ca krodharahitā madbhaktā sattvarūpiṇī

गंगा शिवधाम को जाए, यहाँ केवल पद्मा ही रहे — जो शान्त, क्रोधरहित, मेरी भक्त तथा सत्त्वस्वरूपा है।

श्लोक 55 (devibhagavatam.9.6.55)

महासाध्वी महाभागा सुशीला धर्मचारिणी । यदंशकलया सर्वा धर्मिष्ठाश्च पतिव्रताः

mahāsādhvī mahābhāgā suśīlā dharmacāriṇī | yadaṁśakalayā sarvā dharmiṣṭhāśca pativratāḥ

वह महासाध्वी, महाभागा, सुशीला तथा धर्माचरण करने वाली है; उसके ही अंश और कला से सभी स्त्रियाँ धर्मपरायण और पतिव्रता होती हैं।

श्लोक 56 (devibhagavatam.9.6.56)

शान्तरूपाः सुशीलाश्च प्रतिविश्वेषु पूजिताः । तिस्रो भार्यास्त्रिशीलाश्च त्रयो भृत्याश्च बान्धवाः

śāntarūpāḥ suśīlāśca prativiśveṣu pūjitāḥ | tisro bhāryāstriśīlāśca trayo bhṛtyāśca bāndhavāḥ

वे शान्तस्वरूपा, सुशीला तथा प्रत्येक लोक में पूजित हैं। तीन पत्नियाँ, यदि तीन प्रकार के स्वभाव की हों, और तीन सेवक तथा बन्धु —

श्लोक 57 (devibhagavatam.9.6.57)

ध्रुवं वेदविरुद्धाश्च न ह्येते मङ्गलप्रदाः । स्त्रीपुंवच्च गृहे येषां गृहिणां स्त्रीवशः पुमान्

dhruvaṁ vedaviruddhāśca na hyete maṅgalapradāḥ | strīpuṁvacca gṛhe yeṣāṁ gṛhiṇāṁ strīvaśaḥ pumān

ये निश्चय ही वेद-विरुद्ध हैं, ये मंगलदायक नहीं होते; जिन गृहस्थों के घर में पुरुष स्त्री के वश में रहता है, मानो स्त्री ही पुरुष हो —

श्लोक 58 (devibhagavatam.9.6.58)

निष्फलं च जन्म तेषामशुभं च पदे पदे । मुखे दुष्टा योनिदुष्टा यस्य स्त्री कलहप्रिया

niṣphalaṁ ca janma teṣāmaśubhaṁ ca pade pade | mukhe duṣṭā yoniduṣṭā yasya strī kalahapriyā

उनका जन्म निष्फल तथा पग-पग पर अशुभ होता है; जिसकी स्त्री वाणी में दुष्ट, कुल में दुष्ट तथा कलहप्रिय हो —

श्लोक 59 (devibhagavatam.9.6.59)

अरण्यं तेन गन्तव्यं महारण्यं गृहाद्वरम् । जलानां च स्थलानां च फलानां प्राप्तिरेव च

araṇyaṁ tena gantavyaṁ mahāraṇyaṁ gṛhādvaram | jalānāṁ ca sthalānāṁ ca phalānāṁ prāptireva ca

उसे घर से बेहतर महावन में चला जाना चाहिए; वहाँ जल, स्थल तथा फलों की प्राप्ति —

श्लोक 60 (devibhagavatam.9.6.60)

सततं सुलभा तत्र न तेषां गृह एव च । वरमग्नौ स्थितिर्हिंस्रजन्तूनां सन्निधौ सुखम्

satataṁ sulabhā tatra na teṣāṁ gṛha eva ca | varamagnau sthitirhiṁsrajantūnāṁ sannidhau sukham

वहाँ सदा सुलभ है, किन्तु उनके घर में नहीं; अग्नि में रहना अथवा हिंसक जन्तुओं के समीप रहना भी सुखद है —

श्लोक 61 (devibhagavatam.9.6.61)

ततोऽपि दुःखं पुंसां च दुष्टस्त्रीसन्निधौ ध्रुवम् । व्याधिज्वाला विषज्वाला वरं पुंसां वरानने

tato'pi duḥkhaṁ puṁsāṁ ca duṣṭastrīsannidhau dhruvam | vyādhijvālā viṣajvālā varaṁ puṁsāṁ varānane

