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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 100

याज्ञवल्क्य-उक्त गणपतिकल्प-निरूपण

अध्याय 99अध्याय-सूचीअध्याय 101

श्लोक 1 (garuda.1.100.1)

याज्ञवल्क्य उवाच । विनायकोपसृष्टस्य लक्षणानि निबोधत । स्वप्नेऽवगाहतेऽत्यर्थं जलं मुण्डांश्च पश्यति

yājñavalkya uvāca vināyakopasṛṣṭasya lakṣaṇāni nibodhata svapne'vagāhate'tyarthaṁ jalaṁ muṇḍāṁśca paśyati

याज्ञवल्क्य ने कहा — विनायक-ग्रस्त व्यक्ति के लक्षणों को समझो। वह स्वप्न में स्वयं को अत्यधिक जल में डूबता हुआ, तथा मुण्डित सिर वालों को देखता है,

श्लोक 2 (garuda.1.100.2)

विमना विफलारम्भः संसदित्यनिमित्ततः । राजा राज्यं कुमारी च पतिं पुत्रं च गुर्विणी

vimanā viphalārambhaḥ saṁsadityanimittataḥ rājā rājyaṁ kumārī ca patiṁ putraṁ ca gurviṇī

उदास हो जाता है, उसके कार्य असफल होते हैं, बिना कारण कलह होता है। राजा राज्य नहीं पाता, कुमारी पति नहीं पाती, और गर्भवती पुत्र नहीं पाती —

श्लोक 3 (garuda.1.100.3)

नाप्नुयात्स्नापनं तस्य पुण्येऽह्निविधिपूर्वकम् । गौरसर्षपकल्केन साज्येनोत्सारितस्य तु

nāpnuyātsnāpanaṁ tasya puṇye'hnividhipūrvakam gaurasarṣapakalkena sājyenotsāritasya tu

इस अवस्था में। ऐसे व्यक्ति के लिए किसी पुण्य दिन विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिए। सरसों के लेप को घी सहित लगाकर —

श्लोक 4 (garuda.1.100.4)

सर्वौषधैः सर्वगन्धैर्विलिप्तशिरसस्तथा । भद्रासनोपविष्टस्य स्वस्ति वाच्यं द्विजाञ्छुभान्

sarvauṣadhaiḥ sarvagandhairviliptaśirasastathā bhadrāsanopaviṣṭasya svasti vācyaṁ dvijāñchubhān

तथा उसके सिर पर सभी औषधियाँ और सभी गंध लगाकर, भद्रासन पर बिठाकर, शुभ ब्राह्मणों से आशीर्वचन कहलवाना चाहिए।

श्लोक 5 (garuda.1.100.5)

मृत्तिकां रोचनां गन्धान् गुग्गुलुं चाप्सु निः क्षिपेत् । या आहृता एकवर्णैश्चतुर्भिः कलशैर्ह्रदात्

mṛttikāṁ rocanāṁ gandhān gugguluṁ cāpsu niḥ kṣipet yā āhṛtā ekavarṇaiścaturbhiḥ kalaśairhradāt

मिट्टी, रोचना, गंध और गुग्गुल को जल में डाले — वह जल जो एक ही रंग के चार कलशों में सरोवर से लाया गया हो,

श्लोक 6 (garuda.1.100.6)

चर्मण्यानुडुहे रक्ते स्थाप्यं भद्रासने तथा । सहस्त्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं स्मृतम्

carmaṇyānuḍuhe rakte sthāpyaṁ bhadrāsane tathā sahastrākṣaṁ śatadhāramṛṣibhiḥ pāvanaṁ smṛtam

जो लाल बैल के चमड़े पर, भद्रासन के ऊपर रखा जाए। इस जल को ऋषियों ने 'सहस्राक्ष, शतधार' — पवित्र करने वाला — कहा है।

श्लोक 7 (garuda.1.100.7)

तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते । भगं तु वरुणो राजा भगं सूर्य्यो बृहस्पतिः

tena tvāmabhiṣiñcāmi pāvamānyaḥ punantu te bhagaṁ tu varuṇo rājā bhagaṁ sūryyo bṛhaspatiḥ

'इससे मैं तुम्हारा अभिषेक करता हूँ; पावमानी ऋचाएँ तुम्हें पवित्र करें। राजा वरुण भाग्य दें, सूर्य और बृहस्पति भाग्य दें,

श्लोक 8 (garuda.1.100.8)

भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः । यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्द्धनि

bhagamindraśca vāyuśca bhagaṁ saptarṣayo daduḥ yatte keśeṣu daurbhāgyaṁ sīmante yacca mūrddhani

इन्द्र और वायु भाग्य दें, सप्तर्षियों ने भाग्य दिया है। तुम्हारे केशों में जो दुर्भाग्य है, सिर के मध्य-भाग में जो है,

श्लोक 9 (garuda.1.100.9)

ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्घ्नुंतु ते सदा । स्नातस्य सार्षपं तैलं स्नुवेणौदुम्बरेण तु

lalāṭe karṇayorakṣṇorāpastadghnuṁtu te sadā snātasya sārṣapaṁ tailaṁ snuveṇaudumbareṇa tu

