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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 101

याज्ञवल्क्य-उक्त ग्रहशान्ति-निरूपण

अध्याय 100अध्याय-सूचीअध्याय 102

श्लोक 1 (garuda.1.101.1)

याज्ञवल्क्य उवाच । श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहदृष्ट्यभिचारवान् । ग्रहयंज्ञं समं कुर्य्याद्ग्रहाश्चैते बुधैः स्मृताः

yājñavalkya uvāca śrīkāmaḥ śāntikāmo vā grahadṛṣṭyabhicāravān grahayaṁjñaṁ samaṁ kuryyādgrahāścaite budhaiḥ smṛtāḥ

याज्ञवल्क्य ने कहा — जो श्री की कामना रखता हो, शान्ति चाहता हो, या ग्रहों की दृष्टि अथवा अभिचार से पीड़ित हो, उसे संतुलित ग्रहयज्ञ करना चाहिए। ग्रह इस प्रकार विद्वानों द्वारा स्मरण किए गए हैं —

श्लोक 2 (garuda.1.101.2)

सूर्य्यः सोमो मङ्गलश्च बुधश्चैव बृहस्पतिः । शुक्रः शनैश्चरो राहुः केतुर्ग्रहगणाः स्मृताः

sūryyaḥ somo maṅgalaśca budhaścaiva bṛhaspatiḥ śukraḥ śanaiścaro rāhuḥ keturgrahagaṇāḥ smṛtāḥ

सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु — ये नौ ग्रहगण कहे गए हैं।

श्लोक 3 (garuda.1.101.3)

ताम्रकांस्यस्फाटिकाद्रक्तचन्दनात्स्वर्णकादुभौ । रजतादयसः सीसात्कांस्याद्वर्णान्निबोधत

tāmrakāṁsyasphāṭikādraktacandanātsvarṇakādubhau rajatādayasaḥ sīsātkāṁsyādvarṇānnibodhata

ताँबा, कांसा, स्फटिक, रक्तचंदन, स्वर्ण (दोनों — राहु और केतु के लिए), चाँदी, लोहा, सीसा और कांसा — इनसे बनी वस्तुओं के वर्णों को समझो —

श्लोक 4 (garuda.1.101.4)

रक्तः शुक्लस्तथा रक्तः पीतः पीतः सितोसितः । कृष्णः कृष्णः क्रमाद्वर्णा द्रव्याणि मुनयस्ततः

raktaḥ śuklastathā raktaḥ pītaḥ pītaḥ sitositaḥ kṛṣṇaḥ kṛṣṇaḥ kramādvarṇā dravyāṇi munayastataḥ

लाल, श्वेत, पुनः लाल, पीला, पीला, श्वेत, कृष्ण, कृष्ण और कृष्ण — क्रमशः यही वर्ण हैं, और उन्हीं के अनुसार सामग्री, हे मुनियो!

श्लोक 5 (garuda.1.101.5)

स्थापयेद्गहवर्णानि होमार्थं प्रलिखेत्पटे । स्नापयेद्धोमयेच्चैव ग्रहद्रव्यैर्विधानतः । सुवर्णानि प्रदेयानि वासांसि सुसुमानि च

sthāpayedgahavarṇāni homārthaṁ pralikhetpaṭe snāpayeddhomayeccaiva grahadravyairvidhānataḥ suvarṇāni pradeyāni vāsāṁsi susumāni ca

ग्रहों के वर्णों के अनुसार [मूर्तियाँ] स्थापित करें, हवन के लिए वस्त्र पर आकृति बनाएँ। ग्रहों की सामग्री से विधिपूर्वक स्नान और हवन कराएँ; स्वर्ण और सुंदर वस्त्र देने चाहिए —

श्लोक 6 (garuda.1.101.6)

गन्धाश्च बलयश्चैव धूपो देयश्चगुग्गुलुः । कर्त्तव्यास्तत्र मन्त्रैश्च चरवः प्रतिदैवतम्

gandhāśca balayaścaiva dhūpo deyaścagugguluḥ karttavyāstatra mantraiśca caravaḥ pratidaivatam