उससे भी अधिक दुःख पुरुषों को दुष्टा स्त्री की संगति में निश्चय ही होता है; हे वरानने! पुरुषों के लिए रोग की ज्वाला अथवा विष की ज्वाला श्रेयस्कर है —

श्लोक 62 (devibhagavatam.9.6.62)

दुष्टस्त्रीणां मुखज्वाला मरणादतिरिच्यते । पुंसां च स्त्रीजितां चैव भस्मान्तं शौचमध्रुवम्

duṣṭastrīṇāṁ mukhajvālā maraṇādatiricyate | puṁsāṁ ca strījitāṁ caiva bhasmāntaṁ śaucamadhruvam

दुष्ट स्त्रियों के मुख की ज्वाला मृत्यु से भी बढ़कर है; स्त्री द्वारा जीते हुए पुरुषों की शुद्धि तो केवल भस्म होने तक ही अनिश्चित रहती है।

श्लोक 63 (devibhagavatam.9.6.63)

यदह्नि कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत् । निन्दितोऽत्र परत्रैव सर्वत्र नरकं व्रजेत्

yadahni kurute karma na tasya phalabhāgbhavet | nindito'tra paratraiva sarvatra narakaṁ vrajet

जो कर्म वे दिन में करते हैं, उसका फल उन्हें प्राप्त नहीं होता; वे यहाँ भी निन्दित होते हैं और परलोक में भी सर्वत्र नरक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 64 (devibhagavatam.9.6.64)

यशःकीर्तिविहीनो यो जीवन्नपि मृतो हि सः । बह्वीनां च सपत्नीनां नैकत्र श्रेयसे स्थितिः

yaśaḥkīrtivihīno yo jīvannapi mṛto hi saḥ | bahvīnāṁ ca sapatnīnāṁ naikatra śreyase sthitiḥ

जो यश और कीर्ति से रहित है, वह जीवित रहते हुए भी मृतक ही है; अनेक सपत्नियों की एक साथ स्थिति कल्याणकारी नहीं होती।

श्लोक 65 (devibhagavatam.9.6.65)

एकभार्यः सुखी नैव बहुभार्यः कदाचन । गच्छ गङ्गे शिवस्थानं ब्रह्मस्थानं सरस्वति

ekabhāryaḥ sukhī naiva bahubhāryaḥ kadācana | gaccha gaṅge śivasthānaṁ brahmasthānaṁ sarasvati

एक पत्नी वाला ही सुखी होता है, अनेक पत्नियों वाला कभी सुखी नहीं होता; हे गंगे! शिवधाम को जाओ, हे सरस्वती! ब्रह्मधाम को जाओ।

श्लोक 66 (devibhagavatam.9.6.66)

अत्र तिष्ठतु मद्गेहे सुशीला कमलालया । सुसाध्या यस्य पत्नी च सुशीला च पतिव्रता

atra tiṣṭhatu madgehe suśīlā kamalālayā | susādhyā yasya patnī ca suśīlā ca pativratā

यहाँ मेरे घर में सुशीला कमलालया ही रहे; जिस पुरुष की पत्नी सुसाध्य, सुशील तथा पतिव्रता है —

श्लोक 67 (devibhagavatam.9.6.67)

इह स्वर्गे सुखं तस्य धर्मो मोक्षः परत्र च । पतिव्रता यस्य पत्नी स च मुक्तः शुचिः सुखी । जीवन्मृतोऽशुचिर्दुःखी दुःशीलापतिरेव च

iha svarge sukhaṁ tasya dharmo mokṣaḥ paratra ca | pativratā yasya patnī sa ca muktaḥ śuciḥ sukhī | jīvanmṛto'śucirduḥkhī duḥśīlāpatireva ca

उसके लिए यहाँ और स्वर्ग में सुख है, तथा परलोक में धर्म एवं मोक्ष है; जिस पुरुष की पत्नी पतिव्रता है, वह मुक्त, शुद्ध तथा सुखी है; किन्तु दुःशीला का पति जीवित रहते हुए भी मृतक, अशुद्ध तथा दुःखी है।

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