ललाट, कानों और आँखों में जो है — जल उसे सदा नष्ट करे।' स्नान के बाद सरसों के तेल को औदुम्बर की स्रुवा से,

श्लोक 10 (garuda.1.100.10)

जुहुयान्मूर्द्धनि कुशान्सव्येन परिगृह्य च । मितश्चसमितश्चैव तथा शालकटङ्कटौ

juhuyānmūrddhani kuśānsavyena parigṛhya ca mitaścasamitaścaiva tathā śālakaṭaṅkaṭau

बाएँ हाथ में कुश पकड़कर सिर पर हवन करना चाहिए। मित और समित नामक मन्त्रों से, तथा शालकटंकट से भी —

श्लोक 11 (garuda.1.100.11)

कुष्माण्डो राजपुत्रश्च अन्ते स्वाहासमन्वितैः । दद्याच्चतुष्पथे भूमौ कुशानास्तीर्य्य सर्वशः

kuṣmāṇḍo rājaputraśca ante svāhāsamanvitaiḥ dadyāccatuṣpathe bhūmau kuśānāstīryya sarvaśaḥ

कुष्माण्ड और राजपुत्र नामक अंत में स्वाहा सहित मंत्रों से आहुति दें। चौराहे पर, भूमि पर सर्वत्र कुश बिछाकर अर्पित करे —

श्लोक 12 (garuda.1.100.12)

कृताकृतांस्तण्डुलांश्च पललौदनमेव च । पुष्पं चित्रं सुगन्धं च सुरां च त्रिविधामपि

kṛtākṛtāṁstaṇḍulāṁśca palalaudanameva ca puṣpaṁ citraṁ sugandhaṁ ca surāṁ ca trividhāmapi

पके और कच्चे चावल, तथा तिल-मिश्रित चावल; रंग-बिरंगे सुगंधित फूल, तथा तीनों प्रकार की सुरा भी;

श्लोक 13 (garuda.1.100.13)

मूलकं पूरिकापूपं तथैवौण्डेरकस्रजः । दधि पायसमन्नं च गुडपिष्टं समोदकम्

mūlakaṁ pūrikāpūpaṁ tathaivauṇḍerakasrajaḥ dadhi pāyasamannaṁ ca guḍapiṣṭaṁ samodakam

मूली, पूरी-पुए, तथा गन्ने के फूलों की मालाएँ; दही, खीर, अन्न, गुड़-आटा और मोदक —

श्लोक 14 (garuda.1.100.14)

एतान्सर्वानुपाहृत्य भूमौ कृत्वा ततः शिरः । अम्बिकामुपतिष्ठेच्च दद्यादर्घ्यं कृताञ्जलिः

etānsarvānupāhṛtya bhūmau kṛtvā tataḥ śiraḥ ambikāmupatiṣṭhecca dadyādarghyaṁ kṛtāñjaliḥ

इन सबको लाकर भूमि पर रखकर, फिर सिर झुकाकर अम्बिका के समक्ष उपस्थित होकर हाथ जोड़कर अर्घ्य दे।

श्लोक 15 (garuda.1.100.15)

दूर्वासर्षपपुष्पैश्च पुत्रजन्मभिरन्ततः । कृतस्वस्त्ययनं चैव प्रार्थयेदम्बिकां सतीम्

dūrvāsarṣapapuṣpaiśca putrajanmabhirantataḥ kṛtasvastyayanaṁ caiva prārthayedambikāṁ satīm

दूर्वा, सरसों और फूलों से, तथा अंत में पुत्रजन्म से सम्बन्धित अर्पण से, स्वस्त्ययन करके सती अम्बिका से प्रार्थना करे —

श्लोक 16 (garuda.1.100.16)

रूपं देहि यशोदेहि भाग्यं भगवति ! देहि मे । पुत्रान्देहि श्रियं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे

rūpaṁ dehi yaśodehi bhāgyaṁ bhagavati ! dehi me putrāndehi śriyaṁ dehi sarvānkāmāṁśca dehi me

'हे भगवती! मुझे रूप दो, यश दो, भाग्य दो। मुझे पुत्र दो, श्री दो, और मेरी सब कामनाएँ पूर्ण करो।'

श्लोक 17 (garuda.1.100.17)

ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चाच्छुक्लवस्त्रानुलेपनैः । वस्त्रयुग्मंगुरोर्दद्यासंपूज्य च ग्रहांस्तथा । श्रेयः कर्मफलं विन्द्यात्सूर्यार्चनरतस्तथा

brāhmaṇān bhojayetpaścācchuklavastrānulepanaiḥ vastrayugmaṁgurordadyāsaṁpūjya ca grahāṁstathā śreyaḥ karmaphalaṁ vindyātsūryārcanaratastathā

तत्पश्चात् श्वेत वस्त्र और लेपन के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराए। गुरु को वस्त्र-युगल दे तथा ग्रहों की पूजा करके, सूर्य-अर्चना में रत रहते हुए, शुभ कर्म-फल प्राप्त करे।

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