गंध, बलि और गुग्गुल की धूप देनी चाहिए। वहाँ प्रत्येक देवता के लिए मन्त्रों सहित चरु (हविष्य) बनाना चाहिए —

श्लोक 7 (garuda.1.101.7)

आकृष्णेन इमंदेवा अग्निर्मूर्द्धादिवः ककुत् । उब्दुध्यस्वेति जुहुयादेभिरेव यथाक्रमम्

ākṛṣṇena imaṁdevā agnirmūrddhādivaḥ kakut ubdudhyasveti juhuyādebhireva yathākramam

'आकृष्णेन', 'इमं देवाः', 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्', और 'उद्बुध्यस्व' — इन्हीं मन्त्रों से क्रमशः आहुति देनी चाहिए —

श्लोक 8 (garuda.1.101.8)

बृहस्पतेपरिदीयेति सर्वे अन्नात्परिसुतम् । शन्नोदेवी कयानश्च केतुंक्रण्वन्निति क्रमात्

bṛhaspateparidīyeti sarve annātparisutam śannodevī kayānaśca ketuṁkraṇvanniti kramāt

'बृहस्पते परिदीय', 'सर्वे अन्नात्परिस्रुत', 'शन्नो देवी', 'कया नः' और 'केतुं कृण्वन्' — इसी क्रम से।

श्लोक 9 (garuda.1.101.9)

अर्कः पलाशः खदिरस्त्वपामार्गोऽथ पिप्पलः । औदुम्बरः शमी दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात्

arkaḥ palāśaḥ khadirastvapāmārgo'tha pippalaḥ audumbaraḥ śamī dūrvā kuśāśca samidhaḥ kramāt

अर्क, पलाश, खदिर, अपामार्ग, पीपल, औदुम्बर, शमी, दूर्वा और कुश — ये क्रमशः [ग्रहों की] समिधाएँ हैं।

श्लोक 10 (garuda.1.101.10)

होतव्या मधुसर्पिर्भ्यां दध्ना चैव समन्वितः । गुडौदनं पायसं च हविष्यं क्षीरषाष्टिकम्

hotavyā madhusarpirbhyāṁ dadhnā caiva samanvitaḥ guḍaudanaṁ pāyasaṁ ca haviṣyaṁ kṣīraṣāṣṭikam

मधु और घी से, दही सहित हवन करना चाहिए; गुड़-चावल, खीर, हविष्य अन्न, और दूध में पकाए चावल —

श्लोक 11 (garuda.1.101.11)

दध्योदनं हविः पूपान्मांसं चित्रान्नमेव च । दद्याद्गहक्रमादेतान् ग्रहेभ्यो भोजनं ततः

dadhyodanaṁ haviḥ pūpānmāṁsaṁ citrānnameva ca dadyādgahakramādetān grahebhyo bhojanaṁ tataḥ

दही-चावल, हविष्य पुए, मांस, और मिश्रित अन्न — इन्हें ग्रहों के क्रम में अर्पित करके, तत्पश्चात् ग्रहों को भोजन दें।

श्लोक 12 (garuda.1.101.12)

धेनुः शङ्खस्तथानड्वान्हेम वासो हयस्तथा । कृष्णा गौरायसं छाग एता वै दक्षिणाः क्रमात् । ग्रहाः पूज्याः सदा यस्माद्रज्यादि प्राप्यते फलम्

dhenuḥ śaṅkhastathānaḍvānhema vāso hayastathā kṛṣṇā gaurāyasaṁ chāga etā vai dakṣiṇāḥ kramāt grahāḥ pūjyāḥ sadā yasmādrajyādi prāpyate phalam

गाय, शंख, बैल, स्वर्ण, वस्त्र, घोड़ा, काली गाय, लोहा, और बकरा — ये क्रमशः दक्षिणाएँ हैं। ग्रह सदा पूज्य हैं, क्योंकि इससे राज्य आदि फल प्राप्त होता है।

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